
नीट-नेट जैसी विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं को लेकर सवालों के घेरे में आई नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए (NTA) इन दिनों सुर्ख़ियों में है। उसकी कार्यप्रणाली पर तमाम तरह के प्रश्न खड़े किये जा रहे हैं, उसकी विश्वसनीयता पर भी संदेह जताये जा रहे हैं। बात तो यहाँ तक है कि अलग-अलग समुदाओं से इसे ख़त्म या भंग तक करने की मांग हो रही है, चाहे वो राजनितिक दल हों या फिर छात्र संगठन। अभिभावकों का भी बड़ा तबका अब इस एजेंसी का बोरिया-बिस्तर समेटने की वकालत कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर निष्पक्ष परीक्षाओं का आयोजन करने के इरादे से गठित एनटीए अपने उद्देश्यों में फेल कैसे हो गयी? क्या वजह रही कि वह अपनी साख को बरकरार नहीं रख पाई और हालत यह हो गई कि उसे ख़त्म करने की मांग हो रही है ?
उल्लेखनीय है कि फिलहाल सरकार ने ऐसा कोई निर्णय तो नहीं लिया है, उलटे वह बहुत हद तक एनटीए का बचाव ही कर रही है। एनटीए के अध्यक्ष सुबोध कुमार को उसने ज़रूर हटा दिया है। इसमें सुधार के लिए उसने एक कमेटी भी बनाने का एलान किया है, लेकिन छात्र इससे संतुष्ट नहीं हैं। वे समस्या की जड़ में जाकर उसे समाप्त करना चाहते हैं। और उन्हें समस्या की जड़ एनटीए ही लग रही है, जो बार-बार पेपर लीक रोकने में विफल साबित हुई है। जिससे इन छात्रों की योग्यता पैरों की जूती बनकर रह गई है।
गौरतलब है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए (NTA) का गठन सन 2018 में किया गया था, लेकिन उसके बाद से लगभग हर साल परीक्षा में गड़बड़ी और धांधली के आरोप लगते रहे हैं। एनटीए का गठन इसलिए किया गया था, ताकि प्रवेश परीक्षाओं को निष्पक्ष कराया जा सके, लेकिन एनटीए परीक्षाओं को कराने में बार-बार फेल हो रही है। इसी कारण सीएसआईआर, यूजीसी व नेट की परीक्षाओ को स्थगित करना पड़ा है। ये परीक्षा 25 से 27 जून के बीच होनी थी। परीक्षा आगे बढ़ाने की वजह संसाधनों की कमी बताई गई है, लेकिन सरकार के इस कदम ने एनटीए को लेकर छात्रों की आशंका को बढ़ाने का ही काम किया है।
जिस एजेंसी का गठन परीक्षा में भरोसा बढ़ाने के लिए किया गया, आखिर उसकी विश्वसनीयता खत्म होने के लिए कौन जिम्मेदार है? उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, असम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर देश के इन 15 राज्यो में पिछले 5 साल के अंदर 41 भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक हुए है जिससे करोड़ों छात्र प्रभावित हुए है। नीट की परीक्षा में गड़बड़ी के बाद हो रहे युवाओं के विरोध ने तो इस आक्रोश को सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया है। इन युवाओं का कहना है कि ऐसी कौन सी बात है कि जो बार-बार पेपर लीक हो रहे हैं, हम कैसी दुनिया में जी रहे हैं कि हम सालभर मेहनत करते हैं फिर पेपर लीक हो जाता है। बार-बार वही गलतियां दोहराने से सरकार की भी फजीहत हो रही हैं।
ऐसे में सवाल ये है कि इसमें सुधार क्यों नहीं हो रहा है? युवा पूछ रहे हैं कि जो एनटीए परीक्षा करवाने में असफल साबित हो रही है, इस व्यवस्था को कौन ठीक करेगा? छात्र सरकार से पूछ रहे हैं कि अगली बार परीक्षा का पेपर लीक नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है? चाहे राज्यों में भर्ती परीक्षा हो या फिर दाखिले के लिए कोई परीक्षा, हर छात्र को पेपरलीक और परीक्षा में धांधली का़ डर सता रहा है। नीट परीक्षा में धांधली को लेकर सरकार की कमेटी, सीबीआई या पुलिस किसे जिम्मेदार ठहराती है, यह तो रिपोर्ट आने पर ही पता चलेगा, लेकिन युवाओं की नज़र में एनटीए की पोल खुल चुकी है।
यहां यह गौर करने वाली बात है कि एनटीए की स्थापना उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश/फेलोशिप हेतु परीक्षा आयोजित करने वाले एक प्रमुख परीक्षा संगठन के रूप में की गई थी। परीक्षा आयोजित कराने में ‘विशेषज्ञ’ के तौर पर। इसे परीक्षा संचालन और परीक्षा अंकन तक के सभी चरणों का दायित्व सौंपा गया था। लेकिन मौजूदा सुर्खियां यह साबित करती है कि एनटीए दोनों बिंदुओं पर विफल रहा है। परीक्षा आयोजित कराने में उसकी ‘विशेषज्ञता’ सवालों के घेरे में है। छात्रों और अभिभावकों का एनटीए पर भरोसा खत्म हो चुका है।
यह भयावह है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में 25 से कम स्थायी कर्मचारी हैं, जो पच्चीस परीक्षाओं का आयोजन करवा रहे हैं। अपर्याप्त विशेषज्ञता के कारण एजेंसी ने पेपर-सेटिंग, पेपर वितरण और डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल को निजी सेवा प्रदाताओं सहित बाहरी विशेषज्ञों को आउटसोर्स किया हुआ है। ऐसे में विशेषज्ञ भी कहते हैं कि केंद्र ने एजेंसी को ‘उसकी क्षमता से ज्यादा काम करने’ का निर्देश देकर परीक्षाओं के साथ जुआ खेला है।
केंद्र ने सितंबर 2018 में एनटीए की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य अमेरिका में एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विस (ईटीएस) की तर्ज पर एक एजेंसी बनाना था, जो एक निजी परीक्षण और मूल्यांकन निकाय है जो कॉलेज और विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए स्कोलास्टिक एप्टीट्यूड टेस्ट और ग्रेजुएट रिकॉर्ड परीक्षा का संचालन करता है। लेकिन जहां ईटीएस में 200 से अधिक कर्मचारी हैं, वहीं एनटीए में अन्य सरकारी विभागों से प्रतिनियुक्ति (डेप्युटेशन) पर आए लगभग एक दर्जन अधिकारी और निश्चित अवधि के अनुबंध पर अस्थायी कर्मचारी ही हैं।
एनटीए के ‘पेन-एंड-पेपर’ टेस्ट में प्रवेश को लेकर भी चिंतित होने वाली बात है। ज्ञात हो कि एनटीए का शुरू में केवल कंप्यूटर-आधारित ऑनलाइन परीक्षा आयोजित करने का इरादा था, लेकिन इस साल से नीट एक पेन-एंड-पेपर टेस्ट बन गया है। पेन-एंड-पेपर टेस्ट के लिए प्रश्नपत्र एजेंसी द्वारा चुने गए निजी प्रिंटिंग प्रेस में छपवाए जाते हैं। प्रिंटिंग प्रक्रिया मैनुअल है और लीक होने का खतरा रहता है। एनटीए द्वारा परीक्षा की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त आंतरिक विशेषज्ञता के बिना, पेन-एंड-पेपर टेस्ट सहित नई परीक्षाएं लेना गैर-जिम्मेदाराना है।
तभी दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एन. सुकुमार कहते हैं, “केंद्र ने एनटीए को उससे अधिक करने का निर्देश देकर परीक्षाओं के साथ एक तरह से जुआ खेला है, उसे उसकी क्षमता से ज्यादा करने को कहा गया. मेरा मानना है कि एनटीए को खत्म कर देना चाहिए और सरकार को साधन संपन्न सरकारी संस्थानों के माध्यम से परीक्षा की शुचिता सुनिश्चित करके छात्रों का भविष्य बचाने का प्रयास करना चाहिए।”




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