संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज (CDS 1 Exam 2025) के लिए प्रवेश पत्र जारी कर दिए हैं। यह एडमिट कार्ड अब आधिकारिक वेबसाइट upsc.gov.in पर उपलब्ध हैं। जिन अभ्यर्थियों ने इस परीक्षा के लिए आवेदन किया है, उन्हें सलाह दी जाती है कि वे पोर्टल पर जाकर अपना एडमिट कार्ड डाउनलोड कर लें और उसका प्रिंटआउट भी ले लें।
सीडीएस 1 एडमिट कार्ड में क्या होगा?
एडमिट कार्ड में उम्मीदवारों के नाम, रोल नंबर, माता-पिता का नाम, परीक्षा केंद्र, परीक्षा शहर, टाइम टेबल और परीक्षा दिन के निर्देश सहित अन्य महत्वपूर्ण जानकारी होगी।
एडमिट कार्ड डाउनलोड करने की प्रक्रिया
सीडीएस 1 एडमिट कार्ड डाउनलोड करने के लिए अभ्यर्थियों को निम्नलिखित आसान स्टेप्स को फॉलो करना होगा:
- सबसे पहले अभ्यर्थियों को upsconline.gov.in वेबसाइट पर जाना होगा।
- होमपेज पर मौजूद 'एडमिट कार्ड' लिंक पर क्लिक करें।
- अब, एक नया पेज खुलेगा, जिसमें 'यूपीएससी सीडीएस 1 एडमिट कार्ड 2025 डाउनलोड लिंक पर क्लिक करें।
- स्क्रीन पर दिखाई दे रहे निर्देशों को ध्यान से पढ़ें।
- पंजीकरण संख्या या रोल नंबर दर्ज करें और आवश्यक विवरण भरें।
- अब सीडीएस 2025 एडमिट कार्ड डाउनलोड करें और उसमें सभी विवरणों की जांच करें।
- भविष्य के संदर्भ के लिए इसका प्रिंटआउट लें और उसे सुरक्षित रखें।
यूपीएससी सीडीएस 1 परीक्षा 2025 13 का आयोजन अप्रैल, 2025 को किया जाएगा। यूपीएससी सीडीएस 2 परीक्षा 14 सितंबर को कराई जाएगी। यूपीएससी सीडीएस 1 2025 परीक्षा तीन पालियों में आयोजित की जाएगी। पहली शिफ्ट सुबह 9 से 11 बजे तक और दूसरी पाली दोपहर 12:30 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक और तीसरी पाली शाम 4 बजे से शाम 6 बजे तक होगी। इसके अलावा, एनएडीए, एनए परीक्षा भी 13 अप्रैल, 2025 को ही की जाएगी। परीक्षा से जुड़ी ज्यादा जानकारी के लिए अभ्यर्थियों को वेबसाइट पर विजिट करना होगा।
सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन) ने आगामी एकेडमिक सेशन 2025-26 के लिए सिलेबस अपडेट जारी कर दिया है, और इसके साथ कई महत्वपूर्ण बदलावों की घोषणा की है। जहां एक ओर सीबीएसई बोर्ड 2024 के बोर्ड एग्जाम के रिजल्ट की घोषणा करने की तैयारी कर रहा है, वहीं नए एकेडमिक सेशन के लिए बोर्ड ने कई नए कदम उठाए हैं। इन बदलावों में नए टीचिंग मेथड, ग्रेडिंग सिस्टम और प्रैक्टिकल लर्निंग पर विशेष ध्यान दिया गया है।
कक्षा 10वीं के लिए साल में दो बार बोर्ड एग्जाम
अब कक्षा 10वीं के छात्रों को साल में दो बार बोर्ड एग्जाम देने का अवसर मिलेगा। पहला एग्जाम फरवरी में और दूसरा एग्जाम अप्रैल में आयोजित होगा। इसका मतलब यह है कि अगर छात्र मार्च में होने वाली परीक्षा में असफल हो जाते हैं, तो उन्हें एक और मौका मिलेगा अपनी गलतियों को सुधारने का, और उन्हें अगले दो महीने तक इंतजार करने की आवश्यकता नहीं होगी। हालांकि, कक्षा 12वीं के छात्रों के लिए पहले की तरह एक ही एग्जाम होगा।
नया ग्रेडिंग सिस्टम और 9-पॉइंट स्केल
सीबीएसई ने ग्रेडिंग सिस्टम को भी बदल दिया है और अब 9-पॉइंट स्केल लागू किया गया है। यह नया ग्रेडिंग सिस्टम कक्षा 10वीं और कक्षा 12वीं के परिणामों पर लागू होगा। अब A1, A2, B1 जैसे पुराने ग्रेडिंग सिस्टम का विकल्प समाप्त कर दिया गया है, और छात्रों को 9 पॉइंट स्केल के आधार पर ग्रेड दिए जाएंगे। पास होने वाले छात्रों में से हर आठवें छात्र को एक ग्रेड स्लॉट मिलेगा।
स्किल बेस्ड एजुकेशन पर जोर
सीबीएसई अब कक्षा 10वीं के छात्रों के लिए इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, कंप्यूटर एप्लीकेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे स्किल बेस्ड सब्जेक्ट पर अधिक ध्यान दे रहा है। इसके साथ ही, कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्रों के लिए अब अंग्रेजी या हिंदी में से किसी एक भाषा को चुनना अनिवार्य कर दिया गया है।
वहीं, कक्षा 12वीं के लिए बोर्ड ने 4 नए स्किल इलेक्टिव्स को शामिल किया है, जिनमें लैंड ट्रांसपोर्टेशन एसोसिएट, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड हार्डवेयर, फिजिकल एक्विटी ट्रेनर और डिजाइन थिंकिंग एंड इनोवेशन शामिल हैं। इसके अलावा, 12वीं के बोर्ड एग्जाम में अब छात्रों को बेसिक कैलकुलेटर इस्तेमाल करने की अनुमति दी जाएगी।
कक्षा 10वीं के लिए पासिंग क्राइटेरिया
कक्षा 10वीं के बोर्ड एग्जाम पास करने के लिए छात्रों को पुराने 33% अंक लाने होंगे। अगर कोई छात्र किसी विषय में फेल होता है, तो उसे स्किल बेस्ड या ऑप्शनल लैंग्वेज सब्जेक्ट के अंक मिल सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी छात्र ने मैथ्स में फेल किया, तो उसे स्किल बेस्ड सब्जेक्ट से प्राप्त अंक मैथ्स के अंक के स्थान पर लिए जा सकते हैं।
इस प्रकार, सीबीएसई बोर्ड ने अपनी शिक्षा प्रणाली में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं, जो छात्रों के लिए अधिक अवसर और लचीलापन प्रदान करेंगे।
हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ (UoHSU) ने आज तेलंगाना सरकार द्वारा विश्वविद्यालय के पास स्थित 400 एकड़ भूमि पर आईटी पार्क विकसित करने की योजना के खिलाफ क्रमिक भूख हड़ताल शुरू कर दी। छात्र संघ ने इस भूमि पर पेड़ों की कटाई और बुलडोजरों के उपयोग को रोकने की मांग की है, साथ ही भूमि पर चल रहे निर्माण कार्य को तत्काल बंद करने की अपील की है।
भूख हड़ताल और कक्षाओं का बहिष्कार
यह भूख हड़ताल विश्वविद्यालय के मुख्य गेट पर शुरू हुई, जिसमें छात्र संघ के उपाध्यक्ष आकाश कुमार ने कहा कि उनका उद्देश्य पेड़ों की कटाई को रोकना और पुलिस बल को विश्वविद्यालय परिसर से हटाना है। इसके साथ ही, छात्रों ने कक्षाओं का स्वैच्छिक बहिष्कार भी जारी रखा है।
अनिश्चितकालीन विरोध और केंद्रीय मंत्री से मुलाकात
हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ और अन्य छात्र संगठन, जो 1 अप्रैल से अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से भी मुलाकात की। उन्होंने मंत्रालय से हस्तक्षेप की मांग की और इस भूमि पर कथित अवैध कब्जे को लेकर कार्रवाई की मांग की।
पुलिस गिरफ्तारी और विरोध
इस बीच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जब वे विश्वविद्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का प्रयास कर रहे थे। एबीवीपी ने तेलंगाना सरकार से मांग की है कि वह 400 एकड़ भूमि की नीलामी के निर्णय को वापस ले।
पर्यावरणीय चिंताएं और विरोध
छात्र समूहों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस प्रस्तावित विकास कार्य का विरोध किया है, क्योंकि इससे पारिस्थितिकीय संरक्षण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का खतरा है। उन्होंने भूमि पर किसी भी तरह के निर्माण को रोकने की अपील की है।
सरकार और न्यायालय की प्रतिक्रिया
तेलंगाना राज्य के BRS कार्यकारी अध्यक्ष के. टी. रामाराव ने गुरुवार को कहा कि जब उनकी पार्टी सत्ता में आएगी, तो 400 एकड़ भूमि पर एक विशाल इको पार्क स्थापित किया जाएगा, जिससे हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों और शहरवासियों को लाभ होगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी सत्ता में आने पर भूमि की नीलामी पर कोई खरीदार नहीं मिलेगा, क्योंकि पार्टी इसे वापस लेगी।
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने बुधवार को राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह UoH के पास स्थित 400 एकड़ भूमि पर सभी निर्माण कार्य एक दिन के लिए रोक दे। इसके साथ ही, नागरिक समाज के नेताओं ने राज्य सरकार द्वारा कांची गचिबोवली "शहरी वन" की तबाही की कड़ी निंदा की और भूमि पर नीलामी को रद्द करने की मांग की।
सुरक्षा और कानूनी अधिकार की मांग
मानवाधिकार कार्यकर्ता और UoH के पूर्व प्रोफेसर जी हरगोपाल, UoH के पूर्व डीन डी नरसिम्हा रेड्डी और सामाजिक कार्यकर्ता किरणकुमार विसा सहित अन्य लोगों ने कांची गचिबोवली "जैव विविधता हॉटस्पॉट" की पूरी सुरक्षा और विश्वविद्यालय को कानूनी अधिकार सौंपने की मांग की और कहा कि भूमि की नीलामी नहीं होनी चाहिए।
अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश ने यूपी जीएनएम प्रवेश परीक्षा 2025 की अधिसूचना जारी कर दी है। इसके साथ ही पंजीकरण प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। इच्छुक उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट abvmuup.edu.in पर जाकर अपना आवेदन पत्र भरकर जमा कर सकते हैं।
पंजीकरण प्रक्रिया
यूपी जीएनएम प्रवेश परीक्षा (UPGET 2025) के लिए पंजीकरण प्रक्रिया 2 अप्रैल 2025 से शुरू हो गई है। आवेदन की अंतिम तिथि 14 मई, 2025 (रात्रि 11:59 बजे तक) है। उम्मीदवार 7 मई से 14 मई (रात्रि 11:59 बजे तक) तक अपने आवेदन पत्र में संशोधन कर सकेंगे।
परीक्षा विवरण
यूपी जीएनएम प्रवेश परीक्षा 2025 का आयोजन 11 जून को किया जाएगा। इस परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र 4 जून, 2025 को जारी किए जाएंगे। परीक्षा का समय सुबह 11 बजे से दोपहर 1:20 बजे तक रहेगा, और यह 140 मिनट की अवधि की होगी। परीक्षा कुल 100 अंकों की होगी, जिसमें कोई नेगेटिव मार्किंग नहीं होगी।
पात्रता मानदंड
यूपी जीएनएम प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को निम्नलिखित योग्यताएँ पूरी करनी चाहिए:
- उम्मीदवार को अंग्रेजी विषय के साथ 10+2 उत्तीर्ण होना चाहिए।
- किसी भी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 40% अंकों के साथ 10+2 में योग्यता परीक्षा उत्तीर्ण होना चाहिए।
- उम्मीदवार का 10+2 में अंग्रेजी विषय में व्यक्तिगत रूप से उत्तीर्ण होना आवश्यक है।
- यदि उम्मीदवार ने एएनएम पाठ्यक्रम पूरा किया है, तो 40% अंकों के साथ किसी मान्यता प्राप्त विद्यालय से एएनएम पाठ्यक्रम की डिग्री प्राप्त होनी चाहिए।
- उम्मीदवार की आयु 31 दिसंबर, 2025 तक न्यूनतम 17 वर्ष होनी चाहिए।
आवेदन शुल्क
- अनारक्षित/ओबीसी श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क ₹3000।
- एससी/एसटी/पीडब्ल्यूडी श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क ₹2000।
जीएनएम कोर्स की जानकारी
जीएनएम (जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी) एक 3 साल का डिप्लोमा प्रोग्राम है, जो छात्रों को नर्सिंग के विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित करने का उद्देश्य रखता है। इस कोर्स में पुनर्वास, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, मातृत्व देखभाल, पोस्ट-ट्रॉमा देखभाल आदि शामिल हैं। इसके अलावा, इस कोर्स में एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, सामुदायिक स्वास्थ्य नर्सिंग जैसे प्रमुख विषय भी पढ़ाए जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में 25,000 शिक्षकों और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की भर्ती को रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और सरकारी तथा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,753 कर्मचारियों की नियुक्तियों को अमान्य करार देते हुए चयन प्रक्रिया को दूषित और दागी बताया।
कलकत्ता हाईकोर्ट का निर्णय
कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2016 में एसएससी द्वारा राज्य द्वारा संचालित और राज्य द्वारा सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए 25,000 से अधिक शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने की, ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई वैध आधार या कारण नहीं मिला।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जिन कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द की गई हैं, उन्हें अपना वेतन और अन्य भत्ते लौटाने की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, राज्य सरकार को नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया गया है, जिसे तीन महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश भी दिया गया। हालांकि, विकलांग कर्मचारियों को मानवीय आधार पर छूट दी गई और उन्हें अपनी नौकरी में बने रहने की अनुमति दी गई।
सीबीआई जांच पर सुनवाई
पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर भी सुनवाई की, जिसमें सीबीआई जांच के उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस मामले की सुनवाई 4 अप्रैल को तय की गई है।
एसएससी भर्ती मामला
यह मुकदमा पश्चिम बंगाल एसएससी भर्ती मामले के रूप में प्रसिद्ध है, जो राज्य के स्कूल सेवा आयोग द्वारा 25,000 शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती से संबंधित है, जिसे कलकत्ता उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। राज्य ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जबकि कई प्रभावित उम्मीदवारों ने अपनी नियुक्तियों को रद्द करने को चुनौती दी थी।
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने 7, 8 और 9 अप्रैल को होने वाली संयुक्त प्रवेश परीक्षा मुख्य (JEE Main 2025) सत्र 2 परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र जारी कर दिए हैं। इससे पहले, 29 मार्च को एजेंसी ने 2, 3 और 4 अप्रैल के लिए निर्धारित परीक्षाओं के प्रवेश पत्र जारी किए थे। जिन उम्मीदवारों ने इस परीक्षा के लिए आवेदन किया है, वे आधिकारिक वेबसाइट jeemain.nta.nic.in पर जाकर एडमिट कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं।
परीक्षा शेड्यूल
जेईई मेन सत्र 2 परीक्षा 2 अप्रैल से शुरू हो रही है, और अंतिम परीक्षा 9 अप्रैल 2025 को होगी। परीक्षा 2, 3, 4, और 7 अप्रैल को दो शिफ्टों में पेपर 1 (बीई, बीटेक) के लिए होगी। वहीं, 8 अप्रैल को पेपर 1 एक ही शिफ्ट में दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक आयोजित होगा। 9 अप्रैल को पेपर-2 के लिए केवल पहली शिफ्ट में सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक परीक्षा होगी।
जेईई मेन एडमिट कार्ड में दिए गए विवरण
जेईई मेन एडमिट कार्ड 2025 में उम्मीदवार का नाम, पिता का नाम, जन्म तिथि, लिंग, वर्ग, पात्रता की स्थिति, जेईई मेन रोल नंबर, वह पेपर जिसमें उम्मीदवार उपस्थित होगा, जेईई मेन 2025 आवेदन पत्र संख्या, जेईई मेन 2025 के लिए आवंटित परीक्षा केंद्र, आबंटित तिथि और समय, उम्मीदवार के हस्ताक्षर और फोटो, उम्मीदवार के माता-पिता के हस्ताक्षर आदि विवरण देखे जा सकते हैं।
यदि एडमिट कार्ड पर उम्मीदवार के विवरण, फोटो या हस्ताक्षर में कोई विसंगति हो, तो उन्हें तुरंत एनटीए हेल्पलाइन 011-40759000 पर सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच संपर्क करना चाहिए।
परीक्षा केंद्र में प्रवेश प्रक्रिया
परीक्षा केंद्र में प्रवेश के दौरान तलाशी, बायोमेट्रिक पंजीकरण, निरीक्षक द्वारा मैन्युअल उपस्थिति, दस्तावेज सत्यापन, प्रवेश पत्र और फोटो मिलान की प्रक्रिया की जाएगी। यह प्रक्रिया सुबह के सत्र के लिए सुबह 7 बजे से 8:30 बजे तक और दोपहर के सत्र के लिए दोपहर 1 बजे से 2:30 बजे तक होगी।
जेईई मेन एडमिट कार्ड कैसे डाउनलोड करें?
- जेईई मेन की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।
- जेईई मेन 2025 एडमिट कार्ड डाउनलोड लिंक पर क्लिक करें।
- आपको एडमिट कार्ड लॉगिन पेज पर पुनः निर्देशित किया जाएगा।
- अपना जेईई मेन आवेदन नंबर, पासवर्ड और कैप्चा कोड दर्ज करें, फिर सबमिट बटन पर क्लिक करें।
- जेईई मेन एडमिट कार्ड 2025 स्क्रीन पर दिखाई देगा।
- एडमिट कार्ड पर सभी विवरण सत्यापित करें और भविष्य के संदर्भ के लिए इसे डाउनलोड करें।
उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे परीक्षा से पहले अपने एडमिट कार्ड को डाउनलोड करें और सभी विवरणों को सही से जांच लें। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि एडमिट कार्ड पर सभी जानकारी सही हो ताकि परीक्षा के दिन कोई समस्या न हो।
प्रोफ़ेसर (डॉ.) संजय द्विवेदी मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में एक जानी-मानी शख्सियत हैं। वे भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) दिल्ली के महानिदेशक रह चुके हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति और कुलसचिव बतौर भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी हैं। मीडिया शिक्षक होने के साथ ही प्रो.संजय द्विवेदी ने सक्रिय पत्रकार और दैनिक अखबारों के संपादक के रूप में भी भूमिकाएं निभाई हैं। वह मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक भी हैं। 35 से ज़्यादा पुस्तकों का लेखन और संपादन भी किया है। सम्प्रति वे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभागमें प्रोफेसर हैं। मीडिया शिक्षा, मीडिया की मौजूदा स्थिति, नयी शिक्षा नीति जैसे कई अहम् मुद्दों पर एड-इनबॉक्स के लिए संपादक रईस अहमद 'लाली' ने उनसे लम्बी बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के सम्पादित अंश :
- संजय जी, प्रथम तो आपको बधाई कि वापस आप दिल्ली से अपने पुराने कार्यस्थल राजा भोज की नगरी भोपाल में आ गए हैं। यहाँ आकर कैसा लगता है आपको? मेरा ऐसा पूछने का तात्पर्य इन शहरों से इतर मीडिया शिक्षा के माहौल को लेकर इन दोनों जगहों के मिजाज़ और वातावरण को लेकर भी है।
अपना शहर हमेशा अपना होता है। अपनी जमीन की खुशबू ही अलग होती है। जिस शहर में आपने पढ़ाई की, पत्रकारिता की, जहां पढ़ाया उससे दूर जाने का दिल नहीं होता। किंतु महत्वाकांक्षाएं आपको खींच ले जाती हैं। सो दिल्ली भी चले गए। वैसे भी मैं जलावतन हूं। मेरा कोई वतन नहीं है। लेकिन मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की जमीन मुझे बांधती है। मैंने सब कुछ यहीं पाया। कहने को तो यायावर सी जिंदगी जी है। जिसमें दिल्ली भी जुड़ गया। आप को गिनाऊं तो मैंने अपनी जन्मभूमि (अयोध्या) के बाद 11 बार शहर बदले, जिनमें बस्ती, लखनऊ,वाराणसी, भोपाल, रायपुर, बिलासपुर, मुंबई, दिल्ली सब शामिल हैं। जिनमें दो बार रायपुर आया और तीसरी बार भोपाल में हूं। बशीर बद्र साहब का एक शेर है, जब मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया, तो उन्होंने कहा था-
मेरा घर जला तो
सारा जहां मेरा घर हो गया।
मैं खुद को खानाबदोश तो नहीं कहता,पर यायावर कहता हूं। अभी भी बैग तैयार है। चल दूंगा। जहां तक वातावरण की बात है, दिल्ली और भोपाल की क्या तुलना। एक राष्ट्रीय राजधानी है,दूसरी राज्य की राजधानी। मिजाज की भी क्या तुलना हम भोपाल के लोग चालाकियां सीख रहे हैं, दिल्ली वाले चालाक ही हैं। सारी नियामतें दिल्ली में बरसती हैं। इसलिए सबका मुंह दिल्ली की तरफ है। लेकिन दिल्ली या भोपाल हिंदुस्तान नहीं हैं। राजधानियां आकर्षित करती हैं , क्योंकि यहां राजपुत्र बसते हैं। हिंदुस्तान बहुत बड़ा है। उसे जानना अभी शेष है।
- भोपाल और दिल्ली में पत्रकारिता और जन संचार की पढ़ाई के माहौल में क्या फ़र्क़ महसूस किया आपने?
भारतीय जन संचार संस्थान में जब मैं रहा, वहां डिप्लोमा कोर्स चलते रहे। साल-साल भर के। उनका जोर ट्रेनिंग पर था। देश भर से प्रतिभावान विद्यार्थी वहां आते हैं, सबका पहला चयन यही संस्थान होता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय इस मायने में खास है उसने पिछले तीस सालों से स्नातक और स्नातकोत्तर के रेगुलर कोर्स चलाए और बड़ी संख्या में मीडिया वृत्तिज्ञ ( प्रोफेसनल्स) और मीडिया शिक्षक निकाले। अब आईआईएमसी भी विश्वविद्यालय भी बन गया है। सो एक नई उड़ान के लिए वे भी तैयार हैं।
- आप देश के दोनों प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थानों के अहम् पदों को सुशोभित कर चुके हैं। दोनों के बीच क्या अंतर पाया आपने ? दोनों की विशेषताएं आपकी नज़र में ?
दोनों की विशेषताएं हैं। एक तो किसी संस्था को केंद्र सरकार का समर्थन हो और वो दिल्ली में हो तो उसका दर्जा बहुत ऊंचा हो जाता है। मीडिया का केंद्र भी दिल्ली है। आईआईएमसी को उसका लाभ मिला है। वो काफी पुराना संस्थान है, बहुत शानदार एलुमूनाई है , एक समृध्द परंपरा है उसकी । एचवाई शारदा प्रसाद जैसे योग्य लोगों की कल्पना है वह। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय(एमसीयू) एक राज्य विश्वविद्यालय है, जिसे सरकार की ओर से बहुत पोषण नहीं मिला। अपने संसाधनों पर विकसित होकर उसने जो भी यात्रा की, वह बहुत खास है। कंप्यूटर शिक्षा के लोकव्यापीकरण में एमसीयू की एक खास जगह है। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आप जाएंगें तो मीडिया शिक्षकों में एमसीयू के ही पूर्व छात्र हैं, क्योंकि स्नातकोत्तर कोर्स यहीं चल रहे थे। पीएचडी यहां हो रही थी। सो दोनों की तुलना नहीं हो सकती। योगदान दोनों का बहुत महत्वपूर्ण है।
- आप लम्बे समय से मीडिया शिक्षक रहे हैं और सक्रिय पत्रकारिता भी की है आपने। व्यवहारिकता के धरातल पर मौजूदा मीडिया शिक्षा को कैसे देखते हैं ?
एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ा कर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है। जनसंचार का क्षेत्र आज शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।
मीडिया शिक्षा में सिद्धांत और व्यवहार का बहुत गहरा द्वंद है। ज्ञान-विज्ञान के एक अनुशासन के रूप में इसे अभी भी स्थापित होना शेष है। कुछ लोग ट्रेनिंग पर आमादा हैं तो कुछ किताबी ज्ञान को ही पिला देना चाहते हैं। जबकि दोनों का समन्वय जरूरी है। सिद्धांत भी जरूरी हैं। क्योंकि जहां हमने ज्ञान को छोड़ा है, वहां से आगे लेकर जाना है। शोध, अनुसंधान के बिना नया विचार कैसे आएगा। वहीं मीडिया का व्यवहारिक ज्ञान भी जरूरी है। मीडिया का क्षेत्र अब संचार शिक्षा के नाते बहुत व्यापक है। सो विशेषज्ञता की ओर जाना होगा। आप एक जीवन में सब कुछ नहीं कर सकते। एक काम अच्छे से कर लें, वह बहुत है। इसलिए भ्रम बहुत है। अच्छे शिक्षकों का अभाव है। एआई की चुनौती अलग है। चमकती हुई चीजों ने बहुत से मिथक बनाए और तोड़े हैं। सो चीजें ठहर सी गयी हैं, ऐसा मुझे लगता है।
- नयी शिक्षा निति को केंद्र सरकार नए सपनों के नए भारत के अनुरूप प्रचारित कर रही है, जबकि आलोचना करने वाले इसमें तमाम कमियां गिना रहे हैं। एक शिक्षक बतौर आप इन नीतियों को कैसा पाते हैं ?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति बहुत शानदार है। जड़ों से जोड़कर मूल्यनिष्ठा पैदा करना, पर्यावरण के प्रति प्रेम, व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना यही लक्ष्य है। किंतु क्या हम इसके लिए तैयार हैं। सवाल यही है कि अच्छी नीतियां- संसाधनों, शिक्षकों के समर्पण, प्रशासन के समर्थन की भी मांग करती हैं। हमें इसे जमीन पर उतारने के लिए बहुत तैयारी चाहिए। भारत दिल्ली में न बसता है, न चलता है। इसलिए जमीनी हकीकतों पर ध्यान देने की जरूरत है। शिक्षा हमारे ‘तंत्र’ की कितनी बड़ा प्राथमिकता है, इस पर भी सोचिए। सच्चाई यही है कि मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग ने भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से हटा लिया है। वे सरकारी संस्थानों से कोई उम्मीद नहीं रखते। इस विश्वास बहाली के लिए सरकारी संस्थानों के शिक्षकों, प्रबंधकों और सरकारी तंत्र को बहुत गंभीर होने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश के ताकतवर मुख्यमंत्री प्राथमिक शिक्षकों की विद्यालयों में उपस्थिति को लेकर एक आदेश लाते हैं, शिक्षक उसे वापस करवा कर दम लेते हैं। यही सच्चाई है।
- पत्रकारिता में करियर बनाने के लिए क्या आवश्यक शर्त है ?
पत्रकारिता, मीडिया या संचार तीनों क्षेत्रों में बनने वाली नौकरियों की पहली शर्त तो भाषा ही है। हम बोलकर, लिखकर भाषा में ही खुद को व्यक्त करते हैं। इसलिए भाषा पहली जरूरत है। तकनीक बदलती रहती है, सीखी जा सकती है। किंतु भाषा संस्कार से आती है। अभ्यास से आती है। पढ़ना, लिखना, बोलना, सुनना यही भाषा का असल स्कूल और परीक्षा है। भाषा के साथ रहने पर भाषा हममें उतरती है। यही भाषा हमें अटलबिहारी वाजपेयी,अमिताभ बच्चन, नरेंद्र मोदी,आशुतोष राणा या कुमार विश्वास जैसी सफलताएं दिला सकती है। मीडिया में अनेक ऐसे चमकते नाम हैं, जिन्होंने अपनी भाषा से चमत्कृत किया है। अनेक लेखक हैं, जिन्हें हमने रात भर जागकर पढ़ा है। ऐसे विज्ञापन लेखक हैं जिनकी पंक्तियां हमने गुनगुनाई हैं। इसलिए भाषा, तकनीक का ज्ञान और अपने पाठक, दर्शक की समझ हमारी सफलता की गारंटी है। इसके साथ ही पत्रकारिता में समाज की समझ, मिलनसारिता, संवाद की क्षमता बहुत मायने रखती है।
- मीडिया शिक्षा में कैसे नवाचारों की आवश्यकता है ?
शिक्षा का काम व्यक्ति को आत्मनिर्भर और मूल्यनिष्ठ मनुष्य बनाना है। जो अपनी विधा को साधकर आगे ले जा सके। मीडिया में भी ऐसे पेशेवरों का इंतजार है जो ‘फार्मूला पत्रकारिता’ से आगे बढ़ें। जो मीडिया को इस देश की आवाज बना सकें। जो एजेंड़ा के बजाए जन-मन के सपनों, आकांक्षाओं को स्वर दे सकें। इसके लिए देश की समझ बहुत जरूरी है। आज के मीडिया का संकट यह है वह नागरबोध के साथ जी रहा है। वह भारत के पांच प्रतिशत लोगों की छवियों को प्रक्षेपित कर रहा है। जबकि कोई भी समाज अपनी लोकचेतना से खास बनता है। देश की बहुत गहरी समझ पैदा करने वाले, संवेदनशील पत्रकारों का निर्माण जरूरी है। मीडिया शिक्षा को संवेदना,सरोकार, राग, भारतबोध से जोड़ने की जरूरत है। पश्चिमी मानकों पर खड़ी मीडिया शिक्षा को भारत की संचार परंपरा से जोड़ने की जरूरत है। जहां संवाद से संकटों के हल खोजे जाते रहे हैं। जहां संवाद व्यापार और व्यवसाय नहीं, एक सामाजिक जिम्मेदारी है।
- देश में मीडिया की मौजूदा स्थिति को लेकर आपकी राय क्या है ?
मीडिया शिक्षा का विस्तार बहुत हुआ है। हर केंद्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया शिक्षा के विभाग हैं। चार विश्वविद्यालय- भारतीय जन संचार संस्थान(दिल्ली), माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि(भोपाल), हरिदेव जोशी पत्रकारिता विवि(जयपुर) और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि(रायपुर) देश में काम कर रहे हैं। इन सबकी उपस्थिति के साथ-साथ निजी विश्वविद्यालय और कालेजों में भी जनसंचार की पढ़ाई हो रही है। यानि विस्तार बहुत हुआ है। अब हमें इसकी गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत है। ये जो चार विश्वविद्यालय हैं वे क्या कर रहे हैं। क्या इनका आपस में भी कोई समन्वय है। विविध विभागों में क्या हो रहा है। उनके ज्ञान, शोध और आइडिया एक्सचेंज जैसी व्यवस्थाएं बनानी चाहिए। दुनिया में मीडिया या जनसंचार शिक्षा के जो सार्थक प्रयास चल रहे हैं, उसकी तुलना में हम कहां हैं। बहुत सारी बातें हैं, जिनपर बात होनी चाहिए। अपनी ज्ञान विधा में हमने क्या जोड़ा। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने भी एक समय देश में एक ग्लोबल कम्युनिकेशन यूनिर्वसिटी बनाने की बात की थी। देखिए क्या होता है।
बावजूद इसके हम एक मीडिया शिक्षक के नाते क्या कर पा रहे हैं। यह सोचना है। वरना तो मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी हमारे लिए ही लिख गए हैं-
हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गए।
बी-ए हुए नौकर हुए पेंशन मिली फिर मर गए।।
- आज की मीडिया और इससे जुड़े लोगों के अपने मिशन से भटक जाने और पूरी तरह पूंजीपतियों, सत्ताधीशों के हाथों बिक जाने की बात कही जा रही है। इससे आप कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं?
देखिए मीडिया चलाना साधारण आदमी को बस की बात नहीं है। यह एक बड़ा उद्यम है। जिसमें बहुत पूंजी लगती है। इसलिए कारपोरेट,पूंजीपति या राजनेता चाहे जो हों, इसे पोषित करने के लिए पूंजी चाहिए। बस बात यह है कि मीडिया किसके हाथ में है। इसे बाजार के हवाले कर दिया जाए या यह एक सामाजिक उपक्रम बना रहेगा। इसलिए पूंजी से नफरत न करते हुए इसके सामाजिक, संवेदनशील और जनधर्मी बने रहने के लिए निरंतर लगे रहना है। यह भी मानिए कोई भी मीडिया जनसरोकारों के बिना नहीं चल सकता। प्रामणिकता, विश्वसनीयता उसकी पहली शर्त है। पाठक और दर्शक सब समझते हैं।
- आपकी नज़र में इस वक़्त देश में मीडिया शिक्षा की कैसी स्थिति है ? क्या यह बेहतर पत्रकार बनाने और मीडिया को सकारात्मक दिशा देने का काम कर पा रही है ?
मैं मीडिया शिक्षा क्षेत्र से 2009 से जुड़ा हूं। मेरे कहने का कोई अर्थ नहीं है। लोग क्या सोचते हैं, यह बड़ी बात है। मुझे दुख है कि मीडिया शिक्षा में अब बहुत अच्छे और कमिटेड विद्यार्थी नहीं आ रहे हैं। अजीब सी हवा है। भाषा और सरोकारों के सवाल भी अब बेमानी लगने लगे हैं। सबको जल्दी ज्यादा पाने और छा जाने की ललक है। ऐसे में स्थितियां बहुत सुखद नहीं हैं। पर भरोसा तो करना होगा। इन्हीं में से कुछ भागीरथ निकलेंगें जो हमारे मीडिया को वर्तमान स्थितियों से निकालेगें। ऐसे लोग तैयार करने होंगें, जो बहुत जल्दी में न हों। जो ठहरकर पढ़ने और सीखने के लिए तैयार हों। वही लोग बदलाव लाएंगें।
- देश में आज मीडिया शिक्षा के सामने प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
सबसे बड़ी चुनौती है ऐसे विद्यार्थियों का इंतजार जिनकी प्राथमिकता मीडिया में काम करना हो। सिर्फ इसलिए नहीं कि यह ग्लैमर या रोजगार दे पाए। बल्कि देश के लोगों को संबल, साहस और आत्मविश्वास दे सके। संचार के माध्यम से क्या नहीं हो सकता। इसकी ताकत को मीडिया शिक्षकों और विद्यार्थियों को पहचानना होगा। क्या हम इसके लिए तैयार हैं,यह एक बड़ा सवाल है। मीडिया शिक्षा के माध्यम से हम ऐसे क्म्युनिकेटर्स तैयार कर सकते हैं जिनके माध्यम से समाज के संकट हल हो सकते हैं। यह साधारण शिक्षा नहीं है। यह असाधारण है। भाषा,संवाद,सरोकार और संवेदनशीलता से मिलकर हम जो भी रचेगें, उससे ही नया भारत बनेगा। इसके साथ ही मीडिया एजूकेशन कौंसिल का गठन भारत सरकार करे ताकि अन्य प्रोफेशनल कोर्सेज की तरह इसका भी नियमन हो सके। गली-गली खुल रहे मीडिया कालेजों पर लगाम लगे। एक हफ्ते में पत्रकार बनाने की दुकानों पर ताला डाला जा सके। मीडिया के घरानों में तेजी से मोटी फीस लेकर मीडिया स्कूल खोलने की ललक बढ़ी है, इस पर नियंत्रण हो सकेगा। गुणवत्ता विहीन किसी शिक्षा का कोई मोल नहीं, अफसोस मीडिया शिक्षा के विस्तार ने इसे बहुत नीचे गिरा दिया है। दरअसल भारत में मीडिया शिक्षा मोटे तौर पर छह स्तरों पर होती है। सरकारी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में, दूसरे, विश्वविद्यालयों से संबंद्ध संस्थानों में, तीसरे, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों में, चौथे, पूरी तरह से प्राइवेट संस्थान, पांचवे डीम्ड विश्वविद्यालय और छठे, किसी निजी चैनल या समाचार पत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान। इस पूरी प्रक्रिया में हमारे सामने जो एक सबसे बड़ी समस्या है, वो है किताबें। हमारे देश में मीडिया के विद्यार्थी विदेशी पुस्तकों पर ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन अगर हम देखें तो भारत और अमेरिका के मीडिया उद्योगों की संरचना और कामकाज के तरीके में बहुत अंतर है। इसलिए मीडिया के शिक्षकों की ये जिम्मेदारी है, कि वे भारत की परिस्थितियों के हिसाब से किताबें लिखें।
- भारत में मीडिया शिक्षा का क्या भविष्य देखते हैं आप ?
मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। इसलिए मीडिया शिक्षकों को ये तय करना होगा कि उनका लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर पत्रकारिता शिक्षण का बेहतर माहौल बनाने का है। आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। अब हमें मीडिया शिक्षण में ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे, जिनमें विषयवस्तु के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो। न्यू मीडिया आज न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा और बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने होंगे। नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षण संस्थानों के लिए आज एक बड़ी आवश्यकता है क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करना। भाषा वो ही जीवित रहती है, जिससे आप जीविकोपार्जन कर पाएं और भारत में एक सोची समझी साजिश के तहत अंग्रेजी को जीविकोपार्जन की भाषा बनाया जा रहा है। ये उस वक्त में हो रहा है, जब पत्रकारिता अंग्रेजी बोलने वाले बड़े शहरों से हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शहरों और गांवों की ओर मुड़ रही है। आज अंग्रेजी के समाचार चैनल भी हिंदी में डिबेट करते हैं। सीबीएससी बोर्ड को देखिए जहां पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। क्या हम अन्य राज्यों के पाठ्यक्रमों में भी इस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं, जिससे मीडिया शिक्षण को एक नई दिशा मिल सके।
- तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य के सापेक्ष मीडिया शिक्षा संस्थान स्वयं को कैसे ढाल सकते हैं यानी उन्हें उसके अनुकूल बनने के लिए क्या करना चाहिए ?
मीडिया शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों में इस तरह के बदलाव करने चाहिए, कि वे न्यू मीडिया के लिए छात्रों को तैयार कर सकें। आज तकनीक किसी भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मीडिया में दो तरह के प्रारूप होते हैं। एक है पारंपरिक मीडिया जैसे अखबार और पत्रिकाएं और और दूसरा है डिजिटल मीडिया। अगर हम वर्तमान संदर्भ में बात करें तो सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये दोनों प्रारूप मिलकर चलते हैं। आज पारंपरिक मीडिया स्वयं को डिजिटल मीडिया में परिवर्तित कर रहा है। जरूरी है कि मीडिया शिक्षण संस्थान अपने छात्रों को 'डिजिटल ट्रांसफॉर्म' के लिए पहले से तैयार करें। देश में प्रादेशिक भाषा यानी भारतीय भाषाओं के बाजार का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा के उपभोक्ताओं का डिजिटल की तरफ मुड़ना लगभग पूरा हो चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2030 तक भारतीय भाषाओं के बाजार में उपयोगकर्ताओं की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच जाएगी और लोग इंटरनेट का इस्तेमाल स्थानीय भाषा में करेंगे। जनसंचार की शिक्षा देने वाले संस्थान अपने आपको इन चुनौतियों के मद्देनजर तैयार करें, यह एक बड़ी जिम्मेदारी है।
- वे कौन से कदम हो सकते हैं जो मीडिया उद्योग की अपेक्षाओं और मीडिया शिक्षा संस्थानों द्वारा उन्हें उपलब्ध कराये जाने वाले कौशल के बीच के अंतर को पाट सकते हैं?
भारत में जब भी मीडिया शिक्षा की बात होती है, तो प्रोफेसर के. ई. ईपन का नाम हमेशा याद किया जाता है। प्रोफेसर ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा के तंत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण के पक्षधर थे। प्रोफेसर ईपन का मानना था कि मीडिया के शिक्षकों के पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के साथ साथ मीडिया में काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव भी होना चाहिए, तभी वे प्रभावी ढंग से बच्चों को पढ़ा पाएंगे। आज देश के अधिकांश पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षण संस्थान, मीडिया शिक्षक के तौर पर ऐसे लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें अकादमिक के साथ साथ पत्रकारिता का भी अनुभव हो। ताकि ये शिक्षक ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार कर सकें, ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार कर सकें, जिसका उपयोग विद्यार्थी आगे चलकर अपने कार्यक्षेत्र में भी कर पाएं। पत्रकारिता के प्रशिक्षण के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें से एक दमदार तर्क यह है कि यदि डॉक्टरी करने के लिए कम से कम एम.बी.बी.एस. होना जरूरी है, वकालत की डिग्री लेने के बाद ही वकील बना जा सकता है तो पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण पेशे को किसी के लिए भी खुला कैसे छोड़ा जा सकता है? बहुत बेहतर हो मीडिया संस्थान अपने अध्यापकों को भी मीडिया संस्थानों में अनुभव के लिए भेजें। इससे मीडिया की जरूरतों और न्यूज रूम के वातावरण का अनुभव साक्षात हो सकेगा। विश्वविद्यालयों को आखिरी सेमेस्टर या किसी एक सेमेस्टर में न्यूज रूम जैसे ही पढ़ाई पर फोकस करना चाहिए। अनेक विश्वविद्यालय ऐसे कर सकने में सक्षम हैं कि वे न्यूज रूम क्रियेट कर सकें।
- अपने कार्यकाल के दौरान मीडिया शिक्षा और आईआईएमसी की प्रगति के मद्देनज़र आपने क्या महत्वपूर्ण कदम उठाये, संक्षेप में उनका ज़िक्र करें।
मुझे लगता है कि अपने काम गिनाना आपको छोटा बनाता है। मैंने जो किया उसकी जिक्र करना ठीक नहीं। जो किया उससे संतुष्ठ हूं। मूल्यांकन लोगों पर ही छोड़िए।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता विज्ञान का एक नया वरदान है। कंप्यूटर के क्षेत्र में नई तकनीक। जॉन मैकार्थी को इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जनक माना जाता है। एक ऐसी विधा जिसमें मशीन से मशीन की बातें होती है। एक कंप्यूटर दूसरे कंप्यूटर से बात करता है। यह विज्ञान का अद्भुत चमत्कार है। मानव जीवन में तो इसका दखल बढ़ा ही है, करियर के लिहाज से भी इसका दायरा और और विस्तृत होता जा रहा है। इसमें मैकेनिकल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग, अप्लाइड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ-साथ रोबोटिक ऑटोमेशन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा, बैचलर डिग्री, मास्टर डिग्री और रिसर्च आदि में करियर विकल्प हैं।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक और फिनलैंड के सवोनिया यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंस के प्रोफेसर डॉ राजीव कंठ से इस विषय पर हमने विस्तृत चर्चा की। उनसे चर्चा के क्रम में पता चलता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने वाले समय में हमारे जीवन में कितना महत्वपूर्ण हो जाएगा। बातचीत के कुछ अंश :
प्र. - सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नया क्या है?
उ. - सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आज हर दिन कुछ ना कुछ नया हो रहा है। यही वजह है कि इस क्षेत्र को पोटेंशियल डेवलपमेंट एरिया के रूप में देखा जा रहा है। अब तक मशीन से आदमी की बात होती थी। अब मशीन से मशीन की बात होती है। यह सबसे नई तकनीक है।
प्र. - इस क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उ. - इस क्षेत्र में जितनी नई चीजें आ रही हैं या कह सकते हैं कि जितनी नई चीजों पर शोध हो रहा है, उन चीजों का समुचित विकास करना सबसे बड़ी चुनौती है।
प्र. - इस क्षेत्र के कई आयाम हैं जैसे इंटरनेट, ई-बैंकिंग, ई-कॉमर्स, ईमेल आदि इन सब में सबसे बड़ी चुनौती किस क्षेत्र में है?
उ. - चुनौती तो सभी क्षेत्र में है। किसी भी चुनौती को कम नहीं कहा जा सकता लेकिन बैंकिंग क्षेत्र में ज्यादा कह सकते हैं। क्योंकि लोग मेहनत की कमाई बैंक में रखते हैं और हैकर्स सेकंडों में उसे उड़ा लेते हैं। इसलिए बैंकिंग के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती है।
प्र. - हैकरों से छुटकारा पाने के लिए क्या सुझाव देना चाहेंगे?
उ. - हैकरों से छुटकारा पाने के लिए सुझाव है कि पासवर्ड किसी से शेयर ना करें। पासवर्ड 3-4 लेयर का बनाएं और एक निश्चित समय अंतराल के बाद पासवर्ड को बदलते रहें। ये कुछ उपाय हैं जिससे हैकरों से बचा जा सकता है।
प्र. - युवाओं को करियर के लिए क्या सुझाव देना चाहेंगे?
उ. - करियर के लिहाज से यह क्षेत्र काफी अच्छा है। आज हर युवा जो इस फील्ड में करियर बनाना चाहता है उसकी पहली चॉइस कंप्यूटर साइंस होता है। जब वह कंप्यूटर साइंस से स्नातक करता है, उसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी आथवा कृत्रिम बुद्धिमता या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मैं अपना कैरियर बनाना चाहता है। रोबोट बनाने की ख्वाहिश आज हर सूचना प्रौद्योगिकी पढ़ने वाले छात्र की होती है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की कुल आबादी का एक तिहाई से अधिक हिस्सा 15 से 25 वर्ष की आयु वर्ग के युवाओं का है। आशाओं और आकांक्षाओं से आच्छादित जीवन का यही वह दौर होता है जब एक युवा अपने करियर को लेकर गंभीर होता है। इसी के दृष्टिगत वह अपनी एक अलहदा राह का निर्धारण करता है, सीखने के लिए तदनुरूप विषय का चयन करता है और भविष्य में उसे जिन कार्यों को सम्पादित करना है, उसके मद्देनज़र निर्णय के पड़ाव पर पहुँचने का प्रयास करता है। और यही वह पूरी प्रक्रिया है जो उसे आत्मनिर्भर बनाती है। लिहाजा, जीवन के इस कालखंड में आवश्यक है कि कोई उसका हाथ थामे, उसका ज़रूरी मार्गदर्शन करे।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट अब भी करियर-निर्माण के लिहाज से पसंदीदा क्षेत्र बने हुए हैं, जबकि सीखने, काम करने और अपने पेशेवर जीवन के निर्माण के लिए 99 अन्य विशिष्ट क्षेत्र भी हैं। इनमें डिजाइन, मीडिया, फोरेंसिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, अलाइड हेल्थकेयर, कृषि आदि शामिल हैं। दुर्भाग्यवश, करियर के इन क्षेत्रों को लेकर बहुत कम चर्चा होती है। कोई इस पर बात नहीं करता कि इन डोमेन में नवीनतम क्या है।
हम यह भी न भूलें कि लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था में भारतीय मीडिया की हिस्सेदारी करीब 1% की है। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष 2 मिलियन से अधिक लोग किसी न किसी रूप में इससे सम्बद्ध हैं। मीडिया एक ऐसा क्षेत्र भी है, जो लोगों के दिलो-दिमाग पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। लेकिन शायद ही कोई ऐसा समर्पित मीडिया मंच है जिसका मीडिया-शिक्षा और लर्निंग की दिशा में ध्यान केंद्रित हो। सार्वजनिक जीवन में शायद मीडिया-शिक्षा अभी भी सबसे उपेक्षित क्षेत्र है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा, ये दो ऐसे क्षेत्र हैं जो वास्तव में बड़े देशों के बीच सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश में मानव संसाधन के लिए उत्तरदायी हैं। दुर्भाग्य कि इन क्षेत्रों पर शासन और देश की राजनीति का ध्यान सबसे कम केंद्रित होता है। आने वाले समय में इन पर सार्वजनिक तौर पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
न भूलें कि भारत की उच्च शिक्षा का आज वृहद् दायरा है, जहां बारहवीं कक्षा से ऊपर के सौ मिलियन से अधिक शिक्षार्थी हैं, लेकिन इनमें अधिकांश की स्तर सामान्य और गुणवत्ता औसत है। अपवादस्वरूप, कुछ संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। ऐसे में यदि हम चाहते हैं कि हमारे पास मौजूद जनसांख्यिकीय लाभ का सकारात्मक परिणाम हमें प्राप्त हो तो गुणवत्ता के दायरे का तेजी से विस्तार अतिआवश्यक है।
और, यही वजह है कि उपरोक्त सन्दर्भों पर ध्यान केंद्रित करने और सर्वप्रथम भारत और तदुपरांत एशिया की उच्च शिक्षा (विशेष क्षेत्रों में ख़ास तौर पर ) में प्रगति को गति प्रदान करने के लिए, एक मई को श्रमिक दिवस पर एडइनबॉक्स हिंदी के साथ हम आपके समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। शिक्षा के सामर्थ्य और श्रम की संघर्षशीलता को नमन करते हुए यह हमारी तरफ से इसका सम्मान है, एक उपहार।
साथ ही, इस मंच से हमारा प्रयास होगा बेहतर गुणवत्ता वाले उच्च शिक्षा संस्थानों का समर्थन करना और स्कूलों से निकलने वाले नौजवानों को ज्ञान, जानकारी और अंतर्दृष्टि के साथ उन्हें उनके सपनों के करियर और संस्थानों में प्रवेश की राह आसान बनाने में सहायता करना। इन क्षेत्रों के महारथियों की उपलब्धियों को भी सम्बंधित काउन्सिल के माध्यम से, संस्थानों और मार्गदर्शकों को सम्मानित कर उनकी महती भूमिका को लोगों के समक्ष रखने और उजागर करने का हमारा प्रयास होगा। हमारा इरादा हर क्षेत्र या डोमेन का एक इकोसिस्टम निर्मित करना है, धरातल पर भी और ऑनलाइन भी।
तो आइये, एडइनबॉक्स के साथ हम उच्च शिक्षा जगत की एक प्रभावी यात्रा पर अग्रसर हों।
--
प्रो उज्ज्वल अनु चौधरी
वाइस प्रेजिडेंट, वाशिंगटन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी
एडिटर, एडइनबॉक्स (Edinbox.com)
पूर्व सलाहकार और प्रोफेसर, डैफोडिल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, ढाका
(इससे पूर्व एडमास यूनिवर्सिटी से प्रो वीसी के रूप में,
सिम्बायोसिस व एमिटी यूनिवर्सिटी, पर्ल अकादमी और डब्ल्यूडब्ल्यूआई के डीन,
और टीओआई, ज़ी, बिजनेस इंडिया ग्रुप से जुड़ाव के साथ भारत सरकार और डब्ल्यूएचओ/टीएनएफ के मीडिया सलाहकार रहे हैं।)
आजकल, विभिन्न उद्योगों के काम करने के तौर-तरीके और प्रक्रियाएँ बहुत तेजी से बदल रही हैं, ऐसी जो दो दशकों पहले शायद ही किसी ने कल्पना की हो। डिज़ाइन भी इसका एक अहम हिस्सा है, जो भारत और दुनिया भर में निरंतर विकसित हो रहा है।
डिज़ाइन हर जगह है—हमारे चारों ओर, हर चीज़ में। यह हमारे द्वारा देखे गए हर टेक्स्ट के फॉन्ट, कारों, कपड़ों, फर्नीचर और बर्तनों में मौजूद है। यह हमारी दैनिक ज़िंदगी के हर हिस्से में बसा हुआ है, चाहे हम इसे पहचानें या नहीं। डिज़ाइन ही वह तत्व है जो यह तय करता है कि हम किसी ब्रांड, स्थान या व्यक्ति को कैसे देखते हैं।
दैनिक स्तर पर डिज़ाइन को तकनीक के जादू से या व्यक्तिगत पहल के माध्यम से बढ़ाया और बेहतर बनाया जा रहा है, ताकि हमारे अनुभव को और अधिक आनंददायक बनाया जा सके। वास्तव में, यह डिज़ाइन ही है जो परिभाषित करता है कि आप और हम किसी चीज़ या व्यक्ति को कैसे देखते हैं, चाहे वह कोई ब्रांड हो, कोई चेहरा हो या कोई स्थान हो।
गूगल के अनुसार, डिज़ाइन उद्योग का विकास वर्तमान में हर साल 25% की दर से हो रहा है। फिर भी, भारत में डिज़ाइन क्षेत्र में बड़ी संभावनाएँ हैं, और इसके बावजूद यहां 62,000 डिज़ाइनरों की कमी है, जबकि वर्तमान में सिर्फ 7,000 डिज़ाइनर योग्य हैं। यह एक चुनौती है, लेकिन साथ ही एक बड़ा अवसर भी, खासकर डिज़ाइन संस्थानों और विशेषज्ञता वाले पाठ्यक्रमों के लिए। इन संस्थानों के लिए यह एक मौका है, ताकि वे नए डिज़ाइन विषयों पर ध्यान केंद्रित कर सकें और छात्रों को बेहतर तरीके से तैयार कर सकें।
आजकल डिज़ाइन बहुत अधिक सुलभ हो गया है। छात्र अब कम उम्र से ही डिज़ाइन की दुनिया में कदम रख सकते हैं, और बहुत से ऑनलाइन प्लेटफार्म्स उन्हें सीखने के लिए संसाधन उपलब्ध कराते हैं। हालांकि, यह देखना बाकी है कि डिज़ाइन के इतने सारे विकल्प और अवसरों के बावजूद, मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर कम हो पाएगा या नहीं।
आजकल, संचार डिज़ाइन ब्रांडों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। यह सुनिश्चित करता है कि एक ब्रांड अपने दर्शकों से जुड़ने में सक्षम है, और इससे उसका बाज़ार में स्थान मजबूत होता है। आज के ब्रांड्स—चाहे वे बड़े हों या छोटे—सभी डिज़ाइन में निपुण लोगों की तलाश करते हैं, जो नए विचार लाने के साथ-साथ जोखिम उठाने को तैयार हों।
अब यह जरूरी नहीं कि केवल डिज़ाइन की डिग्री हो, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि आप अपने कौशल पर कितना काम करते हैं। कई लोग बिना औपचारिक शिक्षा के डिज़ाइन उद्योग में सफल हुए हैं। वे रचनात्मक दृष्टिकोण लाते हैं, जो शायद पारंपरिक डिज़ाइनर्स के दिमाग में न आए।
आजकल डिज़ाइनर्स नई तकनीकों, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, का उपयोग करके ऐसे उत्पादों और समाधानों का निर्माण कर रहे हैं, जो बाज़ार में बदलाव ला सकते हैं। डिज़ाइन एक तेज़ी से बदलने वाला क्षेत्र है, और इसमें सफलता के लिए तेजी से निर्णय लेने की क्षमता की आवश्यकता है। इसलिए, भारत में डिज़ाइन उद्योग का भविष्य उज्जवल है, और यदि हम अपनी प्रतिभा और समर्पण का सही उपयोग करें, तो हम फिर से डिज़ाइन की दुनिया में महाशक्ति बन सकते हैं।
किसी भी काम को शुरू करने से पहले एक उचित रोडमैप की आवश्यकता होती है, जिससे काम के सही होने की संभावना बढ़ जाती है। जैसे घर बनाने से पहले पूरा नक्शा चाहिए होता है या कपड़े सिलने से पहले उसे कागज पर डिजाइन किया जाता है। एक डिजाइनर बस वह होता है जो अपनी कल्पना और रचनात्मकता का उपयोग करके सबसे अच्छा अंतिम उत्पाद बनाता है। भारत में डिजाइन उद्योग में अवसर और संभावनाएं अपार हैं। इसमें आपकी मादा कर सकता है AIDAT.
दरअसल, अखिल भारतीय डिज़ाइन एप्टीट्यूड टेस्ट (AIDAT- All India Design Aptitude Test) भारत की पहली राष्ट्रीय स्तर की डिज़ाइन प्रवेश परीक्षा है जो डिज़ाइन शिक्षा के माध्यम से एक कल्पनातीत, नवीन और रचनात्मक दुनिया के द्वार खोलती है। यह एक ऐसा मंच है जहां डिज़ाइन शिक्षा के इच्छुक इस क्षेत्र में अपनी यात्रा की शुरुआत करने के लिए आवेदन करते हैं और उन्हें प्रतिष्ठित डिजाइन संस्थानों से जुड़ने और पठन सामग्री, डिजाइन जगत के समाचार, उद्योग जागरूकता और विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध होता है। भारत के शीर्ष विश्वविद्यालय और कॉलेज एआईडीएटी में भाग लेते हैं और विभिन्न डिज़ाइन विशेषज्ञताओं में डिप्लोमा, स्नातक और मास्टर डिग्री प्रदान करते हैं।
डिज़ाइन उद्योग, विशेष रूप से फैशन डिजाइनिंग, UI/UX डिजाइनिंग, इंटीरियर डिज़ाइनिंग, और ग्राफिक डिजाइनिंग, कई उभरते उद्योगों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। आजकल ये पेशे ऑटोमोबाइल, आईटी, फैशन, आतिथ्य, रियल एस्टेट, शिक्षा, मीडिया और सरकारी क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण बन चुके हैं।
अब डिज़ाइन संस्थान और पाठ्यक्रम बढ़ रहे हैं, और डिज़ाइन पेशेवरों की संख्या भी बढ़ रही है। डिज़ाइन का मुख्य उद्देश्य बेहतर उत्पाद और सेवाएं प्रदान करना, व्यावसायिक दक्षता बढ़ाना और राजस्व में वृद्धि करना है। अगर आप डिज़ाइन को अपने करियर के रूप में चुनते हैं, तो यह एक शानदार अवसर हो सकता है, क्योंकि अगले दस वर्षों में डिज़ाइन उद्योग भारत में और भी तेजी से विकसित होगा। डिज़ाइन शिक्षा के इच्छुक https://aidatexam.com/ पर जाकर इस सफर में अपनी शुरुआत के लिए हर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और देश के चुनिंदा विश्वविद्यालय और कॉलेज में प्रवेश पाकर विभिन्न डिज़ाइन विशेषज्ञताओं में डिप्लोमा, स्नातक और मास्टर डिग्री हासिल कर सकते हैं।
हाल के वर्षों में भारत के स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव आया है, जिसने एलाइड हेल्थकेयर के क्षेत्र को करियर के एक आकर्षक विकल्प के रूप में परिवर्तित कर दिया है। एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स डॉक्टरों और नर्सों के साथ मिलकर रोगी देखभाल, निदान, पुनर्वास और स्वास्थ्य संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तो अगर आप भी इस गतिशील क्षेत्र में एक बेहतर करियर बनाने के बारे में सोच रहे हैं, तो GAHET आपके लिए मददगार साबित हो सकता है।
दरअसल, ग्लोबल एलाइड हेल्थकेयर एंट्रेंस टेस्ट यानी GAHET एक राष्ट्र स्तरीय ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा है, जिसमें शामिल होकर आप देशभर में एलाइड हेल्थकेयर से जुड़े पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराने वाले संस्थानों में अपना प्रवेश सुनिश्चित कर सकते हैं। इन पाठ्यक्रमों में डिप्लोमा पाठ्यक्रम, स्नातक पाठ्यक्रम और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शामिल हैं। डिप्लोमा कार्यक्रमों, स्नातक कार्यक्रमों और स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में पेश किए जाने वाले विभिन्न पाठ्यक्रम फिजियोथेरेपी, ऑपरेशन थिएटर, व्यावसायिक थेरेपी, ऑप्टोमेट्री, कार्डियक टेक्नोलॉजी, एनेस्थीसिया, रेडियोलॉजी और इमेजिंग टेक्नोलॉजी, एक्स-रे तकनीशियन, मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी, न्यूरोपैथी और योग विज्ञान हैं। GAHET के बारे में अधिक जानकारी के लिए उम्मीदवार https://gahet.org/ पर जा सकते हैं।
विशेष बात यह भी है कि राष्ट्र स्तरीय प्रवेश परीक्षा GAHET ऑनलाइन मोड में आयोजित होती है जिसमें उम्मीदवार मोबाइल फोन, लैपटॉप या डेस्कटॉप कंप्यूटर का उपयोग करके आसानी से भाग ले सकते हैं।
बहरहाल, एलाइड हेल्थकेयर का क्षेत्र क्यों एक डिमांडिंग करियर विकल्प के रूप में आज छात्रों के सामने है, उसपर एक दृष्टिपात करने की कोशिश करते हैं :
एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स की बढ़ती मांग
बढ़ती आबादी और स्वास्थ्य को जागरूकता के कारण भारत का स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। इस वृद्धि के साथ कुशल एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स की मांग भी बढ़ी है। चाहे अस्पताल हों, क्लीनिक हों, पुनर्वास केंद्र हों या सामुदायिक स्वास्थ्य संगठन हों, पैरामेडिक्स, रेडियोग्राफर, फिजियोथेरेपिस्ट, मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट और अन्य एलाइड हेल्थ वर्कर्स की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। यह बढ़ती मांग नौकरी के अवसर पैदा कर रही है।
करियर के कई ऑप्शन
एलाइड हेल्थकेयर में करियर बनाने के पीछे सबसे अहम चीज़ है विकल्पों की विविधता है। चाहे आप डायग्नोस्टिक भूमिकाओं, चिकित्सीय सेवाओं या रोगी सहायता में रुचि रखते हों, यहाँ हर किसी के लिए एक पाठ्यक्रम की विशेषज्ञता है। आप रेडियोलॉजिस्ट तकनीशियन, क्लिनिकल प्रयोगशाला प्रौद्योगिकीविद् या फिजियोथेरेपिस्ट आदि बन सकते हैं।
सामुदायिक स्वास्थ्य में योगदान
एलाइड हेल्थकेयर पेशेवर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाते हैं। वे रोगी परिणामों और सामुदायिक स्वास्थ्य पहलों में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। रोगियों के साथ मिलकर काम करके, वे प्रारंभिक निदान, प्रभावी उपचार और पुनर्वास में मदद करते हैं, अंततः समाज के समग्र स्वास्थ्य में सुधार करते हैं। यह जानना कि आपके काम का लोगों के जीवन पर ठोस प्रभाव है, अविश्वसनीय रूप से संतुष्टिदायक हो सकता है।
शैक्षिक अवसर और सहायता
एलाइड हेल्थकेयर में करियर शुरू करने के लिए, सही योग्यता प्राप्त करना आवश्यक है। ग्लोबल एलाइड हेल्थकेयर एंट्रेंस टेस्ट (GAHET), जिसे पहले AIPMCET के नाम से जाना जाता था, एलाइड हेल्थ के इच्छुक छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों में उम्मीदवारों की योग्यता, ज्ञान और कौशल का आकलन करती है।
कौशल विकास पर जोर
एलाइड हेल्थ प्रोग्राम न केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर बल्कि व्यावहारिक कौशल पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं, जो प्रभावी रोगी देखभाल के लिए महत्वपूर्ण हैं। छात्रों को अक्सर व्यावहारिक प्रशिक्षण और इंटर्नशिप में शामिल होने का अवसर मिलता है, जिससे उन्हें वास्तविक दुनिया का अनुभव प्राप्त होता है जो उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाता है। यह कौशल विकास ऐसे क्षेत्र में अमूल्य है जहाँ व्यावहारिक अनुप्रयोग महत्वपूर्ण है।
भारत में एलाइड हेल्थकेयर में करियर बनाना न केवल एक बुद्धिमानी भरा विकल्प है; यह एक ऐसा निर्णय है जो एक संतुष्टिदायक और प्रभावशाली पेशे की ओर ले जा सकता है। कुशल पेशेवरों की बढ़ती मांग, विविध करियर पथ और लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने के अवसर के साथ, यह क्षेत्र कई अवसर प्रदान करता है। और इसमें आपकी मदद करता है GAHET.
फोरेंसिक विज्ञान आज करियर के दृष्टिकोण से छात्रों द्वारा पसंद किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस क्षेत्र के प्रति छात्रों की दीवानगी हाल के वर्षों में खूब बढ़ी है। इस हद तक कि विज्ञान की पृष्ठभूमि वाले स्नातक की पढ़ाई करने के इच्छुक 10 छात्रों में से 5 फोरेंसिक विज्ञान की पढ़ाई का विकल्प चुनते हैं। हालाँकि, अधिकांश को यह नहीं पता होता कि उन्हें अपने मनपसंद कोर्स में प्रवेश पाने के लिए क्या करना होगा।
दरअसल, किसी प्रतिष्ठित सरकारी या निजी कॉलेज से फोरेंसिक साइंस की डिग्री हासिल करने के इच्छुक उम्मीदवारों को प्रवेश परीक्षा देनी होती है। फोरेंसिक साइंस के लिए शीर्ष प्रवेश परीक्षाओं में से एक AIFSET परीक्षा है। यहाँ AIFSET, पात्रता मानदंड, आवेदन प्रक्रिया, पाठ्यक्रम, तैयारी के टिप्स आदि के साथ-साथ अन्य महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।
क्या है एआईएफएसईटी (AIFSET)
ऑल इंडिया फॉरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट यानी अखिल भारतीय फोरेंसिक विज्ञान प्रवेश परीक्षा, जिसे आमतौर पर एआईएफएसईटी (AIFSET) के रूप में जाना जाता है, विभिन्न फोरेंसिक विज्ञान संस्थानों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए आयोजित एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है। जो उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं और इसमें अच्छे अंक प्राप्त करते हैं, उन्हें पूरे भारत में फोरेंसिक कार्यक्रम प्रदान करने वाले संस्थानों में प्रवेश दिया जाता है। ऐसे संस्थानों में प्रवेश उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त अंकों के आधार पर दिया जाता है।
आवेदन प्रक्रिया
परीक्षा आयोजित करने वाली इकाई अपने आधिकारिक वेबसाइट aifset.com पर आवेदन पत्र जारी करती है। जो उम्मीदवार इस प्रवेश परीक्षा में शामिल होना चाहते हैं, उन्हें सलाह दी जाती है कि वे नियमित रूप से उक्त वेबसाइट को देखें ताकि वे परीक्षा से संबंधित कोई भी महत्वपूर्ण अपडेट से न चूकें। एआईएफएसईटी (AIFSET) की वेबसाइट पर इस परीक्षा के बारे में आधिकारिक सूचना जारी की जाती है जिसमें विस्तृत आवेदन प्रक्रिया के साथ परीक्षा तिथि, आवेदन तिथि आदि सभी महत्वपूर्ण विवरण शामिल होते हैं।
पात्रता मानदंड
AIFSET परीक्षा के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू करने से पहले, उम्मीदवारों को इसकी पात्रता मानदंड की जांच करनी चाहिए। किसी भी अन्य परीक्षा की तरह, उम्मीदवारों को AIFSET परीक्षा की पात्रता मानदंड को पूरा करना आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि कोई उम्मीदवार उल्लिखित मानदंडों का पालन करने में विफल रहता है, तो वह AIFSET परीक्षा के माध्यम से प्रवेश नहीं ले पाएगा। इन पात्रता शर्तों में उम्मीदवार की बुनियादी शैक्षणिक योग्यता, आयु सीमा आदि शामिल हैं। बैचलर और मास्टर कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए मानदंड अलग-अलग हैं।
स्नातक कार्यक्रम यानी बीएससी फोरेंसिक विज्ञान पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए उम्मीदवारों को न्यूनतम 50% अंकों के साथ भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान और गणित के साथ कक्षा 12 वीं उत्तीर्ण होना चाहिए। जो अभ्यर्थी कक्षा 12 वीं की परीक्षा दे रहे हैं, वे भी आवेदन करने के पात्र हैं। वहीं मास्टर प्रोग्राम यानी एम.एससी. फोरेंसिक विज्ञान कार्यक्रम में प्रवेश के लिए छात्रों को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से फोरेंसिक विज्ञान या प्रासंगिक विषय में कम से कम 50 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातक की डिग्री प्राप्त की होनी चाहिए। अंतिम सेमेस्टर के छात्र भी परीक्षा के लिए आवेदन कर सकते हैं।
पाठ्यक्रम
AIFSET प्रवेश परीक्षा में शामिल होने की इच्छा रखने वाले छात्रों को परीक्षा के सिलेबस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उम्मीदवारों को AIFSET सिलेबस देखने की सलाह दी जाती है ताकि वे परीक्षा में पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों से अवगत हो सकें। यदि कोई उम्मीदवार सिलेबस के अनुसार तैयारी करता है तो परीक्षा में उसके चयन की संभावना बढ़ जाती है।
फोरेंसिक विज्ञान के स्नातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के लिए पाठ्यक्रम अलग-अलग हैं और इसलिए उम्मीदवारों को संबंधित पाठ्यक्रम की जांच करनी चाहिए और उसी के अनुसार तैयारी करनी चाहिए। दोनों पाठ्यक्रमों के अलग-अलग पाठ्यक्रम छात्र AIFSET की आधिकारिक वेबसाइट https://aifset.com/ पर देख सकते हैं।
फोरेंसिक साइंटिस्ट बनने और इस क्षेत्र में अपने ज्ञान को समृद्ध करने के इच्छुक छात्रों के लिए प्रतिष्ठित AIFSET 2024 परीक्षा की तैयारी का समय आ गया है। फोरेंसिक विज्ञान शिक्षा में नए मानक स्थापित करने के लिए निर्धारित यह परीक्षा आपकी लगन और क्षमता के मूल्यांकन का प्रमाण है।
ऑनलाइन आयोजित होने वाली इस परीक्षा में आप अपने पसंदीदा डिवाइस के माध्यम से भाग ले सकते हैं। अकादमिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने की अपनी स्थापित परंपरा के साथ ऑल इंडिया फोरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट (AIFSET) देश के प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्थानों में आपके लिए प्रवेश द्वार खोलने का कार्य करता है।
फोरेंसिक विज्ञान में करियर के अवसर:
AIFSET द्वारा संचालित फोरेंसिक विज्ञान कार्यक्रमों के स्नातक इंटेलिजेंस ब्यूरो, केंद्रीय जांच ब्यूरो और सरकारी फोरेंसिक प्रयोगशालाओं जैसे प्रतिष्ठित संगठनों में करियर के अनेकानेक अवसर हासिल कर सकते हैं। औसतन लगभग आठ लाख रुपये प्रति वर्ष के शुरुआती वेतन के साथ, फोरेंसिक विज्ञान पेशेवर आपराधिक जांच से लेकर डिजिटल फोरेंसिक तक के क्षेत्रों में सार्थक योगदान देने के लिए स्वयं को मजबूत स्थिति में पाते हैं।
उम्मीदवार बिना नेगेटिव मार्किंग के डर के इस परीक्षा में पूछे जाने वाले सभी प्रश्नों को हल करने का प्रयास कर सकते हैं, ताकि उनके ज्ञान और कौशल का व्यापक मूल्यांकन हो सके। यह परीक्षा ऑनलाइन आयोजित की जाएगी, जिससे सभी आवेदकों तक इसकी पहुँच और यह सुविधा सुनिश्चित हो। उम्मीदवार मोबाइल फोन, लैपटॉप या डेस्कटॉप कंप्यूटर का उपयोग करके इसमें भाग ले सकते हैं। AIFSET 2024 परीक्षा की अवधि 60 मिनट की है, जिसमें फोरेंसिक विज्ञान अवधारणाओं और अनुप्रयोगों में उम्मीदवारों की दक्षता का परीक्षण किया जाएगा।
इच्छुक उम्मीदवारों को आवश्यक रूप से 2000 रुपये का नॉन रिफंडेबल आवेदन शुल्क देना होगा। इस शुल्क का UPI, पेटीएम, क्रेडिट/डेबिट कार्ड और नेट बैंकिंग सहित विभिन्न माध्यमों से भुगतान कर सहज पंजीकरण करा सकते हैं। आवेदक को अपने पसंदीदा परिसर का चुनाव करने की सुविधा है, जिससे वे अपनी शैक्षणिक यात्रा को अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप बना सकें।
सफलता के लिए तैयारी:
AIFSET 2024 में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए, उम्मीदवारों को पाठ्यक्रम और परीक्षा पैटर्न की सावधानीपूर्वक समीक्षा करने की सलाह दी जाती है। इस प्रतियोगी परीक्षा में बेहतर परिणाम के लिए व्यापक तैयारी के साथ सभी आवश्यक विषयों को कवर करने और नमूना पत्रों का अभ्यास महत्वपूर्ण है।
चाहे आपमें वैज्ञानिक जांचों के माध्यम से रहस्यों को उजागर करने को लेकर जुनून हो या आप कानूनी प्रणाली में योगदान के इच्छुक हों, AIFSET आपकी आकांक्षाओं को वास्तविकता में बदलने के लिए एक मंच प्रदान करता है। लगन से तैयारी करें, अपने कौशल का प्रदर्शन करें और AIFSET के माध्यम से फोरेंसिक विज्ञान पेशेवर बनने की दिशा में एक सार्थक यात्रा की शुरुआत करें।
अखिल भारतीय फोरेंसिक विज्ञान प्रवेश परीक्षा यानी ऑल इंडिया फोरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट (AIFSET) एक प्रतिष्ठित परीक्षा है जो फोरेंसिक वैज्ञानिक बनने की महत्वाकांक्षा रखने वालों की योग्यता और ज्ञान का मूल्यांकन करती है। ईमानदारी और निष्पक्षता के उच्च मानकों को कायम रखते हुए, AIFSET उन प्रतिभाशाली व्यक्तियों को आकर्षित करता है जिनमें फोरेंसिक विज्ञान में योगदान की इच्छा और जुनून हो।
पैरामेडिकल साइंस का करियर के रूप में चुनाव उन लोगों के लिए एक बेहतरीन निर्णय साबित हो सकता है जिनमें प्रेरणा, दूसरों की मदद करने के जुनून के साथ उनपर अपना सार्थक प्रभाव छोड़ने की इच्छा हो। यह क्षेत्र एक संतोषजनक मार्ग प्रशस्त करता है जहाँ इसके पेशेवर तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करते हैं, रोगियों को स्थिर करते हैं और उनका जीवन बचाते हैं। यह एक ऐसी भूमिका है जो आपको अपार संतुष्टि देती है।
पैरामेडिक्स एक गतिशील वातावरण में काम करते हैं जो अपनी तेज़ गति और निरंतर सीखने के अवसरों के लिए जाना जाता है। वे आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, अस्पतालों, एम्बुलेंस सेवाओं, आपदा प्रबंधन और उससे परे भी महत्वपूर्ण देखभाल और सहायता प्रदान करते हैं।
यह एक महान पेशा है जो समर्पण, करुणा और सामुदायिक सेवा के प्रति प्रतिबद्धता को महत्व देता है। जिन व्यक्तियों में ये गुण हैं और जो जीवन बचाने और दूसरों की सेवा करने पर केंद्रित करियर चाहते हैं, उनके लिए पैरामेडिकल उद्देश्य और प्रभाव से भरा एक पुरस्कृत मार्ग प्रदान करता है।
पहला चरण: ग्लोबल एलाइड हेल्थकेयर एंट्रेंस टेस्ट (GAHET 2024) एक ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा है। उम्मीदवार मोबाइल फोन, लैपटॉप या डेस्कटॉप कंप्यूटर का उपयोग करके इसमें आसानी से भाग ले सकते हैं।
दूसरा चरण: उम्मीदवारों को परीक्षा से 24 घंटे पहले ईमेल के माध्यम से व्यापक परीक्षा दिशानिर्देश और पैरामेडिकल परीक्षा पोर्टल लिंक प्राप्त होगा।
तीसरा चरण: उम्मीदवारों के लिए परीक्षा के दिशानिर्देशों की पूरी तरह से समीक्षा और पैरामेडिकल परीक्षा के लिए उपस्थित होने के दौरान निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।
ग्लोबल एलाइड हेल्थकेयर एंट्रेंस टेस्ट (GAHET 2024) देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने के इच्छुक छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। इन पाठ्यक्रमों की अवधि बैचलर ऑफ साइंस प्रोग्राम के लिए तीन साल और डिप्लोमा और मास्टर ऑफ साइंस प्रोग्राम दोनों के लिए दो साल है।
GAHET 2024 के लिए प्रश्नपत्र पैटर्न
- GAHET 2024 परीक्षा ऑनलाइन आयोजित की जाएगी, जिसमें लैपटॉप या डेस्कटॉप कंप्यूटर के माध्यम से भाग लिया जा सकता है।
- कुल 60 मिनट की अवधि वाला एक एकल प्रश्नपत्र होगा।
- प्रश्नपत्र का माध्यम अंग्रेजी होगा।
- प्रश्नपत्र में कुल 100 अंक होंगे।
- उम्मीदवारों को प्रत्येक सही उत्तर के लिए एक अंक दिया जाएगा। ख़ास बात यह है कि गलत उत्तर के लिए कोई नेगेटिव मार्किंग नहीं होगी।
GAHET 2024 का उद्देश्य पैरामेडिकल विज्ञान के क्षेत्र में उम्मीदवारों की योग्यता और ज्ञान का आकलन करना है, जिससे संबद्ध स्वास्थ्य सेवा में उनके भविष्य के करियर का मार्ग प्रशस्त हो सके। उम्मीदवारों को लगन से तैयारी करने, परीक्षा दिशानिर्देशों का पालन करने और पैरामेडिकल शिक्षा में एक उल्लेखनीय यात्रा शुरू करने के लिए इस अवसर का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
GAHET 2024 के बारे में अधिक जानकारी के लिए, जिसमें पंजीकरण प्रक्रिया और अपडेट शामिल हैं, उम्मीदवारों को www.edInbox.com और www.edInbox.com/hindi वेबसाइट पर जाने की सलाह दी जाती है।
यह GAHET https://gahet.org/ परीक्षा मूल रूप से पैरामेडिकल छात्रों के लिए है, जो विभिन्न मेडिकल विषय सम्बन्धी पाठ्यक्रमों के लिए उम्मीदवारों की योग्यता, ज्ञान और कौशल का मूल्यांकन करती है। स्वास्थ्य देखभाल संबंधी प्रवेश परीक्षा की पात्रता के लिए, उम्मीदवारों को इसके लिए अधिकृत संचालकों द्वारा निर्धारित एक निश्चित सेट या मापक स्तर के योग्य होना चाहिए।
पैरामेडिकल परिणाम घोषित होने के बाद, उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर एक पैरामेडिकल कॉलेज और एक पाठ्यक्रम चुनना होता है। पैरामेडिकल काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान, आवेदक अपने चुने हुए पैरामेडिकल कॉलेजों, निकटतम पैरामेडिकल परिसर और उपलब्ध विभिन्न स्वास्थ्य देखभाल पाठ्यक्रमों, जैसे हेल्थकेयर डिप्लोमा पाठ्यक्रम, 12वीं के बाद पैरामेडिकल पाठ्यक्रम और स्नातक के बाद पैरामेडिकल पाठ्यक्रम से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और यहां तक कि इस क्षेत्र में कैरियर के अवसरों का भी पता लगा सकते हैं। अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं के आधार पर भारत में सर्वश्रेष्ठ पैरामेडिकल कॉलेजों का निर्धारण करने के लिए, हमेशा कई कारकों पर विचार करें और गहन शोध करें।
स्वास्थ्य देखभाल पाठ्यक्रम विभिन्न विशेषज्ञताओं और अवधि के होते हैं, जिनमें डिप्लोमा पाठ्यक्रम, स्नातक पाठ्यक्रम और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शामिल हैं। ये डिग्री कार्यक्रम स्वास्थ्य देखभाल सहायता, निदान प्रक्रियाओं और रोगी देखभाल पर केंद्रित हैं। छात्र अपनी रुचि और करियर लक्ष्य के आधार पर पैरामेडिकल कोर्स चुन सकते हैं। भारत में हेल्थकेयर कॉलेज अपने बुनियादी ढांचे, सहयोग के अवसरों और प्लेसमेंट ड्राइव के लिए जाने जाते हैं। इन कॉलेजों में अक्सर आधुनिक सुविधाएं और शिक्षा के लिए छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण होता है। निजी हेल्थकेयर कॉलेजों को पसंद करने वाले उम्मीदवार निर्णय लेने के लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों, संकायों, संबद्धताओं और कैरियर प्रॉस्पेक्टस का पता लगा सकते हैं।
पैरामेडिक्स को करियर का चयन उन उम्मीदवारों के लिए एक बेहतर विकल्प है जो संबद्ध स्वास्थ्य देखभाल और दूसरों की मदद करने को लेकर उत्साह होता है। यह क्षेत्र लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए कई अवसर प्रदान करते हुए करियर का मार्ग प्रशस्त करता है। एक स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर के रूप में, आप तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान कर सकते हैं, रोगियों को स्थिति को स्थिर कर सकते हैं और उनका जीवन बचा सकते हैं। पैरामेडिकल क्षेत्र अपनी तीव्र गति और गतिशील प्रकृति के लिए जाना जाता है। यह डोमेन हर दिन सीखने और बढ़ने का अवसर बनाता है। पैरामेडिक्स जरूरतमंद व्यक्तियों को आवश्यक चिकित्सा देखभाल, परिवहन और सहायता प्रदान करने में सबसे आगे हैं। इन पेशेवरों की अस्पतालों, एम्बुलेंस सेवाओं, आपातकालीन कक्षों और विभिन्न अन्य स्वास्थ्य देखभाल संगठनों में आवश्यकता होती है।
स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में होने के नाते, आप एक महान पेशे का हिस्सा बन जाते हैं जहां जीवन बचाना और समुदाय की सेवा करना लक्ष्य है। इस क्षेत्र में ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता है जो समर्पित, दयालु हों और दूसरों की मदद करने की वास्तविक इच्छा रखते हों। यदि किसी में ये गुण हैं और वह बदलाव लाने में विश्वास रखता है, तो पैरामेडिकल पेशेवर बनने के लिए यह डोमेन एक उत्कृष्ट विकल्प है।
डिप्लोमा कार्यक्रमों, स्नातक कार्यक्रमों और स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में पेश किए जाने वाले विभिन्न पाठ्यक्रम फिजियोथेरेपी, ऑपरेशन थिएटर, व्यावसायिक थेरेपी, ऑप्टोमेट्री, कार्डियक टेक्नोलॉजी, एनेस्थीसिया, रेडियोलॉजी और इमेजिंग टेक्नोलॉजी, एक्स-रे तकनीशियन, मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी, न्यूरोपैथी और योग विज्ञान हैं। इन विशेषज्ञताओं में करियर की अलग-अलग संभावनाएं हैं।
जो उम्मीदवार संबद्ध स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं, उन्हें हमारी GAHET परीक्षा 2024 देने की सलाह दी जाती है।
Current Events
'सिटी ऑफ जॉय' कहे जाने वाले कोलकाता शहर में 16 अप्रैल का दिन वाकई उत्साह से भरा रहा, जब 'एडइनबॉक्स' ने अपना विस्तार करते हुए यहाँ के लोगों के लिए अपनी नई ब्रांच का शुभारम्भ किया। ख़ास बात यह रही कि इस मौके पर इटली से आये मेहमानों के साथ 'एडइनबॉक्स' की पूरी टीम मौजूद थी। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में उदघाटित इस कार्यालय से पूर्व 'एडइनबॉक्स' की शाखाएं दिल्ली, भुवनेश्वर, लखनऊ और बैंगलोर जैसे शहरों में पहले से कार्य कर रही हैं।
कोलकाता में एडइनबॉक्स की नयी ब्रांच के उद्घाटन कार्यक्रम में इटली के यूनिमार्कोनी यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधिमंडल की गरिमामयी उपस्थिति ने इस अवसर को तो ख़ास बनाया ही, सहयोग और साझेदारी की भावना को भी इससे बल मिला। विशिष्ट अतिथियों आर्टुरो लावेल, लियो डोनाटो और डारिना चेशेवा ने 'एडइनबॉक्स' के एडिटर उज्ज्वल अनु चौधरी, बिजनेस और कंप्यूटर साइंस के डोमेन लीडर डॉ. नवीन दास, ग्लोबल मीडिया एजुकेशन काउंसिल डोमेन को लीड कर रहीं मनुश्री मैती और एडिटोरियल कोऑर्डिनेटर समन्वयक शताक्षी गांगुली के नेतृत्व में कोलकाता टीम के साथ हाथ मिलाया।
समारोह की शुरुआत अतिथियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत से हुई। तत्पश्चात दोनों पक्षों के बीच विचारों और दृष्टिकोणों का सकारात्मक आदान-प्रदान हुआ। डारिना ने पारम्परिक तरीके से रिबन काटकर आधिकारिक तौर पर कार्यालय का उद्घाटन किया और इस मौके को आपसी सहयोग के प्रयासों की दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। बाकायदा इस दौरान यूनिमार्कोनी विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल और EdInbox.com टीम के बीच एक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर भी हुआ। यह पहल शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और प्रगति के लिए साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक छात्रों का नेतृत्व कर इस पहल से उन्हें सशक्त बनाया जा सकता है ताकि वे वैश्विक मंचों पर सफलता के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।
समारोह के समापन की वेला पर दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे को स्मारिकाएं भेंट की गयीं। 'एडइनबॉक्स' की नई ब्रांच के उद्घाटन के साथ इस आदान-प्रदान की औपचारिकता से दोनों टीमों के बीच मित्रता और सहयोग के बंधन भी उदघाटित हुए।अंततः वक़्त मेहमानों को अलविदा कहने का था, 'एडइनबॉक्स' की कोलकाता टीम ने अतिथियों को विदा तो किया मगर इस भरोसे और प्रण के साथ कि यह नयी पहल भविष्य में संबंधों की प्रगाढ़ता और विकास के नए ठौर तक पहुंचेगी।
डिज़ाइन केवल सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विभिन्न क्षेत्रों के साथ जुड़कर समस्याओं को हल करने का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। बदलते समय और तकनीकी प्रगति के साथ, मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन शिक्षा की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है। आज डिज़ाइन केवल ग्राफिक, फैशन या इंटीरियर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे इंजीनियरिंग, मेडिकल साइंस, बिजनेस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) जैसे क्षेत्रों के साथ जोड़ा जा रहा है।
मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन शिक्षा क्या है?
मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न शैक्षिक क्षेत्रों (डोमेन) के सिद्धांतों, तकनीकों और दृष्टिकोणों को एक साथ लाकर अभिनव समाधान विकसित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, एक उत्पाद डिज़ाइनर को न केवल सौंदर्य और उपयोगिता पर ध्यान देना होता है, बल्कि सामग्री विज्ञान, उपभोक्ता व्यवहार और व्यावसायिक रणनीतियों को भी समझना होता है।
मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन की बढ़ती आवश्यकता क्यों?
1. जटिल समस्याओं के लिए समग्र समाधान
आधुनिक दुनिया की समस्याएँ जटिल और बहुआयामी (Complex and Multifaceted) हैं। जैसे कि स्मार्ट सिटी डिज़ाइन में आर्किटेक्चर, पर्यावरणीय डिज़ाइन, डिजिटल टेक्नोलॉजी और मानव केंद्रित डिज़ाइन (Human-Centered Design) का समावेश आवश्यक है।
2. उद्योग की बढ़ती माँग
आज कंपनियाँ ऐसे पेशेवरों की तलाश कर रही हैं जो डिज़ाइन के साथ-साथ बिजनेस, टेक्नोलॉजी और मनोविज्ञान को भी समझते हों। मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइनर उत्पाद विकास, डिजिटल मार्केटिंग, हेल्थकेयर और स्मार्ट टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला सकते हैं।
3. नवाचार (Innovation) को बढ़ावा
जब डिज़ाइन विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ता है, तो नवाचार की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। उदाहरण के लिए, Apple जैसी कंपनियाँ डिज़ाइन और टेक्नोलॉजी को जोड़कर उपयोगकर्ता के लिए बेहतरीन अनुभव (User Experience) प्रदान करती हैं।
4. सतत विकास और पर्यावरण अनुकूल डिज़ाइन
ग्रीन डिज़ाइन और सस्टेनेबल प्रैक्टिस (Sustainable Practices) को अपनाने के लिए इंजीनियरिंग, पर्यावरण विज्ञान और डिज़ाइन का समावेश अनिवार्य हो गया है।
मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन शिक्षा के प्रमुख क्षेत्र
1. UX/UI डिज़ाइन + साइकोलॉजी – उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर बनाने के लिए मनोविज्ञान और इंटरफेस डिज़ाइन का समावेश।
2. प्रोडक्ट डिज़ाइन + सामग्री विज्ञान – अधिक टिकाऊ और प्रभावी उत्पाद बनाने के लिए सामग्री और इंजीनियरिंग डिज़ाइन का मेल।
3. फैशन डिज़ाइन + टेक्नोलॉजी – स्मार्ट फैब्रिक्स और AI-इंटीग्रेटेड परिधानों का विकास।
4. आर्किटेक्चर + सस्टेनेबिलिटी – ऊर्जा कुशल भवन और हरित संरचनाओं का निर्माण।
5. ग्राफिक डिज़ाइन + डेटा साइंस – इंफोग्राफिक्स और डेटा विज़ुअलाइज़ेशन का उपयोग कर जटिल डेटा को सरल रूप में प्रस्तुत करना।
भारत में मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन शिक्षा का भविष्य
भारत में डिज़ाइन संस्थान जैसे कि NID, IITs, और अन्य विश्वविद्यालय अब मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दे रहे हैं। डिजिटल युग में, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी विभिन्न विषयों को जोड़कर छात्रों को नया सीखने का अवसर दे रहे हैं।
मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन शिक्षा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। यह छात्रों को जटिल समस्याओं के लिए समग्र समाधान विकसित करने में मदद करता है और उन्हें उद्योग में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है। यदि भारत को वैश्विक डिज़ाइन हब बनना है, तो मल्टीडिसिप्लिनरी डिज़ाइन शिक्षा को मुख्यधारा में लाना अनिवार्य होगा।
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ कृषि न केवल अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत भी है। कृषि क्षेत्र को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीकों से उन्नत बनाने के लिए कृषि शिक्षा की आवश्यकता महत्वपूर्ण रही है। भारत में कृषि शिक्षा का विकास प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक विभिन्न चरणों से गुजरा है।
1. प्राचीन काल में कृषि शिक्षा
प्राचीन भारत में कृषि को एक पवित्र कार्य माना जाता था, और इसका उल्लेख ऋग्वेद, अर्थशास्त्र, और मनुस्मृति में मिलता है। प्राचीन काल में किसानों को पारंपरिक ज्ञान और अनुभव के आधार पर खेती के गुर सिखाए जाते थे। प्राचीन गुरुकुलों में भी कृषि से संबंधित शिक्षा दी जाती थी, लेकिन यह मौखिक रूप में थी। मौर्यकाल (321-185 ई.पू.) में चाणक्य के "अर्थशास्त्र" में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए योजनाओं का उल्लेख मिलता है।
2. ब्रिटिश काल में कृषि शिक्षा का विकास
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में संगठित कृषि शिक्षा की नींव रखी गई। 1877 में भारत का पहला कृषि विद्यालय साहारणपुर (उत्तर प्रदेश) में स्थापित किया गया।1905 में अंग्रेजों ने इंपीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) की स्थापना की, जिसे 1936 में पूसा, बिहार से नई दिल्ली स्थानांतरित किया गया। 1920 में ब्रिटिश शासन ने मद्रास, पुणे, और कानपुर में कृषि कॉलेज स्थापित किए।
3. स्वतंत्रता के बाद कृषि शिक्षा का विस्तार
आजादी के बाद सरकार ने कृषि शिक्षा के विकास को प्राथमिकता दी। 1960 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) को पुनर्गठित किया गया, जिससे कृषि अनुसंधान और शिक्षा को नई दिशा मिली। 1965 में हरित क्रांति के दौरान कृषि शिक्षा को वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से उन्नत बनाया गया। 1970 में कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना को बढ़ावा दिया गया और "लैण्ड ग्रांट सिस्टम" को अपनाया गया, जो अमेरिका से प्रेरित था।
4. कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना
भारत में पहला कृषि विश्वविद्यालय 1960 में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (पंतनगर, उत्तराखंड) में स्थापित किया गया। वर्तमान में भारत में 75 से अधिक कृषि विश्वविद्यालय और 1000 से अधिक कृषि महाविद्यालय हैं। प्रमुख कृषि विश्वविद्यालय पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयंबटूर, आचार्य एन.जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश, राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर हैं।
5. हरित क्रांति और कृषि शिक्षा
1960-70 के दशक में हरित क्रांति के कारण कृषि शिक्षा को और अधिक वैज्ञानिक बनाया गया। कृषि विश्वविद्यालयों में नई फसल प्रजातियों, उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई तकनीकों पर शोध किए गए। ICAR ने नए कृषि पाठ्यक्रम तैयार किए और कृषि अनुसंधान को बढ़ावा दिया।
6. आधुनिक कृषि शिक्षा और डिजिटल युग
आज कृषि शिक्षा को डिजिटल तकनीकों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जोड़ा जा रहा है। ई-लर्निंग और ऑनलाइन कोर्स: कई कृषि विश्वविद्यालय अब ऑनलाइन शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। आधुनिक पाठ्यक्रमों में ड्रोन तकनीक, सेंसर आधारित खेती, और डेटा एनालिटिक्स को जोड़ा गया है। ICAR के तहत कृषि शिक्षा को सशक्त बनाने के लिए 2017 में नेशनल एग्रीकल्चरल हायर एजुकेशन प्रोजेक्ट (NAHEP) शुरू किया गया।
7. कृषि शिक्षा से संबंधित सरकारी योजनाएँ
भारत सरकार ने कृषि शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय कृषि शिक्षा योजना (2016) कृषि शिक्षा में नवाचार और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई। राष्ट्रीय कृषि उच्चतर शिक्षा परियोजना (NAHEP) की शुरुआत कृषि विश्वविद्यालयों को आधुनिक बनाने के लिए की गई थी।राष्ट्रिय कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा नेटवर्क (NAREN) का मकसद डिजिटल तकनीकों से कृषि शिक्षा को जोड़ना है।
8. कृषि शिक्षा की चुनौतियाँ और समाधान
कृषि शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी, किसानों और छात्रों के बीच तकनीकी अंतर, नई तकनीकों को अपनाने में धीमी गति, कृषि स्नातकों के लिए सीमित रोजगार अवसर आदि कृषि शिक्षा की मुख्य चुनौतियाँ हैं।
कृषि पाठ्यक्रम में इनोवेशन और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देना, व्यावसायिक प्रशिक्षण पर अधिक ध्यान देना, कृषि विश्वविद्यालयों में इंडस्ट्री और कृषि क्षेत्र के बीच तालमेल स्थापित करना, डिजिटल और स्मार्ट कृषि को पाठ्यक्रम में शामिल करना कृषि शिक्षा की मुख्य चुनौतियों के संभावित समाधान हैं।
भारत में कृषि शिक्षा का विकास प्राचीन काल से आधुनिक डिजिटल युग तक लगातार हुआ है। आज के समय में कृषि शिक्षा केवल परंपरागत खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्मार्ट एग्रीकल्चर, कृषि उद्यमिता, और जैव प्रौद्योगिकी जैसे आधुनिक क्षेत्रों तक विस्तृत हो गई है। यदि कृषि शिक्षा को और अधिक व्यावहारिक और तकनीकी बनाया जाए, तो यह भारत को कृषि आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली में आजादी के बाद से कई सुधार हुए हैं, लेकिन सीखने का संकट अब भी बना हुआ है। शिक्षा की पहुंच भले ही बढ़ी हो, लेकिन बुनियादी साक्षरता का स्तर चिंताजनक रूप से कम है। शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (एएसईआर) लगातार यह दर्शा रही है कि कक्षा पाँच के लगभग आधे छात्र दूसरी कक्षा की सरल पाठ्य सामग्री पढ़ने में भी संघर्ष करते हैं।
इसके विपरीत, चीन जैसे देशों ने प्राथमिक शिक्षा में दशकों तक रणनीतिक निवेश करके ठोस परिणाम हासिल किए हैं। भारत अब तक इस दिशा में डाटा-आधारित दृष्टिकोण अपनाने में पिछड़ा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम (पीआईएसए) जैसे वैश्विक मूल्यांकनों से दूरी बनाए रखना भारत की शिक्षा प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने से रोक रहा है। स्पष्ट है कि मूल्यांकन और पाठ्यक्रम को व्यवस्थित करने के बिना कोई भी सुधार टिकाऊ नहीं हो सकता।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए कई महत्वपूर्ण सुधार प्रस्तावित किए हैं। लेकिन यदि हमें 2047 तक एक विकसित भारत का सपना साकार करना है, तो हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को मौलिक रूप से बदलना होगा। इस परिदृश्य में निजी स्कूलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
निजी स्कूलों की बढ़ती जिम्मेदारी
सरकारी स्कूलों की चुनौतियों और सीमाओं के चलते निजी स्कूलों की भूमिका बढ़ी है। आज कई राज्यों में 50% से अधिक छात्र निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। हालांकि, यह क्षेत्र अभी भी असंगठित है, जिससे नवाचार और बेहतरीन शैक्षिक मॉडल का व्यापक प्रसार नहीं हो पा रहा है। प्रतिस्पर्धा के चलते सफल प्रयोग केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित रह जाते हैं।
इसके बावजूद, कई निजी स्कूलों ने बहुभाषी शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम और आधुनिक तकनीक को अपनाकर छात्रों को वैश्विक भविष्य के लिए तैयार किया है। टेक कंपनियों के सहयोग से कक्षाओं को डिजिटल, व्यक्तिगत और अधिक आकर्षक बनाया गया है। हालांकि, ये सुविधाएँ अभी भी अधिकतर महंगे और शहरी स्कूलों तक सीमित हैं।
सार्वजनिक-निजी सहयोग की जरूरत
शिक्षा सुधार को सफल बनाने के लिए सरकार और निजी स्कूलों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। सरकारी नीतियों और निजी क्षेत्र की नवाचार क्षमता का एकीकृत उपयोग करके शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
डाटा-आधारित निर्णय: निजी स्कूलों को शिक्षा के स्तर को मापने और सुधारने के लिए डेटा-संचालित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
साझा संसाधन: सरकारी और निजी स्कूलों के बीच संसाधनों का आदान-प्रदान बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि शिक्षा का स्तर समान रूप से सुधर सके।
तकनीकी नवाचार: एआई, ऑनलाइन लर्निंग और अन्य एड-टेक समाधानों को प्राथमिक शिक्षा तक पहुँचाया जाना चाहिए।
जवाबदेही और पारदर्शिता: निजी स्कूलों को केवल मुनाफे तक सीमित रहने के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की दिशा में भी काम करना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि निजी प्रयासों ने विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार को आगे बढ़ाया है, फिर शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी को संदेह की नजर से क्यों देखा जाए? यदि निजी स्कूल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सक्षम हैं, तो उन्हें नीति निर्माण और शिक्षा सुधार के केंद्र में भी रहना चाहिए।
2047 का लक्ष्य और शिक्षा का पुनर्परिभाषीकरण
यदि भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो शिक्षा को मौलिक रूप से पुनर्परिभाषित करना होगा। इसमें निजी स्कूलों की भूमिका केवल एक शिक्षण संस्थान की नहीं, बल्कि नवाचार और व्यापक परिवर्तन के केंद्र के रूप में होनी चाहिए। निजी क्षेत्र को आगे आकर न केवल अपने संस्थानों को बेहतर बनाना चाहिए, बल्कि पूरे शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुधारने में योगदान देना चाहिए।
अब समय आ गया है कि शिक्षा के क्षेत्र में राज्य, निजी संस्थान और तकनीकी कंपनियाँ मिलकर काम करें। तभी हम एक ऐसी शिक्षा प्रणाली बना पाएंगे, जो गुणवत्ता, समानता और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप होगी।
फिजिक्सवाला (Physics Wallah) द्वारा 'Drishti IAS' के अधिग्रहण की खबर ने Edtech क्षेत्र में हलचल मचा दी है। अलख पांडे द्वारा स्थापित इस Edtech यूनिकॉर्न कंपनी, जो मुख्य रूप से JEE और NEET परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए जानी जाती है, अब UPSC और राज्य लोक सेवा आयोग (PSC) परीक्षाओं के क्षेत्र में कदम रखने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, फिजिक्सवाला ने विकास दिव्यकीर्ति की प्रमुख UPSC कोचिंग संस्था 'Drishti IAS' को 2500-3000 करोड़ रुपये में खरीदने का प्रस्ताव रखा है। अगर यह डील सफल होती है, तो यह Edtech सेक्टर में सबसे बड़ी अधिग्रहण डील साबित होगी।
फिजिक्सवाला का बड़ा कदम
'Physics Wallah' की सफलता मुख्य रूप से ऑनलाइन कोचिंग और सस्ती शिक्षा प्रदान करने के उनके मॉडल पर आधारित है। अब, कंपनी की योजना है कि वह UPSC मार्केट में अपनी मौजूदगी बढ़ाए, और 'Drishti IAS' के अधिग्रहण के माध्यम से यह लक्ष्य हासिल कर सकती है। 'Drishti IAS' पिछले 26 वर्षों से UPSC की तैयारी कराने में एक बड़ा नाम बन चुका है, और वित्तीय वर्ष 2024 में इसका रेवेन्यू ₹405 करोड़ रहा, जिसमें ₹90 करोड़ का शुद्ध मुनाफा भी था। यह अधिग्रहण फिजिक्सवाला के लिए एक बड़ी रणनीतिक वृद्धि हो सकती है, क्योंकि इससे उसे UPSC के बेहद प्रतिस्पर्धी और हाई-डिमांड मार्केट में प्रवेश मिलेगा।
डील के बारे में क्या कहा गया है?
एडटेक यूनिकॉर्न फिजिक्सवाला का 'Drishti IAS' के अधिग्रहण को लेकर विभिन्न रिपोर्ट्स सामने आई हैं, जिनके मुताबिक यह डील कई चरणों (Tranches) में संपन्न होगी, और इसकी कीमत Drishti IAS के भविष्य के प्रदर्शन से जुड़ी होगी। हालांकि, Drishti IAS के CEO, विवेक तिवारी ने इन खबरों को अफवाह बताया है और कहा है, "हम IPO बैंकरों, प्राइवेट इक्विटी निवेशकों और अन्य Edtech कंपनियों से मिल रहे हैं, लेकिन अभी तक कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है।"
क्या यह डील फिजिक्सवाला के लिए सही कदम है?
फिजिक्सवाला का यह कदम UPSC मार्केट में विस्तार के लिए अहम हो सकता है। 'Drishti IAS' की मजबूत ऑफलाइन मौजूदगी, फिजिक्सवाला के ऑनलाइन कोचिंग मॉडल के साथ मिलकर कंपनी को अधिक व्यापक ग्राहक आधार तक पहुंचने में मदद कर सकती है। वित्तीय वर्ष 2024 में फिजिक्सवाला का रेवेन्यू ₹1,940 करोड़ था, लेकिन नेट लॉस ₹1,131 करोड़ तक पहुंच गया था। इस अधिग्रहण के माध्यम से कंपनी को डायवर्सिफिकेशन का लाभ मिल सकता है, और यह उसे ऑफलाइन शिक्षा क्षेत्र में भी मजबूती प्रदान करेगा।
इस डील से Edtech सेक्टर पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
यदि 'Drishti IAS' का अधिग्रहण हो जाता है, तो यह Edtech मार्केट में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। फिजिक्सवाला, जो पहले JEE और NEET की तैयारी के लिए प्रसिद्ध था, अब UPSC कोचिंग सेगमेंट में भी प्रवेश करेगा, जो शिक्षा के क्षेत्र का एक अहम और हाई-डिमांड हिस्सा है। हालांकि, एक सवाल यह भी उठता है कि क्या फिजिक्सवाला ओवर-एक्सपेंशन का शिकार होगा, जैसा कि पहले बायजूस के साथ हुआ था। बायजूस ने आकाश इंस्टिट्यूट को खरीदा था, लेकिन बाद में उसे भारी वित्तीय नुकसान हुआ था।
Drishti IAS: एक प्रमुख UPSC कोचिंग संस्थान
'Drishti IAS' की स्थापना विकास दिव्यकीर्ति ने की थी, और यह भारत की सबसे लोकप्रिय UPSC कोचिंग संस्थाओं में से एक है। इस संस्थान का मुखर्जी नगर, दिल्ली में स्थित सेंटर, कुल रेवेन्यू का 58% योगदान करता है। अन्य प्रमुख सेंटर प्रयागराज, जयपुर और करोल बाग में स्थित हैं, और इसने पिछले कुछ वर्षों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाई है।
Physics Wallah का भविष्य
फिजिक्सवाला की शुरुआत 2016 में अलख पांडे द्वारा एक यूट्यूब चैनल के रूप में की गई थी, जो अब एक बड़ा Edtech ब्रांड बन चुका है। फिजिक्सवाला ने वित्तीय वर्ष 2024 में ₹1,940 करोड़ का रेवेन्यू हासिल किया, जो पिछले साल से 160% अधिक है। हालांकि, बढ़ते खर्चों के कारण कंपनी को ₹1,131 करोड़ का घाटा हुआ। अब, फिजिक्सवाला का फोकस ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफलाइन कोचिंग पर भी है और FY25 तक ₹1,000 करोड़ की ऑफलाइन कमाई का लक्ष्य रखा गया है।
यदि 'Drishti IAS' का अधिग्रहण फिजिक्सवाला के द्वारा किया जाता है, तो यह Edtech सेक्टर में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। हालांकि, इसके साथ जुड़े जोखिम और अवसर दोनों हैं। कंपनी के लिए यह एक बड़ा कदम हो सकता है, जो उसे UPSC कोचिंग सेगमेंट में सफलता दिला सकता है, लेकिन इस क्षेत्र में ओवर-एक्सपेंशन के खतरे को भी नकारा नहीं जा सकता।
बॉलीवुड की कई ऐसी फिल्में रही हैं, जिन्हें सेंसर बोर्ड ने पहले बैन कर दिया था, लेकिन कानूनी लड़ाई और विवादों के बाद इन्हें रिलीज की अनुमति मिल गई। इन फिल्मों में राजनीति, सामाजिक मुद्दे, यौन सामग्री और धार्मिक विषयों को लेकर आपत्तियां उठाई गई थीं। हाल ही में ऑस्कर 2025 के लिए यूके की आधिकारिक एंट्री 'संतोष' को भारत में रिलीज नहीं किया जा रहा है, क्योंकि सेंसर बोर्ड ने इसमें पुलिस के चित्रण पर आपत्ति जताई है। इससे पहले भी कई फिल्मों को इसी तरह प्रतिबंधित किया गया था, लेकिन बाद में वे दर्शकों तक पहुंचीं। आइए, ऐसी 7 चर्चित फिल्मों पर नजर डालते हैं जो पहले बैन हुईं, लेकिन बाद में रिलीज कर दी गईं।
1. आंधी (1975)
इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल के दौरान इस फिल्म को बैन कर दिया था, क्योंकि इसे उनकी निजी जिंदगी से प्रेरित बताया जा रहा था। हालांकि, 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद यह फिल्म रिलीज हुई। फिल्म में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन मुख्य भूमिकाओं में थे और यह कमलेश्वर के उपन्यास 'काली आंधी' पर आधारित थी।
2. बैंडिट क्वीन (1994)
यह फिल्म फूलन देवी की जीवन कहानी पर आधारित थी, लेकिन फूलन देवी ने खुद इस पर आपत्ति जताई और फिल्म की सत्यता पर सवाल खड़े किए। फिल्म में यौन हिंसा और जातिगत भेदभाव के मुद्दे दिखाए गए थे, जिससे सेंसर बोर्ड भी असहज था। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद कुछ समय तक इसे रिलीज से रोक दिया गया, लेकिन बाद में यह दर्शकों के सामने आई।
3. कामसूत्र: ए टेल ऑफ लव (1996)
इस फिल्म को इसके यौन दृश्यों के कारण सेंसर बोर्ड ने बैन कर दिया था। हालांकि, दो मिनट के न्यूड सीन हटाने के बाद इसे भारत में रिलीज किया गया, जबकि विदेशी संस्करण में ये सीन शामिल रहे।
4. फायर (1996)
फिल्म में समलैंगिक संबंधों को दिखाए जाने के कारण हिंदू कट्टरपंथियों ने थिएटरों पर हमला कर दिया था। इस विरोध के कारण इसे थिएटर से हटा दिया गया और सेंसर बोर्ड के पास वापस भेजा गया। बाद में CBFC द्वारा सुझाए गए कुछ कट्स के साथ फिल्म को फिर से रिलीज किया गया।
5. हवाएं (2003)
यह फिल्म 1984 के सिख विरोधी दंगों पर आधारित थी। दिल्ली, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा जैसे राज्यों में इसे रिलीज से रोक दिया गया, लेकिन बाद में इसे कुछ संशोधनों के साथ रिलीज किया गया।
6. ब्लैक फ्राइडे (2005)
यह फिल्म 1993 के बॉम्बे बम धमाकों पर आधारित थी। बॉम्बे हाई कोर्ट में विचाराधीन कैदियों की याचिका के चलते फिल्म की रिलीज टाल दी गई। निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया। अंततः यह फिल्म 9 फरवरी 2007 को रिलीज हुई।
7. वाटर (2005)
इस फिल्म की शूटिंग के दौरान वाराणसी में कट्टरपंथी संगठनों ने इसका विरोध किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने 31 जनवरी 2000 को शूटिंग रोकने का आदेश दिया, जिसके बाद फिल्म की शूटिंग श्रीलंका में पूरी की गई। कानूनी लड़ाई के बाद यह फिल्म मार्च 2007 में भारत में रिलीज हुई।
इन फिल्मों ने सेंसर बोर्ड और समाज की कड़ी आपत्तियों का सामना किया, लेकिन अपनी कहानी की ताकत और कानूनी लड़ाई के दम पर अंततः पर्दे पर जगह बना ली। आज ये फिल्में भारतीय सिनेमा के सबसे चर्चित और विवादित उदाहरणों में गिनी जाती हैं।
बेंगलुरु के लैगरे की रहने वाली 25 वर्षीय अनन्या आर., जिन्होंने पर्यटन और यात्रा प्रबंधन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है, एक अनोखे मिशन पर हैं। उनका उद्देश्य कर्नाटक की एडवेंचर पर्यटन क्षमता को उजागर करना और यह साबित करना है कि महिलाएँ अकेले भी सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से सुरक्षित यात्रा कर सकती हैं। उन्होंने 25 जनवरी को अपनी यात्रा शुरू की थी और अब तक रामनगर, कोडागु, कारवार, बादामी, बांदीपुर, चिकमंगलूर, शिवमोगा सहित 20 जिलों का सफर पूरा कर चुकी हैं।
प्रत्येक जिले में उन्होंने विभिन्न रोमांचक गतिविधियों का अनुभव किया, जैसे कि कोडागु में रिवर राफ्टिंग, कारवार में पैरासेलिंग, बादामी में रॉक क्लाइम्बिंग और बांदीपुर में जंगल सफारी।
यात्रा का वर्तमान चरण और आगे की योजना
मार्च के अंत तक अनन्या 11 और जिलों की यात्रा पूरी कर चुकी होंगी। अगले चरण में वे दक्षिण कर्नाटक के जिलों का दौरा करेंगी, जहाँ वे ट्रेकिंग, पैराग्लाइडिंग और अन्य साहसिक गतिविधियों में हिस्सा लेंगी। अनन्या का कहना है, "अब तक की यात्रा रोमांचक रही है, और मैं बाकी जिलों में और अधिक अनूठे अनुभवों का इंतजार कर रही हूँ।"
परिवार और संगठनों का सहयोग
अनन्या की इस यात्रा में उनके परिवार का पूरा सहयोग मिल रहा है। उनकी माँ रेखा, जो खुद भी एडवेंचर की शौकीन रही हैं, अपनी बेटी को इस यात्रा के लिए प्रेरित करती रही हैं। इसके अलावा, जनरल थिमैया नेशनल एकेडमी ऑफ एडवेंचर और केएसटीडीसी से भी उन्हें समर्थन मिल रहा है, जिससे उन्हें कुछ स्थानों पर मुफ्त आवास और भोजन की सुविधा मिली है।
सार्वजनिक परिवहन का विशेष उपयोग
अनन्या केवल बस, ट्रेन और साझा वाहनों का उपयोग कर रही हैं ताकि वे स्थानीय लोगों के साथ घुल-मिल सकें और कर्नाटक की विविधता को करीब से देख सकें। उन्होंने कहा, "सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से यात्रा करना न केवल सस्ता है, बल्कि यह स्थानीय लोगों की जीवनशैली को समझने में भी मदद करता है।"
अपनी यात्रा के माध्यम से अनन्या एडवेंचर टूरिज्म को बढ़ावा देने के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रेरित करना चाहती हैं कि वे बेझिझक यात्रा कर सकती हैं। उन्होंने कहा, "अगर आपमें आत्मविश्वास है और आप सही योजना बनाते हैं, तो अकेले यात्रा करना मुश्किल नहीं है।"
अनन्या की यात्रा अप्रैल में समाप्त होगी, जिसके बाद वे अपने अनुभवों को ब्लॉग और डॉक्यूमेंट्री के रूप में प्रस्तुत करने की योजना बना रही हैं।
More Articles
एडइनबॉक्स के साथ रहें शिक्षा जगत की ताजा खबरों से अपडेट
आज की तेज भागती-दौड़ती दुनिया में शिक्षा जगत की नवीनतम जानकारियों और ताजा गतिविधियों से परिचित रहना शिक्षकों, इस क्षेत्र के प्रशासकों, छात्रों और अभिभावकों सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। शिक्षा के बढ़ते दायरे के साथ स्वयं को इसके अनुकूल बनाने और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए इससे संबंधित रुझानों, नीतियों और नवाचारों से अवगत रहना भी आवश्यक है। एडइनबॉक्स जैसा मंच शिक्षा जगत से जुड़ी हर खबर के लिए 'वन-स्टॉप डेस्टिनेशन' उपलब्ध कराता है यानी एक मंच पर सारी जरूरी जानकारियां। एडइनबॉक्स यह सुनिश्चित करता है कि आप मीडिया व शिक्षा जगत की हर हलचल, हर खबर से बाखबर रहें।
क्यों महत्वपूर्ण हैं शिक्षा जगत की खबरें?
शिक्षा जगत की खबरों से तात्पर्य इस क्षेत्र से जुड़े विविध विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला है, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धतियों में बदलाव से लेकर शैक्षिक नीतियों और सुधारों पर अपडेट तक। इसमें स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा प्रौद्योगिकी और शिक्षाशास्त्र में प्रगति संबंधी गतिविधियां भी शामिल हैं। शिक्षा जगत से संबंधित समाचारों से अपडेट रहना इससे जुड़े लोगों को ठोस निर्णय लेने, सर्वोत्तम विधाओं को लागू करने और शिक्षा क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने में मददगार साबित होता है।
मीडिया-शिक्षा की भूमिका
लेख, वीडियो, पॉडकास्ट और इन्फोग्राफिक्स सहित मीडिया-शिक्षा, शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के बीच सूचना के प्रसार और महत्वपूर्ण विमर्शों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चाहे वह नवीन शिक्षण पद्धतियां की खोज हो, सफलता की गाथाओं को लोगों के समक्ष लाना हो, या फिर शिक्षकों के सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की बात हो, मीडिया-शिक्षा शिक्षण और सीखने के अनुभवों को बढ़ाने के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि और संसाधन मुहैया कराती है।
एडइनबॉक्स: शैक्षिक समाचारों का भरोसेमंद स्रोत
एडइनबॉक्स शिक्षा जगत की खबरों की व्यापक कवरेज को समर्पित एक अग्रणी मंच है। यह आपके लिए एक जरूरी साधन है, जो आपके लक्ष्यों के संधान में आपकी मदद करता है क्योंकि यहां आपके लिए है:
विविधतापूर्ण सामग्री: एडइनबॉक्स दुनियाभर से शिक्षा के तमाम पहलुओं का समावेश करते हुए लेख, साक्षात्कार, वीडियो और पॉडकास्ट सहित विविध प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराता है। चाहे आपकी रुचि के विषयों में के-12 शिक्षा, उच्च शिक्षा, एडटेक, या शैक्षिक नीतियां शामिल हों, एडइनबॉक्स पर आपको इससे संबंधित प्रासंगिक और महत्वपूर्ण सामग्री मिलेगी।
समय पर अपडेट: शिक्षा तेज गति से विकास कर रहा क्षेत्र है, जहां की नवीनतम गतिविधियों से अपडेट रहना हर किसी के लिए जरूरी है। और, एडइनबॉक्स वह मंच है जो शिक्षा जगत की हर नवीन जानकारियों को समय पर आप तक पहुंचाकर आपको अपडेट करता है। यह सुनिश्चित करता है कि आप इस क्षेत्र की हर गतिविधि को लेकर जागरूक रहें। चाहे वह ब्रेकिंग न्यूज हो या इसका गहन विश्लेषण, आप खुद को अपडेट रखने के लिए एडइनबॉक्स पर भरोसा कर सकते हैं।
विशेषज्ञ अंतदृष्टि: एडइनबॉक्स का संबंध शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों और विचारवान प्रणेताओं से है। ख्यात शिक्षकों और शोधकर्ताओं से लेकर नीति निर्माताओं और उद्योग के पेशेवरों तक, आप इस मंच पर मूल्यवान अंतदृष्टि और दृष्टिकोण से परिचित होंगे जो आपको न सिर्फ जागरूक करता है बल्कि आपके निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी धारदार बनाता है।
इंटरएक्टिव समुदाय: एडइनबॉक्स पर आप शिक्षकों, प्रशासकों, छात्रों और अभिभावकों के एक सक्रिय व जीवंत समूह के साथ जुड़ सकते हैं। इस मंच पर आप अपने विचार साझा करें, प्रश्न पूछें, और उन विषयों पर चर्चा में भाग लें जो आपके लिए महत्वपूर्ण हैं। समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से जुड़ें और अपने पेशेवर नेटवर्क का भी विस्तार करें।
यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस: एडइनबॉक्स की खासियत है, यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस। यह आपकी रुचि की सामग्री को नेविगेट करना और खोजना आसान बनाता है। चाहे आप लेख पढ़ना, वीडियो देखना या पॉडकास्ट सुनना पसंद करते हों, आप एडइनबॉक्स पर सब कुछ मूल रूप से एक्सेस कर सकते हैं।
तेजी से बदलते शैक्षिक परिदृश्य में, इस क्षेत्र की हर गतिविधि से परिचित होना निहायत जरूरी है। एडइनबॉक्स एक व्यापक मंच प्रदान करता है जहां आप शिक्षा जगत के नवीनतम समाचारों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं, विशेषज्ञों और समूहों के साथ जुड़ सकते हैं और शिक्षा के भविष्य को आकार देने वाली नई पहल को लेकर अपडेट रह सकते हैं। चाहे आप एक शिक्षक हों जो नवीन शिक्षण पद्धतियों की तलाश में हों, नीतियों में बदलाव पर नजर रखने वाले व्यवस्थापक हों, या आपके बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित माता-पिता, एडइनबॉक्स ने हर किसी की चिंताओं-आवश्यकताओं को समझते हुए इस मंच को तैयार किया है। आज ही एडिनबॉक्स पर जाएं और शिक्षा पर एक वैश्विक विमर्श में शामिल हों!
कॉपीराइट @2024 एडइनबॉक्स!. सर्वाधिकार सुरक्षित।