देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक, Union Public Service Commission की सिविल सेवा परीक्षा 2025 का अंतिम परिणाम घोषित कर दिया गया है। लिखित परीक्षा और पर्सनैलिटी टेस्ट के आधार पर आयोग ने कुल 958 उम्मीदवारों को विभिन्न अखिल भारतीय और केंद्रीय सेवाओं में नियुक्ति के लिए अनुशंसित किया है। परिणाम जारी होने के साथ ही हजारों अभ्यर्थियों का लंबा इंतजार खत्म हो गया है।
इस वर्ष परीक्षा में अनुज अग्निहोत्री ने पहला स्थान हासिल किया है। दूसरे स्थान पर राजेश्वरी सुवे एम रहीं, जबकि तीसरी रैंक एकांश ढुल को मिली है। टॉप रैंक हासिल करने वाले इन उम्मीदवारों ने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा में शानदार प्रदर्शन कर अपनी जगह बनाई है।
अगस्त में हुई लिखित परीक्षा, दिसंबर से फरवरी तक इंटरव्यू
सिविल सेवा मुख्य परीक्षा अगस्त 2025 में आयोजित की गई थी। इसके बाद सफल उम्मीदवारों के पर्सनैलिटी टेस्ट (इंटरव्यू) दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच लिए गए। लिखित परीक्षा और इंटरव्यू में मिले अंकों के आधार पर अंतिम मेरिट सूची तैयार की गई।
इस मेरिट सूची के आधार पर चयनित उम्मीदवारों को देश की प्रमुख सेवाओं जैसे Indian Administrative Service, Indian Foreign Service, Indian Police Service और अन्य केंद्रीय सेवाओं (ग्रुप ‘A’ और ‘B’) में नियुक्ति के लिए सिफारिश की गई है।
किस श्रेणी से कितने उम्मीदवार चयनित
घोषित परिणाम के अनुसार कुल 958 चयनित उम्मीदवारों में विभिन्न श्रेणियों का प्रतिनिधित्व इस प्रकार है—
सामान्य वर्ग से 317 उम्मीदवारों का चयन हुआ है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) से 104, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से 306, अनुसूचित जाति (SC) से 158 और अनुसूचित जनजाति (ST) से 73 उम्मीदवार सफल हुए हैं।
आयोग ने यह भी बताया है कि 348 उम्मीदवारों का चयन फिलहाल प्रोविजनल रखा गया है। इन अभ्यर्थियों के दस्तावेजों और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं के सत्यापन के बाद ही उनके चयन को अंतिम रूप दिया जाएगा।
इसके अलावा दो उम्मीदवारों का परिणाम फिलहाल रोका गया है। आयोग ने कुछ प्रशासनिक कारणों के चलते उनके परिणाम को अभी जारी नहीं किया है।
जल्द जारी होंगे उम्मीदवारों के अंक
आयोग के मुताबिक सभी उम्मीदवारों के अंक परिणाम घोषित होने की तारीख से 15 दिनों के भीतर आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध करा दिए जाएंगे। इसके बाद अभ्यर्थी अपनी मेरिट स्थिति और कुल अंक देख सकेंगे।
UPSC CSE 2025: टॉप 20 उम्मीदवारों की सूची
इस साल जारी मेरिट सूची में पहले 20 स्थान प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों के नाम इस प्रकार हैं—
अनुज अग्निहोत्री
राजेश्वरी सुवे एम
एकांश ढुल
राघव झुनझुनवाला
ईशान भटनागर
जिनिया अरोड़ा
ए आर राजा मोहिद्दीन
पक्षल सेक्रेटरी
आस्था जैन
उज्ज्वल प्रियांक
यशस्वी राज वर्धन
अक्षित भारद्वाज
अनन्या शर्मा
सुरभि यादव
सिमरनदीप कौर
मोनिका श्रीवास्तव
चितवन जैन
श्रुति आर
निसार दिशांत अमृतलाल
रवि राज
कुल 1087 पदों पर भर्ती
आयोग के अनुसार इस परीक्षा के माध्यम से कुल 1087 पदों पर भर्ती की जाएगी। इनमें विभिन्न सेवाओं के लिए पद इस प्रकार निर्धारित किए गए हैं।
Indian Administrative Service के लिए 180 पद तय किए गए हैं।
Indian Foreign Service के लिए 55 पद निर्धारित हैं।
Indian Police Service के लिए 150 पद उपलब्ध हैं।
इसके अलावा केंद्रीय सेवाओं के ग्रुप ‘A’ में 507 पद और ग्रुप ‘B’ सेवाओं में 195 पद भरे जाएंगे।
श्रेणीवार रिक्तियों का विवरण
कुल 1087 रिक्तियों में सामान्य वर्ग के लिए 446 पद रखे गए हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 104, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 306, अनुसूचित जाति (SC) के लिए 158 और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 73 पद निर्धारित किए गए हैं।
इसके साथ ही दिव्यांग (PwBD) श्रेणी के लिए भी कुल 42 पद आरक्षित किए गए हैं। इनमें PwBD-1 के लिए 10, PwBD-2 के लिए 14, PwBD-3 के लिए 9 और PwBD-5 श्रेणी के लिए 9 पद शामिल हैं।
कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच सफलता
हर साल लाखों अभ्यर्थी इस परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन अंतिम चयन तक पहुंचने वालों की संख्या सीमित होती है। ऐसे में इस सूची में जगह बनाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। सिविल सेवा परीक्षा न केवल ज्ञान और मेहनत की परीक्षा है, बल्कि धैर्य, अनुशासन और लगातार तैयारी की भी कसौटी है।
सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के लिए बड़ी राहत की खबर है। Staff Selection Commission (SSC) ने भर्ती प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए एक नया नियम लागू करने की घोषणा की है। आयोग ने ‘स्लाइडिंग मैकेनिज्म’ (Sliding Mechanism) नाम की व्यवस्था शुरू की है, जिससे अब भर्ती के दौरान खाली रह जाने वाली सीटों को उसी साल के योग्य उम्मीदवारों से भरा जा सकेगा।
अब तक SSC की कई भर्तियों में ऐसा देखा जाता था कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी कुछ पद खाली रह जाते थे। कई बार चयनित उम्मीदवार डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के लिए नहीं पहुंचते थे या फिर उन्हें कहीं और बेहतर नौकरी मिल जाने के कारण वे जॉइन नहीं करते थे। चूंकि पहले SSC में वेटिंग लिस्ट की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए ये खाली पद अगले साल की भर्ती में जोड़ दिए जाते थे। इससे उस साल परीक्षा पास करने वाले कई योग्य उम्मीदवारों को मौका नहीं मिल पाता था। इसी समस्या को दूर करने के लिए आयोग ने यह नया मैकेनिज्म शुरू किया है।
क्या है SSC का ‘Sliding Mechanism’
नए नियम के तहत भर्ती प्रक्रिया पहले की तरह ही शुरू होगी। सबसे पहले रिजल्ट जारी किया जाएगा और उम्मीदवारों को उनकी मेरिट और पसंद के आधार पर अलग-अलग पद आवंटित किए जाएंगे। इस चरण को फर्स्ट राउंड अलॉटमेंट कहा जाएगा।
इसके बाद चयनित उम्मीदवारों को SSC के क्षेत्रीय कार्यालय में जाकर आधार सत्यापन कराना होगा। इस प्रक्रिया के लिए आमतौर पर करीब 10 दिन का समय दिया जाएगा। सत्यापन के दौरान उम्मीदवारों को दो विकल्प चुनने का मौका मिलेगा—‘FIX’ और ‘FLOAT’
अगर कोई उम्मीदवार अपनी मिली हुई पोस्ट से संतुष्ट है, तो वह ‘FIX’ विकल्प चुन सकता है। इसका मतलब होगा कि उसे वही पोस्ट अंतिम रूप से मिल जाएगी और आगे उसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
दूसरी ओर, अगर कोई उम्मीदवार चाहता है कि आगे चलकर अगर उसकी पसंद की कोई बेहतर पोस्ट खाली होती है तो उसे वह मिल सके, तो वह ‘FLOAT’ विकल्प चुन सकता है। यह विकल्प चुनने वाले उम्मीदवारों को खाली पदों पर मेरिट के आधार पर ऊपर की पसंद वाली पोस्ट मिलने का मौका मिल सकता है।
खाली सीटों का ऐसे होगा इस्तेमाल
वेरिफिकेशन के दौरान जो उम्मीदवार उपस्थित नहीं होंगे या किसी कारण से प्रक्रिया पूरी नहीं करेंगे, उनकी सीटें खाली मानी जाएंगी। इसके बाद इन खाली पदों को उन उम्मीदवारों को दिया जाएगा जिन्होंने ‘FLOAT’ विकल्प चुना है और जिनकी मेरिट बेहतर है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद एक फाइनल रिजल्ट जारी किया जाएगा और चयनित उम्मीदवारों की फाइलें संबंधित विभागों को भेज दी जाएंगी।
उम्मीदवारों के लिए जरूरी बातें
इस पूरी प्रक्रिया को सिर्फ एक बार ही लागू किया जाएगा, यानी बार-बार नई लिस्ट जारी नहीं होगी। अगर किसी उम्मीदवार ने ‘FLOAT’ चुना और उसे नई पोस्ट मिल गई, तो उसे वही जॉइन करनी होगी। अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो उसकी पुरानी और नई दोनों सीटें रद्द हो सकती हैं। वहीं जो उम्मीदवार तय समय में वेरिफिकेशन के लिए नहीं पहुंचेंगे, उनकी उम्मीदवारी भी रद्द मानी जाएगी।
SSC का मानना है कि इस नए कदम से भर्ती प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनेगी। साथ ही इससे ज्यादा से ज्यादा युवाओं को उसी भर्ती चक्र में नौकरी मिलने का अवसर मिल सकेगा। आयोग जल्द ही इस नई व्यवस्था से जुड़ा विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी करेगा।
देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की बात आती है तो ज्यादातर छात्र Computer Science Engineering को सबसे बेहतर विकल्प मानते हैं। इसकी बड़ी वजह आईटी सेक्टर में मिलने वाली ऊंची सैलरी और बड़े पैमाने पर नौकरी के अवसर हैं। लेकिन तेजी से बदलती तकनीक के दौर में कुछ दूसरी इंजीनियरिंग शाखाएं भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं।
इन्हीं में एक अहम क्षेत्र है Automobile Engineering। इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्ट कार और ऑटोमेशन जैसी नई तकनीकों के कारण इस क्षेत्र में विशेषज्ञ इंजीनियरों की मांग लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र करियर के लिहाज से कंप्यूटर साइंस जैसी लोकप्रिय शाखाओं को भी कड़ी टक्कर दे सकता है।
क्या है ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग इंजीनियरिंग की वह शाखा है जिसमें कार, बाइक, ट्रक और अन्य वाहनों के डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और रखरखाव से जुड़ी पढ़ाई कराई जाती है। इस कोर्स में छात्रों को इंजन टेक्नोलॉजी, वाहन डिजाइन, फ्यूल सिस्टम, सुरक्षा तकनीक और नई मोबिलिटी टेक्नोलॉजी के बारे में विस्तार से सिखाया जाता है।
आज के समय में इस क्षेत्र में Electric Vehicle Technology और ऑटोमेशन से जुड़ी तकनीकों को भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है, क्योंकि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री तेजी से नई तकनीकों की ओर बढ़ रही है।
क्यों बढ़ रही है इस क्षेत्र की मांग
दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेजी से बदलाव हो रहा है। भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कई कंपनियां इलेक्ट्रिक कार और बाइक के नए मॉडल लॉन्च कर रही हैं। ऐसे में इन वाहनों के डिजाइन और तकनीक को विकसित करने के लिए प्रशिक्षित इंजीनियरों की जरूरत बढ़ रही है।
इसके अलावा आज की कारें पहले की तुलना में काफी स्मार्ट हो चुकी हैं। इनमें सेंसर, ऑटोमेशन और कई मामलों में Artificial Intelligence आधारित तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन सभी तकनीकों को विकसित और बेहतर बनाने में ऑटोमोबाइल इंजीनियरों की अहम भूमिका होती है।
भारत भी अब दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजारों में शामिल हो चुका है। नई कंपनियों, स्टार्टअप्स और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी से जुड़े प्रोजेक्ट्स के आने से इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं।
करियर के अवसर
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों के लिए कई क्षेत्रों में काम करने के अवसर होते हैं। वे ऑटोमोबाइल कंपनियों, इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर या ऑटोमोबाइल सर्विस इंडस्ट्री में अपना करियर बना सकते हैं।
इस क्षेत्र में काम करने वाले इंजीनियरों को देश की बड़ी कंपनियों में भी अवसर मिलते हैं। इनमें Tata Motors, Mahindra & Mahindra, Maruti Suzuki, Hyundai Motor Company और Toyota जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं।
पढ़ाई के लिए प्रमुख संस्थान
भारत में कई प्रतिष्ठित संस्थान ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए जाने जाते हैं। इन संस्थानों में आधुनिक लैब, इंडस्ट्री से जुड़ा पाठ्यक्रम और बेहतर प्लेसमेंट के अवसर उपलब्ध होते हैं।
इस क्षेत्र में पढ़ाई के लिए प्रमुख संस्थानों में Indian Institute of Technology Delhi, Indian Institute of Technology Madras, Anna University और PSG College of Technology जैसे संस्थान शामिल हैं।
भविष्य की संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, स्मार्ट वाहनों और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग के कारण आने वाले वर्षों में ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग का महत्व और बढ़ेगा।
इस क्षेत्र में तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ इनोवेशन की भी बड़ी भूमिका है। ऐसे में जो छात्र नई तकनीकों के साथ काम करना चाहते हैं और वाहनों की डिजाइन व टेक्नोलॉजी में रुचि रखते हैं, उनके लिए ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग एक मजबूत और भविष्य से जुड़ा करियर विकल्प बनकर उभर रहा है।
केरल में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। Rajendra Vishwanath Arlekar ने Sree Sankaracharya University of Sanskrit, कलाडी की कुलपति प्रोफेसर के. के. गीताकुमारी को उनके पद से हटा दिया है। राज्यपाल विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (चांसलर) भी होते हैं और उसी अधिकार के तहत यह फैसला लिया गया है।
राजभवन की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना के मुताबिक यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है। हालांकि नोटिफिकेशन में कुलपति को पद से हटाने के पीछे का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है। इस निर्णय के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज को लेकर नई व्यवस्था भी की गई है।
राज्यपाल के आदेश के अनुसार Sija Thomas को APJ Abdul Kalam Technological University की कुलपति होने के साथ-साथ श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। यह जिम्मेदारी अगले आदेश तक उनके पास रहेगी।
इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मीडिया की ओर से विश्वविद्यालय के प्रवक्ता से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन इस संबंध में कोई जवाब नहीं मिल सका।
छात्र के परिणाम को लेकर उठा था विवाद
कुलपति को हटाए जाने से पहले विश्वविद्यालय से जुड़ा एक विवाद भी चर्चा में आया था। पिछले महीने राज्यपाल ने विश्वविद्यालय की सिंडिकेट द्वारा लिए गए एक फैसले पर रोक लगा दी थी। यह मामला एक छात्र के शैक्षणिक परिणाम से जुड़ा था।
जानकारी के अनुसार ए. कलेश नाम का एक छात्र वर्ष 2005 में बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स (BFA) परीक्षा में असफल हो गया था। इसके बावजूद बाद में उसे मास्टर ऑफ फाइन आर्ट्स (MFA) कार्यक्रम में प्रवेश मिल गया और उसने वर्ष 2023 में यह कोर्स पूरा कर लिया।
इसके बाद विश्वविद्यालय की सिंडिकेट ने विशेष मामले के तौर पर उस छात्र को बीएफए की डिग्री देने का निर्णय लिया था। बताया गया कि यह छात्र छात्र संगठन Students' Federation of India (SFI) से जुड़ा रहा है।
हालांकि इस फैसले का विरोध भी हुआ। Save University Campaign Committee नामक संगठन ने इस मामले को लेकर सरकार के पास शिकायत दर्ज कराई और विश्वविद्यालय के फैसले पर सवाल उठाए।
नियुक्तियों को लेकर भी लगे आरोप
सेव यूनिवर्सिटी कैंपेन कमेटी ने कुलपति के खिलाफ राज्यपाल को एक और शिकायत भी भेजी थी। इसमें आरोप लगाया गया कि कुलपति ने सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति पर लगी रोक के आदेश का उल्लंघन किया और विधानसभा चुनाव से पहले शिक्षकों की भर्ती करने का फैसला लिया।
इन आरोपों के बाद राज्यपाल ने पिछले महीने विश्वविद्यालय में फैकल्टी भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी।
इसके अलावा कुलपति पर यह आरोप भी लगाया गया कि उन्होंने विश्वविद्यालय के नियमों का पालन किए बिना परिसर की जमीन क्रिकेट स्टेडियम बनाने के लिए आवंटित कर दी। इस मुद्दे को लेकर भी विश्वविद्यालय प्रशासन की आलोचना हुई थी।
इन सभी विवादों के बीच राज्यपाल द्वारा कुलपति को पद से हटाने का फैसला लिया गया है। हालांकि राजभवन की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस निर्णय के पीछे आधिकारिक कारण क्या है। शिक्षा जगत में इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज हो गई है और आने वाले दिनों में इस मामले पर और स्पष्टता आने की संभावना जताई जा रही है।
पश्चिम एशिया यानी मध्य-पूर्व के कुछ देशों में मौजूदा हालात को देखते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद (CBSE) ने बोर्ड परीक्षाओं को लेकर अहम फैसला लिया है। बोर्ड ने स्थिति की समीक्षा के बाद कक्षा 10 और कक्षा 12 की परीक्षाओं में बदलाव की घोषणा की है, ताकि छात्रों की सुरक्षा और परीक्षा प्रक्रिया दोनों प्रभावित न हों।
सीबीएसई के मुताबिक यह फैसला उन देशों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए लागू होगा, जहां बोर्ड से संबद्ध स्कूल संचालित हो रहे हैं। इनमें बहरीन, ईरान, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) शामिल हैं। इन देशों के स्कूलों के लिए बोर्ड ने आधिकारिक सर्कुलर जारी कर नई व्यवस्था की जानकारी दी है।
कक्षा 10 की कई परीक्षाएं रद्द
सीबीएसई के अनुसार कक्षा 10 की 7 मार्च से 11 मार्च 2026 के बीच होने वाली सभी परीक्षाएं अब रद्द कर दी गई हैं। इसके अलावा 2 मार्च, 5 मार्च और 6 मार्च 2026 की वे परीक्षाएं भी रद्द मानी जाएंगी, जिन्हें पहले स्थगित किया गया था।
हालांकि बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन छात्रों के परिणाम किस आधार पर घोषित किए जाएंगे, इस बारे में अलग से विस्तृत जानकारी जारी की जाएगी। यानी फिलहाल परीक्षा रद्द होने के बाद परिणाम तय करने की प्रक्रिया पर बाद में फैसला होगा।
कक्षा 12 की परीक्षा फिलहाल स्थगित
कक्षा 12 के छात्रों के लिए 7 मार्च 2026 को निर्धारित परीक्षा को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। सीबीएसई ने कहा है कि इस परीक्षा की नई तारीख बाद में घोषित की जाएगी। बोर्ड स्थिति पर नजर बनाए हुए है और हालात सामान्य होने पर संशोधित परीक्षा कार्यक्रम जारी करेगा।
आगे की परीक्षाओं पर जल्द फैसला
सीबीएसई ने बताया है कि 7 मार्च 2026 को हालात की दोबारा समीक्षा की जाएगी। इसके बाद 9 मार्च 2026 से निर्धारित कक्षा 12 की आगामी परीक्षाओं के बारे में आगे की घोषणा की जाएगी। यानी स्थिति के अनुसार अगली परीक्षाओं को लेकर नया निर्णय लिया जा सकता है।
छात्रों को स्कूलों से संपर्क में रहने की सलाह
बोर्ड ने छात्रों और अभिभावकों से कहा है कि वे अपने-अपने स्कूलों के संपर्क में बने रहें और सीबीएसई की आधिकारिक घोषणाओं पर नजर रखें। इससे नई परीक्षा तिथियों और अन्य जरूरी निर्देशों की जानकारी समय पर मिल सकेगी।
सीबीएसई ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी अपडेट के लिए केवल आधिकारिक सूचना पर ही भरोसा किया जाए, ताकि अफवाहों या गलत जानकारी से बचा जा सके।
देश के प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थान Indian Institutes of Technology (IITs) इस शैक्षणिक सत्र से आपस में और अधिक जुड़ने जा रहे हैं। एक संरचित क्रॉस-कैंपस अकादमिक एक्सचेंज प्रोग्राम शुरू किया जा रहा है, जिसके तहत छात्र किसी अन्य IIT कैंपस में चुनिंदा कोर्स में दाखिला लेकर एक पूरा सेमेस्टर वहां पढ़ सकेंगे।
इस पहल के तहत छात्रों द्वारा अर्जित क्रेडिट उनके मूल संस्थान में ट्रांसफर किए जा सकेंगे। यह कदम लंबे समय से चली आ रही उस सख्त व्यवस्था में बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जो Joint Entrance Examination (JEE) के आधार पर IIT में प्रवेश के साथ जुड़ी रही है। पहले बड़े स्तर पर कैंपस ट्रांसफर की अनुमति नहीं थी, क्योंकि इससे रैंक आधारित सीट आवंटन की व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका रहती थी।
अब तक सीटों का आवंटन केवल JEE रैंक और छात्रों की पसंद के आधार पर होता था। ऐसे में कैंपस के भीतर स्वतंत्र आवाजाही को उस ढांचे के खिलाफ माना जाता था।
पूर्व में Indian Institute of Technology Delhi के निदेशक रह चुके और वर्तमान में BITS पिलानी समूह के वाइस चांसलर वी रामगोपाल राव ने इसे रणनीतिक बदलाव बताया है। उनके अनुसार दशकों से प्रवेश रैंक ही छात्र के पूरे अकादमिक सफर को तय करती थी। अब संरचित गतिशीलता लाने से लचीलापन और अकादमिक विकल्प बढ़ेंगे।
उन्होंने कहा कि यह कदम भारतीय उच्च शिक्षा में चल रहे सुधारों की दिशा के अनुरूप है, जहां क्रेडिट पोर्टेबिलिटी और बहु-विषयक exposure पर जोर दिया जा रहा है। प्रमुख तकनीकी संस्थानों के बीच यह एक बड़ा सुधार है, जो अन्य संस्थानों के लिए भी मॉडल बन सकता है।
कैसे काम करेगा नया सिस्टम
छात्रों की आवाजाही को संभव बनाने के लिए IIT कैंपसों के बीच पाठ्यक्रम का विस्तृत मिलान किया जा रहा है। जब कोर्स संरचना एक जैसी या समकक्ष मानी जाएगी, तब छात्र दूसरे IIT में स्वीकृत विषय पढ़ सकेंगे और उनके क्रेडिट को औपचारिक रूप से मान्यता मिलेगी।
हाल ही में सभी IIT के अकादमिक डीन की बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा हुई, जिसमें क्रेडिट ट्रांसफर और छात्र गतिशीलता को प्राथमिकता दी गई।
Indian Institute of Technology Madras के निदेशक वी कामकोटी ने बताया कि अलग-अलग IIT के कार्यक्रमों के पाठ्यक्रम का मिलान किया जा रहा है। एक बार यह प्रक्रिया पूरी हो जाने पर IIT मद्रास का छात्र किसी अन्य IIT में एक टर्म बिता सकेगा, वहीं IIT कानपुर, दिल्ली या इंदौर का छात्र मद्रास कैंपस में आकर कोर्स कर सकेगा और अपने मूल संस्थान में क्रेडिट ट्रांसफर कर पाएगा।
राव के अनुसार IIT अपने-अपने स्तर पर मजबूत संस्थान हैं, लेकिन एक साथ मिलकर वे और बड़ा शैक्षणिक नेटवर्क बनाते हैं। एक सेमेस्टर दूसरे IIT में बिताने से छात्रों को विशेष कोर्स, उन्नत रिसर्च लैब और विशेषज्ञ फैकल्टी तक पहुंच मिलेगी, जो उनके मूल कैंपस में उपलब्ध न हो।
बदलती शैक्षणिक जरूरतों के अनुरूप पहल
यह पहल बदलती शैक्षणिक और पेशेवर जरूरतों को भी दर्शाती है। आज छात्र इंटर्नशिप, रिसर्च प्रोजेक्ट और इंडस्ट्री ट्रेनिंग के लिए अलग-अलग शहरों में जाते हैं। नए ढांचे के तहत यदि कोई छात्र किसी अन्य शहर में इंटर्नशिप कर रहा है, तो वह पास के IIT कैंपस में कोर्स लेकर अपनी पढ़ाई भी जारी रख सकेगा।
इस मॉडल की तुलना अंतरराष्ट्रीय सेमेस्टर एक्सचेंज प्रोग्राम से की जा रही है, जहां छात्र विदेश में पढ़ाई करते हुए क्रेडिट ट्रांसफर कर पाते हैं।
राव का कहना है कि विश्व के अधिकतर प्रमुख विश्वविद्यालय अकादमिक भरोसे और स्पष्ट क्रेडिट समकक्षता पर काम करते हैं। छात्रों को स्थान बदलने की सुविधा होती है, लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं होता।
हालांकि इस व्यवस्था को शुरुआत में सीमित और निगरानी के तहत लागू किया जाएगा। हर IIT अपने बुनियादी ढांचे, फैकल्टी की संख्या और हॉस्टल क्षमता के अनुसार यह तय करेगा कि वह कितने विजिटिंग छात्रों को समायोजित कर सकता है।
क्या होंगे फायदे?
शिक्षाविदों का मानना है कि यह पहल IIT प्रणाली को अधिक गतिशील और सहयोगात्मक बनाएगी। इससे कैंपसों के बीच सहयोग बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर IIT की छवि मजबूत होगी।
विदेशी विश्वविद्यालय और शोध साझेदार ऐसे सिस्टम को सकारात्मक रूप से देखते हैं, जहां छात्र और फैकल्टी अलग-अलग कैंपस में मिलकर काम कर सकें। इससे संयुक्त शोध परियोजनाएं और मल्टी-कैंपस सुपरविजन आसान होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस सुधार की सफलता इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यदि शैक्षणिक कैलेंडर, क्रेडिट मैपिंग और डिजिटल सिस्टम को समन्वित तरीके से लागू किया गया, तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक अधिक खुले और एकीकृत अकादमिक ढांचे की ओर बड़ा कदम साबित होगा।
जैसे-जैसे बैंकिंग तेजी से ब्रांच आधारित सेवाओं से आगे बढ़कर पूरी तरह डिजिटल इकोसिस्टम की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस बदलाव को दिशा देने में प्रोडक्ट मैनेजर्स की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इसी बदलाव के केंद्र में काम कर रहे हैं अभिनव श्रीवास्तव, जो तकनीक, नियामकीय ढांचे और ग्राहक-केंद्रित नवाचार के बीच संतुलन बनाकर काम करते हैं।
भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में सात साल से अधिक के अनुभव के साथ, उन्होंने जटिल व्यावसायिक जरूरतों को सुरक्षित, स्केलेबल और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजिटल प्रोडक्ट्स में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
वर्तमान में अभिनव श्रीवास्तव RBL बैंक में सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। वे बैंक के वेब और मोबाइल प्लेटफॉर्म के लिए पूरे प्रोडक्ट रोडमैप और उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालते हैं। इंजीनियरिंग, UX, मार्केटिंग, कंप्लायंस और ऑपरेशंस टीमों के साथ मिलकर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नवाचार सुरक्षा और नियामकीय मानकों के अनुरूप हो। उनका काम प्रोडक्ट के पूरे जीवनचक्र को कवर करता है—आइडिया से लेकर प्राथमिकता तय करने, डिलीवरी और लॉन्च के बाद सुधार तक—और यह सब डेटा आधारित निर्णयों पर आधारित होता है।
अपने करियर में अभिनव ने IndiaLends, ICICI बैंक और कोटक महिंद्रा प्राइम जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है। यहां उन्हें डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म, ग्राहक अधिग्रहण प्रक्रिया, SaaS और CRM सिस्टम तथा बड़े स्तर पर डिजिटल अपनाने का गहरा अनुभव मिला।
शिक्षा की बात करें तो उन्होंने ICFAI फाउंडेशन फॉर हायर एजुकेशन से मार्केटिंग में MBA और PGPM किया है, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल बिजनेस में BBA किया है। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें सख्त नियामकीय माहौल में प्रभावी डिजिटल प्रोडक्ट तैयार करने की मजबूत समझ देती है।
सवाल: आपकी औपचारिक शिक्षा (MBA, PGPM, BBA) ने बैंकिंग जैसे कड़े नियामकीय सेक्टर में प्रोडक्ट स्ट्रैटेजी और निर्णय लेने की सोच को कैसे प्रभावित किया? उन छात्रों को क्या सलाह देंगे जो मानते हैं कि डिग्री ही टेक और फिनटेक में सफलता की गारंटी है?
- मेरी शिक्षा ने निश्चित रूप से एक मजबूत आधार दिया, लेकिन यह कभी भी अकेला अंतर पैदा करने वाला फैक्टर नहीं रही। BBA से मुझे ग्लोबल लेवल पर बिजनेस की समझ मिली, जबकि MBA और PGPM ने उपभोक्ता व्यवहार, रणनीति और निर्णय लेने की क्षमता को और मजबूत किया। बैंकिंग जैसे रेगुलेटेड सेक्टर में यह संरचित सोच काफी मदद करती है, जहां ग्रोथ, कस्टमर एक्सपीरियंस और कंप्लायंस के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
लेकिन करियर की शुरुआत में ही मुझे यह समझ आ गया था कि डिग्रियां आपको असल दुनिया की जटिलताओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं करतीं। क्लासरूम यह नहीं सिखाता कि अधूरी जरूरतों, स्टेकहोल्डर के दबाव या अचानक आने वाले नियामकीय बदलावों को कैसे संभालना है। यह सब अनुभव से ही आता है। जो छात्र मानते हैं कि डिग्री ही सफलता की गारंटी है, उनसे मैं कहूंगा कि डिग्री आपको मौके तक पहुंचा सकती है, लेकिन वहां टिके रहना आपकी सीखने की गति, अनुकूलन क्षमता और काम करने के तरीके पर निर्भर करता है।
सवाल: सीमित संसाधनों में, जब आप वेब, मोबाइल, CRM और लेंडिंग जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म संभालते हैं, तो निवेश को कैसे प्राथमिकता देते हैं? मौजूदा फीचर्स सुधारने और नए फीचर लॉन्च करने के बीच कैसे फैसला करते हैं?
- जब संसाधन सीमित होते हैं, तो मैं सबसे पहले यह देखता हूं कि ग्राहक या बिजनेस की सबसे बड़ी समस्या कहां है। इसके लिए डेटा अहम भूमिका निभाता है—जैसे हाई ट्रैफिक जर्नी, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स और वे प्लेटफॉर्म जो सीधे रेवेन्यू या कंप्लायंस से जुड़े हों। अगर कोई मौजूदा फीचर किसी जरूरी प्रक्रिया में बाधा बन रहा है, तो पहले उसे सुधारना मेरी प्राथमिकता होती है।
मेरे फैसले के मानदंड साफ होते हैं—ग्राहक पर प्रभाव, बिजनेस वैल्यू, नियामकीय जरूरत और मेहनत के मुकाबले मिलने वाला फायदा। बैंकिंग जैसे सेक्टर में मौजूदा जर्नी को बेहतर बनाना अक्सर कम जोखिम के साथ जल्दी परिणाम देता है, जबकि नए फीचर तभी लाए जाते हैं जब वे नया रेवेन्यू, कंप्लायंस समाधान या स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दें।
सवाल: मैनेजमेंट एजुकेशन और आज के डिजिटल प्रोडक्ट लीडर्स से इंडस्ट्री की अपेक्षाओं के बीच आपको क्या अंतर नजर आता है?
- मैनेजमेंट एजुकेशन फ्रेमवर्क और संरचित सोच सिखाने में अच्छा काम करती है, लेकिन इंडस्ट्री आज ऐसे प्रोडक्ट लीडर्स चाहती है जो अनिश्चित परिस्थितियों में भी परिणाम दे सकें। वास्तविक दुनिया में प्राथमिकताएं तेजी से बदलती हैं और अक्सर अधूरी जानकारी के साथ फैसले लेने पड़ते हैं। एक बड़ा अंतर तकनीकी समझ का भी है। प्रोडक्ट लीडर्स को कोडिंग आना जरूरी नहीं है, लेकिन सिस्टम, APIs और प्लेटफॉर्म की समझ होना जरूरी है ताकि वे इंजीनियरिंग टीम के साथ व्यावहारिक निर्णय ले सकें। इसके अलावा, स्टेकहोल्डर मैनेजमेंट और एग्जीक्यूशन स्किल्स—जहां बिजनेस, टेक, UX, कंप्लायंस और टाइमलाइन का संतुलन बनाना पड़ता है—ये चीजें क्लासरूम से ज्यादा फील्ड एक्सपीरियंस से आती हैं।
सवाल: डिजिटल लेंडिंग या बैंकिंग प्रोडक्ट में आप पूरे लाइफसाइकिल के दौरान किन KPIs को ट्रैक करते हैं और उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं?
- मैं KPIs को सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए देखता हूं कि ग्राहक प्रोडक्ट में कहां अटक रहा है। अधिग्रहण चरण में ट्रैफिक क्वालिटी, CTR और लीड से एप्लिकेशन रेशियो पर नजर रहती है। ऑनबोर्डिंग में हर स्टेप पर ड्रॉप-ऑफ, प्रक्रिया पूरी करने में लगा समय और STP रेट अहम होते हैं। एंगेजमेंट के लिए एक्टिव यूजर्स, फीचर यूसेज और जर्नी कम्प्लीशन देखी जाती है। रिटेंशन में रीपीट यूसेज और रिटर्न रेट्स से भरोसे और जुड़ाव का अंदाजा मिलता है। मोनिटाइजेशन में फंडेड अकाउंट या लोन कन्वर्जन, प्रति ग्राहक रेवेन्यू और क्रॉस-सेल पर फोकस रहता है। इन मेट्रिक्स के आधार पर बैकलॉग को प्राथमिकता दी जाती है, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स सुधारे जाते हैं और UX या मैसेजिंग में बदलाव किए जाते हैं।
सवाल: आपके क्षेत्र में निरंतर सीखने की कितनी अहमियत है और यूनिवर्सिटीज को छात्रों को डिजिटल भविष्य के लिए कैसे तैयार करना चाहिए?
- फिनटेक और बैंकिंग में निरंतर सीखना बेहद जरूरी है क्योंकि तकनीक, नियम और ग्राहक की उम्मीदें लगातार बदलती रहती हैं। जो आज काम करता है, वह कुछ सालों में अप्रासंगिक हो सकता है। यूनिवर्सिटीज को चाहिए कि वे खास टूल्स सिखाने के बजाय समस्या समाधान, आलोचनात्मक सोच और अनिश्चितता के साथ काम करने की क्षमता विकसित करें। रियल वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री केस स्टडी और इंटर्नशिप से छात्रों को तेजी से बदलते डिजिटल इकोसिस्टम की बेहतर समझ मिल सकती है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि छात्र सीखते रहना सीखें, न कि डिग्री के साथ सीखने की प्रक्रिया खत्म मान लें।
करियर, कोर्स, कॉलेज और भविष्य—सब कुछ जरूरी लगता है, सब कुछ स्थायी लगता है। रैंकिंग, वायरल सक्सेस स्टोरीज़, सोशल मीडिया की सलाह और अंतहीन तुलना के बीच आज के छात्र विकल्पों की कमी से नहीं, बल्कि स्पष्टता की कमी से जूझ रहे हैं।
एडइनबॉक्स (Edinbox) की Voices That Educate सीरीज़ के इस संस्करण में Edinbox की वर्टिकल हेड–PR और कम्युनिकेशंस, पूजा खन्ना, BCM स्कूल, लुधियाना की फाउंडर प्रिंसिपल वंदना शाही के साथ एक विचारपूर्ण संवाद करती हैं। वंदना शाही राष्ट्रीय पुरस्कार (2022) से सम्मानित हैं और CBSE डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर भी हैं। छात्र-केंद्रित सोच के लिए जानी जाने वाली वंदना शाही नेतृत्व को करुणा, यथार्थ और विवेक के साथ जोड़ती हैं।
प्रश्न 1: आज एक सफल करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
- कई छात्र मानते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाख़िला या किसी “ट्रेंडिंग” स्ट्रीम का चुनाव सफलता की गारंटी है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। आज करियर लचीले, अनिश्चित और पूरी तरह कौशल-आधारित हैं। अब दुनिया केवल डिग्री पर नहीं, बल्कि सोच की फुर्ती, गहरी दक्षता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समस्या-समाधान क्षमता और लगातार सीखने की भूख पर भरोसा करती है।
आज नियोक्ता डिग्री और पदनाम से आगे देखकर ऐसे लोगों को तलाशते हैं जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, तेज़ी से ढल सकें, सार्थक सहयोग करें और वास्तविक समय में मूल्य जोड़ें। इस बदलते परिदृश्य में सफलता उन्हें मिलती है जो व्यापक अनुभव के साथ किसी एक क्षेत्र में गहरी महारत विकसित करते हैं—जो अलग-अलग विषयों को जोड़ पाते हैं और विशेषज्ञता की मजबूत नींव पर खड़े रहते हैं। अंततः सार्थक करियर शुरुआती लेबल या सीधी रेखाओं से नहीं, बल्कि उद्देश्य, निरंतर प्रयास, नैतिक आधार और बदलाव के साथ आगे बढ़ने के साहस से बनता है।
प्रश्न 2: शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई ग्रेजुएट खुद को तैयार क्यों नहीं मानते?
- असल डिसकनेक्ट इरादों में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। शिक्षा को भले ही इंडस्ट्री-ड्रिवन कहा जाए, पर अक्सर जोर कंटेंट मिलान पर रहता है, क्षमता विकास पर नहीं। सिलेबस उद्योग के ट्रेंड दिखा सकता है, लेकिन कक्षा में अब भी रटने, सही जवाब और परीक्षा प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलती है—जबकि कार्यस्थल पर क्रिटिकल थिंकिंग, सहयोग, निर्णय-क्षमता, अनुकूलन और जिम्मेदारी की मांग होती है।
शिक्षा आज छात्रों को परीक्षाएँ पास कराने के लिए तैयार करती है, अस्पष्ट परिस्थितियों से निपटने के लिए नहीं। दूसरी ओर इंडस्ट्री अनिश्चितता में काम करती है, जहाँ समस्याएँ स्पष्ट नहीं होतीं, समाधान विकसित होते रहते हैं और जवाबदेही सबसे अहम होती है। बदलाव की तेज़ रफ्तार इस अंतर को और बढ़ा देती है, क्योंकि स्थिर सिलेबस गतिशील पेशेवर वास्तविकताओं के साथ कदम नहीं मिला पाते।
वास्तविक तालमेल तब बनेगा जब शिक्षा परीक्षा-केंद्रित से अनुभव-केंद्रित बने—जब सीखने में अनुप्रयोग, चिंतन, मेंटरशिप, नैतिक विवेक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर जोर होगा। तभी ग्रेजुएट खुद को कमजोर नहीं, बल्कि सीखने, अनसीखने और आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व करने के लिए सशक्त महसूस करेंगे।
प्रश्न 3: छात्र परिणाम बेहतर करने के लिए सिस्टम में कौन-से बदलाव तात्कालिक हैं?
- सबसे पहले, अंकों-केंद्रित सोच से सीखने-केंद्रित संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। जब सफलता की परिभाषा केवल परीक्षा तय करती है, तो समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और वास्तविक जीवन में उपयोग पीछे छूट जाते हैं। आकलन का उद्देश्य रैंकिंग नहीं, बल्कि विकास और आत्ममंथन होना चाहिए।
दूसरा, शिक्षकों का सशक्तिकरण और सतत पेशेवर विकास अनिवार्य है। 21वीं सदी के परिणाम पुराने प्रशिक्षण से नहीं मिल सकते। शिक्षकों को समय, भरोसा, स्वायत्तता और सीखने-सहयोग-नवाचार के अवसर चाहिए—सशक्त शिक्षक ही छात्रों को गहराई से जोड़ते हैं।
अंत में, अनुभवात्मक सीख, इंटरडिसिप्लिनरी सोच और जरूरी जीवन कौशल को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। छात्रों को सिर्फ परीक्षा या नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जटिलता, अनिश्चितता और आजीवन सीखने के लिए तैयार किया जाए। यही बदलाव शिक्षा को कठोर ढांचे से उत्तरदायी इकोसिस्टम में बदलेंगे।
प्रश्न 4: AI और डिजिटल टूल्स के दौर में कौन-से मानवीय कौशल और महत्वपूर्ण होंगे?
- जब बुद्धिमत्ता को ऑटोमेट किया जा सकता है, तब शिक्षा का पैमाना “क्या जानते हैं” से “कैसे सोचते हैं और क्या बनते हैं” पर आ जाता है। AI के युग में क्रिटिकल थिंकिंग और नैतिक विवेक सबसे जरूरी होंगे—ताकि सत्य पहचाना जा सके, एल्गोरिदम पर सवाल उठाए जा सकें और मूल्य-आधारित निर्णय लिए जा सकें।
रचनात्मकता और मौलिक सोच नवाचार को परिभाषित करेंगी, क्योंकि मशीनें पैटर्न दोहरा सकती हैं, उद्देश्य नहीं। साथ ही भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और प्रभावी संचार नेतृत्व, सहयोग और भरोसे की बुनियाद हैं। बदलाव सामान्य होगा, तो अनुकूलन क्षमता, लचीलापन और आत्म-जागरूकता दीर्घकालिक प्रासंगिकता तय करेंगे। तकनीक क्षमता बढ़ा सकती है, दिशा इंसानी विवेक और जिज्ञासा ही देती है।
प्रश्न 5: शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना जरूरी है और Edinbox जैसी प्लेटफॉर्म्स विश्वसनीयता कैसे बनाए रखें?
- ईमानदार संवाद वैकल्पिक नहीं, बल्कि भरोसे और सार्थक सीख की नींव है। जानकारी की भरमार में स्पष्टता दावों से ज्यादा अहम है। पारदर्शी संवाद अपेक्षाओं को वास्तविकता से जोड़ता है—वरना शिक्षा लेन-देन बनकर रह जाती है।
एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म्स सीखने वालों और संस्थानों के बीच नैतिक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। सटीकता, संपादकीय ईमानदारी और छात्र-केंद्रित कंटेंट को प्राथमिकता देकर ही विश्वसनीयता बनी रहती है। सत्यापित जानकारी, संतुलित दृष्टिकोण और उद्देश्यपूर्ण सामग्री के साथ संस्थागत सहयोग संभव है। ईमानदार और मूल्य-आधारित संवाद शिक्षा संस्कृति को ऊंचा उठाता है।
प्रश्न 6: विकल्पों और रैंकिंग की भीड़ में छात्रों को क्या फ़िल्टर करना चाहिए?
- आज सबसे बड़ा कौशल है—विवेक। रैंकिंग और सलाह मार्गदर्शन दे सकती हैं, पर आत्म-चिंतन का विकल्प नहीं बननी चाहिए। छात्रों को पूछना चाहिए—“क्या लोकप्रिय है?” नहीं, बल्कि “क्या मेरी ताकत, मूल्यों और दीर्घकालिक विकास से मेल खाता है?”
जो ध्यान के योग्य है, वह गहराई बनाता है—ऐसे प्रोग्राम, मेंटर्स और अनुभव जो सोच, लचीलापन, नैतिकता और ट्रांसफरेबल स्किल्स विकसित करें। रैंकिंग एक समय की प्रतिष्ठा दिखाती है, व्यक्तिगत फिट या बदलाव की तैयारी नहीं। शोर में स्पष्टता भीतर से आती है।
प्रश्न 7: महिला लीडर के रूप में आपके सामने कौन-सी सूक्ष्म चुनौतियाँ रहीं?
- कई चुनौतियाँ खुली नहीं थीं—अदृश्य अपेक्षाएँ और खामोश समझौते। बार-बार योग्यता साबित करने का दबाव, सहानुभूति और अधिकार का संतुलन, बिना मान्यता के भावनात्मक श्रम—ये सब यात्रा को आकार देते हैं। कभी महत्वाकांक्षा को आक्रामकता समझा गया, तो संयम को सहमति।
मैंने रणनीतिक आत्म-जागरूकता और आंतरिक लचीलापन विकसित किया—कब दृढ़ बोलना है, कब परिणामों को बोलने देना है; अपराधबोध के बिना सीमाएँ तय करना; संदेह के बिना महत्वाकांक्षा बनाए रखना। मेंटरशिप, चिंतन और मजबूत मूल्य-प्रणाली मेरे सहारे बने। प्रभावी नेतृत्व पुराने ढाँचों में फिट होने से नहीं, बल्कि सोच-समझकर उन्हें नया रूप देने से आता है।
प्रश्न 8: स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभव छात्रों के फैसलों में कैसे मदद करते हैं?
- कहानियाँ अमूर्त विचारों और वास्तविक जीवन के बीच पुल बनाती हैं। डेटा और रैंकिंग जानकारी देते हैं, लेकिन कहानियाँ मानवीय पहलू दिखाती हैं—सफलता, असफलता और पुनर्निर्माण की जटिलताएँ। इससे छात्र समझते हैं कि करियर अक्सर सीधी राह पर नहीं चलते।
कहानियाँ भावनात्मक जुड़ाव और आत्म-चिंतन पैदा करती हैं, पारंपरिक मानकों से आगे संभावनाएँ दिखाती हैं और उन जटिलताओं से परिचित कराती हैं जिन्हें कोई सिलेबस पूरी तरह नहीं सिखा सकता। वास्तविक यात्राओं से जुड़कर छात्र विवेक, लचीलापन और आत्म-जागरूकता विकसित करते हैं—यह प्रेरणा ही नहीं, अंतर्ज्ञान की शिक्षा है।
प्रश्न 9: शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को आगे किस तरह की बातचीत का नेतृत्व करना चाहिए?
- सूचना देने से आगे बढ़कर शिक्षा मीडिया को विवेक का क्यूरेटर और सार्थक संवाद का उत्प्रेरक बनना होगा। उन्हें यह सवाल उठाने चाहिए कि छात्र क्या सीखते हैं ही नहीं, क्यों और किस उद्देश्य से।
ऑटोमेशन, असमानता और तेज़ सामाजिक बदलाव के दौर में शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक के नैतिक उपयोग, मानसिक स्वास्थ्य, समान अवसर, आजीवन सीख और भविष्य के काम पर चर्चा जरूरी है। सनसनी या रैंकिंग-ड्रिवन नैरेटिव्स के बजाय साक्ष्य-आधारित विमर्श को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा मीडिया ट्रेंड्स रिपोर्ट नहीं करता—संस्कृति गढ़ता है।
प्रश्न 10: छात्रों के लिए वह सलाह जो कम सुनते हैं, पर सबसे जरूरी है?
- उपलब्धियों और तेज़ी के शोर में यह याद नहीं दिलाया जाता कि प्रगति से पहले उद्देश्य आता है। हर कोई जल्दी नहीं खिलता, हर योगदान तुरंत दिखाई नहीं देता। विकास अक्सर खामोशी में परिपक्व होता है—चिंतन, सीखने योग्य गलतियों और शांत दृढ़ता से।
स्थायी सफलता तब आती है जब योग्यता, मूल्य और प्रयास एक दिशा में हों—बिना जल्दबाज़ी। सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं से अर्थ, प्रभाव और भलाई रचना है। करुणा, ईमानदारी और सेवा-भाव से जुड़ी महत्वाकांक्षा न सिर्फ करियर बनाती है, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और आशावादी दुनिया का निर्माण करती है।
डिजिटल मीडिया, सहभागी संचार और शिक्षा के बदलते परिदृश्य में डॉ. अमित वर्मा एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अकादमिक शोध और व्यावहारिक अनुभव के बीच मजबूत सेतु बनाया है। मणिपाल विश्वविद्यालय जयपुर के सेंटर फॉर डिस्टेंस एंड ऑनलाइन एजुकेशन में पत्रकारिता एवं जनसंचार के एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट रजिस्ट्रार (हेल्पडेस्क) के रूप में कार्यरत डॉ. वर्मा न केवल भारत, बल्कि वैश्विक स्तर पर सहभागी और समावेशी संचार को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर मीडिया एंड कम्युनिकेशन रिसर्च (IAMCR) के पार्टिसिपेटरी कम्युनिकेशन रिसर्च सेक्शन के वाइस चेयर के तौर पर वे अंतरराष्ट्रीय विमर्श में योगदान दे रहे हैं। इसके साथ ही ‘जर्नल ऑफ कम्युनिकेशन एंड मैनेजमेंट’ और ‘हेल्थ एंड ह्यूमैनिटीज’ जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स के एडिटर-इन-चीफ के रूप में उनकी अकादमिक पहचान और भी सशक्त होती है।
12 वर्षों से अधिक के शैक्षणिक और उद्योग अनुभव में डॉ. अमित वर्मा ने SWAYAM जैसे राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए MOOC कोर्स विकसित किए, दर्जनों शोध लेख प्रकाशित किए, पुस्तकें लिखीं और भारतीय पेटेंट भी हासिल किए हैं। उनका शोध मीडिया साक्षरता, सामुदायिक मीडिया, डिजिटल कम्युनिकेशन और सामाजिक सशक्तिकरण में मीडिया की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करता है।
एडइनबॉक्स (Edinbox) के लिए पूजा खन्ना के साथ इस विशेष बातचीत में डॉ. अमित वर्मा ने मीडिया साक्षरता, ऑनलाइन शिक्षा, सहभागी संचार और डिजिटल युग में मीडिया पेशेवरों की बदलती जिम्मेदारियों पर अपने विचार साझा किये। प्रस्तुत है बातचीत के अंश:
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छात्रों और संस्थानों के साथ काम करने के अनुभव में, आपको क्या लगता है कि आज करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
- सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह मान लेना है कि केवल डिग्री ही सफलता की गारंटी है। कई छात्र सोचते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला मिलते ही या प्रोफेशनल कोर्स पूरा करते ही करियर अपने-आप बन जाएगा। जबकि सच यह है कि डिग्री केवल शुरुआत है, मंज़िल नहीं।
दूसरी गलतफहमी है कि सफलता जल्दी मिलती है। सोशल मीडिया ने ‘ओवरनाइट सक्सेस’ का भ्रम पैदा किया है, जिससे छात्र सीखने की प्रक्रिया को लेकर अधीर हो जाते हैं। मीडिया और कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में करियर निरंतर प्रयास, प्रयोग, असफलताओं और आत्म-मंथन से बनता है।
मैं देखता हूँ कि छात्र पदनाम (Designation) के पीछे दौड़ते हैं, कौशलों को नहीं समझते। आज सफल करियर वही बनाता है जो लगातार सीखता, भूलता और फिर नई चीजें सीखता रहता है — न कि जो किसी तय फॉर्मूले को पकड़कर चलता है।
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शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई छात्र खुद को प्रोफेशनल दुनिया के लिए पूरी तरह तैयार महसूस नहीं करते। असल समस्या कहाँ है?
- असली समस्या इरादों की कमी नहीं, बल्कि उनके ज़मीनी स्तर पर लागू होने में है। संस्थान सचमुच चाहते हैं कि शिक्षा इंडस्ट्री की जरूरतों के अनुरूप हो, लेकिन समस्या यह है कि उद्योग अकादमिक सिस्टम से कहीं तेज़ बदलते हैं। NEP-2020 के बाद जब तक पाठ्यक्रम संशोधित होकर लागू होते हैं, तब तक इंडस्ट्री एक कदम आगे बढ़ चुकी होती है। एक बड़ी चुनौती यह है कि छात्रों को वास्तविक समस्याओं से जूझने का पर्याप्त अनुभव नहीं मिलता। कई प्रोग्राम थ्योरी पर आधारित हैं, जिनमें व्यवहारिक सीखने, चिंतन और अनुप्रयोग की कमी रह जाती है।
इंडस्ट्री-रेडी होने का मतलब सिर्फ तकनीकी ज्ञान नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति, टीमवर्क, संचार और दबाव में निर्णय लेने की क्षमता भी है। छात्रों को यह भी नहीं सिखाया जाता कि कैसे सोचना है। उन्हें बस क्या सोचना है, यह पढ़ा दिया जाता है। यही वजह है कि कार्यस्थल पर वे स्वतंत्र निर्णय लेने में संघर्ष करते हैं।
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आपने शिक्षा व्यवस्था को कई स्तरों से देखा है। छात्रों के बेहतर परिणामों के लिए कौन-से बदलाव तुरंत जरूरी हैं?
- पहला बड़ा बदलाव यह होना चाहिए कि शिक्षा केवल कंटेंट डिलीवरी तक सीमित न रहे, बल्कि सीखने की भागीदारी बढ़ाए। लेक्चर और परीक्षा से आगे बढ़कर चर्चा, चिंतन, प्रोजेक्ट-आधारित सीख, और मेंटरशिप को बढ़ावा देना होगा। छात्र ‘एक्टिव पार्टिसिपेंट’ बनें, सिर्फ श्रोता नहीं।
दूसरी आवश्यकता है मूल्यांकन प्रणाली में सुधार। केवल अंक और ग्रेड सीखने का पैमाना नहीं होने चाहिए। पोर्टफोलियो, प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट, सामुदायिक कार्य और इंटर्नशिप को भी वास्तविक महत्व मिलना चाहिए। तीसरी जरूरत है — फैकल्टी डेवलपमेंट में निवेश। शिक्षकों को विषय ज्ञान के साथ-साथ डिजिटल टूल्स, नई शिक्षण पद्धतियों और छात्र मनोविज्ञान में लगातार प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
अंत में, संस्थानों को असफलता से डरने वाली संस्कृति बदलनी होगी। छात्रों को प्रयोग करने का मौका मिलना चाहिए, बिना डर के। गलतियाँ सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं, कमजोरी नहीं।
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AI और डिजिटल टूल्स के इस दौर में, कौन-से मानवीय कौशल अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं?
- टेक्नोलॉजी जितनी आगे बढ़ती है, मानवीय कौशल उतने आवश्यक होते जाते हैं।
Critical Thinking सबसे जरूरी कौशल है — जानकारी पर प्रश्न करना, स्रोतों की जांच करना और नैतिक निर्णय लेना।
Communication Skills — स्पष्ट अभिव्यक्ति, सक्रिय सुनना और विभिन्न संस्कृतियों के साथ सम्मानपूर्वक संवाद करना — यह मशीनें नहीं कर सकतीं।
Empathy — मानवीय भावनाओं और सामाजिक वास्तविकताओं को समझना किसी भी पेशे में अनिवार्य है।
Adaptability और Emotional Resilience — लगातार बदलते दौर में अनिश्चितता को संभालने की क्षमता ही असली सफलता तय करती है।
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शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना महत्वपूर्ण है, और Edinbox जैसे प्लेटफॉर्म विश्वसनीयता कैसे बनाए रख सकते हैं?
- ईमानदार संवाद ही शिक्षा में विश्वास की नींव है। छात्र और अभिभावक दी गई जानकारी के आधार पर बड़े फैसले लेते हैं। यदि जानकारी बढ़ा–चढ़ाकर पेश की जाए, तो नुकसान लंबे समय तक रहता है।
एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म को पारदर्शिता को प्रचार से ऊपर रखना होगा— संस्थानों, कोर्सों और करियर विकल्पों के वास्तविक पहलुओं को दिखाना चाहिए, केवल सकारात्मक पक्ष नहीं। विश्वसनीयता तभी बनती है जब प्लेटफॉर्म दावों की जांच करें, कठिन सवाल पूछें और विद्यार्थियों के हित को प्राथमिकता दें।
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छात्रों के सामने विकल्प, रैंकिंग और सलाह की भरमार है। वे कैसे तय करें कि किस पर ध्यान देना चाहिए?
- छात्रों को सबसे पहले खुद को समझना चाहिए। रैंकिंग या ट्रेंड के पीछे दौड़ने के बजाय उन्हें पूछना चाहिए- मुझे वास्तव में किसमें रुचि है? किस तरह का काम मुझे ऊर्जा देता है? रैंकिंग केवल संदर्भ का एक हिस्सा हों, अंतिम फैसला नहीं।
पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता, फैकल्टी, सीखने का वातावरण और प्रैक्टिकल अवसर अधिक महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, सलाह देने वालों की संख्या कम होनी चाहिए। बहुत अधिक राय भ्रम पैदा करती है। कुछ भरोसेमंद मेंटर्स और आत्म-चिंतन कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं।
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एक शैक्षणिक लीडर और प्रशासक के रूप में आपने कौन-सी चुनौतियाँ महसूस कीं, और उन्हें कैसे संभाला?
- मेरे अनुभव में कई चुनौतियाँ दिखती नहीं, पर प्रभाव गहरा छोड़ती हैं। सबसे बड़ी चुनौती है — कई भूमिकाओं का संतुलन। शिक्षण, शोध, प्रशासन और छात्रों की सहायता — इनमें संतुलन बनाना आसान नहीं होता। इसके लिए प्राथमिकताओं की समझ, लंबे कार्यघंटे और कठिन निर्णयों की जरूरत पड़ती है।
दूसरी चुनौती है — विभिन्न हितधारकों की अपेक्षाओं का प्रबंधन। छात्र, शिक्षक और प्रशासन — सभी की प्राथमिकताएँ अलग होती हैं। ऐसे में सुनना, संवाद करना और निष्पक्ष रहना बेहद जरूरी होता है। परिवर्तन लागू करना भी एक बड़ी चुनौती है। नए सिस्टम या डिजिटल प्रक्रियाओं को सभी तुरंत स्वीकार नहीं करते।
मैंने इसका समाधान संवाद और सभी को प्रक्रिया में शामिल करके किया। इन चुनौतियों ने मेरी नेतृत्व शैली को परिपक्व बनाया। नेतृत्व पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, भरोसा और शैक्षणिक समुदाय की सेवा का नाम है।
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छात्रों के बेहतर निर्णयों में स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभवों की क्या भूमिका है?
- स्टोरीटेलिंग शिक्षा को जीवंत बनाती है। जब छात्र संघर्ष, असफलताओं और धीरे–धीरे मिली सफलताओं की वास्तविक कहानियाँ सुनते हैं, तो करियर के वास्तविक स्वरूप को समझ पाते हैं। ये कहानियाँ बताते हैं कि करियर सीधा नहीं होता, उतार–चढ़ाव से भरा होता है। सच्ची कहानियाँ डर कम करती हैं और आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। मीडिया शिक्षा में तो स्टोरीटेलिंग समाज, संस्कृति और जिम्मेदारी की गहरी समझ देती है— जो किसी किताब में नहीं मिलती।
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भविष्य में शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को किस तरह की चर्चाओं को बढ़ावा देना चाहिए?
- शिक्षा पोर्टल्स को केवल रैंकिंग और एडमिशन-केंद्रित सामग्री से आगे बढ़ना चाहिए।
उन्हें सीखने की गुणवत्ता, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल एथिक्स, मीडिया साक्षरता और बदलती दुनिया में रोजगार कौशल जैसे मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए।
ग्रामीण, हाशिए पर रहने वाले और गैर-परंपरागत छात्रों की कहानियाँ भी प्रमुखता से सामने लानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण— शिक्षा पोर्टल्स को संवाद को बढ़ावा देना चाहिए, सिर्फ जानकारी देना नहीं।
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यदि आपको छात्रों को एक ऐसी सलाह देनी हो जो वे कम सुनते हैं पर जिसे सुनना बहुत जरूरी है, तो वह क्या होगी?
- मेरी सलाह है कि सफल बनने की जल्दी न करें, सक्षम बनने पर ध्यान दें। सफलता क्षमता के पीछे चलती है, उल्टा नहीं। खुद को समझें, मजबूत नींव बनाएं और लगातार सीखते रहें। दूसरों से तुलना न करें — हर किसी की यात्रा अलग होती है। आज की तेज़ दुनिया में धैर्य, ईमानदारी और निरंतर विकास— ये दुर्लभ लेकिन बेहद शक्तिशाली गुण हैं। मैं इस चर्चा को जॉन डेवी के विचार से समाप्त करना चाहूँगा: “Education is not preparation for life; education is life itself.” यह कथन याद दिलाता है कि शिक्षा केवल डिग्री या नौकरी के बारे में नहीं है, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदार, संवेदनशील और जागरूक व्यक्तियों को विकसित करने की प्रक्रिया है। मैं Edinbox का धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने शिक्षा, मीडिया और छात्र सशक्तिकरण पर सार्थक संवाद का अवसर प्रदान किया। ऐसे संवाद हमें शिक्षा के भविष्य को और अधिक नैतिक, सूझबूझ भरा और प्रभावी बनाने में मदद करते हैं।
Find Your True North की संस्थापक, शिक्षिका और करियर कोच पूजा खन्ना से विशेष बातचीत
युवा करियर फैसलों में अक्सर तुलना, दबाव और अनिश्चितता के बीच उलझ जाते हैं। ऐसे माहौल में सही दिशा चुनने के लिए विश्वसनीय और अनुभव आधारित मार्गदर्शन बेहद ज़रूरी है। इसी उद्देश्य से Find Your True North की संस्थापक, शिक्षिका और करियर कोच पूजा खन्ना से विशेष बातचीत की गई। दो दशकों के अनुभव के साथ वे शिक्षा, एम्प्लॉयबिलिटी और वेल-बिइंग के संगम पर काम करती हैं और छात्रों को आत्म-जागरूकता, स्पष्टता और उद्देश्यपूर्ण करियर पथ चुनने में मदद करती हैं। यह इंटरव्यू छात्रों को करियर और शिक्षा विकल्पों को समझदारी, दीर्घकालिक दृष्टि और आत्मविश्वास के साथ चुनने में मार्गदर्शन देने के लिए है।
प्रश्न 1: करियर चुनते समय छात्र सबसे आम गलती क्या करते हैं, और यह इतनी बार क्यों होती है?
- सबसे आम गलती है—दिखाई देने वाले विकल्पों को योग्य समझ लेना। छात्र अक्सर उन करियर की ओर भागते हैं जो लोकप्रिय हैं, ज्यादा चर्चा में हैं, ज्यादा कमाने वाले हैं या समाज में प्रतिष्ठित माने जाते हैं, बजाय इसके कि वे अपने व्यक्तित्व, रुचि और मूल्यों के अनुरूप रास्ता चुनें। यह इसलिए होता है क्योंकि बच्चे तुलना, मार्क्स, रैंकिंग, सोशल मीडिया की सफलता कहानियों और पैरेंट्स की चिंता वाले माहौल में बड़े होते हैं। OECD और वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रिपोर्ट्स बताती हैं कि आज के युवा एक बेहद अस्थिर और अनिश्चित दुनिया में करियर चुन रहे हैं, जबकि उनके फैसले लेने के टूल उतनी तेज़ी से विकसित नहीं हुए हैं। जब फैसले डर के आधार पर लिए जाते हैं—पीछे रह जाने का डर, माता-पिता को निराश करने का डर, ‘औसत’ समझे जाने का डर—तो स्पष्टता की जगह दबाव ले लेता है।
प्रश्न 2: माता-पिता की उम्मीदों और सामाजिक दबाव के बीच छात्र अपनी वास्तविक रुचियां और क्षमताएं कैसे पहचानें?
- आत्म-जागरूकता एक दिन में नहीं बनती, यह अनुभव और आत्म-चिंतन से विकसित होती है। Find Your True North में हम छात्रों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे:
कमिटमेंट से पहले एक्सप्लोर करें: इंटर्नशिप, शॉर्ट-टर्म प्रोजेक्ट्स, वॉलंटियरिंग, प्रोफेशनल्स को शैडो करना, और इंफॉर्मेशनल इंटरव्यूज़।
खुद को बोर होने दें: जब दिमाग लगातार सोशल मीडिया से भरा न हो, तभी जिज्ञासा जन्म लेती है।
ऊर्जा को देखें, सिर्फ प्रदर्शन को नहीं: खुद से पूछें—कौन-सा काम मुझे लगन से करने पर भी अच्छा महसूस कराता है?
वैश्विक शोध मॉडल बताते हैं कि करियर एक्सप्लोरेशन एक प्रक्रिया है, कोई एक बार का फैसला नहीं। रुचियां अनुभवों से स्पष्ट होती हैं, अनुमान से नहीं।
प्रश्न 3: आपके अनुभव में, क्या अकादमिक मार्क्स किसी छात्र के दीर्घकालिक करियर को तय करते हैं?
- मार्क्स महत्वपूर्ण हैं, पर समय के साथ उनकी अहमियत कम हो जाती है। अच्छे अंक पहली दहलीज़ खोल सकते हैं, लेकिन सफलता कौशल, अनुकूलन क्षमता, सीखने की गति और मूल्यों पर निर्भर करती है। शोध लगातार बताता है कि क्रिटिकल थिंकिंग, सहयोग और रेज़िलिएंस जैसे कौशल भविष्य के लिए बेहद जरूरी हैं।
मैं हमेशा छात्रों से कहती हूं, “मार्क्स आपकी कहानी का एक हिस्सा हैं, पूरी कहानी नहीं।” लंबी दौड़ में सफलता इस बात पर निर्भर है कि आप कितनी तेजी से सीख सकते हैं, भूल सकते हैं और खुद को दोबारा गढ़ सकते हैं।
प्रश्न 4: किस उम्र से छात्रों को गंभीरता से करियर के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए?
- करियर सोचना जल्दी शुरू होना चाहिए, लेकिन करियर तय नहीं।
12–14 वर्ष: स्वयं को समझने पर ध्यान—रुचि, मूल्य, व्यक्तित्व, जिज्ञासा।
15–17 वर्ष: एक्सपोज़र—विषय, इंडस्ट्री, रोल मॉडल, वास्तविक दुनिया का काम।
स्कूल के बाद: कौशल विकसित करना, प्रयोग करना, अनुभव लेना।
वैश्विक करियर फ्रेमवर्क—National Career Services और APCDA सहित—करियर तैयारी पर जोर देते हैं, करियर निश्चितता पर नहीं। लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि “मैं हमेशा क्या बनूंगा”, बल्कि यह कि “अगला कदम मैं क्या एक्सप्लोर करना चाहता हूं।”
प्रश्न 5: आज के छात्र ‘गलत करियर चुन लेने’ से डरते हैं। वे करियर फैसले आत्मविश्वास से कैसे लें?
- छात्रों को फिक्स्ड माइंडसेट से ‘नेविगेशन माइंडसेट’ की ओर बढ़ना चाहिए। एक ही ‘सही’ विकल्प नहीं होता—सिर्फ समझदारी से लिया गया अगला कदम होता है।
कुछ मददगार तरीके:
- बड़े फैसलों को छोटे-छोटे प्रयोगों में बदलें
- “If… but…” की जगह “Yes, and…” सोचें
जैसे: “हाँ, मुझे सुरक्षा चाहिए और मैं अर्थपूर्ण काम भी करना चाहता हूँ।”
- ऐसे कौशल सीखें जो विभिन्न भूमिकाओं में काम आएं
करियर में आत्मविश्वास तब आता है जब छात्र समझते हैं कि करियर चुना नहीं जाता—करियर बनाया जाता है।
प्रश्न 6: माता-पिता को करियर फैसलों में क्या भूमिका निभानी चाहिए, और किस जगह छात्रों को आगे आने देना चाहिए?
- माता-पिता को फैसला करने वाले नहीं, बल्कि फैसला सक्षम बनाने वाले बनना चाहिए।
उनकी भूमिका है:
- एक्सपोज़र और दृष्टिकोण देना
- अनुभव साझा करना, लेकिन परिणाम थोपना नहीं
- सिर्फ नतीजों को नहीं, कोशिश को भी सराहना
छात्रों को अपनी रुचियों, सीखने की पसंद और आकांक्षाओं में नेतृत्व करना चाहिए। जब संवाद सम्मानजनक और तथ्यों पर आधारित होता है, तो सबसे स्वस्थ परिणाम निकलते हैं।
प्रश्न 7: तेजी से बदलते समय में छात्र डिग्री, कौशल और प्रैक्टिकल एक्सपोज़र का संतुलन कैसे बनाएँ?
- करियर को एक तीन टांगों वाली स्टूल की तरह समझें:
डिग्री: बुनियादी ज्ञान और विश्वसनीयता
कौशल: रोजगार क्षमता और अनुकूलन
व्यावहारिक अनुभव: स्पष्टता और आत्मविश्वास
OECD, APCDA और WEF जैसी वैश्विक संस्थाओं के अनुसार, रोजगार क्षमता अब सिर्फ डिग्री पर निर्भर नहीं है। करियर अब एक सीढ़ी नहीं—कौशलों का जाल है, जो समय के साथ बढ़ता है।
जो छात्र पढ़ाई के साथ प्रोजेक्ट्स, इंटर्नशिप, रिसर्च, फ्रीलांसिंग और वास्तविक अनुभव जोड़ते हैं, वे भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना बेहतर तरीके से करते हैं।
प्रश्न 8: उन छात्रों को आप क्या सलाह देना चाहेंगी जो अपने भविष्य को लेकर भ्रमित हैं या खुद को औसत मानते हैं?
- आप पीछे नहीं हैं, आप बन रहे हैं। भ्रम कमजोरी नहीं है, यह अक्सर आत्म-खोज की शुरुआत होती है। अनुभव बनाइए, समझदारी वाला साथ चुनिए, ऐसे लोगों को फॉलो कीजिए जो प्रेरित करें, सिर्फ प्रभावित नहीं। और याद रखें: खुशी सफलता के बाद मिलने वाली चीज़ नहीं—बल्कि अर्थपूर्ण अनुभवों से बनने वाली भावना है। आपका करियर किसी और जैसा दिखने की ज़रूरत नहीं। उसे आपके लिए मायने रखना चाहिए।
आज के दौर में जब शिक्षा, तकनीक और मानसिक स्वास्थ्य अक्सर अलग-अलग खांचों में देखे जाते हैं, ऐसे समय में प्रो. श्याम सुंदर बाली एक दुर्लभ व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं, जो इन सभी क्षेत्रों को एक समग्र दृष्टि से जोड़ते हैं। एपीजे यूनिवर्सिटी, सोहना में मैनेजमेंट, कंप्यूटर एनालिटिक्स, साइकोलॉजी और महाभारत जैसे विषय पढ़ाने वाले प्रो. बाली केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि व्यवहारिक मनोविज्ञान, भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक उद्योग अनुभव का अनूठा संगम हैं।
एक ओर वे EMDR, CBT और स्पोर्ट्स साइकोलॉजी जैसे आधुनिक मनोवैज्ञानिक तरीकों में प्रशिक्षित काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट हैं, तो दूसरी ओर महाभारत और भगवद्गीता के गंभीर अध्येता, योग शिक्षक और हिंदू संस्कारों पर लिखने वाले विद्वान। कॉरपोरेट जगत में जापानी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ से लेकर पावर ग्रिड इंजीनियरों के ट्रेनर तक का उनका सफर, आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
इस विशेष बातचीत में प्रो. श्याम सुंदर बाली से हमने शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, भारतीय दर्शन, तकनीक, नेतृत्व और युवा पीढ़ी के भविष्य को लेकर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश:
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आपने इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, साइकोलॉजी, अध्यात्म और कॉरपोरेट नेतृत्व—इन सभी क्षेत्रों में गहराई से काम किया है। आपके जीवन की यह बहुआयामी यात्रा कैसे आकार लेती गई?
- मेरा जन्म भारत के ऐसे समय में हुआ जब संसाधनों की कमी और अस्तित्व के लिए संघर्ष जीवन की सामान्य अवस्था थी। इस वातावरण ने मेरे भीतर गहरी जिज्ञासा, आत्मअनुशासन और निरंतर आगे बढ़ने की मनोवैज्ञानिक दृढ़ता विकसित की। मैंने जीवन को किसी पूर्वनिर्धारित योजना के रूप में नहीं जिया, बल्कि उसे एक स्वाभाविक रूप से विकसित होती यात्रा की तरह अपनाया। जो अवसर सामने आया, मैंने उसे पूरे मन से स्वीकार किया। इंजीनियरिंग से मैनेजमेंट, मनोविज्ञान से अध्यात्म और कॉरपोरेट नेतृत्व तक का विस्तार स्वाभाविक था सीखने की तीव्र इच्छा और हर क्षेत्र में उत्कृष्टता पाने की आकांक्षा ने नए आयाम जोड़े। एक अवसर ने दूसरे को जन्म दिया, और हर अवसर आत्मचिंतन को और गहरा करता गया। अंततः, हर सेट्बैक ईश्वर की कृपा से मुझे एक कहीं अधिक बेहतर स्थान पर ले गया। मैं इसको केवल एक ईश्वरीय कृपा ही कहूँगा !
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एक जापानी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ पद से अकादमिक दुनिया में आने का निर्णय आसान नहीं रहा होगा। इस बदलाव के पीछे आपकी सोच क्या थी?
- एक जापानी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ पद से अकादमिक दुनिया में आना निश्चित रूप से आसान निर्णय नहीं था, लेकिन यह मेरे जीवन की स्वाभाविक अगली अवस्था थी। मेरा सफर नेतृत्व से पहले प्रशिक्षण से शुरू हुआ मैं एक ट्रेनर भी था और आज भी पावरग्रिड कॉर्पोरेशन में लाइव लाइन इंस्टॉलेशन के क्षेत्र में नंबर-1 फैकल्टी के रूप में सक्रिय हूँ। जीवन ने मुझे जो ज्ञान, अनुभव और दृष्टि दी, उसे समाज को लौटाने का समय है, साथ ही, सीखने की प्रक्रिया मेरे लिए कभी रुकी नहीं। युवाओं के भीतर छिपी क्षमता को पहचानना, उनमें सोच की चिंगारी जगाना और उन्हें आत्मविश्वासी बनते देखना मुझे गहरी संतुष्टि देता है।
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आप एक प्रैक्टिसिंग काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट भी हैं। आज के भारतीय युवाओं में आप सबसे बड़ी मानसिक चुनौती क्या देखते हैं?
- यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। आज जब लोग एआई को एक बड़ी अवसर के रूप में देख रहे हैं, मैं इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गंभीर मानसिक खतरे के रूप में भी देखता हूँ। सबसे बड़ी चुनौती है स्वतंत्र बुद्धि का क्षय। अत्यधिक सूचना-भार (information overload) ने युवाओं की ध्यान-अवधि को बहुत कम कर दिया है। सोचने, विवेक करने और गहराई से समझने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है। हर समय उपलब्ध जानकारी ने निर्णय-क्षमता को कमजोर किया है। इसके साथ ही ग्रीक दर्शन में वर्णित “हेडोनिया”means तात्कालिक सुख की प्रवृत्ति—युवाओं को उद्देश्य, धैर्य और आत्मअनुशासन से दूर ले जा रही है। यह प्रवृत्ति भविष्य की पीढ़ियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है।
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EMDR, CBT जैसी आधुनिक थेरेपी और महाभारत-गीता जैसे ग्रंथ—क्या आपको इनमें कोई साझा सूत्र दिखाई देता है?
- निस्संदेह, आधुनिक थेरेपी और हमारे प्राचीन ग्रंथों के बीच एक गहरा साझा सूत्र दिखाई देता है। श्रीमद्भगवद्गीता अपने आप में इतिहास की सबसे लंबी और परिपूर्ण काउंसलिंग सत्र है, जहाँ भगवान कृष्ण ने अर्जुन को संकट, भ्रम और भय की अवस्था से स्पष्टता और कर्म की ओर मार्गदर्शन दिया। वास्तव में, गीता को संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT) का सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है, जहाँ विचारों को चुनौती देकर व्यवहार में परिवर्तन लाया गया। वहीं EMDR जैसी आधुनिक तकनीकें अभी पूरी तरह समझी जा रही हैं उनके समानांतर सूत्र प्राचीन भारतीय शास्त्रों में खोजे जा सकते हैं। दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है—स्व-जागरूकता (Awareness) बढ़ाना, भावनाओं (Emotions), विचारों (Cognitions) और व्यवहार (Behaviour) को समझना तथा व्यक्ति को स्वयं के लिए सर्वोत्तम करने में सक्षम बनाना।
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आप महाभारत पढ़ाते भी हैं। आज के कॉरपोरेट, राजनीति और पारिवारिक जीवन में महाभारत की कौन-सी सीख सबसे ज्यादा प्रासंगिक है?
- आपके प्रश्नों की परिपक्वता और व्यापक दृष्टि मुझे वास्तव में प्रभावित करती है। महाभारत की सबसे प्रासंगिक सीख चाहे वह कॉरपोरेट हो, राजनीति हो या पारिवारिक जीवन—संघर्ष को समझने और उसे सही ढंग से प्रबंधित करने की क्षमता है। महाभारत यह नहीं सिखाता कि संघर्ष से बचा जाए, बल्कि यह सिखाता है कि संघर्ष के बीच भी विवेक, मर्यादा और उत्तरदायित्व कैसे बनाए रखा जाए। इसके साथ ही यह ग्रंथ हमें ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा देता है जिससे हम संपूर्ण ब्रह्मांडीय पारिस्थितिकी को क्षति न पहुँचाएँ। मनुष्य, समाज और प्रकृति तीनों एक सहजीवी (symbiotic) संबंध में बंधे हैं, और इस संतुलन को बनाए रखना ही महाभारत की सबसे गहरी और आज भी प्रासंगिक शिक्षा है।
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आप हिंदू संस्कारों को सरल और आधुनिक बनाने की बात करते हैं। आज के युवा इन्हें क्यों समझ नहीं पाते और समाधान क्या है?
- आज के युवा हिंदू संस्कारों को इसलिए नहीं समझ पाते क्योंकि सदियों की गुलामी के दौरान तथाकथित आधुनिकीकरण के नाम पर हमारी प्राचीन बुद्धि को उनसे दूर कर दिया गया। इसका दायित्व केवल युवाओं का नहीं, बल्कि पिछली पीढ़ियों का भी है, जो इस ज्ञान को सरल, प्रासंगिक और जीवंत रूप में आगे नहीं पहुँचा सकीं। वास्तव में हिंदू संस्कार आधुनिक प्रबंधन सिद्धांतों—जैसे Management by Objectives का ही गहन और व्यावहारिक रूप हैं, जहाँ जीवन के उद्देश्य स्पष्ट होते हैं। जब हम इन संस्कारों को सरल भाषा में समझेंगे और उनमें निहित वैज्ञानिकता व गौरव को पुनः स्थापित करेंगे, तब युवा स्वाभाविक रूप से उनकी ओर आकर्षित होंगे।
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आप कंप्यूटर एनालिटिक्स भी पढ़ाते हैं। क्या आपको लगता है कि डेटा और एआई मानव व्यवहार को पूरी तरह समझ सकते हैं?
- मैं अत्यंत साधनहीन लेकिन शिक्षित परिवार से आया हूँ, इसलिए जीवन भर स्वयं को नवीनतम ज्ञान और प्रवृत्तियों से अपडेट रखना मेरी आवश्यकता रही। इसी कारण मैं भविष्य के प्रबंधकों को डेटा एनालिटिक्स पढ़ाता हूँ। मेरा स्पष्ट मानना है कि डेटा और एआई कभी भी मानव बुद्धि का स्थान नहीं ले सकते। वे केवल मस्तिष्क पर पड़े सूचना-भार को संभाल सकते हैं, पर वही सूचना-भार आगे चलकर सूचना-अधिकता (Information overload) बन जाता है। इससे मानव व्यवहार में सूक्ष्म लेकिन गहरा परिवर्तन आता है। मुझे आशंका है कि यह परिवर्तन मानव को अधिक संवेदनशील नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अधिक पशु-सदृश, प्रतिक्रियात्मक बना सकता है। यह भले कल्पना लगे, पर इसके लक्षण हम आज ही देखने लगे हैं।
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स्पोर्ट्स साइकोलॉजी में आपका अनुभव क्या कहता है—मानसिक मजबूती किसी खिलाड़ी या प्रोफेशनल की सफलता में कितनी निर्णायक होती है?
- मैं स्पोर्ट्स साइकोलॉजी में प्रमाणित हूँ और अपने अनुभव के आधार पर निस्संदेह कह सकता हूँ कि मानसिक मजबूती किसी भी खिलाड़ी की सफलता का सबसे निर्णायक तत्व होती है। शारीरिक क्षमता और तकनीकी कौशल आवश्यक हैं, लेकिन वे तभी फलते हैं जब मन स्थिर, केंद्रित और दबाव सहने में सक्षम हो। मानसिक रूप से मजबूत खिलाड़ी कठिन परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास बनाए रखते हैं और असफलता को सीख में बदलते हैं। विज़ुअलाइज़ेशन (Visualization) जैसी तकनीकें तभी वास्तविक सफलता में बदलती हैं जब उन्हें मानसिक दृढ़ता का आधार मिलता है। परिपक्व मानसिक मजबूती के बिना प्रतिभा अधूरी रह जाती है और उसी मानसिक मजबूती के साथ साधारण क्षमता भी असाधारण उपलब्धि में परिवर्तित हो सकती है।
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भारत में लाइव-लाइन OPGW इंस्टॉलेशन के आप अग्रणी विशेषज्ञ माने जाते हैं। तकनीकी क्षेत्र में सुरक्षा और प्रशिक्षण को आप कितना अहम मानते हैं?
- भारत में लाइव-लाइन OPGW इंस्टॉलेशन के क्षेत्र में सुरक्षा और प्रशिक्षण मेरे लिए सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता रहे हैं। यह अत्याधुनिक तकनीक सबसे पहले जापानी विशेषज्ञों द्वारा भारत में लाई गई थी, और मुझे उस मूल टीम का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिसने इसे भारतीय परिस्थितियों में सफलतापूर्वक लागू किया। मुझे यह श्रेय भी प्राप्त है कि भारत में पहली बार भूमिगत ऑप्टिकल फाइबर तथा पहली बार लाइव-लाइन परिस्थितियों में ट्रांसमिशन टावरों पर ऑप्टिकल फाइबर स्थापित किया गया, जिससे टेलीकॉम क्रांति को गति मिली। लाइव-लाइन OPGW इंस्टॉलेशन विश्व की सबसे खतरनाक तकनीकों में से एक है, जिसे कई विकसित देशों में अनुमति नहीं है। फिर भी, अत्यंत कठोर सुरक्षा मानकों और गहन प्रशिक्षण के बल पर भारत में हजारों किलोमीटर OPGW लाइव-लाइन कंडीशन में स्थापित किया गया। आज मैं इस क्षेत्र में भारत का नंबर-वन ट्रेनर और कंसल्टेंट हूँ और नियमित रूप से पावरग्रिड के इंजीनियरों को प्रशिक्षण देता हूँ जिस पर मुझे गहरा गर्व है।
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आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आपको सबसे बड़ा सुधार किस स्तर पर जरूरी लगता है—कंटेंट, टीचर या माइंडसेट?
- मेरे विचार से आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ा और सबसे आवश्यक सुधार शिक्षक के स्तर पर होना चाहिए। कंटेंट और माइंडसेट दोनों ही तभी प्रभावी होते हैं, जब उन्हें दिशा देने वाला एक श्रेष्ठ शिक्षक हो। मैं शिक्षक के स्थान पर गुरु शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूँ, क्योंकि गुरु का अर्थ केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि वह होता है जो हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए। गुरु विद्यार्थियों के मन में प्रश्न करने की क्षमता, आत्मविश्वास और नैतिकता का विकास करता है। एक महान गुरु विषय को केवल समझाता नहीं, बल्कि उसे जीवन से जोड़ता है और सोचने की नई दृष्टि देता है। युवाओं के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान कर उसे निखारना गुरु का कार्य है। इसलिए सशक्त शिक्षा व्यवस्था की नींव एक जागरूक, संवेदनशील और प्रेरणादायक गुरु पर ही टिकी होती है।
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क्या आप मानते हैं कि योग, ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास मानसिक रोगों की रोकथाम में सहायक हो सकते हैं?
- हाँ, मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि योग, ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास मानसिक रोगों की रोकथाम में अत्यंत सहायक हैं। एक प्रमाणित योग शिक्षक और मनोवैज्ञानिक होने के नाते, तथा बचपन से अपने पिता से योग सीखकर और बाद में विश्वविद्यालय से औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि योग, ध्यान और सजगता (awareness) मानसिक स्वास्थ्य के सबसे प्रभावी उपकरण हैं। ये अभ्यास मन, शरीर और भावनाओं में संतुलन स्थापित करते हैं, तनाव, चिंता और अवसाद को कम करते हैं तथा आत्म-नियंत्रण और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करते हैं। कई मामलों में ये आधुनिक औषधीय उपचारों से भी अधिक प्रभावी होकर मानसिक रोगों की रोकथाम में सहायक सिद्ध होते हैं।
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आज के छात्रों के लिए आपकी सबसे अहम सलाह क्या होगी—करियर, मानसिक संतुलन और जीवन के उद्देश्य को लेकर?
- आज के छात्रों के लिए मेरी सबसे अहम सलाह यह होगी कि वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने का प्रयास करें। जीवन का लक्ष्य केवल करियर या भौतिक सफलता नहीं, बल्कि अपने परिवेश, प्रकृति और पूरे ब्रह्मांड के साथ सामंजस्य में रहते हुए प्रसन्नता से जीना है। जब हम बच्चे जैसी जिज्ञासा, सरलता और सीखने की भावना के साथ जीवन को देखते हैं, तब मानसिक संतुलन स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। यदि छात्र धर्म के सही अर्थ कर्तव्य, नैतिकता और संतुलन—और ग्रीक अवधारणा ‘यूडैमोनिया’ (Eudaimonia) अर्थात सार्थक एवं सद्गुणमय जीवन को समझ लें, तो करियर, मानसिक शांति और जीवन की दिशा अपने आप सही मार्ग पर आ जाती है।
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आप सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हैं। क्या आपको लगता है कि शिक्षित वर्ग समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूलता जा रहा है?
- मैं इस प्रश्न को थोड़ा अलग दृष्टिकोण से देखता हूँ। वास्तव में, आज का शिक्षित वर्ग समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति पहले से अधिक जागरूक हो रहा है, और यही शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भी है। शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्वों को समझने और निभाने की क्षमता विकसित करने का माध्यम है। सामाजिक कार्यों से जुड़कर व्यक्ति समाज को कुछ लौटाता है और साथ-साथ आत्मसम्मान, संवेदनशीलता तथा मानवीय मूल्यों का विकास करता है। मेरे अपने अनुभव में, सामाजिक सेवा व्यक्ति को आंतरिक संतोष देती है और उसे उद्देश्यपूर्ण व आनंदमय जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
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आने वाली पीढ़ी को आप किस तरह का भारत और किस तरह का इंसान बनते देखना चाहते हैं?
- मैं आने वाली पीढ़ी में ऐसा भारत देखना चाहता हूँ जो पुनः विश्वगुरु के रूप में आध्यात्मिकता, ज्ञान और मानवीय मूल्यों का उज्ज्वल उदाहरण बने। ऐसा भारत जहाँ लोग प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य में जीवन जिएँ, जिज्ञासु हों, सजग हों और आंतरिक आनंद से परिपूर्ण हों। साथ ही, यह पीढ़ी इतनी विवेकशील और सशक्त भी हो कि वह अपनी संस्कृति, स्वतंत्रता और अस्तित्व की रक्षा कर सके। इतिहास हमें सिखाता है कि केवल शांति पर्याप्त नहीं, सुरक्षा और सजगता भी आवश्यक है। मेरा स्वप्न ऐसा इंसान है जो करुणामय हो, संतुलित हो और आवश्यकता पड़ने पर निर्भीक होकर अपने मूल्यों की रक्षा कर सके।
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अगर आप अपने जीवन दर्शन को एक वाक्य में कहें, तो वह क्या होगा?
- यदि मैं एक वाक्य मैं अपने जीवन को कहूँ तो कहूँगा कि मेरे जीवन दर्शन का सार यह है कि “सीखने की कोई उम्र या सीमा नहीं होती और कठोर परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है।“
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आप मैनेजमेंट पढ़ाते हैं। आपके अनुसार आज के समय में मैनेजमेंट केवल डिग्री है या जीवन जीने की एक कला?
- मेरे अनुसार मैनेजमेंट शिक्षा हमें यह समझने में सहायता करती है कि हम अपने जीवन और कार्यों को किस प्रकार अधिक प्रभावी, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से संचालित कर सकते हैं। वास्तव में हर व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर एक मैनेजर होता है—चाहे वह समय प्रबंधन हो, संसाधनों का उपयोग हो, संबंधों का निर्वाह हो या निर्णय लेना। मैनेजमेंट की पढ़ाई व्यक्ति को इन सभी पहलुओं के प्रति सजग बनाती है और उसे बेहतर तरीके से करने की दिशा दिखाती है। मैनेजमेंट की डिग्री केवल एक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि व्यक्ति ने सीखने का सचेत प्रयास किया है और अपने कार्यों को पेशेवर ढंग से उत्कृष्टता के साथ करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसीलिए आज के समय में मैनेजमेंट केवल एक डिग्री नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है।
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MBA क्लासरूम में पढ़ाए जाने वाले पश्चिमी मैनेजमेंट मॉडल और भारतीय दर्शन आधारित प्रबंधन में आप क्या मूल अंतर देखते हैं?
- MBA कक्षा में पढ़ाए जाने वाले पश्चिमी मैनेजमेंट मॉडल मुख्यतः एक व्यवस्थित, मापनीय और सिद्ध ढाँचे पर आधारित होते हैं, जहाँ प्रक्रियाओं, प्रणालियों, मशीनों और मानव संसाधनों के समन्वय से भौतिक उत्पादकता, दक्षता और उपभोग में उत्कृष्टता प्राप्त करना लक्ष्य होता है। इसके विपरीत, भारतीय दर्शन-आधारित प्रबंधन समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड को एक इकाई और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ देखा जाता है। यह मॉडल केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानसिक शांति, नैतिकता और आध्यात्मिक संतुलन को भी उतना ही महत्त्व देता है। जहाँ पश्चिमी मॉडल बाह्य संरचनाओं और परिणामों को समझने पर केंद्रित है, वहीं भारतीय दर्शन आंतरिक चेतना, कर्म, उद्देश्य और आत्म-विकास को प्रबंधन का आधार मानता है। दोनों दृष्टिकोणों का संतुलन ही आज के जटिल वैश्विक परिदृश्य में प्रभावी प्रबंधन का मार्ग प्रशस्त करता है।
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कॉरपोरेट सीईओ रहने का आपका अनुभव मैनेजमेंट पढ़ाने के तरीके को कैसे अलग बनाता है?
- कॉरपोरेट सीईओ के रूप में मेरा अनुभव मेरे मैनेजमेंट पढ़ाने के तरीके को व्यावहारिक और प्रभावी बनाता है। एक जापानी कंपनी के सीईओ रहते हुए मुझे विभिन्न विभागों में कार्य करने और एक बहुराष्ट्रीय संगठन का नेतृत्व करने का अवसर मिला। इस हैंड्स-ऑन अनुभव के कारण मैं छात्रों को मैनेजमेंट की प्रक्रियाएँ केवल सैद्धांतिक रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यानुभव के दृष्टिकोण से समझा पाता हूँ। इससे कक्षा अधिक जीवंत, प्रासंगिक और सीखने योग्य बनती है। यही कारण है कि आज विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की माँग बढ़ रही है। मुझे लगता है कि भविष्य का शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र ऐसे ही अनुभवी और व्यावहारिक शिक्षकों की आवश्यकता करेगा।
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आपके अनुसार आज के मैनेजमेंट छात्रों की सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी ताकत क्या है?
- मेरे अनुसार जो छात्र गंभीरता से सीखने की प्रक्रिया में लगा है, वह कभी कमजोर नहीं हो सकता। आज के मैनेजमेंट छात्रों की सबसे बड़ी कमजोरी इन्फॉर्मेशन ओवरलोड (Information overload) है, जो उन्हें यह भ्रम दे देता है कि वे सब कुछ जानते हैं। जब छात्र यह मानने लगता है कि उसे ज्ञान हो चुका है, वहीं से सीखने की प्रक्रिया रुक जाती है। इस स्थिति को आज के समय में एआई और तेज़ कर रहा है। वहीं, आज के मैनेजमेंट छात्रों की सबसे बड़ी ताकत वे आधुनिक उपकरण हैं, जिनकी सहायता से वे कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुँच बना सकते हैं। यदि विनम्रता और सीखने की जिज्ञासा बनी रहे, तो यही ताकत उन्हें असाधारण बना सकती है।
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क्या भारतीय मैनेजमेंट एजुकेशन अभी भी सिलेबस-केंद्रित है, जबकि इंडस्ट्री स्किल्स चाहती है? इस गैप को कैसे पाटा जा सकता है?
- यह सच है कि कुछ गिने-चुने प्रबंधन संस्थानों को छोड़कर भारत में अधिकांश मैनेजमेंट एजुकेशन संस्थान अभी भी सिलेबस-केंद्रित हैं, जबकि इंडस्ट्री को कुशल और व्यावहारिक प्रोफेशनल्स की आवश्यकता है। इस कारण शिक्षा और उद्योग के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। इस गैप को पाटने के लिए अकादमिक संस्थानों द्वारा संचालित इंटर्नशिप-विशिष्ट संस्थान एक प्रभावी समाधान हो सकते हैं, जिन्हें उद्योग का सक्रिय समर्थन प्राप्त हो। इसके साथ ही शैक्षणिक संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग से वैश्विक अनुभव और व्यावहारिक कौशल छात्रों तक पहुँचाए जा सकते हैं। इससे शिक्षा अधिक प्रासंगिक, कौशल-आधारित और उद्योगोन्मुख बन सकेगी।
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कॉरपोरेट दुनिया में तनाव और बर्नआउट तेजी से बढ़ रहा है। क्या मैनेजमेंट शिक्षा में साइकोलॉजी को अनिवार्य किया जाना चाहिए?
- कॉरपोरेट दुनिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और निरंतर दबाव के कारण तनाव और बर्नआउट तेजी से बढ़े हैं। प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों में मनोविज्ञान और संचार पहले से ही पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं, परंतु बदलते समय में यह पर्याप्त नहीं है। आज मैनेजमेंट शिक्षा को एक नए परिवर्तन की आवश्यकता है, जहाँ मानव मनोविज्ञान को कहीं अधिक गहराई और व्यापक रूप में अनिवार्य किया जाए। एआई, ऑटोमेशन और आधुनिक तकनीकों के बढ़ते उपयोग के साथ ह्यूमन माइंड स्किलिंग पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आज का मैनेजर केवल प्रक्रियाओं या टूल्स तक सीमित नहीं रह सकता; उसे मानव मन, भावनाओं, प्रेरणा और व्यवहार को समझना अनिवार्य है। अब समय आ गया है कि मैनेजमेंट शिक्षा में मनोविज्ञान को एक आवश्यक व्यावसायिक कौशल के रूप में पढ़ाया जाए, न कि केवल मानविकी के हिस्से के रूप में।
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क्या भविष्य का मैनेजर डेटा और एआई पर निर्भर होगा, या मानव विवेक की भूमिका हमेशा निर्णायक रहेगी?
- मेरे दृष्टिकोण से भविष्य का मैनेजर डेटा और एआई पर अत्यधिक निर्भर होता जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। किंतु इस बढ़ती निर्भरता के साथ एक गंभीर चुनौती भी सामने आ रही है—विवेक का क्षरण। एआई और डेटा सूचना तो देते हैं, पर विवेक, अनुभव से उपजा निर्णय और संदर्भ की गहराई को पूरी तरह नहीं समझ पाते। आज मानव प्रबंधक निर्णय लेने में एआई पर बढ़ती निर्भरता के कारण अपनी स्वविवेक क्षमता को धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। सूचना-अधिभार इस समस्या को और गहरा करता है। भविष्य में एआई और डेटा का प्रभाव और बढ़ेगा, जबकि मानवीय प्राकृतिक बुद्धिमत्ता के कमजोर पड़ने की आशंका है। अब यह चुनौती वैज्ञानिकों और डेटा विशेषज्ञों के सामने है कि वे ऐसे उपकरण विकसित करें जो अनुभव-आधारित विवेक और निर्णय क्षमता को समझ सकें या कम से कम उसका अनुकरण कर सकें। तब तक मानव विवेक की भूमिका निर्णायक बनी रहनी चाहिए, अन्यथा प्रबंधन केवल गणना बनकर रह जाएगा।
उच्च शिक्षा की पुरानी विसंगतियों को खत्म करेगा शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025: प्रो. अनिल सहस्त्रबुद्धे
वर्ष 2026 अपने साथ भारतीय शिक्षा जगत में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। लंबे समय से लागू पुरानी शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर नई शिक्षा नीति 2020 को पूरे देश में एकसमान ढंग से लागू करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने पिछले दिनों विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 संसद में पेश किया है। यह विधेयक शिक्षा ढांचे को सरल, पारदर्शी और आधुनिक बनाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस बदलाव की जरूरत को लेकर केंद्र को समय-समय पर अवगत कराने वालों में नेशनल एजुकेशन टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) के चेयरमैन और NAAC कार्यसमिति के अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल डी. सहस्त्रबुद्धे भी शामिल रहे हैं।
प्रो. सहस्त्रबुद्धे का शिक्षा जगत में लंबा अनुभव रहा है। कर्नाटक में जन्मे और पले-बढ़े प्रो. सहस्त्रबुद्धे ने 1980 में कर्नाटक विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक किया। IISc बेंगलुरु से स्नातकोत्तर, पीएचडी और नौकरी करने के बाद वे कुछ समय निजी क्षेत्र में भी रहे, लेकिन जल्द ही लौटकर शिक्षा जगत से जुड़ गए। अरुणाचल प्रदेश के NERIST से लेकर IIT गुवाहाटी तक और उसके बाद पुणे इंजीनियरिंग कॉलेज के निदेशक और AICTE अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देश की तकनीकी शिक्षा में अनेक काम किए। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न 1: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 की जरूरत क्यों महसूस हुई?
- इस विधेयक की जरूरत इसलिए सामने आई क्योंकि भारत अब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है, और इस यात्रा में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण आधार है। लंबे समय से चली आ रही मैकाले काल की पुरानी शिक्षा प्रणाली बदलते समय की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही थी, इसलिए नई शिक्षा नीति 2020 तो लागू कर दी गई, लेकिन उसे पूरे देश में एकसमान और व्यावहारिक रूप में लागू करने के लिए एक मजबूत ढांचे की कमी रही। इसी कमी को दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को सुचारू, सरल और भविष्य के अनुरूप बनाने के लिए विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक लाया गया है, जो अनुमति, मान्यता, निरीक्षण और मानक निर्धारण जैसे बुनियादी पहलुओं में फैली जटिलताओं को खत्म कर शिक्षा जगत को आसानी और पारदर्शिता की नई दिशा देता है।
प्रश्न 2: आप इस विधेयक की व्याख्या कैसे करेंगे?
- इस विधेयक को समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि जैसे व्यापार को आसान बनाने के लिए ‘Ease of Doing Business’ की अवधारणा आई, ठीक उसी की तरह यह शिक्षा जगत के लिए ‘Ease of Doing Education’ का ढांचा तैयार करता है। पुराने ढांचे में अलग-अलग परिषदों के पास जाकर अनुमति और मान्यता लेना बेहद जटिल प्रक्रिया थी, जबकि नया विधेयक इन सभी प्रक्रियाओं को एक ही छतरी के नीचे लाकर शिक्षा देने और पाने दोनों की राह को सरल करता है और एकरूपता सुनिश्चित करता है।
प्रश्न 3: यह शिक्षा प्रणाली को कैसे आसान बनाएगा?
- पुरानी व्यवस्था में किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय को अलग-अलग पाठ्यक्रमों के लिए UGC, AICTE, NCTE और COA जैसे कई संस्थानों से अलग-अलग अनुमति लेनी पड़ती थी, जिनके नियम-कानून और मानक एक-दूसरे से भिन्न थे। नया विधेयक इन तीनों प्रमुख परिषदों को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) के अधीन समाहित कर देता है, जिससे सभी तरह के पाठ्यक्रमों की मान्यता, निरीक्षण और अनुमति एक ही संस्था द्वारा की जा सकेगी। इससे पूरी प्रक्रिया सरल होगी, समय और संसाधन बचेंगे और संस्थानों पर अनावश्यक बोझ कम होगा।
प्रश्न 4: UGC, AICTE और NCTE को एक करने से शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी?
- गुणवत्ता सुधार के लिए इस विधेयक में तीन नई परिषदों—विनियम परिषद, मान्यता परिषद और मानक परिषद—का गठन प्रस्तावित है, जिनके अलग-अलग कार्य होंगे। विनियम परिषद नियम और अनुपालन देखेगी, मान्यता परिषद गुणवत्ता जांच करेगी और मानक परिषद सभी विषयों के मानक एकसमान रूप से तय करेगी। यह ढांचा पूरे देश की उच्च शिक्षा में एकरूपता लाएगा और पुरानी विसंगतियों को खत्म करेगा। अलग-अलग संस्थाओं के अलग नियम होने की वजह से जो उलझनें पैदा होती थीं, अब वे दूर हो जाएंगी और गुणवत्ता में स्थिरता आएगी।
प्रश्न 5: मेडिकल और कानून की शिक्षा को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया?
- फिलहाल मेडिकल और कानून की शिक्षा को इस नए ढांचे में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि दोनों क्षेत्रों के अपने विशेष एवं जटिल मानक हैं। हालांकि भविष्य में आवश्यकता और सहमति के अनुसार इन पर भी विचार किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल उनके अपने नियामक ढांचे ही जारी रहेंगे।
प्रश्न 6: राज्य सरकारों और शिक्षण संस्थानों की इसमें क्या भूमिका होगी?
- नए विधेयक में पहली बार राज्य सरकारों और बड़े शिक्षण संस्थानों को परिषदों का हिस्सा बनाया गया है, जिससे राज्यों की भूमिका औपचारिक और जिम्मेदार बनती है। पहले राज्य सरकारें अपने क्षेत्र के कॉलेजों में होने वाली गड़बड़ियों पर सीधे तौर पर जवाबदेह नहीं थीं, लेकिन अब उन्हें शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और संचालन में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, जिससे स्थानीय स्तर पर सुधार तेजी से हो सकेंगे।
प्रश्न 7: NAAC दौरे बंद होने के बाद संस्थानों की निगरानी कैसे होगी?
- NAAC दौरे अब पूरी तरह समाप्त किए जा रहे हैं और उनकी जगह भरोसा आधारित निगरानी प्रणाली लाई जा रही है, जिसमें हर संस्थान को अपनी वास्तविक सुविधाओं, लैब, शिक्षक संख्या, छात्रों की संख्या, उपकरण, लाइब्रेरी और कक्षाओं की जानकारी स्वयं पोर्टल पर अपलोड करनी होगी। यह जानकारी सभी के लिए खुली होगी—विद्यार्थी, अभिभावक, कंपनियां या नियामक सभी इसे देख सकेंगे। गलत जानकारी देने पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द होने जैसी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान इस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाता है।
प्रश्न 8: इस विधेयक से शिक्षा व्यवस्था में क्या बड़े बदलाव आएंगे?
- यह विधेयक अंग्रेजी काल की मैकाले प्रणाली को बदलते हुए बच्चों को एकसमान और कठोर ढांचे में बांधने वाली पुरानी सोच से मुक्ति देता है। शिक्षकों के प्रमोशन में शोधपत्र अनिवार्य नहीं रहेगा और उनकी कार्यशैली और नवाचार को महत्व मिलेगा। जब शिक्षक नई तकनीकों से पढ़ाएंगे और बच्चे विषय को बेहतर समझेंगे, तो मूल्यांकन इसी आधार पर होगा। इसका सीधा असर गांवों और छोटे कस्बों तक पहुंचेगा और ड्रॉपआउट दर में कमी आने की उम्मीद है।
प्रश्न 9: शिक्षा के स्तर में क्या सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं?
- नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद देश में स्टार्टअप्स की संख्या 440 से बढ़कर 1.75 लाख पार कर गई है, और भारत सिर्फ सॉफ्टवेयर कौशल ही नहीं बल्कि हार्डवेयर, चिप निर्माण, AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और डीप टेक क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है। एक सुव्यवस्थित और पारदर्शी शिक्षा ढांचा इन क्षेत्रों में और भी तेज़ प्रगति का आधार बनेगा।
प्रश्न 10: क्या इस विधेयक से शिक्षा प्रणाली पूरी तरह समस्यामुक्त हो जाएगी?
- पूरी तरह समस्यामुक्त होना संभव नहीं है, क्योंकि किसी भी व्यवस्था में 10–15 प्रतिशत चुनौतियाँ बनी रहती हैं। यह विधेयक भी सभी गड़बड़ियों को एक झटके में समाप्त नहीं कर सकता। लेकिन यह बदलाव एक सतत प्रक्रिया है, और जैसे-जैसे प्रणाली लागू होगी, समस्याएं सामने आते ही उन पर सुधार का काम भी चलता रहेगा।
प्रश्न 11: इसके प्रभाव दिखने में कितना समय लगेगा?
- शिक्षा सुधार त्वरित परिणाम नहीं देते, इसलिए इसके असर जमीन पर दिखने में लगभग पांच से दस साल का समय लग सकता है। लेकिन दिशा सही है और सुधार क्रमिक रूप से दिखाई देंगे।
भारत की आर्थिक कहानी अक्सर दो सिरों से सुनाई जाती है। एक तरफ बड़े कॉरपोरेट, यूनिकॉर्न स्टार्टअप, चमकती हुई फाइनेंस और टेक्नोलॉजी की इमारतें। दूसरी तरफ नैनो और माइक्रो व्यवसायों की एक विशाल, बेचैन दुनिया—चाय बेचने वाले, घर से पापड़ बनाने वाली महिलाएं, हथकरघा बुनकर, सड़क मरम्मत करने वाले कारीगर, कचरा बीनने वाले, छोटे किसान, गांव के प्रोसेसर, होम बेकर्स और अनौपचारिक ट्यूशन पढ़ाने वाले। यह कोई हाशिए की अर्थव्यवस्था नहीं है। यही असली भारत है—अव्यवस्थित, मानवीय, अनौपचारिक, जुझारू और लंबे समय तक कम आंकी गई।
दशकों तक जमीनी स्तर के इन व्यवसायों को सिर्फ़ गुज़र-बसर का साधन माना गया, विकास का इंजन नहीं। नीतियों ने इन्हें कल्याण का विषय समझा, महत्वाकांक्षी व्यवसाय नहीं। बैंकों ने जोखिम माना, बाज़ार ने अविश्वसनीय। लेकिन चुपचाप, गांवों, बस्तियों और छोटे शहरों में एक बदलाव शुरू हो चुका है। नैनो उद्यमियों की नई पीढ़ी अब सिर्फ़ ज़िंदा रहने से संतुष्ट नहीं है। वे सम्मान, स्थिरता, विस्तार और भविष्य चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनका काम उनके बाद भी ज़िंदा रहे।
इस बदलाव के लिए सोच का नया ढांचा चाहिए। न अकादमिक सिद्धांत, न एमबीए की भारी भाषा। बल्कि ज़मीन से जुड़ा, व्यावहारिक नजरिया—जो गली, खेत, वर्कशॉप और रसोई की भाषा समझे। यहीं नैनो और माइक्रो व्यवसायों के “12 पी” का विचार असरदार बनता है। यह सिर्फ़ मार्केटिंग नहीं, बल्कि जमीनी उद्यम के पूरे जीवनचक्र को नए सिरे से देखने की कोशिश है—शुरुआत की चिंगारी से लेकर लंबे समय की स्थिरता और आगे निकलने तक।
यह कहानी बताती है कि कैसे 12 पी भारत की जमीनी अर्थव्यवस्था को बोझ नहीं, बल्कि छिपी हुई ताक़त के रूप में देखने में मदद कर सकते हैं।
पहला बदलाव: रोज़ी से भविष्य तक (Plan – योजना)
हर नैनो व्यवसाय की शुरुआत एक योजना से होती है, भले वह कही न गई हो। परंपरागत रूप से यह योजना बेहद छोटी होती है—आज कमाओ, आज खाओ। किराना दुकानदार अगले साल के विस्तार के बजाय कल के कैश फ्लो की चिंता करता है। घर पर अचार बनाने वाली महिला अगले ऑर्डर पर ध्यान देती है, ब्रांड पर नहीं।
सबसे बड़ा और ज़रूरी बदलाव मानसिक है। योजना अब सिर्फ़ ज़िंदा रहने की नहीं, भविष्य बनाने की होनी चाहिए। इसका मतलब लंबी स्प्रेडशीट नहीं, बल्कि साफ़ सोच है—मैं यह काम क्यों कर रहा हूं? मैं किस समस्या को हल कर रहा हूं? क्या इसकी ज़रूरत पांच साल बाद भी होगी?
जब सब्ज़ी बेचने वाली समझती है कि उसकी असली पूंजी सब्ज़ी नहीं, बल्कि भरोसा है, या गांव का बढ़ई यह जानता है कि उसकी ताक़त सिर्फ़ मेहनत नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा डिज़ाइन ज्ञान है—तब व्यवसाय का आकार बदलने लगता है। नैनो स्तर पर योजना चरणों में होनी चाहिए—पहले आय स्थिर हो, फिर एक मज़बूत उत्पाद या सेवा बने, उसके बाद विस्तार की सोच आए।
दिखावे नहीं, असली समस्याओं का समाधान (Product – उत्पाद)
ग्रामीण भारत को चालाक आइडिया नहीं, उपयोगी समाधान चाहिए। सबसे सफल नैनो व्यवसाय ट्रेंड से नहीं, रोज़मर्रा की मुश्किलों से पैदा होते हैं। गांव की महिला द्वारा बनाए गए सस्ते, सुरक्षित सैनिटरी पैड सिर्फ़ उत्पाद नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सम्मान और पर्यावरण की समस्या का समाधान हैं। कम लागत का भंडारण बनाने वाला किसान तकनीक नहीं, मजबूरी से लड़ रहा है।
नैनो स्तर पर उत्पाद सिर्फ़ वस्तु नहीं होता, वह भरोसा, स्मृति और कहानी भी होता है। हल्दी की जड़ बेचने से किसान गरीब रहता है, लेकिन उसी हल्दी को साफ़-प्रोसेस कर ब्रांडेड पाउडर बनाना मूल्य पैदा करता है। कच्चे माल से उत्पाद तक का सफर नैनो अर्थव्यवस्था का सबसे ताक़तवर बदलाव है।
भूगोल अब बंधन नहीं (Place – स्थान)
पहले गांव में होने का मतलब था सीमित बाज़ार। आज डिजिटल पुल उस दीवार को तोड़ रहे हैं। स्थानीय हाट और मोहल्ला भरोसे की नींव हैं, लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म विस्तार का रास्ता। महाराष्ट्र का तेल निर्माता दिल्ली में बेच सकता है, पूर्वोत्तर का बांस कारीगर बेंगलुरु तक पहुंच सकता है। गांव अब मंज़िल नहीं, शुरुआत है।
डर नहीं, आत्मसम्मान के साथ कीमत (Price – मूल्य)
नैनो उद्यमियों की सबसे बड़ी कमजोरी है कम कीमत लगाना। डर के कारण—ग्राहक खोने का डर, महंगा दिखने का डर। लेकिन कीमत सिर्फ़ संख्या नहीं, संकेत है। यह बताती है कि आप खुद को कितना महत्व देते हैं। ईमानदार लागत, रचनात्मक पैक साइज और समय के साथ बढ़ती कीमत—यही परिपक्वता है।
भीड़ में अपनी पहचान (Positioning – पहचान)
नैनो व्यवसाय बड़े ब्रांड की नकल से नहीं जीतते। वे अपनी स्थानीय पहचान, स्वाद और कहानी से जीतते हैं। जब उत्पाद जानता है कि वह किसके लिए है, तो उसे चिल्लाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
ग्राहक तक पहुंच, नियंत्रण के साथ (Placement – वितरण)
बीचौलियों के दबदबे से अब नए मॉडल संतुलन बना रहे हैं—सीधा विक्रय, डिजिटल नेटवर्क, उत्पादक समूह। एक से ज़्यादा रास्ते मजबूती देते हैं।
पैकेजिंग जो कहानी कहे (Packaging – पैकेजिंग)
साफ़, सुरक्षित और ईमानदार पैकेजिंग उत्पाद से पहले संदेश देती है। आज पैकेजिंग मूल्य और नैतिकता का संकेत भी है।
इंसान केंद्र में (People – लोग)
हर नैनो व्यवसाय परिवार और समुदाय पर टिका है। यहां रणनीति से ज़्यादा रिश्ते मायने रखते हैं। जब कर्मचारी हिस्सेदार बनते हैं, तब असली बदलाव आता है।
टिकाऊपन ज़रूरत है, शौक नहीं (Planet – पर्यावरण)
कम संसाधनों में काम करने वाले नैनो व्यवसाय पहले से ही टिकाऊ होते हैं। आज यही समझ प्रतिस्पर्धी ताक़त बन रही है।
कैसे काम करते हैं, यह भी उतना ही ज़रूरी (Process – प्रक्रिया)
स्पष्ट प्रक्रियाएं, सही मेहनताना और पारदर्शिता—ये व्यवसाय को अस्थायी से स्थायी बनाती हैं।
भौतिक ढांचा जो मूल्य बचाए (Physicality – अवसंरचना)
छोटा-सा कोल्ड बॉक्स या स्टोरेज भी आय को कई गुना सुरक्षित कर सकता है। सही समय पर सही निवेश संघर्ष को स्थिरता में बदल देता है।
डिजिटल गली में कहानी सुनाना (Promotion – प्रचार)
आज प्रचार बातचीत जैसा है—वीडियो, चैट, रील्स। जब निर्माता खुद बोलता है, भरोसा तेज़ी से बनता है।
रोज़गार से विरासत तक (Progress – प्रगति)
अंततः प्रगति सिर्फ़ आय नहीं, आत्मविश्वास है। जब व्यवसाय बिकने, सौंपे जाने या साझेदारी के काबिल बनता है, तब वह संपत्ति बन जाता है।
भारत के सबसे छोटे व्यवसायों के लिए नई कल्पना
12 पी कोई फॉर्मूला नहीं, बल्कि देखने का नज़रिया हैं। सही सोच के साथ भारत के लाखों नैनो व्यवसाय सम्मान, मजबूती और समावेशी विकास के इंजन बन सकते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ़ बोर्डरूम में नहीं, बल्कि रसोई, गली, खेत और वर्कशॉप में गढ़ी जा रही है—छोटे आकार के, लेकिन असीम संभावनाओं वाले उद्यमियों द्वारा।
केंद्र सरकार ने बजट 2026 में शिक्षा को लेकर जो संकेत दिए हैं, वे यह साफ करते हैं कि अब इस क्षेत्र को हाशिये पर रखने का दौर खत्म हो रहा है। शिक्षा बजट को 1.28 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.39 लाख करोड़ रुपये करना केवल आंकड़ों की बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक है, जिसमें देश की मजबूती की नींव शिक्षा को माना जा रहा है। करीब 11 हजार करोड़ रुपये की सीधी बढ़ोतरी यह बताती है कि सरकार मानती है—अगर भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना है, तो इसकी शुरुआत क्लासरूम से ही होगी।
इस बजट का एक सकारात्मक पहलू यह है कि सरकार की सोच अब केवल किताबी पढ़ाई तक सीमित नहीं रही। स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, डिजिटल क्लासरूम, स्किल डेवलपमेंट, रिसर्च और नई शिक्षा नीति तक, हर स्तर पर सुधार की बात की जा रही है। खास तौर पर स्किल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और जॉब-रेडी छात्रों पर दिया गया जोर इस बात का संकेत है कि शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की कोशिश हो रही है। यह बदलाव समय की मांग भी है, क्योंकि आज की अर्थव्यवस्था डिग्री से ज्यादा कौशल को महत्व देती है।
हालांकि, जब भारत के शिक्षा बजट की तुलना वैश्विक स्तर पर की जाती है, तो तस्वीर थोड़ी जटिल नजर आती है। अमेरिका का शिक्षा बजट करीब 82.4 बिलियन डॉलर, यानी लगभग 7.5 लाख करोड़ रुपये है। यह भारत के मौजूदा बजट से कई गुना अधिक है। अमेरिका शिक्षा, रिसर्च, शिक्षक प्रशिक्षण और एडवांस टेक्नोलॉजी पर खुलकर निवेश करता है, जिसका नतीजा यह है कि वहां की यूनिवर्सिटीज—MIT, हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड—दुनिया में अग्रणी बनी हुई हैं। साफ है कि बड़े निवेश का सीधा असर गुणवत्ता पर पड़ता है।
चीन का उदाहरण भी दिलचस्प है। वहां का शिक्षा बजट भारत के आसपास ही बताया जाता है, लेकिन फर्क प्राथमिकताओं का है। चीन स्किल और वोकेशनल एजुकेशन पर ज्यादा ध्यान देता है और योजनाबद्ध तरीके से बजट का इस्तेमाल करता है। यही वजह है कि मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी कौशल में चीन आज वैश्विक ताकत बना हुआ है। रूस का शिक्षा बजट भारत से अधिक है और वहां प्रति छात्र खर्च भी ज्यादा है, क्योंकि आबादी कम है। इसका असर यह है कि रूस विज्ञान और तकनीक जैसे क्षेत्रों में आज भी मजबूत स्थिति में है।
दक्षिण एशिया की बात करें तो भारत और पाकिस्तान के बीच का अंतर साफ दिखता है। जहां भारत शिक्षा पर लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, वहीं पाकिस्तान का शिक्षा बजट महज कुछ हजार करोड़ रुपये तक सीमित है। यह तुलना दिखाती है कि भारत इस क्षेत्र में अपने पड़ोसियों से काफी आगे है, लेकिन केवल आगे होना ही पर्याप्त नहीं है।
असल सवाल यह है कि बढ़े हुए बजट का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा। अगर यह पैसा केवल इमारतों, घोषणाओं और कागजी योजनाओं तक सीमित रह गया, तो इसका असर जमीन पर कम दिखेगा। जरूरत इस बात की है कि स्कूलों की गुणवत्ता सुधरे, शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण मिले, रिसर्च को वास्तविक समर्थन मिले और छात्रों को ऐसे कौशल मिलें, जो उन्हें रोजगार के काबिल बना सकें।
बजट 2026 ने शिक्षा के लिए एक सकारात्मक संदेश जरूर दिया है। अब चुनौती यह है कि इस बढ़े हुए खर्च को सही दिशा और प्रभावी क्रियान्वयन के साथ जोड़ा जाए। तभी शिक्षा सच में देश को मजबूत बनाने का आधार बन पाएगी, न कि सिर्फ बजट भाषणों का आकर्षक हिस्सा।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ एक महत्वपूर्ण सामाजिक-शैक्षणिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आया है। 15 जनवरी 2026 से लागू हुए इस कानून ने उच्च शिक्षा में मौजूद जातिगत भेदभाव को चुनौती देते हुए एक व्यापक दायरा तय किया है। अब पहली बार अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी “जातिगत भेदभाव” की परिभाषा में शामिल किया गया है। यानी, उच्च शिक्षा में भेदभाव का दंश झेलने वाले ओबीसी समुदाय के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को भी शिकायत दर्ज कराने और न्याय पाने का औपचारिक अधिकार मिला है।
कानून का मूल उद्देश्य स्पष्ट है—विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को एक ऐसा स्थान बनाना, जहां समानता केवल आदर्श न रहे, बल्कि व्यवहार में भी दिखे। हर शिक्षण संस्थान में समान अवसर प्रकोष्ठ और विश्वविद्यालय स्तर पर समानता समिति गठित करने का प्रावधान इसी दिशा में उठाया गया कदम है। यूजीसी के आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि ऐसे नियम की ज़रूरत क्यों महसूस हुई—पिछले पांच सालों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118% की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज की चेतना को झकझोरने वाली है।
लेकिन दूसरी ओर, इसका विरोध भी उतनी ही तेज़ी से उभर रहा है, विशेषकर अगड़ी जातियों से जुड़े समूहों से। करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने इसे “दुरुपयोग की आशंका” के आधार पर खारिज किया है। उनका तर्क है कि नए कानून के बाद “झूठे आरोपों” की बाढ़ आ सकती है। गाजियाबाद के डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि का अनशन करने निकलना और फिर नजरबंद किया जाना इस विरोध की गंभीरता को रेखांकित करता है। यूपी चुनाव 2027 के ठीक पहले यह मुद्दा राजनीतिक रंग भी लेने लगा है।
यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि विरोध कौन कर रहा है, बल्कि यह है कि विरोध किस आधार पर किया जा रहा है। क्या किसी कानून का उद्देश्य “दुरुपयोग की आशंका” के डर से रुक जाना चाहिए? यह तर्क कितना मजबूत है? यदि इसी दलील को स्वीकार कर लिया जाए, तो देश के अधिकांश कानून लागू ही नहीं हो पाएंगे। दुरुपयोग की संभावना हर कानून में रहती है, परंतु समाधान कानून को रोकना नहीं, बल्कि उसे अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।
सच्चाई यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में सवर्ण वर्चस्व का प्रश्न नया नहीं है। आरक्षण व्यवस्था लागू होने के दशकों बाद भी विश्वविद्यालयों में वंचित वर्गों की भागीदारी 15% से अधिक नहीं पहुंच सकी है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम लागू होने के बावजूद दलित उत्पीड़न की घटनाएं थमी नहीं हैं। ऐसे में, जब आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा संस्थान—जो समाज का बौद्धिक केंद्र माने जाते हैं—वहां भेदभाव बढ़ रहा है, तो क्या मौन रहना विकल्प हो सकता है?
नया यूजीसी रेगुलेशन न तो किसी वर्ग के खिलाफ है और न ही किसी को विशेषाधिकार देकर दूसरों पर बोझ डालने जैसा। यह उन अदृश्य दीवारों को तोड़ने का प्रयास है जो पीढ़ियों से उच्च शिक्षा को समावेशी होने से रोकती रही हैं। समानता का अर्थ किसी वर्ग को गिराना नहीं, बल्कि सभी को बराबर अवसर देना है।
बेशक, यह कानून राजनीतिक बहस को जन्म देगा, और आने वाले महीनों में यह माहौल और गर्म होगा। लेकिन इन बहसों के बीच यह भूलना खतरनाक होगा कि शिक्षा केवल डिग्री का माध्यम नहीं—यह सामाजिक न्याय का सबसे मजबूत आधार है। यदि विश्वविद्यालयों में ही भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा कमजोर हो, तो समाज में समानता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
अंततः, इस कानून की सफलता विरोध या समर्थन से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की ईमानदारी से तय होगी। यह लोकतांत्रिक समाज की परीक्षा है कि वह समानता के रास्ते पर आगे बढ़ने की हिम्मत करता है या नहीं।
भारत की उच्च शिक्षा लंबे समय से एक शांत विरोधाभास झेलती आई है। हम एक ओर बड़े पैमाने पर शिक्षा उपलब्ध कराने का वादा करते रहे और दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा का लक्ष्य भी रखा, लेकिन विश्वविद्यालयों का ढांचा उसी पुराने टाइम-टेबल और क्लासरूम मॉडल पर चलता रहा, जो सीमित और एकरूप छात्र आबादी के लिए बनाया गया था। UGC (अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट डिग्री देने के लिए न्यूनतम मानक) विनियम 2025 इस पुराने मॉडल को बिना शोर किए अपडेट करते हैं। यह बदलाव शिक्षा को कठोर, एकरूपी रास्ते से निकालकर लचीले, स्टैक करने योग्य और क्रेडिट-आधारित सीखने की दिशा में ले जाता है।
नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क, ब्लेंडेड लर्निंग और मल्टी-असेसमेंट की उभरती व्यवस्था के साथ यह सुधार किसी भी तरह से छोटा कदम नहीं है। यह एक नई सोच है—जहाँ शिक्षा एक पोर्टफोलियो बन जाती है, न कि सिंगल लाइनर डिग्री। आज का युवा सिर्फ “डिग्री” नहीं चाहता; वह नौकरी का रास्ता, करियर बदलने का मौका, उद्यमिता का विकल्प, दूसरी स्किल स्टैक और सबसे महत्वपूर्ण—जीवन की गति के साथ चलने वाली सीख चाहता है।
नीचे वे पाँच बड़े बदलाव दिए जा रहे हैं, जिन्हें UGC 2025 बड़े पैमाने पर संभव बनाता है—साल में दो बार प्रवेश, विषय चुनने की आज़ादी, ड्यूल डिग्री का विकल्प, 50% तक स्किल/वोकेशनल/अप्रेंटिसशिप क्रेडिट, और लिखित परीक्षा से आगे बढ़कर निरंतर व वास्तविक मूल्यांकन। ये पाँच अलग-अलग सुधार नहीं हैं; ये एक बड़े परिवर्तन का हिस्सा हैं—जहाँ विश्वविद्यालय एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनता है जिसमें सीख, काम और क्षमता निर्माण एक साथ आगे बढ़ते हैं।
दूसरी बार प्रवेश लेने की सुविधा: “लॉस्ट ईयर” की समस्या खत्म
साल में दो बार—जुलाई/अगस्त और जनवरी/फरवरी—प्रवेश शुरू होना केवल कैलेंडर का बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा समानता सुधार है। भारत में बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की होती है जो सक्षम होते हुए भी बीमारी, घरेलू जिम्मेदारी, आर्थिक समस्या, देरी से आए परिणाम या किसी संकट के कारण एक बार प्रवेश चूक जाते हैं। पहले एक बार प्रवेश चूकना मतलब पूरा वर्ष गंवाना होता था, और यह “लॉस्ट ईयर” अक्सर “लॉस्ट लर्नर” में बदल जाता था।
अब साल में दो बार प्रवेश की सुविधा इन बच्चों को दूसरा मौका देती है। इससे छात्रों की मानसिकता भी बदलती है—वे असफलता नहीं, बल्कि अगली विंडो का अवसर देखते हैं। गुजरात विश्वविद्यालय जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि संस्थान इस व्यवस्था के अनुरूप अपने सिस्टम को ढालने लगे हैं।
इसका गहरा लाभ यह भी है कि काम और पढ़ाई का मिलाजुला मॉडल सामान्य हो जाता है। छात्र छह महीने का स्किल टर्म, अप्रेंटिसशिप या इंटर्नशिप पूरा करके बिना कोई वर्ष गंवाए जनवरी में डिग्री में प्रवेश ले सकता है। यह लचीलापन उन छात्रों को बड़ी राहत देता है जो पढ़ाई के साथ आय भी बनाए रखना चाहते हैं।
विषय अब भविष्य तय नहीं करता: डिसिप्लिन चुनने की स्वतंत्रता और ब्रिज-कोर्स की व्यवस्था
UGC 2025 एक साहसिक कदम उठाता है—कक्षा 12 में लिए गए विषय अब आपके भविष्य को सीमित नहीं करेंगे। यदि छात्र संबंधित प्रवेश परीक्षा पास करता है, तो वह किसी भी डिसिप्लिन में प्रवेश पा सकता है। जरूरत पड़ने पर संस्थान ब्रिज कोर्स देकर आधार मजबूत करेंगे। यही सुविधा पीजी स्तर पर भी मिलती है।
यह बदलाव छात्र हितैषी तो है ही, साथ ही रोजगार बाज़ार की मांगों के अनुरूप भी है। आज करियर विषयों के दायरे में सीमित नहीं हैं; वे स्किल क्लस्टर्स में बदल रहे हैं—डेटा + डोमेन, डिजाइन + बिजनेस, लॉ + टेक्नोलॉजी, सस्टेनेबिलिटी + फाइनेंस आदि।
अक्सर छात्र अपनी सच्ची रुचि बाद में पहचानते हैं—काम के अनुभव से या सही मार्गदर्शन मिलने के बाद। यह सुधार उन्हें बिना सामाजिक दबाव के रास्ता बदलने की आज़ादी देता है।
संस्थानों के लिए संकेत साफ है—फ्लेक्सिबल मेजर-माइनर मॉडल और कॉमन कोर बनाएं। डिजाइन थिंकिंग, फाइनेंशियल लिटरेसी और AI एथिक्स जैसे विषय अब “वैकल्पिक” नहीं बल्कि आवश्यक हो गए हैं।
ड्यूल डिग्री: पोर्टफोलियो लर्नर को वैध मान्यता
UGC 2025 दो UG और दो PG प्रोग्राम साथ में करने की अनुमति देता है। इससे पहले भी ODL/ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रोग्राम को साथ करने की छूट थी। यह मॉडल उन छात्रों के लिए बेहद उपयोगी है जो एक साथ गहराई और व्यापकता चाहते हैं।
उदाहरण के तौर पर, कोलकाता या रायपुर का कोई छात्र पारंपरिक डिग्री के साथ ऑनलाइन डेटा एनालिसिस, डिजिटल मार्केटिंग या प्रोडक्ट डिजाइन सीख सकता है। तीन साल में उसका पोर्टफोलियो एक मजबूत प्रोफ़ाइल बन जाता है—डोमेन नॉलेज + स्किल स्टैक + प्रोजेक्ट्स।
अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन डिग्री का विकल्प भी अवसर बढ़ाता है, लेकिन इसमें पहचान और मान्यता का ध्यान रखना ज़रूरी है। संस्थानों को छात्रों को सही सलाह और जानकारी देनी होगी ताकि वे विश्वसनीय और मान्यता प्राप्त प्रोग्राम चुनें।
जब 50% क्रेडिट स्किल से आ सकते हैं: डिग्री का फोकस ‘काम’ पर
UGC 2025 में सबसे क्रांतिकारी प्रावधानों में एक यह है कि छात्र अपनी डिग्री के कुल क्रेडिट में से 50% तक स्किल, वोकेशनल कोर्स, अप्रेंटिसशिप या मल्टीडिसिप्लिनरी विषयों से ले सकता है। यह वो व्यवस्था है जो डिग्री को सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि “क्षमता” का प्रमाण बनाती है।
नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क इस मॉडल को और मजबूत करता है—जहाँ अकादमिक, वोकेशनल, स्किल और अनुभव आधारित सीख सब एक ही ढांचे में क्रेडिट के रूप में सुरक्षित रहती है।
यह बदलाव उन छात्रों को भी विश्वविद्यालय की ओर आकर्षित करेगा जो अब तक रोजगार मूल्य न दिखने की वजह से संकोच करते थे। एक छात्र जिसने अप्रेंटिसशिप, स्किल माइक्रो-क्रेडेंशियल और वास्तविक समस्या हल करने वाला कैपस्टोन प्रोजेक्ट पूरा किया हो, उसके पास नौकरी के लिए ठोस “एविडेंस” होता है।
यही मॉडल उद्यमिता को भी बढ़ावा देता है। स्किल-बेस्ड माइनर या वोकेशनल सीक्वेंस सीधे छोटे स्टार्टअप, सेवा मॉडल या स्वतंत्र कार्य में बदल सकते हैं।
परीक्षा अब सबकुछ नहीं: निरंतर, वास्तविक और बहु-मूल्यांकन की ओर कदम
UGC 2025 मूल्यांकन को लिखित परीक्षा से आगे ले जाता है—सेमिनार, प्रेजेंटेशन, फील्डवर्क, क्लास प्रदर्शन और अन्य वास्तविक क्षमताओं को भी शामिल किया गया है। निरंतर मूल्यांकन अनिवार्य बनाया गया है।
इसका सबसे बड़ा असर सीखने की संस्कृति पर पड़ेगा। यह मॉडल रटने के बजाय “करने” की क्षमता को प्रमाणित करता है। लिखित परीक्षा को मात देना आसान होता है, लेकिन लाइव प्रोजेक्ट, लैब डेमो, पोर्टफोलियो या समस्या समाधान की वास्तविक प्रक्रिया को नक़ल नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही यह मॉडल छात्रों का दबाव भी कम करता है और अधिक समावेशी बनाता है। नियोक्ता भी अब मार्कशीट नहीं, बल्कि कौशल के प्रमाण देखते हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय का UGCF उद्यमिता मॉडल इसका अच्छा उदाहरण है—जहाँ आइडिया वैलिडेशन, मार्केट रिसर्च और प्रोटोटाइप/एमवीपी के माध्यम से उद्यमिता को पढ़ाया और आंका जाता है।
ई-portfolio आगे चलकर छात्रों का सबसे मजबूत रोजगार दस्तावेज़ बन सकता है—जहाँ प्रोजेक्ट्स, प्रेजेंटेशन, फील्डवर्क और लिखित नमूने एक ही जगह संजोए जा सकेंगे।
ब्लेंडेड लर्निंग और प्रोजेक्ट कल्चर: समानता की सुरक्षा के साथ
इन सुधारों का विस्तार तभी संभव है जब विश्वविद्यालय अच्छी तरह डिज़ाइन की गई ब्लेंडेड लर्निंग अपनाएँ—जहाँ ऑफलाइन और ऑनलाइन सीख सहज रूप से मिलती है। लेकिन इसके लिए डिजिटल डिवाइड की वास्तविकता को ध्यान में रखना होगा।
कम बैंडविड्थ और मोबाइल-फर्स्ट सामग्री, लचीला एक्सेस और असिंक्रोनस मॉडल—यही वे उपाय हैं जो ब्लेंडेड लर्निंग को समावेशी बना सकते हैं। इससे कैंपस समय स्टूडियो, प्रोजेक्ट, फील्डवर्क और इंटर्नशिप के लिए मुक्त होता है।
नई कैंपस इकॉनमी: जहाँ प्लेसमेंट और उद्यमिता एक पहिए पर चलते हैं
UGC 2025 दिशा देता है, लेकिन संस्थानों को इसके लिए मजबूत व्यवस्था बनानी होगी। सबसे महत्वपूर्ण है प्लेसमेंट को सीज़नल गतिविधि मानने की बजाय उसे सालभर चलने वाली अकादमिक प्रक्रिया बनाना।
उद्योग के साथ साझेदारी सिर्फ MoU और व्याख्यानों तक सीमित न रहे; इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट, को-डेवलप्ड मॉड्यूल और भर्ती संरेखण वास्तविक लिंक बनाते हैं। इससे प्लेसमेंट अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे मॉडल का स्वाभाविक परिणाम बनती है।
भारत के अग्रणी संस्थानों में यह देखा गया है कि सही मेंटरशिप, नेटवर्क और समस्या समाधान के वातावरण में उद्यमिता खुद-ब-खुद बढ़ती है। UGC 2025 इन मॉडलों को मुख्यधारा की डिग्री में शामिल करने का अवसर देता है।
एक अधिक मानवीय और उपयोगी विश्वविद्यालय की ओर
UGC 2025 को डिग्री वितरण से क्षमता विकास की ओर बढ़ने के रूप में समझना चाहिए—जहाँ प्रवेश के अनेक रास्ते हैं, गति लचीली है और सीख को सिद्ध करने के कई अवसर हैं। यह छात्रों के जीवन की वास्तविकताओं का सम्मान करता है, रोजगार को प्राथमिकता देता है, और उद्यमिता को औपचारिक शिक्षा का हिस्सा बनाता है।
असल “गेम चेंजर” किसी एक प्रावधान में नहीं है, बल्कि इस सामूहिक प्रभाव में है—एक ऐसा विश्वविद्यालय, जो अधिक छात्रों को मौका देता है, उन्हें हाइब्रिड पहचान बनाने देता है, स्किल को वैध महत्व देता है और सीख को वास्तविक कार्य द्वारा सिद्ध करने का अवसर प्रदान करता है।
यदि इसे अच्छी तरह लागू किया गया, तो भारत न केवल अधिक शिक्षित बल्कि अधिक रोजगारयोग्य, उद्यमशील और भविष्य-तैयार पीढ़ी तैयार कर सकता है।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है—हजारों कॉलेज, सैकड़ों विश्वविद्यालय और हर साल निकलने वाले लाखों छात्र। लेकिन यह विशाल संरचना एक बुनियादी सवाल का सामना कर रही है: इतने बड़े तंत्र के बावजूद भारत की कोई भी यूनिवर्सिटी दुनिया की शीर्ष सूची में क्यों नहीं पहुंच पाती?
यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि दो हजार साल पहले यही भूमि वैश्विक शिक्षा का केंद्र थी। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय न सिर्फ भारत की बल्कि पूरी दुनिया की बौद्धिक धरोहर थे। आज स्थिति बिल्कुल उलट है—विदेशों में पढ़ने जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है, जबकि भारत की यूनिवर्सिटीज वैश्विक रैंकिंग की दौड़ में पीछे छूटती जा रही हैं।
मूल समस्या हमारे विश्वविद्यालयों की गहराई में छिपी है: रिसर्च की कमी, फंडिंग की सीमाएं, अकादमिक स्वतंत्रता का अभाव और वैश्विक दृष्टि की कमी। यह सच है कि भारत रिसर्च पेपर बहुत प्रकाशित करता है, लेकिन उनका असर दुनिया के शीर्ष देशों के मुकाबले कमजोर है। इसका कारण है—कम बजट, कमजोर लैब, सीमित अवसर और फैकल्टी पर पढ़ाने का अत्यधिक दबाव। जब शोध के लिए समय और संसाधन ही न हों, तो गुणवत्ता कैसे बढ़े?
इसके अलावा, भारत का विश्वविद्यालय मॉडल अधूरा है। IIT जैसे संस्थान शानदार इंजीनियर तैयार करते हैं, लेकिन बहुविषयक शिक्षा—मेडिकल, लॉ, सोशल साइंस और पब्लिक पॉलिसी—के अभाव में वे वैश्विक मानकों के अनुरूप नहीं बन पाते। दुनिया के शीर्ष संस्थान विविध विषयों को एक साथ जोड़कर नवाचार का वातावरण तैयार करते हैं, जबकि भारत की प्रणाली अभी भी साइलो मॉडल में बंधी हुई है।
गवर्नेंस और स्वायत्तता एक और बड़ी बाधा है। बहुत से भारतीय विश्वविद्यालय प्रबंधन और नीतिगत दायरे में इतने उलझे रहते हैं कि वे तेजी से फैसले लेने में सक्षम नहीं होते। दूसरी ओर, दुनिया की अग्रणी यूनिवर्सिटीज स्वतंत्रता और लचीलेपन की वजह से वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करती हैं।
यह भी चिंताजनक है कि भारत में विदेशी फैकल्टी की उपस्थिति लगभग नगण्य है। वीजा नियम, सैलरी कैप और प्रशासनिक जटिलताएं वैश्विक टैलेंट को रोक देती हैं। ऐसे में भारतीय कैंपस अंतरराष्ट्रीय रंग से वंचित रह जाते हैं—और यह रैंकिंग में सीधा नुकसान पहुंचाता है।
बावजूद इसके, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। कुछ निजी विश्वविद्यालयों का उभरना—जैसे अशोका, ओपी जिंदल और अमृता—यह संकेत देता है कि बेहतर ढांचा मिले तो भारतीय संस्थान वैश्विक रफ्तार पकड़ सकते हैं। इन्हें मिली स्वायत्तता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की स्वतंत्रता ने इन्हें तेजी से आगे बढ़ने दिया है।
अब सवाल यह नहीं कि भारत पीछे क्यों है, बल्कि यह है कि भारत 2047 तक आगे कैसे बढ़ सकता है? NEP 2020 ने दिशा तो दिखाई है—बहुविषयक शिक्षा, रिसर्च पर जोर और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की ओर कदम बढ़ाए गए हैं। लेकिन केवल नीतियां काफी नहीं होंगी। भारत को शोध में बड़ा निवेश, फैकल्टी विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विश्वविद्यालयों के आधुनिक पुनर्गठन की ओर साहसिक कदम उठाने होंगे।
अगर भारत ने यह चुनौती स्वीकार की, तो 2047 में देश सिर्फ आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि बौद्धिक नेतृत्व की भूमिका भी निभा सकता है। लेकिन अगर लेटलतीफी जारी रही, तो दुनिया आगे निकल जाएगी और भारत वही सवाल दोहराता रहेगा—हमारी यूनिवर्सिटीज शीर्ष पर क्यों नहीं पहुंचतीं?
भारत के पास समय है, युवा प्रतिभा है और मौके भी हैं। अब जरुरत है एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और शोध-प्रधान शैक्षिक दृष्टि की—तभी भारत अपनी खोई वैश्विक शैक्षणिक विरासत को दोबारा हासिल कर सकेगा।
भारत में विश्वविद्यालयों का दायरा जिस तेज गति से फैल रहा है, उस रफ़्तार से स्थायी और अर्थपूर्ण नौकरियों के अवसर नहीं बढ़ पा रहे हैं। हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर निकलते हैं, उम्मीदें भी बड़ी होती हैं, लेकिन रोजगार तक पहुंचने का रास्ता उतना आसान नहीं होता। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023–24 में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में बेरोज़गारी दर 10.2% रही। यह साफ संकेत है कि शिक्षा से रोजगार तक का सफर आज भी देश के बड़े युवा वर्ग के लिए अनिश्चित बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर भारत के युवा रोजगार को लेकर किए गए आकलन भी इसी चुनौती और शिक्षा से रोजगार तक के बेहतर रास्ते की जरूरत को रेखांकित करते हैं। ऐसे समय में विश्वविद्यालयों की भूमिका सिर्फ पढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें छात्रों को नौकरी ढूंढने के साथ-साथ नौकरी लायक भी बनाना होगा।
यहीं उद्यमिता (Entrepreneurship) की भूमिका सामने आती है। इसे अब कुछ चुनिंदा छात्रों का शौक या केवल बिज़नेस स्कूल तक सीमित विषय मानकर नहीं टाला जा सकता। उद्यमिता एक ऐसी व्यावहारिक क्षमता है, जिसे हर छात्र—चाहे वह किसी भी विषय का हो—सीख सकता है। असली लक्ष्य सिर्फ फाउंडर तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे ग्रेजुएट बनाना है जो समस्याओं को पहचानें, उनके समाधान विकसित करें, ग्राहकों के साथ परखें, लागत और कीमत समझें, टीम बनाएं और जो काम करे उसे आगे बढ़ाएं। आज की अर्थव्यवस्था में यही सबसे जरूरी कौशल है।
नीति साफ है, जरूरत है ज़मीन पर अमल की
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और शिक्षा मंत्रालय की नेशनल इनोवेशन एंड स्टार्टअप पॉलिसी (2019) दोनों ही उच्च शिक्षा संस्थानों को नवाचार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने का स्पष्ट संदेश देती हैं। स्टार्टअप इनक्यूबेशन सेंटर, उद्योग से साझेदारी, बौद्धिक संपदा की व्यवस्था और स्टार्टअप सपोर्ट को एक सिस्टम के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया है।
लेकिन सिर्फ नीति बना देने से कैंपस संस्कृति नहीं बदलती। इसके लिए ऐसा ऑपरेटिंग मॉडल चाहिए, जिसमें नेतृत्व प्रयास करने की अनुमति दे, पढ़ाने का तरीका “बनाने” को महत्व दे और इंफ्रास्ट्रक्चर शुरुआती जोखिम को कम करे।
उद्यमिता एक विभाग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए
आज भी कई विश्वविद्यालय उद्यमिता को केवल मैनेजमेंट या बिज़नेस स्टडीज़ तक सीमित मानते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लॉ, मीडिया, डिज़ाइन, कृषि, विज्ञान या मानविकी के छात्र खुद को इससे अलग समझते हैं। जबकि भारत में आने वाले समय की उद्यमिता सिर्फ टेक स्टार्टअप तक सीमित नहीं होगी। टिकाऊ व्यवसाय, कृषि आधारित समाधान, किफायती हेल्थकेयर, शिक्षा नवाचार, क्रिएटिव इंडस्ट्री और स्थानीय सेवाओं में बड़े अवसर हैं।
इसका सीधा समाधान है—हर छात्र के लिए उद्यमिता के रास्ते खोलना। इंटरडिसिप्लिनरी एंटरप्रेन्योरशिप माइनर, क्रेडिट-बेस्ड वेंचर प्रोजेक्ट और समस्या-समाधान स्टूडियो जैसे मॉडल इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं। अंतिम वर्ष का वेंचर प्रोजेक्ट, अगर सही मार्गदर्शन और मूल्यांकन के साथ हो, तो वह पारंपरिक प्रोजेक्ट रिपोर्ट से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है।
कक्षा से बाहर शुरू होती है सही सीख
उद्यमिता किताबों से नहीं सीखी जाती। यह अनिश्चितता, फील्ड एक्सपोजर और लगातार कोशिश से आती है। जब छात्र किसी शहर, जिले या समुदाय की वास्तविक समस्या पर काम करते हैं, तो सीखने का अनुभव बदल जाता है। कचरा प्रबंधन, ट्रांसपोर्ट, हेल्थ या शिक्षा जैसे क्षेत्रों में काम करते हुए वे समझते हैं कि तकनीक से ज्यादा जरूरी भरोसा, व्यवहार और संचालन है।
भारत जैसे देश के लिए “एंगेज्ड यूनिवर्सिटी” की अवधारणा खास मायने रखती है, जहां विश्वविद्यालय स्थानीय समुदाय और संस्थाओं के साथ मिलकर सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान विकसित करें। यह सामाजिक जिम्मेदारी के साथ-साथ भविष्य की उद्यमिता की मजबूत जमीन भी तैयार करता है।
इनक्यूबेटर सिर्फ कमरा नहीं, एक सिस्टम है
कई कैंपस इनक्यूबेशन सेंटर का उद्घाटन तो कर देते हैं, लेकिन बाद में वे खाली पड़े रहते हैं। वजह साफ है—इनक्यूबेशन फर्नीचर नहीं, एक पूरी प्रक्रिया है। इसमें प्री-इनक्यूबेशन, मेंटर नेटवर्क, कानूनी और IP सपोर्ट, प्रोटोटाइप सुविधा, सीड फंड, निवेशकों तक पहुंच और स्पष्ट संस्थागत नीतियां शामिल होती हैं।
IIT मद्रास, IIT बॉम्बे और IIM अहमदाबाद जैसे संस्थानों के उदाहरण बताते हैं कि जब इनक्यूबेशन को सिस्टम की तरह चलाया जाता है, तब ही बड़े नतीजे सामने आते हैं। सीख यह नहीं कि हर विश्वविद्यालय IIT या IIM बने, बल्कि यह कि हर विश्वविद्यालय एक भरोसेमंद उद्यमिता प्लेटफॉर्म बन सकता है।
IIC और AIM: पहले से मौजूद राष्ट्रीय ढांचा
हर संस्थान को सब कुछ शून्य से बनाने की जरूरत नहीं है। Institution’s Innovation Council (IIC) और Atal Innovation Mission (AIM) जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम पहले से मौजूद हैं। सही उपयोग होने पर ये कैंपस में नवाचार का मजबूत आधार बन सकते हैं।
नेतृत्व और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का महत्व
अधिकांश छात्र इसलिए झिझकते हैं क्योंकि उद्यमिता उन्हें सामाजिक रूप से जोखिम भरी लगती है। यहां नेतृत्व का संदेश निर्णायक होता है। जब विश्वविद्यालय नेतृत्व असफलता को सीख मानता है और प्रयास को सम्मान देता है, तभी छात्र आगे आते हैं।
प्रेरणा नहीं, कौशल सिखाइए
केवल मोटिवेशनल टॉक्स से कंपनियां नहीं बनतीं। इसके लिए ग्राहक समझ, बाजार विश्लेषण, प्राइसिंग, बिक्री, कानूनी समझ और टीम लीडरशिप जैसे ठोस कौशल चाहिए। माइक्रो-क्रेडेंशियल और हाइब्रिड लर्निंग इस दिशा में प्रभावी हो सकते हैं।
मूल्यांकन बदलेगा तो व्यवहार बदलेगा
जब प्रोटोटाइप, डेमो-डे और पिच को परीक्षा की जगह दी जाती है, तो कक्षा स्टूडियो बन जाती है। भारत जैसे देश में यह बेहद जरूरी है, जहां “समय बर्बाद करने” का डर गहरा होता है।
सस्टेनेबिलिटी: भविष्य की उद्यमिता
ऊर्जा, पानी, कचरा, आजीविका और जलवायु से जुड़े क्षेत्र केवल नीति के मुद्दे नहीं, बल्कि बड़े व्यावसायिक अवसर हैं। जब कैंपस खुद living lab बनते हैं, तब टिकाऊ उद्यमिता व्यवहारिक बनती है।
विश्वविद्यालय बनें समाधान की फैक्ट्री
भारत को हर छात्र से फाउंडर बनने की उम्मीद नहीं है, लेकिन हर ग्रेजुएट का venture-capable होना जरूरी है। नीतियां मौजूद हैं, ढांचे मौजूद हैं। अब जरूरत है संस्कृति और संचालन में बदलाव की।
जब ऐसा होगा, तब विश्वविद्यालय नौकरी का इंतजार करने की जगह समाधान तैयार करने के केंद्र बन जाएंगे। युवा और महत्वाकांक्षी भारत के लिए यही अगला रास्ता है।
(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)
भारत में मीडिया शिक्षा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। पहले मीडिया कोर्स मुख्य रूप से प्रिंट पत्रकारिता, रेडियो और टेलीविजन रिपोर्टिंग पर केंद्रित होते थे। लेकिन आज के दौर में मीडिया शिक्षा का फोकस डिजिटल मार्केटिंग, सोशल मीडिया, कंटेंट क्रिएशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स पर भी है। ऐसे में कई छात्र पारंपरिक मीडिया शिक्षा और आधुनिक मीडिया शिक्षा के बीच अंतर को लेकर भ्रमित रहते हैं। यह गाइड उन छात्रों के लिए उपयोगी है जो 2026 में मास कम्युनिकेशन या मीडिया स्टडीज़ में करियर बनाने की सोच रहे हैं।
पारंपरिक मीडिया शिक्षा क्या है
पारंपरिक मीडिया शिक्षा मुख्य रूप से 20वीं सदी के पारंपरिक मास कम्युनिकेशन माध्यमों पर आधारित होती है। इसमें अखबार, टेलीविजन समाचार, रेडियो प्रसारण और फिल्म प्रोडक्शन जैसे क्षेत्र शामिल होते हैं।
इस तरह के कोर्स में आमतौर पर प्रिंट जर्नलिज्म, रेडियो जॉकींग, टीवी रिपोर्टिंग, विज्ञापन की बुनियादी समझ और पब्लिक रिलेशंस जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। पढ़ाई का तरीका अधिकतर लेक्चर आधारित और थ्योरी केंद्रित होता है, जिसमें छात्रों को समाचार लेखन, स्क्रिप्ट लिखने और रिपोर्टिंग से जुड़े असाइनमेंट दिए जाते हैं।
इन कोर्सों के दौरान छात्र न्यूज़ राइटिंग, एडिटिंग, ब्रॉडकास्ट एंकरिंग, बेसिक फोटोग्राफी और विज्ञापन लेखन जैसी स्किल्स सीखते हैं। पहले के समय में टाइपराइटर और बेसिक कैमरों का इस्तेमाल किया जाता था, जबकि अब कुछ संस्थानों में एडिटिंग सॉफ्टवेयर जैसे Final Cut Pro का भी उपयोग कराया जाता है।
पारंपरिक मीडिया शिक्षा के बाद करियर के तौर पर छात्र अखबार के रिपोर्टर, रेडियो अनाउंसर, टीवी रिपोर्टर या फिल्म एडिटर बन सकते हैं। भारत में कई संस्थान ऐसे कोर्स कराते हैं, जैसे Delhi University का BA जर्नलिज्म कोर्स और Indian Institute of Mass Communication का मास कम्युनिकेशन डिप्लोमा।
आधुनिक या समकालीन मीडिया शिक्षा क्या है
आधुनिक मीडिया शिक्षा नए डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आधारित होती है। इसमें डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और इंटरैक्टिव मीडिया शामिल होते हैं। आज के समय में खबरें और कंटेंट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए बहुत तेजी से फैलते हैं, इसलिए मीडिया शिक्षा का फोकस भी उसी दिशा में बढ़ रहा है।
इस तरह के कोर्स में डिजिटल मार्केटिंग, सोशल मीडिया मैनेजमेंट, कंटेंट क्रिएशन, SEO, डेटा एनालिटिक्स, पॉडकास्टिंग, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग और AR/VR स्टोरीटेलिंग जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। पढ़ाई का तरीका भी अधिक प्रैक्टिकल होता है, जिसमें छात्रों को लाइव प्रोजेक्ट, सोशल मीडिया कैंपेन और इंडस्ट्री इंटर्नशिप के जरिए प्रशिक्षण दिया जाता है।
छात्रों को वीडियो एडिटिंग के लिए Adobe Premiere Pro, ग्राफिक डिजाइन के लिए Canva और एनालिटिक्स समझने के लिए Google Analytics जैसे टूल्स सिखाए जाते हैं। इसके अलावा स्मार्टफोन, ड्रोन और वीडियो एडिटिंग ऐप्स जैसे CapCut का भी उपयोग किया जाता है।
इस क्षेत्र में करियर के कई नए विकल्प सामने आए हैं, जैसे डिजिटल मार्केटर, कंटेंट क्रिएटर, सोशल मीडिया मैनेजर, यूट्यूबर और OTT प्लेटफॉर्म प्रोड्यूसर।
पारंपरिक मीडिया शिक्षा आज भी क्यों महत्वपूर्ण है
हालांकि डिजिटल मीडिया तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन पारंपरिक मीडिया शिक्षा की अहमियत अभी भी खत्म नहीं हुई है। यह छात्रों को भाषा, व्याकरण और स्टोरीटेलिंग की मजबूत नींव देता है। छोटे शहरों और टियर-2 क्षेत्रों में आज भी स्थानीय अखबार और रेडियो स्टेशनों में रोजगार के अवसर मौजूद हैं।
इसके अलावा बड़े मीडिया संस्थानों जैसे The Times of India और NDTV में भी पत्रकारिता की बुनियादी स्किल्स की काफी अहमियत है। पारंपरिक मीडिया कोर्स अपेक्षाकृत कम खर्चीले होते हैं और इनमें बहुत ज्यादा तकनीकी उपकरणों की जरूरत भी नहीं होती। जो छात्र प्रिंट या टीवी पत्रकारिता में स्थिर नौकरी चाहते हैं, उनके लिए यह रास्ता अभी भी अच्छा माना जाता है।
2026 में छात्रों को आधुनिक मीडिया शिक्षा क्यों चुननी चाहिए
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में यह बाजार हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसी वजह से डिजिटल मीडिया से जुड़े प्रोफेशनल्स की मांग लगातार बढ़ रही है।
डिजिटल मार्केटिंग सेक्टर में हर साल लाखों नौकरियां उपलब्ध होती हैं। कई कंपनियां सोशल मीडिया मैनेजर को शुरुआती स्तर पर ही 5 से 15 लाख रुपये तक का पैकेज देती हैं। वहीं कंटेंट क्रिएटर औसतन लगभग 8 लाख रुपये सालाना कमा सकते हैं और उन्हें फ्रीलांसिंग की स्वतंत्रता भी मिलती है।
आज लगभग हर कंपनी को सोशल मीडिया रणनीति की जरूरत होती है। इसलिए कंटेंट क्रिएशन, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और डिजिटल मार्केटिंग जैसी स्किल्स भविष्य में भी प्रासंगिक रहने वाली हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स जैसे ChatGPT कंटेंट बनाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन क्रिएटिव सोच और रणनीति बनाने की भूमिका इंसानों की ही रहेगी। डिजिटल मीडिया में रिमोट वर्क की सुविधा भी है, जिससे भारत में बैठकर विदेशी क्लाइंट्स के साथ काम किया जा सकता है।
भारत में आधुनिक मीडिया के लोकप्रिय कोर्स
भारत में कई विश्वविद्यालय आधुनिक मीडिया से जुड़े कोर्स उपलब्ध कराते हैं। इनमें Symbiosis International University, पुणे का BA डिजिटल मीडिया प्रोग्राम, Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Communication का BVoc न्यू मीडिया कोर्स और Lovely Professional University का सोशल मीडिया मार्केटिंग से जुड़ा मास्टर्स प्रोग्राम शामिल हैं।
इसके अलावा छात्र ऑनलाइन सर्टिफिकेशन कोर्स भी कर सकते हैं, जैसे Google Digital Garage का डिजिटल मार्केटिंग कोर्स और HubSpot का कंटेंट मार्केटिंग सर्टिफिकेशन। मीडिया कोर्स में प्रवेश के लिए कई संस्थान प्रवेश परीक्षाएं भी आयोजित करते हैं, जिनमें IIMC Entrance Exam, GMCET, XIC OET और Symbiosis Entrance Test शामिल हैं।
चुनौतियां भी समझना जरूरी
पारंपरिक मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अखबारों की संख्या और प्रिंट रीडरशिप धीरे-धीरे कम हो रही है। दूसरी ओर आधुनिक मीडिया में ट्रेंड बहुत तेजी से बदलते हैं। नए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लगातार आते रहते हैं, इसलिए छात्रों को खुद को लगातार अपडेट रखना पड़ता है।
छात्रों को कौन सा विकल्प चुनना चाहिए
यदि आपको सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करना पसंद है, वीडियो एडिटिंग और कंटेंट क्रिएशन में रुचि है और आप फ्रीलांस या रिमोट काम करना चाहते हैं, तो आधुनिक मीडिया शिक्षा आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकती है। वहीं यदि आपको अखबार पढ़ना, टीवी पत्रकारिता और स्थिर नौकरी पसंद है, तो पारंपरिक मीडिया शिक्षा भी आपके लिए सही रास्ता हो सकती है।
मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 में डिजिटल मीडिया का प्रभाव लगातार बढ़ेगा। भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 90 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिससे कंटेंट क्रिएटर्स और डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में छात्र शुरुआत के लिए यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर मुफ्त कोर्स से सीख सकते हैं, इंस्टाग्राम रील्स जैसे टूल्स का उपयोग समझ सकते हैं और बाद में किसी अच्छे विश्वविद्यालय से मीडिया की पढ़ाई कर सकते हैं।
मीडिया करियर से जुड़ी अधिक जानकारी और मुफ्त करियर काउंसलिंग के लिए 08035018499 पर संपर्क किया जा सकता है।
आज के दौर में कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजाइन और यूजर एक्सपीरियंस भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे समय में प्रोडक्ट डिजाइनर की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। प्रोडक्ट डिजाइनर स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच, मोबाइल ऐप, पैकेजिंग और घरेलू उत्पादों से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म तक कई तरह के उत्पादों का डिजाइन तैयार करते हैं।
जो छात्र प्रोडक्ट डिजाइनिंग में करियर बनाने का सोच रहे हैं, उनके मन में अक्सर सवाल आता है कि क्या यह एक अच्छा करियर विकल्प है? इसका जवाब है—हाँ। यूजर-सेंट्रिक प्रोडक्ट और डिजिटल अनुभवों की बढ़ती मांग के कारण यह क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है और 2026 में भी इसकी संभावनाएं मजबूत दिख रही हैं।
प्रोडक्ट डिजाइन क्या है?
प्रोडक्ट डिजाइन वह प्रक्रिया है जिसमें ऐसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं जो उपयोगी, आकर्षक और उपयोगकर्ता के अनुकूल हों। इसमें रचनात्मकता के साथ तकनीकी समझ और यूजर बिहेवियर की जानकारी जरूरी होती है। प्रोडक्ट डिजाइनर का उद्देश्य ऐसे समाधान तैयार करना होता है जो लोगों की वास्तविक जरूरतों को पूरा करें और साथ ही बिजनेस के लक्ष्यों को भी साधें।
उनके काम में यूजर रिसर्च, स्केच बनाना, प्रोटोटाइप तैयार करना और उत्पाद की उपयोगिता का परीक्षण शामिल होता है। आज के समय में प्रोडक्ट डिजाइन केवल भौतिक उत्पादों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐप, वेबसाइट और सॉफ्टवेयर जैसे डिजिटल उत्पाद भी इसका हिस्सा हैं।
क्यों उभरता हुआ पेशा है प्रोडक्ट डिजाइन?
पिछले कुछ वर्षों में प्रोडक्ट डिजाइनरों की मांग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसकी एक बड़ी वजह टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप सेक्टर का विस्तार है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप्लिकेशन और टेक आधारित उत्पादों के लिए कुशल डिजाइनरों की जरूरत बढ़ रही है।
इसके अलावा कंपनियां अब समझ चुकी हैं कि किसी भी उत्पाद की सफलता में यूजर एक्सपीरियंस की बड़ी भूमिका होती है। बेहतर अनुभव से ग्राहक संतुष्टि और ब्रांड की पहचान मजबूत होती है। ऑटोमोबाइल, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, हेल्थकेयर डिवाइस और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों जैसे क्षेत्रों में भी प्रोडक्ट डिजाइनरों की मांग लगातार बढ़ रही है।
सफल प्रोडक्ट डिजाइनर बनने के लिए जरूरी कौशल
एक सफल प्रोडक्ट डिजाइनर बनने के लिए रचनात्मक सोच के साथ विश्लेषण क्षमता भी जरूरी है। डिजाइन थिंकिंग और समस्या समाधान कौशल इस क्षेत्र की बुनियाद माने जाते हैं।
तकनीकी कौशल भी उतने ही अहम हैं। ज्यादातर डिजाइनर CAD, Adobe Creative Suite, Figma और Sketch जैसे टूल्स का उपयोग करते हैं। साथ ही टीम में काम करने और अपने विचार स्पष्ट रूप से रखने के लिए अच्छे कम्युनिकेशन स्किल्स भी जरूरी हैं।
करियर के अवसर
प्रोडक्ट डिजाइन के क्षेत्र में कई तरह के करियर विकल्प मौजूद हैं। डिजाइनर टेक कंपनियों, मैन्युफैक्चरिंग संस्थानों और कंज्यूमर गुड्स कंपनियों में काम कर सकते हैं। स्टार्टअप इकोसिस्टम ने भी इस क्षेत्र में नए अवसर पैदा किए हैं, जहां डिजाइनर शुरुआत से नए उत्पाद विकसित कर सकते हैं।
इस क्षेत्र में आम पदों में प्रोडक्ट डिजाइनर, इंडस्ट्रियल डिजाइनर, UX/UI डिजाइनर, इंटरैक्शन डिजाइनर और डिजाइन रिसर्चर शामिल हैं। अनुभव बढ़ने के साथ डिजाइन लीड, क्रिएटिव डायरेक्टर और प्रोडक्ट मैनेजर जैसे नेतृत्व पद भी मिल सकते हैं। कई डिजाइनर फ्रीलांसिंग या अपना डिजाइन-आधारित स्टार्टअप शुरू करना भी पसंद करते हैं।
सैलरी और ग्रोथ
प्रोडक्ट डिजाइन को रचनात्मक और आर्थिक दोनों दृष्टि से आकर्षक करियर माना जाता है। शुरुआती स्तर पर एक प्रोडक्ट डिजाइनर की सालाना सैलरी लगभग 4 लाख से 8 लाख रुपये तक हो सकती है, जो कंपनी और कौशल पर निर्भर करती है। अनुभव के साथ आय में तेजी से वृद्धि होती है। टेक कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में काम करने वाले डिजाइनरों को प्रतिस्पर्धी वेतन मिलता है।
12वीं के बाद भारत में प्रोडक्ट डिजाइन कोर्स
भारत में छात्र बैचलर ऑफ डिजाइन (B.Des) इन प्रोडक्ट डिजाइन जैसे कोर्स कर सकते हैं। चार वर्षीय यह डिग्री National Institute of Design, Indian Institute of Technology Guwahati और MIT Institute of Design जैसे संस्थानों में उपलब्ध है।
डिप्लोमा कोर्स के विकल्प Srishti Institute of Art Design and Technology और Pearl Academy में मिलते हैं। ऑनलाइन विकल्पों में Coursera पर उपलब्ध Google UX Design Certificate और Interaction Design Foundation के कोर्स शामिल हैं।
प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं में UCEED, NID DAT, NIFT और AIDAT शामिल हैं। AIDAT छात्रों को डिजाइन क्षेत्र में प्रवेश के लिए मार्गदर्शन और अवसर प्रदान करता है, जिससे उन्हें सही संस्थान और करियर दिशा चुनने में मदद मिलती है।
प्रोडक्ट डिजाइन में जॉब रोल
इस क्षेत्र में प्रोडक्ट डिजाइनर पूरे प्रोडक्ट साइकिल पर काम करते हैं, जबकि UX/UI डिजाइनर ऐप और वेबसाइट पर फोकस करते हैं। इंडस्ट्रियल डिजाइनर भौतिक उत्पादों का डिजाइन तैयार करते हैं और सर्विस डिजाइनर सिस्टम और अनुभव पर काम करते हैं। करियर की शुरुआत जूनियर पद से होती है और आगे चलकर हेड ऑफ डिजाइन या चीफ डिजाइन ऑफिसर तक पहुंचा जा सकता है।
चुनौतियां भी समझें
इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, इसलिए मजबूत पोर्टफोलियो जरूरी है। कड़े डेडलाइन और लगातार बदलते ट्रेंड, खासकर AI आधारित टूल्स, के साथ अपडेट रहना भी आवश्यक है। फ्रीलांसिंग में शुरुआती दौर में आय स्थिर नहीं होती।
क्या यह करियर आपके लिए सही है?
अगर आप यूजर समस्याओं का समाधान करना पसंद करते हैं, तकनीक और रचनात्मकता में रुचि रखते हैं, टीम के साथ काम करने में सहज हैं और वैश्विक अवसर चाहते हैं, तो प्रोडक्ट डिजाइन आपके लिए सही विकल्प हो सकता है।
लेकिन यदि आपको कंप्यूटर टूल्स से काम करना पसंद नहीं है या आप पूरी तरह अकेले काम करना चाहते हैं, तो यह क्षेत्र चुनौतीपूर्ण लग सकता है।
आज की नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था में प्रोडक्ट डिजाइन सबसे रोमांचक करियर विकल्पों में से एक बन चुका है। कंपनियां ऐसे उत्पाद बनाना चाहती हैं जो सहज, उपयोगी और प्रभावी हों। ऐसे में डिजाइनरों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।
रचनात्मकता और समस्या समाधान में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए प्रोडक्ट डिजाइन न केवल विविध उद्योगों में अवसर देता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने का मौका भी प्रदान करता है।
12वीं कक्षा (साइंस स्ट्रीम) की परीक्षा दे रहे या स्कूल शिक्षा पूरी कर चुके कई छात्र अपने भविष्य को लेकर असमंजस में रहते हैं। करियर के अनेक विकल्प होने के कारण सही दिशा चुनना आसान नहीं होता। यह भ्रम नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की चिंता होती है। यदि आपकी रुचि विज्ञान, जांच-पड़ताल और वास्तविक समस्याओं को सुलझाने में है, तो फॉरेंसिक साइंस आपके लिए एक मजबूत और संभावनाओं से भरा करियर विकल्प हो सकता है।
All India Forensic Science Entrance Test (AIFSET) देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों में बीएससी फॉरेंसिक साइंस जैसे स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश का अवसर प्रदान करता है।
AIFSET क्या है?
All India Forensic Science Entrance Test (AIFSET) एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है, जिसके माध्यम से भाग लेने वाले संस्थानों में फॉरेंसिक साइंस के अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाखिला मिलता है। यह 12वीं के बाद बीएससी फॉरेंसिक साइंस और संबंधित पाठ्यक्रमों में प्रवेश का एक व्यवस्थित और पारदर्शी माध्यम है।
यह परीक्षा मुख्य रूप से साइंस स्ट्रीम (PCB/PCM) के छात्रों के लिए होती है, ताकि जिन छात्रों की बुनियादी अकादमिक तैयारी मजबूत है, वे इस विशेष क्षेत्र में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।
क्यों बढ़ रहा है फॉरेंसिक साइंस में करियर का दायरा?
फॉरेंसिक साइंस आधुनिक आपराधिक जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिंगरप्रिंट विश्लेषण से लेकर डीएनए जांच, साइबर अपराधों के साक्ष्य और टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट तक, फॉरेंसिक विशेषज्ञ वैज्ञानिक तरीकों से कानून प्रवर्तन एजेंसियों और न्याय प्रणाली की सहायता करते हैं।
तकनीकी प्रगति और वैज्ञानिक जांच की बढ़ती जरूरत के कारण इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। छात्र निम्नलिखित क्षेत्रों में करियर बना सकते हैं:
क्राइम सीन इन्वेस्टिगेटर, फॉरेंसिक एनालिस्ट, डिजिटल या साइबर फॉरेंसिक एक्सपर्ट, फॉरेंसिक टॉक्सिकोलॉजिस्ट और फॉरेंसिक बायोलॉजिस्ट।
इन क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के लिए सही प्रवेश परीक्षा चुनना पहला कदम है। इच्छुक छात्र आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से AIFSET 2026 के लिए आवेदन कर सकते हैं।
12वीं के छात्रों के लिए AIFSET क्यों उपयोगी?
AIFSET फॉरेंसिक साइंस में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए एक सरल और केंद्रित प्रवेश मार्ग प्रदान करता है। अलग-अलग संस्थानों की कई प्रक्रियाओं से गुजरने के बजाय छात्र एक मानकीकृत परीक्षा देकर प्रवेश की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।
इस परीक्षा के प्रमुख लाभों में भाग लेने वाले संस्थानों के कार्यक्रमों तक पहुंच, मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया, 12वीं साइंस छात्रों के लिए स्पष्ट पात्रता मानदंड और पारदर्शी परीक्षा संरचना शामिल हैं।
AIFSET में शामिल होकर छात्र यह दर्शाते हैं कि वे एक विशेष और कौशल-आधारित करियर के प्रति गंभीर हैं।
परीक्षा संरचना और पात्रता
यह परीक्षा उन छात्रों के लिए है जिन्होंने 12वीं कक्षा साइंस विषयों के साथ पूरी की है या परीक्षा दे रहे हैं। प्रश्न पत्र में भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और गणित जैसे मुख्य विषयों से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं, जो उम्मीदवार की स्ट्रीम पर निर्भर करते हैं।
पात्रता मानदंड, परीक्षा तिथि, सिलेबस और आवेदन प्रक्रिया की सटीक जानकारी के लिए छात्रों को केवल AIFSET की आधिकारिक वेबसाइट पर ही भरोसा करना चाहिए।
बढ़ती पहचान और जागरूकता
फॉरेंसिक साइंस को करियर विकल्प के रूप में मिल रही बढ़ती पहचान यह दर्शाती है कि छात्र अब पारंपरिक विज्ञान करियर से आगे सोच रहे हैं। राष्ट्रीय मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने भी इस रुझान को महत्व दिया है।
प्रमुख हिंदी समाचार पत्र दैनिक भास्कर ने अपने “युवा, शिक्षा, अवसर” सेक्शन में हाल ही में एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें फॉरेंसिक साइंस में करियर बनाने के लिए संरचित प्रवेश परीक्षाओं, विशेष रूप से AIFSET, की भूमिका पर प्रकाश डाला गया। यह मान्यता इस क्षेत्र की बढ़ती प्रासंगिकता को दर्शाती है।
12वीं के बाद छात्रों को AIFSET पर क्यों विचार करना चाहिए?
यदि आप 12वीं में हैं और ऐसा करियर चाहते हैं जो स्थिरता के साथ उद्देश्य भी प्रदान करे, तो फॉरेंसिक साइंस एक उपयुक्त विकल्प हो सकता है। जांच प्रणाली में उन्नत वैज्ञानिक तरीकों के बढ़ते उपयोग के कारण प्रशिक्षित फॉरेंसिक पेशेवरों की मांग लगातार बढ़ने की संभावना है।
AIFSET में शामिल होकर छात्र प्रारंभिक स्तर पर ही विशेष करियर की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं, विज्ञान और कानून के बीच अंतःविषय अवसरों को समझ सकते हैं, न्याय और सार्वजनिक सुरक्षा में योगदान दे सकते हैं और उच्च मांग वाले तकनीकी क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित कर सकते हैं।
12वीं के बाद चुना गया करियर जीवन की लंबी दिशा तय करता है। All India Forensic Science Entrance Test (AIFSET) विज्ञान के छात्रों को एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश का अवसर देता है, जो बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण है।
मीडिया में मिल रही पहचान, बढ़ती जागरूकता और रोजगार के अवसरों के विस्तार के साथ फॉरेंसिक साइंस भारत में नई पीढ़ी के विज्ञान छात्रों के लिए एक मजबूत विकल्प बनता जा रहा है। इच्छुक छात्रों को आधिकारिक माध्यमों से अपडेट रहना चाहिए, पात्रता मानदंड समझना चाहिए और रणनीतिक तैयारी के साथ इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।
जो छात्र विज्ञान, जांच और समाज में सार्थक योगदान का संयोजन चाहते हैं, उनके लिए AIFSET फॉरेंसिक साइंस में सफल करियर की पहली सीढ़ी साबित हो सकता है।
भारत में नई पीढ़ी के छात्र तेजी से सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सतत कृषि) की ओर आकर्षित हो रहे हैं। बदलते जॉब ट्रेंड, जलवायु परिवर्तन की चिंता और एग्री-टेक सेक्टर में उभरते अवसर इसके प्रमुख कारण हैं। शहरों और गांवों के युवा ऑर्गेनिक फार्मिंग और एग्रोइकोलॉजी जैसे कोर्स में दाखिला ले रहे हैं, जहां उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ अर्थपूर्ण करियर का रास्ता मिलता है।
क्या है सस्टेनेबल एग्रीकल्चर और क्यों बढ़ रही है इसकी मांग?
सस्टेनेबल एग्रीकल्चर ऐसी खेती प्रणाली है जो वर्तमान पीढ़ी की खाद्य जरूरतों को पूरा करते हुए जमीन, पानी और पर्यावरण को भविष्य के लिए सुरक्षित रखती है। इसमें मिट्टी की सेहत सुधारना, पानी की बचत, रासायनिक दवाओं का कम उपयोग और जैव विविधता को बढ़ावा देना शामिल है।
इसमें फसल चक्र (क्रॉप रोटेशन), प्राकृतिक कीट नियंत्रण, ड्रिप सिंचाई और वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में यह पद्धति सूखे की समस्या से निपटने और पैदावार बढ़ाने में सहायक साबित हो रही है। सरकार की योजनाएं जैसे Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana पानी के बेहतर प्रबंधन को बढ़ावा देती हैं।
युवाओं में बढ़ती दिलचस्पी
पिछले कुछ वर्षों में सस्टेनेबिलिटी आधारित कृषि पाठ्यक्रमों में दाखिले बढ़े हैं। Shoolini University जैसे संस्थानों में ऑर्गेनिक फार्मिंग कोर्स लोकप्रिय हो रहे हैं। वहीं Tamil Nadu Agricultural University के सर्वे बताते हैं कि जिन छात्रों का पारिवारिक पृष्ठभूमि खेती से जुड़ी है और जिन्हें बाजार तक पहुंच है, वे कृषि करियर को प्राथमिकता दे रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही रुझान दिखता है। University of California के कैंपसों में ऑर्गेनिक इंटर्नशिप और एग्रोइकोलॉजी कार्यक्रमों में सैकड़ों छात्रों ने नामांकन लिया है। भारत में Lovely Professional University के बीएससी एग्रीकल्चर स्नातक भी पारंपरिक नौकरियों की बजाय सस्टेनेबल विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन और फूड सिक्योरिटी की चिंता
कोविड-19 और बदलते मौसम चक्रों ने युवाओं को खाद्य सुरक्षा के महत्व का एहसास कराया है। नो-टिल फार्मिंग, प्राकृतिक कीट नियंत्रण और फसल चक्र जैसी तकनीकें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद करती हैं। Himachal Pradesh में बड़े स्तर पर चल रही परियोजनाओं ने किसानों की आय और उत्पादन दोनों में सुधार किया है।
नई शिक्षा नीति National Education Policy 2020 भी समग्र शिक्षा पर जोर देती है, जिसमें पर्यावरण और कृषि कौशल को महत्व दिया गया है।
सस्टेनेबल एग्रीकल्चर में करियर के अवसर
आज खेती केवल कम आय वाला पेशा नहीं रह गया है। एग्रीबिजनेस, रिसर्च, एक्सटेंशन सर्विस, एग्री-स्टार्टअप और ग्रीन जॉब्स जैसे कई विकल्प उपलब्ध हैं। ऑर्गेनिक उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। कई राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी सहायता योजनाएं किसानों को स्थिर आय देती हैं।
Azim Premji University जैसे संस्थान सस्टेनेबल एग्रीकल्चर को ग्रामीण विकास से जोड़कर पढ़ाते हैं, जिससे छात्रों को जमीनी समझ मिलती है।
प्रकृति से जुड़ाव और बेहतर जीवनशैली
कई युवा डेस्क जॉब की सीमाओं से बाहर निकलकर ऐसा काम चाहते हैं जिसका सीधा असर समाज और पर्यावरण पर पड़े। खेती के जरिए वे जमीन, पौधों और पशुओं के साथ जुड़ते हैं। प्रदूषण से जूझते शहरों के युवाओं के लिए यह साफ हवा, नियमित दिनचर्या और उद्देश्यपूर्ण जीवन का अवसर देता है।
कैसे बनें सस्टेनेबल एग्रीकल्चर प्रोफेशनल?
सबसे पहले 12वीं के बाद बीएससी एग्रीकल्चर, हॉर्टिकल्चर या फॉरेस्ट्री में दाखिला लें। Indian Council of Agricultural Research से मान्यता प्राप्त कॉलेजों जैसे Punjab Agricultural University या तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर सकते हैं। प्रवेश के लिए ICAR AIEEA-UG जैसी परीक्षाएं देनी होती हैं।
इसके बाद इंटर्नशिप और फील्ड वर्क बेहद जरूरी है। मिट्टी परीक्षण, ड्रिप सिंचाई और प्राकृतिक खेती के प्रयोगों का अनुभव करियर में मदद करता है। आगे एमएससी एग्रोइकोलॉजी या सॉइल साइंस जैसे कोर्स कर सकते हैं।
सरकारी क्षेत्र में बैंक एग्री फील्ड ऑफिसर बनने के लिए IBPS SO AFO परीक्षा दे सकते हैं। निजी कंपनियों और एग्री-स्टार्टअप में भी अवसर हैं। उद्यमिता के इच्छुक छात्र फूड प्रोसेसिंग या ऑर्गेनिक फार्मिंग यूनिट शुरू कर सकते हैं।
चुनौतियां और संभावनाएं
पानी की कमी, कीट प्रबंधन और बाजार की अस्थिरता जैसी चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन सोलर पंप, प्रिसिजन फार्मिंग और सरकारी सहायता योजनाएं इन समस्याओं का समाधान दे रही हैं। महिलाएं भी कृषि क्षेत्र में आगे आ रही हैं और कई सरकारी कार्यक्रम उन्हें सशक्त बना रहे हैं।
संक्षेप में, सस्टेनेबल एग्रीकल्चर उन युवाओं के लिए बेहतरीन विकल्प है जो अर्थपूर्ण काम, पर्यावरण संरक्षण और स्थिर करियर चाहते हैं। हरित तकनीक और कृषि बजट में बढ़ते निवेश के बीच यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में और तेजी से बढ़ेगा।
करियर विकल्पों की बात आते ही ज्यादातर छात्रों के मन में इंजीनियरिंग, मेडिकल और आईटी जैसे क्षेत्र आते हैं। वहीं कृषि को अक्सर जोखिम भरा क्षेत्र माना जाता है, क्योंकि इसमें मौसम की अनिश्चितता, बाजार कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भरता जैसी चुनौतियां होती हैं। हालांकि, आज की आधुनिक खेती पारंपरिक खेती से काफी आगे बढ़ चुकी है और यह बेहतर करियर संभावनाएं, स्थिरता और उद्यमिता की आजादी प्रदान करती है।
अगर आप यह सोच रहे हैं कि क्या कृषि एक अच्छा करियर विकल्प हो सकता है, तो इसके कुछ महत्वपूर्ण और तथ्य आधारित पहलुओं को समझना जरूरी है।
सबसे पहले, कृषि एक सदाबहार क्षेत्र है। अन्य उद्योग जहां आर्थिक उतार-चढ़ाव से प्रभावित होते हैं, वहीं कृषि एक बुनियादी जरूरत से जुड़ा क्षेत्र है। लोगों को हर हाल में भोजन की आवश्यकता होती है। वैश्विक जनसंख्या में वृद्धि को देखते हुए आने वाले वर्षों में खाद्य मांग में तेजी से बढ़ोतरी की संभावना है। इससे खेती, एग्रीबिजनेस, फूड टेक्नोलॉजी और एग्रीकल्चर मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में लंबे समय तक रोजगार के अवसर बने रहते हैं। जहां कुछ तकनीकी क्षेत्रों में समय-समय पर अवसरों की कमी देखी जाती है, वहीं कृषि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास से जुड़ी होने के कारण स्थिर बनी रहती है।
दूसरा बड़ा बदलाव एग्रीटेक और आधुनिक खेती के रूप में सामने आया है। अब कृषि सिर्फ हल और खेत तक सीमित नहीं है। प्रिसिजन फार्मिंग, ड्रोन का उपयोग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए फसल मॉनिटरिंग, स्मार्ट सिंचाई प्रणाली और डेटा आधारित फार्म मैनेजमेंट जैसी तकनीकों ने खेती को हाई-टेक बना दिया है। एग्रीटेक स्टार्टअप्स के बढ़ते चलन ने ऐसे युवाओं के लिए नए अवसर खोले हैं, जो तकनीक और कृषि दोनों की समझ रखते हैं। इसी वजह से कृषि तेजी से बदलते पेशेवर क्षेत्रों में शामिल हो चुकी है।
कृषि में उद्यमिता की भी मजबूत संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र में आप ऑर्गेनिक फार्म, डेयरी यूनिट, पोल्ट्री फार्म, फूड प्रोसेसिंग ब्रांड या कृषि परामर्श सेवाएं शुरू कर सकते हैं। जहां कई पेशों में कॉर्पोरेट नौकरी पर निर्भरता होती है, वहीं कृषि आपको अपना व्यवसाय स्थापित करने का मौका देती है। सही योजना और प्रबंधन के साथ कृषि व्यवसाय लाभदायक और विस्तार योग्य साबित हो सकता है।
सरकारी समर्थन भी कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाता है। कई देशों में किसानों और कृषि उद्यमियों के लिए सब्सिडी, फसल बीमा, कृषि ऋण और ग्रामीण विकास कार्यक्रम जैसी योजनाएं उपलब्ध हैं। ये कदम जोखिम को कम करने और युवाओं को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करने में मदद करते हैं। संगठित नीतिगत समर्थन के कारण कृषि उतनी असुरक्षित नहीं है, जितना अक्सर माना जाता है।
पर्यावरण और समाज के प्रति योगदान भी कृषि की बड़ी ताकत है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण आज वैश्विक चिंता के विषय हैं। ऑर्गेनिक खेती, सतत कृषि पद्धतियां और क्लाइमेट-स्मार्ट प्रैक्टिसेज का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कृषि को पेशे के रूप में अपनाने का मतलब है खाद्य उत्पादन, पर्यावरण संतुलन और सतत विकास में सीधा योगदान देना।
कई लोगों के लिए कृषि एक जीवनशैली का भी विकल्प है। खुली हवा में काम करना, अपना फार्म या व्यवसाय चलाना और भीड़भाड़ से दूर रहकर काम करने का अनुभव एक अलग तरह की संतुष्टि देता है। जहां कॉर्पोरेट नौकरियां अक्सर तनावपूर्ण हो सकती हैं, वहीं कृषि में लचीलापन और प्रकृति के करीब रहने का अवसर मिलता है।
यह सही है कि कृषि में मौसम और बाजार कीमतों से जुड़े जोखिम मौजूद हैं। लेकिन आधुनिक तकनीक, बेहतर योजना, विविधीकरण और सरकारी सहायता के जरिए इन जोखिमों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, कृषि में लंबी अवधि की मांग, उद्यमिता के अवसर, स्थिरता पर सकारात्मक प्रभाव और स्वतंत्रता जैसे फायदे हैं, जो इसे कई पारंपरिक करियर विकल्पों से अलग बनाते हैं। जो युवा नवाचार में रुचि रखते हैं, अपना व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं और समाज पर सीधा प्रभाव डालने वाला करियर चुनना चाहते हैं, उनके लिए कृषि कोई बैकअप विकल्प नहीं, बल्कि एक मजबूत और दीर्घकालिक करियर साबित हो सकता है।
अधिक जानकारी या नि:शुल्क करियर काउंसलिंग के लिए AIACAT की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं या दिए गए नंबर पर संपर्क करें।
12वीं के बाद मैनेजमेंट में करियर बनाने का सपना देखने वाले छात्रों के लिए बीबीए (BBA) सबसे लोकप्रिय अंडरग्रेजुएट कोर्स में से एक है। भारत में मैनेजमेंट सेक्टर में बढ़ते अवसरों के बीच अब प्रवेश प्रक्रिया भी आसान हो गई है। ग्लोबल मैनेजमेंट कॉमन एप्टीट्यूड टेस्ट (GMCAT) के जरिए छात्र एक ही प्रवेश परीक्षा देकर विभिन्न कॉलेजों में BBA की अलग-अलग स्पेशलाइजेशन चुन सकते हैं। यह गाइड कॉमर्स छात्रों को सही निर्णय लेने में मदद करेगी।
क्या है GMCAT?
Global Management Common Aptitude Test (GMCAT) एक राष्ट्रीय स्तर की 100% ऑनलाइन मैनेजमेंट प्रवेश परीक्षा है। यह परीक्षा छात्रों की मैनेजमेंट समझ, विश्लेषण क्षमता, लीडरशिप स्किल और निर्णय लेने की क्षमता को परखती है। GMCAT स्कोर के आधार पर देश के कई संस्थानों में BBA प्रोग्राम में प्रवेश मिलता है। कम फीस, ऑनलाइन फॉर्मेट और एकल आवेदन प्रक्रिया इसे 12वीं के छात्रों के लिए सुविधाजनक विकल्प बनाती है।
BBA के प्रमुख प्रकार
BBA इन जनरल मैनेजमेंट
यह कोर्स बिजनेस की बुनियादी समझ देता है, जिसमें मार्केटिंग, फाइनेंस, ऑपरेशंस और ह्यूमन रिसोर्स शामिल हैं। केस स्टडी और प्रोजेक्ट के जरिए छात्रों को प्रबंधन के मूल सिद्धांत सिखाए जाते हैं।
यह उन छात्रों के लिए उपयुक्त है जो आगे एमबीए करना चाहते हैं या कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करना चाहते हैं।
शुरुआती सैलरी औसतन 4 से 7 लाख रुपये प्रतिवर्ष तक हो सकती है। अवधि तीन साल।
BBA इन मार्केटिंग मैनेजमेंट
इसमें कंज्यूमर बिहेवियर, ब्रांडिंग, डिजिटल मार्केटिंग, मार्केट रिसर्च, सोशल मीडिया और SEO जैसे विषय शामिल होते हैं।
रचनात्मक सोच रखने वाले और ब्रांडिंग में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह बेहतर विकल्प है।
डिजिटल मार्केटर या ब्रांड मैनेजर के रूप में 5 से 9 लाख रुपये सालाना तक शुरुआती पैकेज मिल सकता है। ई-कॉमर्स के विस्तार से इस क्षेत्र में प्लेसमेंट के अवसर बढ़े हैं।
BBA इन फाइनेंस
फाइनेंस स्पेशलाइजेशन में फाइनेंशियल प्लानिंग, निवेश विश्लेषण, बैंकिंग ऑपरेशंस, कॉर्पोरेट फाइनेंस, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और जोखिम प्रबंधन पढ़ाया जाता है।
जो छात्र संख्याओं में रुचि रखते हैं और बैंकिंग या वेल्थ मैनेजमेंट में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह उपयुक्त है।
फाइनेंशियल एनालिस्ट या इन्वेस्टमेंट बैंकिंग में 6 से 10 लाख रुपये प्रतिवर्ष शुरुआती वेतन मिल सकता है। फिनटेक सेक्टर के विस्तार से इस क्षेत्र में मांग लगातार बढ़ रही है।
BBA इन ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट
इस कोर्स में टैलेंट एक्विजिशन, ऑर्गनाइजेशनल बिहेवियर, कर्मचारी संबंध और परफॉर्मेंस मैनेजमेंट सिखाया जाता है। हाइब्रिड और रिमोट वर्क मॉडल के दौर में HR की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है।
मनोविज्ञान और कम्युनिकेशन में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह अच्छा विकल्प है।
HR एग्जीक्यूटिव या टैलेंट एक्विजिशन प्रोफेशनल के रूप में 5 से 8 लाख रुपये सालाना पैकेज मिल सकता है।
BBA इन इंटरनेशनल बिजनेस
यह कोर्स अंतरराष्ट्रीय व्यापार, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट, क्रॉस-कल्चरल मैनेजमेंट और ग्लोबल मार्केट स्ट्रेटेजी पर केंद्रित है।
जो छात्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करना चाहते हैं, उनके लिए यह उपयोगी है।
एक्सपोर्ट मैनेजर या ग्लोबल सप्लाई चेन प्रोफेशनल के रूप में 6 से 11 लाख रुपये प्रतिवर्ष शुरुआती वेतन मिल सकता है।
स्पेशलाइजेशन के अनुसार औसत शुरुआती वेतन
जनरल मैनेजमेंट – लगभग 4.5 लाख रुपये प्रतिवर्ष
मार्केटिंग – लगभग 6 लाख रुपये प्रतिवर्ष
फाइनेंस – लगभग 7 लाख रुपये प्रतिवर्ष
HR मैनेजमेंट – लगभग 5.5 लाख रुपये प्रतिवर्ष
इंटरनेशनल बिजनेस – लगभग 7.5 लाख रुपये प्रतिवर्ष
कौन दें GMCAT 2026?
GMCAT 2026 उन छात्रों के लिए उपयुक्त है जिन्होंने 12वीं कॉमर्स से 60% या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं और जो बिना कई अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं के झंझट के अच्छे कॉलेज में दाखिला चाहते हैं। यह उन परिवारों के लिए भी किफायती विकल्प है जो प्रवेश प्रक्रिया में ज्यादा खर्च नहीं करना चाहते।
तैयारी के लिए दो महीने तक एनसीईआरटी कॉमर्स विषयों की दोहराई और लॉजिकल रीजनिंग का अभ्यास पर्याप्त माना जाता है।
GMCAT के जरिए BBA में प्रवेश की प्रक्रिया आसान हो गई है। एक ही परीक्षा देकर छात्र अपनी पसंद की स्पेशलाइजेशन चुन सकते हैं और देश के प्रमुख कॉलेजों में दाखिला पा सकते हैं। जनरल मैनेजमेंट से लेकर इंटरनेशनल बिजनेस तक, GMCAT 2026 छात्रों के लिए कई रास्ते खोलता है।
अधिक जानकारी या करियर काउंसलिंग के लिए आधिकारिक पोर्टल पर संपर्क किया जा सकता है।
Current Events
'सिटी ऑफ जॉय' कहे जाने वाले कोलकाता शहर में 16 अप्रैल का दिन वाकई उत्साह से भरा रहा, जब 'एडइनबॉक्स' ने अपना विस्तार करते हुए यहाँ के लोगों के लिए अपनी नई ब्रांच का शुभारम्भ किया। ख़ास बात यह रही कि इस मौके पर इटली से आये मेहमानों के साथ 'एडइनबॉक्स' की पूरी टीम मौजूद थी। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में उदघाटित इस कार्यालय से पूर्व 'एडइनबॉक्स' की शाखाएं दिल्ली, भुवनेश्वर, लखनऊ और बैंगलोर जैसे शहरों में पहले से कार्य कर रही हैं।
कोलकाता में एडइनबॉक्स की नयी ब्रांच के उद्घाटन कार्यक्रम में इटली के यूनिमार्कोनी यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधिमंडल की गरिमामयी उपस्थिति ने इस अवसर को तो ख़ास बनाया ही, सहयोग और साझेदारी की भावना को भी इससे बल मिला। विशिष्ट अतिथियों आर्टुरो लावेल, लियो डोनाटो और डारिना चेशेवा ने 'एडइनबॉक्स' के एडिटर उज्ज्वल अनु चौधरी, बिजनेस और कंप्यूटर साइंस के डोमेन लीडर डॉ. नवीन दास, ग्लोबल मीडिया एजुकेशन काउंसिल डोमेन को लीड कर रहीं मनुश्री मैती और एडिटोरियल कोऑर्डिनेटर समन्वयक शताक्षी गांगुली के नेतृत्व में कोलकाता टीम के साथ हाथ मिलाया।
समारोह की शुरुआत अतिथियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत से हुई। तत्पश्चात दोनों पक्षों के बीच विचारों और दृष्टिकोणों का सकारात्मक आदान-प्रदान हुआ। डारिना ने पारम्परिक तरीके से रिबन काटकर आधिकारिक तौर पर कार्यालय का उद्घाटन किया और इस मौके को आपसी सहयोग के प्रयासों की दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। बाकायदा इस दौरान यूनिमार्कोनी विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल और EdInbox.com टीम के बीच एक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर भी हुआ। यह पहल शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और प्रगति के लिए साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक छात्रों का नेतृत्व कर इस पहल से उन्हें सशक्त बनाया जा सकता है ताकि वे वैश्विक मंचों पर सफलता के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।
समारोह के समापन की वेला पर दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे को स्मारिकाएं भेंट की गयीं। 'एडइनबॉक्स' की नई ब्रांच के उद्घाटन के साथ इस आदान-प्रदान की औपचारिकता से दोनों टीमों के बीच मित्रता और सहयोग के बंधन भी उदघाटित हुए।अंततः वक़्त मेहमानों को अलविदा कहने का था, 'एडइनबॉक्स' की कोलकाता टीम ने अतिथियों को विदा तो किया मगर इस भरोसे और प्रण के साथ कि यह नयी पहल भविष्य में संबंधों की प्रगाढ़ता और विकास के नए ठौर तक पहुंचेगी।
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने 2025 सत्र में डिप्लोमा और पोस्ट-एमबीबीएस डीएनबी ब्रॉड स्पेशियलिटी कोर्स में प्रवेश लेने वाले अभ्यर्थियों के लिए जॉइनिंग प्रक्रिया को औपचारिक रूप से शुरू कर दिया है। बोर्ड ने उम्मीदवारों को निर्देश दिया है कि वे ऑनलाइन पोर्टल फॉर जॉइनिंग एंड रजिस्ट्रेशन (OPJR) पर अपनी सभी जॉइनिंग औपचारिकताएं और सेल्फ-अप्रेजल अनिवार्य रूप से पूरा करें।
नए सत्र में यह प्रक्रिया सभी अभ्यर्थियों पर लागू होगी—चाहे वे मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) के माध्यम से आवंटित सीट पर जॉइन कर रहे हों या राज्य सरकार, रेलवे, पीएसयू या ईएसआईसी के इन-सर्विस कोटा के तहत प्रवेश ले रहे हों। एनबीईएमएस से मान्यता प्राप्त अस्पतालों को भी उम्मीदवारों की जानकारी और दस्तावेजों के सत्यापन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
9 मार्च से सक्रिय होगा ओपीजेआर पोर्टल, 9 अप्रैल अंतिम तारीख
बोर्ड ने बताया है कि OPJR पोर्टल 9 मार्च से सक्रिय रहेगा। अभ्यर्थियों के पास 9 अप्रैल तक जॉइनिंग औपचारिकताएं पूरी करने का समय होगा। इसके बाद अस्पतालों के पास 30 अप्रैल तक उम्मीदवारों के दस्तावेज़ और सेल्फ-अप्रेजल की जांच करने और आवंटन विवरण की पुष्टि करने की समयसीमा होगी।
नोटिस के अनुसार उम्मीदवारों को पोर्टल पर जॉइनिंग फॉर्मैलिटीज पूरी करनी होंगी, सेल्फ-अप्रेजल फॉर्म भरना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित अस्पताल उनके द्वारा दी गई जॉइनिंग रिपोर्ट (Annexure-A) को पोर्टल पर अपलोड करे। अस्पतालों को अभ्यर्थियों की जानकारी का सावधानी से सत्यापन करना आवश्यक होगा। यह सेल्फ-अप्रेजल प्रक्रिया प्रशिक्षु के पंजीकरण की पात्रता निर्धारित करने के लिए अनिवार्य है।
दस्तावेज़ सत्यापन में सख्ती, आरक्षित श्रेणी के लिए विशेष निर्देश
मान्यता प्राप्त अस्पतालों को मूल दस्तावेजों की जांच की जिम्मेदारी दी गई है। विशेष रूप से SC, ST, OBC और EWS श्रेणी के अभ्यर्थियों के लिए अस्पतालों को एमसीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार वैध जाति/श्रेणी प्रमाणपत्र का सत्यापन अनिवार्य रूप से करना होगा।
इन-सर्विस अभ्यर्थियों के लिए ‘रिलिविंग’ अनिवार्य
एनबीईएमएस ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य कोटा या सरकारी संस्थान से इन-सर्विस आधार पर प्रवेश लेने वाले उम्मीदवारों का प्रशिक्षण तभी शुरू माना जाएगा, जब उन्हें उनकी मूल संस्था से औपचारिक रूप से कार्यमुक्त (Relieved) कर दिया जाए। इससे पहले शुरू की गई कोई ट्रेनिंग मान्य नहीं होगी और उसे शून्य माना जाएगा।
अस्थायी पंजीकरण पत्र जारी होगा, गलत जानकारी पर कार्रवाई
जॉइनिंग और सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अभ्यर्थियों को अस्थायी पंजीकरण पत्र जारी किया जाएगा। हालांकि बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह अस्थायी होगा और आगे के सत्यापन पर निर्भर करेगा। यदि सेल्फ-अप्रेजल या दस्तावेजों में कोई गलत सूचना पाई जाती है, तो उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द की जा सकती है।
एनबीईएमएस ने यह भी दोहराया है कि प्रशिक्षण काउंसलिंग की रिपोर्टिंग अवधि के भीतर शुरू होना चाहिए। बिना पूर्व अनुमति के जॉइनिंग तिथि में किसी भी प्रकार का विस्तार स्वीकार नहीं किया जाएगा।
समय के साथ शिक्षा और करियर के विकल्पों में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ साल पहले तक छात्रों के बीच BA, BSc और BCom जैसे पारंपरिक कोर्स सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ करते थे। लेकिन अब नई तकनीक, डिजिटल बदलाव और उद्योगों की बदलती जरूरतों के कारण छात्र ऐसे कोर्स की ओर रुख कर रहे हैं जो सीधे कौशल और रोजगार से जुड़े हों।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 तक कई नए प्रोफेशनल कोर्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इनकी खास बात यह है कि इनकी मांग सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बढ़ रही है। टेक्नोलॉजी, डेटा और डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने ऐसे कई नए करियर विकल्प खोल दिए हैं, जिनमें बेहतर सैलरी और तेजी से ग्रोथ की संभावना है। आइए जानते हैं 2026 में कौन-कौन से कोर्स सबसे ज्यादा ट्रेंड में हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग
आज लगभग हर क्षेत्र में Artificial Intelligence का उपयोग बढ़ रहा है। कंपनियां ऐसे प्रोफेशनल्स की तलाश में हैं जो डेटा के आधार पर बेहतर निर्णय लेने और ऑटोमेशन से जुड़े सिस्टम विकसित कर सकें।
इसी वजह से Machine Learning से जुड़े कोर्स इंजीनियरिंग कॉलेजों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर तेजी से बढ़े हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ हेल्थकेयर, बैंकिंग, ई-कॉमर्स और टेक कंपनियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
डेटा साइंस और डेटा एनालिटिक्स
आज के डिजिटल दौर में डेटा को सबसे बड़ी संपत्ति माना जा रहा है। बड़ी कंपनियां अपने बिजनेस फैसले डेटा के आधार पर ले रही हैं। इसी कारण Data Science और Data Analytics से जुड़े कोर्स की मांग तेजी से बढ़ रही है।
इन कोर्सों में छात्रों को डेटा कलेक्शन, डेटा एनालिसिस, विजुअलाइजेशन और रिपोर्ट तैयार करने की ट्रेनिंग दी जाती है। टेक कंपनियों के अलावा बैंकिंग, मार्केटिंग और हेल्थ सेक्टर में भी डेटा एक्सपर्ट्स की जरूरत बढ़ती जा रही है।
साइबर सिक्योरिटी
डिजिटल दुनिया के विस्तार के साथ साइबर अपराध के मामलों में भी वृद्धि हुई है। ऐसे में संस्थानों और कंपनियों को अपने डेटा और नेटवर्क की सुरक्षा के लिए विशेषज्ञों की जरूरत पड़ रही है।
Cyber Security के कोर्स में एथिकल हैकिंग, नेटवर्क सिक्योरिटी और इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र युवाओं के लिए सबसे सुरक्षित और तेजी से बढ़ते करियर विकल्पों में से एक माना जा रहा है।
क्लाउड कंप्यूटिंग
आज अधिकांश कंपनियां अपने डेटा और एप्लिकेशन को क्लाउड प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट कर रही हैं। इस वजह से Cloud Computing और DevOps से जुड़े प्रोफेशनल्स की मांग बढ़ गई है।
क्लाउड तकनीक कंपनियों को कम लागत में सुरक्षित और तेज डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद करती है। आईटी सेक्टर में इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को अच्छी सैलरी और तेजी से करियर ग्रोथ मिल रही है।
डिजिटल मार्केटिंग
ऑनलाइन बिजनेस और सोशल मीडिया के विस्तार ने डिजिटल मार्केटिंग को एक मजबूत करियर विकल्प बना दिया है। आज लगभग हर कंपनी अपने प्रोडक्ट और सेवाओं के प्रचार के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रही है।
Digital Marketing से जुड़े कोर्स में SEO, सोशल मीडिया मार्केटिंग, कंटेंट क्रिएशन और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। छोटे स्टार्टअप से लेकर बड़ी कंपनियों तक डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
टीचर ट्रेनिंग और बीएड कोर्स
शिक्षा के क्षेत्र में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। शिक्षक बनने की इच्छा रखने वाले छात्रों के लिए नए अवसर खुल रहे हैं। हाल ही में National Council for Teacher Education (NCTE) ने एक वर्षीय Bachelor of Education (BEd) कोर्स को फिर से शुरू करने का फैसला किया है।
इस कदम से छात्रों को कम समय में शिक्षक बनने का मौका मिलेगा और शिक्षा क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
स्किल बेस्ड और शॉर्ट टर्म कोर्स
आज के समय में कई छात्र लंबे डिग्री कोर्स के बजाय ऐसे कोर्स करना पसंद कर रहे हैं जो कम समय में उन्हें नौकरी के लिए तैयार कर दें। कम्युनिकेशन स्किल्स, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट, कोडिंग बूटकैंप और एआई आधारित सर्टिफिकेट कोर्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
ये कोर्स छात्रों को व्यावहारिक कौशल सिखाते हैं, जिससे वे जल्दी नौकरी के लिए तैयार हो जाते हैं। खासकर डिजिटल और टेक सेक्टर में ऐसे शॉर्ट टर्म कोर्स की मांग लगातार बढ़ रही है।
बदलती शिक्षा व्यवस्था में नई दिशा
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में शिक्षा का फोकस केवल डिग्री पर नहीं बल्कि कौशल आधारित सीखने पर होगा। नई तकनीकों और डिजिटल अर्थव्यवस्था के कारण कई नए करियर विकल्प सामने आ रहे हैं।
ऐसे में छात्रों के लिए जरूरी है कि वे अपने रुचि और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कोर्स का चयन करें। सही कोर्स और सही कौशल के साथ युवा तेजी से बदलते जॉब मार्केट में बेहतर अवसर हासिल कर सकते हैं।
भारत में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हर साल मनाया जाता है, लेकिन इसे सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धियों को याद करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम विज्ञान को सच में अपनी जिंदगी और कार्यसंस्कृति का हिस्सा बना पाए हैं? अगर भारत को विकसित राष्ट्र बनना है, तो इसका रास्ता केवल आर्थिक सुधारों से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समाज में गहराई से स्थापित करने से होकर गुजरता है।
आज भी हमारे स्कूलों में रटने वाली शिक्षा हावी है, जबकि विज्ञान की असली भावना सवाल पूछने, प्रयोग करने और गलतियों से सीखने में है। बच्चों में जिज्ञासा तभी पैदा होती है जब उन्हें यह आज़ादी दी जाती है कि वे चीजों को समझें, छूकर देखें, और प्रयोगशाला में खुद अनुभव करें। अब भी देश के कई स्कूल इस स्तर पर काफी पीछे हैं।
विज्ञान शिक्षा पर निवेश: अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी
सरकार की पहलें स्वागतयोग्य हैं। अटल टिंकरिंग लैब्स ने एक बड़े स्तर पर विज्ञान शिक्षा को आधुनिक चेहरा दिया है। 10,000 से ज्यादा लैब्स स्थापित हो चुकी हैं और 50,000 और बनने का लक्ष्य है। यह संख्या देखने में बड़ी लगती है, लेकिन देश की आबादी और स्कूलों की संख्या को देखते हुए यह केवल शुरुआत है।
मेरा स्पष्ट मत है कि विज्ञान शिक्षा को गाँव-गाँव तक पहुंचाना होगा। सिर्फ शहरों में लैब्स खोलने से वैज्ञानिक चेतना नहीं आएगी। ग्रामीण बच्चों में वही क्षमता है, वही जिज्ञासा है—जरूरत केवल अवसर और सही दिशा की है।
बच्चों को विज्ञान से जोड़ने की कोशिशें—अच्छी लेकिन अभी अधूरी
सीएसआईआर का ‘जिज्ञासा कार्यक्रम’ और इसरो का युविका कार्यक्रम वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने में शानदार पहल हैं। युविका में बच्चों को अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से मिलने और रॉकेट मॉडल बनाने का मौका मिलता है—यह अनुभव किसी भी बच्चे की सोच बदल सकता है।
लेकिन समस्या यह है कि ऐसे कार्यक्रम सीमित संख्या में छात्रों तक पहुंच पाते हैं। हमें ऐसे कार्यक्रमों को स्कूल स्तर पर अनिवार्य बनाना चाहिए, ताकि हर बच्चा कम से कम वर्ष में एक बार प्रयोग आधारित सीखने से गुजरे।
एनसीईआरटी की राष्ट्रीय बाल वैज्ञानिक प्रदर्शनी और राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस भी बड़ी पहलें हैं, लेकिन इनका प्रभाव तभी बढ़ेगा जब स्कूल इन्हें औपचारिकता की तरह नहीं, बल्कि विज्ञान से बच्चों को जोड़ने की गंभीर प्रक्रिया के रूप में अपनाएँ।
उद्योग–शिक्षा साझेदारी की बड़ी कमी
भारत में विज्ञान की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि शोध प्रयोगशालाओं और उद्योग जगत के बीच की दूरी बहुत ज्यादा है। इसरो जैसे संस्थानों ने दुनिया में पहचान बनाई है, लेकिन हर संस्थान इस स्तर पर क्यों नहीं पहुँच पा रहा?
क्योंकि उद्योग जगत शायद ही कभी विश्वविद्यालयों के साथ लंबे समय के शोध प्रोजेक्ट बनाता है। दुनिया के विकसित देशों में विश्वविद्यालय–उद्योग साझेदारी ही अनुसंधान की असली ताकत है। भारत में यह संस्कृति अभी बहुत कमजोर है।
जब तक उद्योग जगत अपनी जरूरतों के अनुरूप शोध संस्थानों के साथ ठोस साझेदारी नहीं करेगा, तब तक नवाचार आम लोगों के जीवन तक नहीं पहुँच पाएगा।
विज्ञान को जीवन और समाज से जोड़ना होगा
वैज्ञानिक शोध तभी सार्थक है जब वह लोगों के जीवन को सहज और सरल बना सके। सिर्फ पीएचडी डिग्री हासिल करना शोध नहीं है। शोध तब सफल होता है जब उसका परिणाम समाज के लिए उपयोगी बन सके, जब आम आदमी उसे समझ सके और अपनाए।
भारत में विज्ञान को एक कठिन विषय की तरह देखा जाता है, जबकि होना यह चाहिए कि विज्ञान रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बने। बच्चे सवाल पूछें, बड़े तर्क से सोचें और समाज अंधविश्वास की बजाय वैज्ञानिक समझ को आगे बढ़ाए—यह तभी होगा जब विज्ञान को हम जीवन से जोड़ें, न कि केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखें।
वैज्ञानिक सोच ही भारत की असली ताकत बन सकती है
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हमें सिर्फ अतीत की उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को वैज्ञानिक सोच से मजबूत करने के लिए प्रेरित करता है। भारत के पास क्षमता है, संसाधन हैं और दुनिया के कुछ बेहतरीन वैज्ञानिक संस्थान भी।
अब जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक सोच को स्कूलों में, समाज में और उद्योग जगत में गहराई से स्थापित किया जाए। जब बच्चे सवाल पूछने लगेंगे, शिक्षक प्रयोग करवाने लगेंगे और उद्योग शोध को बढ़ावा देने लगेगा—तभी भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाएगा।
दुनिया भर में आज आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल लर्निंग की तेज़ रफ्तार दिख रही है। कई देश स्कूल स्तर पर भी AI और तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं। चीन जैसे देशों में बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही AI की शिक्षा दी जा रही है। ऐसे समय में एक यूरोपीय देश ने ठीक उलटा कदम उठाकर वैश्विक बहस छेड़ दी है।
यह देश है Sweden, जहां स्कूलों में एक बार फिर किताबें लौट रही हैं और डिजिटल एजुकेशन मॉडल की समीक्षा की जा रही है।
डिजिटल एजुकेशन से वापसी की वजह
स्वीडन अपने उच्च शिक्षा मानकों के लिए जाना जाता है और 2009 से यहां स्कूलों में बड़े पैमाने पर डिजिटल लर्निंग लागू की गई थी। टैबलेट, स्मार्ट क्लासरूम और कंप्यूटर के जरिए बच्चों को पढ़ाना आधुनिक और उपयोगी माना गया।
लेकिन लगभग 15 साल बाद सरकार को महसूस हुआ कि यह प्रयोग बच्चों के सीखने की क्षमता पर अनचाहा बोझ डाल रहा है।
रिसर्च में सामने आया कि लगातार स्क्रीन पर पढ़ने से आंखों पर तनाव बढ़ रहा है और बच्चों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है। तेज रोशनी वाली स्क्रीन ने याद रखने और समझने की दक्षता पर भी नकारात्मक असर डाला।
कई शिक्षक और अभिभावक इस बात से परेशान थे कि डिजिटल डिवाइस पढ़ाई से ज्यादा ध्यान भटकाने वाले बन गए थे। कक्षाओं में छात्र गेम खेलने और इंटरनेट पर समय बिताने लगे, जिससे उनकी स्कूली परफॉर्मेंस और सामाजिक कौशल दोनों प्रभावित होने लगे।
सरकार ने मानी गलती, अब लौट रही हैं किताबें
स्वीडिश अधिकारियों ने स्वीकार किया कि डिजिटल शिक्षा को तेजी से अपनाते समय दीर्घकालिक प्रभावों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया।
स्थिति को सुधारने के लिए सरकार ने 104 अरब यूरो यानी लगभग 1100 करोड़ रुपये खर्च कर स्कूलों में फिर से किताबें उपलब्ध करानी शुरू कर दी हैं।
उद्देश्य यह है कि हर बच्चा किताब से पढ़ सके और स्क्रीन निर्भरता से दूरी बना सके। सरकार का मानना है कि किताबें न केवल एकाग्रता बढ़ाती हैं बल्कि पढ़ने-लिखने की बुनियादी स्किल को भी मजबूत बनाती हैं।
शैक्षणिक अधिकारियों के अनुसार, पिछले वर्षों में बच्चों में रीडिंग और राइटिंग स्किल का गिरना चिंता का विषय बन गया था। विशेषज्ञों ने बताया कि शुरुआती उम्र से ही टैबलेट और स्क्रीन पर निर्भरता ने स्किल डेवलपमेंट पर असर डाला।
डिजिटल बंद नहीं, लेकिन ‘संतुलन’ पर जोर
स्वीडन ने डिजिटल उपकरणों को पूरी तरह बंद नहीं किया है। सरकार का कहना है कि स्क्रीन का इस्तेमाल तभी होगा, जब उसकी वास्तविक जरूरत हो।
क्लासरूम में डिजिटल टूल्स का प्रयोग अब अधिक संतुलित, नियंत्रित और शिक्षण उद्देश्यों के अनुरूप किया जाएगा, ताकि तकनीक पढ़ाई में मदद करे, बाधा नहीं बने।
जब पूरी दुनिया शिक्षा के डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रही है, स्वीडन का यह कदम एक महत्वपूर्ण संकेत देता है—तकनीक जरूरी है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग उससे भी ज्यादा जरूरी।
किताबों की वापसी दिखाती है कि सीखने की मूल प्रक्रिया में अभी भी पारंपरिक साधन अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।
स्वीडन के इस फैसले ने कई देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या डिजिटल एजुकेशन की दौड़ में कहीं बच्चों की मूल सीखने की क्षमता प्रभावित तो नहीं हो रही।
Kerala High Court ने फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2 - गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज पर 15 दिनों की अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत का यह निर्णय दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया, जिनमें फिल्म के Central Board of Film Certification से मिले सर्टिफिकेट को चुनौती दी गई थी। फिल्म आज यानी 27 फरवरी को रिलीज होने वाली थी, लेकिन अब यह रोक आगे के आदेश तक लागू रहेगी।
पहली नजर में सेंसर बोर्ड की चूक: हाई कोर्ट
जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने अपने आदेश में कहा कि शुरुआती नजर में लगता है कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म को प्रमाणित करते समय सोच-समझकर निर्णय नहीं लिया। अदालत ने यह भी कहा कि फिल्म से सामाजिक सौहार्द प्रभावित न हो, इसके लिए जिन दिशानिर्देशों का अनुपालन होना चाहिए था, उनका पालन नहीं हुआ।
याचिकाओं में क्या कहा गया?
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ‘द केरल स्टोरी 2’ में राज्य को गलत तरीके से दिखाया गया है। उनका कहना है कि फिल्म का शीर्षक, ट्रेलर और प्रमोशनल सामग्री ऐसी है, जो समाज में तनाव बढ़ा सकती है और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा कर सकती है। एक याचिका में फिल्म के टाइटल से “केरल” शब्द हटाने की भी मांग की गई है।
सोशल मीडिया पर विवाद की पृष्ठभूमि
निर्माता विपुल अमृतलाल शाह के प्रोडक्शन में बनी इस फिल्म को ट्रेलर रिलीज के बाद तीखी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा। एक सीन में जबरदस्ती एक महिला को प्रतिबंधित मांस खिलाए जाने का दृश्य सामने आया, जिस पर कई यूजर्स और संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई।
कोर्ट ने फिल्म देखने की जताई इच्छा
सुनवाई के दौरान अदालत ने फिल्म को खुद देखने की इच्छा जताई। फिल्म मेकर्स की ओर से बताया गया कि ‘द केरल स्टोरी 2’ को सेंसर बोर्ड से मंजूरी मिली है, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि सेंसर बोर्ड ने फिल्मों के प्रमाणन के लिए तय नियमों और संवेदनशील विषयों पर लागू दिशानिर्देशों को गंभीरता से नहीं माना।
अब आगे क्या?
15 दिनों की इस अंतरिम रोक के दौरान कोर्ट याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई करेगा। उस दौरान यह तय हो सकता है कि फिल्म में बदलाव होंगे, टाइटल में संशोधन होगा या फिर सेंसर बोर्ड को अपने निर्णय पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया जाएगा।
फिल्म की रिलीज पर लगा यह रोक एक बार फिर उन सवालों को सामने लाती है कि संवेदनशील विषयों पर आधारित फिल्मों को प्रमाणित करते समय पारदर्शिता और जिम्मेदारी किस हद तक निभाई जा रही है।
बिहार के गया जिले में स्थित मगध विश्वविद्यालय ने प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व के अध्ययन को नई दिशा देने के लिए 1960 में इतिहास विभाग से अलग एक नया विभाग स्थापित किया था। उस दौर में यह महसूस किया गया कि प्राचीन भारत के विस्तृत और विशिष्ट अध्ययन के लिए अलग कौशलों की आवश्यकता होती है। इन्हीं जरूरतों को समझते हुए विभाग की स्थापना की गई, जो आज भी इस क्षेत्र में अनुसंधान और शिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
विभाग का मुख्य उद्देश्य भारत की प्राचीन विरासत के पुनर्निर्माण में सहायता करना है। इसके लिए यहां पुरातत्व, शिलालेख विज्ञान, पुरालेख विज्ञान, प्राचीन भाषाओं और मुद्राशास्त्र जैसे विषयों में विशेषज्ञता प्रदान की जाती है। समय के साथ यह विभाग न केवल भारतीय पुरातत्व और संस्कृति, बल्कि एशियाई सभ्यताओं के अध्ययन में भी अग्रणी बनकर उभरा है। वर्तमान में यहां प्रागैतिहासिक काल, प्रारंभिक ऐतिहासिक पुरातत्व, प्राचीन भारतीय संस्कृति और एशियाई अध्ययन से जुड़े अनुभवी विशेषज्ञ शिक्षण कार्य संभाल रहे हैं।
विभाग दो प्रमुख पाठ्यक्रम संचालित करता है—दो वर्षीय स्नातकोत्तर एमए (प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व) और चार वर्षीय बीए (प्राचीन भारतीय एवं एशियाई अध्ययन), जिसे सीबीसीएस पैटर्न के तहत तैयार किया गया है। इन पाठ्यक्रमों का मकसद छात्रों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से उन्हें क्षेत्रीय अध्ययन में दक्ष बनाना है।
विभाग की अध्यक्ष डाॅ अलका मिश्रा के अनुसार इस विषय की बिहार में बड़ी उपयोगिता है, क्योंकि राज्य सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। वे बताती हैं कि विभाग छात्रों को कक्षा शिक्षण के साथ-साथ फील्ड वर्क और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी देता है। विभाग के पास अपना संग्रहालय है, जहां विद्यार्थी पुरातात्विक सामग्री का अध्ययन करते हैं। इसके अलावा गुरुआ प्रखंड के दुब्बा गांव में विभाग को आधिकारिक उत्खनन लाइसेंस प्राप्त है, जिसके अंतर्गत छात्र प्रत्यक्ष पुरातात्विक कार्यों में भाग लेते हैं। इससे उन्हें शोध और फील्ड स्टडी की वास्तविक समझ मिलती है।
डाॅ मिश्रा कहती हैं कि कला एवं वास्तुकला, शिलालेख विज्ञान, संग्रहालय विज्ञान, विरासत प्रबंधन और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में करियर बनाने के इच्छुक छात्रों के लिए यह कोर्स विशेष रूप से लाभकारी है। बिहार की ऐतिहासिक संपन्नता को देखते हुए राज्य के युवाओं के लिए यह विषय न केवल ज्ञानवर्धक है, बल्कि अवसरों से भरा हुआ भी है।
मगध विश्वविद्यालय में जहां पीजी स्तर पर यह पाठ्यक्रम उपलब्ध है, वहीं कई संबद्ध कॉलेजों में स्नातक स्तर की पढ़ाई भी कराई जाती है। विभाग का उद्देश्य अगली पीढ़ी को भारत की प्राचीन धरोहर से जोड़ना और इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने के लिए प्रशिक्षित करना है।
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एडइनबॉक्स: शैक्षिक समाचारों का भरोसेमंद स्रोत
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विविधतापूर्ण सामग्री: एडइनबॉक्स दुनियाभर से शिक्षा के तमाम पहलुओं का समावेश करते हुए लेख, साक्षात्कार, वीडियो और पॉडकास्ट सहित विविध प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराता है। चाहे आपकी रुचि के विषयों में के-12 शिक्षा, उच्च शिक्षा, एडटेक, या शैक्षिक नीतियां शामिल हों, एडइनबॉक्स पर आपको इससे संबंधित प्रासंगिक और महत्वपूर्ण सामग्री मिलेगी।
समय पर अपडेट: शिक्षा तेज गति से विकास कर रहा क्षेत्र है, जहां की नवीनतम गतिविधियों से अपडेट रहना हर किसी के लिए जरूरी है। और, एडइनबॉक्स वह मंच है जो शिक्षा जगत की हर नवीन जानकारियों को समय पर आप तक पहुंचाकर आपको अपडेट करता है। यह सुनिश्चित करता है कि आप इस क्षेत्र की हर गतिविधि को लेकर जागरूक रहें। चाहे वह ब्रेकिंग न्यूज हो या इसका गहन विश्लेषण, आप खुद को अपडेट रखने के लिए एडइनबॉक्स पर भरोसा कर सकते हैं।
विशेषज्ञ अंतदृष्टि: एडइनबॉक्स का संबंध शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों और विचारवान प्रणेताओं से है। ख्यात शिक्षकों और शोधकर्ताओं से लेकर नीति निर्माताओं और उद्योग के पेशेवरों तक, आप इस मंच पर मूल्यवान अंतदृष्टि और दृष्टिकोण से परिचित होंगे जो आपको न सिर्फ जागरूक करता है बल्कि आपके निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी धारदार बनाता है।
इंटरएक्टिव समुदाय: एडइनबॉक्स पर आप शिक्षकों, प्रशासकों, छात्रों और अभिभावकों के एक सक्रिय व जीवंत समूह के साथ जुड़ सकते हैं। इस मंच पर आप अपने विचार साझा करें, प्रश्न पूछें, और उन विषयों पर चर्चा में भाग लें जो आपके लिए महत्वपूर्ण हैं। समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से जुड़ें और अपने पेशेवर नेटवर्क का भी विस्तार करें।
यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस: एडइनबॉक्स की खासियत है, यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस। यह आपकी रुचि की सामग्री को नेविगेट करना और खोजना आसान बनाता है। चाहे आप लेख पढ़ना, वीडियो देखना या पॉडकास्ट सुनना पसंद करते हों, आप एडइनबॉक्स पर सब कुछ मूल रूप से एक्सेस कर सकते हैं।
तेजी से बदलते शैक्षिक परिदृश्य में, इस क्षेत्र की हर गतिविधि से परिचित होना निहायत जरूरी है। एडइनबॉक्स एक व्यापक मंच प्रदान करता है जहां आप शिक्षा जगत के नवीनतम समाचारों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं, विशेषज्ञों और समूहों के साथ जुड़ सकते हैं और शिक्षा के भविष्य को आकार देने वाली नई पहल को लेकर अपडेट रह सकते हैं। चाहे आप एक शिक्षक हों जो नवीन शिक्षण पद्धतियों की तलाश में हों, नीतियों में बदलाव पर नजर रखने वाले व्यवस्थापक हों, या आपके बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित माता-पिता, एडइनबॉक्स ने हर किसी की चिंताओं-आवश्यकताओं को समझते हुए इस मंच को तैयार किया है। आज ही एडिनबॉक्स पर जाएं और शिक्षा पर एक वैश्विक विमर्श में शामिल हों!
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