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Indian Institute of Technology Guwahati के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई है कि स्कूलों में कार्यसंस्कृति और नेतृत्व की शैली शिक्षकों के भावनात्मक स्वास्थ्य और नौकरी से संतुष्टि को किस तरह प्रभावित करती है। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल Qualitative Research in Organisations and Management में प्रकाशित हुआ है।

इस शोध में ‘वर्कप्लेस ऑथेंटिसिटी’ यानी कार्यस्थल पर अपनी वास्तविक पहचान के साथ सहज रहने की अवधारणा पर विशेष ध्यान दिया गया है। अध्ययन के मुताबिक, स्कूलों में मौजूद पदानुक्रम (हायरार्की) इस बात को काफी हद तक तय करता है कि शिक्षक अपने सहकर्मियों और वरिष्ठों के साथ कितनी सहजता से बातचीत कर पाते हैं।

रिपोर्ट बताती है कि शिक्षक कक्षा में छात्रों के साथ बातचीत के दौरान खुद को ज्यादा स्वाभाविक और सहज महसूस करते हैं। वहीं, संस्थागत दबाव और वरिष्ठता से जुड़े माहौल के कारण वे कई बार अपनी असली सोच या व्यक्तित्व के कुछ पहलुओं को कार्यस्थल पर व्यक्त नहीं कर पाते। इस असंतुलन का असर उनके तनाव स्तर और नौकरी से संतुष्टि पर पड़ता है।

अध्ययन से जुड़े Abraham Cyril Issac, जो आईआईटी गुवाहाटी के स्कूल ऑफ बिजनेस में सहायक प्रोफेसर हैं, ने कहा, “कक्षा में वास्तविकता (ऑथेंटिसिटी) शिक्षण को जीवंत बनाती है, लेकिन संस्थान के अन्य हिस्सों में इसकी कमी इसे दबा देती है।”

यह अध्ययन 30 उच्च माध्यमिक स्कूल शिक्षकों के जवाबों के गुणात्मक विश्लेषण पर आधारित है। इन जवाबों को ओपन-एंडेड निबंध प्रश्नों के माध्यम से एकत्र किया गया था। शोधकर्ताओं ने ‘गियोइया मेथड’ का उपयोग करते हुए मुख्य पैटर्न और विषयों की पहचान की और ‘टीचर वर्कप्लेस ऑथेंटिसिटी इम्पैक्ट मॉडल’ (TWAIM) नामक एक ढांचा विकसित किया।

इस मॉडल के अनुसार, जिन शिक्षकों में ऑथेंटिसिटी का स्तर अधिक पाया गया, वे अपने संस्थान से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं और कार्यस्थल की चुनौतियों—जैसे काम का दबाव या आलोचना—से बेहतर तरीके से निपटते हैं। वहीं, जहां कार्यस्थल पर राजनीति और अत्यधिक दबाव का माहौल होता है, वहां खासकर नए शिक्षकों में आत्मविश्वास और सहजता कम देखी गई।

अध्ययन के निष्कर्षों पर टिप्पणी करते हुए इस्साक ने कहा, “शिक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ा सुधार ढांचे से नहीं, बल्कि संस्कृति से आता है। अगर शिक्षकों को खुद के रूप में काम करने की आजादी मिले, तो उनका प्रदर्शन अपने आप बेहतर होगा।”

शोध में यह भी सुझाव दिया गया है कि स्कूल अगर सहयोगी माहौल विकसित करें और नेतृत्व में पारदर्शिता व सहजता को बढ़ावा दें, तो शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य और संतुष्टि में सुधार हो सकता है। इसके अलावा, नेतृत्व प्रशिक्षण, काम के संतुलित वितरण और कार्यस्थल के व्यवहार से जुड़े स्पष्ट नियम भी इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।

शोधकर्ता आगे इस मॉडल की उपयोगिता को अलग-अलग संस्थानों में परखने के लिए मिश्रित शोध पद्धति (मिक्स्ड-मेथड) का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं। यह अध्ययन शिक्षा क्षेत्र में शिक्षकों की स्थिरता और कार्य परिस्थितियों पर चल रही चर्चाओं को नई दिशा देता है।

राष्ट्रीय राजधानी में स्कूल फीस को लेकर अभिभावकों की शिकायतों के बीच Directorate of Education Delhi ने बड़ा फैसला लिया है। निदेशालय ने सभी निजी, गैर-सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे फीस केवल मासिक आधार पर ही लें। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

निदेशालय के 30 अप्रैल को जारी आदेश में कहा गया है कि उसे अभिभावकों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं। इन शिकायतों में आरोप था कि कुछ स्कूल दो महीने, तिमाही या उससे अधिक अवधि की फीस अग्रिम में जमा कराने के लिए दबाव बना रहे थे। इससे कई परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा था।

नए निर्देश में स्पष्ट किया गया है कि कोई भी स्कूल एक बार में एक महीने से अधिक की फीस देना अनिवार्य नहीं कर सकता। यह फैसला पहले जारी दिशा-निर्देशों और Delhi High Court के आदेशों के अनुरूप है, जिसमें फीस संग्रह प्रक्रिया को अभिभावकों के लिए आसान और न्यायसंगत बनाने पर जोर दिया गया था। हालांकि, यदि अभिभावक अपनी सुविधा से एक से अधिक महीने की फीस एक साथ जमा करना चाहें, तो वे ऐसा कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए स्कूल की ओर से किसी प्रकार का दबाव या प्रलोभन नहीं होना चाहिए।

आदेश में यह भी साफ किया गया है कि स्कूल प्रवेश, नामांकन जारी रखने या किसी अन्य सेवा के लिए अग्रिम फीस को शर्त नहीं बना सकते। सभी स्कूलों को इस आदेश को अपने नोटिस बोर्ड पर प्रमुखता से प्रदर्शित करना होगा और सात कार्य दिवसों के भीतर अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर भी अपलोड करना अनिवार्य होगा, ताकि अभिभावकों को पूरी जानकारी मिल सके।

निदेशालय ने Delhi School Education Act 1973 का हवाला देते हुए कहा है कि नियमों का पालन नहीं करने पर कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। इसमें स्कूल की मान्यता रद्द करने या प्रबंधन अपने नियंत्रण में लेने जैसे कदम भी शामिल हैं।

सरकार का यह कदम खास तौर पर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों को राहत देने के लिए अहम माना जा रहा है। इससे न सिर्फ फीस भुगतान में पारदर्शिता आएगी, बल्कि अभिभावकों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव भी कम होने की उम्मीद है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और अनुशासन बढ़ाने के उद्देश्य से बिहार लोक सेवा आयोग यानी Bihar Public Service Commission (BPSC) ने बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) आधारित परीक्षाओं की उत्तर प्रणाली में बड़ा बदलाव किया है। आयोग की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, यह नई व्यवस्था आने वाली परीक्षाओं में लागू की जाएगी।

अब तक MCQ प्रश्नों में चार विकल्प—A, B, C और D—दिए जाते थे। अभ्यर्थियों के लिए किसी प्रश्न का उत्तर देना अनिवार्य नहीं था, जिसके चलते कई उम्मीदवार प्रश्नों को खाली छोड़ देते थे। इससे मूल्यांकन के दौरान समानता और स्पष्टता की कमी महसूस की जाती थी।

नई व्यवस्था के तहत अब हर प्रश्न के साथ पांच विकल्प दिए जाएंगे—A, B, C, D और E। इनमें ‘E’ का अर्थ होगा “प्रयास नहीं किया गया” यानी Not Attempted। अगर कोई अभ्यर्थी किसी प्रश्न को छोड़ना चाहता है, तो उसे ‘E’ विकल्प चुनना अनिवार्य होगा। वहीं, उत्तर देने की स्थिति में A, B, C या D में से किसी एक विकल्प का चयन करना होगा।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार पांचों विकल्पों में से किसी का चयन नहीं करता है, तो इसे अनुत्तरित माना जाएगा और उस प्रश्न के लिए 1/3 अंक की कटौती की जाएगी। यानी अब बिना कोई विकल्प चुने प्रश्न छोड़ना सीधे नुकसान का कारण बनेगा।

इस बदलाव के पीछे उद्देश्य यह है कि हर अभ्यर्थी अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज करे—चाहे वह उत्तर देना चाहता हो या प्रश्न छोड़ना। इससे मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक सटीक और निष्पक्ष होने की उम्मीद है।

परीक्षा की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए यह जरूरी है कि वे इस नई प्रणाली को समझें और उसी के अनुसार अभ्यास करें। परीक्षा के दौरान निर्देशों का पालन करना और हर प्रश्न के लिए सही विकल्प चुनना अब पहले से ज्यादा अहम हो गया है, ताकि अनावश्यक अंक कटौती से बचा जा सके।

दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने विधि संकाय के तहत 5 वर्षीय एकीकृत विधि कार्यक्रम—बीए एलएलबी (ऑनर्स) और बीबीए एलएलबी (ऑनर्स)—के लिए दाखिले की प्रक्रिया शुरू कर दी है। University of Delhi में इन प्रतिष्ठित कोर्सेज में प्रवेश के इच्छुक उम्मीदवार अब ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। आवेदन की अंतिम तिथि 18 मई 2026 रात 11:59 बजे तय की गई है।

विश्वविद्यालय की ओर से बताया गया है कि प्रवेश से जुड़ा विस्तृत शेड्यूल, जैसे सीट आवंटन और काउंसलिंग कार्यक्रम, बाद में आधिकारिक वेबसाइट पर जारी किया जाएगा। साथ ही, रजिस्ट्रेशन और सीट आवंटन के लिए जमा किया गया शुल्क किसी भी स्थिति में वापस नहीं किया जाएगा।

इन कोर्सों में दाखिले के लिए उम्मीदवारों का Common Law Admission Test (CLAT 2026) में शामिल होना अनिवार्य है। इसी परीक्षा के आधार पर मेरिट तय की जाएगी, जो देशभर के प्रमुख लॉ संस्थानों में प्रवेश का मुख्य माध्यम है।

आवेदन शुल्क की बात करें तो सामान्य, ओबीसी-एनसीएल और ईडब्ल्यूएस वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 1,500 रुपये निर्धारित किए गए हैं। वहीं, एससी, एसटी और दिव्यांग (PwBD) वर्ग के अभ्यर्थियों को 1,000 रुपये शुल्क देना होगा। आवेदन के दौरान उम्मीदवारों को फोटो, हस्ताक्षर, शैक्षणिक प्रमाण पत्र और श्रेणी प्रमाण पत्र (यदि लागू हो) की स्कैन कॉपी अपलोड करनी होगी। सभी दस्तावेज निर्धारित साइज और फॉर्मेट में होने चाहिए।

पात्रता मानदंड के अनुसार, उम्मीदवार का किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से कक्षा 12 या समकक्ष परीक्षा उत्तीर्ण होना जरूरी है। सामान्य, ईडब्ल्यूएस और ओबीसी-एनसीएल वर्ग के लिए न्यूनतम 45 प्रतिशत अंक अनिवार्य हैं, जबकि एससी, एसटी और PwBD वर्ग के लिए यह सीमा 40 प्रतिशत तय की गई है। जिन छात्रों के 2026 में 12वीं में कंपार्टमेंट आए हैं, वे इस शैक्षणिक सत्र के लिए पात्र नहीं होंगे।

आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है। उम्मीदवारों को दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ एडमिशन पोर्टल पर जाकर पहले नया अकाउंट बनाना होगा। इसके बाद व्यक्तिगत जानकारी, शैक्षणिक विवरण और कोर्स प्राथमिकता भरनी होगी। जरूरी दस्तावेज अपलोड करने के बाद नेट बैंकिंग, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या UPI के जरिए शुल्क का भुगतान करना होगा। आवेदन सबमिट करने के बाद कन्फर्मेशन पेज और शुल्क रसीद डाउनलोड कर सुरक्षित रखना जरूरी है।

देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शामिल दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ की पढ़ाई के लिए हर साल बड़ी संख्या में छात्र आवेदन करते हैं। ऐसे में समय सीमा के भीतर सही जानकारी के साथ आवेदन करना और सभी दस्तावेजों को सावधानी से अपलोड करना बेहद जरूरी है, ताकि आगे की प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कत न आए।

कक्षा 11 और 12 के छात्रों के लिए पढ़ाई को आसान और सुलभ बनाने की दिशा में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने एक अहम कदम उठाया है। National Council of Educational Research and Training (NCERT) ने ‘स्वयं’ प्लेटफॉर्म पर मुफ्त ऑनलाइन कोर्स शुरू किए हैं, जिनका उद्देश्य छात्रों को घर बैठे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है।

ये कोर्स SWAYAM (Study Webs of Active-Learning for Young Aspiring Minds) पर उपलब्ध हैं और इसमें कुल 11 विषय शामिल किए गए हैं। इनमें अकाउंटेंसी, बायोलॉजी, केमिस्ट्री, इकोनॉमिक्स, जियोग्राफी, फिजिक्स, मैथ्स, साइकोलॉजी, सोशियोलॉजी, बिजनेस स्टडीज और इंग्लिश जैसे मुख्य विषय शामिल हैं। हर कोर्स की अवधि 21 सप्ताह तय की गई है, ताकि छात्र विषयों को गहराई से समझ सकें।

एनसीईआरटी के मुताबिक, इन कोर्सों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि छात्र अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी और कहीं से भी पढ़ाई कर सकते हैं। कोर्स में वीडियो लेक्चर, इंटरैक्टिव कंटेंट, डिस्कशन फोरम और विषय विशेषज्ञों का मार्गदर्शन दिया जाएगा। इससे छात्रों को सिर्फ किताबों तक सीमित रहने के बजाय एक बेहतर और व्यावहारिक सीखने का अनुभव मिलेगा।

कोर्स पूरा करने के बाद छात्रों को अपनी तैयारी परखने के लिए सेल्फ-असेसमेंट और क्विज का विकल्प मिलेगा। अंतिम परीक्षा पास करने वाले छात्रों को प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा, जो आगे की पढ़ाई और करियर में मददगार हो सकता है।

इन कोर्सों के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 1 सितंबर तय की गई है। असेसमेंट के लिए रजिस्ट्रेशन 7 से 9 सितंबर के बीच होगा, जबकि फाइनल परीक्षा 10 से 15 सितंबर के बीच आयोजित की जाएगी। कोर्स का समापन 15 सितंबर को होगा।

आवेदन की प्रक्रिया भी आसान रखी गई है। छात्र SWAYAM की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं और अपनी पसंद के कोर्स में नामांकन कर सकते हैं। इसके अलावा, Central Institute of Educational Technology की वेबसाइट के माध्यम से भी इन कोर्सों तक पहुंचा जा सकता है।

शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल माध्यम को बढ़ावा देने की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे न केवल छात्रों को बेहतर संसाधन मिलेंगे, बल्कि वे अपनी गति और सुविधा के अनुसार पढ़ाई कर सकेंगे, जो आज के समय की बड़ी जरूरत बन चुकी है।

मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) ने प्री एग्रीकल्चर टेस्ट (PAT) 2026 के लिए एडमिट कार्ड जारी कर दिए हैं। जिन अभ्यर्थियों ने इस परीक्षा के लिए आवेदन किया था, वे अब आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर अपना प्रवेश पत्र डाउनलोड कर सकते हैं। परीक्षा से पहले यह एक अहम चरण माना जा रहा है, क्योंकि बिना एडमिट कार्ड के परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

यह परीक्षा 8 मई 2026 को आयोजित की जाएगी। राज्य में कृषि और उससे जुड़े विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए यह परीक्षा प्रमुख माध्यम है। इस साल आवेदन प्रक्रिया 24 मार्च से शुरू होकर 7 अप्रैल 2026 तक चली थी। अब परीक्षा नजदीक आने के साथ ही उम्मीदवारों को अपनी तैयारी को अंतिम रूप देने की सलाह दी जा रही है।

एडमिट कार्ड जारी होने के बाद अभ्यर्थियों के लिए जरूरी है कि वे उसमें दर्ज सभी जानकारी ध्यान से जांच लें। इसमें नाम, परीक्षा केंद्र, तिथि और समय जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां शामिल होती हैं। अगर किसी भी तरह की गलती नजर आती है, तो तुरंत संबंधित प्राधिकरण से संपर्क करना चाहिए, ताकि परीक्षा के दिन किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।

परीक्षा केंद्र पर एडमिट कार्ड के साथ एक वैध पहचान पत्र ले जाना भी जरूरी होगा। बिना प्रिंटेड एडमिट कार्ड के प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी। उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे समय से पहले परीक्षा केंद्र पहुंचें और जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें।

एडमिट कार्ड डाउनलोड करने के लिए उम्मीदवारों को MPESB की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर “Test Admit Card” सेक्शन में जाना होगा। वहां “Pre Agriculture Test (PAT) 2026 Admit Card” लिंक पर क्लिक करना होगा। इसके बाद आवेदन संख्या या एनरोलमेंट नंबर, जन्म तिथि और अन्य जरूरी जानकारी भरनी होगी। कुछ मामलों में मां के नाम के शुरुआती अक्षर और आधार संख्या के अंतिम चार अंक भी मांगे जा सकते हैं। सभी विवरण भरने और कैप्चा दर्ज करने के बाद एडमिट कार्ड स्क्रीन पर दिखाई देगा, जिसे डाउनलोड कर प्रिंट लेना आवश्यक है।

कृषि क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए यह परीक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में अभ्यर्थियों को पूरी तैयारी और सतर्कता के साथ परीक्षा में शामिल होने की जरूरत है, ताकि बेहतर परिणाम हासिल किया जा सके।

 रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया से खास बातचीत

भारतीय पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक रामनाथ गोयनका अवार्ड से इस वर्ष सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया आज हिंदी मीडिया जगत का एक जाना-पहचाना नाम हैं। जमीनी रिपोर्टिंग, संवेदनशील मुद्दों पर पैनी नजर और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले आकोदिया ने अपने काम के जरिए लगातार यह साबित किया है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी है।

फिलहाल देश के प्रमुख हिंदी अखबार दैनिक भास्कर से जुड़े अवधेश आकोदिया ने अपने करियर में कई अहम रिपोर्ट्स के जरिए जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया है। उनकी पत्रकारिता में ईमानदारी, जोखिम उठाने का साहस और आम लोगों की आवाज को मंच देने की प्रतिबद्धता साफ नजर आती है।

इस विशेष बातचीत में हम उनसे जानेंगे उनके पत्रकारिता सफर की कहानी, इस सम्मान तक पहुंचने का अनुभव, रिपोर्टिंग के दौरान आई चुनौतियां और आज के दौर में मीडिया की बदलती भूमिका पर उनका नजरिया। पेश है एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' से अवधेश आकोदिया की हुई लंबी वार्ता के सम्पादित अंश:

  1. सबसे पहले, इस वर्ष रामनाथ गोयनका अवार्ड प्राप्त करने पर आपको कैसा महसूस हुआ?

- यह सम्मान पाना हर भारतीय पत्रकार का सपना होता है। मुझे बेहद गर्व और विनम्रता का अनुभव हो रहा है। यह अवार्ड सिर्फ मेरे काम की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने की जीत है जिसे मैंने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए उजागर किया। इससे यह हौसला मिलता है कि सच्ची पत्रकारिता की कीमत आज भी सबसे ज्यादा है।

  1. इस पुरस्कार के लिए चुने गए आपके स्टोरी/रिपोर्ट की प्रेरणा क्या थी?

- जयपुर में जब फर्जी एनओसी के सहारे अंग प्रत्यारोपण का मामला सामने आया, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ कुछ डॉक्टरों की मिलीभगत नहीं हो सकती। एक मरीज 35 लाख रुपए दे रहा था और अपनी जान दांव पर लगाने वाले गरीब डोनर को सिर्फ 3 लाख मिल रहे थे। अंतरराष्ट्रीय किडनी माफिया द्वारा गरीबों की इस मजबूरी का फायदा उठाना ही मेरे लिए इस नेक्सस की जड़ों तक जाने की सबसे बड़ी प्रेरणा बना।

  1. रिपोर्ट तैयार करते समय किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और आपने उन्हें कैसे पार किया?

- बांग्लादेश के ढाका में जाकर अंडरकवर ऑपरेशन करना सबसे बड़ी चुनौती थी। भाषा की दीवार, तंग गलियों में डोनर्स को खोजना और पकड़े जाने का जोखिम बहुत बड़ा था। एक बार रिसिपिएंट के रिश्तेदार ने खुद को इंटेलिजेंस अधिकारी बताकर मेरी कड़ी पूछताछ भी की थी। लेकिन पुख्ता दस्तावेजों, गहरी तैयारी और एक स्थानीय ड्राइवर की मदद से मैंने इस ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाया।

  1. क्या आपको लगता है कि आज भी गंभीर और ग्राउंड-रिपोर्टिंग को पर्याप्त स्पेस मिल रहा है?

- बिल्कुल। अगर आपकी कहानी में दम है और वह जनता से जुड़ी है, तो स्पेस हमेशा मिलेगा। दैनिक भास्कर जैसे संस्थान आज भी लंबी और जोखिम भरी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीज को पहले पन्ने पर पूरी प्रमुखता देते हैं। पाठक आज भी असली 'खबर' पढ़ना चाहते हैं।

  1. आज की डिजिटल पत्रकारिता पारंपरिक पत्रकारिता से किस तरह अलग हो चुकी है?

- डिजिटल पत्रकारिता में तात्कालिकता है, वहां सूचना सेकंडों में पहुंचती है। लेकिन पारंपरिक पत्रकारिता गहराई, ठहराव और पुख्ता सबूतों पर काम करती है। डिजिटल आपको बताता है कि 'क्या हुआ', जबकि पारंपरिक पत्रकारिता यह बताती है कि 'क्यों और कैसे हुआ'।

  1. यूथ जर्नलिस्ट्स के लिए आप क्या सबसे महत्वपूर्ण कौशल मानते हैं?

- जिज्ञासा, धैर्य और दस्तावेजों को पढ़ने की क्षमता। सिर्फ बयानों पर खबरें न बनाएं, आरटीआई (RTI) लगाना सीखें और सरकारी रिकॉर्ड्स की गहराइयों में जाकर सच खोजना सीखें।

  1. क्या सोशल मीडिया ने पत्रकारिता में जानकारी की गुणवत्ता को प्रभावित किया है?

- दोनों तरह से किया है। इसने आवाज़ों को लोकतांत्रिक बनाया है और कई बार बड़ी लीड्स भी यहीं से मिलती हैं। लेकिन दूसरी तरफ, इसने अफवाहों और एजेंडा-आधारित सूचनाओं का अंबार भी लगा दिया है, जिससे पत्रकार का काम (फैक्ट-चेकिंग) और ज्यादा मुश्किल हो गया है।

  1. आप ‘स्पीड बनाम अक्यूरेसी’ की चुनौती को कैसे देखते हैं?

- मैं हमेशा 'अक्यूरेसी' (सटीकता) को चुनूंगा। एक गलत खबर तेजी से देकर विश्वसनीयता खोने से बेहतर है कि खबर थोड़ी देर से आए, लेकिन 100% सच हो। दस्तावेजों पर आधारित इन्वेस्टिगेशन में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती।

  1. जब आप किसी संवेदनशील मुद्दे पर ग्राउंड रिपोर्ट करने जाते हैं, आप तैयारी कैसे करते हैं?

- तैयारी ही सब कुछ है। फील्ड पर जाने से पहले मैं महीनों तक 'पेपर ट्रेल' फॉलो करता हूँ— कंपनियों के रिकॉर्ड, सरकारी टेंडर और ऑडिट रिपोर्ट्स खंगालता हूँ। अंडरकवर होने के लिए अपनी 'डमी प्रोफाइल' की एक-एक बारीकी तैयार करता हूँ ताकि फील्ड पर कोई चूक न हो।

  1. मैदान में रिपोर्टिंग करते समय आपका सबसे यादगार अनुभव कौन सा रहा?

- आरजीएचएस घोटाले का खुलासा सबसे यादगार रहा। मैंने एक 'डमी मरीज' बनकर सीने में दर्द की झूठी शिकायत की। सभी जांचें सामान्य होने के बावजूद मुझे 7 दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया और फर्जी बिल बनाए गए। मुझे बिना बीमारी के हैवी दवाइयां दी गईं, जिससे मैं वॉशरूम में गिर गया था। वह जानलेवा जोखिम था, लेकिन उस खुलासे से 6500 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा गया।

  1. फील्ड रिपोर्टिंग में सुरक्षा और मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखते हैं?

- इतने भारी और जोखिम भरे प्रोजेक्ट्स के बीच मैं खुद को शांत रखने के लिए साहित्य की ओर मुड़ता हूँ। बशीर बद्र और अल्लामा इकबाल की शायरी मुझे मानसिक सुकून और ऊर्जा देती है। इसके अलावा, पेशेवर तरीके से काम करना और भावनाओं में न बहना सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है।

  1. कहानी को मानव आवाज़ देने के लिए आप किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?

- मैं हमेशा यह देखता हूँ कि किसी बड़े घोटाले या नीतिगत नाकामी का सीधा असर अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति पर कैसे पड़ रहा है। सिस्टम की खामियों को जब किसी पीड़ित (चाहे वह शोषित डोनर हो या परेशान आम आदमी) के चेहरे और उसके दर्द के साथ दिखाया जाता है, तभी खबर में जान आती है।

  1. आज मीडिया पर पक्षपात के आरोप बढ़ रहे हैं। आप निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या करते हैं?

- मैं 'डॉक्यूमेंट्री एविडेंस' (दस्तावेजी सबूतों) पर भरोसा करता हूँ। बयान और विचारधाराएं पक्षपाती हो सकती हैं, लेकिन आरटीआई से निकले सरकारी आंकड़े, बैंक रिकॉर्ड और हिडन कैमरे की फुटेज कभी झूठ नहीं बोलते।

  1. फेक न्यूज़ और मिसइन्फॉर्मेशन के दौर में पत्रकार सत्यापन को कैसे मजबूत कर सकते हैं?

- पत्रकार को हमेशा मूल स्रोत तक जाना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर यकीन न करें। तकनीकी टूल्स का इस्तेमाल करें, क्रॉस-चेक करें और जब तक दो अलग-अलग स्वतंत्र स्रोतों से खबर की पुष्टि न हो जाए, उसे न छापें।

  1. क्या आपको लगता है कि मीडिया हाउसों पर बढ़ते कॉर्पोरेट दबाव से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित होती है?

- चुनौतियां हमेशा रही हैं, लेकिन अगर पत्रकार के पास अकाट्य सबूत हैं और संस्थान का संपादकीय नेतृत्व मजबूत है, तो अच्छी खबरें कभी नहीं रुकतीं। मैंने कॉरपोरेट और बड़े राजनीतिक गठजोड़ के खिलाफ रिपोर्टिंग की है और भास्कर ने हमेशा मेरे काम का समर्थन किया है।

  1. आज के न्यूज़ रूम में डेटा जर्नलिज़्म की क्या भूमिका देखते हैं?

- यह आज की खोजी पत्रकारिता की रीढ़ है। भ्रष्टाचार अब लिफाफों में नहीं, बल्कि टेंडरों, ग्रांट्स और डिजिटल ट्रांजैक्शन में होता है। डेटा में पैटर्न खोजना (जैसे एक ही कंपनी को बार-बार ठेका मिलना या फर्जी डीएनए डेटा का खेल) ही आज सबसे बड़ी खबरें दे रहा है।

  1. AI-आधारित टूल्स को आप पत्रकारिता के लिए खतरा मानते हैं या अवसर?

- यह एक बेहतरीन अवसर है। मैं व्यक्तिगत रूप से बड़ी रिपोर्ट्स को स्ट्रक्चर करने, डेटा विश्लेषण और यहां तक कि विजुअल्स (इमेज जनरेशन) के लिए AI का उपयोग करता हूँ। यह एक टूल है जो पत्रकार की क्षमता को बढ़ाता है, लेकिन फील्ड रिपोर्टिंग और मानवीय संवेदना की जगह कभी नहीं ले सकता।

  1. ग्राउंड रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने के लिए मीडिया संस्थानों को क्या कदम उठाने चाहिए?

- संस्थानों को पत्रकारों को समय और संसाधन देने चाहिए। इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग एक या दो दिन का काम नहीं है। एक रिपोर्टर को हफ्तों या महीनों तक एक विषय के पीछे लगने की आज़ादी और कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

  1. इस पुरस्कार के बाद आपका अगला लक्ष्य या प्रोजेक्ट क्या है?

- मैं सिस्टम में मौजूद 'डिजिटल और टेक्नोलॉजिकल सिंडिकेट्स' की गहराई में उतर रहा हूँ। जैसे ई-वेस्ट की तस्करी और एआई (AI) स्टार्टअप्स के नाम पर हो रहे सरकारी ग्रांट्स के घोटाले। मेरी कोशिश हमेशा उन अंधेरे कोनों को रोशन करने की रहती है जहां आम तौर पर किसी की नजर नहीं जाती।

  1. जर्नलिज़्म पढ़ रहे छात्रों के लिए आपकी तीन मुख्य सलाह क्या होंगी?

- पहली- खूब पढ़ें और खूब घूमें। दूसरी- सवाल पूछने से कभी न डरें। तीसरी- डेस्क डेस्क खेलने के बजाय फील्ड की धूल फांकें, असली खबरें सड़क और फाइलों के बीच ही मिलती हैं।

  1. क्या आप महसूस करते हैं कि शैक्षिक संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है?

- सिद्धांत अच्छी तरह पढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन जो चीजें फील्ड में सबसे ज्यादा काम आती हैं— जैसे आरटीआई फाइल करना, बैलेंस शीट पढ़ना, या डार्क वेब/डेटा स्क्रैपिंग— उन्हें पाठ्यक्रम में और अधिक व्यावहारिक रूप से शामिल करने की जरूरत है।

  1. आज के समय में क्षेत्रीय भाषाओं में पत्रकारिता का भविष्य कैसा दिखता है?

- क्षेत्रीय भाषाएं ही भारत की असली ताकत हैं। सबसे बड़ा इम्पैक्ट वहीं होता है जहां आम जनता आपकी बात समझती है। नीतियां भले ही दिल्ली में बनती हों, लेकिन उनका असर क्षेत्रीय स्तर पर ही दिखाई देता है, इसलिए भाषाई पत्रकारिता का भविष्य बेहद उज्ज्वल और शक्तिशाली है।

 

 

 

 

भौतिक विज्ञानी मोहम्मद सोइफ अहमद से खास बातचीत

महज 30 वर्ष की उम्र में मोहम्मद सोइफ अहमद प्रतिष्ठित इम्पीरियल कॉलेज लंदन में मैरी स्क्लोडोव्स्का-क्यूरी एक्शंस पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप के तहत अपने शोध प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन उनकी यह यात्रा अत्याधुनिक लैब से नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद के एक ऐसे गांव से शुरू हुई, जहां उनके घर में बिजली तक नहीं थी।

प्रश्न: आप बिना बिजली के बड़े हुए। शुरुआती दिनों की सबसे खास याद क्या है?

- मेरे घर में आठवीं कक्षा तक बिजली नहीं थी। हम रोशनी के लिए लालटेन का इस्तेमाल करते थे और पढ़ाई के लिए एक छोटी सी ढिबरी होती थी। मेरे दादा जितना वहन कर सकते थे, उतना करते थे। उस समय यह सब सामान्य लगता था—बस जिंदगी का हिस्सा था। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि उन्हीं परिस्थितियों ने मेरे अंदर अनुशासन और एकाग्रता विकसित की।

प्रश्न: अपनी शुरुआती स्कूली पढ़ाई के बारे में बताइए।

- मैंने कोमनगर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जहां बुनियादी सुविधाएं बहुत कम थीं। केवल एक इमारत थी जो दफ्तर के रूप में इस्तेमाल होती थी और हम आम के पेड़ के नीचे जूट की चटाई पर बैठकर पढ़ाई करते थे। लेकिन सीखने में कभी कोई कमी नहीं आई। दरअसल, वही साल मेरे लिए सबसे ज्यादा सीख देने वाले रहे।

प्रश्न: आपकी शिक्षा में परिवार की क्या भूमिका रही?

- मैं एक संयुक्त परिवार में बड़ा हुआ, जहां पांच बच्चे साथ पढ़ते थे। हम एक-दूसरे की मदद करते थे। गणित में कोई समस्या होती तो मैं अपने मामा से पूछता, और अंग्रेजी में मेरी मौसी मदद करती थीं। यह एक सहयोगी माहौल था। हमने कभी आर्थिक परेशानियों को बाधा के रूप में नहीं देखा।

प्रश्न: आपने आर्थिक तंगी का जिक्र किया है। इसका आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा?

- हम बहुत सादगी से रहते थे। सुबह का नाश्ता अक्सर नहीं होता था—कभी-कभी स्कूल जाने से पहले बिस्कुट या सत्तू खा लेते थे। जो भी स्थानीय रूप से उपलब्ध होता, वही खाते थे। कई बार कई दिनों तक कच्चे केले या कटहल ही खाना पड़ता था। मछली बहुत कम मिलती थी और मटन तो उससे भी कम। लेकिन हमें कभी कमी महसूस नहीं हुई। हमारे लिए पढ़ाई और खेल सबसे महत्वपूर्ण थे।

प्रश्न: आपके परिवार की स्थिति में बदलाव कब आया?

- सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब मेरे पिता को स्कूल शिक्षक की नौकरी मिली। इससे हमारे जीवन में स्थिरता आई। हम नए घर में शिफ्ट हुए और पहली बार घर में बिजली आई। इससे मेरी पढ़ाई भी बेहतर हो गई।

प्रश्न: स्कूल के बाद आपकी पढ़ाई का सफर कैसे आगे बढ़ा?

- दसवीं के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चला गया, जो मेरे परिवार के लिए एक बड़ा कदम था। बाद में मैंने अलियाह यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में इंटीग्रेटेड एमएससी किया, जिसे मैंने 2018 में पूरा किया। वहीं से मैंने रिसर्च को करियर के रूप में गंभीरता से लेना शुरू किया।

प्रश्न: आईआईटी हैदराबाद में पीएचडी करने का निर्णय कैसे लिया?

- GATE परीक्षा पास करने के बाद यह मौका मिला। पहली बार पश्चिम बंगाल से बाहर जाना मेरे लिए बड़ा बदलाव था, लेकिन आईआईटी हैदराबाद ने मुझे आगे बढ़ने का बेहतरीन मंच दिया। मेरे सुपरवाइजर साई संतोष कुमार रावी ने मुझे हर कदम पर सहयोग दिया।

प्रश्न: अपने रिसर्च को आसान भाषा में समझाइए।

- मेरा शोध इस बात पर केंद्रित है कि जब किसी पदार्थ पर प्रकाश डाला जाता है, खासकर अल्ट्राफास्ट लेजर पल्स के जरिए, तो वह कैसे व्यवहार करता है। इससे हमें सोलर सेल, एलईडी और फोटोडिटेक्टर जैसी तकनीकों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इसका उद्देश्य इन डिवाइसों को अधिक कुशल बनाना है।

प्रश्न: वर्तमान में आप कहां काम कर रहे हैं?

- मैं इस समय स्पेन के IMDEA नैनोसाइंसिया में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के रूप में काम कर रहा हूं। यह एक ऐसा इंटरडिसिप्लिनरी स्थान है, जहां भौतिक विज्ञानी, रसायनज्ञ और जीवविज्ञानी मिलकर एडवांस्ड मैटेरियल्स पर काम करते हैं।

प्रश्न: मैरी क्यूरी फेलोशिप आपके लिए क्या मायने रखती है?

- यह मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर है। नवंबर से मैं इम्पीरियल कॉलेज लंदन में अपना खुद का रिसर्च प्रोजेक्ट लीड करूंगा। यह मेरे लंबे समय के लक्ष्य—भारत में, खासकर किसी IIT या प्रमुख संस्थान में अपना रिसर्च ग्रुप बनाने—की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रश्न: क्या आपने कभी इस तरह के सफर की कल्पना की थी?

- बिलकुल नहीं। दसवीं कक्षा तक मुझे यह भी नहीं पता था कि IIT या पीएचडी क्या होती है। मेरा एकमात्र लक्ष्य अपनी कक्षा में टॉप करना था। बाकी सब कुछ धीरे-धीरे अपने आप होता चला गया।

आम के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करने से लेकर दुनिया के शीर्ष संस्थानों में रिसर्च का नेतृत्व करने तक, सोइफ अहमद की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि मेहनत और जिज्ञासा किसी भी परिस्थिति को पीछे छोड़ सकती है।

प्रख्यात भारतीय लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत

श्रीमोयी पियू कुंडू एक प्रख्यात भारतीय लेखिका, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो भारत में जेंडर, यौनिकता और अविवाहित महिलाओं के जीवन से जुड़े मुद्दों पर अपने काम के लिए जानी जाती हैं। वह “स्टेटस सिंगल” की संस्थापक हैं, जो शहरी अविवाहित महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी पहचान को सामने लाने के लिए समर्पित एक कम्युनिटी और प्लेटफॉर्म है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल के जरिए भी उन्होंने अच्छी पहचान बनाई है। श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत के प्रमुख अंश: 

प्रश्न 1: सोशल मीडिया और यूट्यूब पर आपके चैनल और पेज काफी लोकप्रिय हैं, आपने इसकी शुरुआत कैसे की?

- मैंने अपना यूट्यूब चैनल 2024 में, मई महीने में शुरू किया था। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर मैं उससे पहले से ही सक्रिय थी। दरअसल, मैं शुरू से ही अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी रही हूं, इसलिए यह मेरे लिए काफी स्वाभाविक रहा। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए मैंने एक समय किताब भी लिखी और अब पॉडकास्ट करती हूं। माध्यम बदलता रहता है, लेकिन अगर मैं लोगों तक अपनी बात पहुंचा पा रही हूं, तो वही मेरी सफलता है।

प्रश्न 2: आप सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अलग-अलग लोगों के साथ कई विषयों पर चर्चा और इंटरव्यू करती हैं। आपके प्लेटफॉर्म पर मुख्य फोकस किन विषयों पर रहता है?

- अगर आप मेरे यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स देखेंगे, तो पाएंगे कि मेरे अधिकतर विषय और मेहमान महिलाओं से जुड़े होते हैं। मैं कोशिश करती हूं कि समाज में मौजूद महिलाओं के अलग-अलग रूप, उनकी भूमिका और उनके योगदान को सामने लाया जाए। महिलाएं समाज को कैसे प्रभावित कर रही हैं—यह सकारात्मक है या नकारात्मक—इन सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।

मेरे कंटेंट में आमतौर पर इंटरव्यू देने वाली महिलाओं के जीवन और काम के अनुभवों को साझा किया जाता है। यही मेरे पॉडकास्ट और वीडियो का मुख्य विषय होता है। हालांकि हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए हर एपिसोड में विषय भी बदलता रहता है।

प्रश्न 3: आप कई बार राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करती हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है? क्या वे निष्पक्षता से संतुष्ट होते हैं?

- देखिए, राजनीति समाज का एक हिस्सा है। यह अच्छा है या बुरा, इसका निर्णय मैं नहीं करूंगी, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। चूंकि राजनीति पूरे समाज को प्रभावित करती है, इसलिए यह कई बार विवादित भी हो जाती है।

लेकिन मेरा मानना है कि अगर बहस और चर्चा के बाद हम किसी बेहतर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो यह जरूरी और उपयोगी है। ऐसी चर्चाएं समाज के लिए नुकसानदायक नहीं बल्कि फायदेमंद हो सकती हैं।

प्रश्न 4: आप आधुनिक दौर के नए मीडिया की प्रतिनिधि हैं। आज के समय में इस मीडिया को आप कैसे देखती हैं?

- आज के दौर का मीडिया मुख्य रूप से सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित है। 2016 में जियो के आने और 2022 में 5G की शुरुआत के बाद भारत में इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ा है। आने वाले समय में यह और बढ़ेगा।

इससे लोगों तक ज्यादा जानकारी और अलग-अलग विचार आसानी से पहुंच पाएंगे और साझा किए जा सकेंगे।

प्रश्न 5: क्या नया मीडिया वास्तव में पारंपरिक मीडिया जैसे टीवी और अखबार को चुनौती दे पाया है?

- आज 2026 में खड़े होकर मैं कह सकती हूं कि नया मीडिया काफी हद तक पारंपरिक मीडिया पर भारी पड़ा है। अखबार और टीवी अब धीरे-धीरे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं और उनकी जगह OTT और सोशल मीडिया ले रहे हैं।

इस डिजिटल दौर में मीडिया अधिक लोकतांत्रिक हो गया है। अब आम लोग भी अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। हालांकि, हर किसी की राय सभी को पसंद नहीं आती, लेकिन यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

प्रश्न 6: नए मीडिया का भविष्य आप कैसा देखती हैं? और आपके अपने प्लेटफॉर्म को लेकर आगे क्या योजना है?

- मेरे अनुसार नए मीडिया का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। तकनीक के विकास के साथ इस क्षेत्र में और भी नई संभावनाएं सामने आएंगी। लोगों को भी तकनीक के साथ खुद को अपडेट करना होगा और आधुनिक सोच अपनानी होगी, नहीं तो वे इस तेजी से बदलती दुनिया के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।

 

 

 

 

 UPSC टॉपर ए.आर. राजा मोहिदीन से विशेष बातचीत

चेन्नई के रहने वाले ए.आर. राजा मोहिदीन (A.R. Rajah Mohaideen) ने इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग यानी Union Public Service Commission (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 7 हासिल कर शानदार सफलता पाई है। मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा का रास्ता चुना और चार वर्षों की निरंतर तैयारी, स्पष्ट लक्ष्य और कड़ी मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया। प्रस्तुत हैं एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' (Raees Ahmad 'Lali') द्वारा उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंश:

रिजल्ट आने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

ए.आर. राजा मोहिदीन: सच कहूं तो मैं पूरी तरह चौंक गया था। मुझे उम्मीद थी कि मेरा चयन हो सकता है, लेकिन टॉप 10 में, वह भी सिंगल डिजिट रैंक मिलेगी—यह सोचा नहीं था। खुशी भी थी, लेकिन यकीन करने में थोड़ा समय लगा।

आपने UPSC की तैयारी कब शुरू की और कितने साल लगे?

राजा मोहिदीन: मैंने 2022 में तैयारी शुरू की थी। अब इसे चार साल हो चुके हैं। यह सफर लंबा था, लेकिन लगातार मेहनत करता रहा।

जामिया की कोचिंग का आपकी सफलता में कितना योगदान रहा?

राजा मोहिदीन: पहले एक साल मैंने चेन्नई में तैयारी की, लेकिन 2023 में प्रीलिम्स पास नहीं कर पाया। इसके बाद मैंने Jamia Millia Islamia की रेजिडेंशियल कोचिंग अकादमी की प्रवेश परीक्षा दी और चयन हो गया। दिल्ली आने के बाद पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा माहौल मिला। प्रोफेसर समीना बानो मैम और अन्य शिक्षकों ने काफी मार्गदर्शन दिया। यहां की लाइब्रेरी, अखबार और सीनियर्स का सहयोग बहुत मददगार रहा। सीनियर्स ने मेरी गलतियां पहचानने और सुधारने में अहम भूमिका निभाई।

पहले प्रयास में क्या कमी रह गई थी?

राजा मोहिदीन: पहले प्रयास में मैं प्रीलिम्स क्लियर नहीं कर पाया। मैंने मॉक टेस्ट की पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं की थी। हालांकि, उसी समय मैं मेंस की तैयारी भी करता रहा। मेंस की लगातार तैयारी का फायदा इस बार मिला और अच्छे अंक आए।

आपके विषय कौन-कौन से थे?

राजा मोहिदीन: जनरल स्टडीज़ तो सभी के लिए समान होता है। मेरा ऑप्शनल विषय एंथ्रोपोलॉजी था।

आप एमबीबीएस डॉक्टर हैं। फिर सिविल सेवा में आने का फैसला क्यों लिया?

राजा मोहिदीन: मैंने Government Cuddalore Medical College से MBBS किया। मेरी मेडिकल पढ़ाई 2016 में शुरू हुई और 2022 में पूरी हुई। शुरुआत में सिविल सेवा में आने की कोई योजना नहीं थी। लेकिन इंटर्नशिप के दौरान ही कोविड-19 महामारी का समय था। मैंने अपने शहर में सिविल सेवकों को लोगों के लिए दिन-रात काम करते देखा। वहीं से प्रेरणा मिली। मुझे लगा कि एक सिविल सेवक के रूप में मैं समाज के बड़े वर्ग की सेवा कर सकता हूं। इसी सोच ने मुझे ग्रेजुएशन के बाद UPSC की तैयारी के लिए प्रेरित किया।

आपके माता-पिता क्या करते हैं?

राजा मोहिदीन: मेरे माता-पिता शिक्षक रहे हैं और फिलहाल तमिलनाडु के सरकारी कॉलेजों में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हैं।

जो छात्र UPSC की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

राजा मोहिदीन: सबसे जरूरी है कि आपका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। हमेशा याद रखें कि आपने यह परीक्षा क्यों चुनी है। यह सफर लंबा हो सकता है—मुझे चार साल लगे। इस दौरान मानसिक मजबूती और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

दूसरी अहम बात है सिलेबस पर फोकस बनाए रखना। तैयारी बिखरी हुई नहीं होनी चाहिए।

रोज कितने घंटे पढ़ाई करनी चाहिए?

राजा मोहिदीन: मेरे हिसाब से घंटों की गिनती उतनी मायने नहीं रखती। जरूरी यह है कि आप अपना तय लक्ष्य पूरा करें। महीने और हफ्ते का टारगेट बनाएं और उसे हर हाल में पूरा करें। कुछ दिन मैंने पांच घंटे पढ़ाई की, कुछ दिन दस घंटे, लेकिन टारगेट पूरा किया।

सफलता का मूल मंत्र क्या रहा?

राजा मोहिदीन: लक्ष्य की स्पष्टता, नियमित तैयारी, सिलेबस पर पकड़ और मानसिक संतुलन—यही मेरी सफलता की कुंजी रहे।

जैसे-जैसे बैंकिंग तेजी से ब्रांच आधारित सेवाओं से आगे बढ़कर पूरी तरह डिजिटल इकोसिस्टम की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस बदलाव को दिशा देने में प्रोडक्ट मैनेजर्स की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इसी बदलाव के केंद्र में काम कर रहे हैं अभिनव श्रीवास्तव, जो तकनीक, नियामकीय ढांचे और ग्राहक-केंद्रित नवाचार के बीच संतुलन बनाकर काम करते हैं।

भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में सात साल से अधिक के अनुभव के साथ, उन्होंने जटिल व्यावसायिक जरूरतों को सुरक्षित, स्केलेबल और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजिटल प्रोडक्ट्स में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

वर्तमान में अभिनव श्रीवास्तव RBL बैंक में सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। वे बैंक के वेब और मोबाइल प्लेटफॉर्म के लिए पूरे प्रोडक्ट रोडमैप और उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालते हैं। इंजीनियरिंग, UX, मार्केटिंग, कंप्लायंस और ऑपरेशंस टीमों के साथ मिलकर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नवाचार सुरक्षा और नियामकीय मानकों के अनुरूप हो। उनका काम प्रोडक्ट के पूरे जीवनचक्र को कवर करता है—आइडिया से लेकर प्राथमिकता तय करने, डिलीवरी और लॉन्च के बाद सुधार तक—और यह सब डेटा आधारित निर्णयों पर आधारित होता है।

अपने करियर में अभिनव ने IndiaLends, ICICI बैंक और कोटक महिंद्रा प्राइम जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है। यहां उन्हें डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म, ग्राहक अधिग्रहण प्रक्रिया, SaaS और CRM सिस्टम तथा बड़े स्तर पर डिजिटल अपनाने का गहरा अनुभव मिला।

शिक्षा की बात करें तो उन्होंने ICFAI फाउंडेशन फॉर हायर एजुकेशन से मार्केटिंग में MBA और PGPM किया है, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल बिजनेस में BBA किया है। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें सख्त नियामकीय माहौल में प्रभावी डिजिटल प्रोडक्ट तैयार करने की मजबूत समझ देती है।

सवाल: आपकी औपचारिक शिक्षा (MBA, PGPM, BBA) ने बैंकिंग जैसे कड़े नियामकीय सेक्टर में प्रोडक्ट स्ट्रैटेजी और निर्णय लेने की सोच को कैसे प्रभावित किया? उन छात्रों को क्या सलाह देंगे जो मानते हैं कि डिग्री ही टेक और फिनटेक में सफलता की गारंटी है?

- मेरी शिक्षा ने निश्चित रूप से एक मजबूत आधार दिया, लेकिन यह कभी भी अकेला अंतर पैदा करने वाला फैक्टर नहीं रही। BBA से मुझे ग्लोबल लेवल पर बिजनेस की समझ मिली, जबकि MBA और PGPM ने उपभोक्ता व्यवहार, रणनीति और निर्णय लेने की क्षमता को और मजबूत किया। बैंकिंग जैसे रेगुलेटेड सेक्टर में यह संरचित सोच काफी मदद करती है, जहां ग्रोथ, कस्टमर एक्सपीरियंस और कंप्लायंस के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

लेकिन करियर की शुरुआत में ही मुझे यह समझ आ गया था कि डिग्रियां आपको असल दुनिया की जटिलताओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं करतीं। क्लासरूम यह नहीं सिखाता कि अधूरी जरूरतों, स्टेकहोल्डर के दबाव या अचानक आने वाले नियामकीय बदलावों को कैसे संभालना है। यह सब अनुभव से ही आता है। जो छात्र मानते हैं कि डिग्री ही सफलता की गारंटी है, उनसे मैं कहूंगा कि डिग्री आपको मौके तक पहुंचा सकती है, लेकिन वहां टिके रहना आपकी सीखने की गति, अनुकूलन क्षमता और काम करने के तरीके पर निर्भर करता है।

सवाल: सीमित संसाधनों में, जब आप वेब, मोबाइल, CRM और लेंडिंग जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म संभालते हैं, तो निवेश को कैसे प्राथमिकता देते हैं? मौजूदा फीचर्स सुधारने और नए फीचर लॉन्च करने के बीच कैसे फैसला करते हैं?

- जब संसाधन सीमित होते हैं, तो मैं सबसे पहले यह देखता हूं कि ग्राहक या बिजनेस की सबसे बड़ी समस्या कहां है। इसके लिए डेटा अहम भूमिका निभाता है—जैसे हाई ट्रैफिक जर्नी, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स और वे प्लेटफॉर्म जो सीधे रेवेन्यू या कंप्लायंस से जुड़े हों। अगर कोई मौजूदा फीचर किसी जरूरी प्रक्रिया में बाधा बन रहा है, तो पहले उसे सुधारना मेरी प्राथमिकता होती है।

मेरे फैसले के मानदंड साफ होते हैं—ग्राहक पर प्रभाव, बिजनेस वैल्यू, नियामकीय जरूरत और मेहनत के मुकाबले मिलने वाला फायदा। बैंकिंग जैसे सेक्टर में मौजूदा जर्नी को बेहतर बनाना अक्सर कम जोखिम के साथ जल्दी परिणाम देता है, जबकि नए फीचर तभी लाए जाते हैं जब वे नया रेवेन्यू, कंप्लायंस समाधान या स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दें।

सवाल: मैनेजमेंट एजुकेशन और आज के डिजिटल प्रोडक्ट लीडर्स से इंडस्ट्री की अपेक्षाओं के बीच आपको क्या अंतर नजर आता है?

- मैनेजमेंट एजुकेशन फ्रेमवर्क और संरचित सोच सिखाने में अच्छा काम करती है, लेकिन इंडस्ट्री आज ऐसे प्रोडक्ट लीडर्स चाहती है जो अनिश्चित परिस्थितियों में भी परिणाम दे सकें। वास्तविक दुनिया में प्राथमिकताएं तेजी से बदलती हैं और अक्सर अधूरी जानकारी के साथ फैसले लेने पड़ते हैं। एक बड़ा अंतर तकनीकी समझ का भी है। प्रोडक्ट लीडर्स को कोडिंग आना जरूरी नहीं है, लेकिन सिस्टम, APIs और प्लेटफॉर्म की समझ होना जरूरी है ताकि वे इंजीनियरिंग टीम के साथ व्यावहारिक निर्णय ले सकें। इसके अलावा, स्टेकहोल्डर मैनेजमेंट और एग्जीक्यूशन स्किल्स—जहां बिजनेस, टेक, UX, कंप्लायंस और टाइमलाइन का संतुलन बनाना पड़ता है—ये चीजें क्लासरूम से ज्यादा फील्ड एक्सपीरियंस से आती हैं।

सवाल: डिजिटल लेंडिंग या बैंकिंग प्रोडक्ट में आप पूरे लाइफसाइकिल के दौरान किन KPIs को ट्रैक करते हैं और उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं?

- मैं KPIs को सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए देखता हूं कि ग्राहक प्रोडक्ट में कहां अटक रहा है। अधिग्रहण चरण में ट्रैफिक क्वालिटी, CTR और लीड से एप्लिकेशन रेशियो पर नजर रहती है। ऑनबोर्डिंग में हर स्टेप पर ड्रॉप-ऑफ, प्रक्रिया पूरी करने में लगा समय और STP रेट अहम होते हैं। एंगेजमेंट के लिए एक्टिव यूजर्स, फीचर यूसेज और जर्नी कम्प्लीशन देखी जाती है। रिटेंशन में रीपीट यूसेज और रिटर्न रेट्स से भरोसे और जुड़ाव का अंदाजा मिलता है। मोनिटाइजेशन में फंडेड अकाउंट या लोन कन्वर्जन, प्रति ग्राहक रेवेन्यू और क्रॉस-सेल पर फोकस रहता है। इन मेट्रिक्स के आधार पर बैकलॉग को प्राथमिकता दी जाती है, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स सुधारे जाते हैं और UX या मैसेजिंग में बदलाव किए जाते हैं।

सवाल: आपके क्षेत्र में निरंतर सीखने की कितनी अहमियत है और यूनिवर्सिटीज को छात्रों को डिजिटल भविष्य के लिए कैसे तैयार करना चाहिए?

- फिनटेक और बैंकिंग में निरंतर सीखना बेहद जरूरी है क्योंकि तकनीक, नियम और ग्राहक की उम्मीदें लगातार बदलती रहती हैं। जो आज काम करता है, वह कुछ सालों में अप्रासंगिक हो सकता है। यूनिवर्सिटीज को चाहिए कि वे खास टूल्स सिखाने के बजाय समस्या समाधान, आलोचनात्मक सोच और अनिश्चितता के साथ काम करने की क्षमता विकसित करें। रियल वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री केस स्टडी और इंटर्नशिप से छात्रों को तेजी से बदलते डिजिटल इकोसिस्टम की बेहतर समझ मिल सकती है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि छात्र सीखते रहना सीखें, न कि डिग्री के साथ सीखने की प्रक्रिया खत्म मान लें।

करियर, कोर्स, कॉलेज और भविष्य—सब कुछ जरूरी लगता है, सब कुछ स्थायी लगता है। रैंकिंग, वायरल सक्सेस स्टोरीज़, सोशल मीडिया की सलाह और अंतहीन तुलना के बीच आज के छात्र विकल्पों की कमी से नहीं, बल्कि स्पष्टता की कमी से जूझ रहे हैं।

एडइनबॉक्स (Edinbox) की Voices That Educate सीरीज़ के इस संस्करण में Edinbox की वर्टिकल हेड–PR और कम्युनिकेशंस, पूजा खन्ना, BCM स्कूल, लुधियाना की फाउंडर प्रिंसिपल वंदना शाही के साथ एक विचारपूर्ण संवाद करती हैं। वंदना शाही राष्ट्रीय पुरस्कार (2022) से सम्मानित हैं और CBSE डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर भी हैं। छात्र-केंद्रित सोच के लिए जानी जाने वाली वंदना शाही नेतृत्व को करुणा, यथार्थ और विवेक के साथ जोड़ती हैं।

प्रश्न 1: आज एक सफल करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?

- कई छात्र मानते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाख़िला या किसी “ट्रेंडिंग” स्ट्रीम का चुनाव सफलता की गारंटी है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। आज करियर लचीले, अनिश्चित और पूरी तरह कौशल-आधारित हैं। अब दुनिया केवल डिग्री पर नहीं, बल्कि सोच की फुर्ती, गहरी दक्षता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समस्या-समाधान क्षमता और लगातार सीखने की भूख पर भरोसा करती है।

आज नियोक्ता डिग्री और पदनाम से आगे देखकर ऐसे लोगों को तलाशते हैं जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, तेज़ी से ढल सकें, सार्थक सहयोग करें और वास्तविक समय में मूल्य जोड़ें। इस बदलते परिदृश्य में सफलता उन्हें मिलती है जो व्यापक अनुभव के साथ किसी एक क्षेत्र में गहरी महारत विकसित करते हैं—जो अलग-अलग विषयों को जोड़ पाते हैं और विशेषज्ञता की मजबूत नींव पर खड़े रहते हैं। अंततः सार्थक करियर शुरुआती लेबल या सीधी रेखाओं से नहीं, बल्कि उद्देश्य, निरंतर प्रयास, नैतिक आधार और बदलाव के साथ आगे बढ़ने के साहस से बनता है।

प्रश्न 2: शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई ग्रेजुएट खुद को तैयार क्यों नहीं मानते?

- असल डिसकनेक्ट इरादों में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। शिक्षा को भले ही इंडस्ट्री-ड्रिवन कहा जाए, पर अक्सर जोर कंटेंट मिलान पर रहता है, क्षमता विकास पर नहीं। सिलेबस उद्योग के ट्रेंड दिखा सकता है, लेकिन कक्षा में अब भी रटने, सही जवाब और परीक्षा प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलती है—जबकि कार्यस्थल पर क्रिटिकल थिंकिंग, सहयोग, निर्णय-क्षमता, अनुकूलन और जिम्मेदारी की मांग होती है।

शिक्षा आज छात्रों को परीक्षाएँ पास कराने के लिए तैयार करती है, अस्पष्ट परिस्थितियों से निपटने के लिए नहीं। दूसरी ओर इंडस्ट्री अनिश्चितता में काम करती है, जहाँ समस्याएँ स्पष्ट नहीं होतीं, समाधान विकसित होते रहते हैं और जवाबदेही सबसे अहम होती है। बदलाव की तेज़ रफ्तार इस अंतर को और बढ़ा देती है, क्योंकि स्थिर सिलेबस गतिशील पेशेवर वास्तविकताओं के साथ कदम नहीं मिला पाते।

वास्तविक तालमेल तब बनेगा जब शिक्षा परीक्षा-केंद्रित से अनुभव-केंद्रित बने—जब सीखने में अनुप्रयोग, चिंतन, मेंटरशिप, नैतिक विवेक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर जोर होगा। तभी ग्रेजुएट खुद को कमजोर नहीं, बल्कि सीखने, अनसीखने और आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व करने के लिए सशक्त महसूस करेंगे।

प्रश्न 3: छात्र परिणाम बेहतर करने के लिए सिस्टम में कौन-से बदलाव तात्कालिक हैं?

- सबसे पहले, अंकों-केंद्रित सोच से सीखने-केंद्रित संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। जब सफलता की परिभाषा केवल परीक्षा तय करती है, तो समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और वास्तविक जीवन में उपयोग पीछे छूट जाते हैं। आकलन का उद्देश्य रैंकिंग नहीं, बल्कि विकास और आत्ममंथन होना चाहिए।

दूसरा, शिक्षकों का सशक्तिकरण और सतत पेशेवर विकास अनिवार्य है। 21वीं सदी के परिणाम पुराने प्रशिक्षण से नहीं मिल सकते। शिक्षकों को समय, भरोसा, स्वायत्तता और सीखने-सहयोग-नवाचार के अवसर चाहिए—सशक्त शिक्षक ही छात्रों को गहराई से जोड़ते हैं।

अंत में, अनुभवात्मक सीख, इंटरडिसिप्लिनरी सोच और जरूरी जीवन कौशल को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। छात्रों को सिर्फ परीक्षा या नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जटिलता, अनिश्चितता और आजीवन सीखने के लिए तैयार किया जाए। यही बदलाव शिक्षा को कठोर ढांचे से उत्तरदायी इकोसिस्टम में बदलेंगे।

प्रश्न 4: AI और डिजिटल टूल्स के दौर में कौन-से मानवीय कौशल और महत्वपूर्ण होंगे?

- जब बुद्धिमत्ता को ऑटोमेट किया जा सकता है, तब शिक्षा का पैमाना “क्या जानते हैं” से “कैसे सोचते हैं और क्या बनते हैं” पर आ जाता है। AI के युग में क्रिटिकल थिंकिंग और नैतिक विवेक सबसे जरूरी होंगे—ताकि सत्य पहचाना जा सके, एल्गोरिदम पर सवाल उठाए जा सकें और मूल्य-आधारित निर्णय लिए जा सकें।

रचनात्मकता और मौलिक सोच नवाचार को परिभाषित करेंगी, क्योंकि मशीनें पैटर्न दोहरा सकती हैं, उद्देश्य नहीं। साथ ही भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और प्रभावी संचार नेतृत्व, सहयोग और भरोसे की बुनियाद हैं। बदलाव सामान्य होगा, तो अनुकूलन क्षमता, लचीलापन और आत्म-जागरूकता दीर्घकालिक प्रासंगिकता तय करेंगे। तकनीक क्षमता बढ़ा सकती है, दिशा इंसानी विवेक और जिज्ञासा ही देती है।

प्रश्न 5: शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना जरूरी है और Edinbox जैसी प्लेटफॉर्म्स विश्वसनीयता कैसे बनाए रखें?

- ईमानदार संवाद वैकल्पिक नहीं, बल्कि भरोसे और सार्थक सीख की नींव है। जानकारी की भरमार में स्पष्टता दावों से ज्यादा अहम है। पारदर्शी संवाद अपेक्षाओं को वास्तविकता से जोड़ता है—वरना शिक्षा लेन-देन बनकर रह जाती है।

एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म्स सीखने वालों और संस्थानों के बीच नैतिक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। सटीकता, संपादकीय ईमानदारी और छात्र-केंद्रित कंटेंट को प्राथमिकता देकर ही विश्वसनीयता बनी रहती है। सत्यापित जानकारी, संतुलित दृष्टिकोण और उद्देश्यपूर्ण सामग्री के साथ संस्थागत सहयोग संभव है। ईमानदार और मूल्य-आधारित संवाद शिक्षा संस्कृति को ऊंचा उठाता है।

प्रश्न 6: विकल्पों और रैंकिंग की भीड़ में छात्रों को क्या फ़िल्टर करना चाहिए?

- आज सबसे बड़ा कौशल है—विवेक। रैंकिंग और सलाह मार्गदर्शन दे सकती हैं, पर आत्म-चिंतन का विकल्प नहीं बननी चाहिए। छात्रों को पूछना चाहिए—“क्या लोकप्रिय है?” नहीं, बल्कि “क्या मेरी ताकत, मूल्यों और दीर्घकालिक विकास से मेल खाता है?”

जो ध्यान के योग्य है, वह गहराई बनाता है—ऐसे प्रोग्राम, मेंटर्स और अनुभव जो सोच, लचीलापन, नैतिकता और ट्रांसफरेबल स्किल्स विकसित करें। रैंकिंग एक समय की प्रतिष्ठा दिखाती है, व्यक्तिगत फिट या बदलाव की तैयारी नहीं। शोर में स्पष्टता भीतर से आती है।

प्रश्न 7: महिला लीडर के रूप में आपके सामने कौन-सी सूक्ष्म चुनौतियाँ रहीं?

- कई चुनौतियाँ खुली नहीं थीं—अदृश्य अपेक्षाएँ और खामोश समझौते। बार-बार योग्यता साबित करने का दबाव, सहानुभूति और अधिकार का संतुलन, बिना मान्यता के भावनात्मक श्रम—ये सब यात्रा को आकार देते हैं। कभी महत्वाकांक्षा को आक्रामकता समझा गया, तो संयम को सहमति।

मैंने रणनीतिक आत्म-जागरूकता और आंतरिक लचीलापन विकसित किया—कब दृढ़ बोलना है, कब परिणामों को बोलने देना है; अपराधबोध के बिना सीमाएँ तय करना; संदेह के बिना महत्वाकांक्षा बनाए रखना। मेंटरशिप, चिंतन और मजबूत मूल्य-प्रणाली मेरे सहारे बने। प्रभावी नेतृत्व पुराने ढाँचों में फिट होने से नहीं, बल्कि सोच-समझकर उन्हें नया रूप देने से आता है।

प्रश्न 8: स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभव छात्रों के फैसलों में कैसे मदद करते हैं?

- कहानियाँ अमूर्त विचारों और वास्तविक जीवन के बीच पुल बनाती हैं। डेटा और रैंकिंग जानकारी देते हैं, लेकिन कहानियाँ मानवीय पहलू दिखाती हैं—सफलता, असफलता और पुनर्निर्माण की जटिलताएँ। इससे छात्र समझते हैं कि करियर अक्सर सीधी राह पर नहीं चलते।

कहानियाँ भावनात्मक जुड़ाव और आत्म-चिंतन पैदा करती हैं, पारंपरिक मानकों से आगे संभावनाएँ दिखाती हैं और उन जटिलताओं से परिचित कराती हैं जिन्हें कोई सिलेबस पूरी तरह नहीं सिखा सकता। वास्तविक यात्राओं से जुड़कर छात्र विवेक, लचीलापन और आत्म-जागरूकता विकसित करते हैं—यह प्रेरणा ही नहीं, अंतर्ज्ञान की शिक्षा है।

प्रश्न 9: शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को आगे किस तरह की बातचीत का नेतृत्व करना चाहिए?

- सूचना देने से आगे बढ़कर शिक्षा मीडिया को विवेक का क्यूरेटर और सार्थक संवाद का उत्प्रेरक बनना होगा। उन्हें यह सवाल उठाने चाहिए कि छात्र क्या सीखते हैं ही नहीं, क्यों और किस उद्देश्य से।

ऑटोमेशन, असमानता और तेज़ सामाजिक बदलाव के दौर में शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक के नैतिक उपयोग, मानसिक स्वास्थ्य, समान अवसर, आजीवन सीख और भविष्य के काम पर चर्चा जरूरी है। सनसनी या रैंकिंग-ड्रिवन नैरेटिव्स के बजाय साक्ष्य-आधारित विमर्श को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा मीडिया ट्रेंड्स रिपोर्ट नहीं करता—संस्कृति गढ़ता है।

प्रश्न 10: छात्रों के लिए वह सलाह जो कम सुनते हैं, पर सबसे जरूरी है?

- उपलब्धियों और तेज़ी के शोर में यह याद नहीं दिलाया जाता कि प्रगति से पहले उद्देश्य आता है। हर कोई जल्दी नहीं खिलता, हर योगदान तुरंत दिखाई नहीं देता। विकास अक्सर खामोशी में परिपक्व होता है—चिंतन, सीखने योग्य गलतियों और शांत दृढ़ता से।

स्थायी सफलता तब आती है जब योग्यता, मूल्य और प्रयास एक दिशा में हों—बिना जल्दबाज़ी। सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं से अर्थ, प्रभाव और भलाई रचना है। करुणा, ईमानदारी और सेवा-भाव से जुड़ी महत्वाकांक्षा न सिर्फ करियर बनाती है, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और आशावादी दुनिया का निर्माण करती है।

भारत में ऑनलाइन उच्च शिक्षा का तेजी से बढ़ता दायरा केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का संकेत भी है। ट्रेनिंग्स कार्ट (TrainingsKart) के हालिया आकलन के अनुसार, यह क्षेत्र 2030 तक तेज़ रफ्तार से विस्तार करेगा। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह विस्तार गुणवत्ता, भरोसे और समान अवसरों के साथ आगे बढ़ पाएगा?

पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के प्रति भारतीयों का नजरिया बदला है। अब डिग्री केवल कागज का प्रमाण नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल से जुड़ी जरूरत बन गई है। हिमांशु राय जैसे शिक्षाविद मानते हैं कि उच्च शिक्षा एक संरचनात्मक बदलाव से गुजर रही है, जहां ऑनलाइन डिग्री की मांग लगातार बढ़ रही है। यह मांग इस बात का प्रमाण है कि छात्र और पेशेवर अब पारंपरिक कक्षा की सीमाओं से बाहर निकलना चाहते हैं।

इस बदलाव को मजबूती देने में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी University Grants Commission (UGC) की भूमिका अहम रही है। ऑनलाइन डिग्री को पारंपरिक डिग्री के बराबर मान्यता देने से छात्रों का भरोसा बढ़ा है। लेकिन केवल मान्यता देना ही पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि ऑनलाइन माध्यम में शिक्षा की गुणवत्ता और मूल्यांकन की सख्ती बनी रहे।

यहां एक बड़ा सवाल उभरता है—क्या सभी संस्थान इस बदलाव के लिए तैयार हैं? पंकज मित्तल का कहना है कि देश में कुछ संस्थान डिजिटल शिक्षा में आगे हैं, लेकिन पूरे सिस्टम में समान तैयारी नहीं है। यह असमानता आने वाले समय में शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।

ऑनलाइन MBA जैसे कोर्सेज की बढ़ती लोकप्रियता यह दिखाती है कि छात्र अब सीधे करियर से जुड़े विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बेंगलुरु, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर, जो तेज़ प्रतिस्पर्धा में खुद को बनाए रखना चाहते हैं, ऑनलाइन डिग्री को एक व्यावहारिक समाधान के रूप में देख रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ इसका लचीलापन और कम लागत है। यह उन लोगों के लिए नए दरवाजे खोल रही है जो पारंपरिक शिक्षा से दूर रह जाते थे—जैसे छोटे शहरों के छात्र, गृहिणियां या मिड-करियर प्रोफेशनल्स। यह पहलू राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy 2020) के उस लक्ष्य से मेल खाता है, जिसमें शिक्षा को अधिक समावेशी और कौशल-आधारित बनाने की बात कही गई है।

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डिजिटल डिवाइड आज भी एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी के कारण ऑनलाइन शिक्षा का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा। इसके अलावा, कोर्स की गुणवत्ता में असमानता और मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहे हैं।

एक और चिंता यह है कि कहीं ऑनलाइन शिक्षा केवल ‘आसान डिग्री’ का माध्यम बनकर न रह जाए। अगर मूल्यांकन में सख्ती नहीं रही, तो डिग्री की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में विश्वविद्यालयों और नियामक संस्थाओं को तकनीक का उपयोग करते हुए पारदर्शी और मजबूत मूल्यांकन प्रणाली विकसित करनी होगी।

यह भी साफ है कि ऑनलाइन शिक्षा का भविष्य केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करेगा। असली चुनौती शिक्षण पद्धति को बदलने की है। केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाना काफी नहीं, बल्कि यह समझना जरूरी है कि ऑनलाइन माध्यम में छात्रों को प्रभावी तरीके से कैसे पढ़ाया जाए और उनसे जुड़ाव कैसे बनाए रखा जाए।

भारत का ऑनलाइन उच्च शिक्षा क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह न केवल शिक्षा के अवसरों को बढ़ा रहा है, बल्कि कौशल-आधारित सीखने की दिशा में भी देश को आगे ले जा रहा है।

लेकिन इस बदलाव को सफल बनाने के लिए संतुलन जरूरी है—तेजी और गुणवत्ता के बीच, पहुंच और विश्वसनीयता के बीच। अगर यह संतुलन साध लिया गया, तो ऑनलाइन शिक्षा भारत के भविष्य को नई दिशा दे सकती है।

 

 

 

 

क्यों युद्ध, गर्मी, आर्थिक दबाव, प्रवासन, मानसिक तनाव और एआई भारत की उच्च शिक्षा को नया आकार दे रहे हैं

एक समय था जब लोगों को लगता था कि विश्वविद्यालय इतिहास की हलचल से कुछ ऊपर खड़े होते हैं। बाहर आर्थिक मंदी हो, चुनावी लहर हो या सामाजिक अशांति—फिर भी यह कल्पना की जाती थी कि कैंपस के भीतर जीवन अपने शांत और नियमित ढंग से चलता रहेगा। छात्र बैग लेकर कक्षाओं की ओर जाएंगे, प्रोफेसर विचारों पर बहस करेंगे, पुस्तकालय खुले रहेंगे, प्रयोगशालाएँ काम करती रहेंगी और हॉस्टल देर रात तक करियर, सिनेमा, राजनीति और प्रेम पर चर्चाओं से भरे रहेंगे।

यह तस्वीर आज भी विश्वविद्यालयों के ब्रोशर में दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता अब काफी बदल चुकी है।

आज उच्च शिक्षा उस दौर से गुजर रही है जिसे कई विद्वान “पॉलीक्राइसिस” यानी बहु-संकट का समय कहते हैं। इसका मतलब है कि एक नहीं, बल्कि कई संकट एक साथ आ रहे हैं और एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। युद्ध छात्र गतिशीलता को बाधित करता है, वीज़ा प्रतिबंध विश्वविद्यालयों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं, जलवायु संकट कैंपस बंद करा देता है या कक्षाओं का समय बदल देता है। आवास संकट अंतरराष्ट्रीय शिक्षा नीतियों को प्रभावित करता है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पढ़ाने और मूल्यांकन की पारंपरिक पद्धतियों को चुनौती देता है, और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ सीखने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करती हैं।

अब ये समस्याएँ अलग-अलग नहीं आतीं। वे टकराती हैं, एक-दूसरे को बढ़ाती हैं और कई बार ऐसी प्रतिक्रियाएँ पैदा करती हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की गई थी।

इसी कारण आज उच्च शिक्षा का संकट पहले के संकटों से अलग है। यह सिर्फ पाठ्यक्रम, मान्यता, शिक्षण पद्धति या शिक्षकों की संख्या का मुद्दा नहीं रह गया है। आज के बड़े झटके अक्सर कक्षा के बाहर से आते हैं—वे भू-राजनीतिक, जलवायु, तकनीकी, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक होते हैं।

यूरोप में युद्ध कोलकाता के एक मेडिकल छात्र के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता लंदन में पढ़ रहे छात्र की हैदराबाद वापसी को महँगा बना सकती है। कनाडा में आवास संकट हजारों भारतीय परिवारों के विदेश में पढ़ाई के सपनों को सीमित कर सकता है। ओडिशा की गर्मी कक्षाओं का समय दोपहर से सुबह करवा सकती है।

भारत के लिए यह कोई दूर की कहानी नहीं है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक है। यहाँ युवा आबादी विशाल है और शिक्षा को सामाजिक सम्मान और आगे बढ़ने का प्रमुख रास्ता माना जाता है। साथ ही भारत का संबंध वैश्विक प्रवासन, खाड़ी देशों से आने वाले धन, पश्चिमी शिक्षा बाजार, जलवायु संकट और डिजिटल परिवर्तन से गहराई से जुड़ा है। इसलिए जब दुनिया अस्थिर होती है, तो भारतीय उच्च शिक्षा उससे अछूती नहीं रहती—उसके झटके तुरंत महसूस होते हैं।

अब वह समय आ गया है जब कक्षा दुनिया से अलग एक सुरक्षित जगह नहीं रही। बल्कि यह वह स्थान बनती जा रही है जहाँ दुनिया की बड़ी दरारें साफ दिखाई देती हैं।

आइवरी टावर का भ्रम टूट चुका है

“आइवरी टावर” शब्द लंबे समय तक विश्वविद्यालयों के लिए इस्तेमाल होता रहा। इसका मतलब था कि विश्वविद्यालय सामान्य जीवन की हलचल से कुछ दूर होते हैं। लेकिन बीसवीं सदी के अधिकांश समय तक विश्वविद्यालयों को वास्तव में एक तरह का संरक्षण मिला हुआ था। सरकारें बदलती थीं, बाजार ऊपर-नीचे होते थे, लेकिन विश्वविद्यालयों को लंबे समय तक स्थिर संस्थान माना जाता था।

आज यह सुरक्षा काफी हद तक खत्म हो चुकी है।

अब विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय छात्रों की फीस पर निर्भर हैं, वैश्विक उड़ानों पर छात्रों की आवाजाही निर्भर करती है, डिजिटल प्लेटफॉर्म पढ़ाई को जारी रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति वीज़ा नीतियों को तय करती है। ऐसे में विश्वविद्यालय सिर्फ एक कैंपस नहीं, बल्कि एक बड़े और अस्थिर वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं।

इसलिए जब यह नेटवर्क हिलता है, तो विश्वविद्यालय भी हिलते हैं।

जब युद्ध शुरू होता है, तो छात्र भागते हैं

उच्च शिक्षा की असुरक्षा को युद्ध जितनी स्पष्टता से शायद ही कोई और चीज दिखाती हो।

रूस-यूक्रेन युद्ध इसका बड़ा उदाहरण है। युद्ध से पहले यूक्रेन कम लागत में मेडिकल शिक्षा के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य बन चुका था। भारत के कई परिवारों के लिए, जो देश में निजी मेडिकल शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे, यूक्रेन डॉक्टर बनने का एक वास्तविक रास्ता था।

लेकिन युद्ध शुरू होते ही यह रास्ता अचानक बंद हो गया।

लेक्चर हॉल बंकर बन गए, लैब बंद हो गईं और छात्र सुरक्षित रास्तों की तलाश में सीमाओं की ओर निकल पड़े। भारत के ऑपरेशन गंगा के तहत 22,000 से अधिक भारतीयों को वापस लाया गया, लेकिन असली सवाल उसके बाद शुरू हुआ—जब पढ़ाई का भविष्य ही अनिश्चित हो गया।

पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने लौटे छात्रों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश की। कुछ छात्रों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में अस्थायी रूप से समायोजित किया गया, जबकि अन्य को इंटर्नशिप या प्रैक्टिकल प्रशिक्षण की सुविधा दी गई। लेकिन इस घटना ने एक कठोर सच्चाई सामने रखी—शिक्षा का सपना भी एक नाजुक व्यवस्था पर टिका होता है, जिसे भू-राजनीतिक संकट कभी भी तोड़ सकता है।

जब आसमान बंद होता है, तो शिक्षा के रास्ते भी बंद हो जाते हैं

पश्चिम एशिया में अस्थिरता उच्च शिक्षा को दूसरे तरीके से प्रभावित करती है। यह क्षेत्र वैश्विक विमानन मार्गों और श्रम प्रवासन का प्रमुख केंद्र है।

कई भारतीय छात्र विदेश जाते समय खाड़ी देशों के एयर हब से होकर गुजरते हैं। लेकिन यदि क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है तो उड़ानों को लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे टिकट की कीमतें अचानक कई गुना बढ़ सकती हैं। कभी 45 हजार रुपये में होने वाली यात्रा 2 लाख रुपये से अधिक की हो सकती है।

इसके अलावा खाड़ी देश भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ से बड़ी मात्रा में धन भारत आता है। भारत हर साल लगभग 130 से 140 अरब डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यह पैसा सिर्फ घर चलाने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा के लिए भी खर्च होता है।

इसलिए अगर खाड़ी देशों में आर्थिक संकट आता है, तो उसका असर सीधे भारत में शिक्षा पर पड़ सकता है।

पश्चिम अब हमेशा स्थिर विकल्प नहीं रहा

लंबे समय तक भारतीय मध्यम वर्ग के लिए विदेश में पढ़ाई का मतलब अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया था। इन देशों को स्थिर और प्रतिष्ठित माना जाता था।

लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है।

ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन में यूरोपीय छात्रों की संख्या घटी। कनाडा ने आवास संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर सीमा लगा दी। अमेरिका में कम जन्म दर के कारण कॉलेजों को घरेलू छात्रों की संख्या घटने का सामना करना पड़ रहा है।

इन बदलावों ने भारतीय परिवारों को यह एहसास कराया है कि विदेश में पढ़ाई का सपना अब पहले जितना स्थिर नहीं रहा।

जलवायु परिवर्तन अब टाइमटेबल तय कर रहा है

कई सालों तक जलवायु परिवर्तन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का विषय था। अब यह संचालन की वास्तविक चुनौती बन चुका है।

2024 में यूनिसेफ के अनुसार जलवायु से जुड़ी घटनाओं के कारण दुनिया भर में 24 करोड़ से अधिक छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई। भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है।

ओडिशा जैसे राज्यों में भीषण गर्मी के कारण संस्थानों को कक्षाओं और परीक्षाओं का समय सुबह करने के निर्देश दिए गए। यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि संकेत है कि पर्यावरण अब शिक्षा की संरचना को प्रभावित कर रहा है।

सबसे शांत संकट: मानसिक स्वास्थ्य

कुछ संकट विस्फोट के साथ आते हैं, जबकि कुछ चुपचाप फैलते हैं। मानसिक स्वास्थ्य ऐसा ही संकट है।

कई छात्र आर्थिक दबाव, सोशल मीडिया तुलना, नौकरी की अनिश्चितता और जलवायु चिंता जैसे कई तनावों के साथ विश्वविद्यालय में प्रवेश करते हैं। महामारी के बाद यह दबाव और बढ़ गया है।

जब छात्र और शिक्षक दोनों ही मानसिक दबाव में होते हैं, तो इसका असर सीखने की गुणवत्ता पर पड़ता है। ध्यान कम होता है, आत्मविश्वास घटता है और पढ़ाई की गहराई प्रभावित होती है।

इसलिए मानसिक स्वास्थ्य अब शिक्षा की गुणवत्ता से अलग विषय नहीं रहा।

कक्षा के भीतर एआई का तूफान

इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उच्च शिक्षा को एक नई चुनौती दी है।

अगर कोई टूल कुछ सेकंड में निबंध, कोड या शोध का मसौदा लिख सकता है, तो असाइनमेंट का मूल्यांकन कैसे किया जाए? क्या यह ज्ञान की परीक्षा है, लेखन कौशल की या तकनीक के उपयोग की?

भारत जैसे बड़े शिक्षा तंत्र में यह सवाल और भी जटिल हो जाता है। हालांकि एआई खतरे के साथ अवसर भी लाता है—जैसे अनुवाद, व्यक्तिगत सीखने में सहायता और बड़े पैमाने पर शिक्षण समर्थन।

लेकिन इसके लिए शिक्षण पद्धतियों को तेजी से बदलना होगा।

भारत के सामने अवसर और परीक्षा

दुनिया में उच्च शिक्षा का नक्शा बदल रहा है। कई पश्चिमी देशों में छात्र संख्या घट रही है, जबकि भारत के पास बड़ी युवा आबादी है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत को अधिक अंतरराष्ट्रीय और बहुविषयक शिक्षा प्रणाली बनाने की कल्पना करती है। भारत 2030 तक अधिक विदेशी छात्रों को आकर्षित करना चाहता है।

लेकिन इसके लिए सिर्फ महत्वाकांक्षा काफी नहीं है। विश्वविद्यालयों को संकट के समय भी भरोसेमंद साबित होना होगा—चाहे वह जलवायु संकट हो, युद्ध हो या तकनीकी बदलाव।

भविष्य का विश्वविद्यालय

इस दशक का सबसे बड़ा सबक स्पष्ट है—भविष्य का विश्वविद्यालय सिर्फ सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं बनाया जा सकता। उसे बाधाओं और संकटों के बीच भी काम करने के लिए तैयार होना होगा।

ऐसा विश्वविद्यालय जिसे संकट के समय भी पढ़ाई जारी रखने की क्षमता हो, मजबूत डिजिटल प्रणाली हो, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन हो, जलवायु-सुरक्षित बुनियादी ढाँचा हो और एआई के उपयोग के लिए स्पष्ट नीति हो।

सबसे महत्वपूर्ण बात—विश्वास।

आज छात्र और अभिभावक सिर्फ रैंकिंग नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि संकट के समय संस्थान कैसा व्यवहार करता है।

अंतिम सच्चाई

आज उच्च शिक्षा का संकट एक कहानी नहीं है, बल्कि कई कहानियों का संगम है।

यह यूक्रेन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की कहानी है, यह खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर निर्भर परिवारों की कहानी है, यह कनाडा के आवास संकट से बदलते छात्र विकल्पों की कहानी है, यह ओडिशा की गर्मी से बदलते टाइमटेबल की कहानी है, और यह उस छात्र की कहानी है जो कक्षा में शांत दिखता है लेकिन भीतर से संघर्ष कर रहा होता है।

आज विश्वविद्यालय इतिहास से बाहर नहीं हैं। वे उसी के बीच खड़े हैं।

और अब उच्च शिक्षा की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह शांति के समय कितनी चमकती है, बल्कि यह है कि उथल-पुथल के समय भी क्या वह सीखने की रोशनी जलाए रख सकती है।

(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। नई नीतियां, डिजिटल शिक्षा का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग—ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब अपनी शिक्षा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जिस तरह भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर दिया है, उससे यह बहस और तेज हो गई है कि क्या भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान व्यवस्था में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

भारत की शिक्षा परंपरा सदियों पुरानी है। नालंदा यूनिवर्सिटी और तक्षशिला जैसे संस्थानों ने कभी दुनिया भर के छात्रों को आकर्षित किया था। लेकिन आधुनिक दौर में वैश्विक शिक्षा के मंच पर भारत की उपस्थिति उतनी प्रभावशाली नहीं रही। अब सरकार और शिक्षा जगत यह मानने लगे हैं कि समय आ गया है जब भारत को अपनी अकादमिक ताकत, शोध क्षमता और ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती से पेश करना चाहिए।

शिक्षा मंत्री का तर्क है कि यह लक्ष्य केवल तकनीकी या वैज्ञानिक शोध से हासिल नहीं होगा। भारत को ज्ञान महाशक्ति बनने के लिए विज्ञान और समाज विज्ञान दोनों को साथ लेकर चलना होगा। अक्सर यह देखा गया है कि वैज्ञानिक शोध जब समाज की वास्तविक जरूरतों से जुड़ता है, तभी उसका असर व्यापक होता है। तकनीकी नवाचार और सामाजिक समझ के बीच तालमेल ही किसी देश को स्थायी प्रगति की ओर ले जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अब भारत को केवल आईटी या तकनीक के नजरिये से नहीं देख रहे। वे भारतीय समाज, लोकतंत्र, इतिहास और अर्थव्यवस्था को समझने में भी गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत वैश्विक शोध के लिए एक बड़ा विषय बन चुका है। ऐसे में भारतीय समाज विज्ञान की भूमिका और भी अहम हो जाती है।

इसी संदर्भ में Tata Institute of Social Sciences द्वारा प्रस्तावित ‘TISS-Global’ जैसी पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य दुनिया भर के उन विद्वानों को एक मंच पर लाना है जो भारत से जुड़े विषयों पर शोध कर रहे हैं। यह पहल अगर सही दिशा में आगे बढ़ती है तो भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और विकास मॉडल पर अधिक संतुलित और व्यापक विमर्श को बढ़ावा मिल सकता है।

हालांकि अंतरराष्ट्रीयकरण की इस प्रक्रिया के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। इससे भारतीय छात्रों को वैश्विक स्तर की शिक्षा और शोध का अवसर मिल सकता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में भारतीय विश्वविद्यालयों की पहचान और स्वायत्तता कमजोर न पड़े। अंतरराष्ट्रीय सहयोग तभी सार्थक होगा, जब वह बराबरी और ज्ञान के साझे आदान-प्रदान पर आधारित हो।

एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या भारत केवल विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां बुलाने तक सीमित रहेगा, या फिर खुद भी वैश्विक शिक्षा के विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में अपने शिक्षा संस्थान स्थापित करने चाहिए। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिल सकती है।

आज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा केवल आर्थिक ताकत की नहीं है। ज्ञान, विचार और शोध की दुनिया में भी देशों के बीच एक तरह की वैचारिक प्रतिस्पर्धा चल रही है। हर देश चाहता है कि उसकी विकास यात्रा और अनुभव वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनें। भारत भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत की युवा आबादी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर शोध सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र मिलता है, तो भारत आने वाले वर्षों में ज्ञान और नवाचार की दुनिया में एक मजबूत स्थान बना सकता है। लेकिन इसके लिए केवल नीतिगत घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, शोध संस्कृति और अकादमिक स्वतंत्रता को भी उतनी ही गंभीरता से मजबूत करना होगा।

भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की चर्चा दरअसल एक बड़े सवाल से जुड़ी है—क्या भारत दुनिया को केवल तकनीकी कौशल ही देगा, या फिर विचार, ज्ञान और बौद्धिक विमर्श का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। अगर यह संतुलन बन पाया, तो आने वाले वर्षों में भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान शक्ति के रूप में उभर सकता है।

भारत की आर्थिक कहानी अक्सर दो सिरों से सुनाई जाती है। एक तरफ बड़े कॉरपोरेट, यूनिकॉर्न स्टार्टअप, चमकती हुई फाइनेंस और टेक्नोलॉजी की इमारतें। दूसरी तरफ नैनो और माइक्रो व्यवसायों की एक विशाल, बेचैन दुनिया—चाय बेचने वाले, घर से पापड़ बनाने वाली महिलाएं, हथकरघा बुनकर, सड़क मरम्मत करने वाले कारीगर, कचरा बीनने वाले, छोटे किसान, गांव के प्रोसेसर, होम बेकर्स और अनौपचारिक ट्यूशन पढ़ाने वाले। यह कोई हाशिए की अर्थव्यवस्था नहीं है। यही असली भारत है—अव्यवस्थित, मानवीय, अनौपचारिक, जुझारू और लंबे समय तक कम आंकी गई।

दशकों तक जमीनी स्तर के इन व्यवसायों को सिर्फ़ गुज़र-बसर का साधन माना गया, विकास का इंजन नहीं। नीतियों ने इन्हें कल्याण का विषय समझा, महत्वाकांक्षी व्यवसाय नहीं। बैंकों ने जोखिम माना, बाज़ार ने अविश्वसनीय। लेकिन चुपचाप, गांवों, बस्तियों और छोटे शहरों में एक बदलाव शुरू हो चुका है। नैनो उद्यमियों की नई पीढ़ी अब सिर्फ़ ज़िंदा रहने से संतुष्ट नहीं है। वे सम्मान, स्थिरता, विस्तार और भविष्य चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनका काम उनके बाद भी ज़िंदा रहे।

इस बदलाव के लिए सोच का नया ढांचा चाहिए। न अकादमिक सिद्धांत, न एमबीए की भारी भाषा। बल्कि ज़मीन से जुड़ा, व्यावहारिक नजरिया—जो गली, खेत, वर्कशॉप और रसोई की भाषा समझे। यहीं नैनो और माइक्रो व्यवसायों के “12 पी” का विचार असरदार बनता है। यह सिर्फ़ मार्केटिंग नहीं, बल्कि जमीनी उद्यम के पूरे जीवनचक्र को नए सिरे से देखने की कोशिश है—शुरुआत की चिंगारी से लेकर लंबे समय की स्थिरता और आगे निकलने तक।

यह कहानी बताती है कि कैसे 12 पी भारत की जमीनी अर्थव्यवस्था को बोझ नहीं, बल्कि छिपी हुई ताक़त के रूप में देखने में मदद कर सकते हैं।

पहला बदलाव: रोज़ी से भविष्य तक (Plan – योजना)

हर नैनो व्यवसाय की शुरुआत एक योजना से होती है, भले वह कही न गई हो। परंपरागत रूप से यह योजना बेहद छोटी होती है—आज कमाओ, आज खाओ। किराना दुकानदार अगले साल के विस्तार के बजाय कल के कैश फ्लो की चिंता करता है। घर पर अचार बनाने वाली महिला अगले ऑर्डर पर ध्यान देती है, ब्रांड पर नहीं।

सबसे बड़ा और ज़रूरी बदलाव मानसिक है। योजना अब सिर्फ़ ज़िंदा रहने की नहीं, भविष्य बनाने की होनी चाहिए। इसका मतलब लंबी स्प्रेडशीट नहीं, बल्कि साफ़ सोच है—मैं यह काम क्यों कर रहा हूं? मैं किस समस्या को हल कर रहा हूं? क्या इसकी ज़रूरत पांच साल बाद भी होगी?

जब सब्ज़ी बेचने वाली समझती है कि उसकी असली पूंजी सब्ज़ी नहीं, बल्कि भरोसा है, या गांव का बढ़ई यह जानता है कि उसकी ताक़त सिर्फ़ मेहनत नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा डिज़ाइन ज्ञान है—तब व्यवसाय का आकार बदलने लगता है। नैनो स्तर पर योजना चरणों में होनी चाहिए—पहले आय स्थिर हो, फिर एक मज़बूत उत्पाद या सेवा बने, उसके बाद विस्तार की सोच आए।

दिखावे नहीं, असली समस्याओं का समाधान (Product – उत्पाद)

ग्रामीण भारत को चालाक आइडिया नहीं, उपयोगी समाधान चाहिए। सबसे सफल नैनो व्यवसाय ट्रेंड से नहीं, रोज़मर्रा की मुश्किलों से पैदा होते हैं। गांव की महिला द्वारा बनाए गए सस्ते, सुरक्षित सैनिटरी पैड सिर्फ़ उत्पाद नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सम्मान और पर्यावरण की समस्या का समाधान हैं। कम लागत का भंडारण बनाने वाला किसान तकनीक नहीं, मजबूरी से लड़ रहा है।

नैनो स्तर पर उत्पाद सिर्फ़ वस्तु नहीं होता, वह भरोसा, स्मृति और कहानी भी होता है। हल्दी की जड़ बेचने से किसान गरीब रहता है, लेकिन उसी हल्दी को साफ़-प्रोसेस कर ब्रांडेड पाउडर बनाना मूल्य पैदा करता है। कच्चे माल से उत्पाद तक का सफर नैनो अर्थव्यवस्था का सबसे ताक़तवर बदलाव है।

भूगोल अब बंधन नहीं (Place – स्थान)

पहले गांव में होने का मतलब था सीमित बाज़ार। आज डिजिटल पुल उस दीवार को तोड़ रहे हैं। स्थानीय हाट और मोहल्ला भरोसे की नींव हैं, लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म विस्तार का रास्ता। महाराष्ट्र का तेल निर्माता दिल्ली में बेच सकता है, पूर्वोत्तर का बांस कारीगर बेंगलुरु तक पहुंच सकता है। गांव अब मंज़िल नहीं, शुरुआत है।

डर नहीं, आत्मसम्मान के साथ कीमत (Price – मूल्य)

नैनो उद्यमियों की सबसे बड़ी कमजोरी है कम कीमत लगाना। डर के कारण—ग्राहक खोने का डर, महंगा दिखने का डर। लेकिन कीमत सिर्फ़ संख्या नहीं, संकेत है। यह बताती है कि आप खुद को कितना महत्व देते हैं। ईमानदार लागत, रचनात्मक पैक साइज और समय के साथ बढ़ती कीमत—यही परिपक्वता है।

भीड़ में अपनी पहचान (Positioning – पहचान)

नैनो व्यवसाय बड़े ब्रांड की नकल से नहीं जीतते। वे अपनी स्थानीय पहचान, स्वाद और कहानी से जीतते हैं। जब उत्पाद जानता है कि वह किसके लिए है, तो उसे चिल्लाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

ग्राहक तक पहुंच, नियंत्रण के साथ (Placement – वितरण)

बीचौलियों के दबदबे से अब नए मॉडल संतुलन बना रहे हैं—सीधा विक्रय, डिजिटल नेटवर्क, उत्पादक समूह। एक से ज़्यादा रास्ते मजबूती देते हैं।

पैकेजिंग जो कहानी कहे (Packaging – पैकेजिंग)

साफ़, सुरक्षित और ईमानदार पैकेजिंग उत्पाद से पहले संदेश देती है। आज पैकेजिंग मूल्य और नैतिकता का संकेत भी है।

इंसान केंद्र में (People – लोग)

हर नैनो व्यवसाय परिवार और समुदाय पर टिका है। यहां रणनीति से ज़्यादा रिश्ते मायने रखते हैं। जब कर्मचारी हिस्सेदार बनते हैं, तब असली बदलाव आता है।

टिकाऊपन ज़रूरत है, शौक नहीं (Planet – पर्यावरण)

कम संसाधनों में काम करने वाले नैनो व्यवसाय पहले से ही टिकाऊ होते हैं। आज यही समझ प्रतिस्पर्धी ताक़त बन रही है।

कैसे काम करते हैं, यह भी उतना ही ज़रूरी (Process – प्रक्रिया)

स्पष्ट प्रक्रियाएं, सही मेहनताना और पारदर्शिता—ये व्यवसाय को अस्थायी से स्थायी बनाती हैं।

भौतिक ढांचा जो मूल्य बचाए (Physicality – अवसंरचना)

छोटा-सा कोल्ड बॉक्स या स्टोरेज भी आय को कई गुना सुरक्षित कर सकता है। सही समय पर सही निवेश संघर्ष को स्थिरता में बदल देता है।

डिजिटल गली में कहानी सुनाना (Promotion – प्रचार)

आज प्रचार बातचीत जैसा है—वीडियो, चैट, रील्स। जब निर्माता खुद बोलता है, भरोसा तेज़ी से बनता है।

रोज़गार से विरासत तक (Progress – प्रगति)

अंततः प्रगति सिर्फ़ आय नहीं, आत्मविश्वास है। जब व्यवसाय बिकने, सौंपे जाने या साझेदारी के काबिल बनता है, तब वह संपत्ति बन जाता है।

भारत के सबसे छोटे व्यवसायों के लिए नई कल्पना

12 पी कोई फॉर्मूला नहीं, बल्कि देखने का नज़रिया हैं। सही सोच के साथ भारत के लाखों नैनो व्यवसाय सम्मान, मजबूती और समावेशी विकास के इंजन बन सकते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ़ बोर्डरूम में नहीं, बल्कि रसोई, गली, खेत और वर्कशॉप में गढ़ी जा रही है—छोटे आकार के, लेकिन असीम संभावनाओं वाले उद्यमियों द्वारा।

केंद्र सरकार ने बजट 2026 में शिक्षा को लेकर जो संकेत दिए हैं, वे यह साफ करते हैं कि अब इस क्षेत्र को हाशिये पर रखने का दौर खत्म हो रहा है। शिक्षा बजट को 1.28 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.39 लाख करोड़ रुपये करना केवल आंकड़ों की बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक है, जिसमें देश की मजबूती की नींव शिक्षा को माना जा रहा है। करीब 11 हजार करोड़ रुपये की सीधी बढ़ोतरी यह बताती है कि सरकार मानती है—अगर भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना है, तो इसकी शुरुआत क्लासरूम से ही होगी।

इस बजट का एक सकारात्मक पहलू यह है कि सरकार की सोच अब केवल किताबी पढ़ाई तक सीमित नहीं रही। स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, डिजिटल क्लासरूम, स्किल डेवलपमेंट, रिसर्च और नई शिक्षा नीति तक, हर स्तर पर सुधार की बात की जा रही है। खास तौर पर स्किल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और जॉब-रेडी छात्रों पर दिया गया जोर इस बात का संकेत है कि शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की कोशिश हो रही है। यह बदलाव समय की मांग भी है, क्योंकि आज की अर्थव्यवस्था डिग्री से ज्यादा कौशल को महत्व देती है।

हालांकि, जब भारत के शिक्षा बजट की तुलना वैश्विक स्तर पर की जाती है, तो तस्वीर थोड़ी जटिल नजर आती है। अमेरिका का शिक्षा बजट करीब 82.4 बिलियन डॉलर, यानी लगभग 7.5 लाख करोड़ रुपये है। यह भारत के मौजूदा बजट से कई गुना अधिक है। अमेरिका शिक्षा, रिसर्च, शिक्षक प्रशिक्षण और एडवांस टेक्नोलॉजी पर खुलकर निवेश करता है, जिसका नतीजा यह है कि वहां की यूनिवर्सिटीज—MIT, हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड—दुनिया में अग्रणी बनी हुई हैं। साफ है कि बड़े निवेश का सीधा असर गुणवत्ता पर पड़ता है।

चीन का उदाहरण भी दिलचस्प है। वहां का शिक्षा बजट भारत के आसपास ही बताया जाता है, लेकिन फर्क प्राथमिकताओं का है। चीन स्किल और वोकेशनल एजुकेशन पर ज्यादा ध्यान देता है और योजनाबद्ध तरीके से बजट का इस्तेमाल करता है। यही वजह है कि मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी कौशल में चीन आज वैश्विक ताकत बना हुआ है। रूस का शिक्षा बजट भारत से अधिक है और वहां प्रति छात्र खर्च भी ज्यादा है, क्योंकि आबादी कम है। इसका असर यह है कि रूस विज्ञान और तकनीक जैसे क्षेत्रों में आज भी मजबूत स्थिति में है।

दक्षिण एशिया की बात करें तो भारत और पाकिस्तान के बीच का अंतर साफ दिखता है। जहां भारत शिक्षा पर लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, वहीं पाकिस्तान का शिक्षा बजट महज कुछ हजार करोड़ रुपये तक सीमित है। यह तुलना दिखाती है कि भारत इस क्षेत्र में अपने पड़ोसियों से काफी आगे है, लेकिन केवल आगे होना ही पर्याप्त नहीं है।

असल सवाल यह है कि बढ़े हुए बजट का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा। अगर यह पैसा केवल इमारतों, घोषणाओं और कागजी योजनाओं तक सीमित रह गया, तो इसका असर जमीन पर कम दिखेगा। जरूरत इस बात की है कि स्कूलों की गुणवत्ता सुधरे, शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण मिले, रिसर्च को वास्तविक समर्थन मिले और छात्रों को ऐसे कौशल मिलें, जो उन्हें रोजगार के काबिल बना सकें।

बजट 2026 ने शिक्षा के लिए एक सकारात्मक संदेश जरूर दिया है। अब चुनौती यह है कि इस बढ़े हुए खर्च को सही दिशा और प्रभावी क्रियान्वयन के साथ जोड़ा जाए। तभी शिक्षा सच में देश को मजबूत बनाने का आधार बन पाएगी, न कि सिर्फ बजट भाषणों का आकर्षक हिस्सा।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ एक महत्वपूर्ण सामाजिक-शैक्षणिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आया है। 15 जनवरी 2026 से लागू हुए इस कानून ने उच्च शिक्षा में मौजूद जातिगत भेदभाव को चुनौती देते हुए एक व्यापक दायरा तय किया है। अब पहली बार अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी “जातिगत भेदभाव” की परिभाषा में शामिल किया गया है। यानी, उच्च शिक्षा में भेदभाव का दंश झेलने वाले ओबीसी समुदाय के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को भी शिकायत दर्ज कराने और न्याय पाने का औपचारिक अधिकार मिला है।

कानून का मूल उद्देश्य स्पष्ट है—विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को एक ऐसा स्थान बनाना, जहां समानता केवल आदर्श न रहे, बल्कि व्यवहार में भी दिखे। हर शिक्षण संस्थान में समान अवसर प्रकोष्ठ और विश्वविद्यालय स्तर पर समानता समिति गठित करने का प्रावधान इसी दिशा में उठाया गया कदम है। यूजीसी के आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि ऐसे नियम की ज़रूरत क्यों महसूस हुई—पिछले पांच सालों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118% की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज की चेतना को झकझोरने वाली है।

लेकिन दूसरी ओर, इसका विरोध भी उतनी ही तेज़ी से उभर रहा है, विशेषकर अगड़ी जातियों से जुड़े समूहों से। करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने इसे “दुरुपयोग की आशंका” के आधार पर खारिज किया है। उनका तर्क है कि नए कानून के बाद “झूठे आरोपों” की बाढ़ आ सकती है। गाजियाबाद के डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि का अनशन करने निकलना और फिर नजरबंद किया जाना इस विरोध की गंभीरता को रेखांकित करता है। यूपी चुनाव 2027 के ठीक पहले यह मुद्दा राजनीतिक रंग भी लेने लगा है।

यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि विरोध कौन कर रहा है, बल्कि यह है कि विरोध किस आधार पर किया जा रहा है। क्या किसी कानून का उद्देश्य “दुरुपयोग की आशंका” के डर से रुक जाना चाहिए? यह तर्क कितना मजबूत है? यदि इसी दलील को स्वीकार कर लिया जाए, तो देश के अधिकांश कानून लागू ही नहीं हो पाएंगे। दुरुपयोग की संभावना हर कानून में रहती है, परंतु समाधान कानून को रोकना नहीं, बल्कि उसे अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।

सच्चाई यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में सवर्ण वर्चस्व का प्रश्न नया नहीं है। आरक्षण व्यवस्था लागू होने के दशकों बाद भी विश्वविद्यालयों में वंचित वर्गों की भागीदारी 15% से अधिक नहीं पहुंच सकी है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम लागू होने के बावजूद दलित उत्पीड़न की घटनाएं थमी नहीं हैं। ऐसे में, जब आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा संस्थान—जो समाज का बौद्धिक केंद्र माने जाते हैं—वहां भेदभाव बढ़ रहा है, तो क्या मौन रहना विकल्प हो सकता है?

नया यूजीसी रेगुलेशन न तो किसी वर्ग के खिलाफ है और न ही किसी को विशेषाधिकार देकर दूसरों पर बोझ डालने जैसा। यह उन अदृश्य दीवारों को तोड़ने का प्रयास है जो पीढ़ियों से उच्च शिक्षा को समावेशी होने से रोकती रही हैं। समानता का अर्थ किसी वर्ग को गिराना नहीं, बल्कि सभी को बराबर अवसर देना है।

बेशक, यह कानून राजनीतिक बहस को जन्म देगा, और आने वाले महीनों में यह माहौल और गर्म होगा। लेकिन इन बहसों के बीच यह भूलना खतरनाक होगा कि शिक्षा केवल डिग्री का माध्यम नहीं—यह सामाजिक न्याय का सबसे मजबूत आधार है। यदि विश्वविद्यालयों में ही भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा कमजोर हो, तो समाज में समानता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

अंततः, इस कानून की सफलता विरोध या समर्थन से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की ईमानदारी से तय होगी। यह लोकतांत्रिक समाज की परीक्षा है कि वह समानता के रास्ते पर आगे बढ़ने की हिम्मत करता है या नहीं।

भारत में 2026 के दौरान एग्रीकल्चर एंट्रेंस टेस्ट से जुड़ी सर्च में स्पष्ट बढ़ोतरी देखी जा रही है—और इसके पीछे की वजह भी साफ है। अब कृषि केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह तकनीक, टिकाऊ विकास, फूड इनोवेशन और बिजनेस से जुड़ा एक आधुनिक और भविष्य उन्मुख करियर क्षेत्र बन चुका है। यही कारण है कि छात्र इस क्षेत्र को तेजी से अपना रहे हैं।

इस बदलाव के केंद्र में वे एंट्रेंस एग्जाम हैं, जो B.Sc एग्रीकल्चर, हॉर्टिकल्चर और अन्य संबंधित पाठ्यक्रमों में प्रवेश का मुख्य माध्यम बनते हैं।

एग्रीकल्चर एंट्रेंस टेस्ट क्या होता है?

एग्रीकल्चर एंट्रेंस टेस्ट एक प्रतिस्पर्धी परीक्षा होती है, जिसके जरिए छात्र स्नातक और स्नातकोत्तर कृषि पाठ्यक्रमों में दाखिला प्राप्त करते हैं। इन परीक्षाओं के माध्यम से छात्रों के बेसिक साइंस ज्ञान, योग्यता और इस क्षेत्र के लिए उनकी तैयारी का आकलन किया जाता है।

भारत में छात्र राष्ट्रीय, राज्य और विश्वविद्यालय स्तर की विभिन्न परीक्षाओं में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, आज के समय में कई छात्र ऐसे विकल्पों की तलाश में हैं जो सरल हों और जहां बार-बार आवेदन करने की जरूरत कम हो।

AIACAT क्यों बटोर रहा है ध्यान?

All India Agriculture Common Aptitude Test एक लोकप्रिय ऑनलाइन एग्रीकल्चर एंट्रेंस टेस्ट के रूप में उभर रहा है, जो छात्रों को एक स्पष्ट और व्यवस्थित प्रवेश प्रक्रिया प्रदान करता है।

यह 60 मिनट की राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन परीक्षा है। इसकी प्रक्रिया आसान है—छात्र ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करते हैं, परीक्षा देते हैं, रिजल्ट देखते हैं और फिर काउंसलिंग के जरिए अपनी पसंद का कॉलेज चुनते हैं।

आज के छात्रों के लिए AIACAT को खास बनाने वाली बातें हैं कि यह पूरी तरह ऑनलाइन है और पूरे भारत में आसानी से उपलब्ध है। यह UG और PG दोनों स्तर के कृषि कोर्स के लिए बनाया गया है और इसमें एग्रीकल्चर साइंस, बायोलॉजी, पर्यावरण विज्ञान और रीजनिंग जैसे विषयों के आधार पर छात्रों की योग्यता जांची जाती है। साथ ही, इसमें काउंसलिंग आधारित एडमिशन प्रक्रिया भी शामिल है, जिससे छात्रों को सही संस्थान चुनने में मदद मिलती है।

कोर्स और करियर के अवसर

AIACAT के माध्यम से छात्र B.Sc एग्रीकल्चर और M.Sc एग्रीकल्चर जैसे कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं। इन कोर्स में फसल उत्पादन, मृदा विज्ञान, प्लांट प्रोटेक्शन और एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स जैसे महत्वपूर्ण विषय पढ़ाए जाते हैं, जो छात्रों को तकनीकी और प्रबंधन दोनों तरह की भूमिकाओं के लिए तैयार करते हैं।

इस क्षेत्र में करियर के कई विकल्प मौजूद हैं, जैसे कृषि अनुसंधान और विकास, सरकारी नौकरियां, एग्रीबिजनेस और फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, तथा एग्री-स्टार्टअप। Indian Council of Agricultural Research और National Bank for Agriculture and Rural Development जैसे संस्थानों में भी रोजगार के अवसर मिलते हैं। नए ग्रेजुएट्स को शुरुआती स्तर पर करीब 3.6 लाख रुपये सालाना तक का पैकेज मिल सकता है, जो अनुभव के साथ बढ़ता है।

अब क्यों बढ़ रहा है कृषि की ओर रुझान?

एग्रीकल्चर एंट्रेंस टेस्ट की बढ़ती लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि छात्रों की सोच में बदलाव आ रहा है। आज के युवा ऐसे करियर की तलाश में हैं जो स्थिर हो, समाज पर सकारात्मक प्रभाव डाले और भविष्य के लिहाज से सुरक्षित हो। कृषि क्षेत्र इन तीनों जरूरतों को पूरा करता है, खासकर जब वैश्विक स्तर पर फूड सिक्योरिटी और सस्टेनेबिलिटी पर जोर बढ़ रहा है।

कुल मिलाकर, यदि आप भारत में एग्रीकल्चर एंट्रेंस टेस्ट की तलाश कर रहे हैं, तो All India Agriculture Common Aptitude Test एक आसान, ऑनलाइन और व्यवस्थित विकल्प के रूप में सामने आता है।

तेजी से आधुनिक हो रहे इस क्षेत्र में सही शुरुआत आपके पूरे करियर को दिशा दे सकती है—और AIACAT उन प्रमुख विकल्पों में शामिल हो चुका है, जिसे आज के छात्र गंभीरता से तलाश रहे हैं।

भारत में डिजाइन एजुकेशन का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। फैशन, कम्युनिकेशन, प्रोडक्ट और डिजिटल डिजाइन जैसे क्षेत्रों में करियर बनाने के लिए अब पहले से ज्यादा छात्र आगे आ रहे हैं। इसी बढ़ती मांग के बीच All India Design Aptitude Test (AIDAT) एक ऐसे राष्ट्रीय स्तर के ऑनलाइन एंट्रेंस टेस्ट के रूप में सामने आया है, जो छात्रों को अलग-अलग निजी संस्थानों के डिजाइन कोर्स में प्रवेश का मौका देता है।

क्या है AIDAT

AIDAT एक ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा है, जिसका उपयोग देशभर के कई निजी विश्वविद्यालय और संस्थान अपने अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट डिजाइन प्रोग्राम्स में एडमिशन के लिए करते हैं। यह परीक्षा छात्रों की डिजाइन से जुड़ी क्षमताओं का मूल्यांकन करती है और उन्हें एक ही टेस्ट के जरिए कई संस्थानों में आवेदन करने का अवसर देती है।

किन स्किल्स का होता है आकलन

इस परीक्षा के जरिए छात्रों की चार मुख्य क्षमताओं को परखा जाता है—विजुअल थिंकिंग और क्रिएटिविटी, लॉजिकल रीजनिंग, ऑब्जर्वेशन स्किल्स और बेसिक डिजाइन अवेयरनेस। यानी यह सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि रचनात्मक सोच और समझ को भी जांचती है।

कौन-कौन से कोर्स मिलते हैं

AIDAT के जरिए क्वालिफाई करने वाले छात्र कई तरह के डिजाइन कोर्स में आवेदन कर सकते हैं। इनमें Bachelor of Design (B.Des), Bachelor of Fine Arts (BFA), Bachelor of Visual Arts और Master of Design (M.Des) जैसे प्रोग्राम शामिल हैं। हालांकि, अंतिम कोर्स विकल्प संबंधित संस्थान पर निर्भर करता है।

किन छात्रों के लिए है बेहतर विकल्प

यह परीक्षा उन छात्रों के लिए उपयोगी मानी जाती है जो एडमिशन की आसान और ऑनलाइन प्रक्रिया चाहते हैं। खासकर वे छात्र जो निजी डिजाइन संस्थानों में दाखिला लेना चाहते हैं या कई अलग-अलग परीक्षाओं के बजाय एक ही एंट्रेंस टेस्ट देना पसंद करते हैं, उनके लिए AIDAT एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

वहीं, जो छात्र सरकारी शीर्ष संस्थानों में प्रवेश का लक्ष्य रखते हैं, उन्हें NID Design Aptitude Test (NID DAT) और Undergraduate Common Entrance Examination for Design (UCEED) जैसी परीक्षाओं की तैयारी भी करनी चाहिए।

परीक्षा पैटर्न और चयन प्रक्रिया

AIDAT का पैटर्न हर साल थोड़ा बदल सकता है, लेकिन आमतौर पर इसमें ऑनलाइन एप्टीट्यूड आधारित प्रश्न होते हैं। इसमें क्रिएटिविटी और लॉजिकल सोच का मूल्यांकन किया जाता है और मेरिट के आधार पर रैंकिंग तैयार की जाती है।

कुछ संस्थान अंतिम चयन के लिए पोर्टफोलियो रिव्यू या पर्सनल इंटरव्यू भी शामिल कर सकते हैं।

क्यों अहम होता जा रहा है AIDAT

AIDAT जैसे एग्जाम भारत में बदलते शिक्षा सिस्टम की ओर इशारा करते हैं। अब संस्थान डिजिटल एडमिशन प्रक्रिया को तेजी से अपना रहे हैं और छात्र भी ऐसे विकल्प चाहते हैं जो ज्यादा आसान और सुलभ हों।

यह परीक्षा एक ऐसे ट्रेंड का हिस्सा है, जहां एडमिशन प्रक्रिया को सरल और छात्र-हितैषी बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

डिजाइन करियर की ओर आसान रास्ता

AIDAT छात्रों को एक केंद्रीकृत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म देता है, जिससे वे आसानी से डिजाइन कोर्स में प्रवेश पा सकते हैं। यह उन छात्रों के लिए खासतौर पर फायदेमंद है जो क्रिएटिव फील्ड में करियर बनाना चाहते हैं लेकिन जटिल एडमिशन प्रक्रियाओं से बचना चाहते हैं।

डिजाइन के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सही परीक्षा और सही संस्थान का चुनाव बेहद जरूरी है। AIDAT इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभर रहा है, जो छात्रों को उनके करियर लक्ष्यों तक पहुंचने में मदद कर सकता है।

सही करियर चुनना अक्सर ग्रेजुएट छात्रों के लिए चुनौती बन जाता है, क्योंकि उन्हें तय करना होता है कि आगे किस दिशा में जाना है। ऐसे में ऑल इंडिया फॉरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट (AIFSET) उन छात्रों के लिए एक अहम शैक्षणिक माध्यम बनकर उभरता है, जो फॉरेंसिक साइंस में एम.एससी करना चाहते हैं और संगठित तरीके से उच्च शिक्षा पाना चाहते हैं।

AIFSET क्या है?

AIFSET एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है, जिसके माध्यम से छात्र भारत की विभिन्न भागीदार विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित फॉरेंसिक साइंस कार्यक्रमों में प्रवेश पा सकते हैं। यह परीक्षा उन छात्रों की पहचान करती है जिनमें फॉरेंसिक साइंस के प्रति गहरी रुचि और इस क्षेत्र में सफल होने की क्षमता हो।

यह परीक्षा छात्रों को पारदर्शी और सुव्यवस्थित प्रवेश प्रणाली प्रदान करती है।

फॉरेंसिक साइंस क्यों चुनें?

फॉरेंसिक साइंस एक बहु-विषयक क्षेत्र है, जो वैज्ञानिक सिद्धांतों को कानूनी प्रक्रियाओं से जोड़ता है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञ अपराध जांच, वैज्ञानिक साक्ष्यों का विश्लेषण और कोर्ट में उपयोग किए जाने वाले तथ्यों की पुष्टि करने का काम करते हैं। अपराध जांच, साइबर सुरक्षा और कानूनी प्रणाली में विशेषज्ञों की बढ़ती मांग के कारण यह क्षेत्र बेहतरीन करियर अवसर प्रदान करता है।

फॉरेंसिक साइंस में एम.एससी करने के बाद छात्रों के लिए कई क्षेत्रों में अवसर खुलते हैं, जैसे:

- फॉरेंसिक प्रयोगशालाएँ

- अपराध जांच विभाग

- लीगल कंसल्टिंग

- रिसर्च और अकादमिक क्षेत्र

AIFSET छात्रों को प्रवेश के तीन संगठित अवसर प्रदान करता है:

सेंट्रलाइज्ड एडमिशन प्रोसेस

एक ही परीक्षा के आधार पर छात्र कई कॉलेजों में आवेदन कर सकते हैं, जिससे अलग-अलग आवेदन भरने की परेशानी नहीं रहती।

मेरिट-आधारित चयन

प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह परीक्षा प्रदर्शन पर आधारित है, जिससे सभी उम्मीदवारों के लिए एक समान प्रतिस्पर्धा कायम होती है।

स्कॉलरशिप के अवसर

AIFSET से जुड़े संस्थानों में छात्र अपनी अकादमिक प्रदर्शन के आधार पर छात्रवृत्ति प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उच्च शिक्षा का खर्च कम होता है।

करियर दिशा

AIFSET छात्रों को फॉरेंसिक साइंस में आगे बढ़ने का स्पष्ट रास्ता दिखाता है और उनके विकल्पों को समझने में मदद करता है।

AIFSET के माध्यम से M.Sc फॉरेंसिक साइंस के लिए पात्रता

आवेदन करने के लिए आमतौर पर छात्रों के पास होना चाहिए:

- विज्ञान में स्नातक डिग्री (जैसे B.Sc फॉरेंसिक साइंस, केमिस्ट्री, बायोलॉजी या संबंधित विषय)

- वह न्यूनतम प्रतिशत जो संबंधित संस्थान निर्धारित करते हैं

- छात्रों को अपने चुने हुए संस्थान की पात्रता शर्तें अवश्य जांचनी चाहिए, क्योंकि इनमें कुछ छोटे अंतर हो सकते हैं।

परीक्षा संरचना और तैयारी

AIFSET में छात्रों की मूल विज्ञान और तर्क क्षमता की जाँच की जाती है। इसमें शामिल हैं:

- बायोलॉजी

- केमिस्ट्री

- फिजिक्स

- लॉजिकल रीजनिंग

तैयारी के लिए छात्रों को बुनियादी विज्ञान और तर्क शक्ति को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।

AIFSET का महत्व

आज अपराध मामलों में वैज्ञानिक प्रमाणों का महत्व बढ़ गया है, लेकिन कई छात्र इस क्षेत्र में करियर बनाने के रास्ते से परिचित नहीं हैं।

AIFSET इस कमी को दूर करता है—

- फॉरेंसिक साइंस करियर के प्रति जागरूकता बढ़ाकर

- प्रवेश का सुनियोजित मार्ग देकर

- छात्रों को ऐसे विश्वविद्यालयों से जोड़कर जिनमें यह कोर्स उपलब्ध है

आखिर में, जो छात्र जिज्ञासु हैं और विश्लेषणात्मक सोच रखते हैं, उनके लिए M.Sc फॉरेंसिक साइंस एक उत्कृष्ट विकल्प है। यह उन्हें विज्ञान को कानून के साथ जोड़कर काम करने का मौका देता है।

AIFSET इस कोर्स में दाखिले का एक संगठित और व्यावहारिक माध्यम प्रदान करता है, जो भविष्य के फॉरेंसिक विशेषज्ञ तैयार करने की दिशा में पहला कदम है।

यदि आप फॉरेंसिक साइंस में करियर बनाना चाहते हैं, तो AIFSET में रजिस्टर कर अपनी यात्रा शुरू करें!

भारत में साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स की मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि समय के साथ डिजिटल सिस्टम अधिक जटिल और उन्नत होते जा रहे हैं। हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा की गई चर्चाओं में यह स्पष्ट किया गया कि बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर को साइबर हमलों से बचाने के लिए तुरंत सुधार की जरूरत है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI), CERT-In और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ हुई उच्च स्तरीय बैठकों में यह चिंता जताई गई कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नई तरह के साइबर खतरों को जन्म दे रहा है। इन खतरों में ऐसे एडवांस्ड टूल्स शामिल हैं, जो पुराने सॉफ्टवेयर की कमजोरियों का फायदा उठाकर हमले करते हैं और पारंपरिक सुरक्षा सिस्टम उन्हें आसानी से पहचान नहीं पाते।

इसी वजह से साइबर सिक्योरिटी 2026 से 2030 के बीच तेजी से उभरता हुआ एक महत्वपूर्ण करियर विकल्प बन गया है।

भारत में साइबर सिक्योरिटी कोर्स 2026

भारत में 2026 के दौरान साइबर सिक्योरिटी कोर्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इन कोर्सों में एथिकल हैकिंग, क्लाउड सिक्योरिटी, AI आधारित थ्रेट डिटेक्शन और कंप्लायंस जैसी जरूरी स्किल्स सिखाई जा रही हैं। छात्र शॉर्ट-टर्म सर्टिफिकेट से लेकर डिग्री प्रोग्राम तक कई विकल्प चुन सकते हैं। उदाहरण के तौर पर NIELIT का 6 हफ्ते का सर्टिफिकेट कोर्स (करीब ₹9,500) और CEH जैसे 6 महीने के प्रोग्राम (₹50,000 से ₹1 लाख) छात्रों को तेजी से जॉब-रेडी बनाते हैं। वहीं IIT कानपुर के एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम और VIT, एमिटी जैसे संस्थानों में BSc डिग्री भी उपलब्ध है। अनुमान है कि 2030 तक इस सेक्टर में करीब 10 लाख नौकरियों का गैप रहेगा, जिससे हायरिंग में 30% तक वृद्धि हो सकती है।

साइबर सिक्योरिटी कोर्स करने के 5 बड़े कारण

भारत में साइबर सिक्योरिटी प्रोफेशनल्स की मांग लगातार बढ़ रही है। कंपनियों को ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत है, जो उनके डिजिटल सिस्टम को रैनसमवेयर, डीपफेक फ्रॉड और डेटा ब्रीच जैसे खतरों से सुरक्षित रख सकें। बैंक, सरकारी एजेंसियां और निजी कंपनियां अपनी साइबर डिफेंस टीम को तेजी से मजबूत कर रही हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, HDFC बैंक और ICICI बैंक जैसे बड़े संस्थान इस क्षेत्र में भारी निवेश कर रहे हैं, जिससे स्किल्ड प्रोफेशनल्स की मांग और बढ़ गई है।

सैलरी और करियर ग्रोथ के लिहाज से भी यह क्षेत्र काफी आकर्षक है। फ्रेशर स्तर पर सिक्योरिटी एनालिस्ट और एथिकल हैकर को ₹8 लाख से ₹15 लाख सालाना तक का पैकेज मिल सकता है। अनुभव बढ़ने के साथ पेनिट्रेशन टेस्टिंग, साइबर कंसल्टिंग और AI सिक्योरिटी एनालिसिस जैसे स्पेशलाइज्ड रोल्स में और बेहतर सैलरी मिलती है। अनुभवी प्रोफेशनल्स आगे चलकर चीफ इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी ऑफिसर (CISO) जैसे शीर्ष पद तक पहुंच सकते हैं।

आज के साइबर खतरे सिर्फ साधारण हैकिंग तक सीमित नहीं हैं। अब इनमें AI, क्लाउड सिस्टम और बड़े डेटा नेटवर्क शामिल हो चुके हैं। साइबर सिक्योरिटी कोर्स छात्रों को ऐसे प्रैक्टिकल स्किल्स सिखाते हैं, जिससे वे वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सकें। इसमें थ्रेट डिटेक्शन, क्लाउड सिक्योरिटी, एथिकल हैकिंग, डिजिटल फॉरेंसिक और साइबर कानून जैसे विषय शामिल होते हैं।

इस क्षेत्र में काम करने का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यहां वर्क फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है। कई कंपनियां रिमोट और हाइब्रिड वर्क का विकल्प देती हैं, जिससे भारत में रहकर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ काम करने का मौका मिलता है। साथ ही, फ्रीलांस प्रोजेक्ट्स और बग बाउंटी प्रोग्राम के जरिए भी अच्छी कमाई की जा सकती है।

भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल इकोनॉमी को सुरक्षित रखने में भी साइबर सिक्योरिटी की अहम भूमिका है। डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन बैंकिंग और सरकारी सेवाओं में बढ़ोतरी के साथ साइबर सुरक्षा की जरूरत और बढ़ गई है। ऐसे में यह करियर न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत है, बल्कि देश की डिजिटल सुरक्षा में योगदान देने का अवसर भी देता है।

साइबर सिक्योरिटी के वैकल्पिक कोर्स

इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक छात्र विभिन्न सर्टिफिकेशन और डिग्री प्रोग्राम चुन सकते हैं। प्रमुख सर्टिफिकेशन में Certified Ethical Hacker (CEH), CompTIA Security+, Certified Information Systems Security Professional (CISSP), Certified Information Security Manager (CISM) और AWS Certified Security शामिल हैं। भारत के कई विश्वविद्यालय BSc इन साइबर सिक्योरिटी और सूचना सुरक्षा में डिप्लोमा कोर्स भी प्रदान कर रहे हैं।

क्या साइबर सिक्योरिटी एक अच्छा करियर विकल्प है?

साइबर सिक्योरिटी आने वाले वर्षों में सबसे स्थिर और हाई-पेइंग करियर विकल्पों में से एक बनकर उभर रहा है। 2026 से 2030 के बीच बढ़ते साइबर खतरे, डिजिटल अपनाने की रफ्तार और इंडस्ट्री की मांग इसे और मजबूत बनाएंगे। यह क्षेत्र छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करता है और उन्हें ऐसे कौशल प्रदान करता है, जिनकी बाजार में लगातार मांग बनी रहेगी।

कुल मिलाकर, साइबर सिक्योरिटी न सिर्फ एक सुरक्षित करियर विकल्प है, बल्कि यह आने वाले समय में टेक्नोलॉजी और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला क्षेत्र है।

आज के दौर में खेती तेजी से बदल रही है। पारंपरिक तरीकों की जगह अब नई टेक्नोलॉजी और वैज्ञानिक तरीके ले रहे हैं। ऐसे समय में BSc Horticulture एक ऐसा कोर्स बनकर सामने आया है, जो खेती को आधुनिक रूप देने के साथ छात्रों को बेहतर करियर के मौके भी देता है। अगर आपकी रुचि पेड़-पौधों, फूलों, फलों और बागवानी में है, तो यह कोर्स आपके लिए एक मजबूत विकल्प हो सकता है।

क्या है BSc Horticulture कोर्स

BSc Horticulture चार साल का ग्रेजुएशन प्रोग्राम है, जिसमें बागवानी और फसलों की उन्नत खेती से जुड़ी पढ़ाई कराई जाती है। इस कोर्स में छात्रों को फल, सब्जियां, फूल और पौधों की देखभाल के साथ-साथ उनकी पैदावार बढ़ाने के वैज्ञानिक तरीके सिखाए जाते हैं।

पढ़ाई के दौरान Pomology (फल विज्ञान), Olericulture (सब्जी विज्ञान), Floriculture (फूलों की खेती), पौध संरक्षण, मिट्टी और जल प्रबंधन जैसे विषय शामिल होते हैं। कोर्स का फोकस सिर्फ थ्योरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर भी बराबर ध्यान दिया जाता है।

एडमिशन के लिए क्या चाहिए

इस कोर्स में दाखिला लेने के लिए 12वीं साइंस स्ट्रीम से पास होना जरूरी है, खासकर Biology या Agriculture विषय के साथ। देश के कई प्रमुख संस्थानों में एडमिशन के लिए ICAR AIEEA, CUET, AIACAT और राज्यों के एंट्रेंस एग्जाम जैसे UPCATET और BCECE के स्कोर को माना जाता है।

करियर के अवसर कैसे हैं

BSc Horticulture करने के बाद छात्रों के पास नौकरी और खुद का काम शुरू करने, दोनों तरह के विकल्प होते हैं। आप Horticulture Officer, Nursery Manager, Agriculture Consultant, Floriculture Specialist या Plantation Manager जैसे प्रोफाइल में काम कर सकते हैं।

सरकारी क्षेत्र में कृषि विभाग, वन विभाग और अन्य संस्थानों में अवसर मिलते हैं, जबकि प्राइवेट सेक्टर में एग्रीकल्चर कंपनियां, फर्टिलाइजर और सीड कंपनियां, ग्रीनहाउस और नर्सरी जैसे सेक्टर में अच्छी मांग रहती है।

देश के टॉप कॉलेज

इस कोर्स के लिए देश में कई प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं। Indian Agricultural Research Institute (पूसा), Tamil Nadu Agricultural University, Punjab Agricultural University और Banaras Hindu University जैसे संस्थान इस क्षेत्र में प्रमुख माने जाते हैं।

इसके अलावा G. B. Pant University of Agriculture and Technology, Chaudhary Charan Singh Haryana Agricultural University और अन्य राज्य कृषि विश्वविद्यालय भी इस कोर्स के लिए अच्छे विकल्प हैं।

सैलरी और ग्रोथ

इस कोर्स के बाद शुरुआत में औसतन 15,000 से 30,000 रुपये प्रति माह तक सैलरी मिल सकती है। जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता है, यह 50,000 रुपये या उससे अधिक भी हो सकती है। अगर आप अपना एग्रीबिजनेस या नर्सरी शुरू करते हैं, तो कमाई की संभावनाएं और बढ़ जाती हैं।

क्यों चुनें यह कोर्स

BSc Horticulture उन छात्रों के लिए बेहतर है जो खेती को करियर के रूप में अपनाना चाहते हैं और आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। इसमें सरकारी और प्राइवेट दोनों क्षेत्रों में मौके मिलते हैं, साथ ही खुद का व्यवसाय शुरू करने की आजादी भी रहती है।

पर्यावरण और सस्टेनेबल खेती पर बढ़ते फोकस को देखते हुए आने वाले समय में इस क्षेत्र में अवसर और तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।

 

 

 

 

 

अगर आपको कार, बाइक या भविष्य की स्मार्ट गाड़ियों में रुचि है, तो ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइन आज के समय में सबसे रोमांचक करियर विकल्पों में से एक बन चुका है। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और स्मार्ट मोबिलिटी के बढ़ते दौर में अब कई छात्र “भारत में ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइनर कैसे बनें” जैसे सवाल खोज रहे हैं। ऐसे में बी.डिज़ाइन इन ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइन (B.Des in Transportation Design) इस क्षेत्र में पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

B.Des in Transportation Design डिज़ाइन क्या है?

बी.डिज़ाइन इन ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइन (B.Des in Transportation Design) चार साल का अंडरग्रेजुएट डिज़ाइन कोर्स है, जिसमें वाहनों और आधुनिक मोबिलिटी सॉल्यूशंस को डिजाइन करना सिखाया जाता है। यह केवल कार की बाहरी बनावट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर भी केंद्रित होता है कि कोई वाहन कैसा दिखे, कैसा महसूस हो और किस तरह काम करे।

इस कोर्स में छात्र कार, बाइक, इलेक्ट्रिक वाहन, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम और भविष्य की मोबिलिटी कॉन्सेप्ट्स डिजाइन करना सीखते हैं। यह कोर्स रचनात्मकता, तकनीक और यूज़र एक्सपीरियंस का संतुलन बनाकर व्यावहारिक और नए डिज़ाइन तैयार करने में मदद करता है।

ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइन में क्या पढ़ाया जाता है?

कोर्स की शुरुआत बेसिक डिज़ाइन स्किल्स से होती है और धीरे-धीरे एडवांस कॉन्सेप्ट्स तक पहुंचती है। छात्रों को वास्तविक प्रोजेक्ट्स पर काम कराया जाता है ताकि वे मजबूत पोर्टफोलियो तैयार कर सकें, जो नौकरी पाने में काफी मददगार होता है।

इसमें स्केचिंग, विजुअल स्टोरीटेलिंग, ऑटोमोटिव डिज़ाइन, 3D मॉडलिंग, डिजिटल टूल्स, एर्गोनॉमिक्स, मटेरियल्स और सस्टेनेबल डिज़ाइन जैसे विषय शामिल होते हैं। कोर्स पूरा होने तक छात्र एक आइडिया को प्रोटोटाइप तक ले जाने की क्षमता विकसित कर लेते हैं।

किन छात्रों के लिए सही है यह कोर्स?

यह कोर्स उन छात्रों के लिए उपयुक्त है जो क्रिएटिव हैं और नई चीजों के बारे में सोचते हैं। अगर आपको स्केच बनाना पसंद है, वाहनों को ध्यान से देखना अच्छा लगता है या भविष्य की गाड़ियों की कल्पना करना पसंद है, तो यह क्षेत्र आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकता है।

इस क्षेत्र में आने के लिए इंजीनियरिंग विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं है, लेकिन तकनीक, डिज़ाइन और इनोवेशन में रुचि होना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है।

भारत और विदेश में करियर स्कोप

ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइन तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र है क्योंकि दुनिया इलेक्ट्रिक और स्मार्ट मोबिलिटी की ओर बढ़ रही है। इससे कुशल डिजाइनर्स की मांग लगातार बढ़ रही है।

बी.डिज़ाइन पूरा करने के बाद छात्र ऑटोमोटिव डिज़ाइनर, ईवी डिज़ाइनर, व्हीकल इंटीरियर डिज़ाइनर, मोबिलिटी डिज़ाइनर और फ्यूचर व्हीकल कॉन्सेप्ट डिज़ाइनर जैसी भूमिकाओं में काम कर सकते हैं।

भारत में Tata Motors, Mahindra & Mahindra और Maruti Suzuki जैसी कंपनियां ट्रांसपोर्टेशन डिजाइनर्स को नियुक्त करती हैं। इसके अलावा ईवी स्टार्टअप्स और अंतरराष्ट्रीय डिज़ाइन स्टूडियोज में भी अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं।

भारत में ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइनर की सैलरी

इस क्षेत्र में सैलरी आपकी स्किल, रचनात्मकता और पोर्टफोलियो की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

फ्रेशर्स को शुरुआत में लगभग 4 से 8 लाख रुपये सालाना तक वेतन मिल सकता है। कुछ वर्षों के अनुभव के बाद यह 8 से 15 लाख रुपये सालाना तक पहुंच सकता है। अनुभवी डिजाइनर्स 20 लाख रुपये सालाना या उससे अधिक भी कमा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के साथ काम करने वालों की कमाई इससे ज्यादा हो सकती है।

भारत में ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइनर कैसे बनें?

इस करियर को अपनाने के लिए छात्रों को 12वीं किसी भी स्ट्रीम से पास करनी होती है। इसके बाद शीर्ष डिज़ाइन कॉलेजों में प्रवेश के लिए एंट्रेंस एग्जाम देना होता है।

मुख्य प्रवेश परीक्षाओं में NIFT Entrance Exam, UCEED, NID DAT और AIDAT शामिल हैं।

ये परीक्षाएं छात्रों की रचनात्मकता, अवलोकन क्षमता और समस्या समाधान कौशल को जांचती हैं। AIDAT को नई पीढ़ी के लिए एक आधुनिक ऑनलाइन परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है, जो पारंपरिक परीक्षा प्रारूप से अलग विकल्प प्रदान करती है।

भारत के प्रमुख कॉलेज

भारत में ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइन या संबंधित कोर्स कराने वाले प्रमुख संस्थानों में National Institute of Design, MIT Institute of Design, Strate School of Design और Unitedworld Institute of Design शामिल हैं।

ये संस्थान इंडस्ट्री एक्सपोजर, पोर्टफोलियो डेवलपमेंट और प्रैक्टिकल लर्निंग पर विशेष ध्यान देते हैं।

भविष्य के लिए क्यों बेहतर है यह करियर

मोबिलिटी का भविष्य तेजी से बदल रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन, ऑटोनॉमस ड्राइविंग और सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट अब सामान्य बनते जा रहे हैं। ऐसे में कंपनियों को ऐसे डिजाइनर्स की जरूरत है जो भविष्य को समझकर नए समाधान तैयार कर सकें।

ट्रांसपोर्टेशन डिजाइनर्स सिर्फ कलाकार नहीं होते, बल्कि वे ऐसे प्रोफेशनल होते हैं जो आने वाले समय में लोगों के सफर का अनुभव तय करते हैं।

बी.डिज़ाइन इन ट्रांसपोर्टेशन डिज़ाइन (B.Des in Transportation Design) उन छात्रों के लिए बेहतरीन करियर विकल्प है जो ऑटोमोबाइल और मोबिलिटी इंडस्ट्री में रचनात्मक करियर बनाना चाहते हैं। यह कोर्स डिज़ाइन, तकनीक और वास्तविक प्रभाव का शानदार मिश्रण प्रदान करता है।

अगर आपका सपना भविष्य की कारें डिजाइन करना या स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैयार करना है, तो यह करियर आपके लिए सही दिशा बन सकता है।

 

 

 

 

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'सिटी ऑफ जॉय' कहे जाने वाले कोलकाता शहर में 16 अप्रैल का दिन वाकई उत्साह से भरा रहा, जब 'एडइनबॉक्स' ने अपना विस्तार करते हुए यहाँ के लोगों के लिए अपनी नई ब्रांच का शुभारम्भ किया। ख़ास बात यह रही कि इस मौके पर इटली से आये मेहमानों के साथ 'एडइनबॉक्स' की पूरी टीम मौजूद थी। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में उदघाटित इस कार्यालय से पूर्व 'एडइनबॉक्स' की शाखाएं दिल्ली, भुवनेश्वर, लखनऊ और बैंगलोर जैसे शहरों में पहले से कार्य कर रही हैं।

कोलकाता में एडइनबॉक्स की नयी ब्रांच के उद्घाटन कार्यक्रम में इटली के यूनिमार्कोनी यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधिमंडल की गरिमामयी उपस्थिति ने इस अवसर को तो ख़ास बनाया ही, सहयोग और साझेदारी की भावना को भी इससे बल मिला। विशिष्ट अतिथियों आर्टुरो लावेल, लियो डोनाटो और डारिना चेशेवा ने 'एडइनबॉक्स' के एडिटर उज्ज्वल अनु चौधरी, बिजनेस और कंप्यूटर साइंस के डोमेन लीडर डॉ. नवीन दास, ग्लोबल मीडिया एजुकेशन काउंसिल डोमेन को लीड कर रहीं मनुश्री मैती और एडिटोरियल कोऑर्डिनेटर समन्वयक शताक्षी गांगुली के नेतृत्व में कोलकाता टीम के साथ हाथ मिलाया। 

समारोह की शुरुआत अतिथियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत से हुई। तत्पश्चात दोनों पक्षों के बीच विचारों और दृष्टिकोणों का सकारात्मक आदान-प्रदान हुआ। डारिना ने पारम्परिक तरीके से रिबन काटकर आधिकारिक तौर पर कार्यालय का उद्घाटन किया और इस मौके को आपसी सहयोग के प्रयासों की दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। बाकायदा इस दौरान यूनिमार्कोनी विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल और EdInbox.com टीम के बीच एक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर भी हुआ। यह पहल शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और प्रगति के लिए साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक छात्रों का नेतृत्व कर इस पहल से उन्हें सशक्त बनाया जा सकता है ताकि वे वैश्विक मंचों पर सफलता के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। 

समारोह के समापन की वेला पर दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे को स्मारिकाएं भेंट की गयीं।  'एडइनबॉक्स' की नई ब्रांच के उद्घाटन के साथ इस आदान-प्रदान की औपचारिकता से दोनों टीमों के बीच मित्रता और सहयोग के बंधन भी उदघाटित हुए।अंततः वक़्त मेहमानों को अलविदा कहने का था, 'एडइनबॉक्स' की कोलकाता टीम ने अतिथियों को विदा तो किया मगर इस भरोसे और प्रण के साथ कि यह नयी पहल भविष्य में संबंधों की प्रगाढ़ता और विकास के नए ठौर तक पहुंचेगी।  

फुटवियर डिजाइन, फैशन और प्रोडक्ट इनोवेशन जैसे उभरते क्षेत्रों में करियर बनाने की सोच रहे छात्रों के लिए अच्छी खबर है। Footwear Design and Development Institute में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए विभिन्न प्रोफेशनल कोर्सेज में एडमिशन की प्रक्रिया जारी है। देशभर में फैले इसके 12 कैंपस—नोएडा, कोलकाता, रोहतक, फुरसतगंज (रायबरेली), चेन्नई, जोधपुर, छिंदवाड़ा, गुना, अंकलेश्वर, पटना, हैदराबाद और चंडीगढ़—में दाखिले के लिए छात्र 5 मई 2026 तक आवेदन कर सकते हैं। नए सत्र की शुरुआत 29 जुलाई 2026 से होगी।

संस्थान छात्रों को चार वर्षीय बैचलर ऑफ डिजाइन (BDes) और बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (BBA) जैसे कोर्स करने का अवसर देता है। BDes प्रोग्राम के तहत फुटवियर डिजाइन एंड प्रोडक्शन, स्पोर्ट्स और लाइफस्टाइल फुटवियर, हाई फैशन फुटवियर, लेदर लाइफस्टाइल प्रोडक्ट डिजाइन, डिजिटल प्रोडक्ट और वर्चुअल प्रोटोटाइपिंग, फैशन डिजाइन, टेक्सटाइल एंड अपेरल डिजाइन और फैशन कम्युनिकेशन जैसे स्पेशलाइजेशन उपलब्ध हैं।

वहीं, BBA प्रोग्राम में रिटेल और फैशन मर्चेंडाइज, सप्लाई चेन मैनेजमेंट, डेटा साइंस एनालिटिक्स और ग्लोबल एवं लग्जरी ब्रांड मैनेजमेंट जैसे विकल्प दिए जाते हैं। ये कोर्स इंडस्ट्री की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए हैं, जिससे छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही व्यावहारिक अनुभव मिल सके।

योग्यता की बात करें तो किसी भी विषय से 12वीं पास छात्र आवेदन कर सकते हैं। BBA के लिए केवल 12वीं पास होना पर्याप्त है, जबकि BDes में प्रवेश के लिए 12वीं के साथ डिजाइन एप्टीट्यूड को भी परखा जाएगा। इसके अलावा अभ्यर्थी की आयु 1 जुलाई 2026 तक 25 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

इन कोर्सेज में प्रवेश के लिए संस्थान की ओर से आयोजित ऑल इंडिया सिलेक्शन टेस्ट (AIST) 2026 देना अनिवार्य होगा। यह परीक्षा 10 मई 2026 को देश के 36 शहरों में आयोजित की जाएगी। परीक्षा के बाद मेरिट के आधार पर छात्रों को काउंसलिंग के लिए बुलाया जाएगा, जहां वे अपने पसंदीदा कोर्स और कैंपस का चयन कर सकेंगे।

इच्छुक उम्मीदवार संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन की अंतिम तिथि 5 मई 2026 तय की गई है, जिसे पहले से आगे बढ़ाया गया है। ऐसे में जो छात्र डिजाइन और फैशन से जुड़े प्रोफेशनल कोर्स में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह एक अच्छा अवसर है।

भारत में कृषि अब केवल पारंपरिक पेशा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक उभरता हुआ आधुनिक करियर विकल्प बन चुका है। एग्रीटेक के बढ़ते उपयोग, खाद्य सुरक्षा पर जोर और सरकार की विभिन्न योजनाओं के चलते इस क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर तेजी से बढ़े हैं। यही वजह है कि 2026 में एग्रीकल्चर एंट्रेंस एग्जाम की तलाश करने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

एग्रीकल्चर एंट्रेंस एग्जाम एक ऐसी परीक्षा होती है, जिसके माध्यम से छात्र B.Sc एग्रीकल्चर, हॉर्टिकल्चर, फॉरेस्ट्री और अन्य संबंधित विषयों में दाखिला प्राप्त करते हैं। यह परीक्षा उन छात्रों के लिए पहला कदम होती है, जो एग्रीबिजनेस, रिसर्च, फूड प्रोडक्शन और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते हैं।

केंद्रीकृत और स्मार्ट प्रवेश प्रक्रिया

All India Agriculture Common Aptitude Test एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के रूप में उभरकर सामने आई है, जो स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर कृषि और उससे जुड़े पाठ्यक्रमों में प्रवेश का अवसर देती है।

यह 60 मिनट की ऑनलाइन परीक्षा पूरे देश में आयोजित की जाती है। इसकी प्रक्रिया सरल है—छात्र ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करते हैं, परीक्षा देते हैं, परिणाम देखते हैं और फिर काउंसलिंग प्रक्रिया के माध्यम से अपनी पसंद का विश्वविद्यालय चुनते हैं।

AIACAT एक यूनिफाइड टेस्टिंग प्लेटफॉर्म के रूप में छात्रों की कृषि शिक्षा के लिए तैयारी को परखता है। इसमें एग्रीकल्चर साइंस, बायोलॉजी, पर्यावरण विज्ञान और लॉजिकल रीजनिंग जैसे विषय शामिल होते हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि छात्र अपने चुने हुए क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं।

क्यों बन रहा है कृषि एक पसंदीदा करियर?

AIACAT जैसी परीक्षाओं की बढ़ती लोकप्रियता यह संकेत देती है कि कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव हो रहा है। आज कृषि तकनीक, नवाचार और टिकाऊ प्रथाओं पर आधारित एक आधुनिक उद्योग बन चुकी है।

इस क्षेत्र में आने वाले छात्र केवल खेती तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे कई नए क्षेत्रों में करियर बना रहे हैं, जैसे—कृषि अनुसंधान और विकास, एग्री-स्टार्टअप, सरकारी संस्थान और फूड प्रोसेसिंग व बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री।

Indian Council of Agricultural Research और National Bank for Agriculture and Rural Development जैसे संस्थानों में भी रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं। एग्रीकल्चर ग्रेजुएट्स को पब्लिक और प्राइवेट दोनों सेक्टर में नौकरी मिलती है। शुरुआती वेतन आमतौर पर करीब 3.6 लाख रुपये सालाना से शुरू होता है, जो अनुभव के साथ बढ़ता जाता है।

कोर्स और करियर स्कोप

AIACAT के माध्यम से छात्र B.Sc और M.Sc एग्रीकल्चर जैसे कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं। इन पाठ्यक्रमों में फसल उत्पादन, मृदा विज्ञान, प्लांट ब्रीडिंग और एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स जैसे विषय शामिल होते हैं। ये कोर्स छात्रों को वैज्ञानिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल भी प्रदान करते हैं, जिससे वे खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ खेती की चुनौतियों का समाधान कर सकें।

छात्रों को क्या जानना चाहिए?

एग्रीकल्चर एंट्रेंस एग्जाम की बढ़ती मांग केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह क्षेत्र छात्रों को ऐसा करियर विकल्प देता है, जिसमें वैज्ञानिक समझ, सामाजिक प्रभाव और लंबे समय तक स्थिरता—सभी एक साथ मिलती है।

आज जो छात्र इस क्षेत्र को चुन रहे हैं, वे न केवल अपने करियर को मजबूत बना रहे हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और भविष्य के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

चीन ने एक बार फिर सख्त कदम उठाते हुए शिक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया है। अब 6 से 15 वर्ष के बच्चों के लिए कोई भी उद्यमी मुनाफा कमाने वाले निजी स्कूल नहीं चला सकेगा। चीन सरकार ने साफ कर दिया है कि शिक्षा को व्यवसाय नहीं बनाया जा सकता। इस फैसले का मकसद बुनियादी शिक्षा को मजबूत करना है, जिससे हर बच्चे को समान अवसर मिल सके। यह कदम भारत समेत कई देशों के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।

चीन ने यह फैसला क्यों लिया

चीन ने 2021 में इस दिशा में सोचकर बड़े ट्यूशन संस्थानों को बंद कर दिया था और नए मुनाफा-आधारित स्कूल खोलने पर रोक लगा दी थी। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करना, शिक्षा में असमानता को घटाना और सीखने की प्रक्रिया पर नियंत्रण बनाए रखना था।

फैसले से पहले चीन में माता-पिता अपनी आय का लगभग 30 प्रतिशत तक बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे थे। इससे अमीर और गरीब बच्चों के बीच खाई बढ़ती जा रही थी। निजी ट्यूशन का बाजार करीब 120 अरब डॉलर का हो चुका था, जिसे चीन ने समय रहते नियंत्रित करने का फैसला लिया।

इन बदलावों का असर भी तेजी से दिखा। शहरी इलाकों में फीस लगभग 70 प्रतिशत तक कम हो गई, कई निजी संस्थान बंद हो गए और अतिरिक्त कोचिंग की होड़ भी कम हो गई। इससे परिवारों को आर्थिक राहत मिली और ग्रामीण-शहरी अंतर भी घटा।

भारत में तेजी से बढ़ता निजी शिक्षा बाजार

भारत की स्थिति काफी हद तक चीन जैसी पुरानी स्थिति को दर्शाती है। यहां निजी स्कूलों और ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफॉर्म जैसे Byju’s का बड़ा बाजार है। देश में इस समय 3 लाख से ज्यादा मुनाफा कमाने वाले स्कूल मौजूद हैं, जबकि माता-पिता अपनी आय का 20-30 प्रतिशत तक IIT और NEET की कोचिंग पर खर्च कर रहे हैं।

यह बाजार हर साल लगभग 25 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जो भविष्य में संकट का संकेत भी दे सकता है। कोचिंग हब्स में हर सप्ताह औसतन 25 छात्र आत्महत्या जैसे गंभीर मामलों का सामना कर रहे हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के लगभग 80 प्रतिशत बच्चों को अब भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है।

भारत सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाए हैं। नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के जरिए समानता पर जोर दिया जा रहा है और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में फीस नियंत्रण लागू किया गया है। हालांकि, अभी भी व्यापक और सख्त नियमों की जरूरत महसूस की जा रही है।

शिक्षकों और संस्थानों के लिए क्या मायने

शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े उद्यमियों के लिए यह समय भविष्य की तैयारी का है। आने वाले वर्षों में शिक्षा नीतियों में बड़े बदलाव संभव हैं और प्राथमिक से लेकर कक्षा 10 तक की शिक्षा को गैर-लाभकारी दिशा में ले जाया जा सकता है। ऐसे में संस्थानों को धीरे-धीरे अपने मॉडल को बदलने की जरूरत है, जहां मुनाफे की सोच से ज्यादा कौशल आधारित शिक्षा और गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए।

सरकारी स्कूलों के साथ साझेदारी भी संस्थानों के लिए स्थिरता ला सकती है। इसके अलावा अब माता-पिता भी केवल परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि बच्चों के समग्र विकास—जैसे खेल, रचनात्मकता और मानसिक स्वास्थ्य—को प्राथमिकता देने लगे हैं। जो स्कूल इस सोच के साथ आगे बढ़ेंगे, वे लंबे समय तक भरोसा कायम रख पाएंगे।

आगे क्या हो सकता है

अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि ऐसे सुधारों से शिक्षा सस्ती और कम तनावपूर्ण बनती है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर सामाजिक पहलुओं जैसे परिवार नियोजन पर भी पड़ सकता है। भारत में भी मुफ्त या कम लागत वाली शिक्षा को लेकर बहस तेज हो रही है और दुनिया भर की नजरें इस पर टिकी हैं।

स्कूल संचालकों के लिए यह सही समय है कि वे अपने संस्थानों को स्थायी और नीतिगत रूप से मजबूत बनाएं। वहीं निवेशकों के लिए स्किल डेवलपमेंट और जॉब-ओरिएंटेड शिक्षा के क्षेत्र में नए अवसर तेजी से उभर सकते हैं।

एक बड़ा सबक

चीन के इस कदम ने शिक्षा क्षेत्र में लागत कम करने के साथ-साथ शिक्षा के मूल उद्देश्य—गुणवत्ता—को फिर से केंद्र में ला दिया है। यदि भारत भी इस दिशा में सख्त कदम उठाता है, तो शिक्षा प्रणाली में बड़ा बदलाव संभव है।

कुल मिलाकर, चीन का यह फैसला भारत के लिए एक प्रेरणा बन सकता है। अब जरूरत है कि हम भी शिक्षा को व्यवसाय नहीं, बल्कि देश के भविष्य के निर्माण के रूप में देखें और हर स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को प्राथमिकता दें।

डिजिटल दौर में शिक्षा का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब पढ़ाई केवल स्कूल की चारदीवारी या भारी किताबों तक सीमित नहीं रही। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने सीखने की प्रक्रिया को नया रूप दिया है और यह छात्रों के लिए एक भरोसेमंद साथी बनकर उभरा है। चाहे देर रात किसी मुश्किल सवाल को समझना हो या परीक्षा से पहले जल्दी रिवीजन करना हो, एआई अब हर समय मदद के लिए उपलब्ध है।

शिक्षा के क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि सीखने के अनुभव को आसान और व्यक्तिगत बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हर छात्र की समझने की गति अलग होती है और एआई इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए उन्हें उनके स्तर के अनुसार मार्गदर्शन देता है।

सीखने का तरीका बदल रहा है

एजुकेशन टेक प्लेटफॉर्म EventBeep के संस्थापक और सीईओ सौरभ मंगरुलकर का कहना है कि एआई अब केवल एक टूल नहीं रहा, बल्कि यह छात्रों के पढ़ने और सोचने के तरीके का हिस्सा बन चुका है। उनके अनुसार, सीखना कभी एक जैसा नहीं होता—कुछ छात्र तेजी से समझते हैं, तो कुछ को ज्यादा समय और दोहराव की जरूरत होती है। ऐसे में एआई हर छात्र के पैटर्न को समझकर उसी के अनुसार मदद करता है, जिससे पढ़ाई आसान और प्रभावी बनती है।

हर छात्र के लिए अलग सीखने का अनुभव

एआई की सबसे बड़ी खासियत उसकी लचीलापन है। पारंपरिक कक्षा में एक शिक्षक के लिए हर छात्र पर अलग-अलग ध्यान देना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन एआई इस कमी को काफी हद तक पूरा करता है। अगर किसी छात्र को किसी विषय में कठिनाई होती है, तो एआई उसे आसान तरीके से समझाता है। वहीं, जो छात्र आगे बढ़ चुके होते हैं, उन्हें ज्यादा चुनौतीपूर्ण अभ्यास दिए जाते हैं।

यह खासकर उन छात्रों के लिए फायदेमंद है जो क्लास में सवाल पूछने में झिझकते हैं। एआई के साथ वे बिना किसी दबाव के अपनी शंकाएं दूर कर सकते हैं।

कभी भी, कहीं भी पढ़ाई

एआई की एक बड़ी ताकत इसकी 24 घंटे उपलब्धता है। छात्र किसी भी समय—चाहे सफर के दौरान या देर रात—अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं। एआई न केवल सवालों के जवाब देता है, बल्कि छात्रों के लिखे हुए कंटेंट को सुधारने और उनके विचारों को स्पष्ट करने में भी मदद करता है। इससे उनकी लेखन क्षमता और समझ दोनों बेहतर होती हैं।

बेहतर नतीजे और समय की बचत

हाल के वर्षों में कई शोधों ने भी एआई आधारित लर्निंग के फायदे दिखाए हैं। 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, एआई ट्यूटर की मदद से छात्रों ने पारंपरिक तरीकों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया और कम समय में अधिक सीखा। यह संकेत देता है कि एआई केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन चुका है।

भविष्य की तैयारी में मददगार

आज की शिक्षा केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। एआई टूल्स का इस्तेमाल करने वाले छात्र बेहतर तरीके से सवाल पूछना, जानकारी को परखना और अपनी गलतियों से सीखना सीख रहे हैं। ये कौशल आने वाले समय में उनके करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

शिक्षक का विकल्प नहीं, सहयोगी है एआई

विशेषज्ञ मानते हैं कि एआई कभी भी शिक्षकों की जगह नहीं ले सकता। मानवीय समझ, प्रेरणा और मार्गदर्शन का अपना अलग महत्व है। हालांकि, एआई एक सहायक के रूप में शिक्षक की पहुंच को बढ़ाता है और हर छात्र तक व्यक्तिगत रूप से मदद पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है।

एआई ने शिक्षा को अधिक लचीला, आसान और व्यक्तिगत बना दिया है। यह छात्रों के लिए एक ऐसा सहयोगी बन रहा है, जो उन्हें उनकी जरूरत के अनुसार सीखने में मदद करता है। आने वाले समय में इसका उपयोग और बढ़ेगा, लेकिन इसका सही संतुलन ही शिक्षा को बेहतर दिशा देगा।

 

 

 

 

 

हाल ही में चर्चित डॉक्यू सीरीज ‘लॉरेंस ऑफ पंजाब’ रिलीज से पहले ही विवादों में घिर गई है। ट्रेलर सामने आने के बाद कई संगठनों और लोगों ने इस पर आपत्ति जताई और इसे बैन करने की मांग उठाई। मामला अदालत तक पहुंचा, जहां सुनवाई के दौरान कोर्ट ने फिलहाल सीरीज की रिलीज पर रोक को बरकरार रखा है।

कोर्ट ने क्या कहा

दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने स्पष्ट किया कि इस मामले में फिलहाल कोई राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार पहले ही ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 (ZEE5) को इस डॉक्यूसीरीज को रिलीज न करने की सलाह दे चुकी है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की एडवाइजरी को रद्द नहीं किया जाता, तब तक मेकर्स इस सीरीज को जारी नहीं कर सकते। इस टिप्पणी के बाद फिलहाल सीरीज की रिलीज पर अनिश्चितता बनी हुई है।

नाम बदलकर रिलीज की आशंका पर भी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने आशंका जताई कि मेकर्स नाम बदलकर या किसी अन्य तरीके से इस कंटेंट को रिलीज कर सकते हैं। इस पर अदालत ने कहा कि यदि ऐसा कोई कदम उठाया जाता है, तो संबंधित पक्ष दोबारा कानूनी विकल्प अपना सकता है।

वहीं, ZEE5 की ओर से पेश वकील ने संकेत दिया कि वे केंद्र सरकार द्वारा 23 और 24 अप्रैल को जारी एडवाइजरी को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह मामला पंजाब पुलिस की रिपोर्ट से जुड़ा है, इसलिए इसे पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट (Punjab and Haryana High Court) में उठाया जा सकता है।

क्या है सीरीज की कहानी

मेकर्स के अनुसार, ‘लॉरेंस ऑफ पंजाब’ को एक केस स्टडी के रूप में तैयार किया गया है। इसमें छात्र राजनीति, म्यूजिक इंडस्ट्री, विचारधारा और मीडिया के नजरिए से एक अपराधी के उभार को दिखाने की कोशिश की गई है।

बताया जा रहा है कि यह सीरीज कुख्यात गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई (Lawrence Bishnoi) के जीवन और उसके आपराधिक नेटवर्क पर आधारित है। इसमें कई हाई-प्रोफाइल अपराधों के नाटकीय चित्रण के साथ वास्तविक घटनाओं का संदर्भ भी शामिल किया गया है। चर्चा है कि इसमें पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला (Sidhu Moosewala) की हत्या जैसी घटनाओं का भी जिक्र किया गया है, जो पहले ही संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।

आगे क्या

फिलहाल कोर्ट के रुख के बाद साफ है कि जब तक केंद्र सरकार की एडवाइजरी प्रभावी है, तब तक इस सीरीज की रिलीज संभव नहीं है। हालांकि, अगर मेकर्स या प्लेटफॉर्म कानूनी चुनौती देते हैं, तो आने वाले दिनों में इस मामले में नई स्थिति बन सकती है।

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ स्थित शेखा झील बर्ड सेंचुरी को रामसर साइट का दर्जा मिल गया है। इसके साथ ही यह भारत की 99वीं अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि बन गई है और प्रदेश में रामसर साइट्स की संख्या बढ़कर 12 हो गई है।

इसकी घोषणा केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। उन्होंने कहा कि यह मान्यता स्थानीय आजीविका, वैश्विक जैव विविधता और जल व जलवायु सुरक्षा को मजबूत करती है। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा, “उत्तर प्रदेश ने 99 का आंकड़ा छू लिया! अलीगढ़ की शेखा झील बर्ड सेंचुरी को रामसर साइट के रूप में घोषित करते हुए बेहद खुशी हो रही है।”

उन्होंने बताया कि यह उपलब्धि भारत की 99वीं रामसर साइट है, जो देश को 100 के ऐतिहासिक आंकड़े के और करीब ले जाती है।

भूपेंद्र यादव ने कहा कि यह मान्यता भारत के संरक्षण प्रयासों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति भी है। उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश में पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन का मिशन लगातार आगे बढ़ रहा है। वेटलैंड संरक्षण और विशेषकर पक्षियों के प्राकृतिक आवास की रक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को एक बार फिर वैश्विक सराहना मिली है।”

उन्होंने शेखा झील के पारिस्थितिक महत्व पर जोर देते हुए बताया कि यह सेंट्रल एशियन फ्लाईवे का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो दुनिया के प्रमुख प्रवासी पक्षी मार्गों में से एक है। यह आर्द्रभूमि सर्दियों में बार-हेडेड गूज, पेंटेड स्टॉर्क और विभिन्न प्रजातियों की बतखों सहित कई प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराती है।

अलीगढ़ जिले में स्थित यह झील प्रवासी पक्षियों के भोजन, विश्राम और प्रजनन के लिए एक अहम शरणस्थल है। सेंट्रल एशियन फ्लाईवे पर इसकी भूमिका इसे न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे क्षेत्र की जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।

रामसर कन्वेंशन एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जो ऐसी आर्द्रभूमियों के संरक्षण और सतत उपयोग पर केंद्रित है, जिन्हें पारिस्थितिक, वनस्पति, जंतु, भौगोलिक और जल संबंधी महत्व के कारण वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। रामसर साइट का दर्जा उन्हीं वेटलैंड्स को दिया जाता है जो जैव विविधता संरक्षण, जल सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शेखा झील बर्ड सेंचुरी के शामिल होने के साथ उत्तर प्रदेश में रामसर साइट्स की संख्या 12 हो गई है, जबकि भारत का कुल आंकड़ा 99 पर पहुंच गया है। यह उपलब्धि देश को 100 रामसर साइट्स के प्रतीकात्मक माइलस्टोन से सिर्फ एक कदम दूर लेकर आती है और वेटलैंड संरक्षण की निरंतर प्राथमिकता को दर्शाती है।

अपनी पोस्ट में यादव ने लोगों को शेखा झील घूमने के लिए भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने लिखा, “पी.एस.: मौका मिले तो शेखा झील ज़रूर जाएं!”

 

 

 

 

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