दिल्ली विश्वविद्यालय (University of Delhi) ने तकनीकी शिक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। विश्वविद्यालय ने घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026 से माइक्रोवेव और कम्यूनिकेशन इंजीनियरिंग के एमटेक प्रोग्राम में प्रवेश के लिए पहली बार GATE स्कोर को मान्यता दी जाएगी। अब तक दिल्ली विश्वविद्यालय केवल पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में ही GATE अंकों का उपयोग करता था।
विश्वविद्यालय का मानना है कि नई व्यवस्था से तकनीकी कोर्स की गुणवत्ता बेहतर होगी और योग्य छात्रों को प्रवेश प्रक्रिया में अधिक पारदर्शी तरीके से मौका मिल सकेगा। यह बदलाव All India Council for Technical Education की मंजूरी मिलने के बाद लागू किया गया है।
पहली बार PG टेक्निकल कोर्स में लागू होगा GATE स्कोर
दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुसार 2026 से एमटेक (माइक्रोवेव एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग) कोर्स में दाखिले के लिए वैध GATE स्कोर को प्राथमिक आधार बनाया जाएगा। यह पहली बार है जब विश्वविद्यालय किसी पोस्टग्रेजुएट टेक्निकल प्रोग्राम में प्रवेश के लिए GATE अंकों का इस्तेमाल करेगा।
अब तक विश्वविद्यालय में इस प्रकार के कोर्स में प्रवेश अन्य शैक्षणिक मानदंडों के आधार पर होता था, जबकि GATE स्कोर केवल शोध कार्यक्रमों यानी पीएचडी एडमिशन में मान्य था।
GATE उम्मीदवारों को मिलेगी प्राथमिकता
विश्वविद्यालय की अधिसूचना के अनुसार जिन छात्रों के पास वैध GATE स्कोर होगा, उन्हें प्रवेश प्रक्रिया में सबसे पहले मौका दिया जाएगा। श्रेणीवार मेरिट सूची GATE अंकों के आधार पर तैयार की जाएगी।
अगर सभी सीटें GATE उम्मीदवारों से नहीं भरती हैं, तो बची हुई सीटों पर CUET-PG 2026 मेरिट के आधार पर प्रवेश दिया जाएगा। इससे उन छात्रों को भी अवसर मिलेगा जिनके पास GATE स्कोर नहीं है लेकिन उन्होंने CUET-PG में अच्छा प्रदर्शन किया है।
कौन कर सकेगा आवेदन?
एमटेक कार्यक्रम में आवेदन के लिए उम्मीदवार के पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से BTech, BE, BSc इंजीनियरिंग, MSc या समकक्ष डिग्री होना जरूरी है।
पात्रता में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग और रेडियो फिजिक्स जैसे विषय शामिल किए गए हैं। विश्वविद्यालय का कहना है कि तकनीकी पृष्ठभूमि वाले छात्रों को इस कोर्स में रिसर्च और इंडस्ट्री आधारित सीखने का बेहतर अवसर मिलेगा।
कुल 30 सीटों पर होगा दाखिला
दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस एमटेक प्रोग्राम के लिए कुल 30 सीटें निर्धारित की हैं। इनमें 13 सीटें सामान्य वर्ग, 8 ओबीसी, 4 एससी, 2 एसटी और 3 सीटें अल्पसंख्यक वर्ग के लिए आरक्षित रहेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित सीटों और GATE आधारित चयन प्रक्रिया से कोर्स में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इससे विश्वविद्यालय में तकनीकी शिक्षा का स्तर और मजबूत होने की उम्मीद है।
अलग पोर्टल के जरिए होंगे आवेदन
विश्वविद्यालय ने साफ किया है कि एमटेक प्रवेश प्रक्रिया सामान्य CSAS-PG पोर्टल के तहत नहीं चलेगी। इसके लिए अलग से एडमिशन पोर्टल शुरू किया जाएगा, जहां उम्मीदवार आवेदन कर सकेंगे।
उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी होने वाले विस्तृत दिशा-निर्देश और आवेदन तिथियों पर नजर बनाए रखें।
तकनीकी शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय का यह फैसला छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। इससे राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के जरिए प्रतिभाशाली छात्रों को बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद है।
नौकरी की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। कंपनियां भर्ती प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने के लिए AI आधारित एप्लीकेंट ट्रैकिंग सिस्टम (ATS) का उपयोग कर रही हैं। लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस तकनीक को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अध्ययन में पाया गया है कि AI सिस्टम, इंसानों द्वारा लिखे गए रिज्यूमे की तुलना में AI से तैयार किए गए रिज्यूमे को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।
यह रिसर्च भर्ती प्रक्रिया में बढ़ते ऑटोमेशन और उसके संभावित प्रभावों को समझने के लिए की गई थी। अध्ययन के दौरान 2,245 मानव द्वारा लिखे गए रिज्यूमे का विश्लेषण किया गया। इसके बाद उन्हीं रिज्यूमे के कई AI जनरेटेड संस्करण तैयार किए गए और उन्हें 24 अलग-अलग प्रकार की नौकरियों के लिए टेस्ट किया गया।
AI सिस्टम ने AI रिज्यूमे को दी ज्यादा प्राथमिकता
रिसर्च में सामने आया कि AI आधारित भर्ती सिस्टम ने AI से लिखे गए रिज्यूमे को इंसानों द्वारा तैयार रिज्यूमे की तुलना में लगभग 23 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक ज्यादा पसंद किया। विशेषज्ञों के अनुसार यह अंतर काफी बड़ा माना जा रहा है और इससे भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।
अध्ययन में यह भी देखा गया कि AI सिस्टम रिज्यूमे की भाषा, फॉर्मेटिंग और लिखने के तरीके से काफी प्रभावित हो रहे थे। यानी जिन रिज्यूमे में AI टूल्स द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली संरचना और प्रोफेशनल स्टाइल दिखाई दी, उन्हें अधिक सकारात्मक स्कोर मिला।
किन क्षेत्रों में ज्यादा दिखा असर?
रिपोर्ट के अनुसार अकाउंटिंग, सेल्स और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में यह प्रभाव ज्यादा देखने को मिला। इन सेक्टर में रिज्यूमे की भाषा, प्रस्तुति और प्रोफेशनल टोन को काफी महत्व दिया जाता है। ऐसे में AI आधारित सिस्टम उन रिज्यूमे को तेजी से आगे बढ़ा रहे थे जो मशीन द्वारा तैयार किए गए लग रहे थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उन उम्मीदवारों को नुकसान हो सकता है जो योग्य होने के बावजूद तकनीकी रूप से आकर्षक रिज्यूमे तैयार नहीं कर पाते। खासकर छोटे शहरों या सीमित संसाधनों वाले छात्रों और नौकरी तलाशने वालों पर इसका असर अधिक पड़ सकता है।
भर्ती प्रक्रिया में बढ़ सकता है नया पक्षपात
रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति भर्ती प्रक्रिया में एक नए प्रकार का पक्षपात पैदा कर सकती है। अगर कंपनियां केवल AI आधारित स्क्रीनिंग सिस्टम पर निर्भर रहेंगी, तो कई योग्य उम्मीदवार शुरुआती चरण में ही बाहर हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि AI सिस्टम अक्सर पैटर्न और भाषा शैली के आधार पर निर्णय लेते हैं। ऐसे में जिन लोगों को AI टूल्स का बेहतर इस्तेमाल आता है, उन्हें चयन प्रक्रिया में अतिरिक्त फायदा मिल सकता है। इससे भर्ती प्रक्रिया में समान अवसर का सिद्धांत प्रभावित हो सकता है।
शिक्षा और प्रोफेशनल सेक्टर पर भी पड़ सकता है असर
रिसर्च में यह भी कहा गया है कि यदि इस समस्या को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में इसका असर सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं रहेगा। शिक्षा, प्रोफेशनल ट्रेनिंग और अन्य मूल्यांकन प्रक्रियाओं में भी AI आधारित निर्णय प्रणाली असंतुलन पैदा कर सकती है।
दुनियाभर में AI टूल्स का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में विशेषज्ञ अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि कंपनियां और संस्थान AI सिस्टम का इस्तेमाल करते समय मानवीय समीक्षा और पारदर्शिता को भी बराबर महत्व दें।
क्या पूरी तरह AI पर निर्भर होना सही है?
भर्ती विशेषज्ञों का मानना है कि AI तकनीक भर्ती प्रक्रिया को तेज और व्यवस्थित जरूर बनाती है, लेकिन अंतिम निर्णय में मानव मूल्यांकन की भूमिका खत्म नहीं होनी चाहिए। AI केवल एक सहायक उपकरण हो सकता है, लेकिन उम्मीदवार की वास्तविक क्षमता, अनुभव और सोच को समझने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अब भी जरूरी है।
तेजी से बदलती नौकरी की दुनिया में यह रिसर्च एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है, जो बताती है कि तकनीक की सुविधा के साथ उसके संभावित जोखिमों को समझना भी उतना ही जरूरी है।
सीबीआई (Central Bureau of Investigation) ने NEET UG 2026 पेपर लीक मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए पुणे की एक लेक्चरर को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी के अनुसार आरोपी मनीषा संजय हवलदार मेडिकल प्रवेश परीक्षा के फिजिक्स प्रश्नपत्र को चुनिंदा अभ्यर्थियों तक पहुंचाने में शामिल थी। सीबीआई ने उसे पूरे पेपर लीक नेटवर्क का एक अहम “स्रोत” बताया है।
जांच एजेंसी के मुताबिक मनीषा संजय हवलदार पुणे के Seth Hiralal Saraf Prashala में कार्यरत हैं। सीबीआई का दावा है कि उन्हें National Testing Agency द्वारा परीक्षा प्रक्रिया में विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया था। इस जिम्मेदारी के कारण उन्हें NEET UG 2026 के फिजिक्स प्रश्नपत्र तक पहुंच मिली थी।
अप्रैल में साझा किए गए थे प्रश्न
सीबीआई के अनुसार अप्रैल 2026 में हवलदार ने फिजिक्स विषय के कुछ प्रश्न सह-आरोपी मनीषा मंधारे के साथ साझा किए थे। एजेंसी ने मंधारे को 16 मई को गिरफ्तार किया था। वह पुणे की एक बॉटनी शिक्षिका हैं और उन पर भी पेपर लीक नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप है।
जांच के दौरान यह सामने आया कि हवलदार द्वारा साझा किए गए प्रश्न NEET UG 2026 के फिजिक्स पेपर से मेल खाते हैं। एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि प्रश्नपत्र किन-किन छात्रों और बिचौलियों तक पहुंचाया गया था।
कई राज्यों में छापेमारी, डिजिटल सबूत जब्त
सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान देश के कई शहरों में एक साथ छापेमारी की। इस कार्रवाई में लैपटॉप, मोबाइल फोन, बैंक स्टेटमेंट और कई अहम दस्तावेज जब्त किए गए हैं। एजेंसी फिलहाल डिजिटल और वित्तीय रिकॉर्ड का विश्लेषण कर रही है ताकि पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ी जा सकें।
सूत्रों के अनुसार जांच में ऐसे बिचौलियों की पहचान भी हुई है जो छात्रों से लाखों रुपये लेकर कथित तौर पर लीक प्रश्न उपलब्ध कराते थे। एजेंसी इन लेनदेन से जुड़े बैंक खातों और कॉल रिकॉर्ड की भी जांच कर रही है।
अब तक 11 आरोपी गिरफ्तार
गौरतलब है कि 3 मई को आयोजित NEET UG 2026 परीक्षा को पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोपों के बाद 12 मई को रद्द कर दिया गया था। इसके बाद शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की शिकायत पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया था।
जांच एजेंसी के मुताबिक अब तक दिल्ली, जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे, लातूर और अहिल्यानगर समेत कई शहरों से कुल 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सीबीआई का दावा है कि वह पेपर लीक के मूल स्रोत तक पहुंच चुकी है और पूरे रैकेट की परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं।
21 जून को होगी दोबारा परीक्षा
केंद्र सरकार पहले ही घोषणा कर चुकी है कि NEET UG 2026 की पुनर्परीक्षा 21 जून को आयोजित की जाएगी। लाखों मेडिकल अभ्यर्थियों के लिए यह परीक्षा बेहद अहम मानी जाती है, क्योंकि इसी के जरिए देशभर के MBBS, BDS और अन्य मेडिकल कोर्स में प्रवेश मिलता है।
पेपर लीक मामले ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में अब छात्रों और अभिभावकों की नजर सीबीआई जांच और पुनर्परीक्षा की निष्पक्षता पर टिकी हुई है।
Central Board of Secondary Education (CBSE) की नई तीन-भाषा नीति को लेकर देश के कई शहरों में अभिभावकों और शिक्षकों के बीच असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। बोर्ड द्वारा जारी हालिया सर्कुलर में कहा गया है कि 2026-27 सत्र से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा। इनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होना जरूरी है। इस फैसले को लेकर अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।
दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के कुछ अभिभावकों और शिक्षकों ने इस नीति के खिलाफ याचिका दायर की है। उनका कहना है कि छात्रों को अचानक नई भाषा पढ़ने के लिए मजबूर करना उनकी पढ़ाई और मानसिक संतुलन दोनों पर असर डाल सकता है।
विदेशी भाषाओं को लेकर बढ़ी चिंता
सीबीएसई के नए नियम के अनुसार अगर कोई छात्र फ्रेंच, जर्मन या अन्य विदेशी भाषा पढ़ना चाहता है, तो उसे तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में ही चुनना होगा। बोर्ड का कहना है कि यह फैसला National Education Policy 2020 और NCF-SE 2023 के दिशा-निर्देशों के तहत लिया गया है।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कई छात्र वर्षों से विदेशी भाषाएं पढ़ रहे हैं। ऐसे में कक्षा 9 में अचानक भाषा बदलने से उनकी शैक्षणिक तैयारी प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिहाज से कक्षा 9 और 10 बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं और इस दौरान अतिरिक्त भाषा का दबाव छात्रों के प्रदर्शन पर असर डाल सकता है।
CBSE पर बदले गए वादे का आरोप
याचिका में दावा किया गया है कि अप्रैल 2026 में बोर्ड की ओर से संकेत दिया गया था कि यह नियम 2029-30 से लागू होगा। इसी आधार पर कई स्कूलों और परिवारों ने अपनी शैक्षणिक योजना तैयार की थी। लेकिन मई 2026 में जारी नए सर्कुलर में इसे जुलाई 2026 से लागू करने की बात कही गई।
अभिभावकों का कहना है कि अचानक समयसीमा बदलने से छात्रों, शिक्षकों और स्कूल प्रशासन के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। उनका आरोप है कि इतनी बड़ी नीति को बिना पर्याप्त तैयारी और संक्रमण अवधि के लागू करना व्यावहारिक नहीं माना जा सकता।
शिक्षकों और किताबों की कमी भी बड़ा मुद्दा
याचिका में यह भी कहा गया है कि कई स्कूलों में नई भाषाओं के लिए पर्याप्त शिक्षक और अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है। कुछ स्कूलों में दूसरे विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों से भाषा पढ़ाने की तैयारी कराई जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नई भाषा नीति को सफल बनाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक, पाठ्यपुस्तकें और स्पष्ट कार्यान्वयन योजना बेहद जरूरी होती है। बिना इन व्यवस्थाओं के जल्दबाजी में लागू किया गया फैसला छात्रों के लिए चुनौती बन सकता है।
विदेशी भाषा शिक्षकों के रोजगार पर भी असर की आशंका
नई व्यवस्था को लेकर विदेशी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों और संस्थानों के बीच भी चिंता बढ़ी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अगर विदेशी भाषाएं मुख्य तीन-भाषा प्रणाली से बाहर हो जाती हैं, तो इससे हजारों शिक्षकों के रोजगार पर असर पड़ सकता है।
फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषाओं की पढ़ाई पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों और निजी संस्थानों में तेजी से लोकप्रिय हुई है। ऐसे में नई नीति से इस क्षेत्र में काम कर रहे शिक्षकों और ट्रेनिंग संस्थानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
छात्रों के मानसिक दबाव पर भी बहस
अभिभावकों का कहना है कि कक्षा 9 और 10 पहले से ही छात्रों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होती हैं। बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और अतिरिक्त गतिविधियों के बीच नई भाषा जोड़ना छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ा सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है that नई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य छात्रों को विकल्प और लचीलापन देना था, लेकिन मौजूदा व्यवस्था उसी भावना के विपरीत दिखाई देती है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों की नजर बनी हुई है।
एनटीए (National Testing Agency) ने NEET-UG 2026 अभ्यर्थियों को बड़ी राहत देते हुए परीक्षा शुल्क वापसी की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एजेंसी ने शुक्रवार को एक विशेष ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध कराई, जिसके जरिए उम्मीदवार अपने बैंक खाते की जानकारी जमा कर सकते हैं। यह सुविधा 27 मई 2026 रात 11:50 बजे तक सक्रिय रहेगी।
एनटीए की ओर से जारी सार्वजनिक नोटिस के अनुसार, जिन छात्रों ने NEET-UG 2026 के लिए आवेदन किया था, वे आधिकारिक रजिस्ट्रेशन पोर्टल पर लॉगिन करके ‘फीस रिफंड’ लिंक के माध्यम से अपनी बैंक डिटेल दर्ज कर सकते हैं। छात्रों को अकाउंट होल्डर का नाम, बैंक का नाम, खाता संख्या और IFSC कोड जैसी जरूरी जानकारी भरनी होगी। एजेंसी ने यह भी कहा है कि यदि छात्र चाहें तो सही जानकारी सुनिश्चित करने के लिए कैंसिल चेक की स्कैन कॉपी भी अपलोड कर सकते हैं।
बैंक डिटेल भरते समय बरतनी होगी सावधानी
एनटीए ने उम्मीदवारों को स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि एक बार जमा की गई बैंक जानकारी अंतिम मानी जाएगी। इसके बाद किसी भी प्रकार का बदलाव संभव नहीं होगा। ऐसे में छात्रों को सलाह दी गई है कि वे सभी जानकारियां ध्यान से भरें ताकि रिफंड प्रक्रिया में कोई परेशानी न आए।
एजेंसी ने यह भी कहा है कि छात्र परीक्षा शुल्क को लेकर किसी तरह का चार्जबैक रिक्वेस्ट न करें। इससे रिफंड प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और भुगतान सत्यापन में दिक्कत आ सकती है।
क्यों रद्द हुई थी NEET-UG 2026 परीक्षा?
गौरतलब है कि NEET-UG 2026 परीक्षा पहले 3 मई को आयोजित होनी थी, लेकिन परीक्षा प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद इसे रद्द कर दिया गया था। मामले को लेकर देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच चिंता बढ़ गई थी, जिसके बाद केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय ने हस्तक्षेप किया।
इसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने घोषणा की थी कि NEET-UG 2026 की पुनर्परीक्षा 21 जून 2026 को आयोजित की जाएगी। एनटीए पहले ही साफ कर चुका है कि दोबारा परीक्षा देने वाले छात्रों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा।
छात्रों को वापस मिलेगी पहले जमा की गई फीस
एनटीए ने पुष्टि की है कि पहले जमा की गई परीक्षा फीस उम्मीदवारों को वापस की जाएगी। इसी प्रक्रिया के तहत बैंक डिटेल जमा करने की सुविधा शुरू की गई है। एजेंसी का कहना है कि सही बैंक जानकारी मिलने के बाद रिफंड प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी।
NEET-UG देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में से एक है, जिसमें हर साल लाखों छात्र MBBS, BDS और अन्य मेडिकल कोर्स में दाखिले के लिए शामिल होते हैं। ऐसे में परीक्षा रद्द होने के बाद फीस वापसी और पुनर्परीक्षा को लेकर छात्रों के बीच लगातार सवाल उठ रहे थे। अब एनटीए की नई व्यवस्था से अभ्यर्थियों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
नीट-यूजी परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक विवाद के बाद अब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) आगामी 21 जून को होने वाली दोबारा परीक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क दिखाई दे रही है। परीक्षा में अब एक महीने से भी कम समय बचा है और एजेंसी इस बार किसी भी तरह की चूक से बचने के लिए ‘जीरो ट्रस्ट’ नीति के तहत काम कर रही है। इसका मतलब है कि सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर अब हर स्तर पर अतिरिक्त निगरानी रखी जा रही है।
पिछली परीक्षा के बाद छात्रों और अभिभावकों में भारी नाराजगी देखने को मिली थी। पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया पर उठे सवालों ने देशभर में चिंता बढ़ा दी थी। इसी विवाद के बाद दोबारा परीक्षा कराने का फैसला लिया गया था। फिलहाल इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) कर रही है।
कम समय में परीक्षा कराना NTA के लिए बड़ी चुनौती
सूत्रों के मुताबिक, केवल 30 दिनों के भीतर इतने बड़े स्तर पर परीक्षा दोबारा आयोजित करना एजेंसी के लिए आसान नहीं है। आमतौर पर इस स्तर की राष्ट्रीय परीक्षा की तैयारी में कई महीने लगते हैं, लेकिन इस बार समय बेहद सीमित है।
एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि समय तेजी से निकल रहा है और छोटी सी गलती भी बड़ा विवाद खड़ा कर सकती है। यही वजह है कि एजेंसी हर प्रक्रिया की कई स्तरों पर जांच कर रही है ताकि किसी भी तरह की कमी न रह जाए।
एनटीए का मानना है कि छात्रों का भरोसा बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। एजेंसी के सामने सिर्फ परीक्षा कराने की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना भी उतना ही जरूरी है।
पेपर लीक विवाद के बाद सिस्टम में बड़े बदलाव
विवाद के बाद NTA ने अपने आंतरिक सिस्टम और सुरक्षा प्रोटोकॉल में कई बदलाव किए हैं। सूत्रों के अनुसार, अब हर प्रक्रिया में पहले से ज्यादा क्रॉस-चेकिंग की जा रही है। एजेंसी उन सभी कमजोरियों को दूर करने की कोशिश कर रही है जिनकी वजह से पिछली बार सवाल उठे थे।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, खासकर टेलीग्राम चैनलों पर भी विशेष निगरानी रखी जा रही है। जांच एजेंसियों को शक है कि पेपर लीक में ऐसे प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया गया हो सकता है। इसी कारण डिजिटल मॉनिटरिंग को भी मजबूत किया गया है।
निष्पक्ष परीक्षा के लिए गुप्त रणनीति पर काम
सूत्रों का कहना है कि इस बार कई सुरक्षा उपाय ऐसे भी हैं जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा रहा। एजेंसी का मानना है कि अगर सभी रणनीतियों की जानकारी बाहर आ गई, तो नकल और पेपर लीक गिरोह सिस्टम की कमजोरियों को समझने की कोशिश कर सकते हैं।
अंदरूनी स्तर पर भी अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि लंबे समय से सिस्टम से जुड़े लोग भी कभी-कभी गड़बड़ी में शामिल हो सकते हैं। ऐसे मामलों को रोकना सबसे कठिन होता है, इसलिए इस बार हर स्तर पर जवाबदेही तय की जा रही है।
जांच पूरी होने के बाद सामने आएगा पूरा सच
सूत्रों के मुताबिक, पिछली बार कथित तौर पर प्रश्नपत्र का केवल एक हिस्सा प्रभावित हुआ था। अधिकारियों का दावा है कि यदि लीक प्रिंटिंग प्रेस, बैंक या परीक्षा केंद्र से हुआ होता, तो पूरा प्रश्नपत्र बाहर आ सकता था। हालांकि इस मामले में अंतिम सच CBI जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
NTA फिलहाल जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप किए बिना अपनी तैयारियों पर ध्यान दे रहा है। 21 जून को होने वाली परीक्षा को एजेंसी अपनी विश्वसनीयता और नई सुरक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा मान रही है।
छात्रों और अभिभावकों की नजरें अब 21 जून पर
देशभर के लाखों मेडिकल अभ्यर्थी और उनके परिवार अब दोबारा परीक्षा को लेकर चिंतित भी हैं और उम्मीद भी लगाए बैठे हैं। छात्रों की मांग है कि इस बार परीक्षा पूरी तरह निष्पक्ष, सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से आयोजित हो ताकि मेहनत करने वाले उम्मीदवारों को किसी तरह का नुकसान न उठाना पड़े।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परीक्षा केवल छात्रों के भविष्य से जुड़ी नहीं है, बल्कि देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता से भी जुड़ी हुई है।
रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया से खास बातचीत
भारतीय पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक रामनाथ गोयनका अवार्ड से इस वर्ष सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया आज हिंदी मीडिया जगत का एक जाना-पहचाना नाम हैं। जमीनी रिपोर्टिंग, संवेदनशील मुद्दों पर पैनी नजर और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले आकोदिया ने अपने काम के जरिए लगातार यह साबित किया है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी है।
फिलहाल देश के प्रमुख हिंदी अखबार दैनिक भास्कर से जुड़े अवधेश आकोदिया ने अपने करियर में कई अहम रिपोर्ट्स के जरिए जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया है। उनकी पत्रकारिता में ईमानदारी, जोखिम उठाने का साहस और आम लोगों की आवाज को मंच देने की प्रतिबद्धता साफ नजर आती है।
इस विशेष बातचीत में हम उनसे जानेंगे उनके पत्रकारिता सफर की कहानी, इस सम्मान तक पहुंचने का अनुभव, रिपोर्टिंग के दौरान आई चुनौतियां और आज के दौर में मीडिया की बदलती भूमिका पर उनका नजरिया। पेश है एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' से अवधेश आकोदिया की हुई लंबी वार्ता के सम्पादित अंश:
- सबसे पहले, इस वर्ष रामनाथ गोयनका अवार्ड प्राप्त करने पर आपको कैसा महसूस हुआ?
- यह सम्मान पाना हर भारतीय पत्रकार का सपना होता है। मुझे बेहद गर्व और विनम्रता का अनुभव हो रहा है। यह अवार्ड सिर्फ मेरे काम की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने की जीत है जिसे मैंने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए उजागर किया। इससे यह हौसला मिलता है कि सच्ची पत्रकारिता की कीमत आज भी सबसे ज्यादा है।
- इस पुरस्कार के लिए चुने गए आपके स्टोरी/रिपोर्ट की प्रेरणा क्या थी?
- जयपुर में जब फर्जी एनओसी के सहारे अंग प्रत्यारोपण का मामला सामने आया, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ कुछ डॉक्टरों की मिलीभगत नहीं हो सकती। एक मरीज 35 लाख रुपए दे रहा था और अपनी जान दांव पर लगाने वाले गरीब डोनर को सिर्फ 3 लाख मिल रहे थे। अंतरराष्ट्रीय किडनी माफिया द्वारा गरीबों की इस मजबूरी का फायदा उठाना ही मेरे लिए इस नेक्सस की जड़ों तक जाने की सबसे बड़ी प्रेरणा बना।
- रिपोर्ट तैयार करते समय किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और आपने उन्हें कैसे पार किया?
- बांग्लादेश के ढाका में जाकर अंडरकवर ऑपरेशन करना सबसे बड़ी चुनौती थी। भाषा की दीवार, तंग गलियों में डोनर्स को खोजना और पकड़े जाने का जोखिम बहुत बड़ा था। एक बार रिसिपिएंट के रिश्तेदार ने खुद को इंटेलिजेंस अधिकारी बताकर मेरी कड़ी पूछताछ भी की थी। लेकिन पुख्ता दस्तावेजों, गहरी तैयारी और एक स्थानीय ड्राइवर की मदद से मैंने इस ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाया।
- क्या आपको लगता है कि आज भी गंभीर और ग्राउंड-रिपोर्टिंग को पर्याप्त स्पेस मिल रहा है?
- बिल्कुल। अगर आपकी कहानी में दम है और वह जनता से जुड़ी है, तो स्पेस हमेशा मिलेगा। दैनिक भास्कर जैसे संस्थान आज भी लंबी और जोखिम भरी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीज को पहले पन्ने पर पूरी प्रमुखता देते हैं। पाठक आज भी असली 'खबर' पढ़ना चाहते हैं।
- आज की डिजिटल पत्रकारिता पारंपरिक पत्रकारिता से किस तरह अलग हो चुकी है?
- डिजिटल पत्रकारिता में तात्कालिकता है, वहां सूचना सेकंडों में पहुंचती है। लेकिन पारंपरिक पत्रकारिता गहराई, ठहराव और पुख्ता सबूतों पर काम करती है। डिजिटल आपको बताता है कि 'क्या हुआ', जबकि पारंपरिक पत्रकारिता यह बताती है कि 'क्यों और कैसे हुआ'।
- यूथ जर्नलिस्ट्स के लिए आप क्या सबसे महत्वपूर्ण कौशल मानते हैं?
- जिज्ञासा, धैर्य और दस्तावेजों को पढ़ने की क्षमता। सिर्फ बयानों पर खबरें न बनाएं, आरटीआई (RTI) लगाना सीखें और सरकारी रिकॉर्ड्स की गहराइयों में जाकर सच खोजना सीखें।
- क्या सोशल मीडिया ने पत्रकारिता में जानकारी की गुणवत्ता को प्रभावित किया है?
- दोनों तरह से किया है। इसने आवाज़ों को लोकतांत्रिक बनाया है और कई बार बड़ी लीड्स भी यहीं से मिलती हैं। लेकिन दूसरी तरफ, इसने अफवाहों और एजेंडा-आधारित सूचनाओं का अंबार भी लगा दिया है, जिससे पत्रकार का काम (फैक्ट-चेकिंग) और ज्यादा मुश्किल हो गया है।
- आप ‘स्पीड बनाम अक्यूरेसी’ की चुनौती को कैसे देखते हैं?
- मैं हमेशा 'अक्यूरेसी' (सटीकता) को चुनूंगा। एक गलत खबर तेजी से देकर विश्वसनीयता खोने से बेहतर है कि खबर थोड़ी देर से आए, लेकिन 100% सच हो। दस्तावेजों पर आधारित इन्वेस्टिगेशन में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती।
- जब आप किसी संवेदनशील मुद्दे पर ग्राउंड रिपोर्ट करने जाते हैं, आप तैयारी कैसे करते हैं?
- तैयारी ही सब कुछ है। फील्ड पर जाने से पहले मैं महीनों तक 'पेपर ट्रेल' फॉलो करता हूँ— कंपनियों के रिकॉर्ड, सरकारी टेंडर और ऑडिट रिपोर्ट्स खंगालता हूँ। अंडरकवर होने के लिए अपनी 'डमी प्रोफाइल' की एक-एक बारीकी तैयार करता हूँ ताकि फील्ड पर कोई चूक न हो।
- मैदान में रिपोर्टिंग करते समय आपका सबसे यादगार अनुभव कौन सा रहा?
- आरजीएचएस घोटाले का खुलासा सबसे यादगार रहा। मैंने एक 'डमी मरीज' बनकर सीने में दर्द की झूठी शिकायत की। सभी जांचें सामान्य होने के बावजूद मुझे 7 दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया और फर्जी बिल बनाए गए। मुझे बिना बीमारी के हैवी दवाइयां दी गईं, जिससे मैं वॉशरूम में गिर गया था। वह जानलेवा जोखिम था, लेकिन उस खुलासे से 6500 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा गया।
- फील्ड रिपोर्टिंग में सुरक्षा और मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखते हैं?
- इतने भारी और जोखिम भरे प्रोजेक्ट्स के बीच मैं खुद को शांत रखने के लिए साहित्य की ओर मुड़ता हूँ। बशीर बद्र और अल्लामा इकबाल की शायरी मुझे मानसिक सुकून और ऊर्जा देती है। इसके अलावा, पेशेवर तरीके से काम करना और भावनाओं में न बहना सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है।
- कहानी को मानव आवाज़ देने के लिए आप किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?
- मैं हमेशा यह देखता हूँ कि किसी बड़े घोटाले या नीतिगत नाकामी का सीधा असर अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति पर कैसे पड़ रहा है। सिस्टम की खामियों को जब किसी पीड़ित (चाहे वह शोषित डोनर हो या परेशान आम आदमी) के चेहरे और उसके दर्द के साथ दिखाया जाता है, तभी खबर में जान आती है।
- आज मीडिया पर पक्षपात के आरोप बढ़ रहे हैं। आप निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या करते हैं?
- मैं 'डॉक्यूमेंट्री एविडेंस' (दस्तावेजी सबूतों) पर भरोसा करता हूँ। बयान और विचारधाराएं पक्षपाती हो सकती हैं, लेकिन आरटीआई से निकले सरकारी आंकड़े, बैंक रिकॉर्ड और हिडन कैमरे की फुटेज कभी झूठ नहीं बोलते।
- फेक न्यूज़ और मिसइन्फॉर्मेशन के दौर में पत्रकार सत्यापन को कैसे मजबूत कर सकते हैं?
- पत्रकार को हमेशा मूल स्रोत तक जाना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर यकीन न करें। तकनीकी टूल्स का इस्तेमाल करें, क्रॉस-चेक करें और जब तक दो अलग-अलग स्वतंत्र स्रोतों से खबर की पुष्टि न हो जाए, उसे न छापें।
- क्या आपको लगता है कि मीडिया हाउसों पर बढ़ते कॉर्पोरेट दबाव से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित होती है?
- चुनौतियां हमेशा रही हैं, लेकिन अगर पत्रकार के पास अकाट्य सबूत हैं और संस्थान का संपादकीय नेतृत्व मजबूत है, तो अच्छी खबरें कभी नहीं रुकतीं। मैंने कॉरपोरेट और बड़े राजनीतिक गठजोड़ के खिलाफ रिपोर्टिंग की है और भास्कर ने हमेशा मेरे काम का समर्थन किया है।
- आज के न्यूज़ रूम में डेटा जर्नलिज़्म की क्या भूमिका देखते हैं?
- यह आज की खोजी पत्रकारिता की रीढ़ है। भ्रष्टाचार अब लिफाफों में नहीं, बल्कि टेंडरों, ग्रांट्स और डिजिटल ट्रांजैक्शन में होता है। डेटा में पैटर्न खोजना (जैसे एक ही कंपनी को बार-बार ठेका मिलना या फर्जी डीएनए डेटा का खेल) ही आज सबसे बड़ी खबरें दे रहा है।
- AI-आधारित टूल्स को आप पत्रकारिता के लिए खतरा मानते हैं या अवसर?
- यह एक बेहतरीन अवसर है। मैं व्यक्तिगत रूप से बड़ी रिपोर्ट्स को स्ट्रक्चर करने, डेटा विश्लेषण और यहां तक कि विजुअल्स (इमेज जनरेशन) के लिए AI का उपयोग करता हूँ। यह एक टूल है जो पत्रकार की क्षमता को बढ़ाता है, लेकिन फील्ड रिपोर्टिंग और मानवीय संवेदना की जगह कभी नहीं ले सकता।
- ग्राउंड रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने के लिए मीडिया संस्थानों को क्या कदम उठाने चाहिए?
- संस्थानों को पत्रकारों को समय और संसाधन देने चाहिए। इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग एक या दो दिन का काम नहीं है। एक रिपोर्टर को हफ्तों या महीनों तक एक विषय के पीछे लगने की आज़ादी और कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
- इस पुरस्कार के बाद आपका अगला लक्ष्य या प्रोजेक्ट क्या है?
- मैं सिस्टम में मौजूद 'डिजिटल और टेक्नोलॉजिकल सिंडिकेट्स' की गहराई में उतर रहा हूँ। जैसे ई-वेस्ट की तस्करी और एआई (AI) स्टार्टअप्स के नाम पर हो रहे सरकारी ग्रांट्स के घोटाले। मेरी कोशिश हमेशा उन अंधेरे कोनों को रोशन करने की रहती है जहां आम तौर पर किसी की नजर नहीं जाती।
- जर्नलिज़्म पढ़ रहे छात्रों के लिए आपकी तीन मुख्य सलाह क्या होंगी?
- पहली- खूब पढ़ें और खूब घूमें। दूसरी- सवाल पूछने से कभी न डरें। तीसरी- डेस्क डेस्क खेलने के बजाय फील्ड की धूल फांकें, असली खबरें सड़क और फाइलों के बीच ही मिलती हैं।
- क्या आप महसूस करते हैं कि शैक्षिक संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है?
- सिद्धांत अच्छी तरह पढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन जो चीजें फील्ड में सबसे ज्यादा काम आती हैं— जैसे आरटीआई फाइल करना, बैलेंस शीट पढ़ना, या डार्क वेब/डेटा स्क्रैपिंग— उन्हें पाठ्यक्रम में और अधिक व्यावहारिक रूप से शामिल करने की जरूरत है।
- आज के समय में क्षेत्रीय भाषाओं में पत्रकारिता का भविष्य कैसा दिखता है?
- क्षेत्रीय भाषाएं ही भारत की असली ताकत हैं। सबसे बड़ा इम्पैक्ट वहीं होता है जहां आम जनता आपकी बात समझती है। नीतियां भले ही दिल्ली में बनती हों, लेकिन उनका असर क्षेत्रीय स्तर पर ही दिखाई देता है, इसलिए भाषाई पत्रकारिता का भविष्य बेहद उज्ज्वल और शक्तिशाली है।
भौतिक विज्ञानी मोहम्मद सोइफ अहमद से खास बातचीत
महज 30 वर्ष की उम्र में मोहम्मद सोइफ अहमद प्रतिष्ठित इम्पीरियल कॉलेज लंदन में मैरी स्क्लोडोव्स्का-क्यूरी एक्शंस पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप के तहत अपने शोध प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन उनकी यह यात्रा अत्याधुनिक लैब से नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद के एक ऐसे गांव से शुरू हुई, जहां उनके घर में बिजली तक नहीं थी।
प्रश्न: आप बिना बिजली के बड़े हुए। शुरुआती दिनों की सबसे खास याद क्या है?
- मेरे घर में आठवीं कक्षा तक बिजली नहीं थी। हम रोशनी के लिए लालटेन का इस्तेमाल करते थे और पढ़ाई के लिए एक छोटी सी ढिबरी होती थी। मेरे दादा जितना वहन कर सकते थे, उतना करते थे। उस समय यह सब सामान्य लगता था—बस जिंदगी का हिस्सा था। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि उन्हीं परिस्थितियों ने मेरे अंदर अनुशासन और एकाग्रता विकसित की।
प्रश्न: अपनी शुरुआती स्कूली पढ़ाई के बारे में बताइए।
- मैंने कोमनगर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जहां बुनियादी सुविधाएं बहुत कम थीं। केवल एक इमारत थी जो दफ्तर के रूप में इस्तेमाल होती थी और हम आम के पेड़ के नीचे जूट की चटाई पर बैठकर पढ़ाई करते थे। लेकिन सीखने में कभी कोई कमी नहीं आई। दरअसल, वही साल मेरे लिए सबसे ज्यादा सीख देने वाले रहे।
प्रश्न: आपकी शिक्षा में परिवार की क्या भूमिका रही?
- मैं एक संयुक्त परिवार में बड़ा हुआ, जहां पांच बच्चे साथ पढ़ते थे। हम एक-दूसरे की मदद करते थे। गणित में कोई समस्या होती तो मैं अपने मामा से पूछता, और अंग्रेजी में मेरी मौसी मदद करती थीं। यह एक सहयोगी माहौल था। हमने कभी आर्थिक परेशानियों को बाधा के रूप में नहीं देखा।
प्रश्न: आपने आर्थिक तंगी का जिक्र किया है। इसका आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा?
- हम बहुत सादगी से रहते थे। सुबह का नाश्ता अक्सर नहीं होता था—कभी-कभी स्कूल जाने से पहले बिस्कुट या सत्तू खा लेते थे। जो भी स्थानीय रूप से उपलब्ध होता, वही खाते थे। कई बार कई दिनों तक कच्चे केले या कटहल ही खाना पड़ता था। मछली बहुत कम मिलती थी और मटन तो उससे भी कम। लेकिन हमें कभी कमी महसूस नहीं हुई। हमारे लिए पढ़ाई और खेल सबसे महत्वपूर्ण थे।
प्रश्न: आपके परिवार की स्थिति में बदलाव कब आया?
- सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब मेरे पिता को स्कूल शिक्षक की नौकरी मिली। इससे हमारे जीवन में स्थिरता आई। हम नए घर में शिफ्ट हुए और पहली बार घर में बिजली आई। इससे मेरी पढ़ाई भी बेहतर हो गई।
प्रश्न: स्कूल के बाद आपकी पढ़ाई का सफर कैसे आगे बढ़ा?
- दसवीं के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चला गया, जो मेरे परिवार के लिए एक बड़ा कदम था। बाद में मैंने अलियाह यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में इंटीग्रेटेड एमएससी किया, जिसे मैंने 2018 में पूरा किया। वहीं से मैंने रिसर्च को करियर के रूप में गंभीरता से लेना शुरू किया।
प्रश्न: आईआईटी हैदराबाद में पीएचडी करने का निर्णय कैसे लिया?
- GATE परीक्षा पास करने के बाद यह मौका मिला। पहली बार पश्चिम बंगाल से बाहर जाना मेरे लिए बड़ा बदलाव था, लेकिन आईआईटी हैदराबाद ने मुझे आगे बढ़ने का बेहतरीन मंच दिया। मेरे सुपरवाइजर साई संतोष कुमार रावी ने मुझे हर कदम पर सहयोग दिया।
प्रश्न: अपने रिसर्च को आसान भाषा में समझाइए।
- मेरा शोध इस बात पर केंद्रित है कि जब किसी पदार्थ पर प्रकाश डाला जाता है, खासकर अल्ट्राफास्ट लेजर पल्स के जरिए, तो वह कैसे व्यवहार करता है। इससे हमें सोलर सेल, एलईडी और फोटोडिटेक्टर जैसी तकनीकों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इसका उद्देश्य इन डिवाइसों को अधिक कुशल बनाना है।
प्रश्न: वर्तमान में आप कहां काम कर रहे हैं?
- मैं इस समय स्पेन के IMDEA नैनोसाइंसिया में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के रूप में काम कर रहा हूं। यह एक ऐसा इंटरडिसिप्लिनरी स्थान है, जहां भौतिक विज्ञानी, रसायनज्ञ और जीवविज्ञानी मिलकर एडवांस्ड मैटेरियल्स पर काम करते हैं।
प्रश्न: मैरी क्यूरी फेलोशिप आपके लिए क्या मायने रखती है?
- यह मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर है। नवंबर से मैं इम्पीरियल कॉलेज लंदन में अपना खुद का रिसर्च प्रोजेक्ट लीड करूंगा। यह मेरे लंबे समय के लक्ष्य—भारत में, खासकर किसी IIT या प्रमुख संस्थान में अपना रिसर्च ग्रुप बनाने—की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रश्न: क्या आपने कभी इस तरह के सफर की कल्पना की थी?
- बिलकुल नहीं। दसवीं कक्षा तक मुझे यह भी नहीं पता था कि IIT या पीएचडी क्या होती है। मेरा एकमात्र लक्ष्य अपनी कक्षा में टॉप करना था। बाकी सब कुछ धीरे-धीरे अपने आप होता चला गया।
आम के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करने से लेकर दुनिया के शीर्ष संस्थानों में रिसर्च का नेतृत्व करने तक, सोइफ अहमद की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि मेहनत और जिज्ञासा किसी भी परिस्थिति को पीछे छोड़ सकती है।
प्रख्यात भारतीय लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत
श्रीमोयी पियू कुंडू एक प्रख्यात भारतीय लेखिका, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो भारत में जेंडर, यौनिकता और अविवाहित महिलाओं के जीवन से जुड़े मुद्दों पर अपने काम के लिए जानी जाती हैं। वह “स्टेटस सिंगल” की संस्थापक हैं, जो शहरी अविवाहित महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी पहचान को सामने लाने के लिए समर्पित एक कम्युनिटी और प्लेटफॉर्म है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल के जरिए भी उन्होंने अच्छी पहचान बनाई है। श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न 1: सोशल मीडिया और यूट्यूब पर आपके चैनल और पेज काफी लोकप्रिय हैं, आपने इसकी शुरुआत कैसे की?
- मैंने अपना यूट्यूब चैनल 2024 में, मई महीने में शुरू किया था। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर मैं उससे पहले से ही सक्रिय थी। दरअसल, मैं शुरू से ही अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी रही हूं, इसलिए यह मेरे लिए काफी स्वाभाविक रहा। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए मैंने एक समय किताब भी लिखी और अब पॉडकास्ट करती हूं। माध्यम बदलता रहता है, लेकिन अगर मैं लोगों तक अपनी बात पहुंचा पा रही हूं, तो वही मेरी सफलता है।
प्रश्न 2: आप सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अलग-अलग लोगों के साथ कई विषयों पर चर्चा और इंटरव्यू करती हैं। आपके प्लेटफॉर्म पर मुख्य फोकस किन विषयों पर रहता है?
- अगर आप मेरे यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स देखेंगे, तो पाएंगे कि मेरे अधिकतर विषय और मेहमान महिलाओं से जुड़े होते हैं। मैं कोशिश करती हूं कि समाज में मौजूद महिलाओं के अलग-अलग रूप, उनकी भूमिका और उनके योगदान को सामने लाया जाए। महिलाएं समाज को कैसे प्रभावित कर रही हैं—यह सकारात्मक है या नकारात्मक—इन सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।
मेरे कंटेंट में आमतौर पर इंटरव्यू देने वाली महिलाओं के जीवन और काम के अनुभवों को साझा किया जाता है। यही मेरे पॉडकास्ट और वीडियो का मुख्य विषय होता है। हालांकि हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए हर एपिसोड में विषय भी बदलता रहता है।
प्रश्न 3: आप कई बार राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करती हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है? क्या वे निष्पक्षता से संतुष्ट होते हैं?
- देखिए, राजनीति समाज का एक हिस्सा है। यह अच्छा है या बुरा, इसका निर्णय मैं नहीं करूंगी, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। चूंकि राजनीति पूरे समाज को प्रभावित करती है, इसलिए यह कई बार विवादित भी हो जाती है।
लेकिन मेरा मानना है कि अगर बहस और चर्चा के बाद हम किसी बेहतर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो यह जरूरी और उपयोगी है। ऐसी चर्चाएं समाज के लिए नुकसानदायक नहीं बल्कि फायदेमंद हो सकती हैं।
प्रश्न 4: आप आधुनिक दौर के नए मीडिया की प्रतिनिधि हैं। आज के समय में इस मीडिया को आप कैसे देखती हैं?
- आज के दौर का मीडिया मुख्य रूप से सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित है। 2016 में जियो के आने और 2022 में 5G की शुरुआत के बाद भारत में इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ा है। आने वाले समय में यह और बढ़ेगा।
इससे लोगों तक ज्यादा जानकारी और अलग-अलग विचार आसानी से पहुंच पाएंगे और साझा किए जा सकेंगे।
प्रश्न 5: क्या नया मीडिया वास्तव में पारंपरिक मीडिया जैसे टीवी और अखबार को चुनौती दे पाया है?
- आज 2026 में खड़े होकर मैं कह सकती हूं कि नया मीडिया काफी हद तक पारंपरिक मीडिया पर भारी पड़ा है। अखबार और टीवी अब धीरे-धीरे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं और उनकी जगह OTT और सोशल मीडिया ले रहे हैं।
इस डिजिटल दौर में मीडिया अधिक लोकतांत्रिक हो गया है। अब आम लोग भी अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। हालांकि, हर किसी की राय सभी को पसंद नहीं आती, लेकिन यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
प्रश्न 6: नए मीडिया का भविष्य आप कैसा देखती हैं? और आपके अपने प्लेटफॉर्म को लेकर आगे क्या योजना है?
- मेरे अनुसार नए मीडिया का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। तकनीक के विकास के साथ इस क्षेत्र में और भी नई संभावनाएं सामने आएंगी। लोगों को भी तकनीक के साथ खुद को अपडेट करना होगा और आधुनिक सोच अपनानी होगी, नहीं तो वे इस तेजी से बदलती दुनिया के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।
UPSC टॉपर ए.आर. राजा मोहिदीन से विशेष बातचीत
चेन्नई के रहने वाले ए.आर. राजा मोहिदीन (A.R. Rajah Mohaideen) ने इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग यानी Union Public Service Commission (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 7 हासिल कर शानदार सफलता पाई है। मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा का रास्ता चुना और चार वर्षों की निरंतर तैयारी, स्पष्ट लक्ष्य और कड़ी मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया। प्रस्तुत हैं एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' (Raees Ahmad 'Lali') द्वारा उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंश:
रिजल्ट आने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
ए.आर. राजा मोहिदीन: सच कहूं तो मैं पूरी तरह चौंक गया था। मुझे उम्मीद थी कि मेरा चयन हो सकता है, लेकिन टॉप 10 में, वह भी सिंगल डिजिट रैंक मिलेगी—यह सोचा नहीं था। खुशी भी थी, लेकिन यकीन करने में थोड़ा समय लगा।
आपने UPSC की तैयारी कब शुरू की और कितने साल लगे?
राजा मोहिदीन: मैंने 2022 में तैयारी शुरू की थी। अब इसे चार साल हो चुके हैं। यह सफर लंबा था, लेकिन लगातार मेहनत करता रहा।
जामिया की कोचिंग का आपकी सफलता में कितना योगदान रहा?
राजा मोहिदीन: पहले एक साल मैंने चेन्नई में तैयारी की, लेकिन 2023 में प्रीलिम्स पास नहीं कर पाया। इसके बाद मैंने Jamia Millia Islamia की रेजिडेंशियल कोचिंग अकादमी की प्रवेश परीक्षा दी और चयन हो गया। दिल्ली आने के बाद पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा माहौल मिला। प्रोफेसर समीना बानो मैम और अन्य शिक्षकों ने काफी मार्गदर्शन दिया। यहां की लाइब्रेरी, अखबार और सीनियर्स का सहयोग बहुत मददगार रहा। सीनियर्स ने मेरी गलतियां पहचानने और सुधारने में अहम भूमिका निभाई।
पहले प्रयास में क्या कमी रह गई थी?
राजा मोहिदीन: पहले प्रयास में मैं प्रीलिम्स क्लियर नहीं कर पाया। मैंने मॉक टेस्ट की पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं की थी। हालांकि, उसी समय मैं मेंस की तैयारी भी करता रहा। मेंस की लगातार तैयारी का फायदा इस बार मिला और अच्छे अंक आए।
आपके विषय कौन-कौन से थे?
राजा मोहिदीन: जनरल स्टडीज़ तो सभी के लिए समान होता है। मेरा ऑप्शनल विषय एंथ्रोपोलॉजी था।
आप एमबीबीएस डॉक्टर हैं। फिर सिविल सेवा में आने का फैसला क्यों लिया?
राजा मोहिदीन: मैंने Government Cuddalore Medical College से MBBS किया। मेरी मेडिकल पढ़ाई 2016 में शुरू हुई और 2022 में पूरी हुई। शुरुआत में सिविल सेवा में आने की कोई योजना नहीं थी। लेकिन इंटर्नशिप के दौरान ही कोविड-19 महामारी का समय था। मैंने अपने शहर में सिविल सेवकों को लोगों के लिए दिन-रात काम करते देखा। वहीं से प्रेरणा मिली। मुझे लगा कि एक सिविल सेवक के रूप में मैं समाज के बड़े वर्ग की सेवा कर सकता हूं। इसी सोच ने मुझे ग्रेजुएशन के बाद UPSC की तैयारी के लिए प्रेरित किया।
आपके माता-पिता क्या करते हैं?
राजा मोहिदीन: मेरे माता-पिता शिक्षक रहे हैं और फिलहाल तमिलनाडु के सरकारी कॉलेजों में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हैं।
जो छात्र UPSC की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
राजा मोहिदीन: सबसे जरूरी है कि आपका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। हमेशा याद रखें कि आपने यह परीक्षा क्यों चुनी है। यह सफर लंबा हो सकता है—मुझे चार साल लगे। इस दौरान मानसिक मजबूती और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
दूसरी अहम बात है सिलेबस पर फोकस बनाए रखना। तैयारी बिखरी हुई नहीं होनी चाहिए।
रोज कितने घंटे पढ़ाई करनी चाहिए?
राजा मोहिदीन: मेरे हिसाब से घंटों की गिनती उतनी मायने नहीं रखती। जरूरी यह है कि आप अपना तय लक्ष्य पूरा करें। महीने और हफ्ते का टारगेट बनाएं और उसे हर हाल में पूरा करें। कुछ दिन मैंने पांच घंटे पढ़ाई की, कुछ दिन दस घंटे, लेकिन टारगेट पूरा किया।
सफलता का मूल मंत्र क्या रहा?
राजा मोहिदीन: लक्ष्य की स्पष्टता, नियमित तैयारी, सिलेबस पर पकड़ और मानसिक संतुलन—यही मेरी सफलता की कुंजी रहे।
जैसे-जैसे बैंकिंग तेजी से ब्रांच आधारित सेवाओं से आगे बढ़कर पूरी तरह डिजिटल इकोसिस्टम की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस बदलाव को दिशा देने में प्रोडक्ट मैनेजर्स की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इसी बदलाव के केंद्र में काम कर रहे हैं अभिनव श्रीवास्तव, जो तकनीक, नियामकीय ढांचे और ग्राहक-केंद्रित नवाचार के बीच संतुलन बनाकर काम करते हैं।
भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में सात साल से अधिक के अनुभव के साथ, उन्होंने जटिल व्यावसायिक जरूरतों को सुरक्षित, स्केलेबल और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजिटल प्रोडक्ट्स में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
वर्तमान में अभिनव श्रीवास्तव RBL बैंक में सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। वे बैंक के वेब और मोबाइल प्लेटफॉर्म के लिए पूरे प्रोडक्ट रोडमैप और उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालते हैं। इंजीनियरिंग, UX, मार्केटिंग, कंप्लायंस और ऑपरेशंस टीमों के साथ मिलकर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नवाचार सुरक्षा और नियामकीय मानकों के अनुरूप हो। उनका काम प्रोडक्ट के पूरे जीवनचक्र को कवर करता है—आइडिया से लेकर प्राथमिकता तय करने, डिलीवरी और लॉन्च के बाद सुधार तक—और यह सब डेटा आधारित निर्णयों पर आधारित होता है।
अपने करियर में अभिनव ने IndiaLends, ICICI बैंक और कोटक महिंद्रा प्राइम जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है। यहां उन्हें डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म, ग्राहक अधिग्रहण प्रक्रिया, SaaS और CRM सिस्टम तथा बड़े स्तर पर डिजिटल अपनाने का गहरा अनुभव मिला।
शिक्षा की बात करें तो उन्होंने ICFAI फाउंडेशन फॉर हायर एजुकेशन से मार्केटिंग में MBA और PGPM किया है, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल बिजनेस में BBA किया है। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें सख्त नियामकीय माहौल में प्रभावी डिजिटल प्रोडक्ट तैयार करने की मजबूत समझ देती है।
सवाल: आपकी औपचारिक शिक्षा (MBA, PGPM, BBA) ने बैंकिंग जैसे कड़े नियामकीय सेक्टर में प्रोडक्ट स्ट्रैटेजी और निर्णय लेने की सोच को कैसे प्रभावित किया? उन छात्रों को क्या सलाह देंगे जो मानते हैं कि डिग्री ही टेक और फिनटेक में सफलता की गारंटी है?
- मेरी शिक्षा ने निश्चित रूप से एक मजबूत आधार दिया, लेकिन यह कभी भी अकेला अंतर पैदा करने वाला फैक्टर नहीं रही। BBA से मुझे ग्लोबल लेवल पर बिजनेस की समझ मिली, जबकि MBA और PGPM ने उपभोक्ता व्यवहार, रणनीति और निर्णय लेने की क्षमता को और मजबूत किया। बैंकिंग जैसे रेगुलेटेड सेक्टर में यह संरचित सोच काफी मदद करती है, जहां ग्रोथ, कस्टमर एक्सपीरियंस और कंप्लायंस के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
लेकिन करियर की शुरुआत में ही मुझे यह समझ आ गया था कि डिग्रियां आपको असल दुनिया की जटिलताओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं करतीं। क्लासरूम यह नहीं सिखाता कि अधूरी जरूरतों, स्टेकहोल्डर के दबाव या अचानक आने वाले नियामकीय बदलावों को कैसे संभालना है। यह सब अनुभव से ही आता है। जो छात्र मानते हैं कि डिग्री ही सफलता की गारंटी है, उनसे मैं कहूंगा कि डिग्री आपको मौके तक पहुंचा सकती है, लेकिन वहां टिके रहना आपकी सीखने की गति, अनुकूलन क्षमता और काम करने के तरीके पर निर्भर करता है।
सवाल: सीमित संसाधनों में, जब आप वेब, मोबाइल, CRM और लेंडिंग जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म संभालते हैं, तो निवेश को कैसे प्राथमिकता देते हैं? मौजूदा फीचर्स सुधारने और नए फीचर लॉन्च करने के बीच कैसे फैसला करते हैं?
- जब संसाधन सीमित होते हैं, तो मैं सबसे पहले यह देखता हूं कि ग्राहक या बिजनेस की सबसे बड़ी समस्या कहां है। इसके लिए डेटा अहम भूमिका निभाता है—जैसे हाई ट्रैफिक जर्नी, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स और वे प्लेटफॉर्म जो सीधे रेवेन्यू या कंप्लायंस से जुड़े हों। अगर कोई मौजूदा फीचर किसी जरूरी प्रक्रिया में बाधा बन रहा है, तो पहले उसे सुधारना मेरी प्राथमिकता होती है।
मेरे फैसले के मानदंड साफ होते हैं—ग्राहक पर प्रभाव, बिजनेस वैल्यू, नियामकीय जरूरत और मेहनत के मुकाबले मिलने वाला फायदा। बैंकिंग जैसे सेक्टर में मौजूदा जर्नी को बेहतर बनाना अक्सर कम जोखिम के साथ जल्दी परिणाम देता है, जबकि नए फीचर तभी लाए जाते हैं जब वे नया रेवेन्यू, कंप्लायंस समाधान या स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दें।
सवाल: मैनेजमेंट एजुकेशन और आज के डिजिटल प्रोडक्ट लीडर्स से इंडस्ट्री की अपेक्षाओं के बीच आपको क्या अंतर नजर आता है?
- मैनेजमेंट एजुकेशन फ्रेमवर्क और संरचित सोच सिखाने में अच्छा काम करती है, लेकिन इंडस्ट्री आज ऐसे प्रोडक्ट लीडर्स चाहती है जो अनिश्चित परिस्थितियों में भी परिणाम दे सकें। वास्तविक दुनिया में प्राथमिकताएं तेजी से बदलती हैं और अक्सर अधूरी जानकारी के साथ फैसले लेने पड़ते हैं। एक बड़ा अंतर तकनीकी समझ का भी है। प्रोडक्ट लीडर्स को कोडिंग आना जरूरी नहीं है, लेकिन सिस्टम, APIs और प्लेटफॉर्म की समझ होना जरूरी है ताकि वे इंजीनियरिंग टीम के साथ व्यावहारिक निर्णय ले सकें। इसके अलावा, स्टेकहोल्डर मैनेजमेंट और एग्जीक्यूशन स्किल्स—जहां बिजनेस, टेक, UX, कंप्लायंस और टाइमलाइन का संतुलन बनाना पड़ता है—ये चीजें क्लासरूम से ज्यादा फील्ड एक्सपीरियंस से आती हैं।
सवाल: डिजिटल लेंडिंग या बैंकिंग प्रोडक्ट में आप पूरे लाइफसाइकिल के दौरान किन KPIs को ट्रैक करते हैं और उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं?
- मैं KPIs को सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए देखता हूं कि ग्राहक प्रोडक्ट में कहां अटक रहा है। अधिग्रहण चरण में ट्रैफिक क्वालिटी, CTR और लीड से एप्लिकेशन रेशियो पर नजर रहती है। ऑनबोर्डिंग में हर स्टेप पर ड्रॉप-ऑफ, प्रक्रिया पूरी करने में लगा समय और STP रेट अहम होते हैं। एंगेजमेंट के लिए एक्टिव यूजर्स, फीचर यूसेज और जर्नी कम्प्लीशन देखी जाती है। रिटेंशन में रीपीट यूसेज और रिटर्न रेट्स से भरोसे और जुड़ाव का अंदाजा मिलता है। मोनिटाइजेशन में फंडेड अकाउंट या लोन कन्वर्जन, प्रति ग्राहक रेवेन्यू और क्रॉस-सेल पर फोकस रहता है। इन मेट्रिक्स के आधार पर बैकलॉग को प्राथमिकता दी जाती है, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स सुधारे जाते हैं और UX या मैसेजिंग में बदलाव किए जाते हैं।
सवाल: आपके क्षेत्र में निरंतर सीखने की कितनी अहमियत है और यूनिवर्सिटीज को छात्रों को डिजिटल भविष्य के लिए कैसे तैयार करना चाहिए?
- फिनटेक और बैंकिंग में निरंतर सीखना बेहद जरूरी है क्योंकि तकनीक, नियम और ग्राहक की उम्मीदें लगातार बदलती रहती हैं। जो आज काम करता है, वह कुछ सालों में अप्रासंगिक हो सकता है। यूनिवर्सिटीज को चाहिए कि वे खास टूल्स सिखाने के बजाय समस्या समाधान, आलोचनात्मक सोच और अनिश्चितता के साथ काम करने की क्षमता विकसित करें। रियल वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री केस स्टडी और इंटर्नशिप से छात्रों को तेजी से बदलते डिजिटल इकोसिस्टम की बेहतर समझ मिल सकती है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि छात्र सीखते रहना सीखें, न कि डिग्री के साथ सीखने की प्रक्रिया खत्म मान लें।
करियर, कोर्स, कॉलेज और भविष्य—सब कुछ जरूरी लगता है, सब कुछ स्थायी लगता है। रैंकिंग, वायरल सक्सेस स्टोरीज़, सोशल मीडिया की सलाह और अंतहीन तुलना के बीच आज के छात्र विकल्पों की कमी से नहीं, बल्कि स्पष्टता की कमी से जूझ रहे हैं।
एडइनबॉक्स (Edinbox) की Voices That Educate सीरीज़ के इस संस्करण में Edinbox की वर्टिकल हेड–PR और कम्युनिकेशंस, पूजा खन्ना, BCM स्कूल, लुधियाना की फाउंडर प्रिंसिपल वंदना शाही के साथ एक विचारपूर्ण संवाद करती हैं। वंदना शाही राष्ट्रीय पुरस्कार (2022) से सम्मानित हैं और CBSE डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर भी हैं। छात्र-केंद्रित सोच के लिए जानी जाने वाली वंदना शाही नेतृत्व को करुणा, यथार्थ और विवेक के साथ जोड़ती हैं।
प्रश्न 1: आज एक सफल करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
- कई छात्र मानते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाख़िला या किसी “ट्रेंडिंग” स्ट्रीम का चुनाव सफलता की गारंटी है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। आज करियर लचीले, अनिश्चित और पूरी तरह कौशल-आधारित हैं। अब दुनिया केवल डिग्री पर नहीं, बल्कि सोच की फुर्ती, गहरी दक्षता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समस्या-समाधान क्षमता और लगातार सीखने की भूख पर भरोसा करती है।
आज नियोक्ता डिग्री और पदनाम से आगे देखकर ऐसे लोगों को तलाशते हैं जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, तेज़ी से ढल सकें, सार्थक सहयोग करें और वास्तविक समय में मूल्य जोड़ें। इस बदलते परिदृश्य में सफलता उन्हें मिलती है जो व्यापक अनुभव के साथ किसी एक क्षेत्र में गहरी महारत विकसित करते हैं—जो अलग-अलग विषयों को जोड़ पाते हैं और विशेषज्ञता की मजबूत नींव पर खड़े रहते हैं। अंततः सार्थक करियर शुरुआती लेबल या सीधी रेखाओं से नहीं, बल्कि उद्देश्य, निरंतर प्रयास, नैतिक आधार और बदलाव के साथ आगे बढ़ने के साहस से बनता है।
प्रश्न 2: शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई ग्रेजुएट खुद को तैयार क्यों नहीं मानते?
- असल डिसकनेक्ट इरादों में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। शिक्षा को भले ही इंडस्ट्री-ड्रिवन कहा जाए, पर अक्सर जोर कंटेंट मिलान पर रहता है, क्षमता विकास पर नहीं। सिलेबस उद्योग के ट्रेंड दिखा सकता है, लेकिन कक्षा में अब भी रटने, सही जवाब और परीक्षा प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलती है—जबकि कार्यस्थल पर क्रिटिकल थिंकिंग, सहयोग, निर्णय-क्षमता, अनुकूलन और जिम्मेदारी की मांग होती है।
शिक्षा आज छात्रों को परीक्षाएँ पास कराने के लिए तैयार करती है, अस्पष्ट परिस्थितियों से निपटने के लिए नहीं। दूसरी ओर इंडस्ट्री अनिश्चितता में काम करती है, जहाँ समस्याएँ स्पष्ट नहीं होतीं, समाधान विकसित होते रहते हैं और जवाबदेही सबसे अहम होती है। बदलाव की तेज़ रफ्तार इस अंतर को और बढ़ा देती है, क्योंकि स्थिर सिलेबस गतिशील पेशेवर वास्तविकताओं के साथ कदम नहीं मिला पाते।
वास्तविक तालमेल तब बनेगा जब शिक्षा परीक्षा-केंद्रित से अनुभव-केंद्रित बने—जब सीखने में अनुप्रयोग, चिंतन, मेंटरशिप, नैतिक विवेक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर जोर होगा। तभी ग्रेजुएट खुद को कमजोर नहीं, बल्कि सीखने, अनसीखने और आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व करने के लिए सशक्त महसूस करेंगे।
प्रश्न 3: छात्र परिणाम बेहतर करने के लिए सिस्टम में कौन-से बदलाव तात्कालिक हैं?
- सबसे पहले, अंकों-केंद्रित सोच से सीखने-केंद्रित संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। जब सफलता की परिभाषा केवल परीक्षा तय करती है, तो समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और वास्तविक जीवन में उपयोग पीछे छूट जाते हैं। आकलन का उद्देश्य रैंकिंग नहीं, बल्कि विकास और आत्ममंथन होना चाहिए।
दूसरा, शिक्षकों का सशक्तिकरण और सतत पेशेवर विकास अनिवार्य है। 21वीं सदी के परिणाम पुराने प्रशिक्षण से नहीं मिल सकते। शिक्षकों को समय, भरोसा, स्वायत्तता और सीखने-सहयोग-नवाचार के अवसर चाहिए—सशक्त शिक्षक ही छात्रों को गहराई से जोड़ते हैं।
अंत में, अनुभवात्मक सीख, इंटरडिसिप्लिनरी सोच और जरूरी जीवन कौशल को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। छात्रों को सिर्फ परीक्षा या नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जटिलता, अनिश्चितता और आजीवन सीखने के लिए तैयार किया जाए। यही बदलाव शिक्षा को कठोर ढांचे से उत्तरदायी इकोसिस्टम में बदलेंगे।
प्रश्न 4: AI और डिजिटल टूल्स के दौर में कौन-से मानवीय कौशल और महत्वपूर्ण होंगे?
- जब बुद्धिमत्ता को ऑटोमेट किया जा सकता है, तब शिक्षा का पैमाना “क्या जानते हैं” से “कैसे सोचते हैं और क्या बनते हैं” पर आ जाता है। AI के युग में क्रिटिकल थिंकिंग और नैतिक विवेक सबसे जरूरी होंगे—ताकि सत्य पहचाना जा सके, एल्गोरिदम पर सवाल उठाए जा सकें और मूल्य-आधारित निर्णय लिए जा सकें।
रचनात्मकता और मौलिक सोच नवाचार को परिभाषित करेंगी, क्योंकि मशीनें पैटर्न दोहरा सकती हैं, उद्देश्य नहीं। साथ ही भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और प्रभावी संचार नेतृत्व, सहयोग और भरोसे की बुनियाद हैं। बदलाव सामान्य होगा, तो अनुकूलन क्षमता, लचीलापन और आत्म-जागरूकता दीर्घकालिक प्रासंगिकता तय करेंगे। तकनीक क्षमता बढ़ा सकती है, दिशा इंसानी विवेक और जिज्ञासा ही देती है।
प्रश्न 5: शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना जरूरी है और Edinbox जैसी प्लेटफॉर्म्स विश्वसनीयता कैसे बनाए रखें?
- ईमानदार संवाद वैकल्पिक नहीं, बल्कि भरोसे और सार्थक सीख की नींव है। जानकारी की भरमार में स्पष्टता दावों से ज्यादा अहम है। पारदर्शी संवाद अपेक्षाओं को वास्तविकता से जोड़ता है—वरना शिक्षा लेन-देन बनकर रह जाती है।
एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म्स सीखने वालों और संस्थानों के बीच नैतिक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। सटीकता, संपादकीय ईमानदारी और छात्र-केंद्रित कंटेंट को प्राथमिकता देकर ही विश्वसनीयता बनी रहती है। सत्यापित जानकारी, संतुलित दृष्टिकोण और उद्देश्यपूर्ण सामग्री के साथ संस्थागत सहयोग संभव है। ईमानदार और मूल्य-आधारित संवाद शिक्षा संस्कृति को ऊंचा उठाता है।
प्रश्न 6: विकल्पों और रैंकिंग की भीड़ में छात्रों को क्या फ़िल्टर करना चाहिए?
- आज सबसे बड़ा कौशल है—विवेक। रैंकिंग और सलाह मार्गदर्शन दे सकती हैं, पर आत्म-चिंतन का विकल्प नहीं बननी चाहिए। छात्रों को पूछना चाहिए—“क्या लोकप्रिय है?” नहीं, बल्कि “क्या मेरी ताकत, मूल्यों और दीर्घकालिक विकास से मेल खाता है?”
जो ध्यान के योग्य है, वह गहराई बनाता है—ऐसे प्रोग्राम, मेंटर्स और अनुभव जो सोच, लचीलापन, नैतिकता और ट्रांसफरेबल स्किल्स विकसित करें। रैंकिंग एक समय की प्रतिष्ठा दिखाती है, व्यक्तिगत फिट या बदलाव की तैयारी नहीं। शोर में स्पष्टता भीतर से आती है।
प्रश्न 7: महिला लीडर के रूप में आपके सामने कौन-सी सूक्ष्म चुनौतियाँ रहीं?
- कई चुनौतियाँ खुली नहीं थीं—अदृश्य अपेक्षाएँ और खामोश समझौते। बार-बार योग्यता साबित करने का दबाव, सहानुभूति और अधिकार का संतुलन, बिना मान्यता के भावनात्मक श्रम—ये सब यात्रा को आकार देते हैं। कभी महत्वाकांक्षा को आक्रामकता समझा गया, तो संयम को सहमति।
मैंने रणनीतिक आत्म-जागरूकता और आंतरिक लचीलापन विकसित किया—कब दृढ़ बोलना है, कब परिणामों को बोलने देना है; अपराधबोध के बिना सीमाएँ तय करना; संदेह के बिना महत्वाकांक्षा बनाए रखना। मेंटरशिप, चिंतन और मजबूत मूल्य-प्रणाली मेरे सहारे बने। प्रभावी नेतृत्व पुराने ढाँचों में फिट होने से नहीं, बल्कि सोच-समझकर उन्हें नया रूप देने से आता है।
प्रश्न 8: स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभव छात्रों के फैसलों में कैसे मदद करते हैं?
- कहानियाँ अमूर्त विचारों और वास्तविक जीवन के बीच पुल बनाती हैं। डेटा और रैंकिंग जानकारी देते हैं, लेकिन कहानियाँ मानवीय पहलू दिखाती हैं—सफलता, असफलता और पुनर्निर्माण की जटिलताएँ। इससे छात्र समझते हैं कि करियर अक्सर सीधी राह पर नहीं चलते।
कहानियाँ भावनात्मक जुड़ाव और आत्म-चिंतन पैदा करती हैं, पारंपरिक मानकों से आगे संभावनाएँ दिखाती हैं और उन जटिलताओं से परिचित कराती हैं जिन्हें कोई सिलेबस पूरी तरह नहीं सिखा सकता। वास्तविक यात्राओं से जुड़कर छात्र विवेक, लचीलापन और आत्म-जागरूकता विकसित करते हैं—यह प्रेरणा ही नहीं, अंतर्ज्ञान की शिक्षा है।
प्रश्न 9: शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को आगे किस तरह की बातचीत का नेतृत्व करना चाहिए?
- सूचना देने से आगे बढ़कर शिक्षा मीडिया को विवेक का क्यूरेटर और सार्थक संवाद का उत्प्रेरक बनना होगा। उन्हें यह सवाल उठाने चाहिए कि छात्र क्या सीखते हैं ही नहीं, क्यों और किस उद्देश्य से।
ऑटोमेशन, असमानता और तेज़ सामाजिक बदलाव के दौर में शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक के नैतिक उपयोग, मानसिक स्वास्थ्य, समान अवसर, आजीवन सीख और भविष्य के काम पर चर्चा जरूरी है। सनसनी या रैंकिंग-ड्रिवन नैरेटिव्स के बजाय साक्ष्य-आधारित विमर्श को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा मीडिया ट्रेंड्स रिपोर्ट नहीं करता—संस्कृति गढ़ता है।
प्रश्न 10: छात्रों के लिए वह सलाह जो कम सुनते हैं, पर सबसे जरूरी है?
- उपलब्धियों और तेज़ी के शोर में यह याद नहीं दिलाया जाता कि प्रगति से पहले उद्देश्य आता है। हर कोई जल्दी नहीं खिलता, हर योगदान तुरंत दिखाई नहीं देता। विकास अक्सर खामोशी में परिपक्व होता है—चिंतन, सीखने योग्य गलतियों और शांत दृढ़ता से।
स्थायी सफलता तब आती है जब योग्यता, मूल्य और प्रयास एक दिशा में हों—बिना जल्दबाज़ी। सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं से अर्थ, प्रभाव और भलाई रचना है। करुणा, ईमानदारी और सेवा-भाव से जुड़ी महत्वाकांक्षा न सिर्फ करियर बनाती है, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और आशावादी दुनिया का निर्माण करती है।
भारत में शिक्षा केवल किताबों और कक्षाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता, आर्थिक अवसर और देश के भविष्य से सीधे जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में 6 मई को जारी की गई ‘स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) गाइडलाइंस 2026’ को केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज मानना बड़ी भूल होगी। यह दरअसल उस गहरी चिंता का जवाब है, जो पिछले कई वर्षों से सरकारी स्कूलों की गिरती स्थिति को लेकर लगातार बढ़ रही थी।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा जारी इन गाइडलाइंस में पहली बार अभिभावकों को स्कूल प्रबंधन के केंद्र में लाने की स्पष्ट कोशिश दिखाई देती है। स्कूल प्रबंधन समितियों में 75 प्रतिशत अभिभावकों की भागीदारी, महिलाओं को आधी हिस्सेदारी, मासिक बैठक, सामाजिक ऑडिट और तीन साल का विकास प्लान जैसे प्रावधान इस बात का संकेत हैं कि सरकार अब यह समझ चुकी है कि केवल ऊपर से योजनाएं बनाकर सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधारी जा सकती।
असल सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों की मौजूदा स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि अब सरकार को समुदाय आधारित निगरानी की जरूरत महसूस हुई? जवाब है — हां।
देश में करोड़ों गरीब और ग्रामीण परिवार आज भी सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिन स्कूलों को सामाजिक न्याय और समान अवसर का माध्यम होना चाहिए था, वही धीरे-धीरे लोगों का भरोसा खोते गए। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 14.7 लाख स्कूल हैं, जिनमें से 10 लाख से अधिक सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान हैं। इतने बड़े ढांचे के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता लगातार सवालों के घेरे में रही है।
ग्रामीण भारत की तस्वीर सबसे अधिक चिंताजनक है। कई गांवों में स्कूल भवन जर्जर हैं, शिक्षकों की भारी कमी है और पढ़ाई का स्तर बेहद कमजोर हो चुका है। एक शिक्षक कई कक्षाओं को संभाल रहा है। ऊपर से गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ अलग। नतीजा यह हुआ कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का सीखने का स्तर लगातार गिरता गया।
इसका सबसे बड़ा सामाजिक असर यह हुआ कि गरीब परिवार भी अब सरकारी स्कूलों से दूरी बनाने लगे। पहले निजी स्कूल शहरों तक सीमित थे, लेकिन अब गांवों और छोटे कस्बों में भी अंग्रेजी माध्यम और तथाकथित पब्लिक स्कूलों की बाढ़ दिखाई देती है। यह अलग बात है कि इनमें से कई निजी स्कूल खुद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सक्षम नहीं हैं, फिर भी अभिभावकों को वे सरकारी स्कूलों से बेहतर लगते हैं। कारण साफ है — जवाबदेही।
निजी स्कूलों में अभिभावक सीधे सवाल पूछते हैं। फीस देने वाला परिवार स्कूल से परिणाम चाहता है। वहीं सरकारी स्कूलों में लंबे समय तक अभिभावकों की भूमिका लगभग औपचारिक बनी रही। स्कूल प्रबंधन समितियां कागजों तक सीमित रहीं या स्थानीय राजनीति का हिस्सा बन गईं। ऐसे में नई SMC गाइडलाइंस एक महत्वपूर्ण सुधार की शुरुआत हो सकती हैं।
हालांकि केवल समितियां बना देने से शिक्षा व्यवस्था नहीं बदल जाएगी। असली चुनौती इन समितियों को सक्रिय, स्वतंत्र और प्रभावी बनाने की होगी। यदि अभिभावकों को केवल हस्ताक्षर करने तक सीमित रखा गया, तो यह पहल भी पुराने ढर्रे पर चली जाएगी। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि समितियों को वास्तविक अधिकार मिलें, उनकी नियमित ट्रेनिंग हो और उनकी रिपोर्ट पर कार्रवाई भी हो।
महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी का प्रावधान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ग्रामीण समाज में बच्चों की शिक्षा को लेकर माताओं की भूमिका बेहद अहम होती है। यदि उन्हें स्कूल प्रबंधन में प्रभावी स्थान मिलता है, तो स्कूलों की उपस्थिति, स्वच्छता, सुरक्षा और पढ़ाई के माहौल में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।
कोविड महामारी ने भी सरकारी और निजी शिक्षा के बीच की खाई को और गहरा कर दिया। ऑनलाइन शिक्षा के दौर में सरकारी स्कूलों के लाखों बच्चे डिजिटल संसाधनों से दूर रह गए, जबकि निजी स्कूलों ने अपेक्षाकृत तेजी से खुद को ढाल लिया। इस अनुभव ने लोगों के मन में सरकारी स्कूलों को लेकर असुरक्षा और बढ़ा दी।
ऐसे समय में SMC गाइडलाइंस 2026 केवल एक नीति नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में जनता का भरोसा लौटाने की कोशिश है। लेकिन यह भरोसा तभी लौटेगा जब स्कूलों में शिक्षक होंगे, नियमित पढ़ाई होगी, जवाबदेही तय होगी और अभिभावकों की आवाज वास्तव में सुनी जाएगी।
भारत जैसे विशाल देश में शिक्षा सुधार केवल मंत्रालयों के आदेश से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय समुदाय की साझेदारी जरूरी है। यदि नई स्कूल मैनेजमेंट कमेटियां इस साझेदारी को मजबूत कर पाती हैं, तो यह सरकारी स्कूलों के लिए नई शुरुआत साबित हो सकती है। लेकिन अगर यह पहल भी केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रह गई, तो सरकारी स्कूलों से लोगों का टूटता भरोसा वापस लाना और मुश्किल हो जाएगा।
भारत में शिक्षा हमेशा केवल पढ़ाई का माध्यम नहीं रही, बल्कि सामाजिक बदलाव और आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी ताकत मानी गई है। किसी भी देश का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था से तय होता है। लेकिन आज भारत के स्कूली शिक्षा सिस्टम में जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह केवल आंकड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि समाज की सोच और भरोसे में आए बड़े परिवर्तन का संकेत है।
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों से लोगों का भरोसा तेजी से कम हुआ है। वर्ष 2005 में जहां देश के 71 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर करीब 49 प्रतिशत रह गई है। दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यह बदलाव केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे का भी बड़ा संकेत है।
असल सवाल यह है कि क्या लोग सरकारी स्कूलों को छोड़ रहे हैं या वे बेहतर भविष्य खरीदने की कोशिश कर रहे हैं?
आज एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बच्चे की शिक्षा सबसे बड़ा निवेश बन चुकी है। अभिभावकों को लगता है कि प्राइवेट स्कूल अंग्रेजी माध्यम, बेहतर अनुशासन और नौकरी के ज्यादा अवसर देंगे। यही वजह है कि कम आय वाले परिवार भी अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेजना पसंद कर रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि शिक्षा अब धीरे-धीरे “सेवा” से ज्यादा “ब्रांड” बनती जा रही है।
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा यह है कि कम फीस वाले कई प्राइवेट स्कूल भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में पीछे हैं। अगर कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पा रहा और साधारण गणित हल नहीं कर पा रहा, तो यह केवल सरकारी स्कूलों की विफलता नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा मॉडल पर सवाल है।
आज देश में हजारों ऐसे प्राइवेट स्कूल हैं जहां न तो पर्याप्त शिक्षक हैं, न खेल का मैदान, न साफ पीने का पानी और न ही बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल। कई जगह शिक्षकों को बेहद कम वेतन पर रखा जाता है। बिना ट्रेनिंग और नौकरी की सुरक्षा के पढ़ाने वाले शिक्षक आखिर बच्चों को कितनी बेहतर शिक्षा दे पाएंगे?
सरकारी स्कूलों की स्थिति भी कई जगह गंभीर बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक पूरे स्कूल को संभाल रहा है। सोचिए, एक ही शिक्षक अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को कैसे गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई दे सकता है? यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नीति और प्रबंधन की भी कमजोरी है।
शिक्षा व्यवस्था की एक और बड़ी चुनौती “समान अवसर” की है। शहरों और गांवों, अमीर और गरीब, डिजिटल और गैर-डिजिटल भारत के बीच की दूरी स्कूलों में साफ दिखाई देती है। जहां बड़े शहरों के निजी स्कूल एआई और स्मार्ट क्लासरूम की बात कर रहे हैं, वहीं कई ग्रामीण स्कूलों में आज भी स्थायी शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।
सरकार अब कक्षा 3 से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटेशनल थिंकिंग पढ़ाने की तैयारी कर रही है। यह कदम भविष्य की जरूरतों को देखते हुए जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे स्कूल इसके लिए तैयार हैं? जिन स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और प्रशिक्षित शिक्षक तक नहीं हैं, वहां एआई शिक्षा लागू करना आसान नहीं होगा।
भारत की शिक्षा व्यवस्था को केवल नए विषयों की नहीं, बल्कि मजबूत नींव की जरूरत है। अगर शुरुआती कक्षाओं में बच्चे पढ़ना, लिखना और समझना ही ठीक से नहीं सीख पाएंगे, तो तकनीकी शिक्षा का फायदा सीमित रह जाएगा।
यह भी सच है कि केवल सरकारी या प्राइवेट स्कूल की बहस से समस्या हल नहीं होगी। असली मुद्दा गुणवत्ता, जवाबदेही और समान अवसर का है। शिक्षा को बाजार के भरोसे छोड़ देना भी खतरनाक हो सकता है और सरकारी सिस्टम को बिना सुधार के चलाना भी।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने पर गंभीरता से काम करे। शिक्षकों की भर्ती, ट्रेनिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्कूल प्रबंधन में बड़े सुधार की जरूरत है। साथ ही प्राइवेट स्कूलों के लिए भी मजबूत रेगुलेशन जरूरी है, ताकि शिक्षा केवल कमाई का साधन न बन जाए।
भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में स्कूलों की गुणवत्ता केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक बराबरी का भी सवाल है। अगर आज शिक्षा की बुनियाद मजबूत नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में इसका असर पूरे देश के विकास पर दिखाई देगा।
भारत में लड़कियों की शिक्षा को लेकर दशकों से जो बहस चलती रही—“बराबरी कब आएगी?”—उसका जवाब अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की हालिया रिपोर्ट “Women and Men in India 2025” सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलते भारत की एक सामाजिक कहानी भी है। यह कहानी बताती है कि पढ़ाई के मैदान में बेटियां अब सिर्फ बराबरी नहीं कर रहीं, बल्कि कई मोर्चों पर आगे निकल चुकी हैं।
स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक लड़कियों की बढ़ती मौजूदगी इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है। प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक स्तर तक नामांकन में लड़कियां लड़कों से आगे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसमें नई शिक्षा नीति, सरकारी योजनाओं और समाज की बदलती सोच—तीनों की भूमिका है। खास बात यह है कि सिर्फ दाखिले ही नहीं बढ़े, बल्कि ड्रॉपआउट दर में भी गिरावट आई है। यानी बेटियां अब स्कूल तक पहुंच ही नहीं रहीं, बल्कि पढ़ाई जारी भी रख रही हैं।
लेकिन इस कहानी का एक और अहम पहलू है—पीढ़ी का फर्क। जहां कुल साक्षरता में अभी भी पुरुषों और महिलाओं के बीच लगभग 14 प्रतिशत का अंतर है, वहीं 15 से 24 साल की उम्र के युवाओं में यह अंतर घटकर महज 3.8 प्रतिशत रह गया है। इसका मतलब साफ है कि नई पीढ़ी में लैंगिक असमानता तेजी से कम हो रही है। 1981 में जहां महिला साक्षरता 30 प्रतिशत के आसपास थी, आज वह 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है। यह सिर्फ प्रगति नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव का संकेत है।
उच्च शिक्षा में भी तस्वीर उत्साहजनक है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लड़कियों का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो लड़कों से ज्यादा हो गया है। कुल पास होने वाले छात्रों में आधे से अधिक महिलाएं हैं, और एमफिल जैसे उच्च स्तर पर तो उनकी हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है। यह दिखाता है कि अब लड़कियां सिर्फ पढ़ाई कर ही नहीं रहीं, बल्कि उसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन भी कर रही हैं।
फिर भी, यह बदलाव पूरी तरह संतुलित नहीं है। विषयों के चयन में अब भी एक स्पष्ट अंतर दिखता है। आर्ट्स, साइंस, सोशल साइंस और मेडिकल क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी अधिक है, लेकिन इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, आईटी और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में लड़के अभी भी आगे हैं। यह अंतर केवल पसंद का नहीं, बल्कि सामाजिक धारणा और अवसरों की असमानता का भी परिणाम है।
इसके अलावा, पढ़ाई के औसत वर्षों और खर्च में भी फर्क बना हुआ है। लड़कियों की औसत पढ़ाई लड़कों से एक साल कम है और उन पर खर्च भी कम किया जाता है। यह बताता है कि जमीनी स्तर पर अभी भी कई परिवारों में बेटियों की शिक्षा को लेकर प्राथमिकता उतनी मजबूत नहीं है जितनी होनी चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है। क्या हम सिर्फ आंकड़ों से संतुष्ट हो सकते हैं? या हमें इस बदलाव को और गहरा और स्थायी बनाने की दिशा में काम करना होगा?
आज जब भारत तेजी से डिजिटल और तकनीकी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तब यह जरूरी है कि लड़कियां भी उन क्षेत्रों में बराबरी से भागीदारी करें जो भविष्य को तय करेंगे। अगर इंजीनियरिंग, एआई, डेटा साइंस और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में उनकी हिस्सेदारी नहीं बढ़ती, तो यह प्रगति अधूरी रह जाएगी।
सकारात्मक पक्ष यह है कि दिशा सही है। समाज की सोच बदल रही है, नीतियां असर दिखा रही हैं और बेटियां खुद अपनी पहचान बना रही हैं। लेकिन असली चुनौती अब इस रफ्तार को बनाए रखने और इसे हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर विषय तक पहुंचाने की है।
यह बदलाव सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक भविष्य का भी है। क्योंकि जब बेटियां पढ़ती हैं, तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा समाज आगे बढ़ता है।
भारत में ऑनलाइन उच्च शिक्षा का तेजी से बढ़ता दायरा केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का संकेत भी है। ट्रेनिंग्स कार्ट (TrainingsKart) के हालिया आकलन के अनुसार, यह क्षेत्र 2030 तक तेज़ रफ्तार से विस्तार करेगा। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह विस्तार गुणवत्ता, भरोसे और समान अवसरों के साथ आगे बढ़ पाएगा?
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के प्रति भारतीयों का नजरिया बदला है। अब डिग्री केवल कागज का प्रमाण नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल से जुड़ी जरूरत बन गई है। हिमांशु राय जैसे शिक्षाविद मानते हैं कि उच्च शिक्षा एक संरचनात्मक बदलाव से गुजर रही है, जहां ऑनलाइन डिग्री की मांग लगातार बढ़ रही है। यह मांग इस बात का प्रमाण है कि छात्र और पेशेवर अब पारंपरिक कक्षा की सीमाओं से बाहर निकलना चाहते हैं।
इस बदलाव को मजबूती देने में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी University Grants Commission (UGC) की भूमिका अहम रही है। ऑनलाइन डिग्री को पारंपरिक डिग्री के बराबर मान्यता देने से छात्रों का भरोसा बढ़ा है। लेकिन केवल मान्यता देना ही पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि ऑनलाइन माध्यम में शिक्षा की गुणवत्ता और मूल्यांकन की सख्ती बनी रहे।
यहां एक बड़ा सवाल उभरता है—क्या सभी संस्थान इस बदलाव के लिए तैयार हैं? पंकज मित्तल का कहना है कि देश में कुछ संस्थान डिजिटल शिक्षा में आगे हैं, लेकिन पूरे सिस्टम में समान तैयारी नहीं है। यह असमानता आने वाले समय में शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।
ऑनलाइन MBA जैसे कोर्सेज की बढ़ती लोकप्रियता यह दिखाती है कि छात्र अब सीधे करियर से जुड़े विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बेंगलुरु, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर, जो तेज़ प्रतिस्पर्धा में खुद को बनाए रखना चाहते हैं, ऑनलाइन डिग्री को एक व्यावहारिक समाधान के रूप में देख रहे हैं।
ऑनलाइन शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ इसका लचीलापन और कम लागत है। यह उन लोगों के लिए नए दरवाजे खोल रही है जो पारंपरिक शिक्षा से दूर रह जाते थे—जैसे छोटे शहरों के छात्र, गृहिणियां या मिड-करियर प्रोफेशनल्स। यह पहलू राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy 2020) के उस लक्ष्य से मेल खाता है, जिसमें शिक्षा को अधिक समावेशी और कौशल-आधारित बनाने की बात कही गई है।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डिजिटल डिवाइड आज भी एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी के कारण ऑनलाइन शिक्षा का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा। इसके अलावा, कोर्स की गुणवत्ता में असमानता और मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहे हैं।
एक और चिंता यह है कि कहीं ऑनलाइन शिक्षा केवल ‘आसान डिग्री’ का माध्यम बनकर न रह जाए। अगर मूल्यांकन में सख्ती नहीं रही, तो डिग्री की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में विश्वविद्यालयों और नियामक संस्थाओं को तकनीक का उपयोग करते हुए पारदर्शी और मजबूत मूल्यांकन प्रणाली विकसित करनी होगी।
यह भी साफ है कि ऑनलाइन शिक्षा का भविष्य केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करेगा। असली चुनौती शिक्षण पद्धति को बदलने की है। केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाना काफी नहीं, बल्कि यह समझना जरूरी है कि ऑनलाइन माध्यम में छात्रों को प्रभावी तरीके से कैसे पढ़ाया जाए और उनसे जुड़ाव कैसे बनाए रखा जाए।
भारत का ऑनलाइन उच्च शिक्षा क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह न केवल शिक्षा के अवसरों को बढ़ा रहा है, बल्कि कौशल-आधारित सीखने की दिशा में भी देश को आगे ले जा रहा है।
लेकिन इस बदलाव को सफल बनाने के लिए संतुलन जरूरी है—तेजी और गुणवत्ता के बीच, पहुंच और विश्वसनीयता के बीच। अगर यह संतुलन साध लिया गया, तो ऑनलाइन शिक्षा भारत के भविष्य को नई दिशा दे सकती है।
क्यों युद्ध, गर्मी, आर्थिक दबाव, प्रवासन, मानसिक तनाव और एआई भारत की उच्च शिक्षा को नया आकार दे रहे हैं
एक समय था जब लोगों को लगता था कि विश्वविद्यालय इतिहास की हलचल से कुछ ऊपर खड़े होते हैं। बाहर आर्थिक मंदी हो, चुनावी लहर हो या सामाजिक अशांति—फिर भी यह कल्पना की जाती थी कि कैंपस के भीतर जीवन अपने शांत और नियमित ढंग से चलता रहेगा। छात्र बैग लेकर कक्षाओं की ओर जाएंगे, प्रोफेसर विचारों पर बहस करेंगे, पुस्तकालय खुले रहेंगे, प्रयोगशालाएँ काम करती रहेंगी और हॉस्टल देर रात तक करियर, सिनेमा, राजनीति और प्रेम पर चर्चाओं से भरे रहेंगे।
यह तस्वीर आज भी विश्वविद्यालयों के ब्रोशर में दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता अब काफी बदल चुकी है।
आज उच्च शिक्षा उस दौर से गुजर रही है जिसे कई विद्वान “पॉलीक्राइसिस” यानी बहु-संकट का समय कहते हैं। इसका मतलब है कि एक नहीं, बल्कि कई संकट एक साथ आ रहे हैं और एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। युद्ध छात्र गतिशीलता को बाधित करता है, वीज़ा प्रतिबंध विश्वविद्यालयों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं, जलवायु संकट कैंपस बंद करा देता है या कक्षाओं का समय बदल देता है। आवास संकट अंतरराष्ट्रीय शिक्षा नीतियों को प्रभावित करता है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पढ़ाने और मूल्यांकन की पारंपरिक पद्धतियों को चुनौती देता है, और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ सीखने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करती हैं।
अब ये समस्याएँ अलग-अलग नहीं आतीं। वे टकराती हैं, एक-दूसरे को बढ़ाती हैं और कई बार ऐसी प्रतिक्रियाएँ पैदा करती हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की गई थी।
इसी कारण आज उच्च शिक्षा का संकट पहले के संकटों से अलग है। यह सिर्फ पाठ्यक्रम, मान्यता, शिक्षण पद्धति या शिक्षकों की संख्या का मुद्दा नहीं रह गया है। आज के बड़े झटके अक्सर कक्षा के बाहर से आते हैं—वे भू-राजनीतिक, जलवायु, तकनीकी, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक होते हैं।
यूरोप में युद्ध कोलकाता के एक मेडिकल छात्र के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता लंदन में पढ़ रहे छात्र की हैदराबाद वापसी को महँगा बना सकती है। कनाडा में आवास संकट हजारों भारतीय परिवारों के विदेश में पढ़ाई के सपनों को सीमित कर सकता है। ओडिशा की गर्मी कक्षाओं का समय दोपहर से सुबह करवा सकती है।
भारत के लिए यह कोई दूर की कहानी नहीं है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक है। यहाँ युवा आबादी विशाल है और शिक्षा को सामाजिक सम्मान और आगे बढ़ने का प्रमुख रास्ता माना जाता है। साथ ही भारत का संबंध वैश्विक प्रवासन, खाड़ी देशों से आने वाले धन, पश्चिमी शिक्षा बाजार, जलवायु संकट और डिजिटल परिवर्तन से गहराई से जुड़ा है। इसलिए जब दुनिया अस्थिर होती है, तो भारतीय उच्च शिक्षा उससे अछूती नहीं रहती—उसके झटके तुरंत महसूस होते हैं।
अब वह समय आ गया है जब कक्षा दुनिया से अलग एक सुरक्षित जगह नहीं रही। बल्कि यह वह स्थान बनती जा रही है जहाँ दुनिया की बड़ी दरारें साफ दिखाई देती हैं।
आइवरी टावर का भ्रम टूट चुका है
“आइवरी टावर” शब्द लंबे समय तक विश्वविद्यालयों के लिए इस्तेमाल होता रहा। इसका मतलब था कि विश्वविद्यालय सामान्य जीवन की हलचल से कुछ दूर होते हैं। लेकिन बीसवीं सदी के अधिकांश समय तक विश्वविद्यालयों को वास्तव में एक तरह का संरक्षण मिला हुआ था। सरकारें बदलती थीं, बाजार ऊपर-नीचे होते थे, लेकिन विश्वविद्यालयों को लंबे समय तक स्थिर संस्थान माना जाता था।
आज यह सुरक्षा काफी हद तक खत्म हो चुकी है।
अब विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय छात्रों की फीस पर निर्भर हैं, वैश्विक उड़ानों पर छात्रों की आवाजाही निर्भर करती है, डिजिटल प्लेटफॉर्म पढ़ाई को जारी रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति वीज़ा नीतियों को तय करती है। ऐसे में विश्वविद्यालय सिर्फ एक कैंपस नहीं, बल्कि एक बड़े और अस्थिर वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं।
इसलिए जब यह नेटवर्क हिलता है, तो विश्वविद्यालय भी हिलते हैं।
जब युद्ध शुरू होता है, तो छात्र भागते हैं
उच्च शिक्षा की असुरक्षा को युद्ध जितनी स्पष्टता से शायद ही कोई और चीज दिखाती हो।
रूस-यूक्रेन युद्ध इसका बड़ा उदाहरण है। युद्ध से पहले यूक्रेन कम लागत में मेडिकल शिक्षा के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य बन चुका था। भारत के कई परिवारों के लिए, जो देश में निजी मेडिकल शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे, यूक्रेन डॉक्टर बनने का एक वास्तविक रास्ता था।
लेकिन युद्ध शुरू होते ही यह रास्ता अचानक बंद हो गया।
लेक्चर हॉल बंकर बन गए, लैब बंद हो गईं और छात्र सुरक्षित रास्तों की तलाश में सीमाओं की ओर निकल पड़े। भारत के ऑपरेशन गंगा के तहत 22,000 से अधिक भारतीयों को वापस लाया गया, लेकिन असली सवाल उसके बाद शुरू हुआ—जब पढ़ाई का भविष्य ही अनिश्चित हो गया।
पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने लौटे छात्रों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश की। कुछ छात्रों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में अस्थायी रूप से समायोजित किया गया, जबकि अन्य को इंटर्नशिप या प्रैक्टिकल प्रशिक्षण की सुविधा दी गई। लेकिन इस घटना ने एक कठोर सच्चाई सामने रखी—शिक्षा का सपना भी एक नाजुक व्यवस्था पर टिका होता है, जिसे भू-राजनीतिक संकट कभी भी तोड़ सकता है।
जब आसमान बंद होता है, तो शिक्षा के रास्ते भी बंद हो जाते हैं
पश्चिम एशिया में अस्थिरता उच्च शिक्षा को दूसरे तरीके से प्रभावित करती है। यह क्षेत्र वैश्विक विमानन मार्गों और श्रम प्रवासन का प्रमुख केंद्र है।
कई भारतीय छात्र विदेश जाते समय खाड़ी देशों के एयर हब से होकर गुजरते हैं। लेकिन यदि क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है तो उड़ानों को लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे टिकट की कीमतें अचानक कई गुना बढ़ सकती हैं। कभी 45 हजार रुपये में होने वाली यात्रा 2 लाख रुपये से अधिक की हो सकती है।
इसके अलावा खाड़ी देश भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ से बड़ी मात्रा में धन भारत आता है। भारत हर साल लगभग 130 से 140 अरब डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यह पैसा सिर्फ घर चलाने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा के लिए भी खर्च होता है।
इसलिए अगर खाड़ी देशों में आर्थिक संकट आता है, तो उसका असर सीधे भारत में शिक्षा पर पड़ सकता है।
पश्चिम अब हमेशा स्थिर विकल्प नहीं रहा
लंबे समय तक भारतीय मध्यम वर्ग के लिए विदेश में पढ़ाई का मतलब अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया था। इन देशों को स्थिर और प्रतिष्ठित माना जाता था।
लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है।
ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन में यूरोपीय छात्रों की संख्या घटी। कनाडा ने आवास संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर सीमा लगा दी। अमेरिका में कम जन्म दर के कारण कॉलेजों को घरेलू छात्रों की संख्या घटने का सामना करना पड़ रहा है।
इन बदलावों ने भारतीय परिवारों को यह एहसास कराया है कि विदेश में पढ़ाई का सपना अब पहले जितना स्थिर नहीं रहा।
जलवायु परिवर्तन अब टाइमटेबल तय कर रहा है
कई सालों तक जलवायु परिवर्तन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का विषय था। अब यह संचालन की वास्तविक चुनौती बन चुका है।
2024 में यूनिसेफ के अनुसार जलवायु से जुड़ी घटनाओं के कारण दुनिया भर में 24 करोड़ से अधिक छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई। भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है।
ओडिशा जैसे राज्यों में भीषण गर्मी के कारण संस्थानों को कक्षाओं और परीक्षाओं का समय सुबह करने के निर्देश दिए गए। यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि संकेत है कि पर्यावरण अब शिक्षा की संरचना को प्रभावित कर रहा है।
सबसे शांत संकट: मानसिक स्वास्थ्य
कुछ संकट विस्फोट के साथ आते हैं, जबकि कुछ चुपचाप फैलते हैं। मानसिक स्वास्थ्य ऐसा ही संकट है।
कई छात्र आर्थिक दबाव, सोशल मीडिया तुलना, नौकरी की अनिश्चितता और जलवायु चिंता जैसे कई तनावों के साथ विश्वविद्यालय में प्रवेश करते हैं। महामारी के बाद यह दबाव और बढ़ गया है।
जब छात्र और शिक्षक दोनों ही मानसिक दबाव में होते हैं, तो इसका असर सीखने की गुणवत्ता पर पड़ता है। ध्यान कम होता है, आत्मविश्वास घटता है और पढ़ाई की गहराई प्रभावित होती है।
इसलिए मानसिक स्वास्थ्य अब शिक्षा की गुणवत्ता से अलग विषय नहीं रहा।
कक्षा के भीतर एआई का तूफान
इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उच्च शिक्षा को एक नई चुनौती दी है।
अगर कोई टूल कुछ सेकंड में निबंध, कोड या शोध का मसौदा लिख सकता है, तो असाइनमेंट का मूल्यांकन कैसे किया जाए? क्या यह ज्ञान की परीक्षा है, लेखन कौशल की या तकनीक के उपयोग की?
भारत जैसे बड़े शिक्षा तंत्र में यह सवाल और भी जटिल हो जाता है। हालांकि एआई खतरे के साथ अवसर भी लाता है—जैसे अनुवाद, व्यक्तिगत सीखने में सहायता और बड़े पैमाने पर शिक्षण समर्थन।
लेकिन इसके लिए शिक्षण पद्धतियों को तेजी से बदलना होगा।
भारत के सामने अवसर और परीक्षा
दुनिया में उच्च शिक्षा का नक्शा बदल रहा है। कई पश्चिमी देशों में छात्र संख्या घट रही है, जबकि भारत के पास बड़ी युवा आबादी है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत को अधिक अंतरराष्ट्रीय और बहुविषयक शिक्षा प्रणाली बनाने की कल्पना करती है। भारत 2030 तक अधिक विदेशी छात्रों को आकर्षित करना चाहता है।
लेकिन इसके लिए सिर्फ महत्वाकांक्षा काफी नहीं है। विश्वविद्यालयों को संकट के समय भी भरोसेमंद साबित होना होगा—चाहे वह जलवायु संकट हो, युद्ध हो या तकनीकी बदलाव।
भविष्य का विश्वविद्यालय
इस दशक का सबसे बड़ा सबक स्पष्ट है—भविष्य का विश्वविद्यालय सिर्फ सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं बनाया जा सकता। उसे बाधाओं और संकटों के बीच भी काम करने के लिए तैयार होना होगा।
ऐसा विश्वविद्यालय जिसे संकट के समय भी पढ़ाई जारी रखने की क्षमता हो, मजबूत डिजिटल प्रणाली हो, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन हो, जलवायु-सुरक्षित बुनियादी ढाँचा हो और एआई के उपयोग के लिए स्पष्ट नीति हो।
सबसे महत्वपूर्ण बात—विश्वास।
आज छात्र और अभिभावक सिर्फ रैंकिंग नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि संकट के समय संस्थान कैसा व्यवहार करता है।
अंतिम सच्चाई
आज उच्च शिक्षा का संकट एक कहानी नहीं है, बल्कि कई कहानियों का संगम है।
यह यूक्रेन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की कहानी है, यह खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर निर्भर परिवारों की कहानी है, यह कनाडा के आवास संकट से बदलते छात्र विकल्पों की कहानी है, यह ओडिशा की गर्मी से बदलते टाइमटेबल की कहानी है, और यह उस छात्र की कहानी है जो कक्षा में शांत दिखता है लेकिन भीतर से संघर्ष कर रहा होता है।
आज विश्वविद्यालय इतिहास से बाहर नहीं हैं। वे उसी के बीच खड़े हैं।
और अब उच्च शिक्षा की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह शांति के समय कितनी चमकती है, बल्कि यह है कि उथल-पुथल के समय भी क्या वह सीखने की रोशनी जलाए रख सकती है।
(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। नई नीतियां, डिजिटल शिक्षा का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग—ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब अपनी शिक्षा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जिस तरह भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर दिया है, उससे यह बहस और तेज हो गई है कि क्या भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान व्यवस्था में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
भारत की शिक्षा परंपरा सदियों पुरानी है। नालंदा यूनिवर्सिटी और तक्षशिला जैसे संस्थानों ने कभी दुनिया भर के छात्रों को आकर्षित किया था। लेकिन आधुनिक दौर में वैश्विक शिक्षा के मंच पर भारत की उपस्थिति उतनी प्रभावशाली नहीं रही। अब सरकार और शिक्षा जगत यह मानने लगे हैं कि समय आ गया है जब भारत को अपनी अकादमिक ताकत, शोध क्षमता और ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती से पेश करना चाहिए।
शिक्षा मंत्री का तर्क है कि यह लक्ष्य केवल तकनीकी या वैज्ञानिक शोध से हासिल नहीं होगा। भारत को ज्ञान महाशक्ति बनने के लिए विज्ञान और समाज विज्ञान दोनों को साथ लेकर चलना होगा। अक्सर यह देखा गया है कि वैज्ञानिक शोध जब समाज की वास्तविक जरूरतों से जुड़ता है, तभी उसका असर व्यापक होता है। तकनीकी नवाचार और सामाजिक समझ के बीच तालमेल ही किसी देश को स्थायी प्रगति की ओर ले जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अब भारत को केवल आईटी या तकनीक के नजरिये से नहीं देख रहे। वे भारतीय समाज, लोकतंत्र, इतिहास और अर्थव्यवस्था को समझने में भी गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत वैश्विक शोध के लिए एक बड़ा विषय बन चुका है। ऐसे में भारतीय समाज विज्ञान की भूमिका और भी अहम हो जाती है।
इसी संदर्भ में Tata Institute of Social Sciences द्वारा प्रस्तावित ‘TISS-Global’ जैसी पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य दुनिया भर के उन विद्वानों को एक मंच पर लाना है जो भारत से जुड़े विषयों पर शोध कर रहे हैं। यह पहल अगर सही दिशा में आगे बढ़ती है तो भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और विकास मॉडल पर अधिक संतुलित और व्यापक विमर्श को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीयकरण की इस प्रक्रिया के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। इससे भारतीय छात्रों को वैश्विक स्तर की शिक्षा और शोध का अवसर मिल सकता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में भारतीय विश्वविद्यालयों की पहचान और स्वायत्तता कमजोर न पड़े। अंतरराष्ट्रीय सहयोग तभी सार्थक होगा, जब वह बराबरी और ज्ञान के साझे आदान-प्रदान पर आधारित हो।
एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या भारत केवल विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां बुलाने तक सीमित रहेगा, या फिर खुद भी वैश्विक शिक्षा के विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में अपने शिक्षा संस्थान स्थापित करने चाहिए। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिल सकती है।
आज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा केवल आर्थिक ताकत की नहीं है। ज्ञान, विचार और शोध की दुनिया में भी देशों के बीच एक तरह की वैचारिक प्रतिस्पर्धा चल रही है। हर देश चाहता है कि उसकी विकास यात्रा और अनुभव वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनें। भारत भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत की युवा आबादी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर शोध सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र मिलता है, तो भारत आने वाले वर्षों में ज्ञान और नवाचार की दुनिया में एक मजबूत स्थान बना सकता है। लेकिन इसके लिए केवल नीतिगत घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, शोध संस्कृति और अकादमिक स्वतंत्रता को भी उतनी ही गंभीरता से मजबूत करना होगा।
भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की चर्चा दरअसल एक बड़े सवाल से जुड़ी है—क्या भारत दुनिया को केवल तकनीकी कौशल ही देगा, या फिर विचार, ज्ञान और बौद्धिक विमर्श का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। अगर यह संतुलन बन पाया, तो आने वाले वर्षों में भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान शक्ति के रूप में उभर सकता है।
अगर आप पत्रकार, न्यूज एंकर, कंटेंट क्रिएटर, फिल्ममेकर, रेडियो जॉकी, पब्लिक रिलेशन प्रोफेशनल या डिजिटल मीडिया एक्सपर्ट बनने का सपना देखते हैं, तो GMCET 2026 आपके लिए भारत के प्रमुख मीडिया विश्वविद्यालयों तक पहुंचने का एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
Global Media Education Council द्वारा आयोजित और Edinbox द्वारा संचालित GMCET यानी Global Media Common Entrance Test एक राष्ट्रीय स्तर की मीडिया प्रवेश परीक्षा है। यह परीक्षा उन छात्रों के लिए आयोजित की जाती है जो पत्रकारिता, मास कम्युनिकेशन, मीडिया स्टडीज, फिल्म, एनीमेशन और इससे जुड़े अन्य कोर्स में दाखिला लेना चाहते हैं।
GMCET क्यों है महत्वपूर्ण?
GMCET 2026 छात्रों को एक ही परीक्षा के जरिए 50 से अधिक भाग लेने वाले विश्वविद्यालयों और संस्थानों में प्रवेश के अवसर उपलब्ध कराता है। इससे छात्रों को अलग-अलग कॉलेजों में अलग आवेदन करने की जरूरत नहीं पड़ती। यह परीक्षा छात्रों की कम्युनिकेशन स्किल, लॉजिकल रीजनिंग, एनालिटिकल क्षमता और मीडिया क्षेत्र में करियर बनाने की योग्यता को परखती है।
GMCET के जरिए उपलब्ध कोर्स
इस परीक्षा के माध्यम से छात्र कई लोकप्रिय मीडिया और कम्युनिकेशन कोर्स में आवेदन कर सकते हैं। इनमें BJMC (बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन), BA जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन, BMS (बैचलर ऑफ मीडिया स्टडीज), BMC (बैचलर ऑफ मास कम्युनिकेशन), BMM (बैचलर ऑफ मास मीडिया), B.Sc एनीमेशन एंड ग्राफिक्स, B.Sc फिल्म एंड टेलीविजन, B.Sc मीडिया टेक्नोलॉजी, B.Sc VFX फिल्म मेकिंग, B.Sc विजुअल कम्युनिकेशन के साथ-साथ MJMC और MAJMC जैसे पोस्टग्रेजुएट प्रोग्राम शामिल हैं।
GMCET 2026 के लिए पात्रता
GMCET 2026 में आवेदन करने के लिए उम्मीदवार का 12वीं (10+2) पास होना या परीक्षा में शामिल होना जरूरी है। सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक और SC/ST/OBC वर्ग के छात्रों के लिए 45 प्रतिशत अंक निर्धारित किए गए हैं। कुछ मान्यता प्राप्त संस्थान डिप्लोमा कोर्स में भी प्रवेश का अवसर दे सकते हैं।
GMCET के बाद करियर के अवसर
मीडिया क्षेत्र में डिग्री हासिल करने के बाद छात्रों के पास कई करियर विकल्प खुल जाते हैं। इनमें पत्रकार, टीवी संवाददाता, न्यूज एनालिस्ट, रेडियो जॉकी (RJ), वीडियो जॉकी (VJ), पब्लिक रिलेशन ऑफिसर, फोटो जर्नलिस्ट, कंटेंट राइटर, फीचर राइटर और मीडिया प्रोड्यूसर जैसी भूमिकाएं शामिल हैं।
GMCET के अतिरिक्त फायदे
GMCET के जरिए छात्रों को केवल एडमिशन का अवसर ही नहीं मिलता, बल्कि करियर काउंसलिंग, इंटर्नशिप, एजुकेशन लोन सहायता और प्लेसमेंट सपोर्ट जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। यह सहायता भाग लेने वाले संस्थानों और GMEC नेटवर्क के माध्यम से दी जाती है।
GMCET 2026 उन छात्रों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है जो पत्रकारिता, ब्रॉडकास्टिंग, फिल्ममेकिंग, डिजिटल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन जैसे क्षेत्रों में करियर बनाना चाहते हैं। एक ही प्रवेश परीक्षा के जरिए मीडिया शिक्षा की कई धाराओं में प्रवेश का मौका इसे खास बनाता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI ने दुनिया के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है, लेकिन सबसे बड़ा असर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट पर देखने को मिला है। कुछ साल पहले तक कोई ऐप या वेबसाइट बनाना काफी जटिल काम माना जाता था। इसके लिए प्रोग्रामिंग की गहरी समझ, अलग-अलग फ्रेमवर्क्स का ज्ञान और हजारों लाइनों का कोड हाथ से लिखना पड़ता था।
अब AI टूल्स की मदद से केवल लिखित या बोले गए निर्देशों के जरिए वेबसाइट, मोबाइल ऐप, डेटाबेस और ऑटोमेशन वर्कफ्लो तैयार किए जा सकते हैं। इसी बदलाव के साथ टेक्नोलॉजी की दुनिया में दो नए शब्द तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं — Vibe Coder और Agentic Coder।
कंप्यूटर साइंस, AI, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डेटा साइंस या उभरती तकनीकों में रुचि रखने वाले छात्रों के सामने ये शब्द अक्सर आते हैं, लेकिन कई लोग इनके वास्तविक मतलब को नहीं समझ पाते। क्या ये नौकरी के पद हैं? क्या ये कोडिंग की नई तकनीकें हैं? इनमें करियर का भविष्य कैसा है और कौन-से कोर्स करने पड़ते हैं? इन सभी सवालों का जवाब AI आधारित सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट को समझने में छिपा है।
कौन होता है Vibe Coder?
Vibe Coder वह व्यक्ति होता है जो AI टूल्स की मदद से सॉफ्टवेयर तैयार करता है। इसमें डेवलपर पूरा कोड खुद लिखने के बजाय प्राकृतिक भाषा में निर्देश देता है और AI उसके आधार पर कोड तैयार कर देता है।
उदाहरण के तौर पर, कोई व्यक्ति AI असिस्टेंट से कह सकता है — “एक स्टूडेंट अटेंडेंस मैनेजमेंट सिस्टम बनाओ जिसमें लॉगिन ऑथेंटिकेशन, अटेंडेंस रिपोर्ट और डैशबोर्ड हो।”
इसके बाद AI सिस्टम काफी हद तक कोड, इंटरफेस और लॉजिक तैयार कर देता है। इंसान का काम आउटपुट को जांचना, जरूरी बदलाव करना, टेस्टिंग करना और नए निर्देश देकर ऐप को बेहतर बनाना होता है।
इस प्रक्रिया में फोकस कोड की सिंटैक्स पर कम और आइडिया, क्रिएटिविटी, एक्सपेरिमेंट और स्पीड पर ज्यादा होता है। यही वजह है कि स्टार्टअप फाउंडर्स, प्रोडक्ट डिजाइनर्स, एंटरप्रेन्योर, छात्र और प्रोफेशनल्स तेजी से इस तरीके को अपना रहे हैं।
कौन होता है Agentic Coder?
Agentic Coder AI के साथ ज्यादा उन्नत और व्यवस्थित तरीके से काम करता है। इसमें केवल छोटे-छोटे कोड जनरेट नहीं करवाए जाते, बल्कि AI एजेंट्स को पूरा प्रोजेक्ट संभालने के निर्देश दिए जाते हैं। ये एजेंट्स प्लानिंग, कोडिंग, टेस्टिंग, डिबगिंग और ऑप्टिमाइजेशन जैसे कई काम खुद कर सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर, एक Agentic Coder AI से कह सकता है — “एक पूरा यूनिवर्सिटी एडमिशन पोर्टल बनाओ जिसमें रजिस्ट्रेशन, डॉक्यूमेंट अपलोड, पेमेंट इंटीग्रेशन, डैशबोर्ड, एनालिटिक्स, टेस्टिंग और डिप्लॉयमेंट सपोर्ट शामिल हो।”
इसके बाद AI एजेंट प्रोजेक्ट को अलग-अलग हिस्सों में बांटता है, कंपोनेंट तैयार करता है, गलतियों की पहचान करता है और लगातार लक्ष्य की ओर काम करता रहता है। इंसान यहां सुपरवाइजर, स्ट्रैटेजिस्ट और क्वालिटी कंट्रोल की भूमिका निभाता है।
सीधे शब्दों में कहें तो Vibe Coder AI की मदद से प्रोजेक्ट पूरा करता है, जबकि Agentic Coder AI को खुद लक्ष्य हासिल करने के लिए निर्देशित करता है।
Vibe Coder और Agentic Coder में मुख्य अंतर
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फीचर |
Vibe Coder |
Agentic Coder |
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मुख्य फोकस |
तेजी से प्रोडक्ट बनाना और एक्सपेरिमेंट |
लक्ष्य आधारित सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट |
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इंसान की भूमिका |
आइडिया और प्रॉम्प्ट देना |
प्लानिंग, रणनीति और निगरानी |
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AI की जिम्मेदारी |
निर्देश के आधार पर कोड बनाना |
प्लानिंग से लेकर टेस्टिंग और सुधार तक |
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जरूरी तकनीकी ज्ञान |
बेसिक से मध्यम |
मध्यम से उन्नत |
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सबसे बेहतर उपयोग |
प्रोटोटाइप, MVP और छोटे प्रोजेक्ट |
बड़े एंटरप्राइज सिस्टम |
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डेवलपमेंट स्टाइल |
Prompt आधारित |
Workflow आधारित |
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स्पीड |
शुरुआती डेवलपमेंट तेज |
End-to-End प्रक्रिया ज्यादा तेज |
भविष्य में क्यों बढ़ेगी इनकी मांग?
AI अब केवल एक टूल नहीं रह गया, बल्कि कंपनियों के कामकाज का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में अब केवल कोड लिखने वाले लोगों की नहीं, बल्कि समस्या हल करने, सिस्टम डिजाइन करने, यूजर एक्सपीरियंस समझने और AI सिस्टम को सही दिशा देने वाले प्रोफेशनल्स की जरूरत बढ़ रही है।
कंपनियां ऐसे लोगों की तलाश में हैं जो:
- बिजनेस जरूरतों को समझ सकें
- AI सिस्टम को सही दिशा दे सकें
- AI द्वारा तैयार आउटपुट की जांच कर सकें
- गलतियों और जोखिमों को पहचान सकें
- स्केलेबल सॉल्यूशन डिजाइन कर सकें
- AI आधारित वर्कफ्लो मैनेज कर सकें
इसी वजह से AI और पारंपरिक प्रोग्रामिंग स्किल्स का मिश्रण रखने वाले प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है।
Vibe Coders के लिए करियर स्कोप
AI डेवलपमेंट प्लेटफॉर्म्स के आने से ऐसे लोगों के लिए बड़े अवसर बन रहे हैं जो तेजी से आइडिया को प्रोडक्ट में बदल सकते हैं।
इस क्षेत्र में संभावित करियर विकल्प हैं:
- Product Developer
- Startup Founder
- No-Code और Low-Code Specialist
- Digital Product Consultant
- Freelance App Builder
आज कंपनियां तेजी से इनोवेशन चाहती हैं, इसलिए कम समय में प्रोटोटाइप तैयार करने वाले प्रोफेशनल्स की वैल्यू बढ़ रही है।
Agentic Coders के लिए करियर स्कोप
भविष्य में Agentic Coding सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीक बन सकती है।
इस क्षेत्र में प्रमुख करियर विकल्प हैं:
- AI Software Engineer
- AI Solutions Architect
- Machine Learning Engineer
- AI Product Manager
- Automation Engineer
- Intelligent Systems Developer
हेल्थकेयर, फाइनेंस, एजुकेशन, मैन्युफैक्चरिंग और ई-कॉमर्स जैसे सेक्टर्स में AI एजेंट आधारित सिस्टम्स का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, जिससे इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं भी मजबूत मानी जा रही हैं।
AI Coders के लिए जरूरी स्किल्स
चाहे छात्र Vibe Coding में जाना चाहें या Agentic Coding में, मजबूत तकनीकी आधार बेहद जरूरी है। केवल AI टूल्स पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
जरूरी स्किल्स में शामिल हैं:
- Programming Fundamentals
- Data Structures और Algorithms
- Python Programming
- Database Management
- Web Development
- Software Engineering Principles
- Artificial Intelligence Concepts
- Machine Learning Basics
- Cloud Computing
- Cybersecurity Awareness
- Prompt Engineering
- Critical Thinking और Problem Solving Skills
इसके अलावा कम्युनिकेशन स्किल्स भी बेहद अहम होंगी, क्योंकि भविष्य के डेवलपर्स को AI सिस्टम्स के साथ मिलकर काम करना होगा।
छात्र कौन-से कोर्स कर सकते हैं?
जो छात्र Vibe Coder या Agentic Coder बनना चाहते हैं, उनके लिए कई अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम उपलब्ध हैं।
लोकप्रिय कोर्स हैं:
- B.Tech Computer Science Engineering
- B.Tech Artificial Intelligence and Machine Learning
- B.Tech Data Science
- B.Tech Information Technology
- BCA
- B.Sc Computer Science
- B.Sc Artificial Intelligence
- B.Sc Data Science
- B.Sc Cyber Security
- Integrated Computer Science Programmes
ये कोर्स छात्रों को AI और नई तकनीकों के साथ काम करने के लिए जरूरी तकनीकी आधार प्रदान करते हैं।
एडमिशन के लिए कौन-से एंट्रेंस एग्जाम जरूरी हैं?
भारत के टॉप इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी संस्थानों में प्रवेश के लिए कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं।
मुख्य परीक्षाएं हैं:
- JEE Main – NITs, IIITs और अन्य इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए
- JEE Advanced – IITs में एडमिशन के लिए जरूरी
- CUET UG – कई केंद्रीय और भागीदारी विश्वविद्यालयों में कंप्यूटर साइंस और टेक्नोलॉजी कोर्स के लिए
- GCSET (Global Computer Science Entrance Test) – ऑनलाइन फॉर्मेट के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही परीक्षा, जिसके जरिए 100 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में प्रवेश का अवसर मिलता है
इसके अलावा राज्य स्तरीय परीक्षाओं में:
- MHT CET
- WBJEE
- KCET
- AP EAMCET
- TS EAMCET
कई निजी विश्वविद्यालय अपने अलग एंट्रेंस टेस्ट भी आयोजित करते हैं। छात्रों को आवेदन से पहले संबंधित संस्थानों की पात्रता और एडमिशन प्रक्रिया जरूर जांचनी चाहिए।
छात्रों को कौन-सा करियर चुनना चाहिए?
असल सवाल यह नहीं है कि छात्र Vibe Coder बनें या Agentic Coder। महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या उनके पास तकनीक की इतनी समझ है कि वे AI का प्रभावी तरीके से उपयोग कर सकें।
Vibe Coding सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में प्रवेश का आसान और तेज तरीका माना जा सकता है। वहीं Agentic Coding ज्यादा उन्नत स्तर की AI Coding है, जिसमें AI को बड़े और जटिल कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
भविष्य में टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स संभवतः दोनों तरीकों का उपयोग करेंगे। वे Vibe Coding से तेजी से प्रोटोटाइप और आइडिया टेस्ट करेंगे, जबकि बड़े एंटरप्राइज प्रोजेक्ट्स और इंटेलिजेंट ऑटोमेशन के लिए Agentic Systems का उपयोग करेंगे।
छात्रों और अभ्यर्थियों को क्या समझना चाहिए?
Vibe Coding और खासतौर पर Agentic Coding का बढ़ना टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में बड़े बदलाव का संकेत है। अब सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल हाथ से कोड लिखने तक सीमित नहीं रह गया है। भविष्य में सफलता उन्हीं लोगों को मिलेगी जो समस्याओं को समझ सकें, स्पष्ट लक्ष्य तय कर सकें और AI सिस्टम्स को सही दिशा में इस्तेमाल कर सकें।
AI, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डेटा साइंस और नई तकनीकों में करियर बनाने की सोच रहे छात्रों के लिए यह बदलाव बड़े अवसर लेकर आया है। कंप्यूटर साइंस की समझ, AI कॉन्सेप्ट्स की जानकारी, समस्या समाधान क्षमता और आधुनिक टूल्स के साथ काम करने की योग्यता आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण स्किल्स मानी जाएंगी।
भविष्य केवल कोड लिखने वालों का नहीं होगा, बल्कि उन लोगों का होगा जो AI का बुद्धिमानी से उपयोग करके वास्तविक समस्याओं के समाधान तैयार कर सकेंगे।
National Eligibility cum Entrance Test यानी NEET लंबे समय तक भारत में मेडिकल शिक्षा के लिए सबसे पारदर्शी और समान अवसर देने वाली परीक्षा मानी जाती रही है। लाखों छात्र इस परीक्षा की कठिन तैयारी इसलिए करते थे क्योंकि उन्हें भरोसा था कि यह एक निष्पक्ष व्यवस्था है, जहां एक परीक्षा, एक रैंकिंग और मेरिट के आधार पर अवसर मिलता है। लेकिन पिछले दो वर्षों में इस भरोसे को बड़ा झटका लगा है।
पेपर लीक के आरोपों से लेकर ग्रेस मार्क्स विवाद तक, और National Testing Agency यानी NTA की कार्यप्रणाली से लेकर बार-बार उठते सवालों तक, NEET अब भरोसे के संकट से गुजर रहा है। आज छात्र कट-ऑफ और प्रतियोगिता से ज्यादा परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं।
स्थिति को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह विवाद NEET 2024 controversy के महज दो साल बाद सामने आया है, जिसने पहले ही NTA की साख पर सवाल खड़े कर दिए थे। इस बार मामला और बड़ा माना जा रहा है क्योंकि परीक्षा को रद्द तक करना पड़ा।
NEET 2026 में क्या हुआ?
NEET-UG 2026 का आयोजन 3 मई को करीब 23 लाख छात्रों के लिए किया गया था। परीक्षा के तुरंत बाद हस्तलिखित “गेस पेपर” को लेकर आरोप सामने आए, जिनमें कथित तौर पर वही सवाल शामिल थे जो असली प्रश्नपत्र में पूछे गए थे।
बाद में जांच का दायरा बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा समेत कई राज्यों तक फैल गया। रिपोर्ट्स में कथित लीक नेटवर्क, मैसेजिंग ऐप्स के जरिए डिजिटल सर्कुलेशन और कुछ कोचिंग संस्थानों से संभावित संबंधों की बात सामने आई। विवाद बढ़ने के बाद NTA ने परीक्षा रद्द कर दी और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा की।
लाखों छात्रों के लिए यह फैसला मानसिक रूप से बेहद थकाने वाला साबित हुआ। कई छात्र वर्षों से दबाव के बीच तैयारी कर रहे थे। परीक्षा रद्द होने के बाद वे फिर से अनिश्चितता और तनाव की स्थिति में पहुंच गए।
छात्रों का भरोसा क्यों टूट रहा है?
सबसे बड़ी समस्या अब सिर्फ पेपर लीक नहीं रह गई है। असली चिंता यह है कि पूरी परीक्षा प्रणाली पर भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है। प्रतियोगी परीक्षाएं भरोसे के आधार पर चलती हैं। छात्र कठिन प्रश्नपत्र और ऊंचे कट-ऑफ का सामना कर सकते हैं, अगर उन्हें प्रक्रिया के निष्पक्ष होने पर विश्वास हो। लेकिन लगातार सामने आ रहे विवादों ने इस विश्वास को कमजोर कर दिया है।
पिछले दो वर्षों में NEET को लेकर छात्रों की बातचीत भी पूरी तरह बदल गई है। पहले चर्चा तैयारी की रणनीति और रैंक को लेकर होती थी, जबकि अब पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, कोर्ट केस और NTA पर भरोसे जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं। यह बदलाव एक गहरे संकट की ओर इशारा करता है।
एक ही परीक्षा पर निर्भरता का बढ़ता दबाव
NEET ने यह भी दिखाया है कि पूरे देश में मेडिकल एडमिशन के लिए सिर्फ एक हाई-स्टेक परीक्षा पर निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है।
हर साल लाखों परिवार कोचिंग, हॉस्टल, मॉक टेस्ट और स्टडी मटेरियल पर भारी खर्च करते हैं। Kota, Hyderabad और Delhi जैसे शहरों में NEET तैयारी के आसपास पूरी कोचिंग इंडस्ट्री खड़ी हो चुकी है।
ऐसे में जब इतनी बड़ी परीक्षा पर गड़बड़ी के आरोप लगते हैं, तो इसका भावनात्मक और आर्थिक असर भी बहुत बड़ा होता है। इस विवाद ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, बर्नआउट और बढ़ते कोचिंग कल्चर को लेकर चिंता भी फिर से बढ़ा दी है।
NTA की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवाल
National Testing Agency की स्थापना प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता और मानकीकरण लाने के लिए की गई थी। लेकिन NEET 2024 से लेकर NEET 2026 तक लगातार सामने आए विवादों ने संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संसद में चर्चा, अदालतों की निगरानी और जारी जांच ने इस मुद्दे को अब परीक्षा सुधारों पर राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है।
कई छात्रों के लिए अब मुद्दा सिर्फ एक पेपर लीक का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था अब भी निष्पक्षता की गारंटी दे सकती है?
क्या NEET फिर से छात्रों का भरोसा जीत पाएगा?
NEET अभी भी भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा है, लेकिन जनता का भरोसा दोबारा जीतना आसान नहीं होगा। छात्र और अभिभावक अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, पारदर्शी जांच, सख्त जवाबदेही और वास्तविक सुधार चाहते हैं। क्योंकि जब छात्र पूरी प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगते हैं, तब संकट सिर्फ परीक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भरोसे का संकट बन जाता है।
अगर आप मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि सिर्फ NEET ही सफलता का एकमात्र रास्ता नहीं है। देश में कई राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं और विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां छात्रवृत्ति के साथ दाखिले के अवसर मिल सकते हैं। सही जानकारी, मेहनत और लगातार प्रयास ही भविष्य बनाने की असली कुंजी हैं।
पिछले कुछ वर्षों में “मैनेजमेंट करियर” की परिभाषा तेजी से बदली है। पहले मैनेजमेंट शिक्षा का मतलब मुख्य रूप से कॉरपोरेट ऑफिस, पारंपरिक MBA और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन तक सीमित माना जाता था। लेकिन अब कंपनियों को ऐसे प्रोफेशनल्स की जरूरत है, जो एक साथ लोगों को मैनेज करने, डिजिटल सिस्टम समझने, बिजनेस रणनीति बनाने, डाटा का विश्लेषण करने और बदलते बाजार के साथ खुद को ढालने की क्षमता रखते हों।
इसी वजह से भारत में 2026 में मैनेजमेंट कोर्स का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब छात्र और कामकाजी पेशेवर ऐसे कोर्स चुनना चाहते हैं, जो उन्हें केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक कौशल, करियर में लचीलापन और लंबे समय तक विकास के अवसर दें।
हालांकि आज मैनेजमेंट की सैकड़ों स्पेशलाइजेशन मौजूद हैं, जिससे सही कोर्स चुनना कई छात्रों के लिए चुनौती बन गया है। अब सवाल यह नहीं रह गया कि सबसे लोकप्रिय कोर्स कौन-सा है, बल्कि यह है कि कौन-सा मैनेजमेंट कोर्स किसी छात्र के करियर, रुचि और भविष्य के लिए सबसे उपयुक्त है।
2026 में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले MBA कोर्स
MBA in Human Resource Management
आज का HR केवल भर्ती और कर्मचारी रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। अब HR प्रोफेशनल्स कंपनी की नेतृत्व रणनीति, कार्यस्थल संस्कृति, कर्मचारी संतुष्टि, टैलेंट मैनेजमेंट और वर्कफोर्स प्लानिंग में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
हाइब्रिड वर्क कल्चर और कर्मचारी अनुभव पर बढ़ते फोकस के कारण HR मैनेजमेंट तेजी से बदलता हुआ क्षेत्र बन चुका है।
कम्युनिकेशन, लीडरशिप, लोगों के साथ काम करने और संगठनात्मक व्यवहार में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए HR मैनेजमेंट अच्छा विकल्प माना जा रहा है। आईटी, हेल्थकेयर, बैंकिंग, स्टार्टअप और मल्टीनेशनल कंपनियों में HR प्रोफेशनल्स की मांग लगातार बढ़ रही है।
MBA in Business Analytics
आज बिजनेस की दुनिया में बड़ी मात्रा में डाटा तैयार हो रहा है। लेकिन केवल डाटा होना पर्याप्त नहीं है, उसे सही तरीके से समझकर बिजनेस फैसलों में बदलना ज्यादा जरूरी है।
इसी कारण बिजनेस एनालिटिक्स दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते मैनेजमेंट क्षेत्रों में शामिल हो गया है। यह कोर्स मैनेजमेंट और डाटा आधारित निर्णय क्षमता का मिश्रण है।
इसमें डाटा इंटरप्रिटेशन, बिजनेस इंटेलिजेंस, प्रेडिक्टिव एनालिसिस और मार्केट रणनीति जैसे विषय शामिल होते हैं। ई-कॉमर्स, फिनटेक, हेल्थकेयर, कंसल्टिंग और मार्केटिंग सेक्टर में ऐसे प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है।
MBA in Digital Marketing
डिजिटल मार्केटिंग अब केवल एक अतिरिक्त स्किल नहीं रही। लगभग हर कंपनी ऑनलाइन ब्रांडिंग, सोशल मीडिया, कंटेंट मार्केटिंग और डिजिटल विज्ञापन पर निर्भर हो चुकी है।
भारत में इंटरनेट और डिजिटल कारोबार के तेजी से विस्तार के कारण डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल्स की मांग लगातार बढ़ रही है।
इस कोर्स में SEO, ब्रांडिंग, सोशल मीडिया रणनीति, पेड एडवरटाइजिंग, कंज्यूमर बिहेवियर और मार्केटिंग एनालिटिक्स जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं।
क्रिएटिविटी, कंटेंट क्रिएशन, ब्रांडिंग और ऑनलाइन बिजनेस में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह कोर्स काफी लोकप्रिय बन रहा है।
MBA in Finance
नई स्पेशलाइजेशन आने के बावजूद फाइनेंस आज भी सबसे भरोसेमंद और प्रतिष्ठित मैनेजमेंट क्षेत्रों में गिना जाता है। बैंकिंग, निवेश, बीमा, फिनटेक और कॉरपोरेट प्लानिंग जैसे क्षेत्रों में फाइनेंस विशेषज्ञों की लगातार जरूरत बनी रहती है।
MBA in Finance छात्रों को फाइनेंशियल प्लानिंग, निवेश विश्लेषण, कॉरपोरेट फाइनेंस, बजटिंग और रिस्क मैनेजमेंट की समझ देता है।
जो छात्र नंबर, विश्लेषण और संरचित समस्या समाधान में रुचि रखते हैं, उनके लिए यह क्षेत्र भारत और विदेश दोनों में अच्छे करियर अवसर प्रदान करता है।
MBA in International Business
ग्लोबल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजार के बढ़ते विस्तार के कारण इंटरनेशनल बिजनेस की मांग पहले से अधिक बढ़ गई है।
इस कोर्स में ग्लोबल ट्रेड सिस्टम, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट मैनेजमेंट, अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग, विदेशी बाजार संचालन और बिजनेस कम्युनिकेशन पर फोकस किया जाता है।
जो छात्र मल्टीनेशनल कंपनियों, विदेशी बाजारों और वैश्विक व्यापार में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह कोर्स उपयोगी माना जाता है।
MBA in Operations and Supply Chain Management
कोविड महामारी के बाद कंपनियों ने लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और ऑपरेशंस मैनेजमेंट को नए नजरिए से देखना शुरू किया है। अब कंपनियां समझ चुकी हैं कि मजबूत सप्लाई चेन सीधे बिजनेस की स्थिरता और ग्राहक संतुष्टि से जुड़ी होती है।
इस कोर्स में लॉजिस्टिक्स, इन्वेंटरी सिस्टम, प्रोडक्शन मैनेजमेंट, प्रोक्योरमेंट और ऑपरेशंस प्लानिंग जैसे विषय शामिल होते हैं।
मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल, एविएशन, हेल्थकेयर और ई-कॉमर्स सेक्टर में इस क्षेत्र के प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है।
Executive MBA: कामकाजी पेशेवरों के लिए बेहतर विकल्प
आज कई कामकाजी पेशेवर अपने करियर में आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन नौकरी छोड़कर फुल-टाइम पढ़ाई करना उनके लिए आसान नहीं होता। इसी कारण Executive MBA कार्यक्रम तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
ये कोर्स खासतौर पर उन लोगों के लिए बनाए जाते हैं, जो इंडस्ट्री अनुभव रखते हैं और नेतृत्व की भूमिकाओं में आगे बढ़ना चाहते हैं।
इन कार्यक्रमों में अक्सर वीकेंड क्लास, हाइब्रिड लर्निंग और इंडस्ट्री आधारित पाठ्यक्रम शामिल होते हैं, जिससे काम और पढ़ाई दोनों साथ में चल सकें।
सही MBA कोर्स कैसे चुनें?
आज कई छात्र केवल ट्रेंड, सोशल मीडिया या सैलरी की चर्चा देखकर कोर्स चुन लेते हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सही मैनेजमेंट कोर्स चुनते समय छात्रों को अपनी रुचि, कम्युनिकेशन स्किल, विश्लेषण क्षमता, नेतृत्व लक्ष्य और लंबे समय के करियर प्लान को ध्यान में रखना चाहिए।
उदाहरण के तौर पर:
- क्रिएटिव छात्रों के लिए डिजिटल मार्केटिंग बेहतर हो सकता है।
- विश्लेषणात्मक सोच रखने वाले छात्र फाइनेंस या बिजनेस एनालिटिक्स में बेहतर कर सकते हैं।
- लोगों के साथ काम करने में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए HR मैनेजमेंट उपयुक्त माना जाता है।
2026 में तेजी से क्यों बदल रही है मैनेजमेंट शिक्षा?
अब मैनेजमेंट शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रह गई है। कंपनियां ऐसे उम्मीदवार चाहती हैं, जिनके पास व्यावहारिक अनुभव, समस्या समाधान क्षमता, डिजिटल समझ, नेतृत्व कौशल और बदलते माहौल में काम करने की क्षमता हो।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, रिमोट वर्क सिस्टम और डिजिटल अर्थव्यवस्था ने बिजनेस की कार्यशैली पूरी तरह बदल दी है। इसी वजह से मैनेजमेंट कोर्स अब ज्यादा स्किल आधारित और व्यावहारिक बनते जा रहे हैं।
छात्रों के लिए क्या है सबसे जरूरी बात?
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे अच्छा मैनेजमेंट कोर्स वही होता है, जो किसी छात्र की रुचि, क्षमता और भविष्य के करियर लक्ष्य से मेल खाता हो।
चाहे कोई छात्र HR, फाइनेंस, मार्केटिंग, एनालिटिक्स, इंटरनेशनल बिजनेस या ऑपरेशंस में करियर चुनता हो, लंबे समय की सफलता के लिए शैक्षणिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव भी जरूरी है।
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में मैनेजमेंट शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि करियर की स्पष्ट दिशा, पेशेवर क्षमता और भविष्य के अवसरों के लिए खुद को तैयार करना है।
Top 7 Management Courses for Students and Working Professionals in India for 2026
12वीं या ग्रेजुएशन के बाद कानून के क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले छात्रों के सामने कई लॉ एंट्रेंस एग्जाम आते हैं। इन्हीं में से एक तेजी से चर्चा में आ रहा राष्ट्रीय स्तर का परीक्षा मंच है AICLET यानी ऑल इंडिया कॉमन लॉ एंट्रेंस टेस्ट।
AICLET धीरे-धीरे उन छात्रों के बीच एक लोकप्रिय विकल्प बनता जा रहा है, जो भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट लॉ कोर्स में दाखिला लेकर कानूनी क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं।
आज के समय में कानूनी शिक्षा, कॉर्पोरेट लॉ, न्यायिक सेवाओं और लीगल कंसल्टेंसी को लेकर छात्रों के बीच जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। इसी वजह से AICLET जैसे एंट्रेंस एग्जाम की अहमियत भी लगातार बढ़ रही है, क्योंकि यह छात्रों को लॉ प्रोफेशन में प्रवेश का एक व्यवस्थित रास्ता उपलब्ध कराता है।
AICLET क्या है?
Edinbox द्वारा आयोजित AICLET एक राष्ट्रीय स्तर की लॉ प्रवेश परीक्षा है। यह उन छात्रों के लिए आयोजित की जाती है जो निम्न कोर्स में दाखिला लेना चाहते हैं:
- BA LLB
- BBA LLB
- B.Com LLB
- LLB
- LLM
इस परीक्षा का उद्देश्य छात्रों को भारत के भाग लेने वाले लॉ विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रवेश के अवसर उपलब्ध कराना है। AICLET की खास बात यह है कि जहां कई लॉ एंट्रेंस एग्जाम साल में केवल एक बार होते हैं, वहीं यह परीक्षा हर महीने आयोजित की जाती है। इससे छात्रों को अपने एडमिशन और करियर प्लानिंग में अधिक लचीलापन मिलता है।
यह परीक्षा पूरी तरह ऑनलाइन मोड में आयोजित होती है और छात्र मोबाइल फोन, लैपटॉप या डेस्कटॉप के जरिए घर बैठे परीक्षा दे सकते हैं।
क्यों बढ़ रही है AICLET की लोकप्रियता?
पिछले कुछ वर्षों में कानून का क्षेत्र केवल कोर्ट रूम तक सीमित नहीं रहा है। अब छात्रों के लिए कई नए करियर विकल्प सामने आए हैं, जैसे:
- कॉर्पोरेट लॉ
- साइबर लॉ
- इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स
- लीगल कंसल्टेंसी
- लीगल जर्नलिज्म
- ज्यूडिशियरी तैयारी
- पॉलिसी रिसर्च
- स्टार्टअप लीगल एडवाइजरी
इसी वजह से 12वीं के बाद लॉ एंट्रेंस एग्जाम देने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है। हालांकि कई छात्रों को सही कोर्स चुनने, एंट्रेंस एग्जाम समझने और करियर गाइडेंस की कमी जैसी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है।
AICLET छात्रों को रजिस्ट्रेशन से पहले मुफ्त करियर काउंसलिंग भी उपलब्ध कराता है। इसके जरिए छात्र लॉ करियर के अलग-अलग रास्तों, कोर्स विकल्पों, योग्यता, विश्वविद्यालयों और अपने करियर लक्ष्यों के अनुसार सही दिशा को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार AICLET का आवेदन शुल्क 2000 रुपये रखा गया है।
किन कोर्स में मिलता है एडमिशन?
AICLET क्वालिफाई करने वाले छात्र अपनी शैक्षणिक योग्यता और करियर लक्ष्यों के अनुसार विभिन्न लॉ कोर्स में दाखिला ले सकते हैं।
BA LLB
यह कोर्स कानूनी शिक्षा के साथ मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषयों का संयोजन है। आमतौर पर 12वीं में 50 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्र आवेदन कर सकते हैं, हालांकि अलग-अलग संस्थानों के नियम अलग हो सकते हैं।
BBA LLB
यह कोर्स बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन और लॉ स्टडीज का मिश्रण है। कॉर्पोरेट लॉ, बिजनेस कंप्लायंस और बिजनेस मैनेजमेंट से जुड़े कानूनी करियर में रुचि रखने वाले छात्रों के बीच यह काफी लोकप्रिय है।
B.Com LLB
कॉमर्स और कानून की पढ़ाई को जोड़ने वाला यह कोर्स टैक्सेशन, फाइनेंस लॉ, कॉर्पोरेट कंप्लायंस और बिजनेस रेगुलेशन में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए उपयोगी माना जाता है।
LLB
जो छात्र केवल कानूनी शिक्षा पर फोकस करना चाहते हैं, वे भाग लेने वाले संस्थानों के LLB प्रोग्राम में दाखिला ले सकते हैं।
LLM
LLM कोर्स उन छात्रों के लिए होता है जिन्होंने लॉ में बैचलर डिग्री पूरी की हो और निर्धारित न्यूनतम अंक हासिल किए हों। कई संस्थान अंतिम सेमेस्टर के छात्रों को भी आवेदन की अनुमति देते हैं।
AICLET 2026 Exam Pattern
आधिकारिक जानकारी के अनुसार AICLET 2026 पूरी तरह ऑनलाइन आयोजित होगा ताकि देश के विभिन्न हिस्सों के छात्र आसानी से इसमें शामिल हो सकें।
परीक्षा की मुख्य विशेषताएं:
- ऑनलाइन मोड परीक्षा
- 60 मिनट की अवधि
- एक प्रश्न पत्र
- कुल 100 अंक
- अंग्रेजी भाषा आधारित पेपर
- प्रत्येक सही उत्तर पर 1 अंक
- नेगेटिव मार्किंग नहीं
नेगेटिव मार्किंग न होने की वजह से छात्र बिना अंक कटने के डर के सवालों का प्रयास कर सकते हैं। इसे कई अभ्यर्थी एक सकारात्मक पहलू मानते हैं।
किन विश्वविद्यालयों में मान्य हैं AICLET स्कोर?
AICLET स्कोर भारत के 100 से अधिक विश्वविद्यालयों और लॉ संस्थानों में स्वीकार किए जाते हैं। इनमें कई प्रमुख निजी विश्वविद्यालय शामिल हैं, जैसे:
- IILM University
- Bennett University
- Parul University
- Silver Oak University
- Lovely Professional University
- Chandigarh University
- UPES School of Law
- Alliance University
- Graphic Era University
आज क्यों बढ़ रही है लॉ करियर की मांग?
भारत में टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप, साइबर सिक्योरिटी, डिजिटल गवर्नेंस और फाइनेंस सेक्टर के विस्तार के साथ कानूनी विशेषज्ञों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। अब लॉ ग्रेजुएट केवल वकालत तक सीमित नहीं हैं।
आज के समय में कानूनी पेशेवर कई क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जैसे:
- कॉर्पोरेट लीगल डिपार्टमेंट
- लॉ फर्म
- पॉलिसी ऑर्गेनाइजेशन
- कंप्लायंस सेक्टर
- मीडिया लॉ
- साइबर क्राइम जांच
- लीगल कंसल्टेंसी
- लीगल टेक स्टार्टअप
यही वजह है कि भविष्य को ध्यान में रखते हुए कई छात्र लॉ एंट्रेंस एग्जाम की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
लॉ छात्रों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
किसी भी लॉ एंट्रेंस एग्जाम का चयन केवल एडमिशन तक सीमित नहीं होना चाहिए। छात्रों को यह भी समझना जरूरी है कि कौन सा कोर्स, शैक्षणिक माहौल और करियर दिशा उनके रुचि और भविष्य के लक्ष्यों के लिए सबसे बेहतर है।
भारत में कानूनी शिक्षा लगातार बदल रही है और ऐसे में AICLET जैसे एग्जाम छात्रों को न केवल एडमिशन का मौका दे रहे हैं, बल्कि उन्हें कानूनी करियर और उच्च शिक्षा के बेहतर विकल्पों के बारे में जागरूक भी बना रहे हैं।
फ्लेक्सिबल एग्जाम डेट, कम आवेदन शुल्क और एडमिशन से पहले करियर काउंसलिंग जैसी सुविधाओं की वजह से AICLET छात्रों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र तेजी से बदलता हुआ नजर आया है। अब यह केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एग्री-बिजनेस, फूड टेक्नोलॉजी, सस्टेनेबल फार्मिंग, एग्रीकल्चर रिसर्च, बायोटेक्नोलॉजी, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और ग्रामीण नवाचार जैसे क्षेत्रों तक विस्तार कर चुका है।
इसी बदलाव के कारण अब 12वीं के बाद बड़ी संख्या में छात्र कृषि शिक्षा को एक प्रोफेशनल करियर विकल्प के रूप में देखने लगे हैं।
कृषि क्षेत्र में बढ़ती रुचि के साथ All India Agriculture Common Aptitude Test यानी AIACAT को लेकर भी जागरूकता तेजी से बढ़ी है। यह राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है, जिसके माध्यम से छात्र कृषि और इससे जुड़े साइंस प्रोग्राम्स में एडमिशन के अवसर तलाश सकते हैं।
हालांकि, कई छात्रों और अभिभावकों के मन में अब भी यह सवाल रहता है कि AIACAT आखिर क्या है और यह कैसे काम करता है। यहां जानिए इससे जुड़ी पूरी जानकारी।
क्या है AIACAT?
All India Agriculture Common Aptitude Test एक राष्ट्रीय स्तर की एप्टीट्यूड और प्रवेश परीक्षा है, जिसे कृषि और संबद्ध विज्ञान विषयों में अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट कोर्स में प्रवेश के इच्छुक छात्रों के लिए तैयार किया गया है।
यह परीक्षा एक केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म की तरह काम करती है, जिसके माध्यम से छात्र कृषि शिक्षा से जुड़े विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों में एडमिशन के अवसर प्राप्त कर सकते हैं।
इस परीक्षा में छात्रों की क्षमता का मूल्यांकन कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाता है, जिनमें कृषि योग्यता, विज्ञान के मूल सिद्धांत, बायोलॉजी, पर्यावरण की समझ और लॉजिकल रीजनिंग शामिल हैं।
परीक्षा ऑनलाइन मोड में आयोजित की जाती है और इसका उद्देश्य यह जांचना होता है कि छात्र कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के लिए कितने तैयार हैं।
क्यों बढ़ रही है कृषि शिक्षा की लोकप्रियता?
करीब एक दशक पहले तक अधिकांश छात्र कृषि कोर्स की तुलना में इंजीनियरिंग या मेडिकल जैसे पारंपरिक विकल्पों को ज्यादा प्राथमिकता देते थे। लेकिन अब यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है।
आज कृषि क्षेत्र सीधे तौर पर फूड सिक्योरिटी, सस्टेनेबिलिटी, क्लाइमेट एडाप्टेशन, बायोटेक्नोलॉजी, एग्री-बिजनेस, ग्रामीण विकास और स्मार्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी से जुड़ चुका है।
भारत का कृषि तंत्र भी तेजी से आधुनिक हो रहा है, जहां इनोवेशन, रिसर्च, ऑर्गेनिक फार्मिंग, एग्रीकल्चर एंटरप्रेन्योरशिप और मॉडर्न फूड सिस्टम पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इसी वजह से कृषि विज्ञान और इससे जुड़े क्षेत्रों में प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स की मांग लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि AIACAT जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं में छात्रों की रुचि तेजी से बढ़ रही है।
AIACAT एडमिशन प्रक्रिया कैसे काम करती है?
AIACAT की एडमिशन प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।
सबसे पहले छात्रों को ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होता है। इसके बाद उम्मीदवारों को 60 मिनट की ऑनलाइन एप्टीट्यूड परीक्षा में शामिल होना पड़ता है।
परीक्षा के बाद रिजल्ट जारी किए जाते हैं, फिर काउंसलिंग प्रक्रिया आयोजित होती है। इसके बाद छात्र अपनी पसंद के विश्वविद्यालय और कोर्स का चयन करते हैं और संबंधित संस्थानों के माध्यम से एडमिशन प्रक्रिया पूरी की जाती है।
यह प्रक्रिया छात्रों के लिए कृषि क्षेत्र में एडमिशन को अधिक व्यवस्थित और आसान बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई है।
AIACAT में कौन-कौन से विषय शामिल होते हैं?
AIACAT मुख्य रूप से एप्टीट्यूड और साइंस आधारित विषयों पर केंद्रित होती है।
इसमें कृषि विज्ञान, बायोलॉजी, पर्यावरण विज्ञान, लॉजिकल रीजनिंग और एनालिटिकल एप्टीट्यूड जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।
परीक्षा का उद्देश्य केवल रटने की क्षमता को जांचना नहीं, बल्कि यह समझना होता है कि छात्र कृषि शिक्षा के लिए जरूरी बुनियादी समझ और योग्यता रखते हैं या नहीं।
कौन कर सकता है आवेदन?
AIACAT उन छात्रों के लिए तैयार की गई है जो कृषि और संबंधित क्षेत्रों में अंडरग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट कोर्स करना चाहते हैं।
कृषि, एग्रोनॉमी, फूड सिस्टम, एग्री-बिजनेस, पर्यावरण विज्ञान, सस्टेनेबल फार्मिंग और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में रुचि रखने वाले छात्र इस परीक्षा को एडमिशन के एक प्रमुख विकल्प के रूप में देखते हैं।
हालांकि, पात्रता शर्तें संबंधित संस्थान और कोर्स के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
छात्र AIACAT को क्यों चुन रहे हैं?
आज बड़ी संख्या में छात्र All India Agriculture Common Aptitude Test को इसलिए चुन रहे हैं क्योंकि यह विभिन्न विश्वविद्यालयों में एडमिशन प्रक्रिया को आसान बनाता है।
अलग-अलग संस्थानों में अलग आवेदन करने के बजाय छात्र एक ही प्रवेश परीक्षा और काउंसलिंग प्रक्रिया के माध्यम से कई कृषि प्रोग्राम्स के अवसर तलाश सकते हैं।
यह परीक्षा छात्रों की उस बदलती सोच को भी दर्शाती है, जिसमें वे अब सस्टेनेबिलिटी, फूड प्रोडक्शन, क्लाइमेट रेजिलिएंस और कृषि नवाचार से जुड़े करियर विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
कृषि कोर्स के बाद करियर अवसर
आज कृषि शिक्षा केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं है।
कृषि क्षेत्र से पढ़ाई पूरी करने वाले छात्र एग्रीकल्चर रिसर्च, एग्री-बिजनेस मैनेजमेंट, फूड प्रोडक्शन इंडस्ट्री, एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी, सरकारी कृषि विभाग, ग्रामीण विकास परियोजनाओं, ऑर्गेनिक फार्मिंग और सप्लाई चेन मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में करियर बना सकते हैं।
इसके अलावा फूड सिक्योरिटी, सस्टेनेबल डेवलपमेंट, एग्रीकल्चर फाइनेंस और पर्यावरण नीति से जुड़े संगठनों में भी रोजगार के अवसर मौजूद हैं।
क्या आज कृषि एक अच्छा करियर विकल्प है?
जो छात्र विज्ञान, पर्यावरण, सस्टेनेबिलिटी, फूड सिक्योरिटी या ग्रामीण नवाचार में रुचि रखते हैं, उनके लिए कृषि आज भविष्य से जुड़ा मजबूत करियर विकल्प बन चुका है।
यह क्षेत्र अब विज्ञान, टेक्नोलॉजी, रिसर्च, एंटरप्रेन्योरशिप, पॉलिसी और सस्टेनेबिलिटी का मिश्रण बन चुका है।
इसी वजह से कृषि शिक्षा अब केवल खेती तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर क्लाइमेट मैनेजमेंट और फूड सिस्टम से जुड़े नए करियर अवसरों का हिस्सा बन चुकी है।
छात्रों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
All India Agriculture Common Aptitude Test भारत में कृषि और संबद्ध विज्ञान शिक्षा के लिए एक संगठित प्रवेश प्रक्रिया के रूप में उभर रहा है।
कृषि नवाचार, सस्टेनेबिलिटी और फूड सिस्टम को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच अब छात्र कृषि को सीमित पारंपरिक क्षेत्र के बजाय एक आधुनिक और बहुआयामी करियर विकल्प के रूप में देखने लगे हैं।
जो छात्र 12वीं या ग्रेजुएशन के बाद कृषि क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए AIACAT जैसी परीक्षाओं को समझना करियर प्लानिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
Current Events
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में 24 अप्रैल को आयोजित एडइनबॉक्स रीजनल हायर एजुकेशन समिट 2026 सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। सुबह 9 बजे से शाम तक चले इस पूरे दिन के आयोजन में शिक्षा जगत के विशेषज्ञों, विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों, स्कूल लीडर्स, नीति निर्माताओं और बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया। समिट ने उच्च शिक्षा, कौशल विकास, उभरते करियर विकल्पों और इंडस्ट्री-एकेडेमिया तालमेल जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा का मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (विधि विज्ञान प्रयोगशाला) के निदेशक प्रो. (डॉ.) आदर्श कुमार ने किया। उद्घाटन सत्र में उनके साथ प्रयोगशाला के उप निदेशक ए.के. श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रो वाइस चांसलर डॉ. टी.पी. सिंह, लखनऊ स्थित समर्पण इंस्टीट्यूट ऑफ़ नर्सिंग एंड पैरामेडिकल साइंसेज की प्रिंसिपल प्रो. दीप्ति शुक्ला और टेक्नो इंडिया यूनिवर्सिटी, कोलकाता के प्रो वाइस चांसलर एवं एडइनबॉक्स कम्युनिकेशन्स के एडिटोरियल एडवाइजर प्रो. उज्जवल के. चौधरी समेत कई प्रमुख अतिथि मौजूद रहे।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. (डॉ.) आदर्श कुमार ने कहा कि आज के समय में शिक्षा को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने जोर दिया कि छात्रों को व्यावहारिक कौशल, अनुसंधान क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस करना जरूरी है, ताकि वे बदलते समय की चुनौतियों का सामना कर सकें। उन्होंने फॉरेंसिक साइंस को युवाओं के लिए उभरते और संभावनाओं से भरे क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया।
समिट में इस वर्ष फॉरेंसिक साइंस पर विशेष फोकस रहा। विशेषज्ञों ने डीएनए प्रोफाइलिंग, डिजिटल फॉरेंसिक, टॉक्सिकोलॉजी और फिंगरप्रिंट विश्लेषण जैसी तकनीकों को सरल तरीके से समझाया और बताया कि कैसे छोटे-छोटे साक्ष्य बड़े मामलों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाते हैं। साथ ही अदालत में वैज्ञानिक तथ्यों की प्रस्तुति और जांच प्रक्रिया की जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
उद्घाटन सत्र में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, उत्तर प्रदेश के प्रो वाइस चांसलर डॉ. टी.पी. सिंह ने “इंटर, मल्टी और ट्रांस-डिसिप्लिनरी लर्निंग” तथा “टर्मिनल स्किल्स से निरंतर स्किल्स लर्निंग” के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि आज की शिक्षा केवल एक विषय तक सीमित नहीं रह सकती।
उन्होंने बताया कि इंटर-डिसिप्लिनरी लर्निंग में दो विषयों का समन्वय होता है, जबकि मल्टी-डिसिप्लिनरी लर्निंग में कई विषयों की समानांतर समझ विकसित की जाती है। वहीं ट्रांस-डिसिप्लिनरी लर्निंग इन सभी सीमाओं से आगे बढ़कर वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होती है।
डॉ. सिंह ने “टर्मिनल स्किल्स” की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि पहले शिक्षा एक निश्चित कौशल तक सीमित होती थी, जिसे सीखकर छात्र अपने करियर की शुरुआत करते थे। लेकिन बदलते समय में यह मॉडल पर्याप्त नहीं है। अब जरूरत “कंटीन्यूस स्किल्स लर्निंग” की है, जहां व्यक्ति को लगातार नई तकनीकों और कौशलों को सीखते रहना पड़ता है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि तेजी से बदलती तकनीक और रोजगार के स्वरूप को देखते हुए छात्रों को लचीला, जिज्ञासु और आजीवन सीखने के लिए तैयार रहना होगा, तभी वे भविष्य की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पाएंगे।
कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिएटिव करियर, नई शिक्षा नीति और स्किल-आधारित शिक्षा जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। रीजनल प्रिंसिपल्स मीट, एकेडमिक लीडरशिप डायलॉग और स्कूल–यूनिवर्सिटी कनेक्ट इनिशिएटिव जैसे सत्रों ने शिक्षा क्षेत्र के विभिन्न हितधारकों के बीच संवाद को मजबूत किया।
समिट का एक प्रमुख आकर्षण छात्रों और विशेषज्ञों के बीच सीधा संवाद रहा, जिसमें युवाओं ने करियर विकल्प, प्रवेश परीक्षाओं और भविष्य की संभावनाओं से जुड़े सवाल पूछे। इस दौरान उन्हें व्यावहारिक और स्पष्ट मार्गदर्शन मिला। आयोजन में छात्रों के लिए प्रतियोगिताएं, करियर काउंसलिंग सत्र और विभिन्न गतिविधियां भी आयोजित की गईं, जिससे कार्यक्रम और अधिक सहभागी बना।
कार्यक्रम की मेजबानी लोकप्रिय रेडियो जॉकी RJ पुनीत और RJ मनीषा ने की। उनकी जीवंत प्रस्तुति ने पूरे आयोजन को ऊर्जावान बनाए रखा और छात्रों के साथ बेहतर जुड़ाव स्थापित किया।
समिट के दौरान शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए संस्थानों और स्कूल प्रिंसिपल्स को सम्मानित भी किया गया। ‘प्रिंसिपल अवॉर्ड ऑफ ऑनर’ के तहत कई शिक्षाविदों को उनके योगदान के लिए सराहा गया।
आयोजकों ने कहा कि इस तरह के मंच छात्रों को सही दिशा में मार्गदर्शन देने, नए करियर विकल्पों से परिचित कराने और शिक्षा प्रणाली को समय की मांग के अनुरूप ढालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समिट भविष्य में शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक बदलावों को गति देगा।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।
आज के दौर में बच्चे अपना बड़ा समय स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक, ज्यादातर गतिविधियां अब डिजिटल स्क्रीन के जरिए ही हो रही हैं। लेकिन इसके साथ इंटरनेट पर मौजूद हानिकारक कंटेंट, साइबरबुलिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे खतरे भी तेजी से बढ़ रहे हैं। बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास पर इसके असर को देखते हुए मलेशिया ने डिजिटल सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाया है।
मलेशिया सरकार ने 1 जून से बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए नए और सख्त नियम लागू कर दिए हैं। इन नियमों का उद्देश्य सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों तक पहुंचने वाले हानिकारक कंटेंट को रोकना और इंटरनेट को अधिक सुरक्षित बनाना है।
ऑनलाइन कंपनियों को बदलनी होगी अपनी व्यवस्था
मलेशियन कम्युनिकेशंस एंड मल्टीमीडिया कमीशन (MCMC) ने नए नियमों की घोषणा करते हुए कहा है कि अब ऑनलाइन सेवा प्रदाताओं और सोशल मीडिया कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म में बड़े बदलाव करने होंगे।
नियमों के तहत कंपनियों को ऐसे सुरक्षा फीचर्स लागू करने होंगे जो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट रजिस्ट्रेशन और उपयोग को नियंत्रित कर सकें। इसके अलावा प्लेटफॉर्म्स को बच्चों के लिए उम्र के हिसाब से सुरक्षित डिजिटल अनुभव देना भी जरूरी होगा।
सरकार का मानना है कि केवल कंटेंट हटाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बच्चों तक जोखिम भरे फीचर्स और सामग्री की पहुंच को पहले से रोकना भी जरूरी है।
साइबरबुलिंग और हानिकारक कंटेंट पर सख्ती
नए नियमों में हाई-रिस्क फीचर्स पर अतिरिक्त निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे कंटेंट की पहचान कर तुरंत कार्रवाई करनी होगी जो बच्चों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
इसमें साइबरबुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग, फर्जी जानकारी, नस्लीय या धार्मिक नफरत फैलाने वाली पोस्ट और हिंसक सामग्री शामिल हैं। सरकार ने प्लेटफॉर्म्स को यह भी निर्देश दिया है कि संदिग्ध कंटेंट को तेजी से हटाने और रिपोर्टिंग सिस्टम को मजबूत बनाने की व्यवस्था की जाए।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लागू होंगे नए फीचर्स
नए डिजिटल नियमों के तहत कंपनियों को कई नए सुरक्षा फीचर्स लागू करने होंगे। इसमें प्रभावी शिकायत प्रणाली, तेज प्रतिक्रिया तंत्र और विज्ञापनदाताओं की पहचान सत्यापित करने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
इसके अलावा अगर किसी कंटेंट में AI या एडिटेड तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, तो उसे स्पष्ट रूप से लेबल करना भी जरूरी हो सकता है। सरकार का मानना है कि इससे लोगों को असली और बदले हुए कंटेंट के बीच फर्क समझने में मदद मिलेगी।
जल्द लागू हो सकता है एज वेरिफिकेशन सिस्टम
मलेशिया सरकार जल्द ही एज वेरिफिकेशन सिस्टम लागू करने की तैयारी भी कर रही है। इसके जरिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स यूजर्स की उम्र की पुष्टि कर सकेंगे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कम उम्र के बच्चों तक ऐसा कंटेंट न पहुंचे जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं है। हालांकि डिजिटल अधिकारों से जुड़े कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि एज वेरिफिकेशन लागू करते समय यूजर्स की प्राइवेसी का भी ध्यान रखना होगा।
कई देशों में बढ़ रही डिजिटल सुरक्षा को लेकर सख्ती
मलेशिया ऐसा कदम उठाने वाला पहला देश नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सख्त नियम लागू किए हैं। बढ़ती स्क्रीन टाइम आदतों और सोशल मीडिया के प्रभाव को देखते हुए अब सरकारें टेक कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने पर जोर दे रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में और भी देश इसी तरह के डिजिटल सुरक्षा कानून ला सकते हैं। खासतौर पर बच्चों और किशोरों को इंटरनेट के खतरों से बचाने के लिए वैश्विक स्तर पर नए नियमों की मांग लगातार बढ़ रही है।
कंपनियों को दिया गया समय
MCMC ने कहा है कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को नए नियम लागू करने के लिए कुछ समय दिया जाएगा। हालांकि आयोग ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह ग्रेस पीरियड कितने समय का होगा।
सरकार का कहना है कि उद्देश्य केवल नियम लागू करना नहीं, बल्कि ऐसा डिजिटल माहौल बनाना है जहां बच्चे सुरक्षित तरीके से इंटरनेट का उपयोग कर सकें।
आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। तकनीक, ऑटोमेशन और डिजिटल सिस्टम ने काम करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। कई पारंपरिक नौकरियां नए रूप ले रही हैं, जबकि आने वाले वर्षों में ऐसी नौकरियां भी सामने आएंगी, जिनके बारे में आज शायद लोग सोच भी नहीं रहे हैं। ऐसे दौर में युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नौकरी हासिल करना नहीं, बल्कि खुद को लगातार बदलती दुनिया के लिए तैयार रखना है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब केवल डिग्री या तकनीकी कौशल ही सफलता की गारंटी नहीं हैं। बदलते समय में सबसे महत्वपूर्ण है नई चीजें सीखने की क्षमता, खुले विचार रखना और अपने अंदर लगातार सुधार करते रहना। जो लोग बदलाव को स्वीकार कर उसके अनुसार खुद को ढाल लेते हैं, वे भविष्य में ज्यादा मजबूत स्थिति में दिखाई देंगे।
करियर चुनते समय अपने मूल्यों को समझना जरूरी
जब व्यक्ति अपने करियर या जीवन को लेकर उलझन में होता है, तब उसके अपने मूल्य सही दिशा दिखाने का काम करते हैं। ईमानदारी, मेहनत, दूसरों की मदद करना, सीखते रहना या जिम्मेदारी निभाना जैसे मूल्य फैसले लेने में मदद करते हैं।
आज युवाओं के सामने विकल्पों की कमी नहीं है। लेकिन हर विकल्प हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होता। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कौन-सा काम व्यक्ति की सोच, रुचि और जीवन के उद्देश्य से मेल खाता है। जब इंसान अपने मूल्यों के अनुसार फैसले लेता है, तो उसके अंदर आत्मविश्वास और संतोष बना रहता है। यही चीज कठिन समय में भी सही दिशा चुनने में मदद करती है।
वही काम चुनें जिसमें खुशी और संतोष मिले
करियर केवल कमाई का जरिया नहीं होना चाहिए। ऐसा काम चुनना जरूरी है जिसमें व्यक्ति को खुशी, उत्साह और आत्मविश्वास महसूस हो। इसके लिए जरूरी है कि युवा यह समझें कि उनकी सबसे बड़ी ताकत क्या है और उनके कौशल का उपयोग किन क्षेत्रों में बेहतर तरीके से हो सकता है।
अपने पुराने अनुभवों से सीखना भी करियर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कई बार व्यक्ति को अपनी रुचि और क्षमता का पता काम करते-करते ही चलता है। ऐसे में जल्दबाजी के बजाय खुद को समझना जरूरी होता है। जरूरत पड़ने पर किसी अनुभवी व्यक्ति, शिक्षक या करियर विशेषज्ञ से सलाह लेना भी फायदेमंद हो सकता है।
अब करियर एक सीधी राह नहीं, लगातार बदलने वाली यात्रा है
कुछ साल पहले तक लोग एक नौकरी या एक ही क्षेत्र में लंबे समय तक काम करते थे। लेकिन अब करियर का स्वरूप बदल चुका है। आज व्यक्ति को समय-समय पर नई तकनीक सीखनी पड़ती है, नई जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं और कई बार नए क्षेत्र में भी कदम रखना पड़ता है।
इसी वजह से अब सफल वही लोग माने जा रहे हैं जो बदलाव के साथ खुद को ढाल सकें। इसके लिए भविष्य की सही योजना बनाना, सोच-समझकर फैसले लेना और अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखना बेहद जरूरी है। सीखते रहने की आदत व्यक्ति को लगातार आगे बढ़ने में मदद करती है।
सिर्फ स्किल नहीं, खुद को समझना भी है जरूरी
आज करियर को केवल तकनीकी कौशल तक सीमित नहीं माना जाता। यह खुद को बेहतर तरीके से समझने का भी अवसर बन चुका है। व्यक्ति को यह समझना जरूरी है कि वह किस तरह के माहौल में बेहतर काम कर सकता है, किस प्रकार के काम से उसे प्रेरणा मिलती है और किन परिस्थितियों में उसका प्रदर्शन अच्छा रहता है।
जब व्यक्ति अपनी रुचि, सोच और काम के बीच संतुलन बना लेता है, तब उसकी पेशेवर जिंदगी ज्यादा स्थिर और संतोषजनक बनती है। ऐसे लोग लंबे समय तक अपने काम से जुड़े रहते हैं और उनमें थकान या ऊब की भावना भी कम होती है।
प्रेरणा और काम का तालमेल बनाना क्यों जरूरी?
अगर रोज का काम व्यक्ति की अंदरूनी इच्छाओं, रुचियों और मूल्यों के अनुसार हो, तो काम केवल जिम्मेदारी नहीं लगता बल्कि उसमें अर्थ और खुशी भी महसूस होती है। यही वजह है कि आज करियर विशेषज्ञ केवल नौकरी खोजने की नहीं, बल्कि सही दिशा चुनने की सलाह देते हैं।
जो लोग अपने काम में उद्देश्य महसूस करते हैं, वे ज्यादा रचनात्मक, आत्मविश्वासी और लंबे समय तक सफल बने रहते हैं। बदलती नौकरी की दुनिया में यही सोच युवाओं को मजबूत और स्थिर करियर बनाने में मदद कर सकती है।
भारत में उच्च शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह गए हैं, बल्कि वे रिसर्च, इनोवेशन और नई तकनीकों के विकास के केंद्र बनते जा रहे हैं। यही कारण है कि आज उच्च शिक्षा में “Research Culture” यानी शोध संस्कृति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी विश्वविद्यालय की गुणवत्ता केवल उसके पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि वहां होने वाले रिसर्च और इनोवेशन से तय होती है। मजबूत रिसर्च कल्चर न केवल छात्रों को बेहतर सीखने का अवसर देता है, बल्कि देश की वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक प्रगति में भी अहम भूमिका निभाता है।
क्या होता है शोध संस्कृति?
शोध संस्कृति का मतलब केवल रिसर्च पेपर प्रकाशित करना नहीं है। इसका अर्थ है ऐसा शैक्षणिक वातावरण तैयार करना जहां छात्र और शिक्षक नए विचारों पर काम करें, समस्याओं का समाधान खोजें और समाज से जुड़े मुद्दों पर अध्ययन करें।
जब किसी विश्वविद्यालय में रिसर्च को बढ़ावा दिया जाता है, तो वहां छात्रों को प्रयोग करने, डेटा विश्लेषण करने और नई खोजों पर काम करने के अवसर मिलते हैं। इससे उनकी सोचने और समझने की क्षमता मजबूत होती है।
छात्रों के करियर में कैसे मदद करता है रिसर्च?
आज नौकरी का बाजार तेजी से बदल रहा है। कंपनियां अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि समस्या समाधान क्षमता, विश्लेषणात्मक सोच और इनोवेशन स्किल्स को महत्व दे रही हैं। रिसर्च आधारित शिक्षा छात्रों में यही गुण विकसित करती है।
जो छात्र रिसर्च प्रोजेक्ट्स, इंटरनैशनल कॉन्फ्रेंस या इनोवेशन गतिविधियों में भाग लेते हैं, उन्हें करियर में अधिक अवसर मिलते हैं। खासतौर पर AI, डेटा साइंस, हेल्थकेयर, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में रिसर्च अनुभव को बड़ी प्राथमिकता दी जा रही है।
विश्वविद्यालयों की वैश्विक पहचान में बढ़ती भूमिका
विश्व स्तर पर किसी भी विश्वविद्यालय की रैंकिंग में रिसर्च आउटपुट और इनोवेशन का बड़ा योगदान होता है। रिसर्च पेपर्स, पेटेंट, वैज्ञानिक खोज और इंडस्ट्री सहयोग विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को मजबूत करते हैं।
भारत के कई संस्थान अब इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च और ग्लोबल अकादमिक सहयोग पर ध्यान दे रहे हैं ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकें। यही वजह है कि IITs, IIMs और कई निजी विश्वविद्यालय रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े स्तर पर निवेश कर रहे हैं।
नई शिक्षा नीति में भी रिसर्च पर जोर
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी University Grants Commission और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में भी रिसर्च और इनोवेशन को उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। नीति का उद्देश्य भारत में ऐसा शिक्षा तंत्र विकसित करना है जो केवल परीक्षा आधारित न होकर रिसर्च और स्किल डेवलपमेंट पर आधारित हो।
इसके तहत विश्वविद्यालयों को रिसर्च लैब, स्टार्टअप इकोसिस्टम और इंडस्ट्री सहयोग को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
रिसर्च से समाज को भी होता है फायदा
रिसर्च केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहती। इसका सीधा असर समाज और उद्योगों पर भी पड़ता है। हेल्थकेयर, कृषि, पर्यावरण, टेक्नोलॉजी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में नई रिसर्च लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने में मदद करती है।
उदाहरण के तौर पर AI आधारित हेल्थ टेक्नोलॉजी, स्मार्ट कृषि समाधान और क्लीन एनर्जी रिसर्च आज समाज की बड़ी जरूरत बन चुके हैं।
भारत में रिसर्च कल्चर को और मजबूत करने की जरूरत
हालांकि भारत में रिसर्च गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन अभी भी कई विश्वविद्यालयों में फंडिंग, रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री सहयोग की कमी देखी जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर विश्वविद्यालयों में रिसर्च को शुरुआती स्तर से बढ़ावा दिया जाए, तो भारत वैश्विक शिक्षा और इनोवेशन हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
उच्च शिक्षा (Higher Education) में मजबूत शोध संस्कृति (Research Culture) केवल अकादमिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्रों के बेहतर भविष्य, विश्वविद्यालयों की वैश्विक पहचान और देश की प्रगति से भी सीधे जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में वही संस्थान आगे बढ़ेंगे जो शिक्षा के साथ रिसर्च और इनोवेशन को बराबर महत्व देंगे।
दुनियाभर के स्कूल बढ़ते लर्निंग गैप और छात्रों की पढ़ाई में कम होती रुचि जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षक और शोधकर्ता अब Explainable Artificial Intelligence (XAI) की ओर तेजी से ध्यान दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राइवेसी को ध्यान में रखकर तैयार किए गए टिकाऊ AI सिस्टम स्कूलों को उन छात्रों की जल्दी पहचान करने में मदद कर सकते हैं जो पढ़ाई में पिछड़ने लगे हैं, ताकि समय रहते उन्हें जरूरी सहायता दी जा सके।
पारंपरिक AI सिस्टम्स को अक्सर “ब्लैक बॉक्स” कहा जाता है क्योंकि उनमें यह साफ नहीं होता कि निर्णय कैसे लिए गए। वहीं Explainable AI पारदर्शिता पर जोर देता है। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि किसी छात्र को लेकर अलर्ट क्यों जारी हुआ, किन संकेतों के आधार पर भविष्यवाणी की गई और कौन-से फैक्टर्स उस निर्णय में शामिल थे।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इससे शिक्षक AI द्वारा दिए गए सुझावों को बेहतर तरीके से समझ और जांच सकते हैं, बजाय इसके कि वे केवल मशीन के फैसलों पर निर्भर रहें।
कैसे काम करती है Explainable AI?
ये सिस्टम छात्रों की नियमित शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़े डेटा का विश्लेषण करते हैं। इसमें उपस्थिति, डिजिटल लर्निंग सामग्री के साथ इंटरैक्शन, असाइनमेंट में भागीदारी और ऑनलाइन एक्टिविटी पैटर्न जैसे संकेत शामिल होते हैं।
इन जानकारियों के आधार पर AI उन छात्रों की पहचान कर सकता है जो भविष्य में अकादमिक रूप से कमजोर पड़ सकते हैं। खास बात यह है कि यह पहचान परीक्षा परिणाम खराब आने से काफी पहले हो सकती है।
हाल ही में हुई एक रिसर्च में पाया गया कि Explainable AI सिस्टम लगभग 93 प्रतिशत तक की सटीकता के साथ कोर्स रिजल्ट और जोखिम वाले छात्रों की पहचान करने में सक्षम रहे।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ये सिस्टम इसलिए प्रभावी हैं क्योंकि ये केवल परीक्षा आधारित मूल्यांकन पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि छात्रों की लगातार बदलती सीखने की गतिविधियों को ट्रैक करते हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई छात्र लर्निंग रिसोर्स कम देखने लगे या ऑनलाइन गतिविधियों में कम हिस्सा लेने लगे, तो यह उसकी घटती रुचि या सीखने में परेशानी का शुरुआती संकेत हो सकता है।
कई संस्थान कर रहे हैं AI आधारित सिस्टम का इस्तेमाल
दुनियाभर के कई शैक्षणिक संस्थान अब AI आधारित अलर्ट सिस्टम को छात्र सहायता कार्यक्रमों के साथ जोड़ने का प्रयोग कर रहे हैं।
RADAR जैसे प्लेटफॉर्म छात्रों के अकादमिक रिकॉर्ड, उपस्थिति, वर्तमान प्रदर्शन और कुछ सॉफ्ट स्किल संकेतकों को मिलाकर उनकी प्रगति की लगातार निगरानी करते हैं।
अगर किसी छात्र का लर्निंग पैटर्न सामान्य अपेक्षाओं से अलग दिखाई देने लगता है, तो सिस्टम शिक्षकों और सलाहकारों को अलर्ट भेजता है। इसके बाद छात्रों को ट्यूटर सपोर्ट, अतिरिक्त मार्गदर्शन, वर्कलोड एडजस्टमेंट या अकादमिक काउंसलिंग जैसी मदद दी जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सिस्टम्स की सबसे बड़ी ताकत केवल भविष्यवाणी की सटीकता नहीं, बल्कि यह है कि स्कूल कितनी जल्दी उस जानकारी के आधार पर कार्रवाई कर पाते हैं।
शिक्षा में टिकाऊ AI क्यों बन रहा है जरूरी?
शिक्षा में Sustainable AI की बढ़ती चर्चा केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध समान अवसर और बेहतर शैक्षणिक परिणामों से भी है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अगर किसी छात्र की समस्याओं की पहचान देर से होती है, तो इससे उसका तनाव बढ़ सकता है, परिवार और संस्थान के बीच भरोसा कमजोर हो सकता है और बाद में सुधार के लिए स्कूलों को ज्यादा संसाधन खर्च करने पड़ते हैं।
इसके मुकाबले शुरुआती पहचान और व्यक्तिगत सहायता को ज्यादा मानवीय और प्रभावी तरीका माना जा रहा है, जो छात्रों के भविष्य और रोजगार क्षमता दोनों को बेहतर बना सकता है।
AI के इस्तेमाल को लेकर क्या हैं चिंताएं?
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ऐसे Early Warning Systems को जिम्मेदारी के साथ लागू करना बेहद जरूरी है।
आलोचकों का कहना है कि अगर AI टूल्स सही तरीके से डिजाइन नहीं किए गए, तो वे छात्रों को गलत तरीके से लेबल कर सकते हैं, पक्षपात बढ़ा सकते हैं या स्कूलों में जरूरत से ज्यादा निगरानी को बढ़ावा दे सकते हैं।
इन्हीं जोखिमों को कम करने के लिए शोधकर्ता सख्त प्राइवेसी सुरक्षा, सीमित डेटा कलेक्शन, नियमित बायस टेस्टिंग और लगातार मानवीय निगरानी की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।
शिक्षकों को भी सलाह दी जा रही है कि वे AI को अंतिम निर्णय लेने वाले सिस्टम की बजाय केवल सहायता उपकरण के रूप में इस्तेमाल करें, ताकि हस्तक्षेप से जुड़े सभी अहम फैसलों में इंसानी भूमिका बनी रहे।
शिक्षा में AI का भविष्य किस दिशा में जा रहा है?
जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनता जा रहा है, वैसे-वैसे बहस इस बात से आगे बढ़ रही है कि AI का इस्तेमाल होना चाहिए या नहीं। अब चर्चा इस बात पर केंद्रित हो रही है कि इसे नैतिक और टिकाऊ तरीके से कैसे लागू किया जाए।
समर्थकों का मानना है कि अगर Explainable AI को पारदर्शिता, जवाबदेही और समय पर सहायता देने वाले सिस्टम के साथ जोड़ा जाए, तो यह शिक्षा को ज्यादा समावेशी, अनुकूल और छात्र-केंद्रित बना सकता है।
इस तरह की तकनीक केवल शैक्षणिक प्रक्रियाओं को ऑटोमेट करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वास्तव में छात्रों के हित में काम करने वाली शिक्षा व्यवस्था तैयार करने में मदद कर सकती है।
भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा लगातार वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। इसी कड़ी में गुजराती फिल्म ‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’ ने कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में पहुंचकर नया इतिहास रच दिया है। यह उन चुनिंदा गुजराती फिल्मों में शामिल हो गई है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। फिल्म की इस उपलब्धि को गुजराती सिनेमा के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है।
कान फिल्म फेस्टिवल में फिल्म की मौजूदगी ने न सिर्फ गुजरात की संस्कृति और कहानियों को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया, बल्कि भारतीय क्षेत्रीय फिल्मों की बढ़ती ताकत को भी सामने रखा। फिल्म की टीम ने इस उपलब्धि को दर्शकों के प्यार और समर्थन का परिणाम बताया है।
दर्शकों के समर्थन को बताया सबसे बड़ी ताकत
फिल्म के निर्माताओं ने कहा कि ‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’ का सफर दर्शकों के भरोसे और प्यार के बिना संभव नहीं था। टीम के मुताबिक, किसी भी क्षेत्रीय फिल्म के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि होती है और यह पूरे गुजराती फिल्म उद्योग के लिए गर्व का क्षण है।
निर्देशक अंकित सखिया ने क्या कहा?
फिल्म के निर्देशक अंकित सखिया ने इस मौके को भावुक और गर्व भरा बताया। उन्होंने कहा कि कान फिल्म फेस्टिवल जैसे प्रतिष्ठित मंच पर ‘लालो’ का प्रतिनिधित्व करना पूरी टीम के लिए सम्मान की बात है।
उन्होंने अपने बयान में कहा कि उनकी भाषा, संस्कृति और स्थानीय कहानियां ही उन्हें इस मुकाम तक लेकर आई हैं। निर्देशक के अनुसार, फिल्म के जरिए गुजरात की संस्कृति की एक झलक दुनिया तक पहुंचाने का मौका मिला है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह कहानी भाषा और सीमाओं से आगे बढ़कर लोगों के दिलों को छूएगी।
निर्माताओं ने कही दिल की बात
फिल्म के निर्माता अजय पड़ारिया, जय व्यास और जिगर दलसानिया ने कहा कि शुरुआत से ही इस फिल्म को ऐसी कहानी के रूप में तैयार किया गया था जो हर वर्ग के दर्शकों से जुड़ सके।
निर्माताओं के मुताबिक, सिनेमा की असली ताकत तभी दिखाई देती है जब वह लोगों की भावनाओं तक पहुंचे। उनका कहना है कि ‘लालो’ को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा रही है।
जनवरी 2026 में रिलीज हुई थी फिल्म
फिल्म ‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’ 9 जनवरी 2026 को रिलीज हुई थी। फिल्म में रीवा रच, श्रुहद गोस्वामी और करण जोशी मुख्य भूमिकाओं में नजर आए हैं।
फिल्म की अंतरराष्ट्रीय पहचान को देखते हुए माना जा रहा है कि आने वाले समय में गुजराती सिनेमा को वैश्विक प्लेटफॉर्म पर और ज्यादा अवसर मिल सकते हैं। भारतीय क्षेत्रीय फिल्मों के लिए यह उपलब्धि एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, जहां स्थानीय कहानियां अब दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंच रही हैं।
आज की युवा पीढ़ी यानी Gen Z के लिए घूमना-फिरना अब सिर्फ छुट्टियां मनाने का तरीका नहीं रह गया है। यह उनकी लाइफस्टाइल, सोच और मानसिक संतुलन का हिस्सा बन चुका है। कुछ साल पहले तक ट्रैवल को एक लग्जरी या लंबे समय की मेहनत के बाद मिलने वाले इनाम की तरह देखा जाता था। लोग प्रमोशन मिलने, रिटायरमेंट के बाद या पैसे बचाने के बाद घूमने की योजना बनाते थे। लेकिन अब नई पीढ़ी का नजरिया पूरी तरह बदल चुका है।
आज के युवा अचानक ट्रिप प्लान कर लेते हैं, अकेले यात्रा पर निकल जाते हैं, पहाड़ों से काम करते हैं और चीजें खरीदने की बजाय अनुभवों पर पैसा खर्च करना ज्यादा पसंद करते हैं। सोशल मीडिया पर कुछ मिनट बिताने के बाद यह साफ समझ में आ जाता है कि यह पीढ़ी लगातार नई जगहों, नए अनुभवों और मूवमेंट से जुड़ी रहना चाहती है।
Gen Z के लिए ट्रैवल क्यों बन गया है जरूरी?
बहुत से लोग आज यह सवाल पूछते हैं कि आखिर Gen Z को हर समय घूमने की इच्छा क्यों होती है। इसका जवाब सिर्फ लग्जरी या दिखावे में नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक बदलावों में छिपा है।
पुरानी पीढ़ियों को एक स्थिर जिंदगी का सपना दिखाया जाता था। अच्छी पढ़ाई करो, नौकरी पाओ, घर बसाओ और धीरे-धीरे जिंदगी सुरक्षित बनाओ। लेकिन Gen Z ने एक ऐसी दुनिया देखी जहां नौकरी की स्थिरता कम होती गई, वर्कप्लेस पर तनाव बढ़ता गया और महामारी ने अचानक पूरी जिंदगी की योजनाएं बदल दीं।
कोरोना महामारी के दौरान पढ़ाई, करियर, दोस्ती और भविष्य की योजनाओं पर गहरा असर पड़ा। ऐसे में कई युवाओं ने महसूस किया कि खुशी को हमेशा भविष्य के लिए टालना सही नहीं है। यही वजह है कि उनके लिए ट्रैवल अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जिंदगी को महसूस करने का तरीका बन गया है।
सोशल मीडिया ने बदल दी ट्रैवल की सोच
सोशल मीडिया ने भी Gen Z की ट्रैवल सोच को काफी प्रभावित किया है। हालांकि घूमने की इच्छा पहले भी लोगों में थी, लेकिन इंस्टाग्राम और दूसरे प्लेटफॉर्म्स ने इसे और बढ़ा दिया।
अब लोग इंटरनेट पर बजट ट्रिप, बैकपैकिंग, सोलो ट्रैवल और वर्ककेशन जैसी चीजें लगातार देखते हैं। इससे ट्रैवल अब सिर्फ अमीर लोगों या सेलिब्रिटीज तक सीमित नहीं लगता। आज एक सामान्य छात्र, फ्रीलांसर या रिमोट वर्कर भी नई जगहों से काम करते हुए अपना अनुभव साझा कर रहा है।
इसके साथ ही सफलता की परिभाषा भी बदल रही है। पहले सफलता का मतलब घर, गाड़ी और स्थायी नौकरी माना जाता था। लेकिन Gen Z के लिए आजादी, अनुभव, नई जगहें और व्यक्तिगत विकास ज्यादा मायने रखते हैं।
ट्रैवल बना मानसिक राहत का जरिया
आज की डिजिटल लाइफ लगातार थकाने वाली होती जा रही है। मोबाइल नोटिफिकेशन कभी बंद नहीं होते, काम घर तक पहुंच जाता है और सोशल मीडिया पर तुलना हर समय चलती रहती है। ऐसे माहौल में ट्रैवल कई युवाओं के लिए मानसिक राहत का जरिया बन गया है।
नई जगह पर जाने से सोच और मानसिक स्थिति दोनों बदलती हैं। लोग मौसम, खाना, बातचीत और आसपास की चीजों को फिर से महसूस करने लगते हैं। छोटी यात्रा भी रोजमर्रा के तनाव से दूरी बनाने में मदद कर सकती है।
मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि नई जगहें और नए अनुभव मानसिक लचीलापन बढ़ाने में मदद करते हैं। यही वजह है कि कई युवा ट्रैवल को “हीलिंग” यानी मानसिक राहत देने वाला अनुभव मानते हैं।
क्यों अनुभवों पर ज्यादा खर्च कर रही है Gen Z?
आर्थिक परिस्थितियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रही हैं। आज के समय में घर खरीदना या पूरी तरह आर्थिक रूप से सुरक्षित होना कई युवाओं के लिए पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है। बढ़ती महंगाई, बदलते जॉब मार्केट और अस्थिर करियर ने उनकी सोच बदल दी है।
ऐसे में कई युवा लंबे समय तक किसी “सही समय” का इंतजार करने के बजाय अभी जिंदगी जीना चाहते हैं। यही कारण है कि वे ट्रैवल, कॉन्सर्ट, कैफे और अनुभवों पर पैसा खर्च करना पसंद करते हैं।
यह जरूरी नहीं कि यह आर्थिक गैर-जिम्मेदारी हो। कई मामलों में यह अनिश्चित भविष्य के बीच वर्तमान को बेहतर तरीके से जीने की कोशिश होती है।
ट्रैवल अब पहचान का हिस्सा बन चुका है
Gen Z के बीच ट्रैवल अब सिर्फ घूमने तक सीमित नहीं है। यह उनकी पहचान और खुद को व्यक्त करने का तरीका भी बन गया है। यही वजह है कि आज के युवा सिर्फ लोकप्रिय टूरिस्ट स्पॉट्स नहीं, बल्कि लोकल कैफे, छोटे शहर, संस्कृति और वास्तविक अनुभवों को ज्यादा पसंद करते हैं।
सोलो ट्रैवल यानी अकेले घूमने का ट्रेंड भी तेजी से बढ़ा है। कई युवाओं के लिए यह आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और व्यक्तिगत आजादी का प्रतीक बन चुका है।
कोरोना के बाद समय को देखने का नजरिया बदला
कोविड-19 महामारी ने युवाओं के समय और जिंदगी को देखने के तरीके पर गहरा असर डाला। स्कूल बंद हुए, इंटर्नशिप रद्द हुईं, ग्रेजुएशन समारोह टल गए और कई जरूरी अनुभव छूट गए।
इसके बाद कई युवाओं को महसूस हुआ कि जिंदगी को लगातार भविष्य के लिए टालते रहना सही नहीं है। यही सोच आज उनके ट्रैवल व्यवहार में साफ दिखाई देती है।
आखिर Gen Z इतनी यात्रा क्यों करना चाहती है?
आज के समय में Gen Z के लिए ट्रैवल सिर्फ पर्यटन नहीं रह गया है। यह आजादी महसूस करने, मानसिक संतुलन पाने और रोजमर्रा की भागदौड़ से बाहर निकलकर खुद से जुड़ने का तरीका बन चुका है।
शायद यही वजह है कि यह पीढ़ी लगातार एयरपोर्ट, रोड ट्रिप, पहाड़, कैफे और नई जगहों की ओर आकर्षित हो रही है। वे सिर्फ वास्तविकता से भाग नहीं रहे, बल्कि अपनी जिंदगी को फिर से महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं।
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