सतत ऊर्जा बदलाव की दिशा में एक अहम उपलब्धि हासिल करते हुए CSIR-National Chemical Laboratory के वैज्ञानिकों ने डाइमिथाइल ईथर (DME) उत्पादन की स्वदेशी तकनीक विकसित की है। यह एक स्वच्छ रूप से जलने वाला सिंथेटिक ईंधन है, जो भारत की आयातित एलपीजी पर निर्भरता घटाने और घरेलू ऊर्जा व्यवस्था को नया स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत इस समय अपनी 80% से अधिक जीवाश्म ईंधन जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में डीएमई जैसी तकनीकें ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों के लिए बेहद जरूरी मानी जा रही हैं। यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत मिशन की दिशा में देश के प्रयासों को भी मजबूत करती है।
रोजमर्रा के उपयोग के लिए स्वच्छ विकल्प
डाइमिथाइल ईथर को कम प्रदूषण वाला ईंधन माना जाता है। इसके जलने पर पारंपरिक ईंधनों की तुलना में कालिख, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), सल्फर ऑक्साइड (SOx) और हानिकारक कणों का उत्सर्जन काफी कम होता है। स्वच्छ होने के साथ-साथ इसकी ऊष्मा क्षमता एलपीजी के बराबर है, जिससे यह खाना पकाने और घरेलू उपयोग के लिए बेहतरीन विकल्प बनता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि डीएमई के उपयोग के लिए मौजूदा ढांचे में बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी। Bureau of Indian Standards के अनुसार एलपीजी में 20% तक डीएमई मिलाने की अनुमति है। वहीं, 8% डीएमई मिश्रण बिना सिलेंडर, रेगुलेटर या बर्नर में किसी बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे आम घरों के लिए इसे अपनाना आसान हो जाता है।
आर्थिक बचत के साथ पर्यावरण को फायदा
भारत हर साल एलपीजी आयात पर 21,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एलपीजी में केवल 8% डीएमई मिलाने से सालाना करीब 10,000 करोड़ रुपये की बचत संभव है।
यह बचत कल्याणकारी योजनाओं के लिए काफी अहम साबित हो सकती है। Pradhan Mantri Ujjwala Yojana के तहत 10 करोड़ से अधिक परिवारों को एलपीजी कनेक्शन दिए जा चुके हैं। डीएमई के इस्तेमाल से सब्सिडी का बोझ कम होगा और गरीब परिवारों को स्वच्छ ईंधन की बेहतर पहुंच मिल सकेगी।
बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार तकनीक
इस तकनीक की खासियत एक किफायती कैटेलिटिक प्रक्रिया है, जो कम दबाव पर मेथनॉल को डीएमई में बदलती है। इससे तैयार ईंधन को सीधे एलपीजी सिलेंडर में भरा जा सकता है। यह प्रणाली रसायन विज्ञान और रिएक्टर इंजीनियरिंग का प्रभावी मेल है। इस तकनीक को वैज्ञानिक Thirumalaiswamy Raja के नेतृत्व में विकसित किया गया है।
पायलट स्तर पर यह तकनीक रोजाना 250 किलोग्राम उत्पादन क्षमता के साथ सफलतापूर्वक परखी जा चुकी है। अब 2.5 टन प्रतिदिन क्षमता वाले औद्योगिक प्रदर्शन संयंत्र की योजना बनाई जा रही है।
मंजूरी मिलने पर इसे व्यावसायिक स्तर पर 50–100 टन प्रतिदिन उत्पादन तक बढ़ाया जा सकता है, जो इसे मुख्यधारा के ईंधन विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम होगा।
वैज्ञानिकों ने एक लचीला बर्नर भी विकसित किया है, जो एलपीजी, डीएमई या दोनों के मिश्रण से चल सकता है। इसकी दक्षता जांच के लिए इसे राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में परीक्षण हेतु भेजा गया है।
रसोई से आगे, कई क्षेत्रों में उपयोग
शुरुआत में डीएमई का मुख्य उपयोग घरेलू खाना पकाने में होगा, लेकिन इसके इस्तेमाल की संभावनाएं इससे कहीं ज्यादा हैं। यह वाहनों के ईंधन के रूप में, एयरोसोल प्रोपेलेंट के तौर पर हानिकारक सीएफसी के विकल्प में, और औद्योगिक उत्पादन में रासायनिक घटक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यानी डीएमई स्वच्छ ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने में बहुउपयोगी भूमिका निभा सकता है।
भारत में डीएमई का विकास देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का स्वाभाविक विस्तार है—जहां जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता कम कर घरेलू स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
तेल सार्वजनिक उपक्रमों और बायोएनर्जी कंपनियों के बीच साझेदारी और ऐसे प्रोजेक्ट्स के विस्तार से यह तकनीक उत्सर्जन घटाने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण साधन बन सकती है।
असल मायनों में डीएमई की सफलता का पैमाना सिर्फ लागत बचत नहीं होगा, बल्कि यह होगा कि यह देश को कम-कार्बन, मजबूत और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की ओर कितनी तेजी से आगे बढ़ाता है।
स्वदेशी डीएमई तकनीक से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बड़ा कदम, एलपीजी आयात पर निर्भरता होगी कम
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