जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI) ने छात्रों तक शैक्षणिक जानकारी पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया पर बनाए जाने वाले क्लास और बैच ग्रुप को लेकर अपनी व्यवस्था फिर स्पष्ट की है। विश्वविद्यालय ने छात्रों को अनौपचारिक क्लास ग्रुप से दूरी बनाने की सलाह दी है। इसके साथ ही हर क्लास या बैच के आधिकारिक ग्रुप में विश्वविद्यालय की ओर से नामित शिक्षक को शामिल करना जरूरी किया गया है।
विश्वविद्यालय के निर्देश के मुताबिक, पढ़ाई, कक्षाओं, शैक्षणिक गतिविधियों और अन्य जरूरी अकादमिक जानकारी छात्रों तक आधिकारिक ग्रुप के माध्यम से पहुंचाई जाएगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य छात्रों को सही और आधिकारिक जानकारी उपलब्ध कराना तथा अनधिकृत ग्रुप में गलत या अनुचित सामग्री के प्रसार को रोकना है।
हर क्लास के लिए होगा आधिकारिक ग्रुप
नई व्यवस्था के तहत संबंधित क्लास या बैच के लिए एक आधिकारिक सोशल मीडिया ग्रुप बनाया जाएगा। इसमें क्लास प्रतिनिधि एडमिन की भूमिका निभाएगा, जबकि विश्वविद्यालय की ओर से नामित फैकल्टी सदस्य भी ग्रुप का हिस्सा होगा।
शिक्षक की मौजूदगी का उद्देश्य केवल सूचनाएं साझा करना नहीं, बल्कि ग्रुप में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना भी है। विश्वविद्यालय चाहता है कि इन ग्रुप का इस्तेमाल मुख्य रूप से क्लास, पढ़ाई, असाइनमेंट, परीक्षा और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी साझा करने के लिए किया जाए।
JMI की आधिकारिक वेबसाइट पर विश्वविद्यालय छात्रों के लिए अलग-अलग अकादमिक और प्रशासनिक सूचनाएं भी जारी करता है। विश्वविद्यालय में 10 फैकल्टी, 44 विभाग और 30 सेंटर हैं, इसलिए छात्रों तक सही सूचना पहुंचाने के लिए आधिकारिक संचार व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
अनौपचारिक ग्रुप से क्यों बनाई जा रही दूरी?
विश्वविद्यालय के अनुसार, छात्रों की ओर से बनाए गए कुछ अनौपचारिक सोशल मीडिया ग्रुप में अकादमिक बातचीत के अलावा दूसरी गतिविधियां भी होने की शिकायतें सामने आई थीं। कुछ मामलों में आपत्तिजनक या अश्लील सामग्री साझा किए जाने की बात भी सामने आई।
इसी वजह से विश्वविद्यालय ने छात्रों को ऐसे अनौपचारिक ग्रुप से दूरी बनाने और शैक्षणिक जानकारी के लिए आधिकारिक ग्रुप का इस्तेमाल करने की सलाह दी है।
यह कदम ऐसे समय में भी महत्वपूर्ण है जब सोशल मीडिया पर विश्वविद्यालय के नाम से फर्जी सूचनाएं प्रसारित होने के मामले सामने आते रहे हैं। फरवरी 2026 में JMI ने सोशल मीडिया पर वायरल एक फर्जी नोटिफिकेशन को लेकर स्पष्ट किया था कि वह विश्वविद्यालय की ओर से जारी नहीं किया गया था और मामले में दिल्ली पुलिस की साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई गई थी।
डीन और विभागाध्यक्षों को भी जिम्मेदारी
विश्वविद्यालय ने डीन, विभागाध्यक्षों और सेंटर डायरेक्टर्स से कहा है कि वे अपनी संबंधित कक्षाओं और बैच के लिए आधिकारिक ग्रुप बनवाना सुनिश्चित करें। इन ग्रुप में विश्वविद्यालय की ओर से नामित शिक्षक को भी जोड़ा जाएगा।
इस व्यवस्था से छात्रों को पढ़ाई और विश्वविद्यालय से जुड़ी जरूरी जानकारी के लिए अलग-अलग अनौपचारिक ग्रुप पर निर्भर रहने की जरूरत कम होगी। साथ ही छात्रों को यह भी पता रहेगा कि किस ग्रुप में मिलने वाली सूचना विश्वविद्यालय की ओर से अधिकृत है।
सितंबर 2025 में भी जारी हुए थे निर्देश
JMI की ओर से स्पष्ट किया गया है कि आधिकारिक क्लास ग्रुप और उसमें शिक्षक की मौजूदगी से जुड़ी व्यवस्था पूरी तरह नई नहीं है। विश्वविद्यालय ने सितंबर 2025 में भी इस संबंध में निर्देश जारी किए थे। अब उसी व्यवस्था को दोबारा स्पष्ट किया गया है।
पिछले निर्देशों के पीछे भी छात्रों द्वारा बनाए गए कुछ अनौपचारिक सोशल मीडिया ग्रुप में अकादमिक गतिविधियों के अलावा अन्य तरह की सामग्री और बातचीत होने की शिकायतें वजह बनी थीं।
छात्रों को क्या करना चाहिए?
जामिया के छात्रों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे क्लास और पढ़ाई से जुड़ी जानकारी के लिए अपने आधिकारिक क्लास ग्रुप और विश्वविद्यालय के अधिकृत सूचना माध्यमों पर भरोसा करें। किसी सोशल मीडिया ग्रुप में विश्वविद्यालय के नाम से कोई सूचना मिलने पर उसे आधिकारिक स्रोत से सत्यापित करना बेहतर होगा।
JMI अपनी वेबसाइट पर नोटिस और सर्कुलर के जरिए छात्रों को विभिन्न अकादमिक और प्रशासनिक जानकारियां उपलब्ध कराता है। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026 में भी प्रवेश, परीक्षा, अकादमिक कार्यक्रम और अन्य गतिविधियों से संबंधित लगातार सूचनाएं प्रकाशित की जा रही हैं।
देश के स्कूली छात्रों के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT Madras) ने अपने School Connect Program के अक्टूबर 2026 बैच के लिए आवेदन शुरू कर दिए हैं। इस बार खास बात यह है कि कार्यक्रम में पहली बार कक्षा 9वीं के छात्रों को भी शामिल किया गया है। इससे अब कक्षा 9वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं के छात्र IIT Madras के विशेषज्ञों और अन्य प्रमुख संस्थानों के शिक्षकों द्वारा तैयार किए गए अलग-अलग विषयों के शुरुआती स्तर के कोर्स कर सकेंगे।
अक्टूबर 2026 बैच के लिए रजिस्ट्रेशन की अंतिम तारीख 30 सितंबर 2026 है, जबकि कोर्स की शुरुआत 5 अक्टूबर 2026 से होगी। यह 8 सप्ताह का ऑनलाइन कार्यक्रम होगा।
कक्षा 9वीं से ही करियर की दिशा समझने का मौका
IIT Madras के Centre for Outreach and Digital Education (CODE) की ओर से चलाया जा रहा School Connect Program छात्रों को स्कूल की पढ़ाई के साथ अलग-अलग विषयों और करियर क्षेत्रों को समझने का मौका देता है। खास तौर पर कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्रों के लिए इसका उद्देश्य आगे चलकर सही स्ट्रीम चुनने में मदद करना है, जबकि 11वीं और 12वीं के छात्र उच्च शिक्षा और करियर के विकल्पों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
इस कार्यक्रम की एक खास बात यह भी है कि कोर्स अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी उपलब्ध हैं, ताकि भाषा सीखने में बाधा न बने। IIT Madras आने वाले समय में इन मॉड्यूल को सात और भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने पर भी काम कर रहा है।
किन विषयों में कर सकते हैं कोर्स?
School Connect के तहत छात्रों को अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े 17 भविष्य-केंद्रित विषयों में शुरुआती स्तर के कोर्स उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इनमें डेटा साइंस और AI, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स, आर्किटेक्चर एंड डिजाइन, इंजीनियरिंग बायोलॉजिकल सिस्टम्स, मैथ और कंप्यूटिंग, लॉ, एयरोस्पेस, इकोलॉजी, ह्यूमैनिटीज, केमिकल इंजीनियरिंग, इकोनॉमिक्स और फाइनेंस, गेम टेक्नोलॉजी, प्रोडक्ट डिजाइन, मॉलिक्यूलर इंजीनियरिंग, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल ह्यूमैनिटीज जैसे विषय शामिल हैं।
इन कोर्स का मकसद छात्रों को किसी विषय का विशेषज्ञ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें यह समझने का मौका देना है कि किसी क्षेत्र में पढ़ाई और करियर की संभावनाएं क्या हैं। उदाहरण के लिए, Data Science and AI में छात्र डेटा और AI की शुरुआती अवधारणाओं को समझेंगे, जबकि Fundamentals of Aerospace में विमान और अंतरिक्ष से जुड़ी बुनियादी जानकारी दी जाएगी।
इसी तरह Cybersecurity कोर्स में डिजिटल सुरक्षा, पासवर्ड, क्रिप्टोग्राफी, इंटरनेट और साइबर खतरों की बुनियादी समझ दी जाती है। Introduction to Law में संविधान, आपराधिक कानून, कॉन्ट्रैक्ट, टॉर्ट और साइबर लॉ जैसे विषयों की शुरुआती जानकारी दी जाती है। वहीं Humanities Unplugged और Digital Humanities जैसे कोर्स छात्रों को मानविकी और डिजिटल तकनीक के बीच संबंध समझने का अवसर देते हैं।
कैसे होगी पढ़ाई?
School Connect के सभी कोर्स 8 सप्ताह के हैं और ऑनलाइन संचालित होते हैं। इसमें केवल रिकॉर्डेड वीडियो ही नहीं, बल्कि लाइव इंटरैक्टिव सेशन, असाइनमेंट और कंप्यूटर आधारित मूल्यांकन भी शामिल हैं। आम तौर पर हर सप्ताह रिकॉर्डेड लेक्चर उपलब्ध कराए जाते हैं और लाइव सेशन भी आयोजित किया जाता है। असाइनमेंट नियमित अंतराल पर जमा करने होते हैं।
कोर्स की जरूरी शर्तें पूरी करने और मूल्यांकन में सफल होने वाले छात्रों को IIT Madras के Centre for Outreach and Digital Education (CODE) की ओर से आधिकारिक ई-सर्टिफिकेट दिया जाता है।
कौन कर सकता है आवेदन?
यह कार्यक्रम केवल उन छात्रों के लिए है जिनका स्कूल IIT Madras School Connect से पार्टनर है। यानी छात्र सीधे किसी भी स्कूल से व्यक्तिगत रूप से इसमें शामिल नहीं हो सकते। पहले स्कूल का IIT Madras के साथ पार्टनर होना जरूरी है। छात्रों को नामांकन की प्रक्रिया के लिए अपने स्कूल से संपर्क करना होगा।
स्कूल के लिए यह साझेदारी गैर-व्यावसायिक है, लेकिन कोर्स में दाखिला लेने वाले छात्रों से ₹500 का शुल्क लिया जाता है।
देशभर में तेजी से बढ़ रहा है School Connect
IIT Madras के मुताबिक, School Connect Program के साथ अब तक 4,900 से अधिक स्कूल जुड़ चुके हैं, जिनमें भारत के बाहर के 60 से अधिक स्कूल भी शामिल हैं। कार्यक्रम से 1.75 लाख से अधिक छात्र लाभान्वित हो चुके हैं। IIT Madras का लक्ष्य आने वाले वर्षों में इस पहल को देशभर के 25,000 स्कूलों तक पहुंचाना है।
अक्टूबर 2026 बैच के लिए रजिस्ट्रेशन 30 सितंबर तक खुले हैं और कक्षाएं 5 अक्टूबर से शुरू होंगी। इच्छुक छात्रों और अभिभावकों को सबसे पहले अपने स्कूल से यह पता करना चाहिए कि वह IIT Madras School Connect का पार्टनर है या नहीं। इसके बाद उपलब्ध कोर्स और नामांकन की प्रक्रिया की जानकारी ली जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र को जारी किए गए पांच लाख रुपये के निजी मुचलके वाले नोटिस पर बुधवार को कड़ी नाराजगी जताई। यह नोटिस जुलाई में हुए Cockroach Janta Party (CJP) से जुड़े छात्र प्रदर्शन के मामले में जारी किया गया था। खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इन प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में दर्ज FIR रद्द कर चुका है और छात्रों के खिलाफ केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका है।
मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने रखा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि जब कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई पर रोक लगा रखी थी, तो इसके बावजूद कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी किया।
क्या है पूरा मामला?
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के कानून छात्र अक्षत त्रिपाठी को 4 सितंबर 2026 को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में उनसे छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका देने को कहा गया था। इसके अलावा दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग की गई थी।
यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 126 और 135 के तहत शुरू की गई कार्यवाही के बाद हुई थी। नोटिस BNSS की धारा 130 के तहत जारी किया गया था। ऐसी कार्रवाई का उद्देश्य किसी व्यक्ति को सजा देना नहीं, बल्कि संभावित शांति भंग को रोकने के लिए पहले से कानूनी बंधन में रखना होता है।
छात्र पर क्या आरोप लगाए गए थे?
पुलिस रिपोर्ट के आधार पर जारी नोटिस में आरोप लगाया गया था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच कथित तौर पर सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे। उन पर छात्रों को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित करने का भी आरोप लगाया गया।
पुलिस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उनकी गतिविधियों के कारण विश्वविद्यालय परिसर में तनाव पैदा हुआ और आगे चलकर लड़ाई-झगड़े तथा शांति व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी। इसी आधार पर मजिस्ट्रेट ने शांति बनाए रखने के लिए मुचलका लेने की कार्रवाई शुरू की थी।
हालांकि, अक्षत त्रिपाठी ने इन आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से हिस्सा लिया था और उस दौरान वह विश्वविद्यालय की कक्षाओं में नहीं थे।
पांच लाख रुपये के मुचलके का मतलब क्या था?
नोटिस का मतलब यह नहीं था कि छात्र को पांच लाख रुपये तुरंत जमा कराने थे। उससे यह जवाब मांगा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उससे पांच लाख रुपये का निजी मुचलका और दो जमानतदारों से समान राशि के मुचलके क्यों न लिए जाएं।
हालांकि, इतनी बड़ी राशि का मुचलका मांगने को लेकर मामला गंभीर हो गया, खासकर इसलिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट कुछ ही दिन पहले CJP से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के संबंध में महत्वपूर्ण आदेश दे चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या आदेश दिया था?
1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने CJP के नेतृत्व में जुलाई में हुए प्रदर्शनों से जुड़े देशभर के FIR रद्द कर दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि इन प्रदर्शनों में शामिल होने मात्र से छात्रों या युवाओं को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए, हालांकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस सुरक्षा से अलग रखा गया था।
यही वजह है कि अक्षत त्रिपाठी को नया नोटिस जारी किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचने के बाद ज्यादा गंभीर हो गया।
नोटिस वापस लेने के बाद भी कोर्ट क्यों नाराज?
मामला सामने आने के बाद पुलिस ने नोटिस वापस ले लिया। रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने कहा कि जांच के बाद 4 सितंबर को ही नोटिस रद्द कर दिया गया था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि केवल नोटिस वापस ले लेने से मामला खत्म कैसे माना जा सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने इसे उसके आदेश की अवहेलना का मुद्दा बताया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया। LiveLaw और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, CJI ने पूछा कि जब कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक लगाई थी तो कोई मजिस्ट्रेट उस आदेश के विपरीत कार्रवाई कैसे कर सकता है।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता से नोटिस को औपचारिक याचिका के जरिए रिकॉर्ड पर लाने को कहा है। कोर्ट संबंधित अधिकारी से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण भी मांग सकता है। यानी नोटिस वापस हो जाने के बावजूद मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की जांच का रास्ता खुला हुआ है।
इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह सवाल केवल एक छात्र को जारी नोटिस तक सीमित नहीं है। मामला इस बात से जुड़ा है कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बाद निचले स्तर के प्रशासनिक अधिकारी उस आदेश को किस तरह लागू करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की बुधवार की नाराजगी से यह साफ है कि वह अपने आदेशों की अनदेखी को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।
Haryana Education News: हरियाणा के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 10वीं से 12वीं कक्षा के छात्रों के लिए डिजिटल पढ़ाई को मजबूत करने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने छात्रों को दिए गए टैबलेट में इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने के लिए 5 लाख डेटा SIM कार्ड खरीदने को मंजूरी दी है। यह फैसला मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में 7 सितंबर 2026 को हुई हाई पावर्ड परचेज कमेटी (HPPC) की बैठक में लिया गया।
सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य सरकारी स्कूलों के छात्रों को डिजिटल शैक्षणिक सामग्री और तकनीकी संसाधनों तक बेहतर पहुंच देना है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि राज्य सरकार गुणवत्तापूर्ण और तकनीकी शिक्षा पर जोर दे रही है, ताकि छात्र वर्तमान समय की जरूरतों के अनुसार जरूरी कौशल विकसित कर सकें।
5 लाख छात्रों के टैबलेट के लिए खरीदे जाएंगे SIM
हरियाणा सरकार ने 10वीं से 12वीं कक्षा के सरकारी स्कूल छात्रों के लिए पहले ही करीब 5 लाख टैबलेट e-Adhigam कार्यक्रम के तहत उपलब्ध कराए थे। यह कार्यक्रम टैबलेट आधारित व्यक्तिगत और छात्र की जरूरत के अनुसार सीखने की व्यवस्था पर केंद्रित है। हरियाणा सरकार के एक आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, e-Adhigam को 5 मई 2022 को शुरू किया गया था और इसे 10वीं से 12वीं कक्षा के 5 लाख से अधिक सरकारी स्कूल छात्रों तक पहुंचाया गया था।
अब इन टैबलेट के लिए 5 लाख डेटा SIM की खरीद को मंजूरी दी गई है। इससे छात्रों को डिवाइस के जरिए ऑनलाइन पढ़ाई की सामग्री, ई-बुक्स और दूसरे डिजिटल शैक्षणिक संसाधनों तक इंटरनेट के माध्यम से पहुंच मिल सकेगी।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 7 सितंबर की मंजूरी को केवल नए टैबलेट बांटने की घोषणा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक सरकार ने टैबलेट के साथ इस्तेमाल के लिए डेटा SIM की खरीद को मंजूरी दी है।
e-Adhigam योजना का क्या है उद्देश्य?
हरियाणा का e-Adhigam कार्यक्रम सरकारी स्कूलों में डिजिटल माध्यम से पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य छात्रों को उनकी सीखने की जरूरत के अनुसार डिजिटल सामग्री उपलब्ध कराना और पढ़ाई में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना है।
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक इस कार्यक्रम में तीन प्रमुख हिस्से रहे हैं—टैबलेट डिवाइस, इंटरनेट के लिए डेटा SIM और Personalized Adaptive Learning यानी PAL सॉफ्टवेयर। इसका मकसद छात्रों को उनकी सीखने की स्थिति के अनुसार डिजिटल सामग्री उपलब्ध कराना था।
हालांकि, योजना के क्रियान्वयन को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। फरवरी 2026 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इंटरनेट कनेक्टिविटी बंद होने के बाद कई स्कूलों में टैबलेट का इस्तेमाल प्रभावित हुआ और कुछ डिवाइस स्कूलों में रखे रह गए। ऐसे में नई SIM खरीद का फैसला इस डिजिटल शिक्षा व्यवस्था को दोबारा सक्रिय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
छात्रों को कब मिलेंगे नए SIM और कितना डेटा मिलेगा?
सरकार की ओर से अभी तक इन नए SIM कार्ड के वितरण की तारीख, डेटा पैक या रोजाना मिलने वाले डेटा की मात्रा की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए छात्रों और अभिभावकों को फिलहाल इन विवरणों की आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना होगा।
पहले e-Adhigam व्यवस्था में टैबलेट के साथ इंटरनेट कनेक्टिविटी दी गई थी। लेकिन नई खरीद के बाद पुरानी व्यवस्था में क्या बदलाव होंगे और छात्रों को कितना डेटा मिलेगा, इसकी जानकारी सरकार की आगे की प्रक्रिया से स्पष्ट होगी।
डिजिटल शिक्षा के साथ CM Shri Schools पर भी जोर
हरियाणा सरकार सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए दूसरी पहल पर भी काम कर रही है। शिक्षा मंत्री महीपाल धांडा ने फरवरी 2026 में विधानसभा के बजट सत्र के दौरान कहा था कि राज्य में PM SHRI Schools की तर्ज पर CM SHRI Schools शुरू किए जाएंगे। इन स्कूलों में CBSE पैटर्न का पालन करने की बात कही गई थी।
इसके बाद अगस्त 2026 में शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में सरकार ने 250 CM-EEE स्कूलों को राज्य के मॉडल स्कूल के रूप में विकसित करने की योजना की जानकारी दी। इन स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता, इंफ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई के माहौल को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
इस तरह देखा जाए तो हरियाणा सरकार की स्कूली शिक्षा से जुड़ी योजनाओं में डिजिटल पढ़ाई के साथ-साथ आधुनिक स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतर शिक्षण व्यवस्था पर भी जोर दिखाई दे रहा है। 5 लाख डेटा SIM की मंजूरी से e-Adhigam के तहत दिए गए टैबलेट का दोबारा प्रभावी इस्तेमाल बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, योजना का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि SIM छात्रों तक कितनी जल्दी पहुंचते हैं और इंटरनेट सेवा कितनी नियमित रहती है।
CTET 2026 Exam Date: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने CTET 2026 के आवेदन फॉर्म में सुधार के लिए करेक्शन विंडो खोल दी है। जिन उम्मीदवारों ने CTET 2026 के लिए आवेदन किया है, वे 10 सितंबर 2026 तक अपने फॉर्म में जरूरी बदलाव कर सकते हैं। CBSE की ओर से जारी ताजा नोटिस के मुताबिक करेक्शन विंडो 7 सितंबर से उपलब्ध है।
करेक्शन विंडो खुलने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अब CTET 2026 की नई परीक्षा तारीख को लेकर है। पहले 6 सितंबर 2026 को परीक्षा आयोजित की जानी थी, जिसे CBSE ने स्थगित कर दिया था। इसके बाद आवेदन प्रक्रिया दोबारा खोली गई और अब फॉर्म में सुधार का मौका दिया गया है।
उम्मीदवारों के बीच अक्टूबर में परीक्षा होने की चर्चा है। कुछ रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर 9 अक्टूबर 2026 की संभावित तारीख बताई जा रही है। हालांकि, CBSE ने 9 अक्टूबर को CTET परीक्षा की आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की है। इसलिए उम्मीदवारों को इसे अभी संभावित तारीख ही मानना चाहिए।
6 सितंबर की परीक्षा क्यों हुई स्थगित?
CTET 2026 के लिए CBSE ने पहले आवेदन प्रक्रिया शुरू की थी और परीक्षा की तारीख 6 सितंबर 2026 तय की गई थी। बाद में बोर्ड ने परीक्षा स्थगित कर दी और इसके बाद उम्मीदवारों के लिए आवेदन प्रक्रिया दोबारा शुरू की गई।
CBSE की आधिकारिक वेबसाइट पर फिलहाल इस परीक्षा को CTET SEP 2026 के नाम से ही दर्ज किया गया है। बोर्ड के सूचना बुलेटिन में भी परीक्षा का नाम CTET SEPT 2026 है।
इसके बाद दोबारा आवेदन करने वाले और पहले आवेदन कर चुके उम्मीदवारों को अपने फॉर्म में बदलाव का मौका देने के लिए करेक्शन विंडो खोली गई है। यह विंडो 10 सितंबर 2026 तक खुली रहेगी।
क्या 9 अक्टूबर को होगा CTET 2026?
6 सितंबर की परीक्षा स्थगित होने के बाद अक्टूबर में CTET कराने की संभावना को लेकर चर्चा शुरू हुई। इसी बीच 9 अक्टूबर 2026 की तारीख सोशल मीडिया और विभिन्न रिपोर्टों में संभावित परीक्षा तारीख के तौर पर सामने आई।
लेकिन यहां उम्मीदवारों को सावधान रहने की जरूरत है। CBSE ने अभी तक 9 अक्टूबर 2026 को CTET परीक्षा आयोजित करने की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसलिए केवल वायरल खबरों या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर परीक्षा की तैयारी या यात्रा की योजना बनाना ठीक नहीं होगा।
परीक्षा की अंतिम तारीख CBSE की आधिकारिक वेबसाइट पर नोटिस जारी होने के बाद ही निश्चित मानी जाएगी।
दिसंबर 2026 में परीक्षा होने की चर्चा क्यों?
करेक्शन विंडो खुलने के बाद CTET परीक्षा को दिसंबर में कराने की चर्चा भी तेज हुई है। इसकी एक वजह CBSE के नए नोटिस में इस्तेमाल किया गया “CTET SEP-2026” नाम है, जबकि कुछ जगहों पर दिसंबर परीक्षा को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।
हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि CTET 2026 दिसंबर में ही आयोजित किया जाएगा। CBSE की वेबसाइट पर 7 सितंबर को जारी करेक्शन विंडो का नोटिस अभी भी CTET SEP 2026 के नाम से है। वहीं CTET का सूचना बुलेटिन भी सितंबर 2026 परीक्षा के नाम से उपलब्ध है।
इसलिए दिसंबर 2026 की परीक्षा को लेकर चल रही चर्चा को फिलहाल संभावना या अटकल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, आधिकारिक घोषणा के तौर पर नहीं।
उम्मीदवार 10 सितंबर तक क्या कर सकते हैं?
CTET 2026 के उम्मीदवार 10 सितंबर तक अपने आवेदन फॉर्म में उपलब्ध विकल्पों के अनुसार जरूरी सुधार कर सकते हैं। CBSE ने इसके लिए अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर करेक्शन विंडो उपलब्ध कराई है।
उम्मीदवारों को सलाह है कि वे अपने नाम, जन्मतिथि, कैटेगरी, परीक्षा से जुड़ी जानकारी और अन्य जरूरी विवरणों को ध्यान से जांच लें। करेक्शन की सुविधा बंद होने के बाद बदलाव का अवसर सीमित हो सकता है।
CTET 2026 की नई तारीख कब आएगी?
फिलहाल CBSE ने स्थगित परीक्षा के लिए नई तारीख घोषित नहीं की है। आधिकारिक वेबसाइट पर अभी करेक्शन विंडो और CTET SEP 2026 से जुड़े नोटिस ही उपलब्ध हैं।
इसलिए उम्मीदवारों को 9 अक्टूबर या दिसंबर 2026 की तारीख को अंतिम न मानते हुए CBSE की आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना चाहिए। परीक्षा की तारीख घोषित होने के बाद एडमिट कार्ड, परीक्षा शहर और अन्य जरूरी जानकारी भी आधिकारिक पोर्टल के जरिए जारी की जाएगी।
CTET उम्मीदवारों के लिए जरूरी बात
CTET 2026 की परीक्षा तारीख को लेकर इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि 6 सितंबर की पुरानी तारीख पर परीक्षा नहीं हो रही है और नई तारीख अभी आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं हुई है। 10 सितंबर तक करेक्शन विंडो खुली है, जबकि अक्टूबर और दिसंबर दोनों को लेकर अलग-अलग चर्चाएं चल रही हैं।
ऐसे में उम्मीदवारों को सोशल मीडिया पर चल रही तारीखों के बजाय CBSE के आधिकारिक नोटिस को प्राथमिकता देनी चाहिए। परीक्षा की नई तारीख सामने आते ही तैयारी के लिए उपलब्ध समय के अनुसार रणनीति बनाना अधिक सुरक्षित रहेगा।
Supreme Court on Judiciary Criticism: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की आलोचना को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतें आलोचना से बच नहीं सकतीं और न ही उन्हें ऐसा करना चाहिए। न्यायपालिका के कामकाज की निष्पक्ष, तथ्यपरक और रचनात्मक आलोचना संवैधानिक लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है। इससे न्यायिक व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार को बढ़ावा मिलता है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2026 के अपने आदेश में यह बात कही थी। आदेश बाद में अदालत की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया।
अदालत ने साफ किया कि असली अंतर आलोचना और चुप्पी के बीच नहीं है। फर्क जिम्मेदार और तथ्य आधारित चर्चा तथा बिना पर्याप्त जानकारी के किए गए दावों के बीच है।
सुप्रीम कोर्ट ने आलोचना को लेकर क्या कहा?
पीठ ने कहा कि न्यायपालिका एक संस्था के रूप में आलोचना से परहेज नहीं करती और न ही कर सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, जानकारी पर आधारित और रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी आलोचना उचित मंच पर और निष्पक्ष तथा तर्कसंगत प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। खास तौर पर स्कूली पाठ्यक्रम में किसी गंभीर आरोप को शामिल करने से पहले तथ्यों की अच्छी तरह जांच जरूरी है, क्योंकि स्कूल जाने वाले बच्चे अभी सीखने और अपनी समझ विकसित करने की उम्र में होते हैं।
यानी सुप्रीम कोर्ट का संदेश आलोचना पर रोक लगाने का नहीं, बल्कि जिम्मेदार और तथ्य आधारित आलोचना को बढ़ावा देने का है।
किस मामले से जुड़ी है सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी?
यह मामला एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब ‘Exploring Society: India and Beyond’ के एक अध्याय से जुड़ा था। फरवरी 2026 में जारी इस किताब के एक अध्याय में न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा के साथ ‘Corruption in the Judiciary’ यानी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक वाला हिस्सा शामिल था।
इस सामग्री को लेकर विवाद तब बढ़ा जब इसके प्रकाशन की जानकारी सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए किताब की सामग्री की समीक्षा की। 26 फरवरी 2026 को अदालत ने संबंधित किताब के आगे प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर रोक लगा दी थी।
अदालत की शुरुआती चिंता यह थी कि कक्षा 8 के विद्यार्थियों के लिए तैयार पाठ्यक्रम में न्यायपालिका के बारे में इस तरह की सामग्री किस संदर्भ और किस प्रक्रिया के तहत शामिल की गई।
तीन शिक्षाविदों को लेकर क्या हुआ था?
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के आदेश में प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दीवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार को पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक तैयार करने की प्रक्रिया से अलग रखने का निर्देश दिया था।
उस समय अदालत ने कहा था कि इन तीनों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं और केंद्र, राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों तथा सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों को उनसे अलग रहने का निर्देश दिया था। हालांकि, यह निर्देश इन शिक्षाविदों को अदालत के सामने अपना पक्ष रखने का अवसर देने के अधीन था।
बाद में तीनों शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि संबंधित अध्याय तैयार करना किसी एक व्यक्ति का अकेला काम नहीं था, बल्कि यह एक सामूहिक प्रक्रिया थी।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में अपने रुख में बदलाव किया
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों शिक्षाविदों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण पर विचार करते हुए मार्च के आदेश में महत्वपूर्ण बदलाव किया। अदालत ने उन टिप्पणियों को वापस ले लिया जिनमें कहा गया था कि तीनों ने जानबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और कक्षा 8 के विद्यार्थियों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले की टिप्पणियां संबंधित अध्याय की सामग्री के संदर्भ में थीं, न कि तीनों व्यक्तियों के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष के रूप में। केंद्र, राज्य, केंद्रशासित प्रदेश और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों को इन शिक्षाविदों के साथ भविष्य में काम करने के बारे में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की छूट दी गई।
विवादित अध्याय का अब क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा आदेश में दर्ज किया कि केंद्र सरकार की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर विवादित अध्याय में बदलाव किया जा चुका है। संशोधित सामग्री के बाद नई किताबें प्रसार में लाई गई हैं और इसी के बाद अदालत ने मामले की कार्यवाही समाप्त कर दी।
इस तरह यह मामला अब केवल एक पाठ्यपुस्तक में शामिल सामग्री का विवाद नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका की आलोचना लोकतंत्र में स्वीकार्य है, लेकिन ऐसी आलोचना तथ्य, जानकारी और उचित प्रक्रिया पर आधारित होनी चाहिए।
स्कूल की किताबों में सामग्री को लेकर क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
स्कूली पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को किसी संस्था के प्रति अंध समर्थन या विरोध सिखाना नहीं, बल्कि उन्हें सही जानकारी के आधार पर समझ विकसित करने में मदद करना है। इसलिए अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि बच्चों के लिए तैयार की जाने वाली सामग्री में गंभीर दावों और आरोपों की तथ्यात्मक जांच जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख शिक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे यह संकेत मिलता है कि आलोचनात्मक सोच और संस्थागत सम्मान दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन पाठ्यक्रम में शामिल सामग्री तथ्यपरक और जिम्मेदार होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सार
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की आलोचना पर रोक लगाने की बात नहीं कही है। इसके उलट अदालत ने माना है कि निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र में जरूरी है। लेकिन अदालत के अनुसार, आलोचना तथ्यों और पर्याप्त जानकारी पर आधारित होनी चाहिए तथा उसे उचित मंच और प्रक्रिया के माध्यम से सामने रखा जाना चाहिए।
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब से जुड़े इस मामले में विवादित सामग्री को विशेषज्ञ समीक्षा के बाद बदला गया और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही समाप्त कर दी।
रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया से खास बातचीत
भारतीय पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक रामनाथ गोयनका अवार्ड से इस वर्ष सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया आज हिंदी मीडिया जगत का एक जाना-पहचाना नाम हैं। जमीनी रिपोर्टिंग, संवेदनशील मुद्दों पर पैनी नजर और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले आकोदिया ने अपने काम के जरिए लगातार यह साबित किया है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी है।
फिलहाल देश के प्रमुख हिंदी अखबार दैनिक भास्कर से जुड़े अवधेश आकोदिया ने अपने करियर में कई अहम रिपोर्ट्स के जरिए जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया है। उनकी पत्रकारिता में ईमानदारी, जोखिम उठाने का साहस और आम लोगों की आवाज को मंच देने की प्रतिबद्धता साफ नजर आती है।
इस विशेष बातचीत में हम उनसे जानेंगे उनके पत्रकारिता सफर की कहानी, इस सम्मान तक पहुंचने का अनुभव, रिपोर्टिंग के दौरान आई चुनौतियां और आज के दौर में मीडिया की बदलती भूमिका पर उनका नजरिया। पेश है एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' से अवधेश आकोदिया की हुई लंबी वार्ता के सम्पादित अंश:
- सबसे पहले, इस वर्ष रामनाथ गोयनका अवार्ड प्राप्त करने पर आपको कैसा महसूस हुआ?
- यह सम्मान पाना हर भारतीय पत्रकार का सपना होता है। मुझे बेहद गर्व और विनम्रता का अनुभव हो रहा है। यह अवार्ड सिर्फ मेरे काम की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने की जीत है जिसे मैंने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए उजागर किया। इससे यह हौसला मिलता है कि सच्ची पत्रकारिता की कीमत आज भी सबसे ज्यादा है।
- इस पुरस्कार के लिए चुने गए आपके स्टोरी/रिपोर्ट की प्रेरणा क्या थी?
- जयपुर में जब फर्जी एनओसी के सहारे अंग प्रत्यारोपण का मामला सामने आया, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ कुछ डॉक्टरों की मिलीभगत नहीं हो सकती। एक मरीज 35 लाख रुपए दे रहा था और अपनी जान दांव पर लगाने वाले गरीब डोनर को सिर्फ 3 लाख मिल रहे थे। अंतरराष्ट्रीय किडनी माफिया द्वारा गरीबों की इस मजबूरी का फायदा उठाना ही मेरे लिए इस नेक्सस की जड़ों तक जाने की सबसे बड़ी प्रेरणा बना।
- रिपोर्ट तैयार करते समय किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और आपने उन्हें कैसे पार किया?
- बांग्लादेश के ढाका में जाकर अंडरकवर ऑपरेशन करना सबसे बड़ी चुनौती थी। भाषा की दीवार, तंग गलियों में डोनर्स को खोजना और पकड़े जाने का जोखिम बहुत बड़ा था। एक बार रिसिपिएंट के रिश्तेदार ने खुद को इंटेलिजेंस अधिकारी बताकर मेरी कड़ी पूछताछ भी की थी। लेकिन पुख्ता दस्तावेजों, गहरी तैयारी और एक स्थानीय ड्राइवर की मदद से मैंने इस ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाया।
- क्या आपको लगता है कि आज भी गंभीर और ग्राउंड-रिपोर्टिंग को पर्याप्त स्पेस मिल रहा है?
- बिल्कुल। अगर आपकी कहानी में दम है और वह जनता से जुड़ी है, तो स्पेस हमेशा मिलेगा। दैनिक भास्कर जैसे संस्थान आज भी लंबी और जोखिम भरी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीज को पहले पन्ने पर पूरी प्रमुखता देते हैं। पाठक आज भी असली 'खबर' पढ़ना चाहते हैं।
- आज की डिजिटल पत्रकारिता पारंपरिक पत्रकारिता से किस तरह अलग हो चुकी है?
- डिजिटल पत्रकारिता में तात्कालिकता है, वहां सूचना सेकंडों में पहुंचती है। लेकिन पारंपरिक पत्रकारिता गहराई, ठहराव और पुख्ता सबूतों पर काम करती है। डिजिटल आपको बताता है कि 'क्या हुआ', जबकि पारंपरिक पत्रकारिता यह बताती है कि 'क्यों और कैसे हुआ'।
- यूथ जर्नलिस्ट्स के लिए आप क्या सबसे महत्वपूर्ण कौशल मानते हैं?
- जिज्ञासा, धैर्य और दस्तावेजों को पढ़ने की क्षमता। सिर्फ बयानों पर खबरें न बनाएं, आरटीआई (RTI) लगाना सीखें और सरकारी रिकॉर्ड्स की गहराइयों में जाकर सच खोजना सीखें।
- क्या सोशल मीडिया ने पत्रकारिता में जानकारी की गुणवत्ता को प्रभावित किया है?
- दोनों तरह से किया है। इसने आवाज़ों को लोकतांत्रिक बनाया है और कई बार बड़ी लीड्स भी यहीं से मिलती हैं। लेकिन दूसरी तरफ, इसने अफवाहों और एजेंडा-आधारित सूचनाओं का अंबार भी लगा दिया है, जिससे पत्रकार का काम (फैक्ट-चेकिंग) और ज्यादा मुश्किल हो गया है।
- आप ‘स्पीड बनाम अक्यूरेसी’ की चुनौती को कैसे देखते हैं?
- मैं हमेशा 'अक्यूरेसी' (सटीकता) को चुनूंगा। एक गलत खबर तेजी से देकर विश्वसनीयता खोने से बेहतर है कि खबर थोड़ी देर से आए, लेकिन 100% सच हो। दस्तावेजों पर आधारित इन्वेस्टिगेशन में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती।
- जब आप किसी संवेदनशील मुद्दे पर ग्राउंड रिपोर्ट करने जाते हैं, आप तैयारी कैसे करते हैं?
- तैयारी ही सब कुछ है। फील्ड पर जाने से पहले मैं महीनों तक 'पेपर ट्रेल' फॉलो करता हूँ— कंपनियों के रिकॉर्ड, सरकारी टेंडर और ऑडिट रिपोर्ट्स खंगालता हूँ। अंडरकवर होने के लिए अपनी 'डमी प्रोफाइल' की एक-एक बारीकी तैयार करता हूँ ताकि फील्ड पर कोई चूक न हो।
- मैदान में रिपोर्टिंग करते समय आपका सबसे यादगार अनुभव कौन सा रहा?
- आरजीएचएस घोटाले का खुलासा सबसे यादगार रहा। मैंने एक 'डमी मरीज' बनकर सीने में दर्द की झूठी शिकायत की। सभी जांचें सामान्य होने के बावजूद मुझे 7 दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया और फर्जी बिल बनाए गए। मुझे बिना बीमारी के हैवी दवाइयां दी गईं, जिससे मैं वॉशरूम में गिर गया था। वह जानलेवा जोखिम था, लेकिन उस खुलासे से 6500 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा गया।
- फील्ड रिपोर्टिंग में सुरक्षा और मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखते हैं?
- इतने भारी और जोखिम भरे प्रोजेक्ट्स के बीच मैं खुद को शांत रखने के लिए साहित्य की ओर मुड़ता हूँ। बशीर बद्र और अल्लामा इकबाल की शायरी मुझे मानसिक सुकून और ऊर्जा देती है। इसके अलावा, पेशेवर तरीके से काम करना और भावनाओं में न बहना सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है।
- कहानी को मानव आवाज़ देने के लिए आप किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?
- मैं हमेशा यह देखता हूँ कि किसी बड़े घोटाले या नीतिगत नाकामी का सीधा असर अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति पर कैसे पड़ रहा है। सिस्टम की खामियों को जब किसी पीड़ित (चाहे वह शोषित डोनर हो या परेशान आम आदमी) के चेहरे और उसके दर्द के साथ दिखाया जाता है, तभी खबर में जान आती है।
- आज मीडिया पर पक्षपात के आरोप बढ़ रहे हैं। आप निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या करते हैं?
- मैं 'डॉक्यूमेंट्री एविडेंस' (दस्तावेजी सबूतों) पर भरोसा करता हूँ। बयान और विचारधाराएं पक्षपाती हो सकती हैं, लेकिन आरटीआई से निकले सरकारी आंकड़े, बैंक रिकॉर्ड और हिडन कैमरे की फुटेज कभी झूठ नहीं बोलते।
- फेक न्यूज़ और मिसइन्फॉर्मेशन के दौर में पत्रकार सत्यापन को कैसे मजबूत कर सकते हैं?
- पत्रकार को हमेशा मूल स्रोत तक जाना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर यकीन न करें। तकनीकी टूल्स का इस्तेमाल करें, क्रॉस-चेक करें और जब तक दो अलग-अलग स्वतंत्र स्रोतों से खबर की पुष्टि न हो जाए, उसे न छापें।
- क्या आपको लगता है कि मीडिया हाउसों पर बढ़ते कॉर्पोरेट दबाव से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित होती है?
- चुनौतियां हमेशा रही हैं, लेकिन अगर पत्रकार के पास अकाट्य सबूत हैं और संस्थान का संपादकीय नेतृत्व मजबूत है, तो अच्छी खबरें कभी नहीं रुकतीं। मैंने कॉरपोरेट और बड़े राजनीतिक गठजोड़ के खिलाफ रिपोर्टिंग की है और भास्कर ने हमेशा मेरे काम का समर्थन किया है।
- आज के न्यूज़ रूम में डेटा जर्नलिज़्म की क्या भूमिका देखते हैं?
- यह आज की खोजी पत्रकारिता की रीढ़ है। भ्रष्टाचार अब लिफाफों में नहीं, बल्कि टेंडरों, ग्रांट्स और डिजिटल ट्रांजैक्शन में होता है। डेटा में पैटर्न खोजना (जैसे एक ही कंपनी को बार-बार ठेका मिलना या फर्जी डीएनए डेटा का खेल) ही आज सबसे बड़ी खबरें दे रहा है।
- AI-आधारित टूल्स को आप पत्रकारिता के लिए खतरा मानते हैं या अवसर?
- यह एक बेहतरीन अवसर है। मैं व्यक्तिगत रूप से बड़ी रिपोर्ट्स को स्ट्रक्चर करने, डेटा विश्लेषण और यहां तक कि विजुअल्स (इमेज जनरेशन) के लिए AI का उपयोग करता हूँ। यह एक टूल है जो पत्रकार की क्षमता को बढ़ाता है, लेकिन फील्ड रिपोर्टिंग और मानवीय संवेदना की जगह कभी नहीं ले सकता।
- ग्राउंड रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने के लिए मीडिया संस्थानों को क्या कदम उठाने चाहिए?
- संस्थानों को पत्रकारों को समय और संसाधन देने चाहिए। इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग एक या दो दिन का काम नहीं है। एक रिपोर्टर को हफ्तों या महीनों तक एक विषय के पीछे लगने की आज़ादी और कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
- इस पुरस्कार के बाद आपका अगला लक्ष्य या प्रोजेक्ट क्या है?
- मैं सिस्टम में मौजूद 'डिजिटल और टेक्नोलॉजिकल सिंडिकेट्स' की गहराई में उतर रहा हूँ। जैसे ई-वेस्ट की तस्करी और एआई (AI) स्टार्टअप्स के नाम पर हो रहे सरकारी ग्रांट्स के घोटाले। मेरी कोशिश हमेशा उन अंधेरे कोनों को रोशन करने की रहती है जहां आम तौर पर किसी की नजर नहीं जाती।
- जर्नलिज़्म पढ़ रहे छात्रों के लिए आपकी तीन मुख्य सलाह क्या होंगी?
- पहली- खूब पढ़ें और खूब घूमें। दूसरी- सवाल पूछने से कभी न डरें। तीसरी- डेस्क डेस्क खेलने के बजाय फील्ड की धूल फांकें, असली खबरें सड़क और फाइलों के बीच ही मिलती हैं।
- क्या आप महसूस करते हैं कि शैक्षिक संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है?
- सिद्धांत अच्छी तरह पढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन जो चीजें फील्ड में सबसे ज्यादा काम आती हैं— जैसे आरटीआई फाइल करना, बैलेंस शीट पढ़ना, या डार्क वेब/डेटा स्क्रैपिंग— उन्हें पाठ्यक्रम में और अधिक व्यावहारिक रूप से शामिल करने की जरूरत है।
- आज के समय में क्षेत्रीय भाषाओं में पत्रकारिता का भविष्य कैसा दिखता है?
- क्षेत्रीय भाषाएं ही भारत की असली ताकत हैं। सबसे बड़ा इम्पैक्ट वहीं होता है जहां आम जनता आपकी बात समझती है। नीतियां भले ही दिल्ली में बनती हों, लेकिन उनका असर क्षेत्रीय स्तर पर ही दिखाई देता है, इसलिए भाषाई पत्रकारिता का भविष्य बेहद उज्ज्वल और शक्तिशाली है।
भौतिक विज्ञानी मोहम्मद सोइफ अहमद से खास बातचीत
महज 30 वर्ष की उम्र में मोहम्मद सोइफ अहमद प्रतिष्ठित इम्पीरियल कॉलेज लंदन में मैरी स्क्लोडोव्स्का-क्यूरी एक्शंस पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप के तहत अपने शोध प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन उनकी यह यात्रा अत्याधुनिक लैब से नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद के एक ऐसे गांव से शुरू हुई, जहां उनके घर में बिजली तक नहीं थी।
प्रश्न: आप बिना बिजली के बड़े हुए। शुरुआती दिनों की सबसे खास याद क्या है?
- मेरे घर में आठवीं कक्षा तक बिजली नहीं थी। हम रोशनी के लिए लालटेन का इस्तेमाल करते थे और पढ़ाई के लिए एक छोटी सी ढिबरी होती थी। मेरे दादा जितना वहन कर सकते थे, उतना करते थे। उस समय यह सब सामान्य लगता था—बस जिंदगी का हिस्सा था। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि उन्हीं परिस्थितियों ने मेरे अंदर अनुशासन और एकाग्रता विकसित की।
प्रश्न: अपनी शुरुआती स्कूली पढ़ाई के बारे में बताइए।
- मैंने कोमनगर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जहां बुनियादी सुविधाएं बहुत कम थीं। केवल एक इमारत थी जो दफ्तर के रूप में इस्तेमाल होती थी और हम आम के पेड़ के नीचे जूट की चटाई पर बैठकर पढ़ाई करते थे। लेकिन सीखने में कभी कोई कमी नहीं आई। दरअसल, वही साल मेरे लिए सबसे ज्यादा सीख देने वाले रहे।
प्रश्न: आपकी शिक्षा में परिवार की क्या भूमिका रही?
- मैं एक संयुक्त परिवार में बड़ा हुआ, जहां पांच बच्चे साथ पढ़ते थे। हम एक-दूसरे की मदद करते थे। गणित में कोई समस्या होती तो मैं अपने मामा से पूछता, और अंग्रेजी में मेरी मौसी मदद करती थीं। यह एक सहयोगी माहौल था। हमने कभी आर्थिक परेशानियों को बाधा के रूप में नहीं देखा।
प्रश्न: आपने आर्थिक तंगी का जिक्र किया है। इसका आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा?
- हम बहुत सादगी से रहते थे। सुबह का नाश्ता अक्सर नहीं होता था—कभी-कभी स्कूल जाने से पहले बिस्कुट या सत्तू खा लेते थे। जो भी स्थानीय रूप से उपलब्ध होता, वही खाते थे। कई बार कई दिनों तक कच्चे केले या कटहल ही खाना पड़ता था। मछली बहुत कम मिलती थी और मटन तो उससे भी कम। लेकिन हमें कभी कमी महसूस नहीं हुई। हमारे लिए पढ़ाई और खेल सबसे महत्वपूर्ण थे।
प्रश्न: आपके परिवार की स्थिति में बदलाव कब आया?
- सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब मेरे पिता को स्कूल शिक्षक की नौकरी मिली। इससे हमारे जीवन में स्थिरता आई। हम नए घर में शिफ्ट हुए और पहली बार घर में बिजली आई। इससे मेरी पढ़ाई भी बेहतर हो गई।
प्रश्न: स्कूल के बाद आपकी पढ़ाई का सफर कैसे आगे बढ़ा?
- दसवीं के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चला गया, जो मेरे परिवार के लिए एक बड़ा कदम था। बाद में मैंने अलियाह यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में इंटीग्रेटेड एमएससी किया, जिसे मैंने 2018 में पूरा किया। वहीं से मैंने रिसर्च को करियर के रूप में गंभीरता से लेना शुरू किया।
प्रश्न: आईआईटी हैदराबाद में पीएचडी करने का निर्णय कैसे लिया?
- GATE परीक्षा पास करने के बाद यह मौका मिला। पहली बार पश्चिम बंगाल से बाहर जाना मेरे लिए बड़ा बदलाव था, लेकिन आईआईटी हैदराबाद ने मुझे आगे बढ़ने का बेहतरीन मंच दिया। मेरे सुपरवाइजर साई संतोष कुमार रावी ने मुझे हर कदम पर सहयोग दिया।
प्रश्न: अपने रिसर्च को आसान भाषा में समझाइए।
- मेरा शोध इस बात पर केंद्रित है कि जब किसी पदार्थ पर प्रकाश डाला जाता है, खासकर अल्ट्राफास्ट लेजर पल्स के जरिए, तो वह कैसे व्यवहार करता है। इससे हमें सोलर सेल, एलईडी और फोटोडिटेक्टर जैसी तकनीकों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इसका उद्देश्य इन डिवाइसों को अधिक कुशल बनाना है।
प्रश्न: वर्तमान में आप कहां काम कर रहे हैं?
- मैं इस समय स्पेन के IMDEA नैनोसाइंसिया में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के रूप में काम कर रहा हूं। यह एक ऐसा इंटरडिसिप्लिनरी स्थान है, जहां भौतिक विज्ञानी, रसायनज्ञ और जीवविज्ञानी मिलकर एडवांस्ड मैटेरियल्स पर काम करते हैं।
प्रश्न: मैरी क्यूरी फेलोशिप आपके लिए क्या मायने रखती है?
- यह मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर है। नवंबर से मैं इम्पीरियल कॉलेज लंदन में अपना खुद का रिसर्च प्रोजेक्ट लीड करूंगा। यह मेरे लंबे समय के लक्ष्य—भारत में, खासकर किसी IIT या प्रमुख संस्थान में अपना रिसर्च ग्रुप बनाने—की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रश्न: क्या आपने कभी इस तरह के सफर की कल्पना की थी?
- बिलकुल नहीं। दसवीं कक्षा तक मुझे यह भी नहीं पता था कि IIT या पीएचडी क्या होती है। मेरा एकमात्र लक्ष्य अपनी कक्षा में टॉप करना था। बाकी सब कुछ धीरे-धीरे अपने आप होता चला गया।
आम के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करने से लेकर दुनिया के शीर्ष संस्थानों में रिसर्च का नेतृत्व करने तक, सोइफ अहमद की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि मेहनत और जिज्ञासा किसी भी परिस्थिति को पीछे छोड़ सकती है।
प्रख्यात भारतीय लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत
श्रीमोयी पियू कुंडू एक प्रख्यात भारतीय लेखिका, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो भारत में जेंडर, यौनिकता और अविवाहित महिलाओं के जीवन से जुड़े मुद्दों पर अपने काम के लिए जानी जाती हैं। वह “स्टेटस सिंगल” की संस्थापक हैं, जो शहरी अविवाहित महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी पहचान को सामने लाने के लिए समर्पित एक कम्युनिटी और प्लेटफॉर्म है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल के जरिए भी उन्होंने अच्छी पहचान बनाई है। श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न 1: सोशल मीडिया और यूट्यूब पर आपके चैनल और पेज काफी लोकप्रिय हैं, आपने इसकी शुरुआत कैसे की?
- मैंने अपना यूट्यूब चैनल 2024 में, मई महीने में शुरू किया था। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर मैं उससे पहले से ही सक्रिय थी। दरअसल, मैं शुरू से ही अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी रही हूं, इसलिए यह मेरे लिए काफी स्वाभाविक रहा। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए मैंने एक समय किताब भी लिखी और अब पॉडकास्ट करती हूं। माध्यम बदलता रहता है, लेकिन अगर मैं लोगों तक अपनी बात पहुंचा पा रही हूं, तो वही मेरी सफलता है।
प्रश्न 2: आप सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अलग-अलग लोगों के साथ कई विषयों पर चर्चा और इंटरव्यू करती हैं। आपके प्लेटफॉर्म पर मुख्य फोकस किन विषयों पर रहता है?
- अगर आप मेरे यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स देखेंगे, तो पाएंगे कि मेरे अधिकतर विषय और मेहमान महिलाओं से जुड़े होते हैं। मैं कोशिश करती हूं कि समाज में मौजूद महिलाओं के अलग-अलग रूप, उनकी भूमिका और उनके योगदान को सामने लाया जाए। महिलाएं समाज को कैसे प्रभावित कर रही हैं—यह सकारात्मक है या नकारात्मक—इन सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।
मेरे कंटेंट में आमतौर पर इंटरव्यू देने वाली महिलाओं के जीवन और काम के अनुभवों को साझा किया जाता है। यही मेरे पॉडकास्ट और वीडियो का मुख्य विषय होता है। हालांकि हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए हर एपिसोड में विषय भी बदलता रहता है।
प्रश्न 3: आप कई बार राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करती हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है? क्या वे निष्पक्षता से संतुष्ट होते हैं?
- देखिए, राजनीति समाज का एक हिस्सा है। यह अच्छा है या बुरा, इसका निर्णय मैं नहीं करूंगी, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। चूंकि राजनीति पूरे समाज को प्रभावित करती है, इसलिए यह कई बार विवादित भी हो जाती है।
लेकिन मेरा मानना है कि अगर बहस और चर्चा के बाद हम किसी बेहतर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो यह जरूरी और उपयोगी है। ऐसी चर्चाएं समाज के लिए नुकसानदायक नहीं बल्कि फायदेमंद हो सकती हैं।
प्रश्न 4: आप आधुनिक दौर के नए मीडिया की प्रतिनिधि हैं। आज के समय में इस मीडिया को आप कैसे देखती हैं?
- आज के दौर का मीडिया मुख्य रूप से सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित है। 2016 में जियो के आने और 2022 में 5G की शुरुआत के बाद भारत में इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ा है। आने वाले समय में यह और बढ़ेगा।
इससे लोगों तक ज्यादा जानकारी और अलग-अलग विचार आसानी से पहुंच पाएंगे और साझा किए जा सकेंगे।
प्रश्न 5: क्या नया मीडिया वास्तव में पारंपरिक मीडिया जैसे टीवी और अखबार को चुनौती दे पाया है?
- आज 2026 में खड़े होकर मैं कह सकती हूं कि नया मीडिया काफी हद तक पारंपरिक मीडिया पर भारी पड़ा है। अखबार और टीवी अब धीरे-धीरे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं और उनकी जगह OTT और सोशल मीडिया ले रहे हैं।
इस डिजिटल दौर में मीडिया अधिक लोकतांत्रिक हो गया है। अब आम लोग भी अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। हालांकि, हर किसी की राय सभी को पसंद नहीं आती, लेकिन यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
प्रश्न 6: नए मीडिया का भविष्य आप कैसा देखती हैं? और आपके अपने प्लेटफॉर्म को लेकर आगे क्या योजना है?
- मेरे अनुसार नए मीडिया का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। तकनीक के विकास के साथ इस क्षेत्र में और भी नई संभावनाएं सामने आएंगी। लोगों को भी तकनीक के साथ खुद को अपडेट करना होगा और आधुनिक सोच अपनानी होगी, नहीं तो वे इस तेजी से बदलती दुनिया के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।
UPSC टॉपर ए.आर. राजा मोहिदीन से विशेष बातचीत
चेन्नई के रहने वाले ए.आर. राजा मोहिदीन (A.R. Rajah Mohaideen) ने इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग यानी Union Public Service Commission (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 7 हासिल कर शानदार सफलता पाई है। मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा का रास्ता चुना और चार वर्षों की निरंतर तैयारी, स्पष्ट लक्ष्य और कड़ी मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया। प्रस्तुत हैं एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' (Raees Ahmad 'Lali') द्वारा उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंश:
रिजल्ट आने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
ए.आर. राजा मोहिदीन: सच कहूं तो मैं पूरी तरह चौंक गया था। मुझे उम्मीद थी कि मेरा चयन हो सकता है, लेकिन टॉप 10 में, वह भी सिंगल डिजिट रैंक मिलेगी—यह सोचा नहीं था। खुशी भी थी, लेकिन यकीन करने में थोड़ा समय लगा।
आपने UPSC की तैयारी कब शुरू की और कितने साल लगे?
राजा मोहिदीन: मैंने 2022 में तैयारी शुरू की थी। अब इसे चार साल हो चुके हैं। यह सफर लंबा था, लेकिन लगातार मेहनत करता रहा।
जामिया की कोचिंग का आपकी सफलता में कितना योगदान रहा?
राजा मोहिदीन: पहले एक साल मैंने चेन्नई में तैयारी की, लेकिन 2023 में प्रीलिम्स पास नहीं कर पाया। इसके बाद मैंने Jamia Millia Islamia की रेजिडेंशियल कोचिंग अकादमी की प्रवेश परीक्षा दी और चयन हो गया। दिल्ली आने के बाद पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा माहौल मिला। प्रोफेसर समीना बानो मैम और अन्य शिक्षकों ने काफी मार्गदर्शन दिया। यहां की लाइब्रेरी, अखबार और सीनियर्स का सहयोग बहुत मददगार रहा। सीनियर्स ने मेरी गलतियां पहचानने और सुधारने में अहम भूमिका निभाई।
पहले प्रयास में क्या कमी रह गई थी?
राजा मोहिदीन: पहले प्रयास में मैं प्रीलिम्स क्लियर नहीं कर पाया। मैंने मॉक टेस्ट की पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं की थी। हालांकि, उसी समय मैं मेंस की तैयारी भी करता रहा। मेंस की लगातार तैयारी का फायदा इस बार मिला और अच्छे अंक आए।
आपके विषय कौन-कौन से थे?
राजा मोहिदीन: जनरल स्टडीज़ तो सभी के लिए समान होता है। मेरा ऑप्शनल विषय एंथ्रोपोलॉजी था।
आप एमबीबीएस डॉक्टर हैं। फिर सिविल सेवा में आने का फैसला क्यों लिया?
राजा मोहिदीन: मैंने Government Cuddalore Medical College से MBBS किया। मेरी मेडिकल पढ़ाई 2016 में शुरू हुई और 2022 में पूरी हुई। शुरुआत में सिविल सेवा में आने की कोई योजना नहीं थी। लेकिन इंटर्नशिप के दौरान ही कोविड-19 महामारी का समय था। मैंने अपने शहर में सिविल सेवकों को लोगों के लिए दिन-रात काम करते देखा। वहीं से प्रेरणा मिली। मुझे लगा कि एक सिविल सेवक के रूप में मैं समाज के बड़े वर्ग की सेवा कर सकता हूं। इसी सोच ने मुझे ग्रेजुएशन के बाद UPSC की तैयारी के लिए प्रेरित किया।
आपके माता-पिता क्या करते हैं?
राजा मोहिदीन: मेरे माता-पिता शिक्षक रहे हैं और फिलहाल तमिलनाडु के सरकारी कॉलेजों में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हैं।
जो छात्र UPSC की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
राजा मोहिदीन: सबसे जरूरी है कि आपका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। हमेशा याद रखें कि आपने यह परीक्षा क्यों चुनी है। यह सफर लंबा हो सकता है—मुझे चार साल लगे। इस दौरान मानसिक मजबूती और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
दूसरी अहम बात है सिलेबस पर फोकस बनाए रखना। तैयारी बिखरी हुई नहीं होनी चाहिए।
रोज कितने घंटे पढ़ाई करनी चाहिए?
राजा मोहिदीन: मेरे हिसाब से घंटों की गिनती उतनी मायने नहीं रखती। जरूरी यह है कि आप अपना तय लक्ष्य पूरा करें। महीने और हफ्ते का टारगेट बनाएं और उसे हर हाल में पूरा करें। कुछ दिन मैंने पांच घंटे पढ़ाई की, कुछ दिन दस घंटे, लेकिन टारगेट पूरा किया।
सफलता का मूल मंत्र क्या रहा?
राजा मोहिदीन: लक्ष्य की स्पष्टता, नियमित तैयारी, सिलेबस पर पकड़ और मानसिक संतुलन—यही मेरी सफलता की कुंजी रहे।
जैसे-जैसे बैंकिंग तेजी से ब्रांच आधारित सेवाओं से आगे बढ़कर पूरी तरह डिजिटल इकोसिस्टम की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस बदलाव को दिशा देने में प्रोडक्ट मैनेजर्स की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इसी बदलाव के केंद्र में काम कर रहे हैं अभिनव श्रीवास्तव, जो तकनीक, नियामकीय ढांचे और ग्राहक-केंद्रित नवाचार के बीच संतुलन बनाकर काम करते हैं।
भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में सात साल से अधिक के अनुभव के साथ, उन्होंने जटिल व्यावसायिक जरूरतों को सुरक्षित, स्केलेबल और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजिटल प्रोडक्ट्स में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
वर्तमान में अभिनव श्रीवास्तव RBL बैंक में सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। वे बैंक के वेब और मोबाइल प्लेटफॉर्म के लिए पूरे प्रोडक्ट रोडमैप और उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालते हैं। इंजीनियरिंग, UX, मार्केटिंग, कंप्लायंस और ऑपरेशंस टीमों के साथ मिलकर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नवाचार सुरक्षा और नियामकीय मानकों के अनुरूप हो। उनका काम प्रोडक्ट के पूरे जीवनचक्र को कवर करता है—आइडिया से लेकर प्राथमिकता तय करने, डिलीवरी और लॉन्च के बाद सुधार तक—और यह सब डेटा आधारित निर्णयों पर आधारित होता है।
अपने करियर में अभिनव ने IndiaLends, ICICI बैंक और कोटक महिंद्रा प्राइम जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है। यहां उन्हें डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म, ग्राहक अधिग्रहण प्रक्रिया, SaaS और CRM सिस्टम तथा बड़े स्तर पर डिजिटल अपनाने का गहरा अनुभव मिला।
शिक्षा की बात करें तो उन्होंने ICFAI फाउंडेशन फॉर हायर एजुकेशन से मार्केटिंग में MBA और PGPM किया है, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल बिजनेस में BBA किया है। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें सख्त नियामकीय माहौल में प्रभावी डिजिटल प्रोडक्ट तैयार करने की मजबूत समझ देती है।
सवाल: आपकी औपचारिक शिक्षा (MBA, PGPM, BBA) ने बैंकिंग जैसे कड़े नियामकीय सेक्टर में प्रोडक्ट स्ट्रैटेजी और निर्णय लेने की सोच को कैसे प्रभावित किया? उन छात्रों को क्या सलाह देंगे जो मानते हैं कि डिग्री ही टेक और फिनटेक में सफलता की गारंटी है?
- मेरी शिक्षा ने निश्चित रूप से एक मजबूत आधार दिया, लेकिन यह कभी भी अकेला अंतर पैदा करने वाला फैक्टर नहीं रही। BBA से मुझे ग्लोबल लेवल पर बिजनेस की समझ मिली, जबकि MBA और PGPM ने उपभोक्ता व्यवहार, रणनीति और निर्णय लेने की क्षमता को और मजबूत किया। बैंकिंग जैसे रेगुलेटेड सेक्टर में यह संरचित सोच काफी मदद करती है, जहां ग्रोथ, कस्टमर एक्सपीरियंस और कंप्लायंस के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
लेकिन करियर की शुरुआत में ही मुझे यह समझ आ गया था कि डिग्रियां आपको असल दुनिया की जटिलताओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं करतीं। क्लासरूम यह नहीं सिखाता कि अधूरी जरूरतों, स्टेकहोल्डर के दबाव या अचानक आने वाले नियामकीय बदलावों को कैसे संभालना है। यह सब अनुभव से ही आता है। जो छात्र मानते हैं कि डिग्री ही सफलता की गारंटी है, उनसे मैं कहूंगा कि डिग्री आपको मौके तक पहुंचा सकती है, लेकिन वहां टिके रहना आपकी सीखने की गति, अनुकूलन क्षमता और काम करने के तरीके पर निर्भर करता है।
सवाल: सीमित संसाधनों में, जब आप वेब, मोबाइल, CRM और लेंडिंग जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म संभालते हैं, तो निवेश को कैसे प्राथमिकता देते हैं? मौजूदा फीचर्स सुधारने और नए फीचर लॉन्च करने के बीच कैसे फैसला करते हैं?
- जब संसाधन सीमित होते हैं, तो मैं सबसे पहले यह देखता हूं कि ग्राहक या बिजनेस की सबसे बड़ी समस्या कहां है। इसके लिए डेटा अहम भूमिका निभाता है—जैसे हाई ट्रैफिक जर्नी, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स और वे प्लेटफॉर्म जो सीधे रेवेन्यू या कंप्लायंस से जुड़े हों। अगर कोई मौजूदा फीचर किसी जरूरी प्रक्रिया में बाधा बन रहा है, तो पहले उसे सुधारना मेरी प्राथमिकता होती है।
मेरे फैसले के मानदंड साफ होते हैं—ग्राहक पर प्रभाव, बिजनेस वैल्यू, नियामकीय जरूरत और मेहनत के मुकाबले मिलने वाला फायदा। बैंकिंग जैसे सेक्टर में मौजूदा जर्नी को बेहतर बनाना अक्सर कम जोखिम के साथ जल्दी परिणाम देता है, जबकि नए फीचर तभी लाए जाते हैं जब वे नया रेवेन्यू, कंप्लायंस समाधान या स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दें।
सवाल: मैनेजमेंट एजुकेशन और आज के डिजिटल प्रोडक्ट लीडर्स से इंडस्ट्री की अपेक्षाओं के बीच आपको क्या अंतर नजर आता है?
- मैनेजमेंट एजुकेशन फ्रेमवर्क और संरचित सोच सिखाने में अच्छा काम करती है, लेकिन इंडस्ट्री आज ऐसे प्रोडक्ट लीडर्स चाहती है जो अनिश्चित परिस्थितियों में भी परिणाम दे सकें। वास्तविक दुनिया में प्राथमिकताएं तेजी से बदलती हैं और अक्सर अधूरी जानकारी के साथ फैसले लेने पड़ते हैं। एक बड़ा अंतर तकनीकी समझ का भी है। प्रोडक्ट लीडर्स को कोडिंग आना जरूरी नहीं है, लेकिन सिस्टम, APIs और प्लेटफॉर्म की समझ होना जरूरी है ताकि वे इंजीनियरिंग टीम के साथ व्यावहारिक निर्णय ले सकें। इसके अलावा, स्टेकहोल्डर मैनेजमेंट और एग्जीक्यूशन स्किल्स—जहां बिजनेस, टेक, UX, कंप्लायंस और टाइमलाइन का संतुलन बनाना पड़ता है—ये चीजें क्लासरूम से ज्यादा फील्ड एक्सपीरियंस से आती हैं।
सवाल: डिजिटल लेंडिंग या बैंकिंग प्रोडक्ट में आप पूरे लाइफसाइकिल के दौरान किन KPIs को ट्रैक करते हैं और उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं?
- मैं KPIs को सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए देखता हूं कि ग्राहक प्रोडक्ट में कहां अटक रहा है। अधिग्रहण चरण में ट्रैफिक क्वालिटी, CTR और लीड से एप्लिकेशन रेशियो पर नजर रहती है। ऑनबोर्डिंग में हर स्टेप पर ड्रॉप-ऑफ, प्रक्रिया पूरी करने में लगा समय और STP रेट अहम होते हैं। एंगेजमेंट के लिए एक्टिव यूजर्स, फीचर यूसेज और जर्नी कम्प्लीशन देखी जाती है। रिटेंशन में रीपीट यूसेज और रिटर्न रेट्स से भरोसे और जुड़ाव का अंदाजा मिलता है। मोनिटाइजेशन में फंडेड अकाउंट या लोन कन्वर्जन, प्रति ग्राहक रेवेन्यू और क्रॉस-सेल पर फोकस रहता है। इन मेट्रिक्स के आधार पर बैकलॉग को प्राथमिकता दी जाती है, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स सुधारे जाते हैं और UX या मैसेजिंग में बदलाव किए जाते हैं।
सवाल: आपके क्षेत्र में निरंतर सीखने की कितनी अहमियत है और यूनिवर्सिटीज को छात्रों को डिजिटल भविष्य के लिए कैसे तैयार करना चाहिए?
- फिनटेक और बैंकिंग में निरंतर सीखना बेहद जरूरी है क्योंकि तकनीक, नियम और ग्राहक की उम्मीदें लगातार बदलती रहती हैं। जो आज काम करता है, वह कुछ सालों में अप्रासंगिक हो सकता है। यूनिवर्सिटीज को चाहिए कि वे खास टूल्स सिखाने के बजाय समस्या समाधान, आलोचनात्मक सोच और अनिश्चितता के साथ काम करने की क्षमता विकसित करें। रियल वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री केस स्टडी और इंटर्नशिप से छात्रों को तेजी से बदलते डिजिटल इकोसिस्टम की बेहतर समझ मिल सकती है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि छात्र सीखते रहना सीखें, न कि डिग्री के साथ सीखने की प्रक्रिया खत्म मान लें।
करियर, कोर्स, कॉलेज और भविष्य—सब कुछ जरूरी लगता है, सब कुछ स्थायी लगता है। रैंकिंग, वायरल सक्सेस स्टोरीज़, सोशल मीडिया की सलाह और अंतहीन तुलना के बीच आज के छात्र विकल्पों की कमी से नहीं, बल्कि स्पष्टता की कमी से जूझ रहे हैं।
एडइनबॉक्स (Edinbox) की Voices That Educate सीरीज़ के इस संस्करण में Edinbox की वर्टिकल हेड–PR और कम्युनिकेशंस, पूजा खन्ना, BCM स्कूल, लुधियाना की फाउंडर प्रिंसिपल वंदना शाही के साथ एक विचारपूर्ण संवाद करती हैं। वंदना शाही राष्ट्रीय पुरस्कार (2022) से सम्मानित हैं और CBSE डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर भी हैं। छात्र-केंद्रित सोच के लिए जानी जाने वाली वंदना शाही नेतृत्व को करुणा, यथार्थ और विवेक के साथ जोड़ती हैं।
प्रश्न 1: आज एक सफल करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
- कई छात्र मानते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाख़िला या किसी “ट्रेंडिंग” स्ट्रीम का चुनाव सफलता की गारंटी है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। आज करियर लचीले, अनिश्चित और पूरी तरह कौशल-आधारित हैं। अब दुनिया केवल डिग्री पर नहीं, बल्कि सोच की फुर्ती, गहरी दक्षता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समस्या-समाधान क्षमता और लगातार सीखने की भूख पर भरोसा करती है।
आज नियोक्ता डिग्री और पदनाम से आगे देखकर ऐसे लोगों को तलाशते हैं जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, तेज़ी से ढल सकें, सार्थक सहयोग करें और वास्तविक समय में मूल्य जोड़ें। इस बदलते परिदृश्य में सफलता उन्हें मिलती है जो व्यापक अनुभव के साथ किसी एक क्षेत्र में गहरी महारत विकसित करते हैं—जो अलग-अलग विषयों को जोड़ पाते हैं और विशेषज्ञता की मजबूत नींव पर खड़े रहते हैं। अंततः सार्थक करियर शुरुआती लेबल या सीधी रेखाओं से नहीं, बल्कि उद्देश्य, निरंतर प्रयास, नैतिक आधार और बदलाव के साथ आगे बढ़ने के साहस से बनता है।
प्रश्न 2: शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई ग्रेजुएट खुद को तैयार क्यों नहीं मानते?
- असल डिसकनेक्ट इरादों में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। शिक्षा को भले ही इंडस्ट्री-ड्रिवन कहा जाए, पर अक्सर जोर कंटेंट मिलान पर रहता है, क्षमता विकास पर नहीं। सिलेबस उद्योग के ट्रेंड दिखा सकता है, लेकिन कक्षा में अब भी रटने, सही जवाब और परीक्षा प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलती है—जबकि कार्यस्थल पर क्रिटिकल थिंकिंग, सहयोग, निर्णय-क्षमता, अनुकूलन और जिम्मेदारी की मांग होती है।
शिक्षा आज छात्रों को परीक्षाएँ पास कराने के लिए तैयार करती है, अस्पष्ट परिस्थितियों से निपटने के लिए नहीं। दूसरी ओर इंडस्ट्री अनिश्चितता में काम करती है, जहाँ समस्याएँ स्पष्ट नहीं होतीं, समाधान विकसित होते रहते हैं और जवाबदेही सबसे अहम होती है। बदलाव की तेज़ रफ्तार इस अंतर को और बढ़ा देती है, क्योंकि स्थिर सिलेबस गतिशील पेशेवर वास्तविकताओं के साथ कदम नहीं मिला पाते।
वास्तविक तालमेल तब बनेगा जब शिक्षा परीक्षा-केंद्रित से अनुभव-केंद्रित बने—जब सीखने में अनुप्रयोग, चिंतन, मेंटरशिप, नैतिक विवेक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर जोर होगा। तभी ग्रेजुएट खुद को कमजोर नहीं, बल्कि सीखने, अनसीखने और आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व करने के लिए सशक्त महसूस करेंगे।
प्रश्न 3: छात्र परिणाम बेहतर करने के लिए सिस्टम में कौन-से बदलाव तात्कालिक हैं?
- सबसे पहले, अंकों-केंद्रित सोच से सीखने-केंद्रित संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। जब सफलता की परिभाषा केवल परीक्षा तय करती है, तो समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और वास्तविक जीवन में उपयोग पीछे छूट जाते हैं। आकलन का उद्देश्य रैंकिंग नहीं, बल्कि विकास और आत्ममंथन होना चाहिए।
दूसरा, शिक्षकों का सशक्तिकरण और सतत पेशेवर विकास अनिवार्य है। 21वीं सदी के परिणाम पुराने प्रशिक्षण से नहीं मिल सकते। शिक्षकों को समय, भरोसा, स्वायत्तता और सीखने-सहयोग-नवाचार के अवसर चाहिए—सशक्त शिक्षक ही छात्रों को गहराई से जोड़ते हैं।
अंत में, अनुभवात्मक सीख, इंटरडिसिप्लिनरी सोच और जरूरी जीवन कौशल को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। छात्रों को सिर्फ परीक्षा या नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जटिलता, अनिश्चितता और आजीवन सीखने के लिए तैयार किया जाए। यही बदलाव शिक्षा को कठोर ढांचे से उत्तरदायी इकोसिस्टम में बदलेंगे।
प्रश्न 4: AI और डिजिटल टूल्स के दौर में कौन-से मानवीय कौशल और महत्वपूर्ण होंगे?
- जब बुद्धिमत्ता को ऑटोमेट किया जा सकता है, तब शिक्षा का पैमाना “क्या जानते हैं” से “कैसे सोचते हैं और क्या बनते हैं” पर आ जाता है। AI के युग में क्रिटिकल थिंकिंग और नैतिक विवेक सबसे जरूरी होंगे—ताकि सत्य पहचाना जा सके, एल्गोरिदम पर सवाल उठाए जा सकें और मूल्य-आधारित निर्णय लिए जा सकें।
रचनात्मकता और मौलिक सोच नवाचार को परिभाषित करेंगी, क्योंकि मशीनें पैटर्न दोहरा सकती हैं, उद्देश्य नहीं। साथ ही भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और प्रभावी संचार नेतृत्व, सहयोग और भरोसे की बुनियाद हैं। बदलाव सामान्य होगा, तो अनुकूलन क्षमता, लचीलापन और आत्म-जागरूकता दीर्घकालिक प्रासंगिकता तय करेंगे। तकनीक क्षमता बढ़ा सकती है, दिशा इंसानी विवेक और जिज्ञासा ही देती है।
प्रश्न 5: शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना जरूरी है और Edinbox जैसी प्लेटफॉर्म्स विश्वसनीयता कैसे बनाए रखें?
- ईमानदार संवाद वैकल्पिक नहीं, बल्कि भरोसे और सार्थक सीख की नींव है। जानकारी की भरमार में स्पष्टता दावों से ज्यादा अहम है। पारदर्शी संवाद अपेक्षाओं को वास्तविकता से जोड़ता है—वरना शिक्षा लेन-देन बनकर रह जाती है।
एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म्स सीखने वालों और संस्थानों के बीच नैतिक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। सटीकता, संपादकीय ईमानदारी और छात्र-केंद्रित कंटेंट को प्राथमिकता देकर ही विश्वसनीयता बनी रहती है। सत्यापित जानकारी, संतुलित दृष्टिकोण और उद्देश्यपूर्ण सामग्री के साथ संस्थागत सहयोग संभव है। ईमानदार और मूल्य-आधारित संवाद शिक्षा संस्कृति को ऊंचा उठाता है।
प्रश्न 6: विकल्पों और रैंकिंग की भीड़ में छात्रों को क्या फ़िल्टर करना चाहिए?
- आज सबसे बड़ा कौशल है—विवेक। रैंकिंग और सलाह मार्गदर्शन दे सकती हैं, पर आत्म-चिंतन का विकल्प नहीं बननी चाहिए। छात्रों को पूछना चाहिए—“क्या लोकप्रिय है?” नहीं, बल्कि “क्या मेरी ताकत, मूल्यों और दीर्घकालिक विकास से मेल खाता है?”
जो ध्यान के योग्य है, वह गहराई बनाता है—ऐसे प्रोग्राम, मेंटर्स और अनुभव जो सोच, लचीलापन, नैतिकता और ट्रांसफरेबल स्किल्स विकसित करें। रैंकिंग एक समय की प्रतिष्ठा दिखाती है, व्यक्तिगत फिट या बदलाव की तैयारी नहीं। शोर में स्पष्टता भीतर से आती है।
प्रश्न 7: महिला लीडर के रूप में आपके सामने कौन-सी सूक्ष्म चुनौतियाँ रहीं?
- कई चुनौतियाँ खुली नहीं थीं—अदृश्य अपेक्षाएँ और खामोश समझौते। बार-बार योग्यता साबित करने का दबाव, सहानुभूति और अधिकार का संतुलन, बिना मान्यता के भावनात्मक श्रम—ये सब यात्रा को आकार देते हैं। कभी महत्वाकांक्षा को आक्रामकता समझा गया, तो संयम को सहमति।
मैंने रणनीतिक आत्म-जागरूकता और आंतरिक लचीलापन विकसित किया—कब दृढ़ बोलना है, कब परिणामों को बोलने देना है; अपराधबोध के बिना सीमाएँ तय करना; संदेह के बिना महत्वाकांक्षा बनाए रखना। मेंटरशिप, चिंतन और मजबूत मूल्य-प्रणाली मेरे सहारे बने। प्रभावी नेतृत्व पुराने ढाँचों में फिट होने से नहीं, बल्कि सोच-समझकर उन्हें नया रूप देने से आता है।
प्रश्न 8: स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभव छात्रों के फैसलों में कैसे मदद करते हैं?
- कहानियाँ अमूर्त विचारों और वास्तविक जीवन के बीच पुल बनाती हैं। डेटा और रैंकिंग जानकारी देते हैं, लेकिन कहानियाँ मानवीय पहलू दिखाती हैं—सफलता, असफलता और पुनर्निर्माण की जटिलताएँ। इससे छात्र समझते हैं कि करियर अक्सर सीधी राह पर नहीं चलते।
कहानियाँ भावनात्मक जुड़ाव और आत्म-चिंतन पैदा करती हैं, पारंपरिक मानकों से आगे संभावनाएँ दिखाती हैं और उन जटिलताओं से परिचित कराती हैं जिन्हें कोई सिलेबस पूरी तरह नहीं सिखा सकता। वास्तविक यात्राओं से जुड़कर छात्र विवेक, लचीलापन और आत्म-जागरूकता विकसित करते हैं—यह प्रेरणा ही नहीं, अंतर्ज्ञान की शिक्षा है।
प्रश्न 9: शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को आगे किस तरह की बातचीत का नेतृत्व करना चाहिए?
- सूचना देने से आगे बढ़कर शिक्षा मीडिया को विवेक का क्यूरेटर और सार्थक संवाद का उत्प्रेरक बनना होगा। उन्हें यह सवाल उठाने चाहिए कि छात्र क्या सीखते हैं ही नहीं, क्यों और किस उद्देश्य से।
ऑटोमेशन, असमानता और तेज़ सामाजिक बदलाव के दौर में शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक के नैतिक उपयोग, मानसिक स्वास्थ्य, समान अवसर, आजीवन सीख और भविष्य के काम पर चर्चा जरूरी है। सनसनी या रैंकिंग-ड्रिवन नैरेटिव्स के बजाय साक्ष्य-आधारित विमर्श को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा मीडिया ट्रेंड्स रिपोर्ट नहीं करता—संस्कृति गढ़ता है।
प्रश्न 10: छात्रों के लिए वह सलाह जो कम सुनते हैं, पर सबसे जरूरी है?
- उपलब्धियों और तेज़ी के शोर में यह याद नहीं दिलाया जाता कि प्रगति से पहले उद्देश्य आता है। हर कोई जल्दी नहीं खिलता, हर योगदान तुरंत दिखाई नहीं देता। विकास अक्सर खामोशी में परिपक्व होता है—चिंतन, सीखने योग्य गलतियों और शांत दृढ़ता से।
स्थायी सफलता तब आती है जब योग्यता, मूल्य और प्रयास एक दिशा में हों—बिना जल्दबाज़ी। सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं से अर्थ, प्रभाव और भलाई रचना है। करुणा, ईमानदारी और सेवा-भाव से जुड़ी महत्वाकांक्षा न सिर्फ करियर बनाती है, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और आशावादी दुनिया का निर्माण करती है।
भारत की राजनीति में युवा हमेशा एक महत्वपूर्ण शक्ति रहे हैं, लेकिन आज की जेन-जी (Gen Z) अपने पूर्ववर्ती पीढ़ियों से अलग है। यह पीढ़ी केवल भाषण नहीं सुनती, सवाल भी पूछती है। यह केवल वोट नहीं देती, बल्कि सोशल मीडिया, डिजिटल मंचों और सार्वजनिक बहसों के जरिए सत्ता से जवाब भी मांगती है। हाल के पेपर लीक विवादों और भर्ती परीक्षाओं को लेकर हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों ने यह साफ कर दिया है कि युवाओं का धैर्य अब अपनी सीमा पर पहुंच रहा है।
पेपर लीक को केवल परीक्षा प्रणाली की तकनीकी खामी मानना वास्तविक समस्या को नजरअंदाज करना होगा। यह उस गहरे संकट का प्रतीक है, जो वर्षों से शिक्षा, रोजगार और शासन व्यवस्था में जमा हो रहा है। जब कोई परीक्षा रद्द होती है, तो केवल एक प्रश्नपत्र नहीं लीक होता, बल्कि उस व्यवस्था पर से भरोसा भी टूटता है, जिसके सहारे लाखों युवा अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।
भारत का मध्यमवर्ग शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा साधन मानता है। परिवार अपनी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई और कोचिंग पर खर्च करते हैं। कई छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। ऐसे में जब परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी होती है या भर्ती वर्षों तक अटक जाती है, तो इसका असर केवल अभ्यर्थी पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों पर पड़ता है।
युवाओं के गुस्से की जड़ें केवल परीक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। इसके पीछे रोजगार को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी है। उच्च शिक्षा में दाखिले बढ़े हैं, डिग्रियां बढ़ी हैं, लेकिन सम्मानजनक और स्थिर रोजगार की उपलब्धता उसी गति से नहीं बढ़ी। लाखों शिक्षित युवा आज भी ऐसी नौकरियों में काम करने को मजबूर हैं, जो उनकी योग्यता और क्षमता के अनुरूप नहीं हैं। सरकारी नौकरियों की ओर बढ़ता आकर्षण भी इसी असुरक्षा का परिणाम है।
दूसरी ओर, निजी शिक्षा का बढ़ता खर्च और रोजगार की अनिश्चितता परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ा रही है। विश्वविद्यालयों के चमकदार विज्ञापन और बड़े प्लेसमेंट पैकेजों की घोषणाएं अक्सर वास्तविक तस्वीर को छिपा देती हैं। अभिभावक फीस भरते समय भविष्य खरीदने का सपना देखते हैं, लेकिन डिग्री मिलने के बाद भी रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती।
इस पूरी बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू गीग इकॉनमी भी है। लाखों युवा आज डिलीवरी, कैब सेवाओं और फ्रीलांस कार्यों के जरिए रोजगार तो पा रहे हैं, लेकिन उनके पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है। बीमारी, दुर्घटना या काम छिन जाने की स्थिति में उनके पास कोई मजबूत सुरक्षा कवच नहीं होता। रोजगार के बदलते स्वरूप के साथ नीतियों का बदलना भी उतना ही जरूरी है।
इस बीच सोशल मीडिया ने युवाओं को नई ताकत दी है। अब किसी समस्या को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने के लिए बड़े मंचों या राजनीतिक संगठनों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। एक वीडियो, एक पोस्ट या एक अभियान लाखों लोगों को जोड़ सकता है। यही वजह है कि आज का युवा केवल संदेश प्राप्त करने वाला नहीं, बल्कि अपनी बात कहने वाला सक्रिय नागरिक बन चुका है।
लेकिन राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा संदेश यह है कि बेहतर डिजिटल संवाद, बेहतर शासन का विकल्प नहीं हो सकता। आकर्षक वीडियो, प्रभावशाली अभियान और सोशल मीडिया रणनीतियां युवाओं तक पहुंच तो बना सकती हैं, लेकिन वे रोजगार नहीं दे सकतीं, परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी नहीं बना सकतीं और न ही टूटे भरोसे को अपने आप जोड़ सकती हैं।
2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसके संकेत आज दिखाई देने लगे हैं। युवा मतदाता केवल पहचान की राजनीति से संतुष्ट नहीं होगा। वह जाति, धर्म और सांस्कृतिक मुद्दों के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा, अवसर और जवाबदेही पर भी सवाल पूछेगा। वह सरकार से भी जवाब मांगेगा और विपक्ष से भी। उसके लिए सत्ता और विपक्ष दोनों की परीक्षा समान रूप से महत्वपूर्ण होगी।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। लेकिन यही ताकत तब चुनौती बन सकती है जब आकांक्षाओं और अवसरों के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जाए। युवाओं को भाषण नहीं, भरोसा चाहिए। घोषणाएं नहीं, नियुक्तियां चाहिए। वादे नहीं, परिणाम चाहिए।
यदि देश की राजनीति इस संदेश को समय रहते समझ लेती है, तो यह असंतोष बदलाव की ऊर्जा बन सकता है। लेकिन यदि इसे केवल सोशल मीडिया की क्षणिक नाराजगी समझकर नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले वर्षों में यही बेचैनी भारत की राजनीति और शासन व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी होगी।
आज का युवा इंतजार कर रहा है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। उसकी मांग सरल है—मेहनत का सम्मान, अवसर की निष्पक्षता और भविष्य की निश्चितता। लोकतंत्र की असली परीक्षा भी अब इसी कसौटी पर होने वाली है।
बर्फ बनाने वाला वह इंसान, जो अब न्याय के लिए खुद पिघल रहा है
सोनम वांगचुक मौत से लड़ रहे हैं। यह लड़ाई उन ग्लेशियरों की वजह से नहीं है जिन्हें बचाने के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया, न ही उन देशद्रोह के आरोपों की वजह से जो उन्हें झुका नहीं सके। उनकी सबसे बड़ी चुनौती उस व्यवस्था की खामोशी है, जो अपने ही युवाओं की आवाज सुनने को तैयार नहीं है। जंतर-मंतर पर उनके अनशन का 15वां दिन है। न भोजन, न पानी। सिर्फ एक अडिग विश्वास कि शायद उनका यह त्याग देश की सोई हुई संवेदनाओं को जगा सके।
यह किसी सत्ता या पद की मांग के लिए किया जा रहा राजनीतिक अनशन नहीं है। यह भारत के सबसे चर्चित नवप्रवर्तकों में से एक ऐसे व्यक्ति का संघर्ष है, जिसने पूरी जिंदगी असंभव लगने वाली समस्याओं के समाधान खोजे और आज उसी व्यक्ति को व्यवस्था से सिर्फ इतना कहना पड़ रहा है—हमें देखिए, युवाओं की आवाज सुनिए और कुछ कीजिए।
आखिर क्यों अनशन पर बैठे हैं सोनम वांगचुक?
परीक्षा पेपर लीक का बढ़ता संकट
भारत की परीक्षा प्रणाली करोड़ों युवाओं के लिए बेहतर भविष्य और सम्मानजनक जीवन की उम्मीद मानी जाती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में रही है। पिछले एक वर्ष में ही आठ बड़ी सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक या परिणामों में कथित गड़बड़ियों के मामले सामने आए। जब मेहनत के बजाय भ्रष्टाचार सफलता तय करने लगे, तब प्रतिभाशाली छात्रों का भरोसा टूटना स्वाभाविक है। रिपोर्टों के अनुसार, ऐसी घटनाओं से निराश होकर 20 से अधिक युवा अपनी जान तक गंवा चुके हैं।
सोनम वांगचुक की मांग बहुत सीधी है। वे सरकार से जवाबदेही चाहते हैं। न सत्ता परिवर्तन की मांग, न किसी क्रांति की। केवल इतना कि मामलों की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारी तय हो और व्यवस्था में सुधार किया जाए। लेकिन उनके आंदोलन को प्रशासनिक बाधाओं, सीमित सुविधाओं और अपेक्षित सार्वजनिक ध्यान की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
2011 में इसी जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के 11 दिन के अनशन ने तत्कालीन केंद्र सरकार को बातचीत और लोकपाल कानून की दिशा में कदम उठाने के लिए मजबूर किया था। वांगचुक के समर्थकों का मानना है कि आज परिस्थितियां अलग हैं और सरकार जनदबाव का सामना करने के बजाय इंतजार की रणनीति अपना रही है।
आइस स्तूपा बनाने वाले इंजीनियर की प्रेरक यात्रा
वह लड़का जिसने व्यवस्था को चुनौती दी और फिर नया रास्ता बनाया
1966 में लद्दाख के उलेयटोकपो गांव में जन्मे सोनम वांगचुक की जीवन यात्रा प्रेरणा से भरपूर है। उनके पिता राजनीति से जुड़े थे, लेकिन उन्होंने बेटे को विशेष सुविधाएं देने के बजाय एक सामान्य स्कूल में पढ़ने भेजा। कहा जाता है कि बेहतर शिक्षा की तलाश में वांगचुक ने बचपन में घर छोड़ दिया। लद्दाख की कठिन परिस्थितियों ने उन्हें सिखाया कि सबसे बड़ा शिक्षक जीवन का अनुभव और जरूरत होती है।
श्रीनगर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने लद्दाख की समस्याओं—कठोर सर्दी, पानी की कमी, शिक्षा की चुनौतियां और पलायन—को करीब से देखा। उन्होंने शिकायत करने के बजाय समाधान खोजने का रास्ता चुना।
आइस स्तूपा: जिसने रेगिस्तान जैसी जमीन को नई उम्मीद दी
2014 में सोनम वांगचुक ने अपनी सबसे चर्चित खोज आइस स्तूपा दुनिया के सामने पेश की। यह बर्फ का शंकु आकार का ढांचा होता है, जिसमें सर्दियों के दौरान बहते पानी को जमा किया जाता है। गर्मियों में यही बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है और किसानों को उस समय सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराती है, जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी सरलता है। इसमें न बिजली की जरूरत होती है और न ही पंप की। केवल गुरुत्वाकर्षण और वैज्ञानिक डिजाइन के सहारे यह प्रणाली काम करती है। लगभग 50 मीटर ऊंचे बनने वाले ये आइस स्तूपा लाखों लीटर पानी संग्रहित कर सकते हैं और बंजर इलाकों में खेती के लिए नई संभावनाएं पैदा करते हैं।
यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि सोच में बदलाव का उदाहरण भी थी। वांगचुक ने समझा कि लद्दाख की समस्या पानी की कमी नहीं, बल्कि सही समय पर पानी उपलब्ध न होना है। इसलिए उन्होंने प्रकृति से संघर्ष करने के बजाय उसे समझकर समाधान तैयार किया।
SECMOL: ऐसा स्कूल जिसने शिक्षा की परिभाषा बदल दी
1988 में सोनम वांगचुक ने Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) की सह-स्थापना की। यह पारंपरिक स्कूलों से बिल्कुल अलग मॉडल है। लेह के पास स्थित यह परिसर पूरी तरह सौर ऊर्जा पर चलता है, अपने अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण करता है, स्वयं भोजन उगाता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि यहां छात्रों को असफल नहीं माना जाता।
वांगचुक ने ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित की, जिसमें पाठ्यक्रम बच्चे के अनुसार ढलता है, न कि बच्चे को पाठ्यक्रम के अनुसार बदलने के लिए मजबूर किया जाता है।
मिट्टी और स्थानीय सामग्री से बने इस परिसर को इस तरह डिजाइन किया गया है कि -25 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी यह गर्म बना रहता है। यहां छात्र स्वयं सोलर पैनल, ग्रीनहाउस और प्रशासनिक कार्यों का संचालन करते हैं। जिन बच्चों को पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था 'फेल' घोषित कर देती थी, वही SECMOL में आत्मविश्वासी, कुशल और जिम्मेदार युवा बनकर निकलते हैं। यहां किताबों की पढ़ाई के साथ-साथ जीवन और तकनीक से जुड़ी व्यावहारिक शिक्षा को भी समान महत्व दिया जाता है।
लद्दाख से दिल्ली तक की पदयात्रा: जब कदमों ने आवाज़ बनकर देश को झकझोरा
सोनम वांगचुक का सामाजिक आंदोलन केवल विचारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने हमेशा जमीन पर उतरकर संघर्ष किया। वर्ष 2024 में उन्होंने 'क्लाइमेट फास्ट' और लद्दाख से दिल्ली तक पदयात्रा का नेतृत्व किया। इस अभियान का उद्देश्य संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत लद्दाख को विशेष संरक्षण दिलाने की मांग उठाना था, ताकि वहां की भूमि, प्राकृतिक संसाधनों, जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हो सके तथा हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण को अनियंत्रित विकास और बाहरी दबावों से बचाया जा सके।
यह पदयात्रा पूरी तरह अहिंसक थी और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित थी। वांगचुक और उनके समर्थक पहाड़ों, घाटियों और मैदानी इलाकों से पैदल गुजरते हुए गांव-गांव पहुंचे। उन्होंने लोगों से संवाद किया और पर्यावरण संरक्षण व संवैधानिक अधिकारों के पक्ष में जनजागरण अभियान चलाया।
इस आंदोलन के दौरान उन पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए, उन्हें गिरफ्तार किया गया और लगभग छह महीने तक हिरासत में रखा गया। बाद में आरोप सिद्ध नहीं हो सके और उन्हें रिहा कर दिया गया। यह उन्हें दबाव में लाने की कोशिश थी, लेकिन वांगचुक अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।
सोनम वांगचुक की प्रमुख उपलब्धियां
सोनम वांगचुक ने विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं।
जल संरक्षण: उन्होंने आइस स्तूपा तकनीक विकसित की, जिसके माध्यम से लाखों लीटर पानी संग्रहित किया जा सकता है। इस तकनीक ने लद्दाख जैसे शुष्क क्षेत्रों में खेती को नई उम्मीद दी और बाद में इसे हिमालय के अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया गया।
शिक्षा सुधार: SECMOL के माध्यम से उन्होंने हजारों ऐसे छात्रों को नया आत्मविश्वास दिया जिन्हें पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में असफल माना जाता था। यह परिसर पूरी तरह सौर ऊर्जा पर संचालित होता है।
सतत वास्तुकला: उन्होंने लद्दाख में ऐसे भवनों को बढ़ावा दिया जो सौर ऊर्जा आधारित डिजाइन के कारण अत्यधिक ठंड में भी बिना जीवाश्म ईंधन के गर्म रहते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा: सौर ऊर्जा आधारित परिसर और गांवों के विद्युतीकरण के जरिए उन्होंने दूरदराज के इलाकों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता का सफल मॉडल प्रस्तुत किया।
पर्यावरण संरक्षण: हिमालयी पारिस्थितिकी की सुरक्षा के लिए उनके अभियानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाई और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी नीतियों पर चर्चा को गति दी।
संवैधानिक अधिकार: लद्दाख के लिए छठी अनुसूची की मांग को लेकर उन्होंने व्यापक जनसमर्थन जुटाया और इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाई।
सांस्कृतिक संरक्षण: लद्दाखी भाषा, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी उन्होंने कई पहल कीं।
वैश्विक सम्मान: वर्ष 2016 में उन्हें Rolex Award for Enterprise सहित कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। इन उपलब्धियों ने लद्दाख की चुनौतियों और वहां के नवाचारों को वैश्विक पहचान दिलाई।
'3 इडियट्स' और सोनम वांगचुक का संबंध
वर्ष 2009 में रिलीज हुई आमिर खान की सुपरहिट फिल्म '3 इडियट्स' का किरदार 'फुंसुख वांगड़ू' काफी हद तक सोनम वांगचुक के व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है। फिल्म में यह संदेश दिया गया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रटकर परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि सीखना, समझना और नवाचार करना है।
कम ही लोग जानते थे कि इस किरदार के पीछे वास्तविक जीवन में सोनम वांगचुक जैसे नवप्रवर्तक की प्रेरणा थी। उनकी सोच, शिक्षा को लेकर दृष्टिकोण और असंभव लगने वाली समस्याओं के समाधान खोजने की क्षमता ने इस चरित्र को आकार दिया।
हालांकि, फिल्म ने उनके संघर्षों के कठिन पक्ष को नहीं दिखाया। वर्षों तक मिली उपेक्षा, विवाद, कानूनी चुनौतियां, गिरफ्तारी और आंदोलनों की कठिनाइयों को पर्दे पर जगह नहीं मिली। फिल्म ने देश को एक प्रेरणादायक नायक दिखाया, जबकि वास्तविक जीवन में सोनम वांगचुक लगातार लद्दाख और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के लिए संघर्ष करते रहे।
आज जब सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे हैं, तब यह एक विडंबना है कि जिस देश ने उनके जीवन से प्रेरित फिल्मी किरदार का जश्न मनाया, वही देश वास्तविक सोनम वांगचुक की आवाज़ को अनसुना कर रहा है।
यदि सोनम वांगचुक को कुछ हो गया तो क्या होगा?
नैतिकता और लोकतंत्र पर सवाल
यदि सोनम वांगचुक का यह अनशन उनकी मृत्यु के साथ समाप्त होता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं मानी जाएगी, बल्कि इसे भारत के लोकतांत्रिक और नैतिक मूल्यों के लिए गंभीर झटका माना जाएगा। 2011 में अन्ना हजारे के अनशन के समय सरकार सार्वजनिक दबाव के प्रति अधिक संवेदनशील थी, जबकि आज की परिस्थितियों में सरकार पर नैतिक दबाव का प्रभाव पहले जैसा दिखाई नहीं देता।
युवाओं के भरोसे पर असर
परीक्षा पेपर लीक जैसी घटनाओं से निराश होकर जिन युवाओं ने अपनी जान गंवाई, उनके लिए सोनम वांगचुक न्याय और जवाबदेही की मांग उठाने वाले प्रमुख चेहरों में से एक हैं। यदि उनकी मांगों को लगातार अनसुना किया जाता है, तो इससे युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास और कमजोर हो सकता है तथा उनमें निराशा की भावना बढ़ सकती है।
लद्दाख के आंदोलन पर संभावित प्रभाव
सोनम वांगचुक लद्दाख और देश के बाकी हिस्सों के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। यदि उनकी आवाज कमजोर पड़ती है, तो भविष्य में आंदोलन का स्वरूप बदल सकता है और अधिक कट्टर विचारों को बढ़ावा मिल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि
पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित सोनम वांगचुक के साथ होने वाले किसी भी गंभीर घटनाक्रम का असर भारत की वैश्विक छवि पर भी पड़ सकता है। ऐसे मामले मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में भी उठ सकते हैं।
सोनम वांगचुक के संघर्ष से क्या सीख मिलती है?
सोनम वांगचुक का पूरा जीवन इस बात का उदाहरण रहा है कि कठिन परिस्थितियों में भी समाधान खोजे जा सकते हैं। उन्होंने उन बच्चों के लिए शिक्षा का नया मॉडल तैयार किया जिन्हें पारंपरिक व्यवस्था में असफल माना जाता था। पानी की कमी जैसी चुनौती का समाधान आइस स्तूपा तकनीक के जरिए निकाला और कई सामाजिक तथा पर्यावरणीय मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी।
वर्तमान अनशन केवल विरोध का एक तरीका नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति उनकी चिंता का प्रतीक है। यह आंदोलन इस सवाल को सामने रखता है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की आवाज सुने जाने के लिए उन्हें इतने कठोर कदम उठाने पड़ें।
उनके साथ अनशन कर रहे अधिकांश छात्र पेशेवर आंदोलनकारी नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे युवा हैं जो परीक्षा प्रणाली और अन्य मुद्दों को लेकर निराश हैं। सोनम वांगचुक स्वयं को उनके और व्यवस्था के बीच एक नैतिक ढाल के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
लेखक की अपील
सरकार, मीडिया और समाज से अपील है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए। अभी भी संवाद और समाधान का रास्ता खुला है। सरकार बातचीत के जरिए स्थिति को संभाल सकती है, प्रशासन मानवीय दृष्टिकोण अपना सकता है और मीडिया इस विषय को व्यापक रूप से सामने ला सकता है।
नागरिकों से भी आग्रह है कि वे केवल फिल्मों या सोशल मीडिया पर प्रेरणादायक कहानियों की सराहना करने तक सीमित न रहें, बल्कि वास्तविक जीवन में समाज और देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
सोनम वांगचुक ने अपना जीवन न्याय, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और समाज के हित में समाधान खोजने के लिए समर्पित किया है। उनके जैसे व्यक्ति की आवाज को अनसुना करना केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि उन मूल्यों की भी अनदेखी होगी जिन पर लोकतांत्रिक समाज आधारित होता है।
हिमालय की चोटियां, देश के युवा और समाज इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे हैं। अब यह सरकार, संस्थाओं और नागरिकों पर निर्भर है कि वे इस चुनौती का जवाब संवाद और संवेदनशीलता से देते हैं या नहीं।
भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र की तस्वीर पिछले एक दशक में तेजी से बदली है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE) 2023-24 की रिपोर्ट इस बदलाव की पुष्टि करती है। कुल नामांकन का 4.50 करोड़ तक पहुंचना, छात्राओं की बढ़ती भागीदारी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि तथा विज्ञान और तकनीकी शिक्षा में बढ़ती रुचि यह बताती है कि देश में उच्च शिक्षा पहले की तुलना में अधिक सुलभ और समावेशी हुई है। यह उपलब्धि निश्चित रूप से उत्साहजनक है, लेकिन यह केवल आधी तस्वीर है। असली चुनौती अब इस बढ़ती संख्या को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर रोजगार के अवसरों में बदलने की है।
पिछले दस वर्षों में उच्च शिक्षा में 31.5 प्रतिशत की वृद्धि केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव का संकेत भी है। खासकर छात्राओं का नामांकन 42 प्रतिशत से अधिक बढ़ना और जेंडर पैरिटी इंडेक्स (GPI) का लगातार 1.0 से ऊपर रहना दर्शाता है कि परिवारों की सोच बदल रही है। लड़कियां अब केवल स्कूल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भी बड़ी संख्या में पहुंच रही हैं। यह बदलाव भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
सकारात्मक पहलू यह भी है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। लंबे समय तक उच्च शिक्षा से दूर रहे समुदायों का विश्वविद्यालयों तक पहुंचना सामाजिक न्याय की दिशा में एक अहम कदम है। लेकिन केवल प्रवेश दिला देना पर्याप्त नहीं होगा। इन विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, आर्थिक सहायता, कौशल विकास, शोध के अवसर और बेहतर प्लेसमेंट की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। यदि इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया, तो बढ़ता नामांकन केवल सांख्यिकीय उपलब्धि बनकर रह जाएगा।
रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण संकेत STEM यानी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र से जुड़ा है। इन विषयों में छात्राओं की बढ़ती भागीदारी भारत के तकनीकी भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और डेटा साइंस जैसे क्षेत्रों में वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे समय में यदि अधिक छात्र और विशेषकर छात्राएं इन क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं, तो भारत की ज्ञान अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
हालांकि, AISHE रिपोर्ट उन चुनौतियों की ओर भी अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान दिलाती है, जिन पर अब गंभीरता से काम करने की जरूरत है। आज भी देश के अनेक कॉलेजों में शिक्षकों के पद खाली हैं, कई संस्थानों में आधुनिक प्रयोगशालाओं और डिजिटल संसाधनों का अभाव है, जबकि शोध और नवाचार का स्तर वैश्विक मानकों से काफी पीछे है। कई विश्वविद्यालयों में उद्योगों के साथ सहयोग सीमित है, जिसके कारण डिग्री और रोजगार के बीच का अंतर बना हुआ है। यदि उच्च शिक्षा का विस्तार गुणवत्ता के बिना होगा, तो इसका लाभ सीमित रह जाएगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) ने बहुविषयक शिक्षा, लचीले पाठ्यक्रम, डिजिटल शिक्षा और कौशल आधारित सीखने की जो दिशा तय की है, अब उसे तेजी से लागू करने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं, बल्कि नवाचार, शोध और उद्यमिता के केंद्र बनाना होगा। उद्योगों के साथ मजबूत साझेदारी, इंटर्नशिप, स्टार्टअप संस्कृति और रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम समय की मांग हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि AISHE के आंकड़े संस्थानों द्वारा स्वयं उपलब्ध कराए जाते हैं। इसलिए डेटा की गुणवत्ता और पारदर्शिता को लगातार बेहतर बनाना जरूरी है। विश्वसनीय आंकड़े ही बेहतर नीतियों का आधार बन सकते हैं।
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। ऐसे में उच्च शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास का माध्यम नहीं, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का आधार भी है। AISHE 2023-24 की रिपोर्ट यह भरोसा दिलाती है कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन अब लक्ष्य केवल अधिक छात्रों को कॉलेज तक पहुंचाना नहीं होना चाहिए। असली सफलता तब होगी, जब हर छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल, शोध के अवसर और सम्मानजनक रोजगार मिलेगा।
उच्च शिक्षा की असली परीक्षा अब प्रवेश संख्या से आगे बढ़कर गुणवत्ता, समान अवसर और रोजगार क्षमता पर होगी। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भारत केवल सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली वाला देश बनता है या दुनिया की सबसे सक्षम ज्ञान अर्थव्यवस्था भी।
देशभर में 58 इंजीनियरिंग और तकनीकी कॉलेजों तथा 950 से अधिक तकनीकी पाठ्यक्रमों को बंद करने का अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) का फैसला पहली नजर में एक प्रशासनिक कदम लग सकता है। लेकिन यदि इसकी परतें खोली जाएं, तो यह भारत की तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े गहरे संकट की कहानी कहता है। यह सवाल सिर्फ इतने भर का नहीं है कि कुछ कॉलेज बंद हो गए, बल्कि यह है कि आखिर ऐसे हालात पैदा क्यों हुए कि संस्थानों के दरवाजे ही बंद करने पड़े।
एक समय था जब इंजीनियरिंग की डिग्री सफलता की गारंटी मानी जाती थी। देशभर में बड़ी संख्या में निजी इंजीनियरिंग कॉलेज खुले। हर छोटे-बड़े शहर में नए संस्थान बने और हजारों सीटें तैयार कर दी गईं। उम्मीद थी कि उद्योगों की बढ़ती मांग के साथ इन कॉलेजों से निकलने वाले इंजीनियर देश की आर्थिक प्रगति में अहम भूमिका निभाएंगे। लेकिन समय के साथ तस्वीर बदल गई। कई कॉलेजों में सीटें खाली रहने लगीं, कैंपस प्लेसमेंट कमजोर हो गए और छात्रों का भरोसा भी कम होने लगा।
आज स्थिति यह है कि अनेक इंजीनियरिंग कॉलेज अपनी आधी सीटें भी नहीं भर पा रहे हैं। इसका कारण केवल छात्रों की घटती संख्या नहीं है। असली समस्या शिक्षा की गुणवत्ता, उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रम का अभाव, प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और कमजोर बुनियादी सुविधाएं हैं। यदि किसी संस्थान से पढ़ने के बाद रोजगार की संभावना ही सीमित हो जाए, तो स्वाभाविक है कि छात्र दूसरे विकल्पों की ओर रुख करेंगे।
AICTE का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक स्पष्ट संदेश जाता है कि केवल इमारत खड़ी कर देने से शिक्षा संस्थान नहीं चल सकते। यदि कॉलेज निर्धारित मानकों का पालन नहीं करेंगे, योग्य शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे और छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलेगी, तो ऐसे संस्थानों के अस्तित्व पर सवाल उठना तय है। लंबे समय तक सुधार का अवसर देने के बाद भी यदि स्थिति नहीं बदलती, तो नियामक संस्था के पास सख्त कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
हालांकि इस पूरे मामले का एक सकारात्मक पक्ष भी है। AICTE ने 'प्रोग्रेसिव क्लोजर' की नीति अपनाकर पहले से पढ़ रहे छात्रों के हितों की रक्षा की है। नए प्रवेश रोक दिए जाएंगे, लेकिन वर्तमान छात्रों की पढ़ाई पूरी कराई जाएगी और उन्हें डिग्री भी मिलेगी। यह निर्णय छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने की दृष्टि से संतुलित माना जा सकता है।
लेकिन केवल कॉलेज बंद कर देना समाधान नहीं है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि तकनीकी शिक्षा को दोबारा कैसे मजबूत बनाया जाए। आज उद्योग जगत तेजी से बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं बन रही हैं। यदि इंजीनियरिंग कॉलेज अभी भी पुराने पाठ्यक्रम और पारंपरिक पढ़ाई के सहारे चलेंगे, तो वे छात्रों और उद्योग दोनों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाएंगे।
सरकार, नियामक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि इंजीनियरिंग शिक्षा केवल डिग्री देने तक सीमित न रहे, बल्कि छात्रों को रोजगार योग्य कौशल भी दे। उद्योगों के साथ साझेदारी बढ़े, प्रयोगशालाएं आधुनिक हों, शिक्षकों को नियमित प्रशिक्षण मिले और पाठ्यक्रम समय-समय पर अपडेट किए जाएं। तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य केवल इंजीनियर तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे नवाचारकर्ता तैयार करना होना चाहिए जो देश की आर्थिक और तकनीकी प्रगति में योगदान दे सकें।
इस पूरे घटनाक्रम से छात्रों और अभिभावकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख निकलती है। किसी भी कॉलेज में प्रवेश लेने से पहले केवल उसकी फीस, भवन या प्रचार सामग्री देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। यह जांचना जरूरी है कि संस्थान AICTE से मान्यता प्राप्त है या नहीं, वहां पढ़ाई की गुणवत्ता कैसी है, प्लेसमेंट रिकॉर्ड क्या है और उद्योग जगत से उसका जुड़ाव कितना मजबूत है। चार साल का समय और लाखों रुपये निवेश करने से पहले सही जानकारी जुटाना ही समझदारी है।
58 कॉलेजों का बंद होना किसी व्यवस्था की असफलता का उत्सव नहीं, बल्कि उसे सुधारने का अवसर है। यदि इस फैसले से शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होती है, कमजोर संस्थानों की जगह सक्षम संस्थान विकसित होते हैं और छात्रों को बेहतर तकनीकी शिक्षा मिलती है, तो यह कदम भविष्य के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है। लेकिन यदि इसे केवल आंकड़ों तक सीमित कर दिया गया, तो कुछ वर्षों बाद यही संकट फिर किसी नए रूप में सामने खड़ा होगा। भारत को इंजीनियरों की संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता की जरूरत है, और अब तकनीकी शिक्षा की पूरी व्यवस्था को इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।
भारत में करोड़ों छात्रों के लिए परीक्षा केवल पढ़ाई का आकलन नहीं होती, बल्कि यह उनके सपनों, परिवार की वर्षों की बचत, कोचिंग पर किए गए खर्च और बेहतर भविष्य की उम्मीदों से भी जुड़ी होती है। ऐसे में जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो नुकसान केवल परीक्षा रद्द होने तक सीमित नहीं रहता। इससे छात्रों का उस व्यवस्था पर भरोसा भी कमजोर पड़ता है, जो मेहनत के आधार पर निष्पक्ष अवसर देने का दावा करती है।
पिछले कुछ वर्षों में देश में पेपर लीक की घटनाएं अब इक्का-दुक्का मामले नहीं रह गई हैं। यह समस्या शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। लगातार सामने आ रहे मामले यह दिखाते हैं कि उच्च दांव वाली परीक्षाओं (High-Stakes Exams), जवाबदेही की कमी और शिक्षा की असमान गुणवत्ता ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।
सात वर्षों में 70 से अधिक पेपर लीक के मामले
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों और विभिन्न मामलों के रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में भारत में 70 से अधिक पुष्टि किए गए पेपर लीक के मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं से देशभर में करीब 1.7 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए। यह समस्या केवल भर्ती परीक्षाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्कूल बोर्ड परीक्षाओं और विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं में भी प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आईं, जिससे छात्रों की पढ़ाई और रोजगार दोनों प्रभावित हुए।
साल 2002 से 2025 के बीच परीक्षा से जुड़े मामलों की समीक्षा यह भी बताती है कि दोषियों को सजा मिलने की दर बेहद कम रही है। भर्ती परीक्षाओं, उच्च शिक्षा प्रवेश परीक्षाओं और स्कूल बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े मामलों में 1,658 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 925 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुए। इसके बावजूद केवल दो मामलों में 18 दोषसिद्धियां दर्ज की गईं। गिरफ्तारी और अंतिम सजा के बीच इतना बड़ा अंतर छात्रों के मन में जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
NEET विवाद ने फिर उठाए बड़े सवाल
देश में पेपर लीक की समस्या सबसे ज्यादा चर्चा में तब आई जब NEET-UG 2024 परीक्षा विवाद सामने आया। इस मामले में 22 नवंबर 2024 तक केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) 45 आरोपियों के खिलाफ पांच चार्जशीट दाखिल कर चुका था।
इसके बाद 2026 में पेपर लीक के आरोपों के चलते 20 लाख से अधिक मेडिकल अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। पुनर्परीक्षा के दौरान बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और अतिरिक्त पुलिस सुरक्षा जैसी सख्त व्यवस्थाएं की गईं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही रहा कि अगर व्यवस्था पहले से मजबूत होती, तो दोबारा परीक्षा कराने की जरूरत ही क्यों पड़ती?
छात्रों के लिए पुनर्परीक्षा केवल एक और परीक्षा नहीं होती। इसका मतलब है फिर से यात्रा का खर्च, मानसिक तनाव, प्रवेश प्रक्रिया में देरी और कई बार आर्थिक बोझ। छोटे शहरों और सीमित आय वाले परिवारों के छात्रों को दोबारा यात्रा, रहने और कोचिंग जैसी जरूरतों के लिए अतिरिक्त पैसे जुटाने पड़ते हैं। ऐसे में एक पेपर लीक कई छात्रों के लिए पूरे एक साल की मेहनत पर भारी पड़ सकता है।
सिर्फ सुरक्षा बढ़ाने से हल नहीं होगी समस्या
सरकार ने पेपर लीक रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के तहत प्रश्नपत्र लीक करना, संगठित नकल, फर्जी उम्मीदवार बैठाना और परीक्षा सामग्री तक अवैध पहुंच जैसे अपराधों को दंडनीय बनाया गया है।
हालांकि, केवल कानून सख्त कर देने या परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे, मेटल डिटेक्टर और मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। असली चुनौती यह है कि भारत में शिक्षा और सरकारी नौकरियों के लिए आज भी कुछ चुनिंदा परीक्षाओं पर अत्यधिक निर्भरता है।
जब एक ही परीक्षा किसी छात्र के भविष्य का फैसला करती है, तो गलत तरीके अपनाने की संभावना भी बढ़ जाती है। कोचिंग उद्योग का विस्तार होता है, बिचौलियों की भूमिका बढ़ती है और अफवाहों तथा धोखाधड़ी का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में परीक्षा ज्ञान का आकलन कम और चयन की बाधा अधिक बन जाती है।
सीखने और परीक्षा के बीच बढ़ती खाई
यह संकट तब और गंभीर दिखाई देता है जब इसे बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता से जोड़कर देखा जाए। ASER 2024 रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा 3 के केवल 23.4 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ सही ढंग से पढ़ पा रहे हैं। वहीं, सरकारी और निजी स्कूलों को मिलाकर सिर्फ 33.7 प्रतिशत बच्चे साधारण घटाव (Subtraction) कर पा रहे हैं।
ये आंकड़े बताते हैं कि एक ओर शुरुआती कक्षाओं में बुनियादी पढ़ाई और गणित की क्षमता कमजोर है, वहीं दूसरी ओर छात्रों को बेहद कठिन और प्रतिस्पर्धी प्रवेश तथा भर्ती परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। स्कूलों में सीखने और प्रतियोगी परीक्षाओं की अपेक्षाओं के बीच यह अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।
यदि शुरुआती शिक्षा मजबूत नहीं होगी और आगे चलकर केवल एक परीक्षा के आधार पर छात्रों का भविष्य तय किया जाएगा, तो यह व्यवस्था अवसर देने के बजाय तनाव और असमानता को बढ़ावा देगी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन छात्रों को होगा, जिनकी स्कूली शिक्षा पहले से कमजोर रही है।
सबसे बड़ा नुकसान भरोसे का
हर पेपर लीक शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर करता है। छात्र सोचने लगते हैं कि क्या केवल मेहनत से सफलता मिल सकती है। अभिभावकों को कोचिंग और पढ़ाई पर किए गए निवेश की चिंता सताने लगती है। विश्वविद्यालयों और भर्ती एजेंसियों की प्रक्रियाएं प्रभावित होती हैं और सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।
यह समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश में लाखों ऐसे छात्र हैं, जो अपने परिवार में पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। उनके लिए एक निष्पक्ष परीक्षा ही आगे बढ़ने का सबसे बड़ा अवसर होती है। यदि उसी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो जाए, तो इसका असर केवल एक परीक्षा पर नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र पर पड़ता है।
अब सुधार केवल कानून तक सीमित नहीं रहना चाहिए
भारत को परीक्षा सुरक्षा और तकनीकी निगरानी मजबूत करने की जरूरत है, लेकिन इसके साथ परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार भी जरूरी है। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और डिजिटल रूप से ट्रैक करने योग्य बनाया जाना चाहिए। परीक्षा केंद्रों का नियमित और सख्त ऑडिट होना चाहिए। पेपर लीक की जांच तय समय में पूरी हो और उसके परिणाम सार्वजनिक किए जाएं। केवल बिचौलियों या छात्रों पर कार्रवाई करने के बजाय उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए, जिनकी लापरवाही से ऐसी घटनाएं होती हैं।
साथ ही विश्वविद्यालयों, शिक्षा बोर्डों और भर्ती एजेंसियों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जहां केवल एक परीक्षा पर पूरा भविष्य निर्भर न रहे। जहां संभव हो, वहां कई चरणों में मूल्यांकन, स्कूल के प्रदर्शन, योग्यता परीक्षण, साक्षात्कार, पोर्टफोलियो और विषय आधारित आकलन जैसे विकल्पों को भी शामिल किया जा सकता है। हर प्रक्रिया लिखित परीक्षा से अलग नहीं हो सकती, लेकिन कोई भी व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं होनी चाहिए कि एक पेपर लीक लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित कर दे।
पेपर लीक को अक्सर कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर देखा जाता है, जबकि वास्तव में यह शिक्षा व्यवस्था की गहरी खामियों का संकेत है। जब तक भारत परीक्षा सुरक्षा के साथ-साथ परीक्षा आधारित चयन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएगा, तब तक हर नया पेपर लीक छात्रों के मन में यही सवाल छोड़ जाएगा—क्या जिस व्यवस्था पर उन्हें भरोसा करने के लिए कहा जाता है, वह वास्तव में भरोसे के योग्य है?
भारत की चिकित्सा शिक्षा एक नए बदलाव के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 पोस्टग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा मेडिकल कोर्स में प्रवेश का अंतिम वर्ष होगा। इसके बाद 2027-28 से इन पाठ्यक्रमों में नए दाखिले नहीं होंगे और इन्हें चरणबद्ध तरीके से एमडी (MD) तथा एमएस (MS) डिग्री पाठ्यक्रमों में परिवर्तित किया जाएगा। पहली नजर में यह फैसला केवल पाठ्यक्रमों के पुनर्गठन जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में इसका प्रभाव भारत की चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता तक दिखाई देगा।
बीते कई दशकों से पीजी डिप्लोमा मेडिकल कोर्स उन डॉक्टरों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प रहे हैं, जो कम अवधि में किसी विशेष विषय में प्रशिक्षण लेकर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ना चाहते थे। विशेष रूप से जिला अस्पतालों और छोटे शहरों में कार्यरत डॉक्टरों के लिए यह व्यवस्था काफी उपयोगी मानी जाती थी। लेकिन बदलते समय में चिकित्सा विज्ञान की जटिलताओं, आधुनिक उपचार तकनीकों और वैश्विक मानकों को देखते हुए डिग्री आधारित विशेषज्ञ शिक्षा की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में एनएमसी का यह निर्णय सामने आया है।
इस फैसले का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि देशभर में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा का स्वरूप अधिक समान और मानकीकृत होगा। अभी तक कई संस्थानों में एक ही विषय में डिप्लोमा और डिग्री दोनों प्रकार के पाठ्यक्रम चलते थे, जिससे प्रशिक्षण की अवधि, पाठ्यक्रम और विशेषज्ञता के स्तर में अंतर देखने को मिलता था। यदि सभी सीटें एमडी और एमएस कार्यक्रमों में बदलती हैं तो छात्रों को अधिक व्यापक प्रशिक्षण मिलेगा और उनकी योग्यता का स्तर भी एक समान होगा।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ा है। आधुनिक चिकित्सा में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जटिल बीमारियों के इलाज, नई तकनीकों के उपयोग और अनुसंधान आधारित चिकित्सा के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों का बेहतर प्रशिक्षण आवश्यक है। डिग्री आधारित पाठ्यक्रम इस दिशा में अधिक व्यवस्थित और व्यापक माने जाते हैं। ऐसे में यह बदलाव भविष्य में मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने में भी मदद कर सकता है।
हालांकि इस फैसले के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या देश के सभी मेडिकल कॉलेज एमडी और एमएस सीटों में बदलाव के लिए आवश्यक फैकल्टी, अस्पतालों में मरीजों की संख्या, बुनियादी ढांचे और शिक्षण संसाधनों की शर्तों को पूरा कर पाएंगे? यदि सीटों का रूपांतरण समय पर नहीं हो सका तो स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा में सीटों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर उन हजारों एमबीबीएस स्नातकों पर पड़ेगा जो हर वर्ष पीजी प्रवेश परीक्षा में शामिल होते हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत पहले से ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में। यदि संक्रमण काल के दौरान सीटों की संख्या घटती है या नए डिग्री कार्यक्रम पर्याप्त गति से शुरू नहीं हो पाते, तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों को डिप्लोमा सीटों को एमडी और एमएस में बदलने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और संसाधनों के उचित विकास के साथ पूरी होती है, तो यह भारतीय चिकित्सा शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार साबित हो सकती है। लेकिन यदि आवश्यक बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो इस बदलाव का उद्देश्य अधूरा रह सकता है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था तेजी से बदल रही है। बढ़ती आबादी, नई बीमारियां और आधुनिक चिकित्सा तकनीकें ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की मांग कर रही हैं, जो केवल डिग्रीधारी ही नहीं बल्कि बेहतर प्रशिक्षित भी हों। ऐसे में एनएमसी का यह फैसला भविष्य की जरूरतों के अनुरूप दिखाई देता है। फिर भी किसी भी बड़े शैक्षणिक सुधार की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
यह बदलाव केवल डिप्लोमा कोर्स समाप्त करने का निर्णय नहीं है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को नए स्तर पर ले जाने की कोशिश है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि इस परिवर्तन के दौरान छात्रों के अवसर कम न हों, मेडिकल कॉलेजों की क्षमता बढ़े और देश को अधिक संख्या में योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर मिल सकें। यदि ऐसा होता है, तो यह फैसला आने वाले वर्षों में भारतीय चिकित्सा शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में याद किया जाएगा।
M.Tech After B.Tech: B.Tech के बाद अगर आप इंजीनियरिंग की किसी खास फील्ड में आगे पढ़ाई करना चाहते हैं, रिसर्च में जाना चाहते हैं या किसी तकनीकी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैं, तो M.Tech यानी Master of Technology एक अच्छा विकल्प हो सकता है। M.Tech में छात्रों को अपनी चुनी हुई इंजीनियरिंग या टेक्नोलॉजी की शाखा में एडवांस पढ़ाई के साथ प्रोजेक्ट और रिसर्च का अनुभव भी मिलता है।
भारत में M.Tech में एडमिशन के लिए GATE यानी Graduate Aptitude Test in Engineering सबसे प्रमुख राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है। हालांकि हर संस्थान और हर M.Tech प्रोग्राम में एडमिशन का तरीका एक जैसा नहीं होता। कुछ संस्थान अपने अलग प्रवेश नियम या परीक्षा भी रखते हैं।
अगर आप अगले एडमिशन सत्र की तैयारी कर रहे हैं, तो GATE 2027 registration शुरू हो चुका है। IIT Madras की ओर से आयोजित GATE 2027 के लिए आवेदन 2 सितंबर 2026 से शुरू हुए हैं। बिना लेट फीस के आवेदन की आखिरी तारीख 27 सितंबर 2026 है, जबकि लेट फीस के साथ 5 अक्टूबर 2026 तक आवेदन किया जा सकता है। GATE 2027 की परीक्षा फरवरी 2027 में आयोजित होगी।
M.Tech क्या है?
M.Tech एक पोस्टग्रेजुएट इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी डिग्री है। इसमें छात्र B.Tech या संबंधित स्नातक डिग्री के बाद किसी खास क्षेत्र में गहराई से पढ़ाई करते हैं।
M.Tech में कई तरह की स्पेशलाइजेशन उपलब्ध हैं। इनमें Computer Science and Engineering, Artificial Intelligence and Machine Learning, Data Science, VLSI, Electronics and Communication, Structural Engineering, Power Systems, Thermal Engineering और Manufacturing Engineering जैसे क्षेत्र शामिल हो सकते हैं।
किसी कॉलेज में कौन-सी स्पेशलाइजेशन उपलब्ध है, यह उस संस्थान और उसके विभाग पर निर्भर करता है।
M.Tech कितने साल का होता है?
भारत में सामान्य फुल-टाइम M.Tech प्रोग्राम की अवधि दो साल यानी चार सेमेस्टर होती है। हालांकि, कुछ विशेष प्रोग्राम या अलग श्रेणी के छात्रों के लिए संस्थान की अवधि और नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए आवेदन से पहले संबंधित संस्थान का आधिकारिक प्रॉस्पेक्टस देखना जरूरी है।
B.Tech के बाद M.Tech के लिए कौन पात्र है?
M.Tech की पात्रता हर संस्थान और प्रोग्राम के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर संबंधित क्षेत्र में B.E. या B.Tech या उसके समकक्ष डिग्री की जरूरत होती है। कुछ प्रोग्राम दूसरे विषयों की डिग्री जैसे M.Sc., MCA या अन्य मान्य योग्यता वाले छात्रों के लिए भी खुले हो सकते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि GATE की पात्रता और M.Tech में एडमिशन की पात्रता एक ही चीज नहीं है।
GATE 2027 के लिए किसी मान्यता प्राप्त स्नातक कार्यक्रम के तीसरे वर्ष या उससे आगे पढ़ रहे छात्र परीक्षा दे सकते हैं। इसमें Engineering, Technology, Architecture, Science, Commerce, Arts और Humanities जैसे क्षेत्रों के छात्र शामिल हैं। GATE 2027 में B.E./B.Tech./B.Pharm., B.Arch., B.Sc. (Research)/B.S., M.Sc./M.A./MCA, B.Sc./B.A./B.Com./BCA समेत कई योग्यताएं स्वीकार की गई हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि GATE के लिए पात्र छात्र हर M.Tech प्रोग्राम के लिए भी पात्र होगा। किसी विशेष M.Tech प्रोग्राम में प्रवेश के लिए संबंधित B.Tech शाखा, GATE पेपर, न्यूनतम अंक या CGPA और अन्य शर्तें लागू हो सकती हैं।
M.Tech Eligibility में किन बातों को देखें?
छात्रों को मुख्य रूप से इन चीजों की जांच करनी चाहिए:
- आपकी B.Tech या संबंधित डिग्री किस शाखा में है
- उस M.Tech प्रोग्राम के लिए कौन-सी qualifying degree स्वीकार की गई है
- न्यूनतम प्रतिशत या CGPA कितना है
- कौन-सा GATE paper स्वीकार किया जा रहा है
- GATE score जरूरी है या नहीं
- कैटेगरी के अनुसार कोई अतिरिक्त शर्त है या नहीं
इसलिए केवल यह देखकर आवेदन न करें कि आपके पास B.Tech की डिग्री है। जिस M.Tech प्रोग्राम में एडमिशन लेना है, उसकी आधिकारिक eligibility जरूर पढ़ें।
M.Tech में एडमिशन के लिए कौन-सी परीक्षा देनी होती है?
भारत में M.Tech एडमिशन के लिए कोई एक ऐसी परीक्षा नहीं है जो देश के सभी संस्थानों पर लागू हो। हालांकि GATE सबसे प्रमुख राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है।
GATE क्या है?
GATE का आयोजन IITs और IISc की ओर से National Coordination Board के तहत किया जाता है। इसके स्कोर का इस्तेमाल कई संस्थानों में मास्टर और डॉक्टोरल प्रोग्राम में प्रवेश के लिए किया जाता है। कई सरकारी कंपनियां भी भर्ती के लिए GATE स्कोर का इस्तेमाल करती हैं।
GATE 2027 में कुल 30 टेस्ट पेपर हैं और उम्मीदवार एक या निर्धारित संयोजन के अनुसार अधिकतम दो पेपर चुन सकता है।
लेकिन GATE क्वालिफाई करना अपने आप में किसी IIT, IISc, NIT या दूसरे संस्थान में एडमिशन की गारंटी नहीं है। संबंधित संस्थान अपनी eligibility और selection process के अनुसार दाखिला देते हैं।
GATE के अलावा दूसरे रास्ते
कुछ विश्वविद्यालय और संस्थान अपनी प्रवेश परीक्षा या अलग admission route रखते हैं। उदाहरण के लिए अलग-अलग राज्यों और निजी विश्वविद्यालयों में उनके अपने प्रवेश नियम हो सकते हैं।
इसलिए बेहतर तरीका यह है कि पहले अपनी पसंद के कॉलेज और M.Tech specialization की सूची बनाएं और फिर देखें कि वहां एडमिशन के लिए GATE जरूरी है या कोई दूसरा रास्ता उपलब्ध है।
IIT और IISc में M.Tech Admission कैसे होता है?
IITs और IISc में GATE के जरिए M.Tech एडमिशन की प्रक्रिया में COAP यानी Common Offer Acceptance Portal महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेकिन एक बात खास तौर पर याद रखें—COAP खुद M.Tech admission application portal नहीं है। उम्मीदवारों को जिन संस्थानों में M.Tech के लिए आवेदन करना है, वहां अलग से आवेदन करना होता है। इसके बाद संबंधित संस्थान के admission offers COAP के माध्यम से देखने और स्वीकार करने की प्रक्रिया में आते हैं।
COAP 2026 में 2024, 2025 और 2026 के valid GATE scores वाले उम्मीदवारों को registration की सुविधा दी गई थी।
NIT में M.Tech Admission कैसे होता है?
NITs, IIEST Shibpur और कुछ IIITs तथा CFTIs में M.Tech सहित PG admissions के लिए CCMT यानी Centralized Counselling for M.Tech./M.Arch./M.Plan Admissions महत्वपूर्ण है।
CCMT 2026 में 2024, 2025 और 2026 के GATE scores के आधार पर संबंधित संस्थानों के M.Tech प्रोग्राम के लिए आवेदन किया गया। उम्मीदवार एक common application के जरिए उन सभी participating institutes और programmes के लिए आवेदन कर सकते हैं जिनकी eligibility वह पूरी करते हैं।
इसलिए आसान भाषा में समझें तो COAP मुख्य रूप से participating IITs और IISc के admission offers के लिए common platform है, जबकि CCMT participating NITs, IIEST, IIITs और CFTIs के लिए centralized counselling platform है।
M.Tech में कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाते हैं?
M.Tech के विषय आपकी specialization पर निर्भर करते हैं। Computer Science से जुड़े प्रोग्राम में Advanced Algorithms, Artificial Intelligence, Machine Learning, Data Science, Computer Networks और अन्य तकनीकी विषय हो सकते हैं।
इसी तरह Electronics से जुड़े M.Tech में VLSI, Microelectronics और Communication Engineering जैसे विषय मिल सकते हैं। Civil Engineering में Structural या Environmental Engineering, जबकि Mechanical Engineering में Thermal, Manufacturing और Design से जुड़े विषय हो सकते हैं।
इसलिए M.Tech चुनते समय केवल कॉलेज का नाम देखने के बजाय specialization, syllabus, faculty, laboratory facilities, research work और placement record भी देखना चाहिए।
M.Tech की फीस कितनी होती है?
भारत में M.Tech की कोई एक तय फीस नहीं है। फीस संस्थान, प्रोग्राम, कैटेगरी और admission route के आधार पर काफी अलग हो सकती है।
IIT, NIT, सरकारी संस्थानों और निजी विश्वविद्यालयों की फीस एक जैसी नहीं होती। इसके अलावा hostel, mess, examination और दूसरे शुल्क भी कुल खर्च को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए किसी एक औसत फीस को पूरे देश के लिए मानना सही नहीं होगा। जिस संस्थान में एडमिशन लेना है, उसकी नवीनतम official fee structure जरूर देखनी चाहिए।
GATE क्वालिफाई करने पर कितनी आर्थिक मदद मिलती है?
GATE के जरिए eligible M.Tech छात्रों को नियमों के अनुसार financial assistance मिल सकती है। GATE 2027 की आधिकारिक जानकारी के अनुसार M.Tech छात्रों के लिए यह सहायता ₹12,400 प्रति माह है और सामान्य तौर पर 22 महीने तक दी जाती है। हालांकि यह सहायता नियमों और संबंधित संस्थान की शर्तों के अधीन है।
इसलिए केवल GATE क्वालिफाई करने का मतलब यह नहीं है कि हर M.Tech छात्र को स्वतः scholarship या financial assistance मिल जाएगी। पात्रता और भुगतान की शर्तें संबंधित नियमों के अनुसार तय होती हैं।
क्या M.Tech के लिए GATE अनिवार्य है?
नहीं, हर M.Tech प्रोग्राम के लिए GATE अनिवार्य नहीं है।
GATE देश की सबसे प्रमुख M.Tech प्रवेश परीक्षाओं में से एक है और IITs, IISc तथा CCMT के जरिए होने वाले कई admissions में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन कुछ संस्थान अपने नियमों के अनुसार बिना GATE या वैकल्पिक admission route भी रखते हैं।
इसलिए जिस कॉलेज में दाखिला लेना है, उसकी admission notification को देखना सबसे जरूरी है।
COAP और CCMT में क्या अंतर है?
M.Tech की तैयारी करने वाले छात्रों के बीच COAP और CCMT को लेकर अक्सर भ्रम रहता है।
COAP participating IITs और IISc से मिलने वाले M.Tech admission offers को देखने और उन पर निर्णय लेने का common platform है। इसमें शामिल संस्थानों में आवेदन अलग से करना होता है।
वहीं CCMT participating NITs, IIEST Shibpur और कुछ IIITs तथा CFTIs में GATE score के आधार पर M.Tech, M.Arch और M.Plan admissions के लिए centralized counselling कराता है।
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विषय |
COAP |
CCMT |
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मुख्य काम |
Admission offers देखने और स्वीकार करने का platform |
Centralized counselling |
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प्रमुख संस्थान |
Participating IITs और IISc |
NITs, IIEST, participating IIITs और CFTIs |
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GATE score |
जरूरी, जहां संस्थान के नियम में लागू है |
संबंधित कार्यक्रमों के लिए जरूरी |
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आवेदन |
संबंधित संस्थान में अलग आवेदन |
Participating institutes के लिए common application |
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2026 में मान्य GATE scores |
2024, 2025, 2026 |
2024, 2025, 2026 |
M.Tech करने के बाद करियर कैसा है?
M.Tech उन छात्रों के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकता है जो किसी तकनीकी क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैं। यह रिसर्च, R&D, specialized engineering roles, teaching और आगे PhD करने की दिशा में भी मदद कर सकता है।
हालांकि केवल M.Tech की डिग्री से करियर बेहतर होने की गारंटी नहीं है। कॉलेज, specialization, practical skills, projects, internships, research experience और industry की मांग का भी असर पड़ता है।
अगर कोई छात्र Artificial Intelligence, Data Science, Semiconductor, VLSI, Cyber Security या किसी अन्य तेजी से बढ़ते क्षेत्र में जाना चाहता है, तो उसे M.Tech से पहले उस क्षेत्र की वास्तविक job demand और course curriculum को भी देखना चाहिए।
B.Tech के बाद M.Tech करने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
B.Tech के बाद M.Tech का फैसला केवल इसलिए न करें क्योंकि आगे पढ़ाई जारी रखनी है। पहले यह तय करें कि आपको specialization, research, बेहतर technical role या academic career में से क्या हासिल करना है।
इसके बाद अपने target colleges और courses की eligibility देखें। GATE paper चुनते समय भी केवल परीक्षा की तैयारी को आसान मानकर paper न चुनें, क्योंकि admission में संबंधित संस्थान की अपनी eligibility लागू होती है। GATE की आधिकारिक गाइडलाइन भी स्पष्ट करती है कि admission पूरी तरह संबंधित संस्थान के नियमों पर निर्भर करता है।
GATE 2027 की महत्वपूर्ण तारीखें
अगर आप B.Tech के बाद M.Tech के लिए GATE 2027 देने की तैयारी कर रहे हैं, तो अभी registration का समय चल रहा है। IIT Madras के अनुसार GATE 2027 के लिए regular registration की आखिरी तारीख 27 सितंबर 2026 है। लेट फीस के साथ आवेदन 5 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकता है। परीक्षा 6, 7, 13, 14, 20 और 21 फरवरी 2027 को निर्धारित है, जबकि परिणाम 19 मार्च 2027 को घोषित किए जाने हैं। ये तारीखें बदल भी सकती हैं।
FAQs
क्या B.Tech के बाद M.Tech कर सकते हैं?
हां। संबंधित B.Tech या B.E. डिग्री वाले छात्र M.Tech के लिए आवेदन कर सकते हैं, लेकिन अंतिम eligibility संबंधित संस्थान और प्रोग्राम की शर्तों पर निर्भर करती है।
M.Tech के लिए GATE जरूरी है?
हर M.Tech प्रोग्राम के लिए GATE जरूरी नहीं है। हालांकि IITs, IISc और कई NITs तथा अन्य संस्थानों में GATE-based admission प्रमुख रास्ता है।
B.Tech के बाद M.Tech कितने साल का होता है?
सामान्य full-time M.Tech प्रोग्राम दो साल या चार सेमेस्टर का होता है। विशेष प्रोग्राम में अवधि अलग हो सकती है।
M.Tech की फीस कितनी है?
M.Tech की फीस संस्थान और प्रोग्राम के अनुसार अलग होती है। इसलिए जिस कॉलेज में आवेदन करना है, उसकी नवीनतम official fee structure देखना चाहिए।
GATE क्वालिफाई करने पर scholarship मिलती है?
Eligible M.Tech छात्रों को निर्धारित नियमों के तहत ₹12,400 प्रति माह तक financial assistance मिल सकती है, सामान्य तौर पर 22 महीने तक। लेकिन केवल GATE qualify करने से financial assistance की गारंटी नहीं होती।
COAP और CCMT में क्या अंतर है?
COAP participating IITs और IISc के admission offers के लिए common platform है, जबकि CCMT participating NITs, IIEST, IIITs और CFTIs में GATE-based centralized counselling के लिए इस्तेमाल होता है।
भारत में फॉरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, लेकिन कई छात्र यह जाने बिना इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं कि परीक्षा को क्रैक करने के लिए किस तरह की रणनीति जरूरी है। अगर आप कक्षा 12 के छात्र हैं और फॉरेंसिक साइंस में डिग्री कोर्स करना चाहते हैं, तो आपके लिए चुनौती सिर्फ विषयों की पढ़ाई नहीं होगी। असली चुनौती बोर्ड परीक्षा की तैयारी को प्रभावित किए बिना एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी करना होगी।
अगर आप All India Forensic Science Entrance Test (AIFSET) देने की योजना बना रहे हैं, तो आपके लिए अच्छी बात यह है कि BSc Forensic Science Entrance Test का सिलेबस पूरी तरह नया नहीं है। इसमें जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान और गणित जैसे विज्ञान विषयों के साथ फॉरेंसिक साइंस से जुड़े विषय शामिल हैं। इसका मतलब है कि कक्षा 11 और 12 में आप जिन विज्ञान विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं, वही आपकी AIFSET तैयारी की मजबूत नींव बन सकते हैं।
आपको जिस हिस्से पर अतिरिक्त ध्यान देना होगा, वह है फॉरेंसिक साइंस और एंट्रेंस परीक्षा का पैटर्न। AIFSET 2027 एक ऑनलाइन परीक्षा है, जिसमें 60 मिनट में 100 बहुविकल्पीय प्रश्न यानी MCQ हल करने होंगे। हर सही उत्तर के लिए 1 अंक मिलेगा और गलत उत्तर के लिए कोई नेगेटिव मार्किंग नहीं है।
इसलिए AIFSET की तैयारी का मतलब यह नहीं है कि आपको कक्षा 12 की दिनचर्या में एक और पूरा विषय जोड़ना होगा। बेहतर तरीका यह है कि आप समझें कि आपको पहले से क्या आता है, क्या दोहराने की जरूरत है और किन हिस्सों में आपकी गति बढ़ाने की जरूरत है।
AIFSET सिलेबस और अपनी तैयारी की तुलना से शुरुआत करें
नई किताब खरीदने या एंट्रेंस परीक्षा की तैयारी से जुड़े कई घंटे वीडियो देखने के बजाय सबसे पहले मौजूदा AIFSET सिलेबस देखें और उसकी तुलना उन अध्यायों से करें, जिन्हें आप स्कूल में पहले ही पढ़ चुके हैं।
मौजूदा BSc सिलेबस में जीव विज्ञान के तहत सेल बायोलॉजी, बायोमॉलिक्यूल्स, पौधों और मनुष्यों का शरीर विज्ञान, जेनेटिक्स, विकासवाद, मानव रोग एवं स्वास्थ्य, सूक्ष्मजीव और पारिस्थितिकी जैसे अध्याय शामिल हैं।
रसायन विज्ञान में परमाणु संरचना, आवर्तिता, रासायनिक बंधन, ऊष्मागतिकी, साम्यावस्था, कार्बनिक रसायन, इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री और रासायनिक गतिकी जैसे विषय हैं।
भौतिक विज्ञान में यांत्रिकी, कार्य और ऊर्जा, गुरुत्वाकर्षण, बिजली, चुंबकत्व, प्रकाशिकी, आधुनिक भौतिकी और सेमीकंडक्टर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे विषय शामिल हैं। गणित को BSc सिलेबस में वैकल्पिक यूनिट के रूप में दिया गया है।
आप इस जानकारी को अपनी तैयारी की शुरुआत के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। हर विषय के अध्यायों को तीन हिस्सों में बांटें—आसानी से आते हैं, दोहराने की जरूरत है और अभी तैयार नहीं हैं।
ऐसा करने पर आपको पता चलेगा कि पहला वर्ग आपकी सोच से काफी बड़ा हो सकता है। इन अध्यायों में आपको ज्यादा समय देने की जरूरत नहीं होगी। दूसरे वर्ग के अध्यायों पर अधिक ध्यान देना होगा। तीसरे वर्ग को परीक्षा में बचे समय के अनुसार अपनी तैयारी की योजना में शामिल करें।
आधिकारिक AIFSET UG सिलेबस: AIFSET_2026_BSC_Syllabus.pdf
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कक्षा 12 में आप क्या कर रहे हैं |
AIFSET के लिए क्या जोड़ना है |
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फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी दोहराना |
इन्हीं विषयों के MCQ हल करना |
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बोर्ड परीक्षा के लिए कॉन्सेप्ट समझना |
उन्हें जल्दी याद करके लागू करना |
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न्यूमेरिकल सवाल हल करना |
कम समय में सवाल हल करने की आदत बनाना |
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नियमित सिलेबस पढ़ना |
फॉरेंसिक साइंस वाला हिस्सा भी पढ़ना |
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स्कूल में उत्तर लिखना |
सही विकल्प जल्दी पहचानना |
इसी वजह से बोर्ड परीक्षा और AIFSET की तैयारी को दो अलग-अलग काम समझने की जरूरत नहीं है।
फॉरेंसिक साइंस की तैयारी को आखिर के लिए न छोड़ें
तैयारी का एक ऐसा हिस्सा है, जो स्कूल की किताबों में उसी तरीके से नहीं मिलता—फॉरेंसिक साइंस।
AIFSET में फॉरेंसिक साइंस की परिभाषा और इतिहास, अपराध के प्रकार, पुलिस संगठन और क्राइम सीन जैसे बुनियादी विषय शामिल हैं।
अगर आपने इन शब्दों के बारे में पहले कभी नहीं पढ़ा है, तो शुरुआत में बहुत सारी शब्दावली याद करने की कोशिश न करें। पहले हर कॉन्सेप्ट का सामान्य अर्थ समझें।
उदाहरण के लिए, क्राइम सीन इन्वेस्टिगेशन पढ़ते समय सबसे पहले यह समझने की कोशिश करें कि अपराध स्थल पर वास्तव में क्या होता है और सबूतों की पहचान और सावधानी से उनके संग्रह की जरूरत क्यों पड़ती है।
इसी तरह, क्वेश्चन्ड डॉक्यूमेंट्स यानी संदिग्ध दस्तावेजों के बारे में पढ़ते समय यह समझें कि उनके वैज्ञानिक विश्लेषण की जरूरत क्यों होती है। बैलिस्टिक्स पढ़ते समय यह जानें कि इस क्षेत्र में किस तरह के सबूतों का अध्ययन किया जाता है।
एक बार जब आपको विषय की पूरी तस्वीर समझ आने लगेगी, तो शब्दों और परिभाषाओं को याद करना काफी आसान हो जाएगा।
यह भी याद रखें कि आप अभी अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम में प्रवेश के लिए परीक्षा दे रहे हैं। आपसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि डिग्री पूरी करने वाले किसी पेशेवर फॉरेंसिक साइंटिस्ट जितना ज्ञान आपको पहले से होगा।
अगर Chemistry या Physics कमजोर है तो क्या करें?
सिर्फ इसलिए कि सिलेबस में सभी विषय हैं, हर विषय को बराबर समय देना जरूरी नहीं है।
मान लीजिए आपने एक छोटा प्रैक्टिस टेस्ट दिया और पाया कि बायोलॉजी के ज्यादातर सवाल आप सही कर रहे हैं, लेकिन केमिस्ट्री में कमजोर हैं। ऐसे में बायोलॉजी के किसी आसान अध्याय को एक और शाम देने से आपकी तैयारी में बहुत बड़ा सुधार नहीं होगा।
इसके बजाय उन केमिस्ट्री के सवालों को देखें, जिन्हें आपने गलत किया।
अगर कॉन्सेप्ट समझ नहीं आया, तो वापस उसी अध्याय पर जाएं। अगर कॉन्सेप्ट आता था लेकिन कोई रिएक्शन या फॉर्मूला भूल गए हैं, तो उसे दोबारा लिखकर याद करें।
अगर कॉन्सेप्ट समझ में था लेकिन कैलकुलेशन में गलती हुई, तो उसी तरह के कुछ और सवाल हल करें।
और अगर आपको उत्तर पता था लेकिन उसे निकालने में बहुत ज्यादा समय लग गया, तो समस्या केवल विषय के ज्ञान की नहीं है। यहां आपको अपनी स्पीड और टाइम मैनेजमेंट पर काम करने की जरूरत है।
बोर्ड परीक्षा की तैयारी के साथ AIFSET की तैयारी कैसे करें?
कक्षा 12 के छात्र के लिए यह तैयारी का सबसे उपयोगी तरीका हो सकता है।
अगर आप बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो किसी अध्याय को सही तरीके से एक बार पढ़ें। अध्याय पूरा होने के बाद उसी विषय से जुड़े कुछ MCQ हल करें। आपको केवल एंट्रेंस परीक्षा के लिए पूरा अध्याय दोबारा पढ़ने की जरूरत नहीं है।
यही तरीका केमिस्ट्री और फिजिक्स के लिए भी अपनाया जा सकता है।
बोर्ड परीक्षा की तैयारी में आपके पास किसी कॉन्सेप्ट को समझाने, उत्तर लिखने या किसी समस्या को हल करने के लिए अधिक समय होता है। लेकिन एंट्रेंस टेस्ट में आपको सवाल को जल्दी समझना और सही उत्तर चुनना होता है।
इसलिए हर अध्याय के बाद एक छोटा MCQ सेशन रखें। शुरुआत में 15 सवाल भी पर्याप्त हो सकते हैं। जैसे-जैसे आपकी तैयारी बेहतर होती जाए, सवालों की संख्या बढ़ाएं।
इस तरह आप स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ एंट्रेंस परीक्षा की तैयारी भी करते रहेंगे।
AIFSET के लिए रोज कितने घंटे पढ़ना चाहिए?
“मुझे AIFSET के लिए कितने घंटे पढ़ना चाहिए?”—इस सवाल का कोई एक सही जवाब नहीं है।
एक छात्र जो दो घंटे पूरी एकाग्रता के साथ किसी अध्याय को पढ़ता है, वह उस छात्र से बेहतर तैयारी कर सकता है जो पांच घंटे वही पेज पढ़ता है लेकिन खुद की तैयारी को टेस्ट नहीं करता।
बेशक, अगर आप कक्षा 12 में हैं तो आपके पढ़ाई के समय का बड़ा हिस्सा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए होना चाहिए।
AIFSET की तैयारी को छोटे लेकिन नियमित सेशन में शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, साइंस की पढ़ाई के बाद कुछ MCQ हल करें, सप्ताह में कुछ समय फॉरेंसिक साइंस को दें और जब पर्याप्त तैयारी हो जाए तो समय सीमा के साथ पूरा पेपर हल करें।
बोर्ड परीक्षा नजदीक आने पर एंट्रेंस परीक्षा से जुड़ी पढ़ाई को कुछ हल्का किया जा सकता है। बोर्ड की तैयारी नियंत्रण में आने के बाद टाइम्ड प्रैक्टिस बढ़ाई जा सकती है।
आपका टाइमटेबल पूरे साल एक जैसा रहने की जरूरत नहीं है। AIFSET की तैयारी तब आसान होगी जब कक्षा 11 और 12 के साथ-साथ कक्षा 10 के बुनियादी कॉन्सेप्ट भी स्पष्ट हों।
मॉक टेस्ट कब शुरू करें?
अगर आपने अभी किसी अध्याय की शुरुआत की है, तो पहले उसी अध्याय से जुड़े सवाल हल करें।
जब कुछ टॉपिक तैयार हो जाएं तो उन्हें मिलाकर MCQ हल करें। जब आपको सिलेबस का अच्छा हिस्सा समझ आने लगे, तब धीरे-धीरे फुल-लेंथ मॉक टेस्ट की ओर बढ़ें।
AIFSET 2027 में 100 सवालों के लिए 60 मिनट मिलेंगे। यानी औसतन एक सवाल के लिए करीब 36 सेकंड का समय होगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर सवाल को 36 सेकंड में ही हल करना जरूरी है। कुछ सवाल बहुत जल्दी हल हो जाएंगे, जबकि कुछ में अधिक समय लग सकता है।
लेकिन किसी एक कठिन सवाल में कई मिनट फंस जाना भी सही रणनीति नहीं है। इसलिए तैयारी के दौरान यह सीखना जरूरी है कि कब किसी सवाल को छोड़कर आगे बढ़ना है और कब बाद में वापस आना है।
आपकी गलतियां आपके स्कोर से ज्यादा उपयोगी जानकारी दे सकती हैं।
मान लीजिए किसी मॉक टेस्ट में आपको 100 में से 64 अंक मिले। यह स्कोर सिर्फ यह बताता है कि आप इस समय कहां खड़े हैं। लेकिन जिन 36 सवालों के उत्तर गलत हुए, वे आपको यह समझने में मदद कर सकते हैं कि आगे क्या करना है।
दूसरा टेस्ट शुरू करने से पहले इन गलत सवालों को ध्यान से देखें।
क्या कुछ सवाल ऐसे अध्यायों से थे जिन्हें आपने पढ़ा ही नहीं था?
क्या आपने पहले पढ़ी हुई जानकारी भूल गई?
क्या आपने सवाल गलत पढ़ लिया?
क्या कैलकुलेशन में बहुत ज्यादा समय लगा?
हो सकता है कि आपके 10 गलत उत्तर सिर्फ दो कमजोर अध्यायों से आए हों। अगर ऐसा है तो उसी शाम एक और मॉक टेस्ट देना शायद सबसे अच्छा इस्तेमाल नहीं होगा। उन दो अध्यायों को दोहराना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
यही आपकी तैयारी को व्यक्तिगत बनाने का सबसे आसान तरीका है। किसी और के बनाए टाइमटेबल को फॉलो करने के बजाय आपकी अपनी गलतियां आपको बताने लगेंगी कि पढ़ाई का अगला घंटा कहां लगाना है।
AIFSET की तैयारी के लिए क्या पढ़ें?
फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और मैथ्स के लिए सबसे पहले कक्षा 11 और 12 की अपनी मौजूदा किताबों और नोट्स से तैयारी शुरू करें और उन्हें मौजूदा AIFSET सिलेबस से मिलाकर देखें।
फॉरेंसिक साइंस के लिए मौजूदा सिलेबस को आधार बनाएं।
इंटरनेट पर फॉरेंसिक साइंस से जुड़ी बहुत बड़ी मात्रा में जानकारी उपलब्ध है, लेकिन उसमें से हर चीज अंडरग्रेजुएट एंट्रेंस टेस्ट के लिए जरूरी नहीं होगी।
AIFSET की आधिकारिक वेबसाइट पर 2027 परीक्षा से जुड़ी जानकारी उपलब्ध है और तैयारी सामग्री के लिए डाउनलोड सेक्शन भी दिया गया है। FAQ में उम्मीदवारों को पहले सिलेबस और परीक्षा पैटर्न पढ़ने और उसके बाद सैंपल पेपर हल करने की सलाह दी गई है।
यह क्रम सही भी है—पहले यह पता करें कि परीक्षा में क्या पूछा जा रहा है और उसके बाद तय करें कि आपको क्या पढ़ना है।
क्या कक्षा 12 के छात्र AIFSET के लिए आवेदन कर सकते हैं?
हां। AIFSET भाग लेने वाले विश्वविद्यालयों में फॉरेंसिक साइंस से जुड़े पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है। जो छात्र निर्धारित पात्रता मानदंड पूरा करते हैं, वे इस परीक्षा में शामिल हो सकते हैं।
मौजूदा AIFSET पात्रता के अनुसार, जो उम्मीदवार अपनी 10+2 परीक्षा में शामिल होने वाले हैं, वे आवेदन कर सकते हैं।
अंडरग्रेजुएट फॉरेंसिक साइंस पाठ्यक्रम के लिए Physics, Chemistry, Biology और/या Mathematics जैसे विषयों की आवश्यकता बताई गई है। स्कूल की पढ़ाई पूरी कर चुके उम्मीदवारों के लिए कम से कम 50 प्रतिशत कुल अंक की पात्रता भी दी गई है।
इसके अलावा, पात्रता संबंधी जानकारी में यह भी बताया गया है कि उम्मीदवार AIFSET परीक्षा अधिकतम तीन बार दे सकता है।
आखिरी कुछ महीनों के लिए आसान AIFSET तैयारी योजना
अगर आपके पास परीक्षा के लिए कई महीने बाकी हैं तो किसी बेहद सख्त डेली टाइमटेबल के बजाय तैयारी को तीन बड़े चरणों में बांटा जा सकता है।
पहले चरण में अपनी नींव मजबूत करें। कक्षा 11 और 12 के साइंस विषयों को पूरा करें या दोहराएं और उन अध्यायों की पहचान करें जिनमें आपका आत्मविश्वास कम है। इसी समय फॉरेंसिक साइंस के बुनियादी विषयों को भी पढ़ना शुरू करें।
इसके बाद तैयारी को मिलाना शुरू करें। केवल अध्यायवार सवालों से आगे बढ़कर अलग-अलग विषयों के मिश्रित MCQ हल करें। नियमित रूप से टाइम्ड टेस्ट दें और अपनी गलतियों का रिकॉर्ड रखें।
अंतिम चरण में परीक्षा की प्रैक्टिस पर ज्यादा ध्यान दें। इस समय आपको पूरी तरह नए विषय सीखने में कम और कमजोर हिस्सों को दोहराने, फुल-लेंथ टेस्ट देने और 60 मिनट के परीक्षा प्रारूप की आदत डालने में ज्यादा समय देना चाहिए।
एक चरण से दूसरे चरण में कब जाना है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आपके स्कूल का कितना सिलेबस पहले ही पूरा हो चुका है।
सिर्फ इसलिए फुल मॉक टेस्ट शुरू करने का कोई फायदा नहीं है कि आपके बनाए टाइमटेबल में उसकी तारीख आ गई है। अगर बुनियादी कॉन्सेप्ट अभी स्पष्ट नहीं हैं, तो पहले उन्हें मजबूत करना ज्यादा जरूरी है।
कक्षा 12 के छात्र के लिए AIFSET की तैयारी कैसी होनी चाहिए?
परीक्षा तक पहुंचते-पहुंचते आपका लक्ष्य फॉरेंसिक साइंस से जुड़ी हर किताब के हर पेज को याद करना नहीं होना चाहिए।
आपको सिलेबस में दिए गए साइंस विषयों पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए, फॉरेंसिक साइंस के बुनियादी कॉन्सेप्ट समझ में आने चाहिए, पूछे गए सवाल के प्रकार को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए और कम समय में बड़ी संख्या में MCQ हल करने की आदत होनी चाहिए।
अगर आप कक्षा 12 के बाद फॉरेंसिक साइंस में करियर बनाना चाहते हैं, तो AIFSET आपके लिए प्रवेश का एक स्पष्ट रास्ता उपलब्ध कराता है।
इसकी तैयारी भी पूरी तरह अनजान नहीं है। आपको पहले से पढ़े जा रहे साइंस विषयों को मजबूत करना है, फॉरेंसिक साइंस के नए टॉपिक जोड़ने हैं और मॉक टेस्ट के जरिए यह पता लगाना है कि पढ़ाई का अगला घंटा कहां लगाना सबसे ज्यादा फायदेमंद होगा।
यह तरीका किसी ऐसे नए विषय की पूरी तैयारी करने की कोशिश से कहीं ज्यादा आसान है, जिसे आपने अभी डिग्री स्तर पर पढ़ना भी शुरू नहीं किया है।
याद रखें, फॉरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट तभी आसान लग सकता है जब आप मानसिक रूप से इसके लिए तैयार हों। इसलिए परीक्षा को लेकर चिंता करने या “फॉरेंसिक साइंस एंट्रेंस एग्जाम कैसे क्रैक करें” जैसे वीडियो लगातार देखने के बजाय अपनी पढ़ाई और प्रैक्टिस पर ध्यान दें।
12वीं के बाद Journalism और Mass Communication में करियर बनाने की तैयारी कर रहे छात्रों के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि आखिर किस Entrance Exam की तैयारी की जाए। Engineering या Medical Education की तरह भारत में Journalism और Mass Communication के सभी कॉलेजों में दाखिले के लिए कोई एक अनिवार्य राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा नहीं है। अलग-अलग विश्वविद्यालय और संस्थान अपनी admission process के आधार पर छात्रों को प्रवेश देते हैं।
2027 में Journalism और Mass Communication में undergraduate admission लेने की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए CUET-UG और GMCET दो महत्वपूर्ण national-level entrance routes हैं। CUET-UG का आयोजन National Testing Agency (NTA) करती है, जबकि Global Media Common Entrance Test (GMCET) खास तौर पर undergraduate media programmes में प्रवेश के लिए आयोजित किया जाता है।
हालांकि, किसी भी entrance exam की तैयारी शुरू करने से पहले यह समझना जरूरी है कि जिस कॉलेज या विश्वविद्यालय में दाखिला लेना है, वहां उस course के लिए कौन-सी परीक्षा और कौन-से subjects जरूरी हैं।
1. CUET-UG
Common University Entrance Test (CUET-UG) का आयोजन National Testing Agency (NTA) करती है। इसके जरिए Central Universities और CUET में शामिल अन्य universities के undergraduate programmes में प्रवेश का रास्ता खुलता है।
Journalism और Mass Communication की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए CUET-UG इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके domain subjects में Mass Media/Mass Communication भी शामिल है। 2026 के आधिकारिक syllabus में इसका subject code 318 है।
हालांकि, सिर्फ CUET में Mass Media/Mass Communication subject चुन लेना हर विश्वविद्यालय के Journalism course में admission की गारंटी नहीं देता। अलग-अलग universities और programmes अपनी eligibility और subject combination तय करते हैं। उदाहरण के लिए, CUET के आधिकारिक programme details में अलग-अलग विश्वविद्यालयों के Journalism और Mass Communication programmes के लिए अलग subject requirements दिखाई देती हैं।
इसलिए छात्रों को CUET का form भरने से पहले अपने पसंदीदा विश्वविद्यालय और programme की eligibility जरूर देखनी चाहिए।
CUET-UG की मुख्य जानकारी:
- Conducting Body: National Testing Agency (NTA)
- Level: Undergraduate
- Exam Mode: Computer-Based Test
- Relevant Subject: Mass Media/Mass Communication
- Subject Code: 318
- Admission: CUET में शामिल Universities और उनके संबंधित programmes
2027 के लिए परीक्षा की तारीख, syllabus और programme-wise eligibility को लेकर NTA की official notification का इंतजार करना चाहिए।
2. GMCET
Global Media Common Entrance Test (GMCET) एक national-level media entrance exam है, जिसे Journalism, Mass Communication और अन्य media-related undergraduate programmes में admission के लिए बनाया गया है। GMCET की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसके माध्यम से BJMC, BA-JMC, BMC, BMM और BA Journalism (Hons.) जैसे programmes के अलावा कई अन्य media-related courses में प्रवेश के अवसर मिलते हैं।
यह परीक्षा उन छात्रों के लिए खास तौर पर उपयोगी है जिन्होंने 12वीं के बाद Media और Communication को अपना career field तय कर लिया है। GMCET में communication skills के साथ analytical और logical reasoning जैसी क्षमताओं का आकलन किया जाता है।
GMCET की मौजूदा eligibility के अनुसार, undergraduate programmes के लिए उम्मीदवार का 10+2 या equivalent qualification पास होना या उसमें appearing होना जरूरी है। General category के लिए न्यूनतम 50% और SC/ST/OBC candidates के लिए 45% aggregate marks की शर्त दी गई है। हालांकि, admission से पहले संबंधित programme और participating institution की eligibility अलग से जांचना जरूरी है।
GMCET के माध्यम से उपलब्ध programmes में BJMC, BA-JMC, BMS, BMC, BMM, BA Journalism (Hons.), B.Sc. Animation & Graphics, B.Sc. Media Technologies, B.Sc. Film & Television, B.Sc. VFX Film Making और B.Sc. Visual Communication जैसे programmes शामिल हैं।
CUET-UG या GMCET, कौन सा बेहतर है?
इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है। सही entrance exam इस बात पर निर्भर करता है कि छात्र किस course और किस university में admission लेना चाहता है।
अगर किसी छात्र की प्राथमिकता CUET में शामिल universities के Journalism या Mass Communication programmes हैं, तो उसे CUET-UG की तैयारी करनी चाहिए। लेकिन यहां subject combination और eligibility university तथा programme के अनुसार बदल सकती है।
दूसरी ओर, अगर छात्र ने पहले ही Media और Communication को अपना career क्षेत्र तय कर लिया है और ऐसे institutions देख रहा है जो GMCET के जरिए admission देते हैं, तो GMCET उसके लिए अधिक सीधे तौर पर relevant entrance exam हो सकता है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “सबसे अच्छा Journalism entrance exam कौन सा है?” बल्कि यह होना चाहिए कि “मेरे पसंदीदा Journalism course और college में admission किस entrance exam से मिलेगा?”
यही approach छात्रों को ऐसी परीक्षा की तैयारी करने से बचा सकती है, जिसका उनके पसंदीदा course में कोई उपयोग ही नहीं है।
Journalism Entrance Exam की तैयारी में क्या पढ़ें?
Journalism और Mass Communication entrance exam की तैयारी सिर्फ General Knowledge याद करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। छात्रों को Current Affairs, General Awareness, Language Skills, Communication Skills, Logical Reasoning और Analytical Thinking पर अच्छी पकड़ बनानी चाहिए।
इसके लिए नियमित रूप से अखबार और भरोसेमंद news websites पढ़ना काफी उपयोगी हो सकता है। Journalism में केवल खबर लिखना ही जरूरी नहीं है। एक अच्छे media professional को किसी घटना को समझना, महत्वपूर्ण जानकारी पहचानना, दावों पर सवाल उठाना और facts तथा opinions के बीच अंतर करना भी आना चाहिए।
इसलिए तैयारी करते समय केवल यह याद करना पर्याप्त नहीं है कि क्या हुआ। यह समझना भी जरूरी है कि क्यों हुआ और उसका असर क्या पड़ा।
क्या 12वीं के बाद Journalism के लिए Entrance Exam देना जरूरी है?
नहीं। भारत में Journalism और Mass Communication के सभी undergraduate courses में admission के लिए कोई एक compulsory national entrance exam नहीं है।
कुछ universities CUET-UG के माध्यम से admission देती हैं, जबकि कुछ institutions अपनी अलग admission process अपनाते हैं। GMCET भी participating institutions के undergraduate media programmes में प्रवेश का एक national-level route है।
इसी वजह से छात्रों को पहले अपने पसंदीदा courses और colleges की shortlist तैयार करनी चाहिए और उसके बाद प्रत्येक institution की admission process देखनी चाहिए।
12वीं के बाद Journalism में कौन-कौन से Courses कर सकते हैं?
12वीं के बाद Journalism और Mass Communication में कई तरह के undergraduate programmes उपलब्ध हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
BA Journalism, BA Journalism and Mass Communication, BJMC, BA Mass Communication, BA Mass Media, BA Media and Communication और दूसरे specialised media programmes।
हर विश्वविद्यालय में course का नाम और structure अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए, GMCET की मौजूदा programme list में BJMC, BA-JMC, BMC, BMM और BA Journalism (Hons.) जैसे courses शामिल हैं।
वहीं CUET-UG के माध्यम से Journalism और Mass Communication programmes में admission university-specific requirements के आधार पर होता है। CUET के आधिकारिक records में अलग-अलग universities के लिए subject combinations और eligibility अलग दिखाई देती है।
Journalism Entrance Exam 2027: छात्रों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
2027 admission cycle के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि छात्र किसी एक entrance exam को सभी Journalism colleges के लिए जरूरी न मानें। पहले अपने पसंदीदा course और college की सूची बनाएं, फिर देखें कि वहां admission के लिए कौन-सी परीक्षा देनी है।
CUET-UG और GMCET दोनों महत्वपूर्ण विकल्प हो सकते हैं, लेकिन final admission rules संबंधित university, institution और programme पर निर्भर करेंगे।
छात्रों को 2027 में application form भरने से पहले official notification जरूर देखनी चाहिए। खास तौर पर exam date, eligibility, subject combination, syllabus और participating institutions की जानकारी हर admission cycle में बदल सकती है।
Journalism में career आज केवल newspaper या television तक सीमित नहीं है। Digital Journalism, Multimedia Storytelling, Broadcast Media, Content Production, Public Relations, Podcasting, Video Production और कई दूसरे क्षेत्रों में भी media graduates के लिए opportunities बढ़ी हैं।
इसलिए 12वीं के बाद Journalism चुनने वाले छात्रों के लिए पहला कदम सिर्फ entrance exam तय करना नहीं, बल्कि सही course और institution चुनना है। इसके बाद उसी admission route के अनुसार entrance exam की तैयारी करना ज्यादा सही रणनीति होगी।
अगर किसी छात्र को Journalism और Mass Communication में career options, सही course या entrance exam को लेकर guidance चाहिए, तो GMCET की ओर से career consultation की सुविधा भी उपलब्ध है।
अगर आपने 12वीं के बाद BBA करने का फैसला किया है, तो आपके मन में यह सवाल जरूर हो सकता है कि क्या BBA में admission के लिए entrance exam देना जरूरी है? इसका जवाब है- जरूरी नहीं। कुछ universities और colleges 12वीं के अंकों के आधार पर BBA में admission देते हैं, जबकि कुछ institutes candidates को shortlist करने के लिए entrance exam आयोजित करते हैं। ऐसे में जो छात्र बिना entrance exam के BBA में admission लेना चाहते हैं, उनके पास कई विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, हर college के admission rules अलग हो सकते हैं, इसलिए आवेदन से पहले उनकी जानकारी लेना जरूरी है।
यह समझना जरूरी है कि सभी BBA colleges में admission का process एक जैसा नहीं होता। कुछ universities अपना entrance test आयोजित करती हैं, जबकि कुछ national-level entrance exams के scores स्वीकार करती हैं। इसके अलावा, छात्र management aptitude test भी दे सकते हैं, जिसके जरिए एक ही परीक्षा के माध्यम से कई management courses में admission के विकल्प मिल सकते हैं। इसलिए BBA Admission 2027 की तैयारी शुरू करने से पहले अलग-अलग admission options की जानकारी रखना समय और अनावश्यक confusion से बचा सकता है।
क्या Entrance Exam दिए बिना BBA में Admission मिल सकता है?
हां, भारत में कुछ colleges ऐसे हैं जो entrance exam आयोजित किए बिना BBA में admission देते हैं। ऐसे मामलों में admission मुख्य रूप से 12वीं के अंकों और संबंधित institution द्वारा तय eligibility criteria के आधार पर दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, कुछ universities मान्यता प्राप्त board से 12वीं पास करने वाले और निर्धारित percentage हासिल करने वाले छात्रों को admission देती हैं।
हालांकि, “बिना entrance exam” का मतलब हमेशा “बिना किसी selection process के direct admission” नहीं होता। College में interview, counselling, document verification या कोई अन्य internal assessment भी हो सकता है। इसके अलावा, admission rules हर साल बदल भी सकते हैं।
इसलिए छात्रों को केवल इस आधार पर college का चुनाव नहीं करना चाहिए कि वह “BBA colleges without entrance exam” की list में शामिल है। Application fee जमा करने से पहले university की official admission website पर जाकर eligibility criteria, selection process और 2027 admission dates जरूर check करें।
2027 में BBA में Admission कैसे लें?
BBA programme में admission लेने के कई रास्ते हो सकते हैं। सबसे आसान विकल्प merit-based admission है, जिसमें 12वीं के marks के आधार पर admission दिया जाता है। यह उन छात्रों के लिए अच्छा विकल्प हो सकता है, जिन्होंने school में अच्छे marks हासिल किए हैं और किसी अलग entrance exam की तैयारी नहीं करना चाहते।
दूसरा विकल्प BBA के लिए university द्वारा आयोजित entrance test या किसी national-level entrance exam में शामिल होना है। कुछ institutions अपने aptitude tests आयोजित करते हैं, जिनमें quantitative ability, reasoning, English और general awareness जैसे topics से जुड़े सवाल पूछे जा सकते हैं। वहीं कुछ universities national-level entrance test के scores स्वीकार करती हैं। उदाहरण के लिए, CUET-UG participating universities में undergraduate admission के लिए लागू हो सकता है। हालांकि, छात्रों को संबंधित university और BBA programme की admission requirements जरूर check करनी चाहिए।
इसके अलावा, management education में admission के लिए कुछ अन्य aptitude-based entrance tests भी विकल्प हो सकते हैं। Global Management Common Aptitude Test (GMCAT) undergraduate और postgraduate management programmes के लिए एक management entrance exam option है। GMCAT online mode में 60 मिनट की परीक्षा है, जिसमें 100 questions होते हैं और negative marking नहीं होती। इसमें management aptitude, business administration, quantitative and logical reasoning, verbal ability and communication skills और general management awareness जैसे areas शामिल हैं।
इस तरह entrance exam और merit-based admission, दोनों विकल्प होने से छात्रों को management education में admission के लिए ज्यादा flexibility मिल सकती है। इससे वे केवल एक admission pathway पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग विकल्पों के लिए आवेदन कर सकते हैं।
12वीं के बाद BBA के लिए Eligibility
आमतौर पर किसी recognised board से 12वीं या equivalent qualification पूरी करने वाले छात्र BBA के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालांकि, eligibility programme और university के अनुसार अलग हो सकती है। कई BBA courses में Commerce background होना जरूरी नहीं होता, इसलिए अलग-अलग academic streams के छात्र BBA में admission ले सकते हैं।
यही वजह है कि Commerce, Science और Arts/Humanities background के छात्रों के बीच BBA एक लोकप्रिय course है। हालांकि, कुछ colleges में minimum percentage या specific subjects जैसी अतिरिक्त eligibility requirements हो सकती हैं। इसलिए आवेदन करने से पहले संबंधित college की eligibility conditions को ध्यान से पढ़ना जरूरी है।
Maths को लेकर भी छात्रों के मन में अक्सर सवाल रहता है। कुछ BBA courses में 12वीं में Mathematics पढ़ना जरूरी नहीं होता, जबकि कुछ institutions या management specialisations में subjects को लेकर अलग requirements हो सकती हैं। इसलिए यह मान लेना सही नहीं है कि Mathematics हर BBA course के लिए compulsory है या कहीं भी जरूरी नहीं है। जिस college में admission लेना चाहते हैं, उसकी eligibility criteria जरूर check करें।
BBA के लिए कौन-सा Entrance Exam देना चाहिए?
किसी छात्र के लिए सही BBA entrance exam का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह किन colleges में admission लेना चाहता है, उन colleges की admission requirements क्या हैं, उसकी तैयारी का स्तर कैसा है और वह कितने admission options रखना चाहता है।
अगर आपके पसंदीदा college या university का अपना entrance exam है, तो उस परीक्षा की तैयारी करना बेहतर विकल्प हो सकता है। CUET-UG के जरिए admission देने वाली participating universities के लिए छात्रों को CUET और संबंधित programme के eligibility criteria का पालन करना चाहिए। वहीं अलग-अलग institutes में management-related programmes में admission लेने के इच्छुक छात्र GMCAT जैसे aptitude tests को भी एक विकल्प के तौर पर देख सकते हैं।
Aptitude-based entrance exam की तैयारी का एक फायदा यह भी है कि इससे विकसित होने वाली skills आगे पढ़ाई और career में भी काम आती हैं। इनमें logical reasoning, quantitative skills, communication, business awareness और decision-making जैसी skills शामिल हैं। Management education में प्रवेश करने वाले छात्रों के लिए ये skills काफी महत्वपूर्ण होती हैं।
क्या बिना Entrance Exam वाला BBA College चुनना चाहिए?
जरूरी नहीं। केवल इसलिए किसी BBA college का चुनाव करना सही नहीं है क्योंकि वहां entrance exam नहीं लिया जाता। ऐसा college ज्यादा बेहतर हो सकता है जो मजबूत academic programme, अनुभवी faculty, industry exposure, internships, student activities और अच्छी career placement opportunities देता हो।
College चुनने से पहले students को course structure, specialisations, fees, campus facilities, placement support, location और eligibility criteria जैसी बातों पर ध्यान देना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि BBA degree recognised है या नहीं और university को संबंधित programme चलाने की उचित मान्यता या accreditation प्राप्त है या नहीं।
अगर आप अभी 12वीं में हैं, तो एक बेहतर strategy यह हो सकती है कि आप एक साथ कई colleges में आवेदन करें। अपनी list में merit-based admission देने वाले colleges के साथ-साथ entrance exam के जरिए admission देने वाले institutions को भी शामिल किया जा सकता है। इससे किसी एक admission process पर पूरी तरह निर्भर रहने का risk कम हो जाता है।
BBA Admission 2027 के लिए छात्रों को क्या करना चाहिए?
सबसे पहले उन BBA colleges की list तैयार करें, जिनमें आप वास्तव में admission लेना चाहते हैं। हर college के सामने यह लिखें कि वहां admission merit, CUET-UG, university-level entrance test, common management aptitude exam, interview या इनमें से किसी combination के आधार पर होता है।
इसके बाद 2027 में applications शुरू होने पर university की official admission notification को ध्यान से पढ़ें। इसमें eligibility, application dates, entrance exam, fees और selection process से जुड़ी जानकारी दी जाती है।
अगर आप पूरी तरह entrance exam से बचना चाहते हैं, तो ऐसे colleges पर focus करें जो officially merit-based admission देते हैं। वहीं अगर आप entrance exam देने के लिए तैयार हैं, तो merit-based applications के साथ GMCAT जैसे entrance exam option को भी शामिल कर सकते हैं। इससे management education में admission पाने के लिए आपके पास एक अतिरिक्त रास्ता उपलब्ध रहेगा।
क्या आपको ऐसे डिजाइन पसंद हैं जो किसी बात को बिना ज्यादा शब्दों के समझा देते हैं? क्या आपको पोस्टर, ब्रांडिंग, सोशल मीडिया विजुअल्स, वेबसाइट, एनीमेशन या किसी विज्ञापन के जरिए कहानी बताने का तरीका आकर्षित करता है? क्या आप रंगों, फॉन्ट और डिजाइन के लेआउट को घंटों देखते रहते हैं?
लेकिन अगर आप ड्रॉइंग में बहुत अच्छे नहीं हैं, तो हो सकता है कि यही बात आपको 12वीं के बाद Communication Design चुनने से रोक रही हो।
डिजाइन कोर्स चुनने से पहले कई छात्रों के मन में यह सवाल आता है। हालांकि, Communication Design की पढ़ाई के लिए एक बेहतरीन कलाकार होना जरूरी नहीं है।
हां, एक बात जरूर समझनी चाहिए। हर Communication Design course में एडवांस ड्रॉइंग जरूरी नहीं होती, लेकिन कुछ डिजाइन एंट्रेंस एग्जाम में ड्रॉइंग, स्केचिंग, ऑब्जर्वेशन और विजुअलाइजेशन की क्षमता को परखा जा सकता है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि आप कितनी अच्छी ड्रॉइंग बना सकते हैं। असली सवाल यह है कि क्या आप किसी विचार को विजुअल तरीके से समझा सकते हैं और जरूरत पड़ने पर अपनी बेसिक ड्रॉइंग स्किल सुधारने के लिए तैयार हैं?
अगर आप 12वीं के बाद Communication Design करना चाहते हैं, तो आपको यह समझना जरूरी है कि कौन-कौन से एंट्रेंस एग्जाम आपके लिए विकल्प हो सकते हैं और किस स्थिति में AIDAT आपके लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है।
क्या Communication Design के लिए Drawing जरूरी है?
नहीं। सभी Communication Design courses में एडवांस लेवल की ड्रॉइंग स्किल जरूरी नहीं होती।
Communication Design का मुख्य उद्देश्य किसी विचार, संदेश या अनुभव को विजुअल और डिजिटल माध्यमों से लोगों तक पहुंचाना है। कोर्स के अनुसार छात्रों को Graphic Design, Typography और Branding, Illustration, Photography, Motion Graphics, Animation, Digital Media, Visual Storytelling और UI/UX जैसे क्षेत्रों में काम करने का मौका मिल सकता है।
Communication Design पढ़ने का मतलब यह नहीं है कि आप Fine Artist या Illustrator बनने की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
एक Communication Designer के सामने कई तरह के सवाल हो सकते हैं, जैसे:
- किसी ब्रांड की पहचान और व्यक्तित्व को बेहतर तरीके से कैसे दिखाया जाए?
- किसी जानकारी को लोगों के लिए आसान और समझने योग्य कैसे बनाया जाए?
- किसी पोस्टर को इस तरह कैसे डिजाइन किया जाए कि लोगों का ध्यान सही जगह जाए?
- किसी ऐप के इंटरफेस को ज्यादा आसान और यूजर-फ्रेंडली कैसे बनाया जाए?
- सोशल मीडिया कैंपेन के जरिए कुछ सेकंड में किसी विचार को कैसे समझाया जाए?
- किसी विजुअल स्टोरी के जरिए सही भावना कैसे पैदा की जाए?
इन सवालों के जवाब देने के लिए आपको सुंदर ड्रॉइंग बनाने की जरूरत नहीं है। इसके लिए ऑब्जर्वेशन, नए विचार, विजुअल सोच और समस्या का समाधान करने की क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
उदाहरण के लिए, UCEED के आधिकारिक सिलेबस में Drawing और Design Aptitude को अलग-अलग हिस्सों के रूप में देखा जाता है। Design Aptitude में समस्याओं और परिस्थितियों को नए और संवेदनशील तरीके से हल करने की क्षमता शामिल है।
इसलिए अगर आपके मन में यह विचार है कि “मैं ड्रॉइंग नहीं कर सकता, इसलिए मैं Designer नहीं बन सकता”, तो यह सोच पूरी तरह सही नहीं है।
क्या Communication Design Entrance Exam में Drawing देनी पड़ती है?
कभी-कभी हां।
यही वह जगह है जहां Design Aspirants को सावधान रहने की जरूरत है। भारत में Communication Design के लिए कोई एक ऐसा Entrance Exam नहीं है, जो हर कॉलेज और हर कोर्स पर लागू होता हो। अलग-अलग यूनिवर्सिटी और संस्थानों की Admission Process अलग हो सकती है।
किसी कॉलेज में अपना Design Test हो सकता है, जबकि दूसरे संस्थान में AIDAT, NID DAT, UCEED या संस्थान का अपना Entrance Test स्वीकार किया जा सकता है।
इन सभी परीक्षाओं में छात्रों की क्षमता को एक ही तरीके से नहीं परखा जाता। इसलिए Communication Design में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए AIDAT भी एक विकल्प हो सकता है।
Communication Design Admission के लिए AIDAT
अगर आप 12वीं के बाद अपने करियर विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, तो All India Design Aptitude Test यानी AIDAT को भी एक विकल्प के रूप में देख सकते हैं।
मान्यता प्राप्त बोर्ड से 10+2 की पढ़ाई पूरी करने वाले उम्मीदवार Undergraduate Diploma और Degree Courses के लिए आवेदन कर सकते हैं। AIDAT में Communication Design के साथ Graphic Design, Fashion Design, Interior Design, Product Design, UX और अन्य Creative Disciplines से जुड़े विकल्प भी शामिल हैं।
यह उन छात्रों के लिए उपयोगी हो सकता है जो अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि उन्हें Design की किस खास शाखा में जाना है। इसकी वजह यह है कि प्रक्रिया केवल Drawing Test तक सीमित नहीं है।
दिए गए विवरण के अनुसार AIDAT की Level 1 परीक्षा में 100 MCQ आधारित प्रश्न होते हैं और परीक्षा की अवधि 60 मिनट है। इसके बाद Portfolio Round, Counselling और Interview जैसी प्रक्रियाएं हो सकती हैं।
इसके सिलेबस में Design Aptitude, 2D/3D Visualization, Observation, Design Principles, Creative Thinking, Logical Reasoning, Design Ability, Aesthetic Sense, Form and Function, Perspective और Visual Logic जैसे विषय शामिल हैं।
अगर आप Design में ज्यादा सोचने और Visual Problems को हल करने में रुचि रखते हैं, तो AIDAT आपके लिए विचार करने योग्य विकल्प हो सकता है।
हालांकि, AIDAT की प्रकृति को समझना जरूरी है। यह एक National-Level Design Entrance System है, जिसके माध्यम से इसमें भाग लेने वाले संस्थानों के अलग-अलग Design Courses में प्रवेश के अवसर मिल सकते हैं।
यह जरूरी नहीं है कि भारत का हर Communication Design College AIDAT को स्वीकार करता हो। इसलिए आवेदन करने से पहले छात्रों को यह जरूर देखना चाहिए कि जिस कॉलेज और प्रोग्राम में वे प्रवेश लेना चाहते हैं, वह AIDAT Admission Pathway में शामिल है या नहीं।
NID DAT भी एक प्रमुख विकल्प
अगर आपका लक्ष्य National Institute of Design (NID) है, तो NID DAT आपके लिए महत्वपूर्ण Entrance Exam है।
NID के B.Des Programme में Ahmedabad Campus में Communication Design से जुड़े Graphic Design, Animation Film Design, Film and Video Communication और Exhibition Design जैसे क्षेत्र शामिल हैं। Admission के लिए Design Aptitude Test यानी DAT की दो चरणों वाली प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।
NID के 2026–27 B.Des Eligibility Criteria के अनुसार Science, Commerce, Arts, Humanities और अन्य मान्यता प्राप्त 10+2 Streams के विद्यार्थी निर्धारित Eligibility और Age Conditions पूरी करने पर आवेदन कर सकते थे।
लेकिन अगर आप Drawing में कमजोर हैं, तो NID DAT को इस सोच के साथ नहीं देना चाहिए कि इसमें Drawing की जरूरत नहीं होगी। परीक्षा में Design से जुड़ी Knowledge, Skills और Qualities का आकलन किया जाता है। इसलिए तैयारी में Visualization और Drawing के साथ-साथ व्यापक Design Aptitude पर भी ध्यान देना चाहिए।
IIT में Design करना है तो UCEED Entrance Exam
अगर आपका लक्ष्य IIT से B.Des करना है, तो UCEED महत्वपूर्ण Entrance Exam है।
UCEED के स्कोर के आधार पर IIT Bombay, IIT Delhi, IIT Guwahati, IIT Hyderabad, IIT Indore, IIT Roorkee और IIITDM Jabalpur जैसे संस्थानों में B.Des Admission के अवसर मिलते हैं। इसके अलावा कई अन्य संस्थान भी UCEED Scores को अपनी Admission Process में स्वीकार करते हैं।
Science, Commerce और Arts & Humanities Background के विद्यार्थी भी निर्धारित Eligibility Criteria पूरी करने पर UCEED के लिए आवेदन कर सकते हैं।
लेकिन अगर आप Drawing में कमजोर हैं, तो UCEED को लेकर एक बात पहले से समझ लें—इसमें Drawing को भी महत्व दिया जाता है।
UCEED के सिलेबस में Products, People और Scenes की Drawing, Proportion, Line Quality, Composition, Perspective और Shading जैसी क्षमताओं से जुड़े हिस्से शामिल हैं। परीक्षा में Design Ability और Problem-Solving Skills को भी परखा जाता है।
आपको Expert Artist बनने की जरूरत नहीं है, लेकिन अगर UCEED आपका लक्ष्य है तो Drawing की नियमित Practice जरूर करनी चाहिए।
NIFT Entrance Exam
अगर आपकी रुचि Fashion Communication में है, तो NIFT Entrance Exam भी एक महत्वपूर्ण विकल्प है। हालांकि, इसे हर Communication Design Degree के लिए सामान्य Entrance Exam नहीं माना जाना चाहिए।
NIFT के B.Des Programmes में Fashion Communication के अलावा Fashion Design, Accessory Design, Textile Design और अन्य क्षेत्र शामिल हैं। 2026 की Entrance Framework में B.Des Programmes के लिए General Ability Test और Creative Ability Test शामिल थे।
यह अंतर समझना जरूरी है क्योंकि Communication Design और Fashion Communication में कुछ Skills समान हो सकती हैं, लेकिन दोनों हमेशा एक ही Course नहीं होते।
इसलिए किसी भी Entrance Exam की तैयारी शुरू करने से पहले संबंधित कॉलेज और Programme का सही नाम और Eligibility जरूर जांचें।
Drawing में कमजोर छात्र के लिए AIDAT, NID DAT और UCEED में क्या अंतर है?
सिर्फ यह पूछने के बजाय कि “सबसे आसान Entrance Exam कौन-सा है?”, छात्रों को यह देखना चाहिए कि “मेरे लिए किस तरह की Design Education सही है?”
AIDAT: ऐसे छात्रों के लिए उपयोगी हो सकता है जो अलग-अलग Design Colleges और कई Design Disciplines को Explore करना चाहते हैं। इसका Level 1 Format MCQ आधारित है, लेकिन इसके व्यापक Syllabus में Visualization और Drawing से जुड़े Concepts भी शामिल हैं।
NID DAT: NID को Target करने वाले छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें Design Aptitude और Visual Skills पर ध्यान देना जरूरी है।
UCEED: IIT B.Des और अन्य संबंधित संस्थानों को Target करने वाले छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें Drawing Syllabus का स्पष्ट हिस्सा है।
NIFT Entrance Exam: NIFT के B.Des Programmes, खासकर Fashion Communication में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है। B.Des Admission Process में Creative Ability को महत्व दिया जाता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Drawing में कमजोर होना Design के लिए आवेदन न करने की वजह नहीं होनी चाहिए। लेकिन इससे आपकी तैयारी की दिशा जरूर तय होनी चाहिए।
अगर आप Realistic Drawing नहीं बना सकते तो क्या करें?
हो सकता है कि आपके पास Creative Ideas बहुत अच्छे हों, लेकिन आप किसी व्यक्ति, चेहरे या वस्तु की Realistic Drawing बनाने में कठिनाई महसूस करते हों।
इसका मतलब यह नहीं है कि आप Communication Design में अच्छे नहीं हो सकते।
Design Entrance की तैयारी Fine Arts Competition की तैयारी से अलग होती है। कई Design Situations में Sketch का उद्देश्य एक विचार को समझाना होता है, न कि उसे पूरी तरह Art की तरह तैयार करना।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के किसी वस्तु का इस्तेमाल करने का तरीका या किसी Visual Story का संभावित Sequence बताने वाला एक साधारण Sketch, ऐसी बहुत Detailed Drawing से ज्यादा उपयोगी हो सकता है जो आपके विचार को स्पष्ट ही न करे।
इसीलिए 12वीं के बाद Communication Design Entrance Exam की तैयारी कर रहे छात्रों को Visual Communication के लिए Drawing सीखने पर ध्यान देना चाहिए, केवल Artistic Perfection पर नहीं।
इसके लिए आप रोजमर्रा की चीजों जैसे Chair, Bottle या School Bag को लेकर अभ्यास कर सकते हैं। सोचें कि इन्हें अलग-अलग लोगों या परिस्थितियों के लिए कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए:
- किसी बच्चे के लिए इसे ज्यादा उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है?
- इसे उठाना और ले जाना आसान कैसे बनाया जा सकता है?
- छोटे कमरे में इसका इस्तेमाल ज्यादा सुविधाजनक कैसे हो सकता है?
इस अभ्यास का उद्देश्य सुंदर Sketch बनाना नहीं है। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि आप किसी समस्या को कैसे देखते हैं और उसके लिए Visual Solution कैसे सोचते हैं।
यही Communication Design की एक महत्वपूर्ण सोच है। आपको Fine Artist बनने की ट्रेनिंग नहीं मिल रही है। आपको Design के जरिए अपने विचारों को प्रभावी तरीके से व्यक्त करना सीखना है।
अगर Drawing में कमजोर हैं तो तैयारी कैसे करें?
अगर Drawing आपकी कमजोर कड़ी है, तो महीनों तक केवल Portrait Copy करने में समय न लगाएं।
आपकी तैयारी में Basic Drawing Skills के साथ Observation और Design Thinking भी शामिल होनी चाहिए। रोजमर्रा की चीजों से शुरुआत करें और धीरे-धीरे Proportion, Perspective, Human Figure के Basic Forms, Gesture और Visual Narration पर काम करें।
आप इन तरीकों से Practice कर सकते हैं:
Observation: रोजमर्रा में दिखाई देने वाली चीजों के Sketch बनाएं और उनके Shape, Size और Details पर ध्यान दें।
Perspective: समझें कि अलग-अलग दूरी और कोण से देखने पर कोई वस्तु कैसी दिखाई देती है।
Human Figures: शुरुआत में कठिन Anatomy पर जाने के बजाय Basic Poses और Gestures की Practice करें।
Visual Storytelling: Sketches की एक Series के जरिए किसी छोटी घटना या Situation को समझाने की कोशिश करें।
Design Thinking: सोचें कि किसी सामान्य Product, Poster या Sign को ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है।
Timed Practice: निर्धारित समय में Questions और Sketches हल करने की Practice करें, ताकि कम समय में किसी Idea को स्पष्ट तरीके से व्यक्त करना सीख सकें।
इसके साथ ही अपने आसपास मौजूद Designs को देखना शुरू करें। Packaging, Ads, Websites, Apps, Posters और Public Signs पर ध्यान दें।
सोचें कि कोई Design आपको क्यों आकर्षित करता है और दूसरा क्यों नहीं।
इस तरह का Observation आपकी Visual Thinking Skills को बेहतर कर सकता है, जो केवल Drawing के लिए ही नहीं, बल्कि Communication Design के लिए भी महत्वपूर्ण है।
क्या Commerce और Science के छात्र Communication Design पढ़ सकते हैं?
हां, अगर वे संबंधित Programme की Eligibility Criteria पूरी करते हैं।
Communication Design केवल Fine Arts Students तक सीमित नहीं है। इसके लिए यह भी जरूरी नहीं है कि आपने 11वीं और 12वीं में Fine Arts Subject लिया हो।
उदाहरण के लिए, NID के 2026–27 B.Des Admission के लिए निर्धारित Eligibility और Age Criteria पूरी करने वाले Science, Arts, Commerce और Humanities Background के विद्यार्थी आवेदन कर सकते थे।
UCEED 2026 में भी Science, Commerce और Arts & Humanities Background के विद्यार्थियों के लिए आवेदन का विकल्प था। हालांकि, संबंधित Participating Institutes की अपनी Admission Criteria हो सकती है।
इसी तरह 12वीं के बाद विद्यार्थी AIDAT के जरिए भी Design Courses के विकल्प तलाश सकते हैं। उपलब्ध Eligibility Details के अनुसार मान्यता प्राप्त बोर्ड से 10+2 पास करने वाले उम्मीदवार इसके Undergraduate Design Programmes के लिए आवेदन कर सकते हैं, जिनमें Communication Design सहित अन्य Design Courses शामिल हैं।
इसलिए अगर आपने Arts, Commerce या Science से 12वीं की है, तो Communication Design को अपने Career Option के रूप में देखने से पीछे न हटें।
सबसे जरूरी है कि आप जिस Course में प्रवेश लेना चाहते हैं, उसकी Eligibility, Admission Process और Career Scope को अच्छी तरह समझें।
Communication Design में अच्छा बनने के लिए क्या जरूरी है?
Creative होना अच्छी बात है, लेकिन केवल Creativity किसी अच्छे Designer बनने के लिए पर्याप्त नहीं है।
Communication Design में मुख्य रूप से सही Decisions लेने की क्षमता महत्वपूर्ण होती है—किस Idea को कैसा दिखना चाहिए, Audience को सबसे पहले क्या दिखाई देना चाहिए और वह Message कितनी आसानी से समझ पाएगी।
एक Designer को लगातार ऐसे सवालों के जवाब तलाशने पड़ते हैं:
- एक Font दूसरे Font से बेहतर क्यों है?
- किसी खास Image को किसी खास जगह पर रखने से क्या फर्क पड़ता है?
- कोई Poster समझने में मुश्किल क्यों हो रहा है?
- किसी Shelf पर एक Package दूसरे से अलग क्यों नजर आता है?
- कोई User एक Interface को आसानी से समझ लेता है, लेकिन दूसरे को समझने में परेशानी क्यों होती है?
- किसी Idea को Visual Form में सबसे आसान तरीके से कैसे समझाया जा सकता है?
यही Design से जुड़े सवाल हैं।
इनका जवाब समझाने के लिए Drawing एक माध्यम हो सकती है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है उस सोच को समझाना, जिसकी वजह से आपने कोई Design Decision लिया।
अच्छा Observation, Storytelling, Problem Solving और लोगों की जरूरतों को समझने की क्षमता प्रभावी Design Skills विकसित करने में मदद कर सकती है, भले ही आप स्वाभाविक रूप से एक शानदार Artist न हों।
12वीं के बाद Communication Design के लिए कौन-सा Entrance Exam दें?
भारत में Communication Design के सभी Courses के लिए कोई एक अनिवार्य Entrance Exam नहीं है।
सही Entrance Exam इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस College और Programme में Admission लेना चाहते हैं।
NID DAT: अगर आपका लक्ष्य NID है तो यह महत्वपूर्ण विकल्प है।
UCEED: IITs और अन्य Participating Institutes में B.Des Admission को Target करने वाले छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है।
NIFT Entrance Exam: अगर आपकी रुचि NIFT के Fashion Communication जैसे Programmes में है तो यह relevant विकल्प है।
AIDAT: अगर आप अलग-अलग Participating Institutions और Design Disciplines में विकल्प तलाशना चाहते हैं और Communication Design के साथ अन्य Design Fields पर भी विचार कर रहे हैं, तो AIDAT को देखा जा सकता है।
Communication Design Aspirants को क्या पता होना चाहिए?
Communication Design पढ़ने के लिए आपको शुरुआत से ही एक Skilled Artist होना जरूरी नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आप Drawing, Observation और Visual Thinking पर काम करने के लिए तैयार हों। अगर आपके चुने हुए Entrance Exam में इन Skills को परखा जाता है, तो इनकी तैयारी और भी जरूरी हो जाती है।
अपने आप से एक बेहतर सवाल पूछें—क्या आपको Visuals के जरिए किसी Communication Problem को Solve करना अच्छा लगता है?
अगर आपको यह सोचने में रुचि है कि किसी Brand को कैसा दिखना चाहिए, कोई App अपने उद्देश्य को आसानी से कैसे समझा सकता है, Data को ज्यादा स्पष्ट तरीके से कैसे दिखाया जा सकता है या Images के जरिए किसी Story को कैसे बताया जा सकता है, तो केवल आपकी मौजूदा Drawing Skill यह तय नहीं करती कि आप इस Field में सफल होंगे या नहीं।
12वीं के बाद Entrance Exam चुनते समय सबसे पहले उस College और Programme से शुरुआत करें, जहां आप Admission लेना चाहते हैं। फिर उसकी Eligibility और Selection Process को समझें। इसके बाद ऐसा Entrance Exam चुनें जो आपके Target College और Programme से मेल खाता हो।
कई छात्रों के लिए AIDAT उपयोगी विकल्प हो सकता है क्योंकि यह व्यापक Design Skill Path को ध्यान में रखता है। वहीं NID DAT और UCEED उन छात्रों के लिए ज्यादा उपयुक्त हो सकते हैं जिन्हें पहले से पता है कि वे किन विशेष संस्थानों को Target करना चाहते हैं।
हो सकता है कि आज आप Perfect Drawing न बना पाएं। लेकिन आप यह जरूर सीख सकते हैं कि Designers किस तरह सोचते हैं।
इसलिए अगर आप Communication Design में Career बनाने को लेकर गंभीर हैं, तो अपनी मौजूदा Drawing Skill को अपनी सबसे बड़ी कमजोरी न मानें। Practice करें, Visual Thinking विकसित करें और अपनी Creativity को सही दिशा दें।
जहां चाह है, वहां राह है।
12वीं के बाद B.Sc Agriculture करने का फैसला कई छात्रों के लिए आसान नहीं होता। विषयों की पसंद, करियर के विकल्प और कॉलेज को लेकर सोचने के बाद एक और बड़ा सवाल सामने आता है—B.Sc Agriculture में एडमिशन के लिए कौन-सा Entrance Exam देना चाहिए?
अगर आप 12वीं के बाद Agriculture Entrance Exam की तलाश कर रहे हैं, तो AIACAT यानी All India Agriculture Common Aptitude Test का नाम भी आपके सामने आ सकता है। ऐसे में आपके मन में सवाल हो सकता है कि क्या AIACAT देना आपके लिए सही रहेगा? क्या इसके जरिए मनचाहे Agriculture College में एडमिशन मिल सकता है? या फिर आपको किसी दूसरे Entrance Exam पर ध्यान देना चाहिए?
इसका जवाब हर छात्र के लिए एक जैसा नहीं हो सकता। AIACAT उन छात्रों के लिए एक विकल्प हो सकता है जो Agriculture और इससे जुड़े Undergraduate Programmes में एडमिशन लेना चाहते हैं। हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस University और किस Course में एडमिशन लेना चाहते हैं।
इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले यह समझना जरूरी है कि AIACAT क्या है और B.Sc Agriculture में एडमिशन के लिए इसकी जरूरत कब पड़ती है।
AIACAT क्या है?
AIACAT का पूरा नाम All India Agriculture Common Aptitude Test है। यह Agriculture और इससे जुड़े क्षेत्रों में Undergraduate और Postgraduate स्तर की पढ़ाई करने के इच्छुक छात्रों के लिए आयोजित किया जाता है।
AIACAT की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार यह एक Online Entrance Exam है। इसमें Agriculture Science, Biology, Environmental Science और Logical Reasoning जैसे विषयों से जुड़े प्रश्न शामिल होते हैं।
अगर आप 12वीं के बाद Agriculture Entrance Exam की तलाश कर रहे हैं, तो AIACAT को एक विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, आवेदन करने से पहले यह जरूर जांचना चाहिए कि जिस University या College में आप एडमिशन लेना चाहते हैं, वह AIACAT Score स्वीकार करता है या नहीं।
इसके साथ ही B.Sc Agriculture के जिस खास Programme में आप प्रवेश लेना चाहते हैं, उसकी Eligibility और Admission Rules भी जरूर देखें।
क्या B.Sc Agriculture में एडमिशन के लिए AIACAT जरूरी है?
नहीं। भारत में B.Sc Agriculture की सभी सीटों के लिए AIACAT अनिवार्य नहीं है। अलग-अलग Universities और Colleges अपने Admission Rules तय करते हैं। इसलिए एक University में मान्य Entrance Exam दूसरी University में जरूरी नहीं कि स्वीकार किया जाए।
B.Sc Agriculture समेत Agriculture और Allied Sciences के कई Undergraduate Programmes में CUET (ICAR-UG) भी एक महत्वपूर्ण Admission Route है। ICAR के 2026 Information Bulletin में B.Sc. (Hons.) Agriculture को CUET (ICAR-UG) के तहत शामिल किया गया है। 2026-27 के लिए Agriculture और Allied Sciences से जुड़े 13 Bachelor Degree Programmes में प्रवेश CUET (ICAR-UG) की Merit Rank के आधार पर किया जाना है।
ICAR के 2026 नियमों के अनुसार इन Agriculture-related programmes के लिए उम्मीदवार को 12वीं पास होना चाहिए और Physics, Chemistry, Mathematics, Biology तथा Agriculture/Inter-Agriculture में से कम से कम तीन विषय पढ़े होने चाहिए। हालांकि, संबंधित University की अपनी अतिरिक्त Eligibility Conditions भी हो सकती हैं, इसलिए आवेदन से पहले University के नियम जरूर जांचने चाहिए।
इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि B.Sc Agriculture में एडमिशन के लिए केवल एक ही Entrance Exam होता है। कौन-सा Exam देना है, यह आपके चुने हुए College, University, Course और Admission Route पर निर्भर करता है।
AIACAT और दूसरे B.Sc Agriculture Entrance Exams में क्या अंतर है?
भारत में B.Sc Agriculture में एडमिशन के लिए सभी Colleges और Universities का एक जैसा Entrance Exam Pattern नहीं है। अलग-अलग संस्थान अपने Admission Process के अनुसार Entrance Exam या Merit-Based Admission का विकल्प रखते हैं।
AIACAT एक ऐसा विकल्प है जिसे कुछ Agriculture और इससे जुड़े Programmes के लिए इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, CUET (ICAR-UG) के जरिए ICAR की Admission System के तहत Agriculture और Allied Sciences के Undergraduate Programmes में प्रवेश दिया जाता है। ICAR अपनी वेबसाइट पर Agricultural Universities और उनके मान्यता प्राप्त Colleges और Programmes की जानकारी भी उपलब्ध कराता है, जिससे छात्रों को College Shortlist करने में मदद मिल सकती है।
इसलिए किसी भी Entrance Exam के लिए आवेदन करने से पहले यह देखना जरूरी है कि आपकी पसंद की University उस Exam का Score स्वीकार करती है या नहीं।
B.Sc Agriculture के लिए AIACAT चुनना चाहिए या नहीं?
अगर आपकी पसंद की University AIACAT Score स्वीकार करती है, तो आप AIACAT को अपने Admission Options में शामिल कर सकते हैं। लेकिन आवेदन करने से पहले यह जरूर जांच लें कि जिस B.Sc Agriculture Programme में आप एडमिशन लेना चाहते हैं, उसमें AIACAT मान्य है या नहीं।
कुछ छात्रों के लिए AIACAT 12वीं के बाद Agriculture में एडमिशन का एक अतिरिक्त या वैकल्पिक रास्ता हो सकता है। लेकिन इसे हर B.Sc Agriculture सीट के लिए अनिवार्य नहीं माना जाना चाहिए।
सबसे पहले अपनी पसंद की Universities की List तैयार करें। इसके बाद हर University की Eligibility, Admission Process और Accepted Entrance Exam की जानकारी जांचें। अगर University AIACAT स्वीकार करती है और आप उसकी Eligibility पूरी करते हैं, तभी AIACAT के लिए आवेदन करने पर विचार करें।
सिर्फ Entrance Exam नहीं, Course भी देखें
अगर आप Agriculture को अपना Long-Term Career बनाना चाहते हैं, तो केवल Entrance Exam के नाम पर फैसला न लें। जिस B.Sc Agriculture Programme में आप एडमिशन लेने जा रहे हैं, उसके Syllabus, Practical Training, College Facilities, Faculty और आगे मिलने वाले Career Opportunities के बारे में भी जानकारी लें।
Agriculture में पढ़ाई के बाद छात्रों के लिए Research, Farming Technology, Agribusiness, Food Industry, Government Sector, Agricultural Extension और कई अन्य क्षेत्रों में Career Options हो सकते हैं।
इसलिए सही फैसला लेने का बेहतर तरीका यही है कि पहले अपने Career Goal को समझें और फिर उसके हिसाब से University और Entrance Exam चुनें।
अगर आपको अभी भी यह तय करने में परेशानी हो रही है कि B.Sc Agriculture आपके लिए सही Career Option है या नहीं, तो आप AIACAT Team से Free Career Consultation के लिए 08071296500 पर संपर्क कर सकते हैं और अपनी रुचि व Career Goals के आधार पर सलाह ले सकते हैं।
Current Events
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में 24 अप्रैल को आयोजित एडइनबॉक्स रीजनल हायर एजुकेशन समिट 2026 सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। सुबह 9 बजे से शाम तक चले इस पूरे दिन के आयोजन में शिक्षा जगत के विशेषज्ञों, विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों, स्कूल लीडर्स, नीति निर्माताओं और बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया। समिट ने उच्च शिक्षा, कौशल विकास, उभरते करियर विकल्पों और इंडस्ट्री-एकेडेमिया तालमेल जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा का मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (विधि विज्ञान प्रयोगशाला) के निदेशक प्रो. (डॉ.) आदर्श कुमार ने किया। उद्घाटन सत्र में उनके साथ प्रयोगशाला के उप निदेशक ए.के. श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रो वाइस चांसलर डॉ. टी.पी. सिंह, लखनऊ स्थित समर्पण इंस्टीट्यूट ऑफ़ नर्सिंग एंड पैरामेडिकल साइंसेज की प्रिंसिपल प्रो. दीप्ति शुक्ला और टेक्नो इंडिया यूनिवर्सिटी, कोलकाता के प्रो वाइस चांसलर एवं एडइनबॉक्स कम्युनिकेशन्स के एडिटोरियल एडवाइजर प्रो. उज्जवल के. चौधरी समेत कई प्रमुख अतिथि मौजूद रहे।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. (डॉ.) आदर्श कुमार ने कहा कि आज के समय में शिक्षा को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने जोर दिया कि छात्रों को व्यावहारिक कौशल, अनुसंधान क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस करना जरूरी है, ताकि वे बदलते समय की चुनौतियों का सामना कर सकें। उन्होंने फॉरेंसिक साइंस को युवाओं के लिए उभरते और संभावनाओं से भरे क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया।
समिट में इस वर्ष फॉरेंसिक साइंस पर विशेष फोकस रहा। विशेषज्ञों ने डीएनए प्रोफाइलिंग, डिजिटल फॉरेंसिक, टॉक्सिकोलॉजी और फिंगरप्रिंट विश्लेषण जैसी तकनीकों को सरल तरीके से समझाया और बताया कि कैसे छोटे-छोटे साक्ष्य बड़े मामलों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाते हैं। साथ ही अदालत में वैज्ञानिक तथ्यों की प्रस्तुति और जांच प्रक्रिया की जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
उद्घाटन सत्र में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, उत्तर प्रदेश के प्रो वाइस चांसलर डॉ. टी.पी. सिंह ने “इंटर, मल्टी और ट्रांस-डिसिप्लिनरी लर्निंग” तथा “टर्मिनल स्किल्स से निरंतर स्किल्स लर्निंग” के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि आज की शिक्षा केवल एक विषय तक सीमित नहीं रह सकती।
उन्होंने बताया कि इंटर-डिसिप्लिनरी लर्निंग में दो विषयों का समन्वय होता है, जबकि मल्टी-डिसिप्लिनरी लर्निंग में कई विषयों की समानांतर समझ विकसित की जाती है। वहीं ट्रांस-डिसिप्लिनरी लर्निंग इन सभी सीमाओं से आगे बढ़कर वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होती है।
डॉ. सिंह ने “टर्मिनल स्किल्स” की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि पहले शिक्षा एक निश्चित कौशल तक सीमित होती थी, जिसे सीखकर छात्र अपने करियर की शुरुआत करते थे। लेकिन बदलते समय में यह मॉडल पर्याप्त नहीं है। अब जरूरत “कंटीन्यूस स्किल्स लर्निंग” की है, जहां व्यक्ति को लगातार नई तकनीकों और कौशलों को सीखते रहना पड़ता है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि तेजी से बदलती तकनीक और रोजगार के स्वरूप को देखते हुए छात्रों को लचीला, जिज्ञासु और आजीवन सीखने के लिए तैयार रहना होगा, तभी वे भविष्य की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पाएंगे।
कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिएटिव करियर, नई शिक्षा नीति और स्किल-आधारित शिक्षा जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। रीजनल प्रिंसिपल्स मीट, एकेडमिक लीडरशिप डायलॉग और स्कूल–यूनिवर्सिटी कनेक्ट इनिशिएटिव जैसे सत्रों ने शिक्षा क्षेत्र के विभिन्न हितधारकों के बीच संवाद को मजबूत किया।
समिट का एक प्रमुख आकर्षण छात्रों और विशेषज्ञों के बीच सीधा संवाद रहा, जिसमें युवाओं ने करियर विकल्प, प्रवेश परीक्षाओं और भविष्य की संभावनाओं से जुड़े सवाल पूछे। इस दौरान उन्हें व्यावहारिक और स्पष्ट मार्गदर्शन मिला। आयोजन में छात्रों के लिए प्रतियोगिताएं, करियर काउंसलिंग सत्र और विभिन्न गतिविधियां भी आयोजित की गईं, जिससे कार्यक्रम और अधिक सहभागी बना।
कार्यक्रम की मेजबानी लोकप्रिय रेडियो जॉकी RJ पुनीत और RJ मनीषा ने की। उनकी जीवंत प्रस्तुति ने पूरे आयोजन को ऊर्जावान बनाए रखा और छात्रों के साथ बेहतर जुड़ाव स्थापित किया।
समिट के दौरान शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए संस्थानों और स्कूल प्रिंसिपल्स को सम्मानित भी किया गया। ‘प्रिंसिपल अवॉर्ड ऑफ ऑनर’ के तहत कई शिक्षाविदों को उनके योगदान के लिए सराहा गया।
आयोजकों ने कहा कि इस तरह के मंच छात्रों को सही दिशा में मार्गदर्शन देने, नए करियर विकल्पों से परिचित कराने और शिक्षा प्रणाली को समय की मांग के अनुरूप ढालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समिट भविष्य में शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक बदलावों को गति देगा।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।
NEET UG 2026 Counselling: नीट यूजी में अच्छी रैंक हासिल करने के बाद ज्यादातर छात्रों का लक्ष्य सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS सीट पाना होता है। लेकिन केवल NEET रैंक के आधार पर यह तय नहीं होता कि उम्मीदवार को कौन-सा कॉलेज मिलेगा। सीट अलॉटमेंट में कैटेगरी, काउंसलिंग का कोटा, उपलब्ध सीटें, उम्मीदवार की पसंद और संबंधित राउंड में सीट की स्थिति जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं।
NEET UG 2026 की MCC Round 1 Final Allotment Result जारी होने के बाद अलग-अलग रैंक पर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हुए सीट अलॉटमेंट की तस्वीर सामने आई है। आधिकारिक रिकॉर्ड में 10 हजार के आसपास की रैंक पर भी कई सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS सीट मिलने के उदाहरण हैं। वहीं आरक्षित कैटेगरी में अधिक रैंक वाले उम्मीदवारों को भी सरकारी मेडिकल कॉलेज मिल सकते हैं।
हालांकि, उम्मीदवारों को यह समझना जरूरी है कि किसी एक रैंक पर सीट मिलने का मतलब यह नहीं है कि अगली काउंसलिंग में भी उसी रैंक पर वही कॉलेज मिल जाएगा। हर राउंड में सीट की उपलब्धता और उम्मीदवारों की पसंद के आधार पर स्थिति बदल सकती है।
10 हजार के आसपास रैंक पर सरकारी मेडिकल कॉलेज
MCC के Round 1 के आधिकारिक सीट अलॉटमेंट रिकॉर्ड में 10,002 ऑल इंडिया रैंक पर Government Medical College & Super Facility Hospital, Azamgarh में OBC कैटेगरी के उम्मीदवार को MBBS सीट मिली। इसी तरह 10,004 रैंक पर Odisha के Pt. Raghunath Murmu Medical College and Hospital, Baripada में Open General कैटेगरी के उम्मीदवार को MBBS सीट अलॉट हुई।
इसी रेंज में दूसरे सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी सीटें अलॉट हुईं। उदाहरण के लिए Round 1 के रिकॉर्ड में 10,013 रैंक पर ESIC Medical College, Gulbarga में Open General सीट, 10,019 रैंक पर Government Medical College, Haldwani में EWS सीट और 10,021 रैंक पर Mahatma Gandhi Institute of Medical Sciences, Sevagram में Open General सीट का अलॉटमेंट दर्ज है।
इससे साफ है कि 10 हजार के आसपास रैंक हासिल करने वाले उम्मीदवारों के पास सरकारी MBBS कॉलेजों के लिए कई विकल्प हो सकते हैं। लेकिन कॉलेज का चुनाव करते समय सिर्फ रैंक नहीं, बल्कि कैटेगरी और संबंधित कोटा भी देखना जरूरी है।
OBC उम्मीदवारों के लिए भी सरकारी कॉलेज के मौके
OBC-NCL उम्मीदवारों के लिए भी Round 1 में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीट अलॉटमेंट के कई उदाहरण सामने आए हैं। Azamgarh के Government Medical College & Super Facility Hospital में 10,002 रैंक पर OBC उम्मीदवार को सीट मिली। इसी तरह 10 हजार के आसपास की रैंक पर कई अन्य सरकारी संस्थानों में भी OBC कैटेगरी में सीटें अलॉट हुईं।
यहां उम्मीदवारों को यह ध्यान रखना चाहिए कि OBC-NCL की वैधता और प्रमाणपत्र संबंधी शर्तें MCC की काउंसलिंग गाइडलाइन के अनुसार पूरी करनी होती हैं। केवल OBC प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं है, यदि उम्मीदवार संबंधित काउंसलिंग के लिए निर्धारित OBC-NCL शर्तों को पूरा नहीं करता।
SC और ST उम्मीदवारों के लिए अधिक रैंक पर भी अवसर
NEET में रैंक बढ़ने के साथ Open General कैटेगरी में सरकारी MBBS सीट हासिल करना कठिन हो सकता है। लेकिन SC, ST, OBC-NCL और EWS जैसी आरक्षित कैटेगरी में उपलब्ध सीटों के कारण अधिक रैंक पर भी सरकारी मेडिकल कॉलेज का विकल्प बन सकता है।
यही वजह है कि 50 हजार, 70 हजार, 80 हजार या 1 लाख के आसपास रैंक आने पर उम्मीदवारों को काउंसलिंग से बाहर नहीं होना चाहिए। उन्हें अपनी कैटेगरी, राज्य की पात्रता और उपलब्ध AIQ या State Quota विकल्पों को देखकर कॉलेजों की सूची तैयार करनी चाहिए।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। MCC की Round 1 Allotment List सीट मिलने वाले उम्मीदवारों और कॉलेजों का रिकॉर्ड देती है, जबकि किसी कॉलेज की वास्तविक “closing rank” निकालने के लिए उस कॉलेज, कोटा और कैटेगरी के सभी संबंधित अलॉटमेंट रिकॉर्ड को देखना पड़ता है। इसलिए 1 लाख के आसपास की किसी एक रैंक को पूरे देश में सरकारी MBBS की निश्चित cutoff मानना सही नहीं होगा।
1 लाख रैंक वालों को क्या करना चाहिए?
अगर किसी उम्मीदवार की NEET UG 2026 में रैंक करीब 1 लाख है, तो उसे केवल टॉप सरकारी मेडिकल कॉलेजों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी पसंद की सूची को व्यापक रखना चाहिए। नए स्थापित सरकारी मेडिकल कॉलेज, अपेक्षाकृत कम मांग वाले संस्थान और अलग-अलग राज्यों में उपलब्ध AIQ सीटें विकल्प बढ़ा सकती हैं।
साथ ही, उम्मीदवार को MCC की काउंसलिंग में Choice Filling के दौरान अधिक से अधिक उपयुक्त कॉलेजों को प्राथमिकता के क्रम में रखना चाहिए। केवल कुछ लोकप्रिय कॉलेज भरने से सीट मिलने की संभावना कम हो सकती है।
MCC की वेबसाइट पर 2026 UG काउंसलिंग का Round 1 Final Allotment Result उपलब्ध है। साथ ही Round 2 की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है और MCC ने Round 2 के लिए नए तथा खाली सीटों से संबंधित जानकारी भी जारी की है।
रैंक के साथ ये बातें भी जरूर देखें
NEET UG में सरकारी MBBS सीट की संभावना देखते समय उम्मीदवारों को सिर्फ अपनी AIR नहीं देखनी चाहिए। कैटेगरी, AIQ या State Quota, domicile नियम, कॉलेज की उपलब्ध सीटें और पिछले राउंड का allotment pattern भी देखना जरूरी है।
एक और बात ध्यान देने योग्य है कि AIQ और State Quota की cutoff अलग हो सकती है। MCC मुख्य रूप से All India Quota समेत कुछ विशेष संस्थानों और कोटा की काउंसलिंग करता है, जबकि 85 प्रतिशत State Quota सीटों के लिए संबंधित राज्य की काउंसलिंग अथॉरिटी प्रक्रिया चलाती है। इसलिए किसी छात्र की राज्य कोटे में संभावना उसकी domicile eligibility के आधार पर AIQ से काफी अलग हो सकती है।
NEET UG 2026 में 10 हजार से 1 लाख तक की रैंक वाले उम्मीदवारों के लिए सरकारी MBBS कॉलेज के विकल्प पूरी तरह खत्म नहीं होते। Round 1 के आधिकारिक अलॉटमेंट रिकॉर्ड में 10 हजार के आसपास की रैंक पर भी कई सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीट मिलने के उदाहरण मौजूद हैं। आरक्षित कैटेगरी में यह दायरा और आगे जा सकता है।
लेकिन किसी भी रैंक को पक्की admission guarantee नहीं माना जा सकता। उम्मीदवारों को अपनी कैटेगरी और कोटा के अनुसार MCC तथा संबंधित State Counselling Authority की ताजा seat matrix और allotment result देखकर ही कॉलेज की संभावना तय करनी चाहिए। 2026 की काउंसलिंग आगे बढ़ने के साथ सीटों की स्थिति में बदलाव भी हो सकता है।
DU Hostel Crisis: दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला छात्र हॉस्टल की इमारत गिरने और सात लोगों की मौत के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती रहने की जगह का सवाल एक बार फिर सामने है। दक्षिणी दिल्ली में दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास हुई इस घटना ने उन हजारों छात्रों की मुश्किलें उजागर कर दी हैं, जिन्हें कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद कैंपस में हॉस्टल नहीं मिल पाता और उन्हें निजी PG, प्राइवेट हॉस्टल या किराए के मकान का सहारा लेना पड़ता है।
सत्य निकेतन में जिस पांच मंजिला इमारत में निजी छात्र हॉस्टल चल रहा था, वह 6 सितंबर को ढह गई थी। हादसे में सात लोगों की मौत हुई और पांच लोग घायल हुए। पुलिस जांच में इमारत में चल रहे निर्माण और मरम्मत कार्य सहित कई पहलुओं की जांच की जा रही है। हादसे के बाद दिल्ली में PG और छात्र आवासों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं।
इस हादसे की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली में PG और छात्र आवासों की सुरक्षा जांच की मांग भी उठी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने DU में पर्याप्त हॉस्टल विकसित करने से जुड़ी एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होनी है।
DU के 91 कॉलेज, लेकिन सिर्फ 20 में हॉस्टल
दिल्ली यूनिवर्सिटी में कुल 91 कॉलेज हैं। उपलब्ध अधिकारियों के आंकड़ों के मुताबिक इनमें करीब 20 कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा है, जबकि 71 कॉलेजों में छात्रों के लिए कॉलेज स्तर पर हॉस्टल उपलब्ध नहीं है। विश्वविद्यालय के नॉर्थ और साउथ कैंपस में भी मुख्य हॉस्टल हैं, लेकिन कुल मिलाकर करीब 7,000 हॉस्टल सीटें ही उपलब्ध हैं।
यह आंकड़ा DU की कुल छात्र संख्या के मुकाबले बेहद कम है। विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार DU में करीब 2.1 लाख अंडरग्रेजुएट छात्र और 34,520 पोस्टग्रेजुएट छात्र हैं। इनमें PhD स्कॉलर भी शामिल हैं। यानी विश्वविद्यालय की कुल छात्र संख्या करीब 2.5 लाख है।
ऐसे में करीब 7,000 हॉस्टल सीटें कुल छात्र संख्या का बहुत छोटा हिस्सा ही कवर करती हैं। खासकर दिल्ली से बाहर से आने वाले छात्रों के लिए यह समस्या और बड़ी हो जाती है।
2026-27 में करीब 71,600 नए UG छात्र
हॉस्टल की कमी का असर नए एडमिशन के समय सबसे ज्यादा दिखाई देता है। 2026-27 सत्र में दिल्ली यूनिवर्सिटी में करीब 71,600 नए अंडरग्रेजुएट छात्रों को दाखिला मिला है। कॉलेजों के अनुमान के मुताबिक DU के करीब आधे छात्र दिल्ली के बाहर से आते हैं। ऐसे छात्रों के लिए एडमिशन के साथ ही रहने की व्यवस्था करना जरूरी हो जाता है।
लेकिन कैंपस में उपलब्ध सीटों की संख्या इतनी कम है कि हर जरूरतमंद छात्र को हॉस्टल मिलना संभव नहीं है। यही वजह है कि यूनिवर्सिटी के आसपास निजी PG और किराए के कमरों की मांग लगातार बनी रहती है।
हॉस्टल वाले कॉलेजों में भी सीटों की कमी
जिन कॉलेजों में हॉस्टल है, वहां भी छात्रों की संख्या और उपलब्ध सीटों के बीच बड़ा अंतर है। इसका एक उदाहरण मिरांडा हाउस है। कॉलेज में करीब 5,375 छात्र हैं, जबकि हॉस्टल में लगभग 370 छात्रों के रहने की क्षमता बताई गई है। 2026-27 में फर्स्ट ईयर के छात्रों के लिए हॉस्टल की सिर्फ 90 सीटें उपलब्ध कराई गई हैं। मिरांडा हाउस की आधिकारिक हॉस्टल सीट आवंटन जानकारी भी 2026-27 के लिए 90 सीटों की पुष्टि करती है।
इसी तरह श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में करीब 4,600 छात्र हैं, लेकिन हॉस्टल की क्षमता लगभग 150 छात्रों की है। इनमें नए छात्रों के लिए सिर्फ 50 सीटें उपलब्ध हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हॉस्टल सुविधा वाले कॉलेजों में भी बड़ी संख्या में छात्रों को निजी आवास पर निर्भर रहना पड़ता है।
हॉस्टल की कमी आज की समस्या नहीं
दिल्ली यूनिवर्सिटी में हॉस्टल की कमी लंबे समय से बनी हुई है। नवंबर 2016 में राज्यसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने DU के आंकड़ों के हवाले से बताया था कि विश्वविद्यालय के पास 19 हॉस्टल थे, जिनकी कुल क्षमता 3,580 छात्रों की थी। कॉलेजों की ओर से उपलब्ध आवास को जोड़ने पर कुल क्षमता करीब 6,000 सीट तक पहुंचती थी। उस समय DU हर साल कम से कम 60,000 छात्रों को दाखिला दे रहा था।
करीब एक दशक बाद भी तस्वीर बहुत नहीं बदली है। 2026 में DU में करीब 71,600 नए UG छात्रों का प्रवेश हुआ, जबकि कुल हॉस्टल सीटें करीब 7,000 के आसपास हैं। यानी छात्रों की संख्या बढ़ने के साथ रहने की सुविधा उसी अनुपात में नहीं बढ़ी है।
हॉस्टल नहीं मिला तो PG और किराए का कमरा ही विकल्प
कैंपस में जगह नहीं मिलने के बाद छात्रों के सामने निजी आवास ही प्रमुख विकल्प बचता है। नॉर्थ कैंपस के आसपास विजयनगर और अन्य छात्र इलाकों में बड़ी संख्या में PG और किराए के कमरे हैं। वहीं साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन जैसे इलाकों में भी छात्रों के लिए निजी हॉस्टल और PG बड़ी संख्या में चलते हैं।
लेकिन निजी आवास का विकल्प हर छात्र के लिए आसान नहीं है। किराया, सिक्योरिटी डिपॉजिट, कमरे का आकार, बिजली-पानी के खर्च और मकान की स्थिति जैसी कई चीजें छात्रों के बजट पर असर डालती हैं। सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा की है। सत्य निकेतन हादसे ने दिखाया है कि कम किराए या कॉलेज के पास रहने की सुविधा के साथ यह देखना भी जरूरी है कि जिस इमारत में छात्र रह रहे हैं, वह सुरक्षित है या नहीं।
अब सवाल सिर्फ हॉस्टल की संख्या का नहीं, सुरक्षित आवास का भी है
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में छात्र आवासों की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा तेज हुई है। दिल्ली सरकार ने PG सहित सार्वजनिक इस्तेमाल वाली इमारतों के लिए नई सुरक्षा नीति और स्ट्रक्चरल ऑडिट की दिशा में कदम उठाने की बात कही है। PG हब के रूप में पहचाने जाने वाले इलाकों में इमारतों की जांच भी प्रस्तावित है।
इस पूरी स्थिति से एक बात साफ है कि DU में हॉस्टल की समस्या केवल कमरे उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। छात्रों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त, सस्ता और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना भी उच्च शिक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है। जब विश्वविद्यालय में दाखिला पाने वाले हजारों छात्रों के पास कैंपस में रहने का विकल्प नहीं होता, तो वे निजी बाजार पर निर्भर होते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय, दिल्ली सरकार और स्थानीय निकायों के लिए चुनौती यह है कि छात्रों को सिर्फ शिक्षा का अवसर ही नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक रहने की व्यवस्था भी मिल सके।
कोई छात्र सक्षम हो सकता है, मेहनत कर सकता है और फिर भी ऐसी कक्षा में उसके लिए सफल होना मुश्किल हो सकता है, जहां उसे यह महसूस न हो कि वह उस माहौल का हिस्सा है। स्कूल और कॉलेज अक्सर यह सवाल नहीं पूछते कि सीखने का माहौल खुद छात्रों के प्रदर्शन को किस हद तक प्रभावित करता है? एक नए अध्ययन में इसी सवाल को समझने की कोशिश की गई है।
अमेरिका के मिडवेस्ट क्षेत्र की सरकारी यूनिवर्सिटीज में STEM पाठ्यक्रमों पर किए गए एक बड़े रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल में शोधकर्ताओं Kevin R. Kennedy, Kira K. Means और Markus Brauer ने इस विचार की जांच की। यह रिसर्च Fall 2022 और Spring 2023 सेमेस्टर के दौरान की गई थी और शोधपत्र को Scientific Reports ने 4 सितंबर 2026 को स्वीकार किया।
शोधकर्ताओं ने उन छात्रों पर ध्यान दिया जो विभिन्न हाशिए पर रहने वाले नस्ली और जातीय समूहों से आते थे। इनमें African American, Native American/American Indian, Latinx/Hispanic और दो या उससे अधिक नस्ली पहचान बताने वाले छात्र शामिल थे। अध्ययन में ग्रेड से जुड़े आंकड़ों के आधार पर कुल 2,116 छात्र शामिल थे। विभिन्न कारणों से कुछ छात्रों को बाहर करने के बाद अंतिम विश्लेषण में 1,737 छात्र शामिल रहे।
एक ही समस्या के समाधान के दो अलग तरीके
इन पाठ्यक्रमों को बेतरतीब तरीके से तीन समूहों में बांटा गया—एक कंट्रोल ग्रुप, दूसरा Resilience यानी लचीलापन आधारित हस्तक्षेप और तीसरा Inclusion यानी समावेशन आधारित हस्तक्षेप।
कंट्रोल ग्रुप में शिक्षक सामान्य तरीके से ही पढ़ाते रहे।
दूसरे समूह में Resilience approach अपनाई गई। इसके तहत शिक्षकों को ऐसी गतिविधियों और तरीकों के लिए तैयार किया गया, जिनसे छात्र पढ़ाई के पाठों को अपनी जिंदगी से जोड़ सकें, फीडबैक का इस्तेमाल सीखने के लिए कर सकें और स्कूल में आत्मविश्वास विकसित कर सकें। छात्रों को यह समझने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया कि बुद्धिमत्ता एक ऐसी क्षमता है जिसे अभ्यास के जरिए विकसित किया जा सकता है। इसके अलावा, छात्रों को अकादमिक समस्याओं को खतरे की बजाय चुनौती के रूप में देखने और अपने लिए महत्वपूर्ण मूल्यों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया गया।
तीसरे समूह में Inclusion approach अपनाई गई। इसमें मुख्य रूप से छात्रों से कठिन परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की उम्मीद करने के बजाय कक्षा के माहौल में बदलाव करने पर जोर दिया गया। इसके तहत छह तरह की शिक्षण गतिविधियां शामिल थीं—अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले छात्रों के बीच बातचीत को बढ़ावा देना, ज्यादा सहयोगात्मक माहौल बनाना, शिक्षक और छात्रों के बीच बेहतर संबंध विकसित करना, कक्षा में समावेश की स्पष्ट संस्कृति बनाना, छात्रों में अपनेपन की भावना बढ़ाना और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बारे में सकारात्मक सोच विकसित करना।
यही अंतर इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। एक तरीका मूल रूप से यह कहता है कि “छात्र को बेहतर महसूस कराएं।” दूसरा सवाल पूछता है—“क्या हम उस जगह को बेहतर बना सकते हैं जहां छात्र सीखता है?”
कक्षा के माहौल का छात्रों के प्रदर्शन पर दिखा असर
दोनों हस्तक्षेपों के परिणाम अलग-अलग रहे।
कंट्रोल ग्रुप में हाशिए पर रहने वाले छात्रों का औसत कोर्स ग्रेड 4.0 में से 2.71 था। Resilience ग्रुप में यह औसत 2.87 रहा। हालांकि, यह अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था।
वहीं Inclusion ग्रुप में छात्रों का औसत ग्रेड 3.34 रहा। यह कंट्रोल ग्रुप की तुलना में 0.627 ग्रेड पॉइंट अधिक था। अध्ययन में इस्तेमाल 4-पॉइंट स्केल पर यह आधे से अधिक लेटर ग्रेड के अंतर के बराबर था। छात्रों के अलग-अलग कक्षाओं में समूहबद्ध होने को ध्यान में रखकर किए गए अन्य विश्लेषणों में भी यह निष्कर्ष नहीं बदला।
इसका असर केवल हाशिए पर रहने वाले छात्रों तक सीमित नहीं था। सभी छात्रों को मिलाकर कंट्रोल कोर्स में औसत ग्रेड 2.95, Resilience कोर्स में 2.85 और Inclusion कोर्स में 3.27 रहा।
कंट्रोल स्थिति में हाशिए पर रहने वाले और अन्य छात्रों के प्रदर्शन के बीच अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण था। हालांकि, अलग-अलग intervention conditions के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया।
इस अध्ययन का मतलब यह नहीं है कि शिक्षा में असमानता का समाधान सिर्फ एक अच्छा और सहयोगी शिक्षक है। इसका अधिक सीमित लेकिन उपयोगी निष्कर्ष यह है कि कक्षा के माहौल में कुछ बदलाव छात्रों के ग्रेड में महत्वपूर्ण सुधार से जुड़े थे, खासकर उन छात्रों के लिए जो शैक्षणिक व्यवस्था में हाशिए पर थे।
शिक्षकों के लिए यह निष्कर्ष क्यों महत्वपूर्ण है?
कई बार “Inclusion” या समावेशन शब्द सुनने में ऐसा लग सकता है कि यह एक अस्पष्ट विचार है, जिसका रोजमर्रा की कक्षा में ज्यादा इस्तेमाल नहीं है। लेकिन इस अध्ययन में जिन तरीकों का इस्तेमाल किया गया, उन्होंने इसे व्यवहारिक रूप दिया।
कक्षा में छात्रों को सामाजिक समूहों में अलग रखने के बजाय एक-दूसरे को जानने के अवसर दिए जा सकते हैं। अनावश्यक प्रतियोगिता की जगह सहयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है। शिक्षक केवल ग्रेड देखने के बजाय किसी छात्र को एक व्यक्ति के रूप में बेहतर समझने की कोशिश कर सकते हैं। समावेशन को कभी-कभार दिए जाने वाले संदेश के बजाय कक्षा की सामान्य अपेक्षा बनाया जा सकता है।
कक्षा में ये बदलाव देखने में छोटे लग सकते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं के निष्कर्ष बताते हैं कि इन सभी गतिविधियों का संयुक्त असर उनके आकार से कहीं बड़ा हो सकता है।
इस अध्ययन से यह भी सीख मिलती है कि कमजोर प्रदर्शन करने वाले छात्रों के बारे में हम किस तरह बात करते हैं।
अगर कोई छात्र अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है, तो आमतौर पर सबसे पहले उसकी प्रेरणा, आत्मविश्वास, पढ़ाई की आदत या संघर्ष करने की क्षमता पर सवाल उठाए जाते हैं। ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं। लेकिन अध्ययन संकेत देता है कि केवल छात्र पर ध्यान केंद्रित करना पूरी तस्वीर नहीं हो सकती।
सवाल हमेशा यह नहीं होना चाहिए कि “हम इस छात्र को और मजबूत कैसे बना सकते हैं?” यह भी पूछा जाना चाहिए कि “जिस कक्षा में इस छात्र से सफल होने की उम्मीद की जा रही है, वह कक्षा कैसी है?”
शोधकर्ताओं ने अध्ययन के निष्कर्षों की सीमाएं भी बताईं
अध्ययन के कुछ महत्वपूर्ण सीमित पहलू हैं।
Inclusion intervention में छह आपस में जुड़े शिक्षण तरीकों का इस्तेमाल किया गया था। इसलिए शोधकर्ता यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि इनमें से किस एक तरीके की वजह से छात्रों के प्रदर्शन में सुधार हुआ।
वे यह भी पता नहीं लगा सके कि छात्रों के बेहतर ग्रेड के पीछे वास्तव में कौन-सा मनोवैज्ञानिक कारण काम कर रहा था।
दूसरी महत्वपूर्ण सीमा अध्ययन की जगह और प्रतिभागियों से जुड़ी है। यह रिसर्च चार सरकारी यूनिवर्सिटीज में की गई और अंतिम सैंपल में करीब 85 प्रतिशत छात्र White थे। इसलिए शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि अलग छात्र आबादी वाले कॉलेजों में इन परिणामों को बिल्कुल उसी तरह लागू करना संभव नहीं हो सकता।
शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि शिक्षकों ने इन तरीकों को अलग-अलग स्तर पर लागू किया हो सकता है और इससे परिणामों पर असर पड़ा हो।
अध्ययन हमें क्या बताता है?
इस अध्ययन को सबसे आसान तरीके से समझने के लिए पौधे का उदाहरण लिया जा सकता है। आप किसी पौधे से कह सकते हैं—“और मेहनत करो, मजबूत बनो और तेजी से बढ़ो।” लेकिन पौधे को अच्छी मिट्टी, पानी और धूप की भी जरूरत होती है।
छात्रों की स्थिति कुछ ऐसी ही है। उन्हें आत्मविश्वासी बनाने में मदद करना जरूरी है, लेकिन जिस जगह और माहौल में वे सीखते हैं, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह रिसर्च बताती है कि शिक्षक छात्रों को सिर्फ समस्याओं से निपटना सिखाकर ही उनके प्रदर्शन में सुधार नहीं ला सकते, बल्कि कक्षा को ऐसा माहौल बनाकर भी मदद कर सकते हैं जहां छात्र खुद को शामिल, सुरक्षित और सहयोग के लिए तैयार महसूस करें।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने इस निष्कर्ष को लेकर सावधानी बरती है। उन्होंने यह नहीं कहा कि हर समावेशी कक्षा अपने आप बेहतर ग्रेड देगी। अध्ययन अमेरिका की यूनिवर्सिटीज में किया गया था और शोधकर्ता यह भी निर्धारित नहीं कर सके कि Inclusion की छह गतिविधियों में से किस एक की वजह से सुधार आया।
इस रिसर्च से सबसे सरल सीख यही निकलती है कि हमें केवल यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि “हम छात्रों को बेहतर सीखने वाला कैसे बना सकते हैं?”
हमें कभी-कभी यह भी पूछना चाहिए—“हम कक्षा को सीखने के लिए बेहतर जगह कैसे बना सकते हैं?”
कोचिंग की शुरुआत एक बेहद सरल और प्रभावी सोच के साथ हुई थी—एक इंसान अगर बेहतर सवाल पूछे, तो वह दूसरे इंसान की क्षमता को सामने ला सकता है। दशकों तक यह सोच काम करती रही और कोचिंग दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले पेशों में शामिल हो गई। साल 2024 में इस इंडस्ट्री का आकार करीब 6.25 अरब डॉलर आंका गया था, जो 2027 तक 8.9 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। आज 1 लाख से अधिक लोग कोचिंग से अपनी पूरी या आंशिक कमाई कर रहे हैं।
लेकिन अब इस कमरे में एक नए तरह का कोच आ चुका है। ऐसा कोच जो न थकता है और न ही काम के दबाव में टूटता है। उसका मूड नहीं बदलता, ऑफिस की राजनीति से उसका कोई लेना-देना नहीं है और उसका कोई निजी एजेंडा भी नहीं है। वह आपकी जरूरत पर काम करता है। उसकी लागत किसी जूनियर कर्मचारी को रखने से भी कम हो सकती है और वह सबसे तेज सीखने वाले इंसान से भी तेजी से काम कर सकता है। सबसे खास बात यह है कि वह पहले से ही आपकी टीम के सामने मौजूद है।
यह कोच है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI।
AI अब कोचिंग के पेशे को तेजी से बदल रहा है। सवाल अब यह नहीं रह गया है कि क्या मशीनें कोचिंग कर सकती हैं। असली सवाल यह है कि क्या इंसानी कोच ऐसी मशीनों के सामने टिक पाएंगे, जो कुछ मामलों में उनसे बेहतर कोचिंग दे सकती हैं।
कोचिंग की सबसे बड़ी समस्या: महंगा होना
दशकों से कोचिंग इंडस्ट्री में एक ऐसी सच्चाई रही है, जिसे बहुत कम लोग खुलकर स्वीकार करते हैं—कोचिंग एक तरह की लग्जरी सेवा बन गई है। वास्तव में कुशल कोच कम हैं, उनकी फीस ज्यादा है और उनके पास पहले से ही लंबी बुकिंग होती है।
2024 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने ऐसी अर्थव्यवस्था की कल्पना सामने रखी थी, जिसमें लोगों को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन इसके साथ एक मुश्किल हकीकत भी सामने आती है—अच्छी और व्यक्तिगत कोचिंग सस्ती नहीं होती।
AI इस गणित को बदल रहा है। Salesforce के प्रशिक्षण परीक्षणों में AI कोचबॉट्स ने बार-बार किए जाने वाले ट्रेनिंग कार्यों को इंसानी मैनेजरों की तुलना में अधिक निरंतरता, पूर्वानुमान और सटीकता के साथ पूरा किया। इनमें भावनात्मक उतार-चढ़ाव, थकान और कार्यस्थल के तनाव जैसी मानवीय सीमाएं नहीं थीं।
सबसे बड़ी बात यह थी कि यह काम बड़े स्तर पर किया जा सकता है। एक साथ हजारों सेल्स एजेंटों को ट्रेनिंग दी जा सकती है और अतिरिक्त लागत लगभग न के बराबर हो सकती है।
AI आधारित कोचिंग से ग्राहकों की लागत काफी कम हो सकती है। इससे उन लोगों के लिए भी प्रोफेशनल कोचिंग की सुविधा खुल सकती है, जो पहले इसकी कीमत नहीं चुका सकते थे। यानी जो सेवा कभी सीमित संख्या में लोगों तक पहुंचती थी, वह अब अरबों लोगों की पहुंच में आ सकती है।
AI कोचिंग पर हुए परीक्षण क्या बताते हैं?
अब इसके पक्ष में केवल अनुभव या दावे नहीं हैं, बल्कि शोध भी सामने आ रहे हैं। 2025 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा में 2,312 प्रतिभागियों से जुड़े 16 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि AI कोच प्रभावी, स्वीकार्य और उपयोगी हो सकते हैं। कुछ खास तरह के कार्यों में उनकी क्षमता इंसानी कोचों के बराबर भी हो सकती है।
एक अन्य रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल में चैटबॉट Coach Vici का परीक्षण किया गया। छह महीने तक इसका इस्तेमाल करने वाले 75 प्रतिभागियों में लक्ष्य हासिल करने की क्षमता में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण सुधार देखा गया। इसकी तुलना 94 लोगों वाले एक कंट्रोल ग्रुप से की गई थी।
मनोविज्ञान से जुड़े निष्कर्ष इससे भी ज्यादा दिलचस्प हैं। दशकों के शोध में यह पाया गया है कि कोच और क्लाइंट के बीच बना भरोसे और सहयोग का रिश्ता कोचिंग के परिणामों का सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है। यानी केवल तकनीक नहीं, बल्कि दोनों के बीच का संबंध बदलाव लाने में बड़ी भूमिका निभाता है।
इसके बावजूद लोग वर्चुअल एजेंट्स के साथ भी वास्तविक जुड़ाव महसूस कर रहे हैं। इसका मतलब है कि AI केवल बातचीत करने की क्षमता की परीक्षा ही पास नहीं कर रहा, बल्कि भरोसे की परीक्षा में भी अपनी जगह बना रहा है।
लेकिन AI कोचिंग कहां कमजोर पड़ती है?
AI की सीमाओं को भी उतनी ही ईमानदारी से समझना जरूरी है। एक कोचबॉट समझदार बातचीत की नकल कर सकता है, लेकिन वह इंसान की तरह सोचता नहीं है।
किसी क्लाइंट की अच्छी तरह तैयार की गई कहानी के पीछे छिपी असली समस्या को पहचानना आसान नहीं होता। इंसानी कोचों के लिए भी यह मुश्किल काम है और फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि इसे जल्द ही कोई एल्गोरिदम पूरी तरह स्वचालित कर देगा।
AI किसी व्यक्ति के लक्ष्य की दिशा में उसकी वास्तविक प्रगति का सही आकलन करने या उस पर सार्थक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया देने में भी सीमित हो सकता है।
समस्या तब और जटिल हो जाती है जब महत्वाकांक्षा और वास्तविक जीवन की मुश्किलें आमने-सामने आती हैं। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति लंबे समय से इंतजार कर रहे प्रमोशन को हासिल करना चाहता है और साथ ही अपने परिवार के साथ छुट्टी पर भी जाना चाहता है। ऐसे मामलों में इंसानी भावनाएं, रिश्ते और परिस्थितियां बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं। यही वह जगह है जहां मशीनें अक्सर इंसानों की जटिलता को पूरी तरह समझने में पीछे रह जाती हैं।
डेटा की समस्या, जिस पर कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता
इसके बाद एक और बड़ा सवाल आता है—डेटा और उसकी सुरक्षा का।
AI सिस्टम बड़े पैमाने पर डेटा पर निर्भर करते हैं। इससे उन बेहद निजी बातों तक पहुंच बढ़ सकती है, जिन्हें कोई व्यक्ति आमतौर पर बहुत कम लोगों के साथ साझा करता है। अगर इस डेटा का गलत इस्तेमाल हुआ, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
एक और समस्या AI के प्रशिक्षण डेटा में मौजूद पूर्वाग्रहों की है। अगर पुराने डेटा में किसी तरह का भेदभाव मौजूद है, तो AI उसी को आगे भी दोहरा सकता है और बड़े स्तर पर फैला सकता है।
यहां एक और समस्या सामने आती है—AI को अपनाने की तैयारी और उसकी जरूरत के बीच बड़ा अंतर।
2019 में Deloitte ने 119 देशों के 10,000 HR और बिजनेस लीडर्स के बीच एक सर्वे किया था। इसमें 81 प्रतिशत लोगों ने माना कि उनकी संस्थाएं AI का इस्तेमाल बढ़ाएंगी। लेकिन केवल 6 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनकी संस्थाएं AI के कर्मचारियों पर पड़ने वाले प्रभाव से निपटने के लिए तैयार हैं।
2026 में लर्निंग और डेवलपमेंट क्षेत्र के नेताओं पर किए गए एक अध्ययन में भी भरोसे और सही नियम-कायदे की कमी को AI अपनाने की बड़ी बाधाओं में शामिल किया गया। इसके बावजूद इंसानों और मशीनों को मिलाकर काम करने वाले हाइब्रिड मॉडल को लेकर काफी रुचि दिखाई जा रही है।
बाजार ने अपना फैसला सुना दिया है
AI कोचिंग को लेकर बहस अभी जारी है, लेकिन बाजार इंतजार नहीं कर रहा।
अमेरिका की कोचिंग इंडस्ट्री से अकेले करीब 14 अरब डॉलर का कारोबार होने का दावा किया जाता है। अमेरिका के प्रमुख कोचिंग प्लेटफॉर्म BetterUp ने 2021 में 4.7 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर 300 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई थी।
तीन सबसे बड़ी डिजिटल कोचिंग कंपनियां मिलकर ही 50 करोड़ डॉलर से ज्यादा की बिक्री करती हैं। BetterUp, CoachHub, Coach Vici और Sherlock AI जैसे प्लेटफॉर्म अपनी सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रहे हैं।
इससे साफ है कि AI अब केवल भविष्य की तकनीक नहीं रह गया है। यह कोचिंग इंडस्ट्री के मौजूदा बिजनेस मॉडल का हिस्सा बन चुका है।
AI इंसानी कोच की जगह नहीं, उसकी ताकत बन सकता है
आखिर में तस्वीर इंसान बनाम मशीन की लड़ाई जैसी नहीं दिखती। ज्यादा संभावना इस बात की है कि AI एक कोचिंग मल्टीप्लायर के रूप में काम करेगा।
AI वास्तविक समय में डेटा, पुराने मामलों और अलग-अलग परिस्थितियों को सामने रख सकता है। इससे इंसानी कोच को क्लाइंट की जरूरतों को और गहराई से समझने के लिए ज्यादा समय मिल सकता है।
2030 के दशक के मध्य तक कोचिंग कंपनियां नियमित रूप से इंसानी और AI दोनों तरह की सेवाएं उपलब्ध करा सकती हैं। मशीनें रोजमर्रा और बार-बार किए जाने वाले कामों का बड़ा हिस्सा संभाल सकती हैं, जबकि इंसानी कोच जटिल और भावनात्मक मामलों पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं।
अगले दशक के सबसे सफल कोच जरूरी नहीं कि वे हों, जिन्होंने मशीन से मुकाबला किया। संभव है कि वे वही हों, जिन्होंने मशीन के साथ काम करना सीख लिया।
क्योंकि भविष्य में सवाल यह नहीं होगा कि इंसान या AI में से कौन बेहतर कोच है, बल्कि यह होगा कि इंसान और AI साथ मिलकर कितनी बेहतर कोचिंग दे सकते हैं।
शादी का नाम सुनते ही आमतौर पर दूल्हा-दुल्हन, बारात, डांस, संगीत, सजावट और तरह-तरह के खाने की तस्वीर सामने आती है। लेकिन अब शादियों से जुड़ा एक ऐसा ट्रेंड सामने आया है, जिसमें न दूल्हा है, न दुल्हन और न ही कोई असली शादी। इसके बावजूद लोग तैयार होकर पहुंचते हैं, बारात निकलती है, ढोल बजता है, डांस होता है, खाना मिलता है और लोग पूरी रात पार्टी करते हैं।
इसे ‘Fake Wedding’ या ‘Fake Shaadi’ कहा जा रहा है। भारत के कई शहरों में wedding-themed ये टिकटेड इवेंट युवाओं, खासकर Gen-Z, के बीच चर्चा में हैं। इनका मकसद शादी करना नहीं, बल्कि शादी के माहौल और उससे जुड़े मनोरंजन का अनुभव लेना है। 2025 में दिल्ली, बेंगलुरु और पुणे जैसे शहरों में इस तरह के आयोजनों की रिपोर्ट सामने आई थी और 2026 में भी ऐसे टिकटेड इवेंट आयोजित किए जा रहे हैं।
क्या होती है Fake Wedding?
Fake Wedding असल में एक wedding-themed party या immersive social event है। इसमें आयोजक किसी होटल, क्लब, लॉन या दूसरे बड़े venue को बिल्कुल शादी की तरह सजाते हैं। मेहमान भी आम पार्टी की तरह कैजुअल कपड़ों में नहीं, बल्कि शादी के लिए तैयार होकर पहुंचते हैं।
वहां आपको dhol, DJ, wedding decoration, food counters, photo booths और कई तरह की activities देखने को मिल सकती हैं। कुछ आयोजनों में baraat-style entry, sangeet, mehndi, mock varmala, games और दूसरी wedding-themed activities भी रखी जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां कोई असली दूल्हा-दुल्हन नहीं होते और शादी का कोई वास्तविक रिश्ता या विवाह नहीं होता।
यानी इसे आसान भाषा में कहें तो शादी की सारी मौज-मस्ती, लेकिन शादी की जिम्मेदारी के बिना।
आखिर क्यों पसंद आ रही है Fake Shaadi?
इस ट्रेंड के लोकप्रिय होने के पीछे सबसे बड़ी वजह इसका आसान और हल्का-फुल्का माहौल माना जा रहा है। असली शादी में मेहमानों के सामने रिश्तेदारों से मिलना, कई रस्मों में शामिल होना, समय देना और सामाजिक जिम्मेदारियां निभाना पड़ती हैं। Fake Wedding में इन सबकी जगह केवल मनोरंजन और socialising पर ध्यान रहता है।
खासकर बड़े शहरों में पढ़ाई या नौकरी के लिए परिवार से दूर रहने वाले युवाओं के लिए यह एक अलग तरह का social experience बन रहा है। उन्हें शादी में शामिल होने के लिए किसी रिश्तेदार के बुलावे का इंतजार नहीं करना पड़ता। वे टिकट लेकर दोस्तों के साथ या कभी-कभी अकेले भी ऐसे आयोजन में शामिल हो सकते हैं।
फैशन भी इस ट्रेंड का एक बड़ा हिस्सा है। लोग लहंगा, साड़ी, कुर्ता, शेरवानी जैसे traditional outfits पहनकर आते हैं, तस्वीरें खिंचवाते हैं और सोशल मीडिया के लिए reels बनाते हैं। इस तरह Fake Wedding में पार्टी, फैशन, संगीत और social media content एक साथ मिल जाते हैं।
सिर्फ Gen-Z ही नहीं, दूसरे उम्र के लोग भी हो रहे शामिल
हालांकि Fake Wedding को सबसे ज्यादा Gen-Z party trend के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन ऐसे आयोजनों की खासियत यह है कि इनमें शामिल होने के लिए जरूरी नहीं कि आप किसी खास दोस्त या परिवार के ग्रुप का हिस्सा हों। कुछ आयोजनों को इस तरह तैयार किया जाता है कि लोग नए लोगों से मिलें और socialise करें।
यही वजह है कि कई आयोजनों में wedding games, social mixers, confession walls और दूसरे interactive activities रखे जाते हैं। मुंबई में आयोजित एक Fake Wedding event में Team Bride vs Team Groom challenges, rishta booths, anonymous confession walls, photobooth और DJ afterparty जैसी गतिविधियां शामिल की गई थीं।
अब यह सिर्फ ट्रेंड नहीं, बन रहा है बिजनेस
Fake Wedding की लोकप्रियता ने event organisers के लिए एक नया business model भी तैयार किया है। इसमें असली शादी की तरह किसी परिवार के लाखों रुपये खर्च करने की बजाय आयोजक एक बड़े venue पर wedding-themed party तैयार करते हैं और लोगों को टिकट बेचकर उसमें शामिल करते हैं।
टिकट की कीमत venue, food, music, artists और event में मिलने वाली सुविधाओं के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। 2025 की कुछ रिपोर्टों में टिकट की कीमत करीब ₹1,500 से ₹2,000 के आसपास बताई गई थी, जबकि कुछ premium events में इससे काफी ज्यादा कीमत भी रही।
2026 में भी यह मॉडल जारी है। उदाहरण के लिए, हैदराबाद में सितंबर 2026 के एक Fake Wedding event के लिए ₹1,499 से टिकट उपलब्ध हैं। इस आयोजन में DJ, live Punjabi dhol, wedding-style decoration, food stalls और photobooth जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
इससे साफ है कि Fake Wedding अब केवल सोशल मीडिया पर वायरल होने वाला मजेदार आइडिया नहीं रह गया है। Event और nightlife industry में इसके लिए एक अलग market भी तैयार होती दिख रही है।
कैसे शामिल हो सकते हैं Fake Wedding में?
Fake Wedding में आमतौर पर किसी परिवार की तरह व्यक्तिगत invitation नहीं मिलता। ये आयोजन event platforms या आयोजकों के जरिए promote किए जाते हैं और इच्छुक लोग online ticket book करके शामिल होते हैं।
हर event का format अलग हो सकता है। कहीं केवल DJ और dance party होती है, तो कहीं mehndi, dhol, games, food counters, photo booths, sangeet और mock wedding activities भी रखी जाती हैं।
उम्र की शर्त भी आयोजन के हिसाब से अलग हो सकती है। कई events केवल adults के लिए होते हैं। उदाहरण के लिए, हैदराबाद में सितंबर 2026 के एक Fake Wedding event में 21+ age limit रखी गई है। इसलिए टिकट बुक करने से पहले event की age policy, venue rules और टिकट में शामिल सुविधाओं की जानकारी जरूर देखनी चाहिए।
क्या Fake Wedding में शादी की रस्में भी होती हैं?
हर Fake Wedding का format एक जैसा नहीं होता। कुछ आयोजक केवल wedding theme, music और food पर ध्यान देते हैं, जबकि कुछ events में baraat entry, sangeet, mock varmala, mehndi और दूसरी symbolic activities भी रखी जाती हैं।
इन रस्मों का मकसद वास्तविक विवाह कराना नहीं, बल्कि मेहमानों को शादी जैसा माहौल देना होता है। यही वजह है कि आयोजक इन्हें आमतौर पर party या immersive experience के रूप में पेश करते हैं, न कि वास्तविक विवाह समारोह के रूप में।
शादी की जिम्मेदारी नहीं, सिर्फ सेलिब्रेशन
भारत में शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तेदारों से जुड़ा बड़ा सामाजिक आयोजन होती है। Fake Wedding इसी अनुभव के मनोरंजक हिस्से को अलग करके पेश करती है। यहां लोग तैयार होते हैं, डांस करते हैं, खाना खाते हैं, नए लोगों से मिलते हैं और शादी जैसा माहौल महसूस करते हैं—लेकिन असली शादी की जिम्मेदारियां उनके ऊपर नहीं होतीं।
शायद यही इस नए ट्रेंड की सबसे बड़ी वजह है। लोग शादी नहीं, शादी का अनुभव चाहते हैं। और Fake Wedding इसी सोच को एक नए तरह के party format में बदल रही है।
भारत में म्यूजियम यानी संग्रहालयों की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब संग्रहालय केवल ऐसी जगह नहीं रह गए हैं, जहां ऐतिहासिक वस्तुओं को शीशे के पीछे रखा जाता है और लोग उन्हें देखकर आगे बढ़ जाते हैं। आज संग्रहालय शिक्षा, शोध, समुदाय से जुड़ाव, डिजिटल कहानी और नए तरह के अनुभवों के केंद्र बन रहे हैं। इसके साथ ही इस क्षेत्र में करियर के विकल्प भी बढ़ रहे हैं। क्यूरेटर और संरक्षण विशेषज्ञों के अलावा कलेक्शन मैनेजर, रिसर्चर, म्यूजियम एजुकेटर, एग्जीबिशन डिजाइनर और डिजिटल विशेषज्ञों की जरूरत बढ़ रही है।
इस बदलाव का अंदाजा सरकार के निवेश से भी लगाया जा सकता है। मार्च 2026 में संस्कृति मंत्रालय ने बताया था कि पिछले पांच वर्षों में म्यूजियम ग्रांट स्कीम के तहत 21 नए संग्रहालय बनाए गए और 23 मौजूदा संग्रहालयों को विकसित किया गया। इसके अलावा संग्रहालयों के कलेक्शन को डिजिटल बनाने और एक वर्चुअल एक्सपीरियेंशियल म्यूजियम के लिए भी सहायता दी गई है। इस योजना में म्यूजियम प्रोफेशनल्स की क्षमता बढ़ाने और प्रशिक्षण को भी शामिल किया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में संग्रहालयों का विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी ही तेजी से इस क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स भी तैयार हो रहे हैं?
बढ़ता म्यूजियम सेक्टर, लेकिन प्रशिक्षित लोगों की कमी
आधुनिक संग्रहालय के लिए सिर्फ कलेक्शन संभालने वाले लोगों की जरूरत नहीं होती। यहां ऐसे प्रोफेशनल्स चाहिए जो कलेक्शन, रिकॉर्ड रखने, संरक्षण, शोध, एग्जीबिशन डिजाइन, दर्शकों से जुड़ाव, शिक्षा, तकनीक और मैनेजमेंट को समझते हों।
नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट के महानिदेशक डॉ. संजीव किशोर गौतम के अनुसार, संग्रहालयों की बदलती भूमिका के साथ वहां काम करने वाले लोगों से जुड़ी जरूरतें भी बदल रही हैं। उनका कहना है कि भारत के संग्रहालय केवल कलेक्शन रखने वाली जगहों से आगे बढ़कर शिक्षा और लोगों से जुड़ने वाले स्थान बन रहे हैं। ऐसे में क्यूरेशन, आईटी, विजिटर एक्सपीरियंस और कम्युनिटी आउटरीच जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित लोगों की जरूरत है।
डॉ. गौतम के अनुसार, मौजूदा शिक्षा व्यवस्था इन नए क्षेत्रों के लिए बहुत कम विशेषज्ञ तैयार कर रही है। विश्वविद्यालयों को केवल आर्ट हिस्ट्री पर ध्यान देने के बजाय ऐसे प्रैक्टिकल म्यूजियम स्टडीज प्रोग्राम शुरू करने चाहिए, जिनमें कलेक्शन के साथ इंटर्नशिप को भी पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा बनाया जाए। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों और संग्रहालयों के बीच मेंटरशिप और रेजिडेंसी प्रोग्राम के जरिए बेहतर संबंध बनाने की जरूरत है।
इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम्स (ICOM) की 2022 की परिभाषा भी संग्रहालयों की बदलती भूमिका को दिखाती है। इसके अनुसार संग्रहालय शोध करते हैं, कलेक्शन तैयार करते हैं, संरक्षण करते हैं, विरासत की व्याख्या करते हैं और उसे प्रदर्शित करते हैं। साथ ही उन्हें सभी लोगों के लिए सुलभ, समावेशी और समुदाय से जुड़े संस्थान के रूप में काम करना चाहिए।
इसके बावजूद भारत में म्यूजियम से जुड़े विशेषज्ञ प्रशिक्षण के अवसर अभी सीमित हैं।
सांस्कृतिक विरासत के हिसाब से प्रशिक्षण व्यवस्था पर्याप्त नहीं
छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय (CSMVS), मुंबई के महानिदेशक और बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सचिव डॉ. सब्यसाची मुखर्जी का मानना है कि भारत के पास बहुत समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, लेकिन इसके अनुरूप प्रोफेशनल ट्रेनिंग सिस्टम अभी विकसित नहीं हो पाया है।
भारत की सांस्कृतिक विरासत में स्मारक, मंदिर, भाषाएं, खान-पान की परंपराएं, पहनावे, हस्तशिल्प, लोक और प्रदर्शन कलाएं तथा कई तरह की सांस्कृतिक परंपराएं शामिल हैं। डॉ. मुखर्जी के अनुसार, कल्चरल हेरिटेज मैनेजमेंट एक बहुत खास क्षेत्र है, जिसमें म्यूजियम मैनेजमेंट, संरक्षण, पुरातत्व, सांस्कृतिक पर्यटन, हेरिटेज इंटरप्रिटेशन, कलेक्शन मैनेजमेंट, सांस्कृतिक नीति, दस्तावेजीकरण, शिक्षा और डिजिटल तकनीक शामिल हैं।
कुछ विश्वविद्यालय और संस्थान पोस्टग्रेजुएट और डिप्लोमा कोर्स चला रहे हैं, लेकिन डॉ. मुखर्जी के अनुसार इनकी गुणवत्ता, संख्या और अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव अभी जरूरत के मुताबिक नहीं है।
प्रशिक्षित लोगों की कमी का असर केवल कर्मचारियों की संख्या पर नहीं पड़ता। इससे कलेक्शन के सही दस्तावेजीकरण और संरक्षण, एग्जीबिशन की योजना, विरासत की सही व्याख्या और अंत में दर्शकों के अनुभव पर भी असर पड़ सकता है।
डिग्री के साथ प्रैक्टिकल अनुभव भी जरूरी
म्यूजियम सेक्टर में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं हो सकता। उन्हें वास्तविक कलेक्शन, स्टोरेज, संरक्षण के तरीकों, एग्जीबिशन तैयार करने और संग्रहालय चलाने की रोजमर्रा की प्रक्रिया का अनुभव भी चाहिए।
बिहार म्यूजियम सोसाइटी, पटना के एडिशनल डायरेक्टर (एडमिनिस्ट्रेशन) रणबीर सिंह राजपूत का कहना है कि म्यूजियम और हेरिटेज सेक्टर की अहमियत को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन इस मांग को पूरा करने के लिए प्रशिक्षित लोगों की अभी कमी है।
उनके अनुसार, म्यूजियम प्रोफेशनल की भूमिका भी बदल गई है। अब संग्रहालय केवल अपनी वस्तुओं के कलेक्शन के लिए नहीं जाने जाते। प्रोफेशनल्स को ऐसी प्रस्तुति तैयार करनी होती है, जिसमें जानकारी के साथ दर्शकों के लिए दिलचस्प अनुभव भी हो।
राजपूत का कहना है कि कई मौजूदा कोर्स अभी भी वस्तुओं के इतिहास और महत्व पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जबकि कैटलॉग बनाना, वस्तुओं की स्थिति का आकलन करना और डिजिटल दस्तावेजीकरण जैसे प्रैक्टिकल कामों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
म्यूजियम का काम कई क्षेत्रों से जुड़ा होता है। एक ही एग्जीबिशन पर काम करते समय किसी प्रोफेशनल को शोध, अनुवाद, डिजाइन, संरक्षण और लोगों से संवाद जैसे अलग-अलग काम करने पड़ सकते हैं। इसलिए केवल एक क्षेत्र की ट्रेनिंग किसी छात्र को पूरी तरह तैयार नहीं कर सकती।
यही वजह है कि विश्वविद्यालयों और संग्रहालयों के बीच इंटर्नशिप, साझा शोध और मिलकर पढ़ाने जैसी व्यवस्था जरूरी हो जाती है।
क्यूरेशन से आगे बढ़ रही है म्यूजियम की भूमिका
संग्रहालयों में आने वाले लोगों की भूमिका भी बदल रही है। अब दर्शक सिर्फ जानकारी सुनने या पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं है। आधुनिक संग्रहालय में संवाद, चर्चा और समुदाय की भागीदारी को भी महत्व दिया जा रहा है।
लखनऊ म्यूजियम ऑफ हेरिटेज एंड आर्ट की एसोसिएट क्यूरेटर और रिसर्च कंसल्टेंट सिमरन लेखी, जो फिलहाल म्यूजियोलॉजी में मास्टर डिग्री कर रही हैं, मानती हैं कि आधुनिक म्यूजियोलॉजी को समझना इस बदलाव के लिए जरूरी है।
उनके अनुसार, पारंपरिक संग्रहालय व्यवस्था में क्यूरेटर को विशेषज्ञ और शिक्षक की तरह देखा जाता था और दर्शकों से उम्मीद होती थी कि वे दी गई जानकारी को स्वीकार कर लें। लेकिन आधुनिक संग्रहालय को संवाद, बहस और समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देने वाला संस्थान होना चाहिए।
लेखी का मानना है कि संग्रहालय में काम करने से छात्रों को ऐसी चीजें सीखने को मिलती हैं, जिन्हें केवल क्लासरूम में पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता। इसमें बजट, संस्थागत ढांचा, राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ, एग्जीबिशन से जुड़े फैसले और रोजमर्रा के काम में आने वाली अचानक समस्याएं शामिल हैं।
वहीं, विशेष म्यूजियोलॉजी प्रोग्राम भी जरूरी हैं, ताकि छात्रों को एथिक्स, सहयोग के साथ संग्रहालय तैयार करने, एग्जीबिशन डिजाइन और ज्ञान निर्माण की समझ मिल सके।
उनके अनुसार, कंजर्वेशन साइंस और आर्किटेक्चर जैसे तकनीकी क्षेत्रों पर भी तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि देश में इनसे जुड़े विशेष कोर्स चलाने वाले संस्थान बहुत कम हैं।
म्यूजियम के पीछे काम करती है विज्ञान और तकनीक
दर्शकों को संग्रहालय में केवल गैलरी और प्रदर्शित वस्तुएं दिखाई देती हैं, लेकिन इनके संरक्षण के पीछे काफी वैज्ञानिक और तकनीकी काम होता है।
किसी पेंटिंग या कपड़े को किस रोशनी में रखा जाए, यह केवल सुंदर दिखने का मामला नहीं है। तापमान और नमी पर नजर रखना जरूरी होता है। रोशनी, प्रदूषण और कीड़ों से भी वस्तुओं को नुकसान हो सकता है। इसके अलावा स्टोरेज सिस्टम, वस्तुओं को संभालना, पैकिंग, ट्रांसपोर्ट, सुरक्षा और आपात स्थिति की तैयारी भी जरूरी होती है।
ICOM की कमेटी फॉर कंजर्वेशन के अनुसार, रोशनी, नमी, प्रदूषण और कीड़ों पर नियंत्रण के साथ-साथ रजिस्ट्रेशन, स्टोरेज, हैंडलिंग, पैकिंग, ट्रांसपोर्ट और इमरजेंसी प्लानिंग प्रिवेंटिव कंजर्वेशन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
इसलिए आज संग्रहालयों को केवल क्यूरेटर की जरूरत नहीं है। उन्हें कंजर्वेटर, कंजर्वेशन साइंटिस्ट, आर्किटेक्ट, इंजीनियर, डिजाइनर, कलेक्शन मैनेजर, डिजिटल विशेषज्ञ और म्यूजियम एजुकेटर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की जरूरत होती है।
सोमैया विद्याविहार यूनिवर्सिटी की डीन, फैकल्टी ऑफ धर्मा स्टडीज, डॉ. पल्लवी जांभले के अनुसार, तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने इस क्षेत्र में अलग-अलग विशेषज्ञताओं को साथ लाना और जरूरी कर दिया है। छात्रों के लिए बारकोडिंग, RFID सिस्टम, डिजिटल डेटाबेस और वर्चुअल रियलिटी जैसी तकनीकों को समझना जरूरी होता जा रहा है, लेकिन इन्हें केवल क्लासरूम में पूरी तरह नहीं सिखाया जा सकता।
भविष्य के संग्रहालयों के लिए कैसे हों कोर्स?
भारत में म्यूजियोलॉजी की पढ़ाई मुख्य रूप से पोस्टग्रेजुएट प्रोग्राम, डिप्लोमा और पुरातत्व या हेरिटेज स्टडीज से जुड़े विषयों के रूप में उपलब्ध है। इससे छात्रों के लिए अवसर तो बनते हैं, लेकिन कोर्स की संख्या, पहुंच और करियर की संभावनाओं को लेकर सवाल भी बने हुए हैं।
डॉ. जांभले के अनुसार, जिन संस्थानों में म्यूजियोलॉजी को किसी अन्य विषय के साथ पढ़ाया जाता है, वहां यह पाठ्यक्रम का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा रहता है। कुछ विश्वविद्यालयों में इसके लिए अलग विभाग और डिग्री प्रोग्राम हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कार्यक्रम भारत के बढ़ते हेरिटेज सेक्टर की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त हैं।
उनके अनुसार, केवल नए कोर्स शुरू करना ही समाधान नहीं है। मौजूदा और नए दोनों कोर्स में म्यूजियोलॉजी और म्यूजियम प्रोफेशन के बीच लगातार संवाद होना चाहिए।
इंटर्नशिप और वास्तविक काम का अनुभव भी इसमें महत्वपूर्ण है। छात्र म्यूजियम, आर्काइव, कंजर्वेशन स्टूडियो और निजी कलेक्शन के साथ काम करके अनुभव हासिल कर सकते हैं। वर्कशॉप, प्रोजेक्ट और कॉन्फ्रेंस भी उनके शोध कौशल को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
संस्कृति मंत्रालय की म्यूजियम ग्रांट स्कीम में भी क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण को शामिल किया गया है। यह योजना म्यूजियम कलेक्शन के डिजिटलीकरण, डिजिटल कैटलॉग, हार्डवेयर, ऑनलाइन म्यूजियम लाइब्रेरी और इंटरैक्टिव इंफॉर्मेशन कियोस्क जैसी सुविधाओं के लिए भी सहायता देती है।
इससे साफ है कि भविष्य केवल नए म्यूजियम भवन बनाने का नहीं है। इनके संचालन के लिए प्रशिक्षित लोगों और तकनीकी व्यवस्था को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।
क्यूरेटर से आगे बढ़ रहा है करियर का दायरा
म्यूजियम सेक्टर में बदलाव के साथ छात्रों के लिए करियर के विकल्प भी बढ़ रहे हैं।
मुंबई के विल्सन कॉलेज में इतिहास की तीसरे वर्ष की छात्रा निशिदा मेहरकर का कहना है कि म्यूजियम में उनके अनुभव ने उन्हें समझाया कि इस क्षेत्र में पारंपरिक क्यूरेशन से कहीं ज्यादा अवसर हैं।
उनके अनुसार, क्यूरेशन, रिसर्च, डॉक्यूमेंटेशन, कंजर्वेशन, म्यूजियम एजुकेशन और हेरिटेज मैनेजमेंट में करियर बनाया जा सकता है। उनका अनुभव यह भी बताता है कि किताबी ज्ञान जरूरी है, लेकिन फील्ड में काम करने का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसी तरह जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी से म्यूजियोलॉजी और हेरिटेज स्टडीज में दूसरी मास्टर डिग्री कर रहीं मीडिया प्रोफेशनल मेहा माथुर के अनुसार, इस क्षेत्र में थ्योरी, आर्काइविंग, डॉक्यूमेंटेशन, अलग-अलग तरह के म्यूजियम, मैनेजमेंट और कानूनी पहलुओं की जानकारी शामिल है।
उनके अनुसार, म्यूजियम अब केवल स्थिर वस्तुओं को प्रदर्शित करने वाली जगह नहीं रहे हैं। वे अलग-अलग समुदायों की आवाज को सामने रखने वाले इंटरैक्टिव प्लेटफॉर्म बन रहे हैं।
वह यह भी मानती हैं कि बदलते म्यूजियम सेक्टर में प्रोफेशनल्स के लिए लगातार ट्रेनिंग जरूरी होगी। साथ ही ऐसे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, आर्किटेक्ट्स और डिजाइन विशेषज्ञों की भी जरूरत होगी, जो वस्तुओं के संरक्षण से लेकर AR और VR जैसे नए अनुभव तैयार करने में योगदान दे सकें।
सिर्फ डिग्री नहीं, मजबूत प्रोफेशनल सिस्टम की जरूरत
भारत के सामने चुनौती केवल म्यूजियोलॉजी पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। जरूरत ऐसे प्रोफेशनल सिस्टम की है, जहां इन छात्रों को प्रशिक्षण के साथ बेहतर करियर के अवसर भी मिल सकें।
बिहार म्यूजियम की क्यूरेटर विशी उपाध्याय के अनुसार, भारत में प्रशिक्षित म्यूजियम प्रोफेशनल्स की संख्या बढ़ रही है, लेकिन खासकर बड़े शहरों के बाहर उनकी तैयारी और उपलब्धता में अंतर दिखाई देता है।
छोटे शहरों के कई संस्थानों में कलेक्शन मैनेजमेंट, कंजर्वेशन, डॉक्यूमेंटेशन, एग्जीबिशन डिजाइन, एजुकेशन और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक विशेषज्ञता की कमी बनी हुई है। उनका मानना है कि इंटर्नशिप, फील्डवर्क, अप्रेंटिसशिप और लाइव प्रोजेक्ट इस कमी को दूर करने में मदद कर सकते हैं।
द रोहिन स्टूडियोज, चंडीगढ़ के संस्थापक और टेक्सटाइल क्यूरेटर राजा प्रताप ककरावड़ा का मानना है कि म्यूजियम प्रोफेशनल्स के लिए टेक्सटाइल, संस्कृति, परंपराओं, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र और इतिहास की समझ के साथ तकनीकी ज्ञान भी जरूरी है।
वहीं, डॉ. सब्यसाची मुखर्जी का मानना है कि भारत को सांस्कृतिक विरासत के प्रबंधन के लिए एक मजबूत और विश्वस्तरीय संस्थान की जरूरत है। इसके लिए भारतीय और विदेशी विशेषज्ञों, सांस्कृतिक संस्थानों, सरकारी एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, फाउंडेशन और निजी क्षेत्र को साथ लाने की जरूरत है। ऐसे संस्थान में अलग-अलग विषयों की पढ़ाई, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, रिसर्च सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग होना चाहिए।
भारत के पास समृद्ध विरासत, हजारों कहानियां, कलाएं, परंपराएं और ऐतिहासिक संग्रह हैं। चुनौती अब इन्हें सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित लोगों को तैयार करने की है।
जैसे-जैसे संग्रहालय डिजिटल, इंटरैक्टिव और लोगों से जुड़े संस्थान बन रहे हैं, म्यूजियम प्रोफेशनल की भूमिका भी लगातार बड़ी होती जाएगी। आने वाले समय में इस क्षेत्र में केवल इतिहास की जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। प्रोफेशनल्स को संरक्षण की वैज्ञानिक समझ, डिजिटल तकनीक, शोध, डिजाइन और समुदायों के साथ संवाद करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।
यही बदलाव भारत में म्यूजियोलॉजी की शिक्षा और म्यूजियम सेक्टर के भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत बनता जा रहा है।
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