कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केरल सरकार के उस प्रस्तावित कानून पर कड़ा ऐतराज जताया, जिसमें कन्नड़ माध्यम के स्कूलों में भी मलयालम भाषा को अनिवार्य बनाने की बात कही गई है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी राज्य में भाषाई अल्पसंख्यकों पर कोई भाषा जबरन नहीं थोपी जा सकती और सभी भाषाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
“भाषा थोपने का अधिकार किसी को नहीं”
मंगलुरु के पास पिलिकुला निसर्गधाम में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई भी विधानमंडल कानून पारित कर सकता है, लेकिन उसके कार्यान्वयन में संवैधानिक सुरक्षा और भाषाई विविधता को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
उन्होंने कहा, “कानून बना देना एक बात है, लेकिन उसे लागू उसी तरह नहीं किया जा सकता। भाषाई अल्पसंख्यकों पर कोई भी भाषा मजबूरी में नहीं थोपी जा सकती।”
अल्पसंख्यक भाषाओं के अधिकारों पर जोर
सिद्धारमैया ने स्पष्ट कहा कि कन्नड़भाषी छात्रों या अन्य मातृभाषा बोलने वाले समुदायों पर केवल मलयालम सीखने का दबाव डालना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केरल के राज्यपाल इस प्रस्ताव को मंजूरी देते हैं और कानून बनने के बाद इसे लागू किया जाता है, तो कर्नाटक को विरोध दर्ज कराने के लिए आगे आना पड़ेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ज़रूरत पड़ने पर केंद्र सरकार और राष्ट्रपति से भी अपील की जाएगी। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जा सकता है।
“संवैधानिक ढांचे में भाषाई पहचान की सुरक्षा ज़रूरी”
उन्होंने कहा कि भारत की संघीय संरचना भाषाई अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा देती है—खासकर उन सीमावर्ती क्षेत्रों में, जहां समुदायों ने लंबे समय से अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित रखा है। उनका कहना था कि इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश से खतरनाक मिसाल बन सकती है।
कर्नाटक की निगाहें केरल के फैसलों पर
दक्षिण भारत में शिक्षा और भाषा नीति पर बढ़ते राजनीतिक विमर्श के बीच सिद्धारमैया की यह प्रतिक्रिया आई है। कर्नाटक के अधिकारियों ने संकेत दिया कि राज्य केरल सरकार के कदमों पर बारीकी से नजर रखेगा और आवश्यक होने पर संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों से प्रतिक्रिया देगा।
राज्यपाल से जुड़े विधेयकों पर भी बोले CM
अन्य प्रशासनिक सवालों के जवाब में मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार उन विधेयकों पर स्पष्टीकरण दे रही है जिन पर राज्यपाल ने सवाल उठाए हैं।
उन्होंने कहा, “राज्यपाल ने कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। सरकार आवश्यक जानकारी देने की प्रक्रिया में है।” हालांकि उन्होंने संबंधित विधेयकों का विवरण साझा नहीं किया।
भारतीय कृषि अब केवल हल-बैल या मानसून के भरोसे नहीं, बल्कि डेटा, सेंसर और ड्रोन के दम पर एक नए युग में प्रवेश कर रही है। परंपरागत खेती के तरीकों को पीछे छोड़ते हुए 'प्रिसीजन फार्मिंग' (Precision Farming) यानी सटीक खेती एक ऐसी क्रांति बनकर उभरी है, जो न केवल लागत घटा रही है, बल्कि पैदावार को भी नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है।
क्या है प्रिसीजन फार्मिंग? "हर पौधे की अपनी ज़रूरत"
आसान शब्दों में कहें तो सटीक खेती का मतलब है—खेत के हर हिस्से और हर पौधे को उतनी ही खाद, पानी और कीटनाशक देना, जितनी उसे ज़रूरत है। यह 'एक ही लाठी से सबको हांकने' वाली पुरानी पद्धति के विपरीत है। इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल टूल्स के ज़रिए ज़मीन के मिजाज़ को समझा जाता है।
तकनीक के त्रिकोण से बदली तस्वीर
प्रिसीजन फार्मिंग मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिकी है:
सेंसर तकनीक (खेत की नब्ज): खेत में लगे सेंसर मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की पल-पल की जानकारी देते हैं। इससे किसान को पता चलता है कि किस कोने में सिंचाई की ज़रूरत है और कहाँ मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी है।
ड्रोन और सैटेलाइट (आसमान से निगरानी): ड्रोन तकनीक ने फसल की निगरानी को आसान बना दिया है। ये उड़ते हुए रोबोट कुछ ही मिनटों में कीड़ों और बीमारियों का पता लगा लेते हैं, जिससे पूरे खेत में ज़हर छिड़कने के बजाय केवल प्रभावित हिस्से का उपचार किया जाता है।
GPS मैपिंग (सटीक निशाना): ट्रैक्टरों और मशीनों में लगे GPS यह सुनिश्चित करते हैं कि बीज और खाद की एक भी बूंद बर्बाद न हो। इससे खाद की ओवरडोज से मिट्टी को होने वाला नुकसान रुकता है।
संसाधनों की बचत: पर्यावरण और जेब दोनों को फायदा
सटीक खेती का सबसे बड़ा असर किसान की लागत पर पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार, इस तकनीक के सही इस्तेमाल से उर्वरकों और रसायनों की खपत में 20-30% की कमी आती है। पानी की भी भारी बचत होती है, जो गिरते भूजल स्तर के बीच बेहद अहम है। इससे कुल पैदावार में 15% से 25% तक की वृद्धि देखी गई है।
चुनौतियां: छोटे किसानों के लिए क्या है राह?
भारत में 80% से अधिक किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में आते हैं। उनके लिए महंगी तकनीक खरीदना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, विशेषज्ञ इसके समाधान के रूप में 'शेयरिंग इकोनॉमी' को देख रहे हैं।
FPO की भूमिका: किसान उत्पादक संगठन (FPO) मिलकर मशीनें खरीद रहे हैं।
किराए पर तकनीक: अब गांवों में 'कस्टम हायरिंग सेंटर्स' के जरिए किसान किराए पर ड्रोन और स्मार्ट मशीनें ले सकते हैं।
सरकारी सब्सिडी: डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत सरकार ड्रोन और स्मार्ट सिंचाई पर भारी छूट दे रही है।
"खेती अब केवल पसीने का काम नहीं, बल्कि दिमाग और डेटा का खेल है। जो किसान समय रहते तकनीक को अपनाएगा, वही भविष्य की चुनौतियों का सामना कर पाएगा।"
भविष्य की राह: डेटा ही बनेगा खाद
आने वाले समय में 'स्मार्ट खेती' केवल विकल्प नहीं बल्कि ज़रूरत बन जाएगी। बदलती जलवायु और बढ़ती आबादी के बीच कम ज़मीन से अधिक अनाज उगाने का एकमात्र रास्ता तकनीक ही है।
डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट की पहुंच जैसे-जैसे गांवों तक बढ़ रही है, प्रिसीजन फार्मिंग भारतीय किसानों के लिए खुशहाली का नया द्वार खोल रही है। अब वह दिन दूर नहीं जब किसान अपने मोबाइल पर एक क्लिक करके तय करेगा कि आज उसके खेत को क्या चाहिए।
केंद्र सरकार ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए स्कूल शिक्षा में बड़े बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसी कड़ी में 1 अप्रैल से ‘समग्र शिक्षा 3.0’ अभियान शुरू किया जाएगा, जिसके तहत सरकारी स्कूलों को समाज से सीधे जोड़ने का नया मॉडल लागू किया जाएगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और 11 राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ हुई बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।
अब स्कूल प्रबंधन में विशेषज्ञ भी होंगे शामिल
बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अब सरकारी स्कूलों की संचालन व्यवस्था में सिर्फ अभिभावक ही नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। ये विशेषज्ञ स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) का हिस्सा होंगे और पढ़ाई के स्तर, खेल सुविधाओं, कौशल विकास, फीस नियंत्रण और ड्रॉप-आउट रोकने जैसे अहम मुद्दों पर सुझाव देंगे।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा कि स्कूलों की संरचना और शिक्षकों के वेतन की जिम्मेदारी सरकार की होगी, लेकिन स्कूलों का संचालन समाज की सहभागिता से आगे बढ़ाया जाएगा।
उद्देश्य: पुरानी सोच से आगे बढ़कर नई पीढ़ी के लिए बेहतर शिक्षा
सरकार का मानना है कि देश को 2047 तक विकसित बनाने के लिए मजबूत और सक्षम मानव पूंजी आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए समग्र शिक्षा 3.0 को इस तरह तैयार किया गया है कि स्कूल शिक्षा पुरानी व्यवस्था और सीमाओं से बाहर निकलकर अधिक गुणवत्तापूर्ण, व्यावहारिक और परिणाम-आधारित बन सके।
बैठक में कई राज्यों की भागीदारी
इस बैठक में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र सहित 11 राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। राज्यों से प्राप्त सुझावों के आधार पर देशभर में एक समान, अधिक प्रभावी और जवाबदेह शिक्षा प्रबंधन प्रणाली तैयार की जाएगी।
मुख्य फोकस: नामांकन बढ़ाना, तकनीक से जोड़ना और तनाव कम करना
नई शिक्षा व्यवस्था में तीन मुख्य लक्ष्य तय किए गए हैं—
- 12वीं तक शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करना
- परीक्षा के तनाव को कम करना
- स्कूलों में आधुनिक तकनीक और डिजिटल संसाधनों का विस्तार करना
सरकार अब शिक्षा को सिर्फ एक पारंपरिक योजना के रूप में नहीं, बल्कि क्वालिटी और लर्निंग आउटकम पर आधारित फ्रेमवर्क के रूप में विकसित कर रही है। इसका मकसद है कि हर बच्चे को बेहतर सीखने का अवसर मिले और देश के भविष्य को मजबूत आधार मिल सके।
वाराणसी स्थित आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने औद्योगिक अपशिष्ट जल की समस्या का एक किफायती और पर्यावरण-अनुकूल समाधान खोज लिया है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने ऐसा उन्नत एडसोर्बेंट (शोषक पदार्थ) तैयार किया है, जो वस्त्र, प्रिंटिंग और फार्मा उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक रंगों से भरे पानी को लगभग पूरी तरह साफ करने में सक्षम है।
85–99% तक हटेंगे खतरनाक रासायनिक डाई
इस नई तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पानी में मौजूद एजो डाई, कॉन्गो रेड और मिथाइल ऑरेंज जैसे खतरनाक रसायनों को 85 से 99 फीसदी तक हटाने की क्षमता रखती है। ये डाई उद्योगों में सबसे अधिक उपयोग की जाती हैं और वर्षों से पर्यावरण प्रदूषण का बड़ा कारण रही हैं।
शोध के अनुसार, नया एडसोर्बेंट प्रति ग्राम 869.5 मिलीग्राम तक रंग सोख सकता है, जबकि इसकी लागत मात्र 9 पैसे प्रति लीटर आती है—जो वर्तमान तकनीकों की तुलना में कहीं अधिक सस्ती है।
फिल्टर लगाने की झंझट खत्म, तकनीक करेगी तेज़ी से साफ
यह शोध स्कूल ऑफ मैटेरियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रो. चंदन उपाध्याय, अमित बार और रसायन अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. राम शरण सिंह ने मिलकर किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तकनीक मौजूदा जटिल फिल्टर सिस्टम को बदल सकती है, क्योंकि इसमें कई प्रकार के महंगे फिल्टर लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
रासायनिक स्पंज की तरह काम करता है नया पदार्थ
टीम ने लेयर्ड डबल हाईड्रॉक्साइड्स (LDH) आधारित एक उन्नत शोषक सामग्री विकसित की है, जो रासायनिक स्पंज की तरह पानी में मौजूद रंगों और प्रदूषकों को तेजी से सोख लेती है।
उनके अनुसार, वस्त्र उद्योग हर साल अरबों लीटर ऐसा अपशिष्ट जल छोड़ता है जिसमें एजो डाई की मात्रा बेहद अधिक होती है। यह रसायन न केवल पानी को साफ करना मुश्किल बनाते हैं बल्कि मानव स्वास्थ्य और जलीय जीवों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करते हैं।
पहली तकनीकों की तुलना में सस्ती और इको-फ्रेंडली
प्रो. चंदन उपाध्याय के मुताबिक, यह तकनीक पहले से उपयोग में आने वाली विधियों की तुलना में काफी सस्ती और पर्यावरण के लिए सुरक्षित है। इसके निर्माण में साधारण धातु नाइट्रेट्स और नियंत्रित ताप तकनीक का उपयोग किया गया है।
सबसे खास बात यह है कि इसे तैयार करने या इस्तेमाल करने के लिए महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे इसे छोटे और मध्यम स्तर के उद्योग भी आसानी से अपना सकते हैं।
वाराणसी के कालीन उद्योग के लिए भी राहत
रासायनिक रंगों से भरे अपशिष्ट जल की समस्या सिर्फ वैश्विक वस्त्र उद्योग तक सीमित नहीं है। वाराणसी और आसपास के इलाके, खासकर स्थानीय कालीन उद्योग, लंबे समय से इस प्रदूषण से जूझ रहे हैं। यह तकनीक उनके लिए भी एक बड़ा और टिकाऊ समाधान बन सकती है।
आईआईटी बीएचयू के निदेशक प्रो. अमित पात्रा के अनुसार, “यह नवाचार औद्योगिक अपशिष्ट जल प्रबंधन में एक प्रभावी समाधान बन सकता है। इसी को आगे बढ़ाने के लिए शोध टीम को चैलेंज ग्रांट के तहत वित्तीय सहायता दी गई है।”
IIT BHU develops inexpensive and effective technology to clean industrial wastewater in minutes
भारत का आईटी सेक्टर अब सिर्फ एआई टूल्स के प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि एजेंटिक एआई के सहारे वह दुनिया में तकनीकी बदलाव की अगुवाई कर रहा है। टेक्नोलॉजी कंसल्टिंग कंपनी थॉटवर्क्स की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि देश की बड़ी टेक कंपनियां इस उभरती तकनीक को तेजी से अपनाकर नई कार्य संस्कृति तैयार कर रही हैं।
रिपोर्ट में शामिल 86% भारतीय आईटी नेताओं का मानना है कि एआई नौकरियां खत्म नहीं कर रहा, बल्कि कर्मचारियों के कौशल और उत्पादकता को बेहतर बनाकर उद्योग को नई दिशा दे रहा है।
भारत आगे, अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया पीछे
थॉटवर्क्स द्वारा सात देशों के 3,500 अधिकारियों पर किए गए इस सर्वे में 500 प्रतिभागी भारत से थे। रिपोर्ट के अनुसार, एजेंटिक एआई को अपनाने की रफ्तार में भारत 48% के साथ दुनिया में शीर्ष पर है।
इसके मुकाबले अमेरिका 28% और ऑस्ट्रेलिया 23% पर हैं। कई पश्चिमी देशों का फोकस अभी भी पारंपरिक दक्षता सुधारने वाली एआई टेक्नोलॉजी तक सीमित है, जबकि भारत सीधे उन्नत और स्वायत्त सिस्टमों की ओर बढ़ रहा है।
एजेंटिक एआई ऐसे डिजिटल सिस्टम होते हैं जो इंसानों की तरह सोचने, तर्क करने और स्वतः निर्णय लेकर काम पूरा करने की क्षमता रखते हैं।
भारतीय कंपनियों का नजरिया बेहद सकारात्मक
सर्वे में शामिल 10 में से 9 भारतीय नेताओं ने कहा कि एआई कर्मचारियों की क्षमता बढ़ा रहा है। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर तेज़ काम, बेहतर गुणवत्ता और दक्षता में देखा जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि 57% भारतीय कंपनियों ने स्वीकार किया कि मानव और एआई के सहयोग से उनकी संस्थाओं में नई भूमिकाएं और पद भी बने हैं। यानी एआई ऑटोमेशन नौकरी घटाने के बजाय नए अवसर पैदा कर रहा है।
राजस्व बढ़ने को लेकर भारतीय नेतृत्व सबसे अधिक आत्मविश्वासी
एआई से होने वाले आर्थिक लाभ पर भारतीय आईटी कंपनियां सबसे ज्यादा भरोसा कर रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 49% भारतीय कंपनियों का अनुमान है कि अगले पांच साल में उनकी आय में 15% से अधिक की बढ़त होगी। 14% भारतीय लीडर्स अगले 12 महीनों में ही इतनी वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं, जो वैश्विक औसत (8%) से काफी आगे है।
इससे साफ है कि भारतीय उद्योग एआई को सिर्फ तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि विकास की मजबूत रणनीति की तरह देख रहा है।
क्या है एजेंटिक एआई?
एजेंटिक एआई, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का वह अगला चरण है, जो केवल जवाब देने तक सीमित नहीं रहता। यह खुद निर्णय ले सकता है, योजनाएं बना सकता है और इंसानों की तरह कार्य पूरा कर सकता है।
सरल उदाहरण समझें:
पारंपरिक एआई से पूछा जाए—
“गोवा की सबसे सस्ती फ्लाइट कौन-सी है?”
तो यह सिर्फ विकल्प बता देगा।
जबकि एजेंटिक एआई से कहा जाए—
“अगले हफ्ते 10,000 रुपये के बजट में गोवा की फ्लाइट बुक कर दो।”
तो यह खुद इंटरनेट पर फ्लाइट ढूंढेगा, आपके कैलेंडर से तारीख मिलाएगा और बुकिंग भी पूरी कर देगा। यानी यह एआई सलाह नहीं, बल्कि पूरा काम करके देता है।
तकनीकी भविष्य का नेतृत्व करेगा भारत
रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारतीय आईटी कंपनियां अब सिर्फ एआई टूल्स के उपयोग तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे कारोबार को एआई-चालित मॉडल में बदलने की दिशा में बढ़ रही हैं।
एजेंटिक एआई के तेज़ी से अपनाने और कर्मचारियों के कौशल में दिख रहे सुधार के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक तकनीकी इकोसिस्टम में नई परिभाषा लिख सकता है।
India Becomes a Global Leader in the Era of Agentic AI, Ushering in a New Revolution in the IT Sector
जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण और घटते प्राकृतिक संसाधन—इन चुनौतियों के बीच ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन यानी स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव को भविष्य की ज़रूरत बताया जा रहा है। सरकारें, अंतरराष्ट्रीय संगठन और उद्योग इसे पर्यावरण बचाने का एकमात्र रास्ता मानते हैं। लेकिन इस बड़े बदलाव के बीच एक अहम सवाल उभर रहा है—क्या ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन का बोझ धीरे-धीरे आम नागरिक पर बढ़ता जा रहा है?
ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन क्या है?
ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन का मतलब है कोयला, तेल और गैस जैसी पारंपरिक ऊर्जा से हटकर सौर, पवन, जल और अन्य नवीकरणीय स्रोतों को अपनाना। इसका उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन कम करना, पर्यावरण की रक्षा करना और भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सैद्धांतिक रूप से यह बदलाव सकारात्मक और ज़रूरी है, लेकिन इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी उतने ही वास्तविक हैं।
बिजली बिल और महँगाई का दबाव
कई देशों और शहरों में यह देखा जा रहा है कि ग्रीन एनर्जी से जुड़ी नीतियों के कारण बिजली दरों में बढ़ोतरी हुई है। सोलर और विंड एनर्जी के लिए नई इंफ्रास्ट्रक्चर लागत, ग्रिड अपग्रेड और टैक्स—इन सबका असर अंततः उपभोक्ता के बिल पर पड़ता है।आम नागरिक के लिए, जो पहले ही महँगाई से जूझ रहा है, यह सवाल वाजिब है कि क्या स्वच्छ ऊर्जा की कीमत उसकी जेब से चुकाई जा रही है?
ईंधन बदलाव और परिवहन का सवाल
इलेक्ट्रिक वाहनों को भविष्य बताया जा रहा है, लेकिन उनकी ऊँची कीमतें आज भी आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं। पेट्रोल-डीज़ल पर बढ़ते टैक्स और वैकल्पिक ईंधन की सीमित उपलब्धता से रोज़मर्रा का सफ़र महँगा होता जा रहा है। यह स्थिति एक तरह से नागरिकों को मजबूर करती है कि वे बदलाव को स्वीकार करें, चाहे वे आर्थिक रूप से इसके लिए तैयार हों या नहीं।
रोज़गार और आजीविका पर असर
ग्रीन ट्रांज़िशन के तहत कोयला खनन, थर्मल पावर और पारंपरिक उद्योगों में काम करने वाले लाखों लोगों के सामने रोज़गार का संकट खड़ा हो सकता है। हालाँकि नई ग्रीन नौकरियों की बात की जाती है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए उस बदलाव में ढल पाना आसान नहीं है। आम नागरिक के लिए यह सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, बल्कि रोटी-रोज़गार का सवाल भी बन जाता है।
नीतियों में संतुलन की कमी
अक्सर ग्रीन एनर्जी नीतियाँ बड़े शहरों और विकसित क्षेत्रों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में बिजली की उपलब्धता, सस्ती ऊर्जा और बुनियादी सुविधाएँ अभी भी चुनौती बनी हुई हैं। अगर ट्रांज़िशन की नीतियाँ समानता और सामाजिक न्याय को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो यह बदलाव लोगों के बीच असंतोष पैदा कर सकता है।
क्या लाभ भी आम नागरिक तक पहुँच रहे हैं?
सवाल सिर्फ़ बोझ का नहीं, बल्कि लाभ के वितरण का भी है। क्या आम नागरिक को सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा मिल रही है? क्या सब्सिडी और प्रोत्साहन वास्तव में ज़रूरतमंद तक पहुँच रहे हैं, या उनका लाभ बड़े उद्योग उठा रहे हैं? ग्रीन ट्रांज़िशन तभी सफल होगा, जब इसका फायदा केवल रिपोर्ट्स में नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर महसूस किया जाए।
पर्यावरण बनाम नागरिक?
ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन को पर्यावरण बनाम नागरिक की लड़ाई नहीं बनाया जाना चाहिए। यह बदलाव अनिवार्य है, लेकिन इसे न्यायसंगत और समावेशी बनाना उतना ही ज़रूरी है। नीतियाँ ऐसी हों कि आम नागरिक पर अचानक आर्थिक बोझ न पड़े, रोज़गार के सुरक्षित विकल्प तैयार हों और ऊर्जा सस्ती और सुलभ बने।
स्वच्छ ऊर्जा का भविष्य तभी टिकाऊ होगा, जब वह केवल धरती को नहीं, बल्कि आम इंसान के जीवन को भी बेहतर बनाए। वरना यह सवाल और गहराता जाएगा— ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन: समाधान या नया बोझ?
Green Energy Transition: An Environmental Necessity or a Growing Burden on the Average Citizen?
उच्च शिक्षा की पुरानी विसंगतियों को खत्म करेगा शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025: प्रो. अनिल सहस्त्रबुद्धे
वर्ष 2026 अपने साथ भारतीय शिक्षा जगत में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। लंबे समय से लागू पुरानी शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर नई शिक्षा नीति 2020 को पूरे देश में एकसमान ढंग से लागू करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने पिछले दिनों विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 संसद में पेश किया है। यह विधेयक शिक्षा ढांचे को सरल, पारदर्शी और आधुनिक बनाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस बदलाव की जरूरत को लेकर केंद्र को समय-समय पर अवगत कराने वालों में नेशनल एजुकेशन टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) के चेयरमैन और NAAC कार्यसमिति के अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल डी. सहस्त्रबुद्धे भी शामिल रहे हैं।
प्रो. सहस्त्रबुद्धे का शिक्षा जगत में लंबा अनुभव रहा है। कर्नाटक में जन्मे और पले-बढ़े प्रो. सहस्त्रबुद्धे ने 1980 में कर्नाटक विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक किया। IISc बेंगलुरु से स्नातकोत्तर, पीएचडी और नौकरी करने के बाद वे कुछ समय निजी क्षेत्र में भी रहे, लेकिन जल्द ही लौटकर शिक्षा जगत से जुड़ गए। अरुणाचल प्रदेश के NERIST से लेकर IIT गुवाहाटी तक और उसके बाद पुणे इंजीनियरिंग कॉलेज के निदेशक और AICTE अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देश की तकनीकी शिक्षा में अनेक काम किए। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न 1: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 की जरूरत क्यों महसूस हुई?
- इस विधेयक की जरूरत इसलिए सामने आई क्योंकि भारत अब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है, और इस यात्रा में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण आधार है। लंबे समय से चली आ रही मैकाले काल की पुरानी शिक्षा प्रणाली बदलते समय की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही थी, इसलिए नई शिक्षा नीति 2020 तो लागू कर दी गई, लेकिन उसे पूरे देश में एकसमान और व्यावहारिक रूप में लागू करने के लिए एक मजबूत ढांचे की कमी रही। इसी कमी को दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को सुचारू, सरल और भविष्य के अनुरूप बनाने के लिए विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक लाया गया है, जो अनुमति, मान्यता, निरीक्षण और मानक निर्धारण जैसे बुनियादी पहलुओं में फैली जटिलताओं को खत्म कर शिक्षा जगत को आसानी और पारदर्शिता की नई दिशा देता है।
प्रश्न 2: आप इस विधेयक की व्याख्या कैसे करेंगे?
- इस विधेयक को समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि जैसे व्यापार को आसान बनाने के लिए ‘Ease of Doing Business’ की अवधारणा आई, ठीक उसी की तरह यह शिक्षा जगत के लिए ‘Ease of Doing Education’ का ढांचा तैयार करता है। पुराने ढांचे में अलग-अलग परिषदों के पास जाकर अनुमति और मान्यता लेना बेहद जटिल प्रक्रिया थी, जबकि नया विधेयक इन सभी प्रक्रियाओं को एक ही छतरी के नीचे लाकर शिक्षा देने और पाने दोनों की राह को सरल करता है और एकरूपता सुनिश्चित करता है।
प्रश्न 3: यह शिक्षा प्रणाली को कैसे आसान बनाएगा?
- पुरानी व्यवस्था में किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय को अलग-अलग पाठ्यक्रमों के लिए UGC, AICTE, NCTE और COA जैसे कई संस्थानों से अलग-अलग अनुमति लेनी पड़ती थी, जिनके नियम-कानून और मानक एक-दूसरे से भिन्न थे। नया विधेयक इन तीनों प्रमुख परिषदों को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) के अधीन समाहित कर देता है, जिससे सभी तरह के पाठ्यक्रमों की मान्यता, निरीक्षण और अनुमति एक ही संस्था द्वारा की जा सकेगी। इससे पूरी प्रक्रिया सरल होगी, समय और संसाधन बचेंगे और संस्थानों पर अनावश्यक बोझ कम होगा।
प्रश्न 4: UGC, AICTE और NCTE को एक करने से शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी?
- गुणवत्ता सुधार के लिए इस विधेयक में तीन नई परिषदों—विनियम परिषद, मान्यता परिषद और मानक परिषद—का गठन प्रस्तावित है, जिनके अलग-अलग कार्य होंगे। विनियम परिषद नियम और अनुपालन देखेगी, मान्यता परिषद गुणवत्ता जांच करेगी और मानक परिषद सभी विषयों के मानक एकसमान रूप से तय करेगी। यह ढांचा पूरे देश की उच्च शिक्षा में एकरूपता लाएगा और पुरानी विसंगतियों को खत्म करेगा। अलग-अलग संस्थाओं के अलग नियम होने की वजह से जो उलझनें पैदा होती थीं, अब वे दूर हो जाएंगी और गुणवत्ता में स्थिरता आएगी।
प्रश्न 5: मेडिकल और कानून की शिक्षा को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया?
- फिलहाल मेडिकल और कानून की शिक्षा को इस नए ढांचे में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि दोनों क्षेत्रों के अपने विशेष एवं जटिल मानक हैं। हालांकि भविष्य में आवश्यकता और सहमति के अनुसार इन पर भी विचार किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल उनके अपने नियामक ढांचे ही जारी रहेंगे।
प्रश्न 6: राज्य सरकारों और शिक्षण संस्थानों की इसमें क्या भूमिका होगी?
- नए विधेयक में पहली बार राज्य सरकारों और बड़े शिक्षण संस्थानों को परिषदों का हिस्सा बनाया गया है, जिससे राज्यों की भूमिका औपचारिक और जिम्मेदार बनती है। पहले राज्य सरकारें अपने क्षेत्र के कॉलेजों में होने वाली गड़बड़ियों पर सीधे तौर पर जवाबदेह नहीं थीं, लेकिन अब उन्हें शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और संचालन में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, जिससे स्थानीय स्तर पर सुधार तेजी से हो सकेंगे।
प्रश्न 7: NAAC दौरे बंद होने के बाद संस्थानों की निगरानी कैसे होगी?
- NAAC दौरे अब पूरी तरह समाप्त किए जा रहे हैं और उनकी जगह भरोसा आधारित निगरानी प्रणाली लाई जा रही है, जिसमें हर संस्थान को अपनी वास्तविक सुविधाओं, लैब, शिक्षक संख्या, छात्रों की संख्या, उपकरण, लाइब्रेरी और कक्षाओं की जानकारी स्वयं पोर्टल पर अपलोड करनी होगी। यह जानकारी सभी के लिए खुली होगी—विद्यार्थी, अभिभावक, कंपनियां या नियामक सभी इसे देख सकेंगे। गलत जानकारी देने पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द होने जैसी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान इस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाता है।
प्रश्न 8: इस विधेयक से शिक्षा व्यवस्था में क्या बड़े बदलाव आएंगे?
- यह विधेयक अंग्रेजी काल की मैकाले प्रणाली को बदलते हुए बच्चों को एकसमान और कठोर ढांचे में बांधने वाली पुरानी सोच से मुक्ति देता है। शिक्षकों के प्रमोशन में शोधपत्र अनिवार्य नहीं रहेगा और उनकी कार्यशैली और नवाचार को महत्व मिलेगा। जब शिक्षक नई तकनीकों से पढ़ाएंगे और बच्चे विषय को बेहतर समझेंगे, तो मूल्यांकन इसी आधार पर होगा। इसका सीधा असर गांवों और छोटे कस्बों तक पहुंचेगा और ड्रॉपआउट दर में कमी आने की उम्मीद है।
प्रश्न 9: शिक्षा के स्तर में क्या सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं?
- नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद देश में स्टार्टअप्स की संख्या 440 से बढ़कर 1.75 लाख पार कर गई है, और भारत सिर्फ सॉफ्टवेयर कौशल ही नहीं बल्कि हार्डवेयर, चिप निर्माण, AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और डीप टेक क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है। एक सुव्यवस्थित और पारदर्शी शिक्षा ढांचा इन क्षेत्रों में और भी तेज़ प्रगति का आधार बनेगा।
प्रश्न 10: क्या इस विधेयक से शिक्षा प्रणाली पूरी तरह समस्यामुक्त हो जाएगी?
- पूरी तरह समस्यामुक्त होना संभव नहीं है, क्योंकि किसी भी व्यवस्था में 10–15 प्रतिशत चुनौतियाँ बनी रहती हैं। यह विधेयक भी सभी गड़बड़ियों को एक झटके में समाप्त नहीं कर सकता। लेकिन यह बदलाव एक सतत प्रक्रिया है, और जैसे-जैसे प्रणाली लागू होगी, समस्याएं सामने आते ही उन पर सुधार का काम भी चलता रहेगा।
प्रश्न 11: इसके प्रभाव दिखने में कितना समय लगेगा?
- शिक्षा सुधार त्वरित परिणाम नहीं देते, इसलिए इसके असर जमीन पर दिखने में लगभग पांच से दस साल का समय लग सकता है। लेकिन दिशा सही है और सुधार क्रमिक रूप से दिखाई देंगे।
डिजिटल और सोशल मीडिया के विस्तार से सूचना से वंचित समाज तक सूचनाओं की पहुँच बढ़ी है: डॉ. हुसैन ताबिश
डॉ. हुसैन ताबिश एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है। फिलवक़्त वह ज़ी सलाम डिजिटल के संपादक हैं। इससे पहले वह एचटी मीडिया, अमर उजाला, दूरदर्शन, फ़ॉरवर्ड प्रेस सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से विभिन्न भूमिकाओं में जुड़े रहे हैं। हुसैन ताबिश अल्पसंख्यक समुदायों, हाशिए पर खड़े समाज और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशील और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। मीडिया एथिक्स और डिजिटल पत्रकारिता पर व्यापक अनुभव रखने वाले हुसैन ताबिश आज भी स्वयं को पत्रकारिता का विद्यार्थी मानते हैं।
एक ऐसे दौर में जब ब्रेकिंग न्यूज़ को सेकंडों में मापा जा रहा है, टीआरपी न्यूज़रूम की प्राथमिकताएं तय कर रही है और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस कंटेंट निर्माण के तरीके बदल रहा है, पत्रकारिता एक अहम मोड़ पर खड़ी है। रफ्तार पहले से कहीं तेज़ है, लेकिन भरोसा पहले से कहीं ज़्यादा नाज़ुक। हुसैन ताबिश मानते हैं कि विश्वसनीयता आज भी मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है और डिजिटल बदलाव के इस दौर में नैतिक पत्रकारिता ही न्यूज़रूम की मजबूत आधारशिला होनी चाहिए। भारतीय मीडिया के सामने खड़ी बदलती चुनौतियों पर एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए पूजा खन्ना ने डॉ. हुसैन ताबिश से विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न 1: आपने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम किया है। आपके अनुभव में भारतीय पत्रकारिता का सबसे बड़ा बदलाव क्या रहा है?
- दुनिया के हर प्रोफेशन में समय के हिसाब से परिवर्तन होते रहे हैं, कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक. पत्रकारिता कोई अपवाद नहीं है, इसमें भी पिछले दो दशकों में जन सरोकार, कंटेंट और तकनीक के स्तर पर तीन बड़े बदलाव हुए हैं. भारतीय मीडिया से जन सरोकार गायब हुए हैं. अख़बारों में जनहित की ख़बरों की जगह अब उनके प्रसार संख्या और अधिकतम कार्पोरेट या सरकारी विज्ञापन ने ले लिया है. निजी टीवी चैनलों ने अपने शुरुआत से ही जनहित से ज्यादा TRP यानी बिकने और लाभ देने वाली खबरों को प्राथमिकता दी है. डिजिटल में इसका और विस्तार हुआ है. यहाँ प्रसार और TRP की जगह व्यूज (UVs-PVs) ने ले ली. संपादकीय आज़ादी नाम मात्र की रह गई है. संपादकों के पास सिर्फ प्रबंधन की इच्छा को लागू करने भर का दायित्व शेष रह गया है. ख़बरों की परिभाषा भी बिल्कुल बदल गई है. खबर वो ही है, जो ज्यादा बिके, दिखे या चले; जिससे पैसा आये और मालिकान और हुक्मरान दोनों खुश रहें. पाठक इस सीन में कहीं नहीं हैं. ख़बरों से निष्पक्षता और सत्यनिष्ठता पूरी तरह गायब है. जनता का मीडिया के सभी प्लेटफार्म से भरोसा उठ चुका है.
देश की लगभग 75 करोड़ आबादी के हाथ में आज स्मार्ट फ़ोन है और इन्टरनेट तक उसकी पहुँच है. टीवी न्यूज़ चैनल्स ने अख़बार को चुनौती दी, डिजिटल ने टीवी को चुनौती दी और सोशल मीडिया ने अख़बार, टीवी और डिजिटल तीनों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है. लोगों की मीडिया कंजम्पशन हैबिट भी बदल रही है.
हालांकि, इन सब में अच्छी बात ये है कि डिजिटल और सोशल मीडिया के विस्तार से सूचना से वंचित समाज तक सूचनाओं की पहुँच बढ़ी है. उनकी बातें सुनी जा रही है, उनकी बातें की जा रही है. मीडिया कारोबार से कार्पोरेट का एकाधिकार समाप्त हुआ है. लेकिन भरोसे का संकट यहाँ भी बरकरार है. यहाँ ख़बरों की गेटकीपिंग खत्म हो चुकी है. AI कंटेंट ने असली और नकली कंटेंट में भेद करने का संकट पैदा कर दिया है. डिजिटल और सोशल न्यूज़ पब्लिशर के सामने भी google और facebook जैसे प्लेटफार्म की मोनोपोली की चुनौतियाँ हैं.
प्रश्न 2: आप माइनोरिटी और हाशिए के समाज की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। क्या डिजिटल मीडिया ने इन आवाज़ों को सशक्त किया है?
- इसका जवाब हमेशा 'हाँ' में होगा. अखबार और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों बड़े कॉर्पोरेट पूँजी का हिस्सा हैं. इनका संचालन खर्चीला है, प्रोडक्शन कास्ट महंगा है. यहाँ काम करने वाले लोगों में इस समाज का प्रतिनिधत्व नहीं है. अख़बार में स्पेस तो टीवी में टाइम स्लॉट की भी सीमाएं हैं. बड़े शहरों, बड़ी हस्तियों और बहुसंख्यक समाज की खबरें अक्सर अल्पसंख्यक और वंचित समाज की ख़बरों का स्पेस और टाइम हड़प लेते हैं, लेकिन डिजिटल और सोशल मीडिया में ऐसी बाध्यताएं नहीं है. इसकी पहुँच भी अखबार और टीवी से ज्यादा है, और न्यूज़ प्रोडक्शन का खर्चा भी न के बराबर है. सबसे बड़ी बात ये है कि डिजिटल या सोशल पर खबर पढने के लिए पैसा पाठकों से नहीं वरना गूगल और सोशल मीडिया प्लेटफार्म से आ रहा है. इस वजह से अब बड़े मीडिया समूहों के भी डिजिटल और सोशल प्लेटफार्म पर अल्पसंख्यकों और वंचित समाज की खबरों को स्पेस मिल रहा है. पिछले 10 सालों में डिजिटल और सोशल प्लेटफार्म पर कई ऐसे मीडिया वेंचर्स शुरू किये गए हैं, जो पूर्ण रूप से अल्पसंख्यक और हाशिये पर पड़े वंचित समाज को समर्पित हैं, और उनकी आवाज़ को बुलंद कर रहे हैं. डिजिटल और सोशल मीडिया ने सूचना से वंचित समाज को नया हथियार सौंप दिया है.
प्रश्न 3: क्या आज की युवा पत्रकारिता ज़मीनी रिपोर्टिंग से दूर हो रही है?
- हो नहीं रही है, बल्कि पूरी तरह दूर हो चुकी है. जब पत्रकारिता से जनहित के मुद्दे, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठता और स्वतंत्रता जैसे ज़रूरी तत्व ही गायब हैं, तो ज़मीनी रिपोर्टिंग कैसे होगी, किसके लिए होगी, कौन करेगा ? रिपोर्टर की ग्राउंड रिपोर्ट भी सतही, पूर्वाग्रह से ग्रस्त और एकतरफा हो रही है. टीवी रिपोर्ट में एकपक्षीय बाइट और विजुअल लाना ही अब ग्राउंड रिपोर्ट का हिस्सा रह गया है. अख़बार के रिपोर्टर फ़ोन पर रिपोर्ट बना रहे हैं. किसी ने कुछ कह दिया वो अब खबर है. ख़बरों को वेरीफाई करने का चलन खत्म होता जा रहा है. बड़े समूह के डिजिटल प्लेटफार्म के लिए अलग से ग्राउंड रिपोर्टिंग का कोई मेकैनिजम नहीं है. छोटे संस्थानों के पास फंड और साधन नहीं है. यूटूबर के पास ट्रेनिंग नहीं है. कोई भी मीडिया संस्थान इस समय खबर नहीं बल्कि सूचनाएं परोस रहा है. खबर और ग्राउंड रिपोर्टिंग कराने वाले न संपादक बचे हैं, न संस्थान और न ही पत्रकार.
प्रश्न 4:आपने रिसर्च और चुनावी रिपोर्टिंग दोनों में काम किया है। दोनों के बीच संतुलन क्यों ज़रूरी है?
- रिसर्च खबरों की रीढ़ है, इसके बिना खबरें सीधी खड़ी नहीं हो पाती और ज्यादा दिनों तक उसका जीवन नहीं होता है. एक सूचना या क्लू को एक सम्पूर्ण खबर या रिपोर्ट में तब्दील होने के पहले कई चरणों से गुज़रना पड़ता है, जिसमें रिसर्च एक महत्वपूर्ण चरण है. रिसर्च बेस्ड ख़बरें पाठकों को किसी मुद्दे की गहन समझ और एक अंतर्दृष्टि देती हैं, जबकि सामान्य खबरें सिर्फ सतही जानकारी देती हैं.
चुनावी रिपोर्टिंग एक मौसमी और भागम-भाग रिपोर्टिंग है, जिसकी मियाद बेहद छोटी है. इसमें हम नेताओं, राजनीतिक दलों के चुनावी सभाओं, भाषणों, रैलियों, बयानों, पक्ष- विपक्ष के आरोप- प्रत्यारोपों, वादे- दावे, घोषणा- पत्रों, टिकट बंटवारे, उमीदवारों, जनता के मत, उनकी पसंद, उनकी परेशानियों, मांगों को रोजाना रिपोर्ट करते हैं. ओपिनियन पोल, एग्जिट पोल और चुनाव परिणाम का कवरेज भी इसका हिस्सा है. ऐसी चुनावी रिपोर्टों से बड़े और सत्तारूढ़ दलों को लाभ मिलता है. सनसनी पैदा होती है.चुनावी इलाके का माहौल तनावपूर्ण और अविश्वास से भर जाता है. इससे जनता और उमीदवारों के बीच भय और निराशा भी पैदा होती है. कुछ लोग इसे एन्जॉय भी करते हैं. चुनावी रिपोर्टिंग एक टूरिज्म रिपोर्टिंग में तब्दील हो जाती है. लेकिन इसमें जनता के गंभीर सवाल और मसले हमेशा पीछे छूट जाते हैं.
ऐसे में रिसर्च और investigative रिपोर्टिंग एक संतुलन बनाता है. रिसर्च बेस्ड खबरों में इस बात की पड़ताल की जाती है कि किसी नेता या पार्टी ने पिछले 5 साल में क्या किया है? उसने जनता के हित में कौन- कौन से काम किये हैं, और किसे नज़रंदाज़ किया है? सरकार की सफलताएं और विफलताएं क्या रही हैं? किन वादों पर खड़ी उतरी है, कहाँ उसने वादाखिलाफी की है. उसकी नीतियां कैसी रही है. किसी दल के चुनावी घोषणा पत्र में क्या है, अगर वो सत्ता में आती है और उसे लागू करती है, तो उसका क्या असर होगा? रिसर्च बेस्ड रिपोर्टिंग में इलाके में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और अन्य आधारभूत संरचनाओं की पड़ताल की जाती है. उसपर जनमत का निर्माण होता है. इससे वोटर्स को असल मुद्दों की जानकारी होती है, वो अपने मताधिकार का इस्तेमाल सही पार्टी और उमीदवार के पक्ष में कर पाता है. रिसर्च बेस्ड रिपोर्टिंग नेता, पार्टी या सरकार को जवाबदेह बनाती हैं, उससे सवाल पूछती है, और एक वाचडॉग की भूमिका निभाती है, जबकि चुनावी रिपोटिंग नेता और राजनीतिक दलों की टूल बन जाती है.
प्रश्न 5: रीजनल डिजिटल मीडिया की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
- टीवी, अख़बार और डिजिटल का नेशनल डिजिटल मीडिया अपना स्वर्णकाल भोग चुका है. उनके दिन लद चुके हैं. सही मायनों में अब वो ढहने की कगार पर खड़े हैं. नई उम्मीदें अब सिर्फ रीजनल मीडिया से बची है. ये सभी माध्यमों पर सामान रूप से लागू होता है. वहां अभी भी बहुत कुछ एक्सप्लोर किया जाना बाकी है. अख़बार,टीवी और डिजिटल के पाठक/ दर्शक/ यूजर्स यहीं पर हैं. रेवेन्यू आने की संभावना यहीं से है. छोटे-छोटे रीजनल मीडिया प्लेयर आएँगे तो बड़े मीडिया समूहों की मोनोपोली भी समाप्त होगी, जिसकी वजह से प्रेस की आज़ादी,निष्पक्षता और सत्यनिष्ठता के साथ लोकतंत्र भी जीवित रहेगा.
प्रश्न 6:अनुवाद की पत्रकारिता को आप कैसे परिभाषित करते हैं?
- अनुवाद, दो संस्कृतियों और समाजों के बीच भाषाई आधार पर पैदा हुई ज्ञान और सूचनाओं के आदान-प्रदान और समायोजन की बाधाओं को दूर करता है. अनुवाद के बिना पत्रकारिता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. इन्टरनेट ने अगर दुनिया की भौगोलिक दूरियों को पाटकर ग्लोबल विलेज बनाया है, तो अनुवाद ने उसे ग्लोबल फैमिली में तब्दील करने का काम किया है. भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से भरी इस दुनिया को जानने और समझने की दृष्टि अनुवाद से ही हमें मिली है. भारत जैसे विशाल और बहुभाषी देश में तो Journalistic Translation न सिर्फ भाषाई पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि इंग्लिश जर्नलिज्म का भी इसके बिना काम नहीं चल पाता है. हिंदी के अखबार, टीवी या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अगर चीन, जापान, इटली, जर्मनी, फ्रांस, पुर्तगाल, या गुजरात और पश्चिम बंगाल की खबर छप रही है, तो इसके पीछे अनुवाद की पत्रकारिता की ही भूमिका है. देश-दुनिया की सभी बड़ी न्यूज़ एजेंसियां अनुवाद पर टिकी हुई है. वो इंग्लिश और लोकल भाषाओँ में खबर लेती है, और समाचार संस्थाओं को उनके इच्छित भाषाओँ में समाचार उपलब्ध कराती है. अनुवाद ने जिस तरह साहित्य को समृद्ध किया है, उसी तरह ये पत्रकारिता को भी समृद्ध कर रहा है. रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की और इंग्लिश के गुजराती लेखक चेतन भगत के उपन्यास अगर हिंदी पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं, तो इसका श्रेय अनुवाद की विद्या को जाता है.
प्रश्न 7: आज मीडिया एथिक्स का सबसे बड़ा संकट क्या है?
- भारतीय मीडिया संस्थानों और उसके पत्रकारों के बीच मीडिया एथिक्स बोध कभी परिपक्व अवस्था में पहुंचा ही नहीं, अखबारों ने उसके हाथ काट दिए, टीवी ने टाँगे तोड़ दी और डिजिटल मीडिया क्रांति ने उसका गला घोंट दिया. साल 2017 में भोपाल में हिंदी पत्रकारों पर किए गए एक सर्वे में सामने आया कि लगभग 37 फीसदी पत्रकार ये भी नहीं जानते हैं कि पत्रकारिता की कोई एथिक्स भी होती है. जो जानते भी हैं, वो उसे लेकर स्पष्ट नहीं हैं. अधिकांश पत्रकारों की नज़र में रेप पीड़िता का नाम और फोटो न छापना और कोर्ट में विचारधीन मामलों पर टीका- टिपण्णी न करना, सिर्फ यही मीडिया एथिक्स है. अखबार, टीवी और डिजिटल सभी माध्यमों में एकतरफा, झूठी, आधी-अधूरी और पूर्वाग्रह से ग्रस्त खबरों का बोलबाला है. जर्नलिज्म से सत्यता, निष्पक्षता, और सम्पूर्णता जैसे बैसिक एलिमेंट गायब हैं. पत्रकार पक्षकार, प्रवक्ता, और राजनीतिक कार्यकर्त्ता की भूमिका में खड़ें हैं. पहले से फेक न्यूज़ के संकट से जूझ रहे भारतीय मीडिया में AI जनरेटेड कंटेंट ने और तबाही ला दी है. तकनीक का इस्तेमाल कर झूठ इतनी सफाई के साथ परोसा जा रहा है कि पाठक/ दर्शक और यूजर्स असली और नकली का भेद नहीं कर पा रहा है. पत्रकारिता से उसका भरोसा उठ चुका है. अगर वो किसी माध्यम से न्यूज़ कन्जूम कर रहा है, तो सूचना या समाचार के लिए नहीं बल्कि मनोरंजन और टाइम पास के लिए कर रहा है. एक खबर को कई स्रोतों से वेरीफाई करने के बाद ही वो उसपर भरोसा कर पा रहा है.
गूगल और वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेक न्यूज़ को रोकने और न्यूज़ पब्लिशर को ज़िम्मेदार बनाने की दिशा में कदम उठा रहा है, जिसका पॉजिटिव असर आने वाले दिनों में डिजिटल और सोशल मीडिया न्यूज़ पर पड़ सकता है, लेकिन अखबार और टीवी की खबरों की सुध कौन और कब लेगा, इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है.
प्रश्न 8:आप खुद को आज भी “पत्रकारिता का इंटर्न” कहते हैं। क्यों?
- अध्यापन, वकालत, इंजीनियरिंग, साइंस एवं तकनीक और पत्रकारिता जैसे बहुत से प्रोफेशन हैं, जहाँ आप कभी मास्टर होने का दावा नहीं कर सकते हैं. आपको हमेशा एक विद्यार्थी, ट्रेनी या इंटर्न की तरह सीखते रहना पड़ता है.
मेरे पत्रकारिता करिअर की शुरुआत अखबार में एजुकेशन बीट के एक सिटी रिपोर्टर के तौर पर हुई थी. जब इसमें कुछ अनुभव हुआ तो मुझे स्पोर्ट की खबरों में लगा दिया गया, फिर क्राइम, जिला प्रशासन और पोलिटिकल बीट की खबरों की जिम्मेदारी सौंप दी गई. डेस्क पर भी अखबारों के अलग-अलग पन्नों पर काम करना पड़ा. अखबार का काम कुछ सीख गया तो टीवी में आकर लगा, मुझे कुछ नहीं आता है. जब लगा के टीवी का काम थोड़ा- बहुत समझ गया हूँ, तो डिजिटल में आकर फिर खुद को एक ट्रेनी पत्रकार जैसा महसूस किया. डिजिटल मीडिया सबसे परिवर्तनशील माध्यम है, यहाँ जो कुछ आज चल रहा है, अगले दो- तीन महीने बाद भी ऐसा सबकुछ रहेगा इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है. यहाँ संपादक से लेकर एक सब- एडिटर तक सभी इंटर्न हैं, उन्हें रोज़ सीखना पड़ता है. ऐसे में पत्रकारिता का मास्टर, एक्सपर्ट या फिर वरिष्ट पत्रकार होने का रिस्क भला कौन लेगा? यही वजह है कि मैं खुद को 'पत्रकारिता का इंटर्न' मानता हूँ!
IIIT-H के निदेशक प्रो. संदीप के. शुक्ला से बातचीत
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जिस तेजी से कक्षाओं, मूल्यांकन के तरीकों और करियर के रास्तों को बदल रहा है, उसे देखते हुए भारत भर के इंजीनियरिंग संस्थानों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपनी पढ़ाने और छात्रों के मूल्यांकन की पद्धतियों को तुरंत नया रूप दें। एक बातचीत में इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी हैदराबाद (IIIT-H) के निदेशक प्रो. संदीप के. शुक्ला बताते हैं कि किस तरह AI इंजीनियरिंग शिक्षा की पुरानी मान्यताओं को तोड़ रहा है, पारंपरिक मूल्यांकन मॉडल पर दबाव बढ़ा रहा है और क्यों संस्थानों को रिसर्च आधारित लर्निंग, व्यूहा लैब्स जैसे साइबर सुरक्षा प्रोजेक्ट्स और उद्योग के साथ गहरी साझेदारी के जरिए खुद को बदलना होगा, ताकि अस्थिर तकनीकी भविष्य में टिके रह सकें।
- आज AI इंजीनियरिंग शिक्षा और मूल्यांकन को कैसे नया रूप दे रहा है?
प्रो. संदीप के. शुक्ला: AI, खासकर जनरेटिव और एजेंटिक टूल्स ने छात्रों के सीखने के तरीके और उनके काम के आउटपुट को पूरी तरह बदल दिया है। अब कोड लिखना, निबंध तैयार करना या स्ट्रक्चर्ड उत्तर देना AI की मदद से काफी आसान हो गया है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे यह समझ सकें कि छात्र ने सिर्फ उत्तर तो नहीं लिख दिया, बल्कि वह कॉन्सेप्ट को समझकर उसे वास्तविक परिस्थितियों में लागू भी कर पा रहा है या नहीं।
यही वजह है कि भारत सहित पूरी दुनिया में पारंपरिक मूल्यांकन मॉडल पर भारी दबाव है और संस्थान अब न सिर्फ पाठ्यक्रम के डिजाइन पर, बल्कि मूल्यांकन के तरीकों पर भी दोबारा सोचने को मजबूर हैं।
- AI के दौर में भारतीय इंजीनियरिंग कॉलेजों को अपने पाठ्यक्रम और मूल्यांकन में क्या बदलाव करने चाहिए?
प्रो. शुक्ला: कुछ संस्थान ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जहां परीक्षा और असाइनमेंट में AI के इस्तेमाल की अनुमति दी जा रही है, साथ ही छात्रों से यह भी कहा जा रहा है कि वे अपने प्रॉम्प्ट्स जमा करें। सवालों का फोकस अब कॉन्सेप्ट की स्पष्ट समझ और रचनात्मक उपयोग पर रखा जा रहा है।
फिलहाल किसी एक समाधान पर नहीं पहुंचा गया है, लेकिन दिशा साफ है—रटने वाली पढ़ाई से आगे बढ़कर अनुभव आधारित, हैंड्स-ऑन और कॉन्सेप्ट ड्रिवन शिक्षा की ओर जाना। आने वाले समय में AI पर्सनलाइज्ड लर्निंग और एडैप्टिव असेसमेंट का मजबूत टूल बनेगा। जैसे-जैसे AI आगे बढ़ेगा, पाठ्यक्रमों को भी लगातार अपडेट करना होगा।
- व्यूहा लैब्स की शुरुआत के बाद IIIT-H राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा में कैसे योगदान दे रहा है?
प्रो. शुक्ला: भारत में साइबर क्राइम लोगों की चिंता का बड़ा कारण बन चुका है और हर साल स्थिति और गंभीर होती जा रही है। खासकर सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित फ्रॉड बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं। व्यूहा लैब्स का मकसद साइबर अपराध के अलग-अलग पहलुओं पर रिसर्च करना है, ताकि अपराधियों की रणनीतियों और तरीकों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
ये अपराध इसलिए भी जटिल हैं क्योंकि अपराधी बड़े डेटा के समुद्र में अपने निशान छुपा लेते हैं, वहीं पीड़ितों के लिए यह समझाना मुश्किल होता है कि उनके साथ किस तरह का टारगेटेड और जटिल हमला हुआ।
साइबरक्राइम नेविगेटर एक ऐसा टूल है, जो पीड़ितों की जानकारी के आधार पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अपराध का नक्शा तैयार करने में मदद करता है। डेटा एनालिटिक्स के जरिए पुलिस को अपराध के ट्रेंड और हॉटस्पॉट्स की भी बेहतर समझ मिलती है।
इसके अलावा, लैब साइबरक्राइम हेल्पलाइन पर आने वाली कॉल्स को अलग-अलग भाषाओं में ट्रांसक्राइब करने की तकनीक पर भी काम कर रही है और डिजिटल सबूतों को टेक्स्ट में बदलकर उनका विश्लेषण आसान बना रही है। साथ ही, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए ट्रेनिंग और स्वदेशी फॉरेंसिक टूल्स के विकास पर भी काम किया जा रहा है, ताकि साइबर अपराधियों से प्रभावी मुकाबला किया जा सके।
- IIIT-H रिसर्च, टीचिंग और छात्रों के परिणामों के बीच संतुलन कैसे बनाता है?
प्रो. शुक्ला: IIIT-H की संरचना पारंपरिक विभागों की बजाय रिसर्च लैब्स के इर्द-गिर्द की गई है। यहां फैकल्टी अपनी एक्टिव रिसर्च को सीधे पढ़ाई से जोड़ती है और छात्र दूसरे वर्ष से ही रिसर्च या ट्रांसलेशनल सेंटर्स से जुड़ जाते हैं।
इस शुरुआती एक्सपोजर की वजह से मजबूत रिसर्च आउटपुट, इनोवेशन, बौद्धिक संपदा (IP) का निर्माण और वैश्विक स्तर पर अकादमिक प्रतिस्पर्धा संभव हो पाती है।
- तेजी से बदलते तकनीकी दौर में छात्रों को किन कौशलों की जरूरत है?
प्रो. शुक्ला: तकनीकी कौशल एक सीमित समय तक ही प्रासंगिक रहते हैं। सबसे अहम स्किल है—लगातार सीखने, खुद को ढालने और बदलने की क्षमता। लचीलापन, संवाद कौशल, टीमवर्क और बदलाव के साथ बिना घबराए काम करने की क्षमता ही भविष्य में सफलता की असली कुंजी हैं।
- आज इंजीनियरिंग शिक्षा में उद्योग साझेदारी कितनी अहम है?
प्रो. शुक्ला: इंडस्ट्री के साथ जुड़ाव बेहद जरूरी है। इससे पाठ्यक्रम प्रासंगिक बनते हैं, रिसर्च वास्तविक समस्याओं पर केंद्रित होती है और इनोवेशन का व्यावहारिक असर दिखता है। मजबूत उद्योग साझेदारी संस्थानों को न सिर्फ आज की नौकरियों के लिए छात्रों को तैयार करने में मदद करती है, बल्कि उन्हें आने वाली चुनौतियों के लिए भी सक्षम बनाती है।
ख्यात पत्रकार व मीडिया शिक्षक डॉ. मुकेश कुमार से ख़ास बातचीत
डॉ. मुकेश कुमार भारतीय मीडिया जगत की एक प्रतिष्ठित हस्ती हैं। लगभग चार दशक के करियर में उन्होंने अख़बार, टीवी और डिजिटल मीडिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। एंकर, स्तंभकार, लेखक, कवि, शिक्षाविद और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ—हर भूमिका में उनका काम उल्लेखनीय रहा है।
वर्तमान में वे Satyahindi.com के एडिटर हैं, जिसके यूट्यूब चैनल के 32 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं। उनका दैनिक शो और ‘ताना-बाना’ व ‘सच का सामना’ जैसे कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हैं। इससे पहले वे लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, एसजीटी यूनिवर्सिटी और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों में डीन और प्रोफेसर रहे।
उन्होंने भारतीय न्यूज़ इंडस्ट्री में बड़ा योगदान दिया है और न्यूज़ एक्सप्रेस, सहारा समय, S1, VOI और मौर्या टीवी जैसे छह बड़े चैनलों के लॉन्च में अहम भूमिका निभाई। दूरदर्शन पर सुबह-सवेरे, फ़िलहाल, कही अनकही, आपकी बैठक के अलावा अन्य चैनलों पर ‘राजनीति–खेल सत्ता का’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘बात बोलेगी’ जैसे कार्यक्रमों की एंकरिंग ने उन्हें खास पहचान दिलाई। वे दूरदर्शन की पहली राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका ‘परख’ के एडिटोरियल चीफ भी रहे।
लेखन और रचना के क्षेत्र में भी उनकी 14 प्रकाशित पुस्तकें और कई डॉक्यूमेंट्री-टेलीफिल्में शामिल हैं। उनका कविता संग्रह ‘साधो जग बौराना’ को व्यापक सराहना मिली है।
मीडिया, साहित्य और शिक्षा में उनका अनुभव नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है। मीडिया के बदलते परिदृश्य और पत्रकारिता की चुनौतियों पर एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' से हुई उनकी बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं:
आपने पत्रकारिता का सफर कैसे शुरू किया? शुरुआती चुनौतियाँ क्या रहीं?
- विज्ञान में मास्टर डिग्री लेने के बाद सवाल उठा कि अब क्या.....एक स्थानीय अख़बार 'दैनिक समय' को प्रशिक्षु पत्रकारों की ज़रूरत थी। लेखन का सिलसिला बहुत पहले शुरू हो चुका था और पत्र-पत्रिकाओं से वास्ता बना हुआ था, लिहाज़ा ये एक तरह से अपनी रुचि का विस्तार था। तीन महीने ही हुए थे कि मेरे एक शिक्षक ने कहा कि पत्रकारिता का कोर्स कर लो और मैं सागर यूनिवर्सिटी पहुँच गया कोर्स करने। वहीं देशबंधु अख़बार समूह से अंशकालिक संवाददाता बनने का ऑफर आया और मैं पढ़ाई के साथ-साथ रिपोर्टिंग भी करने लगा। बस यही शुरुआत थी।
लगभग चार दशक के मीडिया करियर में आपको कौन-से महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले?
- बदलाव तो ढेरों हुए हैं और बहुत बड़े हुए हैं। उन पर एक नहीं कई क़िताबें लिखी जा सकती हैं। लेकिन अगर मोटे तौर पर आप कहें तो पहला बदलाव तो ये हुआ कि मीडिया का पूरा चरित्र ही बदल गया। पहले सरोकारी पत्रकारिता का बोलबाला था। सरोकार विहीन पत्रकार को पत्रकार ही नहीं माना जाता था, मगर अब सरोकार बहुत बुरा शब्द हो गया है। प्रबंधक या मीडिया संस्थान इस शब्द से ही चिढ़ते हैं। वे ऐसे पत्रकार चाहते हैं जो उनके धंधे के विस्तार में मदद करें। वे बाज़ारोन्मुखी हो गए हैं, मार्केट फ्रैंडली हो गए हैं। वे अपने टारगेट ग्रुप के लिए कंटेंट बनाते हैं।
इसी के साथ-साथ वे सत्ता के साँचे में पूरी तरह से ढल गए हैं। उन्हें ख़बरों, पत्रकारिता, मीडिया की स्वतंत्रता, समाज, लोकतंत्र वगैरह से कुछ भी लेना देना नहीं है। वे सत्ता के हर नाजायज़ काम को जायज़ ठहराने के लिए तैयार बैठे हैं। इसके पीछे उनकी स्वेच्छा भी है और डर भी। मगर स्थितियाँ विकट हैं। अच्छी पत्रकारिता के लिए जगह बहुत कम बची है।
दूसरा, बड़ा परिवर्तन तकनीक के स्तर पर आया है। हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तो चंद अख़बार थे और एकमात्र टीवी चैनल दूरदर्शन। लेकिन इस समय देश में क़रीब नौ सौ चैनल हैं और उनमें से साढ़े तीन सौ के आसपास न्यूज़ चैनल। इंटरनेट के आगमन ने मीडिया का और विस्तार किया है। मोबाइल के ज़रिए वह हर समय आपके साथ है। लोग पहले के मुक़ाबले कई गुना ज़्यादा मीडिया कंज्यूम कर रहे हैं।
लेकिन अगर मीडिया की गुणवत्ता की बात करेंगे, पत्रकारिता की बात करेंगे तो वह बहुत नीचे गिर गया है। इतना नीचे कि पत्रकारिता की आचरण संहिता की धज्जियाँ उड़ा रहा है।
टीवी और डिजिटल मीडिया—दोनों में आपने मजबूत भूमिका निभाई। आपके अनुसार दोनों का सबसे बड़ा अंतर क्या है?
- टीवी आपके साथ नहीं जा सकता, मगर डिजिटल मीडिया मोबाइल के ज़रिए आपके साथ हर जगह मौजूद है। यानी आप हर समय कनेक्टेड हैं। आप किसी भी समय कुछ भी देख सकते हैं। हालाँकि टीवी भी अब मोबाइल के ज़रिए आप तक पहुँच रहा है, उसका कंटेंट तो पहुँच ही रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि विजुअल या वीडियो हमारी दुनिया पर छा गए हैं। हम पढ़ने से ज़्यादा देखने लगे हैं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बढ़ते व्यवसायीकरण का पत्रकारिता की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ा है?
- इसका ज़िक्र मैंने पहले सवाल के जवाब में किया है। आर्थिक उदारीकरण के बाद से बाज़ार का अंधाधुंध विस्तार हुआ है और उसका सीधा हमला मीडिया कंटेंट पर पड़ा है। वह सतही और सनसनीखेज़ हुआ है। बाज़ारीकरण की वज़ह से संपादक नामक संस्था ख़त्म हो गई है और उसकी जगह प्रबंधन ने ले ली है। वही सब कुछ कंट्रोल कर रहा है। फिर मीडिया का कार्पोरेटाइजेशन भी हुआ है, जिससे बड़ी पूँजी ने मीडिया का कंट्रोल अपने हाथों में ले लिया है। कार्पोरेट की सत्ता के साथ मिलीभगत है और दोनों मिलकर मीडिया का इस्तेमाल अपने स्वार्थों के लिए कर रहे हैं। इसीलिए हम पाते हैं कि मीडिया लोकतंत्र-विरोधी और जन-विरोधी हो चुका है। वह नफ़रत, हिंसा और तमाम तरह के विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।
जनता के मुद्दे और TRP—आपकी नज़र में पत्रकारों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
- अगर मुख्यधारा में पत्रकारों की बात करेंगे तो उनके हाथों में कुछ रह नहीं गया है। उन्हें तो वही करना होगा जो सत्ता और उनका मालिक चाहेगा। उसमें थोड़ी-बहुत गुंज़ाइश निकाली जा सकती है, मगर इतनी नहीं कि कार्पोरेट लूट और सत्ता की धांधलियों के ख़िलाफ़ कुछ कहा जा सके। हाँ, वैकल्पिक मीडिया ने नई खिड़कियाँ खोली हैं, जहाँ पत्रकार खुलकर बोल भी रहे हैं और नए-नए प्रयोग भी कर रहे हैं। तो प्राथमिकता पत्रकारों को तय करना है कि वे क्या करना चाहते हैं। अगर मुख्यधारा के मीडिया में रहेंगे तो टीआरपी के हिसाब से ही चलना होगा।
आज का हिंदी न्यूज मीडिया कितनी हद तक स्वतंत्र और निष्पक्ष है?
- इसका जवाब मैं पहले के सवालों में दे चुका हूँ।
सरकार और मीडिया के संबंधों को लेकर आपकी क्या राय है? क्या दबाव पत्रकारिता को प्रभावित कर रहे हैं?
- सरकार और मीडिया अब अलग नहीं रह गए हैं। मीडिया अब सत्ता के प्रोपेगंडा का टूल भर रह गया है। उसका कंटेंट पूरी तरह से सत्ता-पक्ष की ओर झुका हुआ है। जब मैं सत्ता-पक्ष कहता हूँ तो उसका मतलब शासक वर्ग से है और उसमें सरकार, कार्पोरेट, उच्च वर्ग और उच्च वर्ण सब शामिल हैं।
एक एडिटर की भूमिका आज पहले के मुकाबले कैसे बदली है?
- गोदी मीडिया में संपादक नहीं हैं, मैनेजर हैं। वे चैनल को सत्ता और अपने मालिकों के फ़ायदे के लिए मैनेज कर रहे हैं बस। इसलिए उनकी भूमिका आप समझ सकते हैं। स्वतंत्र मीडिया में ज़रूर उनकी भूमिका है और वह बेहद सार्थक भी है।
आज की पत्रकारिता पर पक्षपात के जो आरोप लगते हैं, आप उन्हें कैसे देखते हैं?
- पूरी तरह से सही हैं और ये बात तो अब पूरा देश, पूरी दुनिया जानती है। कोई बच्चा भी बता देगा कि मीडिया क्या कर रहा है। उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है। वह केवल मनोरंजन के लिए देखा जाता है और जनमत निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
सोशल मीडिया के दौर में फेक न्यूज की बाढ़ ने मीडिया की विश्वसनीयता को कितना नुकसान पहुँचाया है?
- बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुँचाया है और डीप फेक की वज़ह से ये नुक़सान बढ़ता जा रहा है। कई बार तो लोगों को समझ में ही नहीं आता कि ख़बर सही है या झूठ। हमारे देश में मीडिया लिट्रेसी ज़ीरो है। लोगों को पता ही नहीं है कि वे कैसे किसी ख़बर को जाँचें-परखें, मीडिया कंटेंट का कैसे इस्तेमाल करें। ऐसे में ख़तरे और भी बढ़ जाते हैं।
फेक न्यूज़ और प्रोपेगेंडा के समय में विश्वसनीय कंटेन्ट कैसे बनाया जा सकता है?
- लोग बना रहे हैं। पत्रकारिता के बुनियादी सिद्दांतों को पालन करके बनाया जा सकता है। तथ्यों की अच्छे से पड़ताल करके, विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी जुटा के ये काम किया जा सकता है। ये इतना मुश्किल भी नहीं है, लेकिन सवाल उठता है कि आप में उतना धैर्य और कमिटमेंट है या नहीं।
लोकतंत्र की मजबूती में मीडिया की आज क्या भूमिका होनी चाहिए?
- लोकंतंत्र में मीडिया को चौथा खंभा माना जाता है, मगर जो हालत बाक़ी तीनों खंभों की हुई है वही उसकी भी। इसलिए वह अपनी भूमिका नहीं निभा रहा है। होना तो ये चाहिए कि वह सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए उससे मुश्किल सवाल पूछे, मगर सब उसके क़दमों में बिछ रहे हैं।
मीडिया जनता और सत्ता के बीच संतुलन कैसे बनाए रख सकता है?
- संतुलन के फेरे में नहीं पड़ना चाहिए। ऑब्जेक्टिव पत्रकारिता, जन-सापेक्ष पत्रकारिता, ग़रीबों, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों के मुद्दों की पत्रकारिता करते जाइए, संतुलन की परवाह मत कीजिए।
यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आपका शो बेहद चर्चित है। दर्शकों की यह लोकप्रियता आपको किस तरह प्रेरित करती है?
- मेरा हमेशा से ये ध्येय रहा है कि अच्छी सामग्री को रोचक ढंग से पेश करूँ। इसमें कभी सफलता मिलती है, कभी नहीं, मगर मैं अपनी राह पर चलता रहता हूँ। परवाह नहीं करता कि टीआरपी नहीं आई या व्यूज़ नहीं आए। अपने काम पर फोकस करके लगे रहो यही मेरा मूल मंत्र है।
जैसे-जैसे भारत का प्रीस्कूल सेक्टर तेज़ी से एक हाई-रिटर्न फ्रेंचाइज़ी बाज़ार में बदलता जा रहा है, वैसे-वैसे शिक्षा, व्यापार और ट्रस्ट कानून के बीच की सीमाओं को लेकर कानूनी विशेषज्ञों की चिंताएं भी बढ़ रही हैं। जिला जज कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता अभिषेक चौधरी ने एडइनबॉक्स (EdInbox) से बातचीत में बताया कि किस तरह प्रारंभिक शिक्षा चुपचाप भारत के सबसे मुनाफ़े वाले बिज़नेस मॉडल्स में शामिल हो गई है और क्यों यह पूरा सेक्टर एक कानूनी “ग्रे ज़ोन” की ओर बढ़ रहा है।
सवाल: आज प्रीस्कूल्स को फ्रेंचाइज़ी बिज़नेस की तरह क्यों बेचा जा रहा है? क्या बदला है?
अभिषेक चौधरी: यह बदलाव तब शुरू हुआ जब बड़ी चेन कंपनियों ने समझा कि प्रीस्कूल शिक्षा राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट के दायरे में नहीं आती। के–12 स्कूलों के विपरीत, प्रीस्कूल्स के लिए गैर-लाभकारी संस्था होना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। इसी वजह से आक्रामक फ्रेंचाइज़िंग का रास्ता खुल गया।
आज निवेशकों को साफ संदेश दिया जाता है—₹8–10 लाख निवेश करें और सालाना ₹40 लाख तक कमाएं। यह मॉडल शिक्षकों से ज़्यादा निवेशकों को आकर्षित करता है।
रंग-बिरंगे क्लासरूम्स के पीछे एक पूरा कमर्शियल इकोसिस्टम काम करता है—ब्रांडिंग फीस, रॉयल्टी, ट्रेनिंग चार्ज, करिकुलम किट, यहां तक कि यूनिफॉर्म की अनिवार्य खरीद। असल में पढ़ाने की पद्धति (पेडागॉजी) कुल लागत का बहुत छोटा हिस्सा होती है।
सवाल: कई प्रीस्कूल चेन ट्रस्ट या सोसाइटी के तहत चलते हैं। क्या यह विरोधाभास नहीं है?
अभिषेक चौधरी: यहीं असली कानूनी तनाव पैदा होता है। ट्रस्ट सीधे तौर पर “मुनाफ़ा” घोषित नहीं कर सकता, लेकिन वह सरप्लस बना सकता है। इस सरप्लस को कंसल्टेंसी फीस, मैनेजमेंट चार्ज, करिकुलम डेवलपमेंट, किराया या आउटसोर्स सेवाओं के ज़रिये बाहर निकाला जा सकता है।
अक्सर ट्रस्ट और ये सेवाएं देने वाली प्राइवेट कंपनियां एक ही प्रमोटर द्वारा संचालित होती हैं। पैसा कानूनी रूप से ट्रांसफर होता है, लेकिन चैरिटेबल गतिविधि की मूल भावना कमजोर पड़ जाती है।
जैसा कि मैं अक्सर कहता हूं—“यह तकनीकी रूप से अवैध नहीं है, लेकिन जब कोई ट्रस्ट कॉरपोरेट चेन की तरह काम करने लगे, तो कानून की भावना पर चोट लगती है।”
सवाल: फ्रेंचाइज़ी लेने वाले लोग क्या वाकई हाई रिटर्न के वादों से गुमराह होते हैं?
अभिषेक चौधरी: यह बहुत आम है। लोग इसे गारंटीड रिटर्न वाला बिज़नेस समझकर जुड़ते हैं। बाद में रॉयल्टी, अनिवार्य अपग्रेड्स और मार्केटिंग फीस का बोझ सामने आता है। कई फ्रेंचाइज़ी ओनर्स कहते हैं कि चेन कंपनी उनकी तुलना में ज़्यादा कमाती है।
आज प्रीस्कूल की सफलता काफी हद तक लोकेशन पर निर्भर है। लोअर या मिडिल-इनकम इलाकों में यह मॉडल अक्सर फेल हो जाता है। प्रीस्कूल अब शिक्षा की ज़रूरत नहीं, बल्कि एक लग्ज़री प्रोडक्ट बनता जा रहा है।
सवाल: इसका असर अभिभावकों पर कैसे पड़ रहा है?
अभिषेक चौधरी: आज माता-पिता प्रीस्कूल में एडमिशन को प्रीमियम कंज़्यूमर ब्रांड की तरह देखने लगे हैं। फीस कई बार प्राइमरी स्कूलों के बराबर होती है, लेकिन टीचर्स की सैलरी या करिकुलम की गुणवत्ता पर पारदर्शिता नहीं होती।
कई अभिभावक कहते हैं—“यह ट्रस्ट द्वारा चलाया गया स्कूल कम और कॉरपोरेट प्राइसिंग ज़्यादा लगता है।”
यह गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि प्रारंभिक शिक्षा बच्चों की नींव होती है। अगर यह केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित हो गई, तो असमानता सबसे शुरुआती स्तर से ही बढ़ने लगेगी।
सवाल: इस स्थिति में किस तरह के रेगुलेटरी बदलाव ज़रूरी हैं?
अभिषेक चौधरी: भारत को तुरंत इन सुधारों की ज़रूरत है—
- प्रीस्कूल्स के लिए स्पष्ट लाइसेंसिंग मानक
- फ्रेंचाइज़ी चलाने वाले ट्रस्ट्स के लिए पारदर्शिता नियम
- फीस स्ट्रक्चर और अनिवार्य खरीद की निगरानी
- शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता और वेतन मानक
- प्रारंभिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा
फिलहाल प्रीस्कूल एक रेगुलेटरी वैक्यूम में काम कर रहे हैं, और इसी खाली जगह में व्यावसायिक हित फल-फूल रहे हैं।
सवाल: क्या हम अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं?
अभिषेक चौधरी: बिल्कुल। अगर निगरानी नहीं हुई, तो यह सिस्टम पूरी तरह प्रॉफिट-फर्स्ट मॉडल की ओर चला जाएगा—जहां बच्चे, जो समाज का सबसे संवेदनशील वर्ग हैं, फ्रेंचाइज़ी इकॉनमी के ग्राहक बनकर रह जाएंगे।
प्रारंभिक शिक्षा को निवेश उत्पाद नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक हित के रूप में देखा जाना चाहिए।
राष्ट्रीय विज्ञान संचार और नीति संस्थान (CSIR) से संबद्ध ख्यात वैज्ञानिक, लेखक और विज्ञान संचारक डॉ. मनीष मोहन गोरे से ख़ास बातचीत
भारत में विज्ञान संचार और लोकोपयोगी विज्ञान की मुहीम में विगत करीब तीन दशकों से काम कर रहे डॉ. मनीष मोहन गोरे से बातचीत एक सुखद अनुभव रहा। वे एक वैज्ञानिक, लेखक और प्रभावशाली विज्ञान संचारक हैं। नई दिल्ली स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद - राष्ट्रीय विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR) में वे विज्ञान संचार प्रभाग में अध्ययन और शोध का नेतृत्व कर रहे हैं। वनस्पति विज्ञान में डॉक्टरेट होने के बावजूद उन्होंने विज्ञान लेखन, संपादन और लोकप्रियकरण को अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बनाया। पर्यावरण, वैज्ञानिकों की जीवनी, जन्तु व्यवहार, भारतीय विज्ञान, जैव विविधता और विज्ञान कथाओं पर उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें पाठकों और विशेषज्ञों ने समान रूप से सराहा है। विज्ञान संचार में योगदान के लिए उन्हें सर सीवी रमण तकनीकी लेखन पुरस्कार, राजभाषा गौरव पुरस्कार और जगपति चतुर्वेदी बाल विज्ञान लेखन सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
इन्हीं अनुभवों और उनके विचारों को समझने के लिए एडइनबॉक्स (EdInbox) की तरफ से रईस अहमद 'लाली' ने सीएसआईआर-निस्पर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं 'विज्ञान प्रगति' पत्रिका के संपादक डॉ. मनीष मोहन गोरे से यह विशेष बातचीत की।
- विज्ञान संचार के क्षेत्र में आपका सफर कैसे शुरू हुआ? आपको इस दिशा में काम करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
- मैं मूलतः विज्ञान का विद्यार्थी रहा, और मेरे बचपन के दिनों में किताबों से लदे घर और पिता के साहित्य प्रेम ने मुझमें साहित्य (जो बाद में विज्ञान साहित्य की ओर उन्मुख हो गया), संचार और लेखन की ओर काम करने के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर 1997 में जब मैं बी.एस-सी. का छात्र था तो मैं कुछ अनुभवी विज्ञान लेखकों के संपर्क में आया। उसी समय मैं राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (एनसीएसटीसी) के संपर्क में आया जिसने मेरे भीतर पनप रहे एक विज्ञान संचारक और विज्ञान लेखक को उचित दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। मेरे पिता श्रीचंद गोरे जो अंग्रेजी साहित्य के शिक्षक और शौकिया तौर पर पत्रकार रहे, उन्होंने परोक्ष रूप से मेरे भीतर मौजूद एक लेखक को उकसाया। हालांकि वे नहीं चाहते थे कि मैं साहित्य सृजन या लेखन को अपना करियर बनाऊं क्योंकि इस पेशे में जीवनयापन कठिन होता है, ऐसा वे मानते थे। मैं भी एक तरह से देखें तो विज्ञान संचार-लेखन शौकिया तौर पर करता रहा, यह अलग बात है कि विज्ञान संचार के संस्थान में मुझे सेवा करने का अवसर मिला है जिसके कारण मेरी स्वाभाविक रुचि और सेवा दायित्व में काफी एकरूपता का योग बन जाता है और इससे निष्कर्ष बड़े सुन्दर और सकारात्मक आते हैं।
- वनस्पति विज्ञान से विज्ञान लेखन और विज्ञान संचार की ओर आपके झुकाव का कौन-सा मोड़ सबसे महत्वपूर्ण रहा?
- वनस्पति विज्ञान मेरे अध्ययन का विषय रहा है। विभिन प्रकार के पौधे, उनके भीतर होने वाली जैविक क्रियाएं और उनके पीछे निहित विज्ञान मुझे अक्सर रोमांचित करता रहा। पौधों के विज्ञान को आमजन की भाषाशैली में बताने से मेरे विज्ञान लेखन की शुरुआत 1994 से हुई। इसके अलावा मैंने जंतु विज्ञान, जंतुओं के व्यवहार, पर्यावरण के नवीनतम मुद्दों, भारत में विज्ञान और भारतीय वैज्ञानिकों के संबंध में मैं विज्ञान लेखन करता रहा हूँ। अपने लेखन के आरम्भ में जब मेरे मन में यह विचार आया कि बच्चों और किशोरों को विज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में उन्मुख करने के लिए विज्ञान लेखन बेहद कारगर युक्ति हो सकती है और फिर उस दिशा में मैं पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लिखने लगा। यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव था मेरे जीवन का या इसे वह मोड़ भी कह सकते हैं जिसने मुझे विज्ञान संचार और लेखन में काम करने की ओर प्रेरित किया।
- CSIR-NIScPR के विज्ञान संचार प्रभाग में आप किस तरह के अनुसंधान और प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर रहे हैं?
- सीएसआईआर-निस्पर भारत का एक अग्रणी विज्ञान संचार और विज्ञान नीति अनुसन्धान संस्थान है जिसके पास लगभग 75 वर्षों की एक समृद्ध विरासत है। यहां पर एक लोकप्रिय विज्ञान विभाग है जहाँ से 'विज्ञान प्रगति', 'साइंस रिपोर्टर' और 'साइंस की दुनिया' नामक तीन लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाएं क्रमशः हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं में प्रकाशित की जाती हैं। मैं 'विज्ञान प्रगति' के संपादक के दायित्व के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में विज्ञान संचार से संबद्ध अनुसन्धान और भारतीय प्रयोगशालाओं की वैज्ञानिक उपलब्धियों से जुड़ी परियोजना पर कार्य कर रहा हूँ।
- भारत में विज्ञान संचार को मजबूत बनाने में आपके संस्थान की क्या भूमिका है?
- देश की आजादी के चार वर्ष बाद 1951 में भारत के अग्रणी वैज्ञानिक अनुसन्धान संगठन- सीएसआईआर (वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्) के अंतर्गत प्रकाशन एवं सूचना निदेशालय (पीआईडी) का गठन किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य विज्ञान के शोध को समाज तक ले जाने से संबंधित प्रयत्न करना था। वही पीआईडी, वर्तमान में निस्पर (राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसन्धान संस्थान) है। अब आप समझ सकते हैं कि निस्पर की देश में विज्ञान संचार को सशक्त बनाने में क्या भूमिका रही है। विज्ञान की पत्रिकाओं, शोध जर्नल, लोकविज्ञान पुस्तकों का प्रकाशन इसके अहम योगदान हैं। “भारत की संपदा” पुस्तक श्रृंखला में भारत में मिलने वाली प्राकृतिक संपदाओं (खनिज, जंतु, वनस्पति) का अनमोल खजाना लिपिबद्ध किया गया है। राष्ट्रीय विज्ञान पुस्तकालय भी निस्पर की एक महत्वपूर्ण गतिविधि है जो पूरे देश की पत्रिकाओं-जर्नलों को ISSN क्रमांक प्रदान करती है।
- आप कई वर्षों से विज्ञान लेखन और संपादन से जुड़े हैं—इस दौरान आपने कौन-से बड़े बदलाव महसूस किए?
- विज्ञान संचार से जुड़े निरन्तर प्रयासों के कारण आमजन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के संबंध में रुचि का विकास हुआ है, नहीं तो पहले इन्हें गंभीर और दुरूह विषय मानकर इनसे दूरी बना ली जाती थी। विज्ञान संचार ने बच्चों और युवाओं को वैज्ञानिक शोध से जोड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप आज हजारों युवा विज्ञान और तकनीक के नवीनतम क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिकल्पना लेकर आगे आ रहे हैं। साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले लोग विज्ञान संचार और लेखन से प्रेरित होकर जीवनोपयोगी स्टार्टअप और उद्यमिता, कृषि के क्षेत्रों में नवाचार कर रहे हैं। ये कुछ बड़े बदलाव विज्ञान संचार से आये हैं जो कि सुखद और जीवन की समस्याओं को सुलझाने में मददगार साबित हो रहे हैं।
- आम पाठकों के लिए विज्ञान को सरल और रोचक बनाने की सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?
- उन्हें विज्ञान की संकल्पना या सिद्धांत को समझा पाना। यहीं पर विज्ञान संचार की भूमिका सामने आती है। यह एक कठिन कार्य है, और मेरा मानना है कि विज्ञान संचार या लेखन वैज्ञानिक अनुसन्धान से भी जटिल कार्य है। वो इसलिए क्योंकि वैज्ञानिक अनुसन्धान की एक परिभाषित परिपाटी या फ्रेमवर्क होता है, लेकिन विज्ञान संचार का ऐसा कोई सुपरिभाषित फ्रेमवर्क नहीं होता। आपको एक जनजाति, किसान या एक ऐसे बच्चे को विज्ञान की अवधारणा समझानी होती है जिसने विज्ञान की कोई शिक्षा-दीक्षा नहीं ली है। इसमें सरल भाषा, लक्ष्य समूह के अनुकूल परिवेश-संस्कृति और जीवन के व्यावहारिक प्रसंगों-उदाहरणों के माध्यम से या उनका सहारा लेकर विज्ञान की जानकारी साझा की जाती है। यही इसकी चुनौती है और इसी में इसका समाधान भी छिपा हुआ है।
- भारत में विज्ञान संचार को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए आप किस तरह के कदम आवश्यक मानते हैं?
- भारत पहले से ही विश्व स्तर के विज्ञान संचार कार्यक्रम संचालित करता आ रहा है। अलबत्ता भारत में ऐसे कई अनोखे प्रयोग हुए हैं और हो रहे हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं हुए हैं। जिला, राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तरों पर बच्चों में विज्ञान माडल विकसित करने का प्रयत्न अनोखा है। जनजातीय समुदायों के बीच विज्ञान की समझ विकसित करने का प्रयास दुनिया के लिए एक मिसाल है। ऐसे अनेक प्रयोग हैं जो दुनिया में पहली बार और हमारे देश में हुए हैं।
- पर्यावरणीय चुनौतियों पर समाज में जागरूकता बढ़ाने में विज्ञान संचारक क्या भूमिका निभा सकते हैं?
- अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़ी जानकारी कहानी, कविता, चुटकुलों, नाटक के स्वरूप में प्रस्तुत करके आमजन को जागरूक किया जा सकता है। विज्ञान कथाएं विज्ञान संचार की एक सशक्त विधा है, जिनके द्वारा भी पर्यावरण चेतना जगाने में काम किया जा सकता है।
- आपकी विज्ञान कथाओं को पाठकों में अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है। भारतीय समाज में विज्ञान कथाओं की क्या भूमिका आप देखते हैं?
- विज्ञान कथाएं आने वाले कल की कहानी होती हैं जो विज्ञान और तकनीक से प्रभावित समाज का एक बिम्ब प्रस्तुत करती हैं। यह विधा एक सचेतक आख्यान की तरह होती है जो नाटकीयता के साथ रोमांचक तरीके से आमजन के जीवन के रास्ते चलते हुए एक ऐसे भविष्य तक पाठक को लेकर जाती है जो आश्चर्य, रोमांच और संकट से भरा होता है। विज्ञान कथाएं न केवल भारत बल्कि समग्र विश्व के समाज को तकनीकी उन्नति के साथ एक तार्किक संतुलन बनाये रखने की प्रेरणा देती हैं।
- क्या विज्ञान कथा बच्चों और युवाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है?
- अवश्य। विज्ञान कथाएं एक काल्पनिक मगर अवश्यम्भावी भविष्यगत समाज का चित्र हमारे सामने रखती हैं जो हमें अपने वर्तमान व्यवहार में उचित बदलाव की प्रेरणा देती हैं ताकि हम उस संकटपूर्ण भविष्य को समय रहते टाल सकें जिसका पूर्वानुमान विज्ञान कथा में बतलाया जाता है। इस मायने में बच्चों और युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में विज्ञान कथाएं एक प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।
- आपको क्या लगता है कि डिजिटल मीडिया के दौर में विज्ञान संचार के लिए कौन-सी नई क्षमताएँ जरूरी हो गई हैं?
- डिजिटल और सोशल मीडिया केवल माध्यम हैं कला, साहित्य, विज्ञान, खेल और मनोरंजन की सामग्रियों को समाज तक पहुंचाने के लिए। इन नए संचार माध्यमों के अनुरूप विज्ञान संचार को प्रामाणिक सामग्री के साथ समाज के मुखातिब होना पड़ेगा और इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं।
- क्या आपको लगता है कि आज भी विज्ञान और समाज के बीच एक दूरी मौजूद है?
- विज्ञान और समाज के बीच आज भी दूरी तो है लेकिन पहले के मुकाबले यह दूरी कम हुई है। आने वाले समय में जैसे-जैसे आमजन की वैज्ञानिक समझ बढ़ेगी, यह दूरी सिमटती जाएगी और इसमें विज्ञान संचार को अहम भूमिका निभानी पड़ेगी।
- युवा विज्ञान लेखकों और शोधार्थियों के लिए आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
- युवा विज्ञान लेखकों को सलाह नहीं बल्कि एक बहुत साधारण बात कहना चाहूँगा कि उन्हें ऐसे मुद्दों पर विज्ञान लेखन करना चाहिए जिनसे आमजन का जीवन जुड़ा हुआ हो जैसे कि खेती के दौरान देर तलक बैठकर या झुककर काम करने से किसानों की पीठ, हाथ और पैरों में दर्द होने लगता है, तो इस कठिनाई को दूर करने के लिए कौन से उपकरण या टूल उपयोगी हो सकते हैं, ऐसे विषयों पर लिखने की आवश्यकता है। शोधार्थियों से मैं कहना चाहूँगा कि वे जिस विषय में भी शोध कर रहे हैं, वो अपने शोध से समाज का क्या भला कर सकते हैं या उनके शोध का सामाजिक लाभ क्या है, उस विषय पर छोटे लेख, वीडियो, रील, कविता या कहानी बनाकर आमजन के साथ साझा करें। आप यकीन मानिए इस तरह के छोटे प्रयासों से समाज को फायदा तो होगा ही, आपको एक ऐसी आत्मसंतुष्टि होगी जिसका अनुभव आपने पहले कभी नहीं किया होगा।
भारत में विश्वविद्यालयों का दायरा जिस तेज गति से फैल रहा है, उस रफ़्तार से स्थायी और अर्थपूर्ण नौकरियों के अवसर नहीं बढ़ पा रहे हैं। हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर निकलते हैं, उम्मीदें भी बड़ी होती हैं, लेकिन रोजगार तक पहुंचने का रास्ता उतना आसान नहीं होता। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023–24 में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में बेरोज़गारी दर 10.2% रही। यह साफ संकेत है कि शिक्षा से रोजगार तक का सफर आज भी देश के बड़े युवा वर्ग के लिए अनिश्चित बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर भारत के युवा रोजगार को लेकर किए गए आकलन भी इसी चुनौती और शिक्षा से रोजगार तक के बेहतर रास्ते की जरूरत को रेखांकित करते हैं। ऐसे समय में विश्वविद्यालयों की भूमिका सिर्फ पढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें छात्रों को नौकरी ढूंढने के साथ-साथ नौकरी लायक भी बनाना होगा।
यहीं उद्यमिता (Entrepreneurship) की भूमिका सामने आती है। इसे अब कुछ चुनिंदा छात्रों का शौक या केवल बिज़नेस स्कूल तक सीमित विषय मानकर नहीं टाला जा सकता। उद्यमिता एक ऐसी व्यावहारिक क्षमता है, जिसे हर छात्र—चाहे वह किसी भी विषय का हो—सीख सकता है। असली लक्ष्य सिर्फ फाउंडर तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे ग्रेजुएट बनाना है जो समस्याओं को पहचानें, उनके समाधान विकसित करें, ग्राहकों के साथ परखें, लागत और कीमत समझें, टीम बनाएं और जो काम करे उसे आगे बढ़ाएं। आज की अर्थव्यवस्था में यही सबसे जरूरी कौशल है।
नीति साफ है, जरूरत है ज़मीन पर अमल की
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और शिक्षा मंत्रालय की नेशनल इनोवेशन एंड स्टार्टअप पॉलिसी (2019) दोनों ही उच्च शिक्षा संस्थानों को नवाचार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने का स्पष्ट संदेश देती हैं। स्टार्टअप इनक्यूबेशन सेंटर, उद्योग से साझेदारी, बौद्धिक संपदा की व्यवस्था और स्टार्टअप सपोर्ट को एक सिस्टम के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया है।
लेकिन सिर्फ नीति बना देने से कैंपस संस्कृति नहीं बदलती। इसके लिए ऐसा ऑपरेटिंग मॉडल चाहिए, जिसमें नेतृत्व प्रयास करने की अनुमति दे, पढ़ाने का तरीका “बनाने” को महत्व दे और इंफ्रास्ट्रक्चर शुरुआती जोखिम को कम करे।
उद्यमिता एक विभाग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए
आज भी कई विश्वविद्यालय उद्यमिता को केवल मैनेजमेंट या बिज़नेस स्टडीज़ तक सीमित मानते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लॉ, मीडिया, डिज़ाइन, कृषि, विज्ञान या मानविकी के छात्र खुद को इससे अलग समझते हैं। जबकि भारत में आने वाले समय की उद्यमिता सिर्फ टेक स्टार्टअप तक सीमित नहीं होगी। टिकाऊ व्यवसाय, कृषि आधारित समाधान, किफायती हेल्थकेयर, शिक्षा नवाचार, क्रिएटिव इंडस्ट्री और स्थानीय सेवाओं में बड़े अवसर हैं।
इसका सीधा समाधान है—हर छात्र के लिए उद्यमिता के रास्ते खोलना। इंटरडिसिप्लिनरी एंटरप्रेन्योरशिप माइनर, क्रेडिट-बेस्ड वेंचर प्रोजेक्ट और समस्या-समाधान स्टूडियो जैसे मॉडल इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं। अंतिम वर्ष का वेंचर प्रोजेक्ट, अगर सही मार्गदर्शन और मूल्यांकन के साथ हो, तो वह पारंपरिक प्रोजेक्ट रिपोर्ट से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है।
कक्षा से बाहर शुरू होती है सही सीख
उद्यमिता किताबों से नहीं सीखी जाती। यह अनिश्चितता, फील्ड एक्सपोजर और लगातार कोशिश से आती है। जब छात्र किसी शहर, जिले या समुदाय की वास्तविक समस्या पर काम करते हैं, तो सीखने का अनुभव बदल जाता है। कचरा प्रबंधन, ट्रांसपोर्ट, हेल्थ या शिक्षा जैसे क्षेत्रों में काम करते हुए वे समझते हैं कि तकनीक से ज्यादा जरूरी भरोसा, व्यवहार और संचालन है।
भारत जैसे देश के लिए “एंगेज्ड यूनिवर्सिटी” की अवधारणा खास मायने रखती है, जहां विश्वविद्यालय स्थानीय समुदाय और संस्थाओं के साथ मिलकर सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान विकसित करें। यह सामाजिक जिम्मेदारी के साथ-साथ भविष्य की उद्यमिता की मजबूत जमीन भी तैयार करता है।
इनक्यूबेटर सिर्फ कमरा नहीं, एक सिस्टम है
कई कैंपस इनक्यूबेशन सेंटर का उद्घाटन तो कर देते हैं, लेकिन बाद में वे खाली पड़े रहते हैं। वजह साफ है—इनक्यूबेशन फर्नीचर नहीं, एक पूरी प्रक्रिया है। इसमें प्री-इनक्यूबेशन, मेंटर नेटवर्क, कानूनी और IP सपोर्ट, प्रोटोटाइप सुविधा, सीड फंड, निवेशकों तक पहुंच और स्पष्ट संस्थागत नीतियां शामिल होती हैं।
IIT मद्रास, IIT बॉम्बे और IIM अहमदाबाद जैसे संस्थानों के उदाहरण बताते हैं कि जब इनक्यूबेशन को सिस्टम की तरह चलाया जाता है, तब ही बड़े नतीजे सामने आते हैं। सीख यह नहीं कि हर विश्वविद्यालय IIT या IIM बने, बल्कि यह कि हर विश्वविद्यालय एक भरोसेमंद उद्यमिता प्लेटफॉर्म बन सकता है।
IIC और AIM: पहले से मौजूद राष्ट्रीय ढांचा
हर संस्थान को सब कुछ शून्य से बनाने की जरूरत नहीं है। Institution’s Innovation Council (IIC) और Atal Innovation Mission (AIM) जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम पहले से मौजूद हैं। सही उपयोग होने पर ये कैंपस में नवाचार का मजबूत आधार बन सकते हैं।
नेतृत्व और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का महत्व
अधिकांश छात्र इसलिए झिझकते हैं क्योंकि उद्यमिता उन्हें सामाजिक रूप से जोखिम भरी लगती है। यहां नेतृत्व का संदेश निर्णायक होता है। जब विश्वविद्यालय नेतृत्व असफलता को सीख मानता है और प्रयास को सम्मान देता है, तभी छात्र आगे आते हैं।
प्रेरणा नहीं, कौशल सिखाइए
केवल मोटिवेशनल टॉक्स से कंपनियां नहीं बनतीं। इसके लिए ग्राहक समझ, बाजार विश्लेषण, प्राइसिंग, बिक्री, कानूनी समझ और टीम लीडरशिप जैसे ठोस कौशल चाहिए। माइक्रो-क्रेडेंशियल और हाइब्रिड लर्निंग इस दिशा में प्रभावी हो सकते हैं।
मूल्यांकन बदलेगा तो व्यवहार बदलेगा
जब प्रोटोटाइप, डेमो-डे और पिच को परीक्षा की जगह दी जाती है, तो कक्षा स्टूडियो बन जाती है। भारत जैसे देश में यह बेहद जरूरी है, जहां “समय बर्बाद करने” का डर गहरा होता है।
सस्टेनेबिलिटी: भविष्य की उद्यमिता
ऊर्जा, पानी, कचरा, आजीविका और जलवायु से जुड़े क्षेत्र केवल नीति के मुद्दे नहीं, बल्कि बड़े व्यावसायिक अवसर हैं। जब कैंपस खुद living lab बनते हैं, तब टिकाऊ उद्यमिता व्यवहारिक बनती है।
विश्वविद्यालय बनें समाधान की फैक्ट्री
भारत को हर छात्र से फाउंडर बनने की उम्मीद नहीं है, लेकिन हर ग्रेजुएट का venture-capable होना जरूरी है। नीतियां मौजूद हैं, ढांचे मौजूद हैं। अब जरूरत है संस्कृति और संचालन में बदलाव की।
जब ऐसा होगा, तब विश्वविद्यालय नौकरी का इंतजार करने की जगह समाधान तैयार करने के केंद्र बन जाएंगे। युवा और महत्वाकांक्षी भारत के लिए यही अगला रास्ता है।
(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)
भारत की प्रवेश परीक्षाओं को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचती दिख रही है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित SAT-आधारित प्रवेश मॉडल न केवल NEET, JEE और CUET जैसे प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षाओं को समाप्त करने की दिशा में कदम है, बल्कि यह पूरी शिक्षा व्यवस्था को नए ढांचे में ढालने का प्रयास भी है। यह बदलाव अगर लागू होता है, तो यह भारत की उच्च शिक्षा में बीते कई दशकों का सबसे बड़ा सुधार माना जाएगा।
नई प्रणाली का उद्देश्य स्पष्ट है— तनाव कम करना, कोचिंग कल्चर पर निर्भरता घटाना और स्कूल शिक्षा को केंद्रीय भूमिका देना। यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के अनुरूप है, जो हमेशा से ‘स्कूल-आधारित मूल्यांकन’ और ‘समझ आधारित सीखने’ पर जोर देती रही है।
क्या यह मॉडल छात्रों का बोझ कम करेगा?
कक्षा 11 में दो बार SAT आयोजित करने का सुझाव काफी संतुलित लगता है। छात्रों को अपने प्रदर्शन सुधारने का एक से अधिक मौका मिलेगा, और 12वीं बोर्ड के साथ संयुक्त मूल्यांकन से प्रवेश प्रक्रिया धीरे-धीरे एकीकृत, पारदर्शी और स्कूल-केंद्रित बन सकती है। अभी तक परीक्षा का सारा दबाव केवल 12वीं के बाद पड़ता था। इस नई प्रणाली से तैयारी का भार दो वर्षों में बांटकर मानसिक तनाव काफी कम किया जा सकता है।
कोचिंग कल्चर पर रोक—क्या यह संभव है?
देश में कोचिंग उद्योग एक समानांतर शिक्षा प्रणाली बन चुका है। कोटा, हैदराबाद, दिल्ली और पटना जैसे शहर सालाना लाखों छात्रों को आकर्षित करते हैं। बढ़ते दबाव, आर्थिक बोझ और लगातार सामने आती आत्महत्या की घटनाएं इस मॉडल की कमियाँ उजागर करती रही हैं।
नए प्रवेश ढांचे में कोचिंग समय की सीमा, 16 वर्ष से कम छात्रों के लिए पाबंदी और स्कूल पाठ्यक्रम से जुड़ी परीक्षा जैसे प्रावधान निश्चित तौर पर कोचिंग संस्थानों की पकड़ को कमजोर कर सकते हैं। यह परिवर्तन समाज और अभिभावकों के लिए राहत भरा होगा।
ग्रामीण और वंचित वर्ग के लिए परिवर्तनकारी कदम
सबसे बड़ी चुनौती हमेशा से रही है—समान अवसर। जब कोचिंग महंगी हो और बड़े शहरों तक पहुंच आसान न हो, तब ग्रामीण और गरीब छात्र स्वाभाविक रूप से पिछड़ जाते हैं। नई प्रणाली इस खाई को काफी हद तक भर सकती है।
NCERT आधारित मूल्यांकन, स्कूल में ही तैयारी की सुविधा और परसेंटाइल आधारित निष्पक्ष अलॉटमेंट—ये सभी कदम शिक्षा को अधिक समावेशी बना सकते हैं।
क्या राज्य बोर्डों की समानता संभव है?
यही वह बिंदु है जो सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। भारत में विभिन्न राज्य बोर्डों के पाठ्यक्रम, मूल्यांकन पद्धति और परीक्षा की कठिनाई में बड़ा अंतर है। यदि SAT का सिलेबस NCERT आधारित रहेगा, तो राज्य बोर्डों को अपने ढांचे में बदलाव करना होगा ताकि छात्रों के बीच संतुलन बना रहे। यह सुधार तभी सफल होगा जब राज्यों की भूमिका मजबूत हो और उन्हें पर्याप्त समय दिया जाए।
विशेषज्ञों की राय क्या कहती है?
कई विशेषज्ञ इसे छात्रों का बोझ कम करने वाला मॉडल बताते हैं, पर वे सिलेबस एलाइनमेंट को सबसे अहम चुनौती मानते हैं। वे इसे ग्रामीण छात्रों के लिए बड़ा अवसर बताते हैं और सुझाव देते हैं कि शिक्षक अभी से तैयारी शुरू करें। कुछ शिक्षक इस मॉडल को रट्टा सिस्टम समाप्त करने वाला बताते हैं, लेकिन राज्य बोर्डों की एकरूपता को भी अनिवार्य मानते हैं। उनकी नज़र में यह मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक राहत और शिक्षण गुणवत्ता सुधारने वाला कदम है, मगर वे इसके कार्यान्वयन से पहले पायलट प्रोजेक्ट की आवश्यकता भी जताते हैं। इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि शिक्षकों के बीच आशावाद तो है, लेकिन वे लागू करने की चुनौतियों को लेकर सतर्क भी हैं।
अंततः कह सकते हैं कि नई प्रवेश प्रणाली का मकसद सराहनीय है। यह बच्चों का तनाव कम कर सकती है, स्कूल शिक्षा को नई प्रतिष्ठा दे सकती है और कोचिंग पर निर्भरता घटा सकती है। लेकिन यह भी सच है कि यह बदलाव केवल परीक्षा बदलने तक सीमित नहीं है—यह पूरे शिक्षा ढांचे में व्याप्त सोच, पद्धति और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की मांग करता है। अगर सरकार इसे चरणबद्ध तरीके से, पायलट प्रोजेक्ट के साथ और राज्यों को साझेदार बनाकर लागू करती है, तभी यह सफल मॉडल बन पाएगा।
2027 का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन यह भारत को एक अधिक समान, तनाव-मुक्त और स्कूल-केंद्रित शिक्षा प्रणाली की ओर ले जाने का महत्वपूर्ण अवसर भी है।
आज किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय के कैंपस में कदम रखते ही दो साफ रुझान दिखाई देते हैं। एक तरफ उत्साह है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और डिजिटल टूल्स ने छात्रों को पहले से कहीं ज्यादा सक्षम बना दिया है। वे डिजाइन कर रहे हैं, लिख रहे हैं, ऐप और प्रोटोटाइप बना रहे हैं—वह भी महीनों में नहीं, कई बार हफ्तों में। दूसरी तरफ चिंता भी उतनी ही गहरी है। जॉब मार्केट अनिश्चित है, बिजनेस साइकल भरोसेमंद नहीं रहे और कई भूमिकाएं इतनी तेजी से बदल रही हैं कि सिलेबस अपडेट होने से पहले ही काम का स्वरूप बदल जाता है।
इसी टकराव के बीच उच्च शिक्षा के सामने सबसे अहम सवाल खड़ा होता है—आखिर विश्वविद्यालय छात्रों को किसके लिए तैयार कर रहा है? अगर जवाब सिर्फ “नौकरी” है, तो संस्थान पहले ही पीछे छूट रहा है। लेकिन अगर उद्देश्य यह है कि छात्र अनिश्चित हालात में भी मूल्य निर्माण कर सकें, तो विश्वविद्यालय की भूमिका पूरी तरह बदल जाती है। तब शिक्षा का मकसद सिर्फ डिग्री देना नहीं, बल्कि नवाचार को रोजमर्रा की आदत बनाना होता है—हर विषय में, हर विभाग में और पूरे कैंपस सिस्टम में।
क्या है ‘इनोवेशन यूनिवर्सिटी’ की सोच
इनोवेशन यूनिवर्सिटी किसी नए सेंटर, इमारत या लोगो का नाम नहीं है। यह पूरे कैंपस का ऑपरेटिंग सिस्टम है। इसमें लीडरशिप, संस्कृति, मूल्यांकन, प्रोत्साहन, संसाधन और इंडस्ट्री व समाज से साझेदारी—सब इस तरह जुड़ते हैं कि नए विचार पैदा करना और उन्हें लागू करना सामान्य प्रक्रिया बन जाए।
यहां सवाल सिर्फ स्टार्टअप बनाने का नहीं, बल्कि समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने का है। भारत जैसे देश में नवाचार की जरूरत हमेशा लैब में होने वाली बड़ी खोजों से नहीं आती। अक्सर जरूरत ऐसे समाधानों की होती है जो सस्ते हों, बड़े पैमाने पर काम कर सकें और जमीनी हालात के अनुकूल हों—चाहे वह स्वास्थ्य सेवाएं हों, शिक्षा, जलवायु से जुड़ी चुनौतियां, स्किलिंग, MSME की उत्पादकता या अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाली सरकारी सेवाएं।
‘एंटरप्रेन्योरियल’ से ‘एंगेज्ड’ यूनिवर्सिटी की ओर
दुनिया में विश्वविद्यालयों में नवाचार की चर्चा अक्सर पेटेंट और कमर्शियलाइजेशन तक सीमित रहती है। यह मॉडल उपयोगी है, लेकिन भारत के संदर्भ में इससे आगे जाना जरूरी है। यहां ज्यादा असरदार मॉडल ‘एंगेज्ड यूनिवर्सिटी’ का है—जो आर्थिक विकास में योगदान दे, लेकिन समाज और स्थानीय जरूरतों से जुड़ी रहे।
ऐसे में विश्वविद्यालय एक सुरक्षित मंच बन सकता है, जहां छात्र, फैकल्टी, समुदाय और NGOs मिलकर कम लागत वाले, समावेशी समाधान विकसित करें। जब यह सोच मजबूत होती है, तो विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री बांटने की जगह एक भरोसेमंद विचार-जनक संस्था बन जाता है, जिसका असर कैंपस से बाहर भी दिखता है।
इनोवेशन इवेंट नहीं, सिस्टम है
आज कई कैंपस हैकाथॉन और इनोवेशन फेस्टिवल आयोजित करते हैं। इससे ऊर्जा बनती है, लेकिन अगर सिस्टम नहीं हो, तो यह ऊर्जा जल्दी खत्म हो जाती है। असली बदलाव तब आता है जब इनोवेशन के लिए पूरा ढांचा तैयार किया जाए—जहां अलग-अलग पहल एक-दूसरे को मजबूत करें।
यही सोच ‘10Square मॉडल’ जैसे फ्रेमवर्क को जन्म देती है, जो बताता है कि इनोवेशन कल्चर कुछ गिने-चुने इवेंट्स से नहीं, बल्कि आपस में जुड़े कई लीवरों से बनता है। लक्ष्य यह नहीं कि दस अलग प्रोजेक्ट शुरू कर दिए जाएं, बल्कि यह कि एक ऐसा इकोसिस्टम बने, जहां हर सुधार अगले सुधार को ताकत दे।
लीडरशिप: पहला और सबसे जरूरी टूल
नवाचार सबसे पहले डर में मरता है—असफल होने का डर, जज होने का डर और इस बात का डर कि “इससे ग्रेड नहीं मिलेगा।” सकारात्मक और सहभागी नेतृत्व ही वह माहौल बना सकता है, जहां प्रयोग करना सुरक्षित लगे। जब प्रयासों को सम्मान मिले, सीख को महत्व दिया जाए और असफलता को डेटा माना जाए, तब ही छात्र और फैकल्टी नए विचारों पर काम करने का साहस करते हैं।
यह बदलाव बड़े बजट या नई इमारतों से नहीं, बल्कि सोच बदलने से शुरू होता है। मानक घटाने की नहीं, बल्कि “परफेक्ट जवाब” से “काम करने वाले समाधान” की ओर बढ़ने की जरूरत है।
एडमिशन और ब्रांडिंग में बदलाव जरूरी
इनोवेशन यूनिवर्सिटी सिर्फ अपने प्रोग्राम नहीं बेचती, बल्कि “हल करने लायक समस्याएं” सामने रखती है। प्लेसमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर की चमक के साथ यह दिखाना जरूरी है कि छात्र स्थानीय उद्योग, अस्पताल, स्कूल, नगर निकाय और NGOs के साथ मिलकर किन वास्तविक चुनौतियों पर काम कर रहे हैं।
इसी तरह एडमिशन प्रक्रिया में भी बदलाव जरूरी है। पोर्टफोलियो, प्रोजेक्ट, हैकाथॉन, क्रिएटिव वर्क और समुदाय के साथ किए गए काम को भविष्य की क्षमता का संकेत माना जाना चाहिए। स्कॉलरशिप भी यहां अहम भूमिका निभा सकती है, क्योंकि भारत में उद्यमिता की राह में सबसे बड़ा जोखिम अक्सर वित्तीय होता है।
पाठ्यक्रम और पेडागॉजी: बनाकर सीखने पर जोर
इनोवेशन को वैकल्पिक विषय मानने की सोच अब पुरानी हो चुकी है। इसे हर छात्र के लिए जरूरी ग्रेजुएट एट्रिब्यूट बनाना होगा। हर प्रोग्राम में चरणबद्ध इनोवेशन पाथवे—बुनियादी मेथड्स, विषय आधारित स्टूडियो, लाइव प्रॉब्लम लैब और अंत में कैपस्टोन प्रोजेक्ट—इस दिशा में ठोस कदम हो सकते हैं।
साथ ही पढ़ाने का तरीका भी बदलना होगा। लेक्चर से ज्यादा अनुभव आधारित सीख जरूरी है। जब छात्र वास्तविक, जटिल समस्याओं पर काम करते हैं, उपयोगकर्ताओं से बात करते हैं और बार-बार सुधार करते हैं, तभी नवाचार की समझ विकसित होती है।
मूल्यांकन वही, जो आप मापते हैं
अगर विश्वविद्यालय सिर्फ परीक्षा और याददाश्त को मापेगा, तो वही मिलेगा। इनोवेशन को मुख्यधारा में लाने के लिए मूल्यांकन भी बदलना होगा। प्रोटोटाइप, पिच, पोर्टफोलियो, पब्लिक डेमो और पीयर असेसमेंट जैसे तरीकों से ही रचनात्मकता और समस्या-समाधान की क्षमता को सही मायने में आंका जा सकता है।
नीति और सिस्टम पहले से समर्थन में
इस बदलाव के लिए नई नीति की जरूरत नहीं है। National Innovation and Startup Policy 2019 और Ministry of Education के Institution’s Innovation Councils पहले से ही इनोवेशन और स्टार्टअप कल्चर को बढ़ावा देने की बात करते हैं। यानी जो संस्थान आज कदम उठाते हैं, वे सिस्टम के खिलाफ नहीं, बल्कि उसी दिशा में आगे बढ़ते हैं।
कैंपस को बनाइए ‘लिविंग लैब’
इनोवेशन की शुरुआत घर से होनी चाहिए। कैंपस ऑपरेशन्स—ऊर्जा, पानी, कचरा, ट्रांसपोर्ट, सेवाएं—सब सीखने की प्रयोगशाला बन सकते हैं। जब छात्र अपने ही विश्वविद्यालय में बदलाव होते देखते हैं, तो इनोवेशन दिखावा नहीं, रोजमर्रा का काम बन जाता है।
आज बदलाव स्थायी है और निश्चितता दुर्लभ। ऐसे समय में विश्वविद्यालय या तो प्रतिक्रियात्मक बने रहेंगे, या फिर देश की सबसे भरोसेमंद ‘फ्यूचर फैक्टरी’ बनेंगे। जो संस्थान नवाचार को आदत बना लेंगे, वे सिर्फ बेहतर प्लेसमेंट नहीं देंगे, बल्कि ऐसे नागरिक और पेशेवर तैयार करेंगे जो अनिश्चित हालात में भी समाधान बना सकें, समुदायों को मजबूत कर सकें और अर्थव्यवस्था को ज्यादा लचीला बना सकें। शायद आज शिक्षा की सबसे व्यावहारिक परिभाषा यही है।
(लेखक एडइनबॉक्स में चीफ मेंटर हैं, टेक्नो इंडिया ग्रुप, कोलकाता में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और समूह से जुड़ी कोलकाता स्थित एक विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल एडवाइज़र भी हैं।)
आज छात्र जब कॉलेज में दाख़िले का फॉर्म भरता है, तो उसके मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है—डिग्री ज़रूरी है या कौशल? माता-पिता अब भी ‘अच्छे कॉलेज’ को सुरक्षित भविष्य की गारंटी मानते हैं, जबकि नौकरी का बाजार साफ कह रहा है कि कागज़ से ज्यादा क्षमता मायने रखती है। इसी खिंचाव के बीच 2025 के विदा होने और 2026 के आगमन के साथ भारत का उच्च शिक्षा ढांचा आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखता है, जहाँ विकल्प ज्यादा हैं लेकिन भरोसा उतना मजबूत नहीं। संस्थानों की संख्या बढ़ी है, कोर्सों में विविधता आई है, पर गुणवत्ता, रेगुलेशन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को लेकर सवाल पहले से ज्यादा गहरे हैं।
बढ़ता पैमाना, लेकिन बढ़ती चिंता भी
भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में गिना जाता है, पर पैमाना बढ़ने के साथ यह डर भी बढ़ा है कि क्या गुणवत्ता बराबरी से पहुँच रही है। निजी संस्थानों का दबदबा खासकर कॉलेज स्तर पर मजबूत दिखता है, जबकि विश्वविद्यालयों में अभी भी सरकारी संस्थान प्रमुख हैं। यह मिश्रित मॉडल हर जगह समान परिणाम नहीं दे पा रहा। इसी असमानता ने ‘डिग्री या स्किल्स’ की बहस को और तेज किया है, क्योंकि असली चिंता अब नंबर्स की नहीं बल्कि छात्रों की आर्थिक व वैश्विक मोबिलिटी की है।
अंतरराष्ट्रीयकरण: इरादे तेज, नतीजे धीमे
भारत खुद को ग्लोबल एजुकेशन हब के रूप में स्थापित करना चाहता है, लेकिन आंकड़े कहानी कुछ और बताते हैं। AISHE 2021–22 के अनुसार भारत में विदेशी छात्रों की संख्या करीब 46,878 है, जिसमें अधिकांश पड़ोसी देशों से आते हैं और अंडरग्रेजुएट स्तर पर होते हैं। इसके उलट, NITI Aayog के अनुसार 2024 में 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ रहे थे। यह सिर्फ ‘ब्रेन ड्रेन’ नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा की चुनौती है। जब तक भारत विदेशी छात्रों को मजबूत अकादमिक नतीजे, कैंपस अनुभव, रोजगार अवसर और भरोसेमंद प्रशासन मुहैया नहीं कराता, अंतरराष्ट्रीयकरण कागज़ पर ही प्रभावी दिखेगा।
रेगुलेटरी ढांचे का सबसे बड़ा मोड़: VBSA बिल 2025
2025 में पेश “विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल” ने बड़ा हलचल पैदा किया। यह UGC, AICTE और NCTE की जगह एक नया रेगुलेटर बनाने का प्रस्ताव देता है, जिसे JPC के पास भेजा गया है और फरवरी 2026 तक चर्चा की उम्मीद है। बिल को HECI के पुराने प्रस्ताव का बदला हुआ रूप माना जा रहा है। चिंता यह है कि कहीं यह अतिसंख्य केंद्रीकरण की दिशा में न चला जाए—क्योंकि फंडिंग, नियुक्तियों और नियमों का ज्यादा नियंत्रण केंद्र में केंद्रित हो सकता है।
दूसरी तरफ़ यह तर्क भी है कि वर्षों से टूटे-बिखरे रेगुलेशन को एक छत के नीचे लाना जरूरी है। 2026 में बिल का अंतिम रूप ही तय करेगा कि यह “स्मार्ट रेगुलेशन” बनेगा या “सुपर कंट्रोल” का मॉडल।
कॉन्ट्रैक्ट टीचिंग: लचीलापन या असुरक्षा का नया चेहरा?
2025 में UGC ने शिक्षक भर्ती और प्रमोशन के नए नियम जारी किए, साथ ही कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों पर लगी सीमा हटाने के संकेत दिए। पहले 10% कैप था, लेकिन अब कई संस्थानों में कॉन्ट्रैक्ट फैकल्टी सामान्य होती जा रही है।
समर्थक कहते हैं कि इससे सिस्टम में गति आती है, पर शिक्षकों के लिए यह असुरक्षा, कम वेतन और रिसर्च अवसरों के कमजोर होने की चिंता बढ़ाता है। दस्तावेज़ यह भी दर्शाता है कि UGC अध्यक्ष का पद कुछ समय खाली रहा और उच्च शिक्षा सचिव के पास अतिरिक्त प्रभार रहा—शीर्ष स्तर पर यह अस्थायी व्यवस्था भरोसा कम करती दिखती है।
NAAC विवाद: गुणवत्ता की मुहर ही जब संदिग्ध बने
2025 की शुरुआत में NAAC निरीक्षण समिति से जुड़े रिश्वत मामले ने पूरे सिस्टम को झटका दिया। NAAC को कुछ समय के लिए एक्रिडिटेशन रोकना पड़ा और निरीक्षण नियमों में बदलाव की घोषणा करनी पड़ी। यह घटना सिर्फ एक स्कैंडल नहीं बल्कि उच्च शिक्षा पर भरोसे की जड़ को हिलाने वाली थी।
एक्रिडिटेशन जब खरीदा-बेचा जाने योग्य लगे, तो उसका असर छात्रों के फैसलों से लेकर नियोक्ताओं, साझेदार संस्थानों और रिसर्च फंडिंग तक पर पड़ता है। अब जरूरत प्रक्रिया को पारदर्शी, ट्रेस करने योग्य और संघर्ष-हितों से मुक्त बनाने की है।
केंद्र-राज्य तनाव और विश्वविद्यालयों की रोज़मर्रा की चुनौतियाँ
2025 में कुलपति नियुक्तियों और फंडिंग विवादों ने कई विश्वविद्यालयों की कार्य-प्रणाली को प्रभावित किया। इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ा—परीक्षाएं देर से हुईं, क्लासेस बाधित हुईं और डिग्री समय पर नहीं मिल पाई। उच्च शिक्षा सुधार राष्ट्रीय मसला है, लेकिन जमीनी असर वहीं दिखता है जहाँ छात्र अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित खड़ा होता है।
विदेशी विश्वविद्यालय: बड़े सपने, छोटे बैच
भारत ने कई विदेशी विश्वविद्यालयों को लेटर ऑफ इंटेंट जारी किए, लेकिन GIFT City में खुले दो विदेशी कैंपसों में पहले बैच में सिर्फ 60 छात्रों के दाख़िले हुए—वो भी दो राज्यों से। दूसरी तरफ़, IIM अहमदाबाद का दुबई कैंपस 2025 में 35 छात्रों के साथ शुरू हुआ।
यह साफ संकेत है कि अंतरराष्ट्रीयकरण ‘परमिशन’ से आगे बढ़कर ‘अनुभव’ पर निर्भर करेगा—वीज़ा, सेवाएं, हॉस्टल, सुरक्षा, रोजगार अवसर और नियमों की स्थिरता असली पैमाना बनेंगे।
NEP के पाँच साल: नीतियाँ तेज, क्लासरूम धीमा
NEP 2020 को पाँच साल हो चुके हैं। नीति के स्तर पर डिजिटलाइजेशन, डीरगुलेशन और फ्लेक्सिबिलिटी जैसे कदम आगे बढ़े हैं, लेकिन संसाधनों और स्टाफ की कमी ने कई जगह अकादमिक सुधारों की रफ्तार धीमी कर दी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के FYUP में परीक्षा प्रबंधन की दिक्कतें—जैसे कुछ पेपर समय पर न पहुंचना—दिखाती हैं कि सुधार तभी सफल होंगे जब कोर्स डिजाइन, असेसमेंट और अकादमिक सलाह प्रणाली मजबूत होगी। वरना विकल्प बढ़ेंगे, लेकिन भ्रम भी बढ़ेगा।
कानून और चिकित्सा शिक्षा: प्रोफेशनल काउंसिल्स का मजबूत रुख
भले ही नया सुपर-रेगुलेटर इन क्षेत्रों को अपने दायरे में नहीं लाएगा, लेकिन 2025 में सबसे सख्त हस्तक्षेप इन्हीं प्रोफेशनल काउंसिल्स से आए। Bar Council of India ने नए लॉ स्कूलों और विस्तार पर तीन साल की रोक लगा दी, ताकि कमजोर गुणवत्ता वाले संस्थानों के बढ़ते दबाव को रोका जा सके। Allied health शिक्षा में भी NCAHP ने पाठ्यक्रम और एडमिशन को लेकर कई नए मानक बनाए।
यह बताता है कि भारत एक हाइब्रिड नियामक मॉडल की ओर बढ़ रहा है—जहाँ एक तरफ़ केंद्रीय रेगुलेटर होगा, दूसरी तरफ़ मजबूत प्रोफेशनल काउंसिल्स।
2026 की संभावनाएँ और खतरे: असली दिशा क्या होगी?
2026 के लिए तीन बड़ी संभावनाएँ सामने हैं—पहली, VBSA बिल के जरिए स्पष्ट और संतुलित रेगुलेशन; दूसरी, NAAC प्रकरण के बाद क्रेडिबिलिटी की नई शुरुआत; और तीसरी, अंतरराष्ट्रीयकरण का असली स्केल-अप, बशर्ते छात्र सेवाओं और रोजगार अवसरों को प्राथमिकता दी जाए।
खतरों में सबसे बड़ा दबाव AI और स्किल्स का है, जो अब हायरिंग संकेतों को बदल रहा है। डिग्री के साथ पोर्टफोलियो, प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप और लैब अनुभव अनिवार्य बनेंगे।
दूसरा खतरा कॉन्ट्रैक्टाइजेशन का है, जहाँ लागत बचत के चक्कर में अध्यापन, मेंटरिंग और रिसर्च संस्कृति कमजोर हो सकती है।
तीसरा खतरा ‘रिफॉर्म फटीग’ का है—बहुत सारे बदलाव, पर उतनी तैयारी नहीं, जिसके कारण छोटी प्रशासनिक विफलताएँ छात्रों के भरोसे को नुकसान पहुँचाती हैं।
अंतिम सवाल: 2026 में भारत किस मॉडल को चुनेगा?
2025–26 के मोड़ पर भारत के सामने दो रास्ते हैं—पहला, ‘परमिशन-लेड’ भविष्य, जिसमें नए ढांचे तो बनेंगे लेकिन डिलीवरी कमजोर रहेगी; दूसरा, ‘आउटकम-लेड’ मॉडल, जहाँ भरोसे, शिक्षक करियर, छात्र सेवाओं और वैश्विक स्तर की कैंपस गुणवत्ता पर निवेश होगा।
यदि भारत सच में दुनिया की सबसे प्रभावी उच्च शिक्षा प्रणाली बनना चाहता है, तो 2026 में सुधारों का केंद्र ‘ट्रस्ट’, ‘टीचिंग टैलेंट’ और ‘स्टूडेंट एक्सपीरियंस’ को बनाना होगा। यही वह बदलाव होगा जो सिर्फ नीति नहीं, बल्कि भरोसे की नई नींव तैयार करेगा।
(लेखक एडइनबॉक्स में चीफ मेंटर हैं, टेक्नो इंडिया ग्रुप, कोलकाता में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और समूह से जुड़ी कोलकाता स्थित एक विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल एडवाइज़र भी हैं।)
भारत ने दशकों तक अपनी प्रतिभा को दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजा। लाखों छात्र विदेशों में पढ़ाई के लिए गए और देश के कई बेहतरीन शिक्षक व शोधकर्ता वहीं अपने करियर बना सके। लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी है। दिसंबर 2025 में जारी नीति आयोग की नई रिपोर्ट कहती है कि भारतीय उच्च शिक्षा का अगला चरण केवल छात्रों को बाहर भेजने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें अंतरराष्ट्रीय छात्रों और फैकल्टी को भारत आकर्षित करना, सीमा-पार शोध को बढ़ावा देना और वैश्विक स्तर पर जुड़े कैंपस विकसित करना शामिल होना चाहिए — वह भी भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान को बनाए रखते हुए।
यह रिपोर्ट ‘Internationalisation of Higher Education in India: Prospects, Potential and Policy Recommendations’ (दिसंबर 2025) नीति आयोग के शिक्षा प्रभाग द्वारा आईआईटी मद्रास के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम के सहयोग से तैयार की गई है। यह स्पष्ट रूप से एक शोध और नीति सुझाव दस्तावेज है, न कि बाध्यकारी सरकारी नीति। रिपोर्ट की खास बात यह है कि इसमें “अंतरराष्ट्रीयकरण” को केवल शब्दों तक सीमित न रखकर उसे लागू करने की ठोस योजना दी गई है—5 प्रमुख स्तंभ, 22 नीति सिफारिशें, 76 कार्य मार्ग और 125 प्रदर्शन संकेतक।
अंतरराष्ट्रीयकरण का मतलब सिर्फ विदेशी छात्र नहीं
नीति आयोग के अनुसार, अंतरराष्ट्रीयकरण का अर्थ भारतीय विश्वविद्यालयों के पढ़ाने, शोध करने, साझेदारी और वैश्विक पहचान के पूरे तंत्र को नया रूप देना है। इसमें ‘इंटरनेशनलाइजेशन एट होम’, छात्र और फैकल्टी मोबिलिटी, अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग, विदेशी छात्र कार्यालय, ऑनशोर-ऑफशोर कैंपस, और भारतीय ज्ञान परंपराओं को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करना शामिल है।
रिपोर्ट यह भी मानती है कि चुनौती सिर्फ एडमिशन की नहीं है। वीजा प्रक्रिया, डिग्री की मान्यता, क्रेडिट ट्रांसफर, कैंपस सपोर्ट, सुरक्षा और वह “सॉफ्ट इंफ्रास्ट्रक्चर” भी अहम है, जिससे विदेशी छात्र और शिक्षक भारत में सहज महसूस कर सकें।
लक्ष्य: 2047 तक वैश्विक औसत के करीब
रिपोर्ट ने समयबद्ध लक्ष्य तय किए हैं। 2047 तक भारत में अंतरराष्ट्रीय छात्र मोबिलिटी को 1.0% तक ले जाने का प्रस्ताव है, जिसका मतलब लगभग 8 लाख विदेशी छात्रों का भारत में अध्ययन करना होगा। रिपोर्ट का साफ संदेश है—यदि भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र बनना है, तो विदेशी छात्रों की संख्या बढ़ाना अनिवार्य है और इसके लिए शिक्षा, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और राज्य सरकारों के बीच समन्वय जरूरी होगा।
प्रमुख प्रस्ताव और उनकी भूमिका
रिपोर्ट में कई बड़े प्रस्ताव रखे गए हैं, जैसे—
ग्लोबल हायर एजुकेशन हब्स: देश के अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षा आधारित नवाचार क्लस्टर।
GIFT IFSC एजुकेशन ज़ोन: गिफ्ट सिटी को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित करना।
टैगोर फ्रेमवर्क: ASEAN, BIMSTEC और BRICS देशों के साथ बहुपक्षीय छात्र और फैकल्टी एक्सचेंज।
भारत विद्या कोष: प्रवासी भारतीयों के सहयोग से शोध और नवाचार के लिए कोष।
विश्व बंधु स्कॉलरशिप और फेलोशिप: अंतरराष्ट्रीय छात्रों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करने की पहल।
भारत विद्या मंथन: उच्च शिक्षा और शोध पर वार्षिक वैश्विक सम्मेलन।
स्टडी इन इंडिया (नया रूप): विदेशी छात्रों के लिए एक ही प्लेटफॉर्म पर सभी सुविधाएं।
रणनीति और नियमन पर जोर
रिपोर्ट का पहला स्तंभ अंतरराष्ट्रीयकरण को पूरे सरकारी तंत्र की साझा जिम्मेदारी मानता है। इसमें ग्लोबल हब्स बनाने, विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहन देने और ‘डिजिटल इंडिया’ व ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे मिशनों से जोड़ने की बात है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें गैर-स्टेम विषयों—जैसे प्रबंधन, कानून, संचार और भाषाओं—पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
नियमन के स्तर पर रिपोर्ट वीजा प्रक्रिया सरल करने, विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए नियम आसान करने और भारतीय संस्थानों के साथ साझा कैंपस मॉडल को बढ़ावा देने की सिफारिश करती है। साथ ही, NIRF रैंकिंग में अंतरराष्ट्रीयकरण से जुड़े मानकों को शामिल करने का सुझाव भी है।
क्षेत्रीय मोबिलिटी के लिए ‘टैगोर फ्रेमवर्क’
रिपोर्ट केवल द्विपक्षीय समझौतों तक सीमित नहीं रहना चाहती। यह ‘एरास्मस’ जैसी बहुपक्षीय प्रणाली का प्रस्ताव रखती है, जिसे ‘टैगोर फ्रेमवर्क’ नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य ग्लोबल साउथ के देशों के बीच आसान, मान्यता प्राप्त और व्यवस्थित शैक्षणिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।
वित्त और स्कॉलरशिप
अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए दीर्घकालिक फंडिंग जरूरी मानी गई है। भारत विद्या कोष के तहत 10 अरब डॉलर का कोष बनाने का प्रस्ताव है, जिसमें प्रवासी भारतीयों और सरकार की समान भागीदारी होगी।
इसके अलावा, विश्व बंधु स्कॉलरशिप और फेलोशिप को फुलब्राइट और शेवनिंग जैसी वैश्विक स्कीम्स के बराबर लाने की बात कही गई है।
शिक्षा को कूटनीति के रूप में देखना
रिपोर्ट मानती है कि उच्च शिक्षा भी एक तरह की कूटनीति है। इसलिए अलग-अलग देशों के लिए अलग रणनीति, ‘भारतीय एलुमनाई एंबेसडर नेटवर्क’ और ‘भारत विद्या मंथन’ जैसे मंचों की सिफारिश की गई है। ‘स्टडी इन इंडिया’ को एक सिंगल-विंडो प्लेटफॉर्म बनाने पर भी जोर है।
पाठ्यक्रम, संस्कृति और छात्र अनुभव
नीति आयोग का मानना है कि वैश्विक बनने का मतलब अपनी पहचान खोना नहीं होना चाहिए। पाठ्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ भारतीय ज्ञान परंपराओं को शामिल करने, भाषाई और सांस्कृतिक तैयारी पर ध्यान देने की बात कही गई है।
विदेशी छात्रों के लिए सुरक्षा, आवास, काउंसलिंग और सहयोग को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है, क्योंकि वैश्विक शिक्षा में छात्र अनुभव ही सबसे बड़ा भरोसे का आधार बनता है।
चुनौतियां और निष्कर्ष
रिपोर्ट की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्पष्टता है, लेकिन इसके साथ कुछ जोखिम भी हैं—मंत्रालयों के बीच समन्वय, गुणवत्ता बनाए रखना और विश्वविद्यालयों की कार्यान्वयन क्षमता।
कुल मिलाकर, नीति आयोग इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीयकरण को ‘विकसित भारत 2047’ से जोड़ता है। यदि इसे गंभीरता से लागू किया गया, तो भारत केवल छात्रों को भेजने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक उच्च शिक्षा का मेजबान और साझेदार बन सकता है। हालांकि, NEP 2020 के कार्यान्वयन की रफ्तार को देखते हुए, इन लक्ष्यों की समय-सीमा और प्रभाव को लेकर सवाल भी बने रहेंगे।
(लेखक एडइनबॉक्स में चीफ मेंटर हैं, टेक्नो इंडिया ग्रुप, कोलकाता में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और समूह से जुड़ी कोलकाता स्थित एक विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल एडवाइज़र भी हैं।)
पोस्ट-कोविड दौर में भारतीय विश्वविद्यालयों के सामने अब यह सवाल नहीं है कि तकनीक अपनाई जाए या नहीं। कोविड-19 के दौरान यह बहस पूरी तरह खत्म हो चुकी है, जब देशभर के कैंपस को लगभग रातों-रात डिजिटल होना पड़ा। आज उच्च शिक्षा के सामने कहीं ज्यादा जटिल और अहम सवाल खड़ा है—उस तकनीक का सही तरीके से संचालन (गवर्नेंस) कैसे किया जाए, उसे सिस्टम में कैसे जोड़ा जाए और उसे मानवीय कैसे बनाया जाए, जो अब चुपचाप विश्वविद्यालय के पूरे कामकाज का आधार बन चुकी है।
देश के बड़े महानगरों के प्रतिष्ठित संस्थानों से लेकर टियर-2 और टियर-3 शहरों के विश्वविद्यालयों तक, छात्रों का अनुभव पूरी तरह बदल चुका है। आज कोई फाइनल ईयर का छात्र इंटर्नशिप के लिए आवेदन करते समय न तो फाइलों में फोटोस्टेट इकट्ठा करता है और न ही प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर लगाता है। अब स्मार्टफोन ही फाइल फोल्डर की जगह ले चुका है। ट्रांसक्रिप्ट, डिग्री सर्टिफिकेट और क्रेडिट रिकॉर्ड मिनटों में डिजिटल रूप में मिल जाते हैं—जिन्हें आसानी से वेरिफाई, शेयर और इस्तेमाल किया जा सकता है। जो सुविधा कभी गिने-चुने छात्रों तक सीमित थी, वह अब पोस्ट-पैंडेमिक भारतीय विश्वविद्यालयों की नई सामान्य अपेक्षा बनती जा रही है।
यह दिखने में आसान बदलाव असल में एक कहीं गहरे परिवर्तन का संकेत है। तकनीक अब सिर्फ “एड-टेक” तक सीमित नहीं रही, यानी न केवल ऑनलाइन क्लास या वर्चुअल लेक्चर। यह एक एंड-टू-एंड डिजिटल ढांचा बन चुकी है, जो पढ़ाई और मूल्यांकन, दाखिला और परीक्षाएं, गवर्नेंस और अनुपालन, फाइनेंस और एचआर, रिसर्च मैनेजमेंट, कैंपस सुरक्षा और यहां तक कि एलुमनाई जुड़ाव तक को आकार दे रही है। महामारी ने तकनीक को तेजी से अपनाने की रफ्तार बढ़ाई, लेकिन पोस्ट-कोविड दौर में संस्थानों के सामने असली चुनौती है—बिखरे सिस्टम को एकजुट करना, डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करना, अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच तालमेल बैठाना और ठोस शैक्षणिक व प्रशासनिक परिणाम देना।
आपातकालीन ऑनलाइन क्लास से डिजिटल ढांचे तक
कोविड के दौरान विश्वविद्यालयों ने बेहद तेज़ी से ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की। इससे शिक्षा तो चलती रही, लेकिन साथ ही कई कैंपस में “डिजिटल फैलाव” भी देखने को मिला—अलग-अलग ऐप्स, प्लेटफॉर्म और विभागीय जुगाड़, जिन्हें रणनीति से ज्यादा मजबूरी में अपनाया गया था। अब सवाल यह नहीं है कि तकनीक अपनाई जा सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विश्वविद्यालय सिस्टम को जोड़ सकते हैं, छात्र और संस्थान के डेटा की सुरक्षा कर सकते हैं और तकनीक के जरिए पढ़ाई की गुणवत्ता, रिटेंशन, पारदर्शिता और छात्र अनुभव को बेहतर बना सकते हैं।
भविष्य के लिए तैयार कैंपस अब एक लेयर्ड डिजिटल इकोसिस्टम के रूप में देखे जा रहे हैं। इसकी बुनियाद में मजबूत नेटवर्क और क्लाउड बैकबोन होता है—जो हाई बैंडविड्थ, सुरक्षित और हमेशा सक्रिय रहे। इसके ऊपर अकादमिक कोर होता है, जहां लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS) को स्टूडेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम से जोड़ा जाता है। सबसे ऊपर “स्मार्ट कैंपस” की परिकल्पना है, जहां सेंसर, ऑटोमेशन, डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल क्लासरूम उपयोग, ऊर्जा दक्षता, सुरक्षा अलर्ट और सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है।
बैकबोन, ब्रेन और सेंस
भारत में उच्च शिक्षा का यह बदलाव सिर्फ विश्वविद्यालयों की पहल नहीं है। इसमें राष्ट्रीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी भूमिका है। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC), डिजीलॉकर, नेशनल अकादमिक डिपॉजिटरी (NAD) और SWAYAM जैसे प्लेटफॉर्म विश्वविद्यालयों को इंटरऑपरेबिलिटी, मॉड्यूलर सिस्टम और भरोसेमंद डिजिटल सर्टिफिकेट की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।
नीति का संदेश साफ है—क्रेडिट की आसान ट्रांसफर व्यवस्था, डिजिटल डिग्री पर भरोसा और बड़े पैमाने पर ब्लेंडेड लर्निंग। छोटे या संसाधन-सीमित विश्वविद्यालयों के छात्रों के लिए इसका मतलब है कि वे उभरते क्षेत्रों में बेहतर क्वालिटी के कोर्स चुन सकते हैं, बिना हर कैंपस को अलग से विशेषज्ञता विकसित किए। लेकिन संस्थानों के लिए यह साफ-सुथरे डेटा सिस्टम, स्टैंडर्ड वर्कफ्लो और ऑडिट-रेडी गवर्नेंस की मांग करता है, जिसके लिए कई बार अंदरूनी ढांचे में बड़े बदलाव जरूरी होते हैं।
कैंपस में इंटीग्रेशन की झलक
कुछ शुरुआती उदाहरण यह दिखाते हैं कि भारतीय कैंपस किस दिशा में बढ़ रहे हैं। KIIT यूनिवर्सिटी में बड़े स्तर पर ERP आधारित ऑटोमेशन के जरिए अकादमिक, रिसर्च, कंसल्टेंसी, एचआर और प्रशासन को “एक सिस्टम” की तरह चलाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, BITS पिलानी का AI-आधारित स्मार्ट कैंपस मॉडल दिखाता है कि हाइब्रिड लर्निंग और डिजिटल सेवाएं अब कैंपस डिजाइन का हिस्सा बन रही हैं, न कि बाद में जोड़ी गई सुविधा।
कुछ बदलाव कम दिखाई देते हैं, लेकिन उतने ही अहम हैं। अमिटी यूनिवर्सिटी और IGNOU जैसे संस्थानों में ब्लॉकचेन आधारित सर्टिफिकेट पर प्रयोग, वेरिफिकेशन में देरी और फर्जी डिग्री की समस्या को हल करने की कोशिश है। IIT मद्रास के ऑनलाइन BS डिग्री प्रोग्राम एक ऐसे वितरित विश्वविद्यालय मॉडल की ओर इशारा करते हैं, जहां ऑनलाइन पढ़ाई और ऑफलाइन मूल्यांकन मिलकर एक्सेस और अकादमिक विश्वसनीयता का संतुलन बनाते हैं।
पढ़ाने के तरीके की असली परीक्षा
हालांकि, सिर्फ तकनीक से शिक्षा नहीं बदलती—पेडागॉजी यानी पढ़ाने का तरीका बदलता है। SAMR और TPACK जैसे फ्रेमवर्क यह साफ करते हैं कि सही इंटीग्रेशन के लिए लर्निंग टास्क को दोबारा डिजाइन करना, फैकल्टी को ट्रेन करना और इंस्ट्रक्शनल डिजाइन की संस्थागत क्षमता बनाना जरूरी है। सिर्फ PDF अपलोड करना या लेक्चर रिकॉर्ड करना बदलाव नहीं है; असली बदलाव तब होता है जब मूल्यांकन, फीडबैक, सहयोग और छात्र सहायता को नए सिरे से सोचा जाए।
यहीं कई विश्वविद्यालयों को चुनौती आती है। सॉफ्टवेयर खरीदना आसान है, लेकिन अकादमिक संस्कृति बदलना मुश्किल। पोस्ट-कोविड छात्र इस फर्क को जल्दी समझ लेते हैं। जब पढ़ाई इंटरएक्टिव होती है, फीडबैक समय पर मिलता है, सीखने के रास्ते व्यक्तिगत होते हैं और सिस्टम छात्रों की दिक्कतों पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है—तभी वे बदलाव को महसूस करते हैं।
मानवीय बाधा
तकनीक को अक्सर तकनीकी अपग्रेड के रूप में देखा जाता है, लेकिन असल में यह एक चेंज मैनेजमेंट प्रक्रिया है, जिसके केंद्र में इंसान होते हैं। फैकल्टी का विरोध अक्सर नवाचार के खिलाफ नहीं होता, बल्कि आत्मविश्वास की कमी, बढ़ते काम के दबाव और इस डर से जुड़ा होता है कि कहीं तकनीक क्लासरूम टीचिंग की अहमियत को कम न कर दे।
भारत में इस अंतर को पाटने के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय शिक्षक एवं शिक्षण मिशन (PMMMNMTT) जैसी पहल की गई है, जिसके तहत ICT आधारित पेडागॉजी पर केंद्रित टीचिंग-लर्निंग सेंटर्स के जरिए लाखों शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया है। साथ ही, “लर्निंग आर्किटेक्ट” के रूप में इंस्ट्रक्शनल डिजाइनर्स की बढ़ती भूमिका यह दिखाती है कि अच्छी डिजिटल शिक्षा के लिए विशेष कौशल और भूमिकाओं की जरूरत होती है।
विरोध कभी-कभी संस्थागत और राजनीतिक भी होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में SWAYAM क्रेडिट ट्रांसफर को लेकर हुई बहसें—जिन्हें “डिजिटल विस्थापन” या “टीचरलेस यूनिवर्सिटी” जैसे डर से जोड़ा गया—असल चिंताओं को दिखाती हैं। जो विश्वविद्यालय इन सवालों को नजरअंदाज करते हैं, वहां भरोसा कमजोर पड़ सकता है। वहीं, जो पारदर्शिता के साथ संवाद करते हैं, वे तकनीक को विकल्प नहीं बल्कि सहायक के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
मानव-केंद्रित डिजिटल विश्वविद्यालय की ओर
पोस्ट-पैंडेमिक भारत के लिए सबक साफ है। तकनीक अब किसी एक विभाग या कुछ उत्साही लोगों का औजार नहीं रही। यह आधुनिक विश्वविद्यालय की जोड़ने वाली कड़ी बन चुकी है—जो सही तरीके से इस्तेमाल होने पर पहुंच बढ़ा सकती है और गुणवत्ता सुधार सकती है, लेकिन गलत तरीके से लागू होने पर असमानता भी बढ़ा सकती है।
आने वाले वर्षों में भारत के डिजिटल विश्वविद्यालयों की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उनके प्लेटफॉर्म कितने आधुनिक हैं, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि तकनीक का संचालन कितना समझदारी से किया गया, उसे कितनी समावेशी तरीके से लागू किया गया और अकादमिक जीवन में उसे कितनी मानवीय संवेदनशीलता के साथ जोड़ा गया।
(लेखक एडइनबॉक्स में चीफ मेंटर हैं, टेक्नो इंडिया ग्रुप, कोलकाता में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और समूह से जुड़ी कोलकाता स्थित एक विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल एडवाइज़र भी हैं।)
12वीं के बाद इंटीरियर डिज़ाइनिंग कोर्स खोज रहे छात्रों के लिए AIDAT 2026 एक सुनहरा मौका है। यह भारत का सबसे आसान डिजाइन एंट्रेंस एग्ज़ाम माना जाता है। NIFT या NID जैसी परीक्षाओं में महीनों की स्केचिंग, पोर्टफोलियो और लंबे टेस्ट की जरूरत होती है, जबकि AIDAT सिर्फ 60 मिनट का MCQ टेस्ट है, वह भी घर बैठे ऑनलाइन।
₹2000 की रजिस्ट्रेशन फीस वाला यह टेस्ट देशभर के 300 से अधिक कॉलेजों में मान्य है, जिससे B.Des Interior Design में सीधे दाखिले का रास्ता खुलता है।
जो छात्र “interior design admission without entrance exam” या “low competition design courses after 12th” ढूंढ रहे हैं, उनके लिए AIDAT सबसे शानदार विकल्प है।
AIDAT को सबसे आसान डिजाइन एंट्रेंस एग्ज़ाम क्यों माना जाता है?
AIDAT पारंपरिक डिजाइन प्रवेश परीक्षाओं का तनाव खत्म कर देता है। NIFT का तीन घंटे का लिखित और फिर सिचुएशन टेस्ट कला के शुरुआती छात्रों को डराता है।
NID DAT में एडवांस स्केचिंग और इंटरव्यू शामिल होता है। UCEED में IIT-स्तर का गणित और डिजाइन एप्टीट्यूड पूछा जाता है।
वहीं AIDAT में सिर्फ क्रिएटिविटी, लॉजिक और डिजाइन अवेयरनेस को सरल MCQs के जरिए परखा जाता है। 10+2 का सामान्य ज्ञान और 15 दिन की तैयारी से छात्र अच्छे कॉलेजों में सीट हासिल कर सकते हैं।
AIDAT एग्ज़ाम पैटर्न:
- 100 प्रश्न = 100 अंक
- कोई निगेटिव मार्किंग नहीं
- विषय: कलर थ्योरी, स्पैशियल विज़ुअलाइज़ेशन, फर्नीचर स्टाइल्स, बेसिक रीजनिंग
- उदाहरण प्रश्न: “कौन-सी लाइटिंग मॉडर्न मिनिमलिस्ट बेडरूम के लिए उपयुक्त है?”
न स्केचिंग चाहिए, न पोर्टफोलियो।
क्या AIDAT, NIFT से आसान है? हाँ! यहाँ तुलना देखें
|
परीक्षा |
आसान स्तर |
परीक्षा पैटर्न |
शुल्क |
इंटीरियर सीटें |
तैयारी का समय |
|
AIDAT |
⭐⭐⭐⭐⭐ (सबसे आसान) |
केवल MCQs |
₹2000 |
300+ |
15 दिन |
|
NID DAT |
⭐⭐ |
ड्रॉइंग + इंटरव्यू |
₹3000 |
30–125 |
6 महीने |
|
NIFT |
⭐⭐⭐ |
GAT + सिचुएशन टेस्ट |
₹2000 |
41–100 |
4 महीने |
|
UCEED |
⭐ |
CBT + PBT |
₹2000–4000 |
245 |
8 महीने |
नतीजा: 12वीं के बाद इंटीरियर डिज़ाइन में सबसे तेज़ एडमिशन का रास्ता AIDAT है।
AIDAT डिजाइन एंट्रेंस टेस्ट की प्रमुख बातें
AIDAT पूरी तरह ऑनलाइन प्रॉक्टर्ड होता है:
- छात्र अपने लैपटॉप/डेस्कटॉप और वेबकैम के साथ घर से परीक्षा दे सकते हैं।
- न कोई ट्रैवल खर्च, न एग्ज़ाम सेंटर की दौड़-धूप।
योग्यता (Eligibility):
- किसी भी स्ट्रीम से 12वीं पास
- न्यूनतम 50%
- आयु सीमा नहीं
- B.Des Interior Design के लिए 12वीं पास छात्र योग्य हैं, जबकि M.Des के लिए ग्रेजुएट।
रजिस्ट्रेशन AIDAT के आधिकारिक पोर्टल पर ऑनलाइन होता है। ₹2000 का भुगतान UPI/कार्ड/नेट बैंकिंग से किया जा सकता है। परीक्षा स्लॉट चुनने के बाद रिजल्ट एक सप्ताह में जारी हो जाते हैं और 300 से अधिक कॉलेजों के लिए काउंसलिंग शुरू हो जाती है। कई राज्य विश्वविद्यालय — जैसे ओडिशा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र — AIDAT रैंक पर एडमिशन देते हैं। इससे छात्रों को अपने शहर के पास या पसंद के लोकेशन में कॉलेज चुनने का मौका मिलता है।
AIDAT Entrance Test कैसे क्रैक करें? (आसान गाइड)
AIDAT की तैयारी बाकी एग्ज़ाम की तुलना में बहुत आसान है। सिर्फ 15 दिन की पढ़ाई काफी है।
- आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध फ्री मॉक टेस्ट से शुरुआत करें।
- रोज 2 घंटे कलर थ्योरी, फर्नीचर हिस्ट्री और interior styles (minimalist, bohemian आदि) पर YouTube ट्यूटोरियल देखें।
- स्पैशियल रीजनिंग बढ़ाने के लिए मोबाइल puzzle apps का उपयोग करें।
- 5 फुल-लेंथ मॉक दें ताकि समय प्रबंधन में महारत मिले।
70/100 स्कोर से अच्छा कॉलेज मिल सकता है, जबकि कई छात्र 80+ भी लाते हैं।
निगेटिव मार्किंग नहीं है, इसलिए सभी प्रश्न हल करना लाभदायक है।
इंटीरियर डिज़ाइन इंडस्ट्री का भविष्य और जॉब स्कोप
भारत में इंटीरियर डिजाइन सेक्टर 8.7% CAGR से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में 20% तक पहुँच सकता है। यह ₹15,000 करोड़ का उद्योग है। इसमें करियर के कई विकल्प हैं:
- स्पेस प्लानर
- रेजिडेंशियल इंटीरियर डिजाइनर
- कमर्शियल डिजाइन विशेषज्ञ
- फ्रीलांस कंसल्टेंट
सैलरी:
- शुरुआती पदों पर ₹40,000 प्रति माह
- फ्रीलांसर: प्रति प्रोजेक्ट लगभग ₹50,000 (1 साल अनुभव के बाद)
- हॉस्पिटैलिटी और रियल एस्टेट में पैकेज ₹8–12 लाख प्रति वर्ष
NIFT जैसी परीक्षाओं की लंबी तैयारी के मुकाबले AIDAT छात्रों को तेजी से इंडस्ट्री में प्रवेश दिलाता है।
छात्र AIDAT 2026 को क्यों चुन रहे हैं?
- कठिन डिजाइन एंट्रेंस के आसान विकल्प की तलाश
- कई निजी कॉलेजों में सीधा एडमिशन तो है, लेकिन फीस बहुत अधिक
- पोर्टफोलियो बनाने के लिए वर्षों की स्केचिंग चाहिए
- AIDAT सस्ता, भरोसेमंद, और पूरे भारत में मान्य
₹2000 का निवेश आपकी शिक्षा और करियर दोनों को मजबूत बनाता है।
रजिस्ट्रेशन अभी भी खुला है — 5 मिनट का फॉर्म भरें, पेमेंट करें और अपना स्लॉट बुक करें।
AIDAT उन छात्रों के लिए वरदान है:
- जो स्केचिंग में कमजोर हैं लेकिन क्रिएटिविटी में अच्छे
- जो कॉमर्स या साइंस से हैं
- ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र जिनके लिए एग्ज़ाम सिटी पहुँचना मुश्किल होता है
अगर NIFT में सफलता नहीं मिली तो यह आपका सफर खत्म होने की वजह नहीं।
AIDAT कौशल, सीट और सैलरी — तीनों दिलाने में मदद करता है।
आज ही AIDAT के आधिकारिक पोर्टल पर जाएं और रजिस्टर करें।
12वीं के बाद इंटीरियर डिज़ाइन का आपका सपना यहीं से शुरू होता है।
Tags: design entrance test, interior designing, AIDAT
Easy Entrance Exam for Interior Designing After 12th Grade: AIDAT 2026 Makes Your Path Easier
AIFSET 2026 की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया अब अंतिम चरण में है। अंतिम तारीख 23 जनवरी 2026 है। परीक्षा 24 जनवरी 2026 को आयोजित होगी। एडइनबॉक्स (EdInbox) द्वारा संचालित यह नेशनल-लेवल फोरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट भारत में सबसे लोकप्रिय परीक्षाओं में शामिल हो चुका है। इसके साथ 180+ यूनिवर्सिटी जुड़ी हैं, जो BSc और MSc फोरेंसिक साइंस प्रोग्राम चलाती हैं। एग्ज़ाम फीस सिर्फ ₹2000 है। आप परीक्षा घर से ऑनलाइन दे सकते हैं—किसी भी प्रकार की यात्रा की जरूरत नहीं। परिणाम भी जल्दी जारी होता है और प्रवेश प्रक्रिया काफी आसान है।
AIFSET 2026 परीक्षा कार्यक्रम
कार्यक्रम | तिथि
पंजीकरण शुरू: 1 सितंबर 2025
आवेदन की अंतिम तिथि: 23 जनवरी 2026
एडमिट कार्ड जारी: 22 जनवरी 2026
AIFSET परीक्षा तिथि: 24 जनवरी 2026
परिणाम घोषित: 27 जनवरी 2026
काउंसलिंग/प्रवेश प्रक्रिया: फरवरी 2026
पहले पात्रता जांचें:
बीएससी (BSc) के लिए 12वीं में PCM/PCB के साथ न्यूनतम 50% अंक आवश्यक हैं। एमएससी (MSc) के लिए स्नातक में कम से कम 50% अंक जरूरी हैं।
आरक्षित वर्गों को 5% की छूट मिलेगी। लाइफटाइम में अधिकतम 3 प्रयास की अनुमति है।
AIFSET 2026: प्रश्नपत्र पैटर्न
AIFSET में 12वीं स्तर का विज्ञान, रीजनिंग और बेसिक फोरेंसिक ज्ञान पूछा जाता है।
कुल प्रश्न: 100 MCQs
कुल अंक: 100
समय: 60 मिनट
भाषा: अंग्रेजी
मार्किंग: +1 सही उत्तर, कोई नेगेटिव मार्किंग नहीं
सेक्शनवार प्रश्न:
भौतिकी/रसायन/गणित/जीवविज्ञान: 40
विषय: NCERT कक्षा 11–12 (PCM/PCB)
तार्किक क्षमता/एप्टीट्यूड: 30
विषय: पज़ल्स, क्वांटिटेटिव एबिलिटी, डेटा इंटरप्रिटेशन
फॉरेंसिक साइंस जागरूकता/सामान्य ज्ञान: 30
विषय: क्राइम सीन की मूल बातें, साक्ष्यों के प्रकार
टिप: कोई नेगेटिव मार्किंग नहीं है—इसलिए सभी प्रश्न अटेम्प्ट करें।
ऑनलाइन परीक्षा प्रारूप
AIFSET पूरी तरह से रिमोट प्रॉक्टर्ड ऑनलाइन परीक्षा है। उम्मीदवार लैपटॉप, मोबाइल या डेस्कटॉप से परीक्षा दे सकते हैं। इसके लिए कम से कम 1 Mbps इंटरनेट स्पीड और वेबकैम जरूरी है। किसी भी परीक्षा केंद्र पर जाने की आवश्यकता नहीं होती। स्थिर इंटरनेट कनेक्शन होने से तकनीकी समस्याओं की संभावना कम रहती है। उम्मीदवार परीक्षा पैटर्न और फॉर्मेट को समझने के लिए मॉक टेस्ट देकर पहले से अभ्यास कर सकते हैं।
EdInbox और 180+ पार्टनर यूनिवर्सिटीज
AIFSET का पूरा संचालन EdInbox द्वारा किया जाता है, जो देशभर की 180 से अधिक यूनिवर्सिटीज के साथ साझेदारी करता है। इनमें पारुल यूनिवर्सिटी, विवेकानंद ग्लोबल यूनिवर्सिटी, इनवर्टिस, MATS, APG, सिल्वर ओक यूनिवर्सिटी जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं।
इन सभी कोर्सेज में कुल मिलाकर 1000 से अधिक सीटें उपलब्ध हैं।
AIFSET 2026 एक सिंगल एंट्रेंस टेस्ट है, जिसके जरिए इन सभी टॉप यूनिवर्सिटीज में प्रवेश मिलता है। एक कॉमन मेरिट लिस्ट के आधार पर सीट अलॉटमेंट होता है।
BSc फॉरेंसिक साइंस: अवधि 3 वर्ष (12वीं के बाद)
MSc फॉरेंसिक साइंस: अवधि 2 वर्ष (ग्रेजुएशन के बाद)
दाखिला पूरी तरह मेरिट आधारित है। किसी भी तरह का डोनेशन या एजेंट की जरूरत नहीं होती।
स्टेप-बाय-स्टेप आवेदन प्रक्रिया
- सबसे पहले apply.aifset.com पर जाएं
- ईमेल या मोबाइल नंबर से अकाउंट बनाएं
- आवश्यक व्यक्तिगत जानकारी भरें
- 10+2 या ग्रेजुएशन की मार्कशीट अपलोड करें
- फोटो और सिग्नेचर अपलोड करें
- ₹2000 आवेदन शुल्क ऑनलाइन भुगतान करें (UPI/कार्ड/नेट बैंकिंग)
- कन्फर्मेशन ईमेल तुरंत प्राप्त होगा
- 22 जनवरी को एडमिट कार्ड डाउनलोड करें
- परीक्षा से पहले निर्देशों को ध्यान से पढ़ें
किसी भी सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर: +91 80350 18480
जल्दी आवेदन करने से बेहतर यूनिवर्सिटी मिलने की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि लोकप्रिय कॉलेजों में सीटें तेजी से भरती हैं।
85+ स्कोर के लिए तैयारी रणनीति
- NCERT फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी पर मजबूत पकड़ बनाएं (40%)
- रीजनिंग और एप्टीट्यूड (30%) के लिए आर.एस. अग्रवाल जैसी किताबें उपयोगी हैं
- फॉरेंसिक साइंस की बेसिक जानकारी के लिए AIFSET पोर्टल पर उपलब्ध फ्री PDF पढ़ें
- 60 मिनट में प्रश्न हल करने का अभ्यास करें
- रोजाना कम से कम 100 प्रश्नों का अभ्यास करें
- गलतियों का तुरंत विश्लेषण करें
- कठिन सवालों को दोबारा पढ़ें
- हर हफ्ते इंटरनेट स्पीड चेक करें
- पावर बैकअप रखें ताकि परीक्षा के दौरान रुकावट न आए
- समय प्रबंधन पर विशेष ध्यान दें
AIFSET अन्य फॉरेंसिक एंट्रेंस परीक्षाओं से बेहतर क्यों?
कम फीस: AIFSET की फीस सिर्फ ₹2000 है, जबकि अन्य परीक्षाएं ₹3000–₹5000 तक लेती हैं
180+ यूनिवर्सिटीज में एक साथ मौका: एक ही परीक्षा से देशभर के कॉलेजों में प्रवेश
घर से परीक्षा: यात्रा, ठहरने और लंबी कतारों की झंझट खत्म
नो नेगेटिव मार्किंग: सभी 100 प्रश्न बिना डर हल करें
तेज़ रिजल्ट और एडमिशन:
परीक्षा: 24 जनवरी
रिजल्ट: 27 जनवरी
एडमिशन: फरवरी
बेहतर करियर अवसर:
हर साल 10,000+ फॉरेंसिक प्रोफेशनल्स की मांग
CBI, स्टेट FSL, प्राइवेट लैब्स में मौके
शुरुआती सैलरी: ₹4–12 लाख प्रति वर्ष
अपराध दर बढ़ने के साथ फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। पुलिस विभागों और जांच एजेंसियों में इस कमी को AIFSET से प्रशिक्षित छात्र तेजी से पूरा कर रहे हैं।
एक परीक्षा, पूरे देश में मौके
- 180+ यूनिवर्सिटीज
- 1000+ BSc/MSc फॉरेंसिक साइंस सीटें
- एक ही रैंक लिस्ट, कई विकल्प
- न दोबारा परीक्षा, न कई आवेदन
AIFSET 2026 करियर की दिशा बदलने वाला मौका है।
रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि: 23 जनवरी 2026
परीक्षा तिथि: 24 जनवरी 2026
आज ही रजिस्टर करें और परीक्षा दें।
फ्री काउंसलिंग के लिए कॉल करें: 08035018480
एमबीए इन मार्केटिंग आज के समय में प्रोफेशनल्स को ऐसे रणनीतिक कौशल देता है, जिससे वे भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल इकोनॉमी में अग्रणी भूमिका निभा सकें। Naukri.com के ट्रेंड्स के अनुसार, पिछले एक साल में मार्केटिंग जॉब्स में करीब 45% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह कोर्स खास तौर पर उन फ्रेशर्स और वर्किंग प्रोफेशनल्स के लिए फायदेमंद है, जो HUL, Amazon जैसी बड़ी कंपनियों में उच्च वेतन वाली भूमिकाओं की ओर बढ़ना चाहते हैं।
एमबीए (मार्केटिंग) कोर्स के प्रमुख फायदे
1. करियर में तेज़ ग्रोथ
एमबीए इन मार्केटिंग करने के बाद प्रोफेशनल्स 2–3 साल में ही ब्रांड मैनेजर जैसे मिड-लेवल पदों तक पहुंच सकते हैं, जबकि बिना एमबीए के लंबे समय तक एंट्री-लेवल भूमिकाओं में रहना पड़ता है।
इस डिग्री के साथ शुरुआती सैलरी आमतौर पर 40–60% अधिक होती है। भारत में औसतन ₹12–18 लाख प्रति वर्ष (LPA) की शुरुआती सैलरी मिलती है, क्योंकि इसमें कंज्यूमर एनालिटिक्स और मार्केटिंग कैंपेन की व्यवस्थित ट्रेनिंग दी जाती है।
IILM, LPU और VGU जैसे संस्थानों के पूर्व छात्र कई बार ग्लोबल रोल्स तक पहुंच जाते हैं, जहां उनकी कमाई BBA ग्रेजुएट्स की तुलना में लगभग दोगुनी होती है।
2. जरूरी स्किल्स में महारत
एमबीए (मार्केटिंग) प्रोग्राम में SEO, Google Analytics और AI आधारित पर्सनलाइजेशन जैसी आधुनिक स्किल्स सिखाई जाती हैं। HubSpot की 2025 सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, आज 70% मार्केटिंग फैसले डेटा पर आधारित होते हैं।
कोर्स के दौरान रियल-वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स कराए जाते हैं, जो असली विज्ञापन कैंपेन जैसे होते हैं। भारत में डिजिटल मार्केटिंग सेक्टर हर साल करीब 30% की दर से बढ़ रहा है, और यह ट्रेनिंग सामान्य कॉमर्स डिग्री की तुलना में कहीं ज्यादा प्रैक्टिकल होती है। Google Ads जैसी सर्टिफिकेशन ट्रेनिंग भी रिज़्यूमे को मजबूत बनाती है।
3. नेटवर्किंग के बेहतरीन अवसर
SPJIMR या IMT जैसे कैंपस में पढ़ाई के दौरान छात्रों को मजबूत एलुमनाई नेटवर्क मिलता है, जिससे Deloitte या Flipkart जैसी कंपनियों में रेफरल के मौके बढ़ जाते हैं। LinkedIn डेटा के अनुसार, MBA की करीब 80% प्लेसमेंट नेटवर्किंग के जरिए होती हैं।
CMO लेक्चर, इंडस्ट्री इवेंट्स और फेस्टिवल्स छात्रों को ऐसे प्रोफेशनल कनेक्शन देते हैं, जो आगे चलकर करियर में बड़ा फायदा पहुंचाते हैं।
4. करियर में लचीलापन
मार्केटिंग में एमबीए करने वाले प्रोफेशनल्स आसानी से सेल्स, पीआर या प्रोडक्ट मैनेजमेंट जैसी भूमिकाओं में शिफ्ट कर सकते हैं। GMAC सर्वे के मुताबिक, करीब 65% ग्रेजुएट्स 5 साल के भीतर अलग-अलग फंक्शंस में काम कर चुके होते हैं।
यह लचीलापन ONDC, ई-कॉमर्स और फास्ट कॉमर्स जैसे तेजी से बढ़ते स्टार्टअप सेक्टर में खास तौर पर फायदेमंद है।
प्रमुख भूमिकाएं और औसत सैलरी
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भूमिका |
औसत सैलरी (₹ LPA) |
ग्रोथ सेक्टर |
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डिजिटल मार्केटर |
10–15 |
ई-कॉमर्स, फिनटेक |
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ब्रांड मैनेजर |
15–25 |
FMCG, रिटेल |
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मार्केट रिसर्च एनालिस्ट |
12–20 |
कंसल्टिंग, एनालिटिक्स |
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CMO (10+ वर्ष अनुभव) |
50+ |
टेक, मीडिया |
शानदार ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट)
एमबीए (मार्केटिंग) की फीस आमतौर पर ₹15–25 लाख होती है, जिसे अच्छी प्लेसमेंट के जरिए करीब 2 साल में रिकवर किया जा सकता है। NIRF की टॉप-50 बी-स्कूल्स में 95% तक प्लेसमेंट रेट देखा गया है।
स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन की सुविधा के चलते यह कोर्स मिडिल-क्लास परिवारों के लिए भी सुलभ है, खासकर उन छात्रों के लिए जो मेट्रो सिटीज़ में करियर बनाना चाहते हैं।
एमबीए इन मार्केटिंग आज के चुनौतीपूर्ण जॉब मार्केट में करियर ग्रोथ, जरूरी स्किल्स, मजबूत नेटवर्किंग, रोल फ्लेक्सिबिलिटी और बेहतर कमाई का भरोसेमंद रास्ता है। डिजिटलाइजेशन के बढ़ते प्रभाव के साथ फ्रेशर्स और वर्किंग प्रोफेशनल्स दोनों को इसमें स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिल रही है।
2026 के मार्केटिंग माहौल में सफल होने के लिए सही बी-स्कूल चुनना जरूरी है। CAT, GMAT या GMCAT जैसे नेशनल-लेवल एंट्रेंस टेस्ट देकर भारत की टॉप यूनिवर्सिटीज़ में एडमिशन के दरवाजे खोले जा सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए संबंधित संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट पर विज़िट करें।
अगर आप “BCA entrance exam 2026 India”, “B.Tech computer science admission test” या “B.Sc IT eligibility entrance exam” सर्च कर रहे हैं, तो आप सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत में कंप्यूटर साइंस सेक्टर लगातार तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2026 तक इस क्षेत्र में करीब 12 लाख नई नौकरियों और 15 लाख से अधिक टेक्नोलॉजी वैकेंसी होने का अनुमान है।
हालांकि, अलग-अलग राज्यों की प्रवेश परीक्षाएं, सीमित सीटें और कड़ी प्रतिस्पर्धा छात्रों के लिए चुनौती बन जाती हैं। इसी समस्या का समाधान है ग्लोबल कंप्यूटर साइंस एंट्रेंस टेस्ट (GCSET)।
GCSET एक राष्ट्रीय स्तर की एकीकृत प्रवेश परीक्षा है, जो भारत सहित 190 से अधिक देशों के छात्रों के लिए खुली है। इसके जरिए छात्र BCA, B.Tech CSE/IT, B.Sc IT/Data Science और पोस्टग्रेजुएट कोर्स (M.Tech, M.Sc, MCA) में दाखिला ले सकते हैं। सिर्फ 60 मिनट की ऑनलाइन परीक्षा आपको देशभर की पार्टनर यूनिवर्सिटीज तक पहुंच देती है।
कंप्यूटर साइंस में प्रवेश के लिए एंट्रेंस टेस्ट क्यों जरूरी है?
भारत और दुनिया भर में करीब 40 लाख कंप्यूटर साइंस प्रोफेशनल्स की जरूरत है और यह मांग हर साल लगभग 33% की दर से बढ़ रही है। प्रमुख कॉलेज और यूनिवर्सिटीज छात्रों से उनकी योग्यता का प्रमाण मांगती हैं—GCSET यही अवसर प्रदान करता है।
यदि आप प्रवेश परीक्षा नहीं देते हैं, तो अक्सर मैनेजमेंट कोटा के तहत दाखिला लेना पड़ता है, जिसमें हर साल 3–5 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च हो सकते हैं। वहीं, बार-बार लोकल एडमिशन लेने से आपके विकल्प केवल आसपास के कॉलेजों तक सीमित रह जाते हैं।
GCSET का मतलब है—राष्ट्रीय स्तर की मेरिट के आधार पर चयन, बेहतर लैब सुविधाओं तक पहुंच, AI/ML में व्यावहारिक प्रशिक्षण, और 85% से अधिक प्लेसमेंट, जहां शुरुआती पैकेज 6 से 18 लाख रुपये सालाना (LPA) तक हो सकता है।
GCSET बनाम अन्य कंप्यूटर साइंस प्रवेश परीक्षाएं
GCSET
स्तर: राष्ट्रीय
पात्रता: सभी (भारतीय + अंतरराष्ट्रीय)
अवधि: 60 मिनट
कोर्स: BCA / B.Tech / B.Sc IT + M.Tech / MCA
कॉलेज: देशभर की पार्टनर यूनिवर्सिटीज
फीस: ₹2000 (ऑफर/स्कॉलरशिप अलग)
CUET UG
- सीमित यूनिवर्सिटी और सीमित CS विकल्प
- केवल भारतीय छात्रों के लिए
JEE Main
- केवल B.Tech CSE
- लाखों आवेदन, सीमित सीटें
KCET / MHT CET / VITEEE
- राज्य या एक ही निजी यूनिवर्सिटी तक सीमित
GCSET का फायदा:
एक ही परीक्षा UG और PG दोनों के लिए, कोई डोमिसाइल बाध्यता नहीं, अंतरराष्ट्रीय पात्रता, और सबसे तेज एडमिशन प्रक्रिया।
GCSET क्या है?
Global Computer Science Entrance Test (GCSET) एक ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा है, जो BCA, B.Tech CSE/IT, B.Sc IT, M.Tech, M.Sc CS और MCA के लिए प्रतिभाशाली छात्रों का चयन करती है।
यह 60 मिनट की ऑनलाइन परीक्षा है, जो वर्किंग प्रोफेशनल्स और विदेशी छात्रों के लिए भी उपयुक्त है।
कौन आवेदन कर सकता है?
UG कोर्स (BCA / B.Tech / B.Sc IT):
- 10+2 या समकक्ष परीक्षा पास
- फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और/या कंप्यूटर साइंस
- न्यूनतम 50% अंक
- 10+2 में उपस्थित छात्र भी पात्र
- अधिकतम 3 प्रयास की अनुमति
PG कोर्स (M.Tech / MCA / M.Sc):
- B.Sc CS / IT या संबंधित विषय में ग्रेजुएशन
- न्यूनतम 50% अंक
- फाइनल ईयर के छात्र भी आवेदन कर सकते हैं
- अधिकतम 3 प्रयास
GCSET के जरिए एडमिशन कैसे लें? (5 आसान स्टेप)
- gcset.org पर आवेदन करें (Admission 2026)
- 60 मिनट की ऑनलाइन परीक्षा दें
- स्कोरकार्ड डाउनलोड करें
- काउंसलिंग में पार्टनर यूनिवर्सिटी चुनें
- एडमिशन फीस देकर सीट कन्फर्म करें
CUET और JEE से बेहतर क्यों है GCSET?
CUET: बड़ा सिलेबस, सीमित CS कॉलेज
JEE Main: बहुत कम सीटें, केवल B.Tech
GCSET: एप्टीट्यूड आधारित, सभी स्ट्रीम के छात्र, UG + PG, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवसर
GCSET 2026 के जरिए कौन-से कोर्स करें?
GCSET के जरिए भारत की 100+ पार्टनर यूनिवर्सिटीज में B.Tech, B.Sc IT, BCA जैसे कोर्स आसानी से किए जा सकते हैं। यह परीक्षा छात्रों को सही कॉलेज चुनने में मदद करती है, बिना लंबी और जटिल प्रक्रिया के।
GCSET बनाम प्राइवेट यूनिवर्सिटी एग्जाम
VITEEE, SRMJEEE, MET जैसी परीक्षाएं सिर्फ एक-एक कॉलेज तक सीमित होती हैं, जबकि GCSET एक परीक्षा में कई यूनिवर्सिटी का विकल्प देता है। कोई इंटरव्यू नहीं, तुरंत रिजल्ट और स्कॉलरशिप की सुविधा।
GCSET 2026 किसे देना चाहिए?
- कक्षा 12 (किसी भी स्ट्रीम) के छात्र – BCA/B.Tech/B.Sc IT के लिए
- ग्रेजुएट – M.Tech/MCA के लिए
- NRI और अंतरराष्ट्रीय छात्र
- JEE/KCET ड्रॉपर
- वर्किंग प्रोफेशनल्स
GCSET की तैयारी कैसे करें?
सप्ताह 1–3: क्वांट, रीजनिंग, बेसिक C/Python
सप्ताह 4–6: कंप्यूटर फंडामेंटल्स, सैंपल पेपर
सप्ताह 7–8: मॉक टेस्ट और रिविजन
2026 को कई प्रवेश परीक्षाओं में न गंवाएं। GCSET चुनें।
भारत को 12 लाख कंप्यूटर साइंस प्रोफेशनल्स की जरूरत है और GCSET सभी को बराबर मौका देता है—बिना राज्य भेदभाव, बिना विषय सीमा और अंतरराष्ट्रीय मान्यता के साथ।
अधिक जानकारी और फ्री काउंसलिंग के लिए आधिकारिक GCSET पोर्टल पर जाएं और आज ही तैयारी शुरू करें।
21वीं सदी में फोरेंसिक साइंस कोर्स सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले कार्यक्रमों में शामिल हो गए हैं। छात्र अपने करियर की शुरुआत के लिए “forensic science admission 2026” और “best forensic courses via entrance exam” जैसे तथ्य सर्च कर रहे हैं। भारत में B.Sc/M.Sc फोरेंसिक साइंस कोर्स में प्रवेश आमतौर पर मेरिट-आधारित एंट्रेंस टेस्ट के माध्यम से मिलता है, जैसे नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्जाम और AIFSET (ऑल इंडिया फोरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट)।
सीधे प्रवेश वाले कॉलेजों में औसत प्रशिक्षण मिलता है, जबकि प्रवेश परीक्षा वाले मार्ग से छात्र बेहतर लैब सुविधाएं, उच्चस्तरीय प्लेसमेंट और CBI/FSL जैसी संस्थाओं में करियर का अवसर पाते हैं।
प्रवेश परीक्षा के जरिए क्यों करें फोरेंसिक साइंस ?
1. भारत की टॉप फोरेंसिक यूनिवर्सिटीज में प्रवेश का मौका
एंट्रेंस एग्जाम के जरिए छात्रों को NAAC A++ ग्रेड वाली टॉप यूनिवर्सिटीज में जगह मिलती है, जैसे— नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) के गांधीनगर, एनसीआर दिल्ली, गोवा कैंपस—जो दुनिया की पहली फोरेंसिक शिक्षा देने वाली यूनिवर्सिटी है। सीधे प्रवेश वाले साधारण B.Sc कॉलेजों में क्राइम लैब या FSL एसोसिएशन जैसी सुविधाएं अक्सर नहीं होतीं।
2. बेहतर प्लेसमेंट और आकर्षक वेतन
एंट्रेंस आधारित एडमिशन यह सुनिश्चित करते हैं कि छात्र उच्च रैंकिंग वाले कॉलेजों में पढ़ें, जिससे उन्हें बेहतरीन करियर अवसर, गारंटीड प्लेसमेंट, फ्रेशर स्तर पर बेहतर सैलरी जैसे लाभ मिलें। AIFSET जैसी परीक्षाएं केवल उन यूनिवर्सिटीज को जोड़ती हैं जिन्हें पहले क्वालिटी के आधार पर परखा गया हो।
3. इंडस्ट्री-रेडी स्किल्स और आधुनिक पाठ्यक्रम
एंट्रेंस परीक्षा से मिलने वाले कॉलेजों में प्रैक्टिकल आधारित पाठ्यक्रम मिलता है जिसमें साइबर फोरेंसिक्स, टॉक्सिकोलॉजी, कोर्टरूम स्किल्स, फेक क्राइम सीन पर ट्रेनिंग, एविडेंस हैंडलिंग शामिल हैं। भारत में हर साल 5,000+ फोरेंसिक विशेषज्ञों की कमी है। ऐसे में टेस्ट-बेस्ड डिग्री MHA की नौकरियों के लिए सबसे उपयुक्त होती है।
4. छात्रवृत्ति और शुल्क में राहत
एंट्रेंस परीक्षा से प्रवेश पाने वाले छात्रों को मेरिट स्कॉलरशिप, आरक्षित वर्ग के लिए वित्तीय सहायता, प्रोविजनल एडमिशन स्कॉलरशिप जैसे लाभ भी मिलते हैं। सीधे प्रवेश वाले कोर्स इतनी सहायता अक्सर प्रदान नहीं करते।
5. करियर में दीर्घकालिक बढ़त
फोरेंसिक साइंस प्रवेश परीक्षा पास करने से छात्रों में आत्मविश्वास बढ़ता है और वे आगे PhD, R&D लैब्स, विशेषज्ञ सरकारी भूमिकाओं में करियर बना सकते हैं।
2026 के लिए भारत के सर्वश्रेष्ठ फोरेंसिक साइंस प्रवेश परीक्षा
B.Sc/M.Sc फोरेंसिक साइंस करना चाहने वाले छात्र आमतौर पर इन परीक्षाओं को पसंद करते हैं—
- NFSU एंट्रेंस एग्जाम
(नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी के लिए)
- AIFSET (ऑल इंडिया फोरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट)
जिससे NAAC A+ यूनिवर्सिटीज में प्रवेश मिलता है। यहां से छात्र आधुनिक लैब एक्सेस, प्रैक्टिकल करिकुलम, 90%+ प्लेसमेंट, CBI/स्टेट फोरेंसिक डिपार्टमेंट्स (₹6–12 लाख वार्षिक शुरुआती पैकेज) में पा सकते हैं।
NFSU प्रतिष्ठित है, जबकि AIFSET सबसे आसानी से दिया जाने वाला राष्ट्रीय स्तर का टेस्ट माना जाता है।
AIFSET क्यों चुनें?
AIFSET फोरेंसिक साइंस चाहने वाले छात्रों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है क्योंकि - यह लचीला है, किफायती है और पूरे भारत में उपलब्ध है
- 12th साइंस या ग्रेजुएट (PCB/PCM) छात्रों के लिए बिना किसी जटिलता के खुला है
- स्कॉलरशिप और ड्यूल सर्टिफिकेशन्स देता है
- साइबर फोरेंसिक्स/प्राइवेट लैब्स में करियर बढ़ाने में मदद करता है
- 5–9 LPA एवरेज पैकेज वाले प्लेसमेंट प्रोग्राम्स उपलब्ध कराता है
AIFSET की परीक्षा प्रक्रिया आसान है— छात्र रजिस्टर कर सकते हैं, परीक्षा दे सकते हैं और इससे जुड़े शीर्ष विश्वविद्यालयों में सीट सुरक्षित कर सकते हैं। भाग लेने वाली यूनिवर्सिटीज की जानकारी आधिकारिक AIFSET पोर्टल पर उपलब्ध है।
प्रवेश परीक्षा के माध्यम से फोरेंसिक साइंस डिग्री हासिल करना सबसे समझदारी भरा कदम है। NFSU और AIFSET जैसे एंट्रेंस टेस्ट छात्रों को अत्याधुनिक लैब्स, 90%+ प्लेसमेंट, ₹1 से 6–12 लाख वार्षिक पैकेज, बेहतर स्कॉलरशिप जैसे अवसर देते हैं, जो सीधे प्रवेश से संभव नहीं।
जो छात्र forensic science entrance 2026 खोज रहे हैं, उनके लिए AIFSET पात्रता की सहजता, राष्ट्रीय पहुंच और रोजगार संभावनाओं का बेहतरीन संयोजन प्रदान करता है।
अधिक जानकारी और मुफ्त काउंसलिंग के लिए आधिकारिक पोर्टल जरूर देखें।
साल 2025 में भारत में फर्जी लॉ कॉलेजों और नकली डिग्रियों का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया। कई संस्थानों द्वारा छात्रों को अवैध रूप से नकली कानून की डिग्रियाँ दी जा रही थीं, जिससे हज़ारों छात्रों का भविष्य और पैसा दोनों दांव पर लग गया। ऐसे में लॉ कोर्स में प्रवेश के लिए CLAT या AICLET जैसी मान्य प्रवेश परीक्षाओं का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
सही प्रवेश परीक्षा के माध्यम से छात्र वैध और मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों में दाख़िला लेकर एक सुरक्षित और भरोसेमंद कानूनी करियर बना सकते हैं।
नीचे दी गई सूची उन छात्रों की मदद करेगी, जो लॉ प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद भारत के श्रेष्ठ निजी लॉ विश्वविद्यालयों का चयन करना चाहते हैं।
भारत के शीर्ष निजी लॉ विश्वविद्यालय
- लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU), फगवाड़ा, पंजाब
- एमिटी यूनिवर्सिटी, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
- एमिटी यूनिवर्सिटी, जयपुर, राजस्थान
- एमिटी यूनिवर्सिटी, मुंबई
- एमिटी यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम (मानेसर)
- एमिटी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु, कर्नाटक
- चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, मोहाली, पंजाब
- चंडीगढ़ ग्रुप ऑफ कॉलेजेस, झांजेरी, मोहाली
- बेनेट यूनिवर्सिटी, ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश
- शूलिनी यूनिवर्सिटी, बजहोल, हिमाचल प्रदेश
- मानव रचना यूनिवर्सिटी, फरीदाबाद, हरियाणा
- पारुल यूनिवर्सिटी, वडोदरा, गुजरात
- एलायंस यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु
- रिम्ट यूनिवर्सिटी, मंडी गोबिंदगढ़, पंजाब
- महर्षि मार्कंडेश्वर यूनिवर्सिटी, मुलाना, अंबाला, हरियाणा
- दयानंद सागर यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु
- चाणक्य यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु
- सुषांत यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम, हरियाणा
- जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी, जयपुर, राजस्थान
- गीता यूनिवर्सिटी, हरियाणा
- आईआईएलएम यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम, हरियाणा
- एपीजे सत्य यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम, हरियाणा
- उत्तरांचल यूनिवर्सिटी, देहरादून, उत्तराखंड
- जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी, राजस्थान
- विवेकानंद ग्लोबल यूनिवर्सिटी, जयपुर, राजस्थान
- रायत बाहरा यूनिवर्सिटी, पंजाब
- बाहरा यूनिवर्सिटी, हिमाचल प्रदेश
- इनवर्टिस यूनिवर्सिटी, बरेली, उत्तर प्रदेश
- ओम स्टर्लिंग ग्लोबल यूनिवर्सिटी, हरियाणा
- गोकुल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सिद्धपुर, गुजरात
प्रवेश परीक्षा क्यों है फर्जी लॉ कॉलेजों से बचाव की ढाल?
भारतीय विधि परिषद (Bar Council of India – BCI) ने 20 से अधिक ऐसे अनधिकृत लॉ कॉलेजों का खुलासा किया, जो हज़ारों छात्रों को नकली डिग्रियाँ दे रहे थे। इसका नतीजा यह हुआ कि कई छात्रों की नौकरियाँ चली गईं और उनकी सालों की मेहनत बेकार हो गई।
वास्तविक और भरोसेमंद निजी लॉ विश्वविद्यालय CLAT और AILET जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं के माध्यम से ही छात्रों का चयन करते हैं। ये परीक्षाएँ योग्यता आधारित होती हैं, जो छात्र की तार्किक क्षमता, समझ और ज्ञान की सही परीक्षा लेती हैं।
प्रवेश परीक्षा के ज़रिए दाख़िला लेने से यह सुनिश्चित होता है कि छात्र NBA/NAAC से मान्यता प्राप्त कार्यक्रमों में पढ़ाई करें, जिनकी डिग्रियाँ अदालतों और नियोक्ताओं द्वारा मान्य होती हैं।
आज जब कानूनी क्षेत्र में रोज़गार के अवसर तेज़ी से बढ़ रहे हैं, तब सही प्रवेश परीक्षा न केवल आपकी पढ़ाई में किए गए निवेश की सुरक्षा करती है, बल्कि एक मजबूत और उज्ज्वल करियर की राह भी खोलती है।
इसलिए दाख़िले से पहले NIRF रैंकिंग, BCI मान्यता और प्रवेश परीक्षा की शर्तों की जाँच ज़रूर करें—क्योंकि एक वकील के रूप में आपका भविष्य इन्हीं फैसलों पर निर्भर करता है।
निःशुल्क परामर्श और मार्गदर्शन के लिए संपर्क करें: 08071296498
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: 2026 में भारत के सबसे अच्छे निजी लॉ कॉलेज कौन से हैं?
उत्तर: लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (फगवाड़ा), एमिटी यूनिवर्सिटी के विभिन्न कैंपस (लखनऊ, जयपुर, मुंबई, गुरुग्राम, बेंगलुरु), चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी (मोहाली), बेनेट यूनिवर्सिटी (ग्रेटर नोएडा) और शूलिनी यूनिवर्सिटी प्रमुख विकल्प हैं। ये संस्थान CLAT या AICLET 2026 के माध्यम से BA LLB/LLM में अच्छे प्लेसमेंट प्रदान करते हैं।
प्रश्न 2: फर्जी लॉ डिग्रियाँ छात्रों को कैसे नुकसान पहुँचा रही हैं?
उत्तर: अनधिकृत कॉलेजों की नकली डिग्रियों के कारण छात्रों को नौकरी में अस्वीकृति, BCI द्वारा पंजीकरण रद्द होना और फीस का नुकसान उठाना पड़ता है। अदालतें ऐसी डिग्रियों को मान्यता नहीं देतीं।
प्रश्न 3: लॉ एडमिशन के लिए CLAT या AICLET क्यों ज़रूरी हैं?
उत्तर: ये राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएँ योग्यता आधारित दाख़िले को सुनिश्चित करती हैं और छात्रों को BCI-मान्यता प्राप्त संस्थानों तक पहुँच दिलाती हैं, जिससे फर्जी कॉलेजों से बचाव होता है।
प्रश्न 4: क्या एमिटी और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी लॉ के लिए अच्छी हैं?
उत्तर: हाँ, एमिटी यूनिवर्सिटी कॉर्पोरेट ओरिएंटेड BA LLB के लिए जानी जाती है, जहाँ 10–15 लाख रुपये प्रति वर्ष तक के पैकेज मिलते हैं, जबकि चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी लगभग 95% प्लेसमेंट रिकॉर्ड के लिए प्रसिद्ध है।
प्रश्न 5: किसी निजी लॉ कॉलेज की वैधता कैसे जाँचें?
उत्तर: BCI की मान्यता, NIRF 2025 रैंकिंग, NAAC ग्रेड और प्रवेश परीक्षा की जानकारी nirfindia.org और bci.org.in पर जाँचें। BCI द्वारा प्रतिबंधित कॉलेजों से दूरी बनाएँ।
प्रश्न 6: क्या CLAT के बिना भी लॉ में दाख़िला मिल सकता है?
उत्तर: हाँ, कई विश्वविद्यालय जैसे LPU (LPUNEST), पारुल यूनिवर्सिटी या JECRC AICLET स्कोर स्वीकार करते हैं, जिससे एक ही परीक्षा के माध्यम से दाख़िले का अवसर मिल जाता है।
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'सिटी ऑफ जॉय' कहे जाने वाले कोलकाता शहर में 16 अप्रैल का दिन वाकई उत्साह से भरा रहा, जब 'एडइनबॉक्स' ने अपना विस्तार करते हुए यहाँ के लोगों के लिए अपनी नई ब्रांच का शुभारम्भ किया। ख़ास बात यह रही कि इस मौके पर इटली से आये मेहमानों के साथ 'एडइनबॉक्स' की पूरी टीम मौजूद थी। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में उदघाटित इस कार्यालय से पूर्व 'एडइनबॉक्स' की शाखाएं दिल्ली, भुवनेश्वर, लखनऊ और बैंगलोर जैसे शहरों में पहले से कार्य कर रही हैं।
कोलकाता में एडइनबॉक्स की नयी ब्रांच के उद्घाटन कार्यक्रम में इटली के यूनिमार्कोनी यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधिमंडल की गरिमामयी उपस्थिति ने इस अवसर को तो ख़ास बनाया ही, सहयोग और साझेदारी की भावना को भी इससे बल मिला। विशिष्ट अतिथियों आर्टुरो लावेल, लियो डोनाटो और डारिना चेशेवा ने 'एडइनबॉक्स' के एडिटर उज्ज्वल अनु चौधरी, बिजनेस और कंप्यूटर साइंस के डोमेन लीडर डॉ. नवीन दास, ग्लोबल मीडिया एजुकेशन काउंसिल डोमेन को लीड कर रहीं मनुश्री मैती और एडिटोरियल कोऑर्डिनेटर समन्वयक शताक्षी गांगुली के नेतृत्व में कोलकाता टीम के साथ हाथ मिलाया।
समारोह की शुरुआत अतिथियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत से हुई। तत्पश्चात दोनों पक्षों के बीच विचारों और दृष्टिकोणों का सकारात्मक आदान-प्रदान हुआ। डारिना ने पारम्परिक तरीके से रिबन काटकर आधिकारिक तौर पर कार्यालय का उद्घाटन किया और इस मौके को आपसी सहयोग के प्रयासों की दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। बाकायदा इस दौरान यूनिमार्कोनी विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल और EdInbox.com टीम के बीच एक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर भी हुआ। यह पहल शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और प्रगति के लिए साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक छात्रों का नेतृत्व कर इस पहल से उन्हें सशक्त बनाया जा सकता है ताकि वे वैश्विक मंचों पर सफलता के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।
समारोह के समापन की वेला पर दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे को स्मारिकाएं भेंट की गयीं। 'एडइनबॉक्स' की नई ब्रांच के उद्घाटन के साथ इस आदान-प्रदान की औपचारिकता से दोनों टीमों के बीच मित्रता और सहयोग के बंधन भी उदघाटित हुए।अंततः वक़्त मेहमानों को अलविदा कहने का था, 'एडइनबॉक्स' की कोलकाता टीम ने अतिथियों को विदा तो किया मगर इस भरोसे और प्रण के साथ कि यह नयी पहल भविष्य में संबंधों की प्रगाढ़ता और विकास के नए ठौर तक पहुंचेगी।
आईआईटी दिल्ली में आयोजित डिज़ाइन फॉर भारत यूथ इनोवेशन चैलेंज 2026 में देशभर से आए युवा प्रतिभाओं ने अपने नवाचारों को मॉडल, पोस्टर और प्रोटोटाइप के रूप में प्रस्तुत किया। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस चैलेंज का उद्देश्य युवाओं को वास्तविक समस्याओं पर आधारित समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
50 प्रविष्टियों में से 19 टीमों का चयन
इस प्रदर्शनी के लिए कुल 50 प्रविष्टियां प्राप्त हुईं, जिनमें से चयनित 19 टीमों ने अपने प्रोजेक्ट्स को प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया। छात्रों ने सामाजिक, तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियों पर आधारित नवाचारों को इंटरैक्टिव मॉडल और कार्यशील प्रोटोटाइप के माध्यम से पेश किया।
आईआईटी दिल्ली रहा दिल्ली राज्य का नोडल संस्थान
विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026 के तहत युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय द्वारा इस राष्ट्रीय डिजाइन चैलेंज की शुरुआत की गई है। दिल्ली राज्य के लिए आईआईटी दिल्ली को नोडल संस्थान की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसके अंतर्गत चयन प्रक्रिया और प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।
18 से 29 वर्ष के युवाओं ने लिया हिस्सा
प्रतियोगिता में 18–29 वर्ष आयु वर्ग के प्रतिभागियों ने भाग लिया। उन्हें भारत की वर्तमान चुनौतियों से जुड़े रचनात्मक समाधान डिजाइन करने का अवसर दिया गया। प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य टीमवर्क, समस्या-समाधान कौशल और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देना है, ताकि युवा नवाचार को भविष्य की जरूरतों के अनुसार दिशा दी जा सके।
विशेषज्ञ जूरी द्वारा चयन
डिजाइन क्षेत्र से जुड़े अनुभवी संकाय सदस्यों और विशेषज्ञ डिजाइनरों की जूरी ने सभी 19 चयनित प्रविष्टियों का मूल्यांकन किया। निर्धारित मानकों के आधार पर तीन सर्वश्रेष्ठ प्रोजेक्ट्स को अंतिम रूप दिया गया है। ये टीमें अब राष्ट्रीय स्तर के अगले चरण में अपने नवाचारों को प्रस्तुत करेंगी।
नवाचारों को प्रोत्साहित करने का बड़ा कदम
यह प्रदर्शनी न सिर्फ छात्रों को अपनी सोच और तकनीकी क्षमता दिखाने का अवसर देती है, बल्कि उन्हें देश की जमीनी चुनौतियों को समझकर समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित भी करती है। मंत्रालय के इस प्रयास को युवा नवाचार को एक राष्ट्रीय मंच देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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IIT Delhi Hosts ‘Design for Bharat Youth Innovation Challenge 2026’, Providing a National Platform for Youth Innovation
आज के दौर में 'वर्क–लाइफ बैलेंस' शब्द जितना लोकप्रिय है, उतना ही रहस्यमयी भी। कॉर्पोरेट दफ्तरों की चमचमाती दीवारों से लेकर सोशल मीडिया के 'सेल्फ-केयर' पोस्ट्स तक, हर जगह इसकी चर्चा है। लेकिन हकीकत के धरातल पर सवाल आज भी वही खड़ा है—क्या निजी जीवन और काम के बीच संतुलन वाकई मुमकिन है, या यह केवल एक शहरी मध्यम वर्ग का बुना हुआ भ्रम है?
डिजिटल बेड़ियाँ: जब दफ्तर घर तक आ गया
तकनीकी क्रांति ने हमें आज़ादी तो दी, लेकिन साथ ही 'हर वक्त उपलब्ध' रहने की एक अदृश्य शर्त भी थोप दी। स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट ने दफ्तर की चारदीवारी को खत्म कर दिया है। अब काम का समय शाम को ऑफिस की लाइट बंद होने के साथ खत्म नहीं होता; वह ईमेल, व्हाट्सएप और ज़ूम कॉल के जरिए हमारे बेडरूम और खाने की मेज तक पहुंच चुका है। जब 'लॉग-ऑफ' करने के बाद भी दिमाग 'ऑनलाइन' रहे, तो निजी समय की परिभाषा धुंधली पड़ जाती है।
क्या यह केवल 'वाइट कॉलर' समस्या है?
अक्सर यह माना जाता है कि काम और जीवन के संतुलन की चिंता केवल एसी कमरों में बैठने वाले आईटी पेशेवरों की है। लेकिन गहराई से देखने पर यह एक व्यापक मानवीय संकट नज़र आता है।
असंगठित क्षेत्र: एक दिहाड़ी मज़दूर या छोटे दुकानदार के लिए काम और जीवन के बीच कोई स्पष्ट रेखा नहीं होती। उनके लिए अधिक काम का मतलब अधिक रोटी है, लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपने स्वास्थ्य और परिवार से दूर रहकर चुकानी पड़ती है।
महिलाएं और 'डबल शिफ्ट': कामकाजी महिलाओं के लिए यह चुनौती दोगुनी है। दफ्तर की फाइलें निपटाने के बाद उन पर घर की रसोई और बच्चों की परवरिश का जो 'अघोषित' बोझ होता है, वह उन्हें किसी भी संतुलन से कोसों दूर ले जाता है।
उत्पादकता का भ्रम: ज़्यादा काम यानी बेहतर काम?
आधुनिक कार्य-संस्कृति में अक्सर देर तक बैठने (Hustle Culture) को वफादारी और मेहनत का पैमाना मान लिया जाता है। लेकिन मनोवैज्ञानिक शोध कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
बर्नआउट का खतरा: लगातार बिना ब्रेक के काम करने से 'बर्नआउट' की स्थिति पैदा होती है, जहाँ इंसान शारीरिक और मानसिक रूप से खाली महसूस करने लगता है।
रचनात्मकता की मौत: थका हुआ दिमाग केवल निर्देशों का पालन कर सकता है, वह कुछ नया नहीं सोच सकता। यानी लंबे घंटे काम करने का मतलब यह कतई नहीं है कि परिणाम भी उतने ही बेहतर होंगे।
मानसिक स्वास्थ्य: अब यह 'निजी' मामला नहीं रहा
पिछले कुछ वर्षों में युवाओं में तनाव, अवसाद और एंग्जायटी के मामलों में भारी उछाल आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा संबंध कार्यस्थल के बढ़ते दबाव और निजी सुकून के अभाव से है। अब कंपनियां भी यह समझने लगी हैं कि एक मानसिक रूप से स्वस्थ कर्मचारी ही कंपनी के लिए सबसे बड़ी संपत्ति (Asset) है। इसीलिए 'मेंटल हेल्थ लीव' और 'वेलनेस प्रोग्राम' जैसे शब्द अब पॉलिसी का हिस्सा बन रहे हैं।
समाधान: केवल पॉलिसी नहीं, सोच बदलनी होगी
वर्क-लाइफ बैलेंस का मतलब यह नहीं है कि काम कम किया जाए, बल्कि यह है कि काम को सही तरीके से किया जाए। इसके लिए कुछ बुनियादी बदलाव ज़रूरी हैं:
परिणाम आधारित मूल्यांकन: कंपनियों को घंटों के बजाय काम की गुणवत्ता (Quality) पर ध्यान देना चाहिए।
राइट टू डिस्कनेक्ट: यूरोप के कई देशों की तरह भारत में भी इस पर चर्चा ज़रूरी है कि ऑफिस के घंटों के बाद कर्मचारियों को कॉल या मैसेज न भेजे जाएं।
सामाजिक सहयोग: घर के कामों में पुरुषों की भागीदारी को केवल 'मदद' नहीं, बल्कि 'ज़िम्मेदारी' समझना होगा।
यह विलासिता नहीं, ज़रूरत है
वर्क-लाइफ बैलेंस कोई 'लग्जरी' या फैशन नहीं है, बल्कि यह एक स्वस्थ समाज की बुनियादी ज़रूरत है। यदि हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो आर्थिक रूप से तो समृद्ध है लेकिन मानसिक और पारिवारिक रूप से खोखली, तो यह तरक्की अधूरी है।
सच्ची सफलता वह है, जहाँ करियर की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद आपके पास उस सफलता का जश्न मनाने के लिए समय, स्वास्थ्य और खुशहाल परिवार भी मौजूद हो।
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली लंबे समय से एक बुनियादी चुनौती से जूझती रही है—जांच में देरी और साक्ष्यों की कमजोरी। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा 2029 तक हर राज्य में फोरेंसिक विश्वविद्यालय या केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशाला (CFSL) स्थापित करने की घोषणा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार की दिशा में बड़ा हस्तक्षेप है। 30 हजार करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश के साथ यह पहल संकेत देती है कि सरकार अब “सबूत आधारित न्याय” को नीति के केंद्र में लाना चाहती है।
आज की तारीख में जब अपराध के स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं—साइबर क्राइम, डिजिटल फ्रॉड, संगठित अपराध और आतंकी गतिविधियां—तो पारंपरिक पुलिसिंग के भरोसे प्रभावी जांच संभव नहीं रह गई है। फोरेंसिक विज्ञान अब केवल एक सहायक उपकरण नहीं, बल्कि अपराध जांच की रीढ़ बन चुका है। ऐसे में सात से बढ़कर 15 केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की तैयारी और राज्यों में क्षेत्रीय लैब्स को मजबूत करने की योजना समय की मांग है।
इस पहल का सबसे अहम पक्ष फोरेंसिक शिक्षा और मानव संसाधन विकास से जुड़ा है। नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) को जिस तरह से एक वैश्विक स्तर के संस्थान के रूप में विकसित किया जा रहा है, वह भारत की “नॉलेज पावर” बनने की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। 2029 तक 35 हजार छात्रों का अध्ययन, 100 प्रतिशत प्लेसमेंट, सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय समझौते और दर्जनों पेटेंट—ये आंकड़े बताते हैं कि फोरेंसिक साइंस अब एक सीमित विशेषज्ञता नहीं, बल्कि उभरता हुआ मेनस्ट्रीम करियर विकल्प है।
हालांकि, इस पूरी योजना की असली कसौटी ज़मीन पर इसके क्रियान्वयन में होगी। इमारतें और लैब्स बना देना पर्याप्त नहीं है। ज़रूरत है स्वतंत्र, पेशेवर और राजनीतिक दबाव से मुक्त फोरेंसिक संस्थानों की, जिनकी रिपोर्ट्स पर अदालतें बिना संदेह भरोसा कर सकें। साथ ही, राज्यों के पुलिस तंत्र और अभियोजन व्यवस्था को भी फोरेंसिक साक्ष्यों की सही समझ और उपयोग के लिए प्रशिक्षित करना होगा।
गृह मंत्री द्वारा घोषित “तीन साल में न्याय” का लक्ष्य तभी संभव है, जब फोरेंसिक रिपोर्ट्स समयबद्ध, विश्वसनीय और मानकीकृत हों। वरना तेज़ जांच का सपना कागज़ों तक ही सीमित रह जाएगा। फोरेंसिक ढांचे का विस्तार न्याय को तेज़ करने का साधन बन सकता है, लेकिन केवल तभी, जब गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
कुल मिलाकर, फोरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर में यह निवेश भारत को न सिर्फ एक सशक्त न्याय प्रणाली की ओर ले जा सकता है, बल्कि देश को वैश्विक फोरेंसिक हब बनाने की क्षमता भी रखता है। सवाल अब यह नहीं है कि क्या यह ज़रूरी था, बल्कि यह है कि क्या हम इस मौके का सही और ईमानदार इस्तेमाल कर पाएंगे।
दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लगातार तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इसी दौरान एक शब्द बार-बार सुनाई देता है—AI Agent। कई लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन तकनीक को नज़दीक से समझने वालों में भी अभी तक इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं है। ऐसे ही पाठकों के लिए यह एक्सप्लेनर तैयार है, जिसमें हम आसान भाषा में समझेंगे कि AI एजेंट क्या होते हैं, यह कैसे काम करते हैं और इसके कितने प्रकार हैं।
AI एजेंट क्या हैं?
AI एजेंट ऐसे सॉफ्टवेयर सिस्टम होते हैं जो किसी तय लक्ष्य या टास्क को यूज़र के निर्देश पर ऑटोमेट तरीके से पूरा करते हैं। इनमें सोचने, प्लान बनाने, डेटा समझने और अपने अनुभव से सीखने की क्षमता होती है।
ये अपने डिजिटल या वास्तविक वातावरण से जानकारी जुटाकर खुद निर्णय लेते हैं और लक्ष्य तक पहुंचने की प्रक्रिया खुद तय करते हैं। कुछ एजेंट कंप्यूटर पर टिकट बुकिंग या ग्रॉसरी ऑर्डर करने जैसे काम संभालते हैं, जबकि कई रोबोट, ड्रोन और सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों के रूप में वास्तविक दुनिया में भी मौजूद हैं।
AI एजेंट्स के मुख्य फीचर्स
1. रीजनिंग (Reasoning)
AI एजेंट उपलब्ध जानकारी का विश्लेषण कर समस्या हल करते हैं। ये पैटर्न पहचानते हैं और सबूत-आधारित निर्णय लेते हैं।
2. एक्शन लेना (Acting)
निर्णय लेने के बाद एजेंट जरूरी कदम उठाते हैं—जैसे मैसेज भेजना, फाइल अपलोड करना या कोई प्रक्रिया शुरू करना।
3. ऑब्ज़र्व करना (Observing)
एजेंट अपने आसपास के माहौल से डेटा जुटाते हैं। इसके लिए वे कंप्यूटर विज़न, सेंसर, और नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग का उपयोग कर सकते हैं।
4. प्लानिंग (Planning)
ये अपने लक्ष्य के हिसाब से काम को छोटे-छोटे चरणों में बांटकर रणनीति बनाते हैं। चुनौतियों की पहचान कर उनका समाधान भी ढूंढते हैं।
5. सहयोग (Collaborating)
एजेंट अन्य एजेंट्स, मशीनों और इंसानों के साथ मिलकर किसी बड़े काम को पूरा कर सकते हैं। इसमें सही कम्युनिकेशन और एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझना जरूरी होता है।
6. सेल्फ-रिफाइनिंग (Self-Refining)
ये लगातार अनुभव से सीखते रहते हैं और फीडबैक के आधार पर अपने प्रदर्शन में सुधार करते हैं। समय के साथ इनकी कार्यक्षमता बढ़ती जाती है।
AI एजेंट कैसे काम करते हैं?
AI एजेंट किसी भी टास्क को ऑटोमेट और सरल बनाने के लिए एक तय वर्कफ़्लो पर काम करते हैं:
यूज़र के दिए गए गोल को समझना
एजेंट लक्ष्य या निर्देश को इंटरप्रेट करता है।
टास्क को प्लान करना
लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कदम तय किए जाते हैं।
काम को छोटे हिस्सों में बांटना
ताकि प्रक्रिया तेज़ और प्रभावी हो सके।
डेटा जुटाना
एजेंट अपने ट्रेनिंग मॉडल और इंटरनेट—दोनों से जानकारी ले सकता है। कई मामलों में यह अन्य एजेंट्स या मशीन लर्निंग मॉडल्स से भी इंटरेक्ट करता है।
एक्शन लेना और लक्ष्य पूरा करना
सभी जरूरी कदम उठाकर एजेंट टास्क पूरा करता है और यूज़र को आउटपुट देता है।
AI एजेंट्स के प्रकार
1. Simple Reflex Agents
ये पहले से तय नियमों पर काम करते हैं और केवल सरल काम कर सकते हैं।
2. Model-Based Reflex Agents
इनके पास बेहतर निर्णय क्षमता होती है। यह परिस्थिति समझकर डिसीजन लेते हैं, सिर्फ तय नियमों पर नहीं चलते।
3. Goal-Based Agents
इनमें मजबूत रीजनिंग होती है। कई विकल्पों की तुलना कर सबसे बेहतर तरीका अपनाते हैं। रोबोटिक्स जैसे जटिल कामों में इनका खूब इस्तेमाल होता है।
4. Utility-Based Agents
ये अलग-अलग स्थितियों का विश्लेषण कर वह आउटपुट देते हैं जो यूज़र के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद हो। ये अधिक उन्नत एल्गोरिद्म पर काम करते हैं।
AI एजेंट्स के फायदे
उत्पादकता बढ़ाते हैं:
ये एक ही समय में कई काम कर सकते हैं और रिपीट होने वाले टास्क ऑटोमेट कर देते हैं।
बेहतर निर्णय क्षमता:
एजेंट आपस में विचार कर, तुलना कर और सीखते हुए बेहतर निर्णय लेते हैं।
कठिन परिस्थितियों में मदद:
ये जटिल और वास्तविक जीवन की समस्याओं को भी संभाल सकते हैं। साथ ही लगातार सीखकर खुद को बेहतर बनाते रहते हैं।
AI चैटबॉट और AI एजेंट में अंतर
कई लोग दोनों को एक जैसा समझ लेते हैं, जबकि दोनों का काम बिल्कुल अलग है।
चैटबॉट केवल बातचीत करता है और सवालों के जवाब देता है। AI एजेंट बातचीत के साथ-साथ टास्क पूरा कर सकता है और खुद एक्शन ले सकता है।
उदाहरण के लिए, चैटबॉट मौसम बताएगा, जबकि AI एजेंट मौसम देखकर आपका दिन का शेड्यूल तैयार कर सकता है। अगर उसे कोई गोल दे दिया जाए, तो वह बिना लगातार इंस्ट्रक्शन के खुद काम करता रहता है।
साल 2009 में जब सिल्वर स्क्रीन पर आमिर खान, आर. माधवन और शरमन जोशी की तिकड़ी उतरी, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह फिल्म भारतीय शिक्षा व्यवस्था (Indian Education System) के लिए एक 'कल्ट क्लासिक' बन जाएगी। राजकुमार हिरानी द्वारा निर्देशित “3 इडियट्स” केवल एक मनोरंजक बॉलीवुड मसाला फिल्म नहीं है, बल्कि यह करोड़ों छात्रों की दबी हुई आवाज़, उनके सपनों और संघर्षों का एक आईना है।
आज, जब बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी इम्तिहानों (Competitive Exams) का दबाव अपने चरम पर है, यह फिल्म हमें फिर से कुछ ठहर कर सोचने पर मजबूर करती है। यह फिल्म फिर से प्रासंगिक हो जाती है। सवाल यह नहीं कि हमने फिल्म देखी या नहीं, बल्कि यह है कि हमने उससे क्या सीखा।
1. रट्टू तोता नहीं, ज्ञान के साधक बनें
फिल्म का सबसे सशक्त संदेश हमारी 'रटने की संस्कृति' (Rote Learning) पर सीधा प्रहार है। फिल्म का किरदार 'चतुर रामलिंगम' इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे बिना समझे रटने से आप परीक्षा में अच्छे अंक तो ला सकते हैं, लेकिन जीवन में हंसी का पात्र बन सकते हैं।
आज के छात्रों के लिए सबक:
अवधारणा (Concept) ही राजा है: परीक्षाओं में रटे हुए उत्तर भूल सकते हैं, लेकिन समझी हुई बात जीवन भर याद रहती है।
डिग्री बनाम ज्ञान: शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि अपने दिमाग को विकसित करना होना चाहिए। आज के दौर में गूगल के पास सारे जवाब हैं, लेकिन उन जवाबों का उपयोग कैसे करना है, यह 'समझ' आपको ही विकसित करनी होगी।
2. पैशन बनाम प्रेशर: दिल की सुनें या दुनिया की?
फिल्म में फरहान कुरैशी का किरदार उन लाखों युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो फोटोग्राफर, लेखक या कलाकार बनना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक दबाव में इंजीनियरिंग या मेडिकल की किताबें चाट रहे हैं। 'रैंचो' का सिद्धांत बहुत साफ है—काम वो करो जिसमें मज़ा आए, तो काम, काम नहीं खेल लगेगा।
करियर का चुनाव कैसे करें?
माता-पिता का सम्मान ज़रूरी है, लेकिन अपनी ज़िंदगी के फैसलों की डोर अपने हाथ में रखना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
जब आप अपने जूनून (Passion) को अपना पेशा (Profession) बनाते हैं, तो 'मंडे ब्लूज़' जैसी चीज़ें मायने नहीं रखतीं।
3. मार्कशीट नहीं, कौशल (Skills) आपकी पहचान है
क्या 99% लाने वाला छात्र ही सफल है और 60% वाला असफल? फिल्म इस मिथक को पूरी तरह तोड़ती है। असली दुनिया में आपकी मार्कशीट से ज़्यादा आपकी समस्या सुलझाने की क्षमता (Problem Solving Skills) और रचनात्मकता (Creativity) काम आती है।
बाज़ार की हकीकत: आज बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs) डिग्री से ज़्यादा हुनर को तरजीह दे रही हैं। रैंचो टॉपर न होकर भी सबसे बड़ा वैज्ञानिक बनता है क्योंकि वह जिज्ञासु (Curious) था, केवल किताबी कीड़ा नहीं।
4. मानसिक स्वास्थ्य: 'ऑल इज़ वेल' का मनोविज्ञान
फिल्म का सबसे भावुक और गंभीर पहलू 'जॉय लोबो' का प्रसंग है। यह हमें याद दिलाता है कि एक छात्र का जीवन किसी भी प्रोजेक्ट या डेडलाइन से ज़्यादा कीमती है। "ऑल इज़ वेल" केवल एक तकियाकलाम नहीं, बल्कि विपत्ति के समय खुद को सांत्वना देने का एक मनोवैज्ञानिक मंत्र है।
जरूरी संदेश:
असफलता अंत नहीं, बल्कि एक 'बेंड' (मोड़) है।
डिप्रेशन या तनाव को छुपाएं नहीं। मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत की निशानी है।
5. सफलता का असली सूत्र: एक्सीलेंस (Excellence)
फिल्म के अंत में बाबा रणछोड़दास का यह संवाद आज भी गूंजता है: “कामयाबी के पीछे मत भागो, काबिल बनो... कामयाबी झक मार के पीछे आएगी।” आज के दौर में छात्र शॉर्टकट्स और तुरंत सफलता (Instant Success) के पीछे भाग रहे हैं, जबकि फिल्म सिखाती है कि खुद को इतना बेहतर बना लो कि सफलता आपके पास आने को मजबूर हो जाए।
क्या आ रहा है “3 इडियट्स” का सीक्वल?
फिल्म की रिलीज के 14 साल बाद भी दर्शकों के मन में एक ही सवाल है—क्या रैंचो, फरहान और राजू की तिगड़ी वापस आएगी? हाल ही में इस फिल्म के सीक्वल को लेकर काफी चर्चा और उत्साह (Buzz) देखने को मिला है।
शूटिंग और स्क्रिप्ट पर क्या है खबर?
सोशल मीडिया पर अक्सर फिल्म की शूटिंग की तस्वीरें वायरल होती रहती हैं, लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग है।
करीना कपूर का वीडियो: पिछले साल करीना कपूर खान ने एक वीडियो शेयर किया था जिसमें आमिर, माधवन और शरमन एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते दिखे थे। इससे सीक्वल की अफवाहें उड़ीं, लेकिन बाद में पता चला कि यह एक ब्रांड (Dream11) के प्रचार के लिए था।
राजकुमार हिरानी का बयान: हालांकि, फैंस को निराश होने की ज़रूरत नहीं है। निर्देशक राजकुमार हिरानी ने हाल ही में एक इंटरव्यू में पुष्टि की है कि वह सीक्वल की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "मेरे पास एक 'बीज' (Idea) है जिस पर हम काम कर रहे हैं, लेकिन यह अभी शुरुआती चरण में है।"
लेखक अभिजात जोशी की भूमिका: फिल्म के लेखक अभिजात जोशी भी इस कहानी को आगे बढ़ाने के लिए नए एंगल तलाश रहे हैं।
क्या हो सकती है कहानी?
कयास लगाए जा रहे हैं कि सीक्वल में इन दोस्तों की आगे की ज़िंदगी दिखाई जाएगी। क्या रैंचो का स्कूल सफल हुआ? क्या वायरस (वीरू सहस्त्रबुद्धे) बदल गए? और सबसे बड़ा सवाल—अगली पीढ़ी के लिए शिक्षा की चुनौतियां क्या हैं?
फिलहाल फिल्म की 'आधिकारिक शूटिंग' (Official Shooting) शुरू नहीं हुई है, लेकिन प्री-प्रोडक्शन और स्क्रिप्टिंग के स्तर पर हलचल तेज़ है। जैसे ही स्क्रिप्ट फाइनल होगी, हम उम्मीद कर सकते हैं कि यह जादुई टीम फिर से सेट पर होगी।
“3 इडियट्स” केवल ढाई घंटे का मनोरंजन नहीं है। यह एक रिमाइंडर है कि जीवन रेस नहीं है। अगर आप छात्र हैं, तो अपनी जिज्ञासा को मरने न दें। अगर आप अभिभावक हैं, तो अपने बच्चों को उड़ने दें।
अंत में, चाहे एग्जाम का रिजल्ट कुछ भी हो, दिल पर हाथ रखिए और कहिए— “ऑल इज़ वेल!”
भारत की जेन-जी पीढ़ी के लिए यात्रा का मतलब अब सिर्फ घूमना या छुट्टियां मनाना नहीं रह गया है। 18 से 28 वर्ष के युवा अब अपनी ट्रैवल प्लानिंग पसंदीदा कलाकारों के कॉन्सर्ट के हिसाब से कर रहे हैं। इसी बदलते व्यवहार से एक नया ट्रेंड सामने आया है, जिसे ‘गिग ट्रिपिंग’ कहा जा रहा है—यानी कॉन्सर्ट देखने के लिए शहर या देश बदलकर यात्रा करना।
ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि संगीत अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नई जगहों को जानने और अनुभव करने का जरिया बन गया है। एयरबीएनबी और यूगोव की संयुक्त रिसर्च के अनुसार, 71 फीसदी भारतीय युवाओं ने पहली बार किसी शहर की यात्रा सिर्फ इसलिए की क्योंकि वहां उनके पसंदीदा कलाकार का कॉन्सर्ट हो रहा था। इससे साफ है कि म्यूजिक इवेंट्स अब युवा पर्यटन की दिशा तय कर रहे हैं।
कॉन्सर्ट की तारीख से बन रही ट्रैवल प्लानिंग
रिपोर्ट के मुताबिक, 36 फीसदी युवा कॉन्सर्ट की घोषणा होते ही अपनी यात्रा की योजना बनाना शुरू कर देते हैं। ट्रेन या फ्लाइट टिकट से लेकर होटल बुकिंग तक, सब कुछ कॉन्सर्ट की तारीख के आसपास तय किया जाता है। यही नहीं, 62 फीसदी युवाओं ने कहा है कि वे साल 2026 में म्यूजिक-बेस्ड ट्रिप पर जाने की योजना बना रहे हैं।
यह ट्रेंड बताता है कि जेन-जी के लिए कॉन्सर्ट अब एक रात का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे ट्रैवल एक्सपीरियंस का केंद्र बन चुका है।
अनुभव के लिए खुलकर खर्च कर रहे युवा
गिग ट्रिपिंग में युवा केवल टिकट पर ही नहीं, बल्कि पूरे अनुभव पर खर्च कर रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, एक कॉन्सर्ट ट्रिप पर औसतन 51 हजार रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं। इसमें यात्रा, ठहरने, खाने-पीने और स्थानीय घूमने का खर्च शामिल होता है।
सामूहिक यात्रा इस ट्रेंड का अहम हिस्सा है। करीब 70 फीसदी युवा दोस्तों या ग्रुप के साथ कॉन्सर्ट ट्रिप पर जाना पसंद करते हैं, ताकि यह अनुभव यादगार बन सके।
पसंदीदा कलाकार के लिए विदेश यात्रा भी
गिग ट्रिपिंग अब देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में सामने आया है कि 40 फीसदी भारतीय युवा अपने पसंदीदा बैंड या कलाकार को लाइव देखने के लिए विदेश तक यात्रा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय म्यूजिक फेस्टिवल और ग्लोबल टूर अब भारतीय युवाओं को भी बड़े पैमाने पर आकर्षित कर रहे हैं।
यह बदलाव युवाओं की बढ़ती वैश्विक सोच, बेहतर कनेक्टिविटी और अनुभव-केंद्रित जीवनशैली को दर्शाता है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिल रही नई रफ्तार
विशेषज्ञों का मानना है कि गिग ट्रिपिंग का असर केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है। कॉन्सर्ट के चलते होटल, होमस्टे, कैफे, टैक्सी सेवाएं, छोटे दुकानदार और लोकल बिज़नेस को सीधा फायदा मिल रहा है। जिन शहरों में बड़े म्यूजिक इवेंट्स होते हैं, वहां अल्पकालिक पर्यटन में तेज़ उछाल देखा जा रहा है।
स्थानीय समुदायों के लिए यह ट्रेंड नई ऊर्जा और सांस्कृतिक संवाद लेकर आ रहा है, खासकर उन शहरों में जो अब तक पारंपरिक पर्यटन मानचित्र पर नहीं थे।
बदलते पर्यटन की नई पहचान
गिग ट्रिपिंग इस बात का संकेत है कि भारतीय युवाओं की यात्रा की परिभाषा बदल रही है। अब लोग सिर्फ जगह देखने नहीं, बल्कि अनुभव जीने के लिए सफर कर रहे हैं। संगीत, भावनाओं और साझा यादों के साथ जुड़ी यह यात्रा जेन-जी की सोच को पूरी तरह प्रतिबिंबित करती है।
आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे भारत और दुनिया में लाइव म्यूजिक इवेंट्स बढ़ेंगे, गिग ट्रिपिंग भारतीय पर्यटन का एक अहम चेहरा बन सकती है—जहां ट्रैवल प्लान की शुरुआत नक्शे से नहीं, बल्कि प्लेलिस्ट से होगी।
Gig Tripping: When Music Becomes the New Reason for Travel
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क्यों महत्वपूर्ण हैं शिक्षा जगत की खबरें?
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मीडिया-शिक्षा की भूमिका
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