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Not just Al-Falah University, 50% of universities lack valid NAAC accreditation

फैसले ऐसे लिखें जो आम जनता समझ सके, सीजेआई ने कानूनी भाषा को सरल बनाने की दी सलाह

फैसले ऐसे लिखें जो आम जनता समझ सके, सीजेआई ने कानूनी भाषा को सरल बनाने की दी सलाह

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने न्यायपालिका से अपील की है कि वह अपने फैसलों में जरूरत से ज्यादा कठिन और तकनीकी कानूनी भाषा के इस्तेमाल से बचे। उनका कहना है कि जटिल शब्दावली और उलझी हुई भाषा आम लोगों और न्याय के बीच दूरी पैदा करती है। वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले साफ, सरल और समझने योग्य होने चाहिए, ताकि आम नागरिक भी यह जान सके कि उसके मामले में क्या तय हुआ है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि अगर न्याय लोगों को समझ में ही न आए, तो जिनके लिए वह है, उनके लिए उसका महत्व कम हो जाता है। अदालत के फैसले केवल कानूनी बहस या अकादमिक चर्चा नहीं होते, बल्कि वे सीधे तौर पर लोगों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय करते हैं। ऐसे में फैसलों की भाषा और ढांचे में बहुत अधिक अंतर होने से आम व्यक्ति के लिए उनका मतलब समझना मुश्किल हो जाता है।

उन्होंने उन मामलों का जिक्र किया, जहां लोग केस जीतने के बाद भी यह नहीं समझ पाए कि उन्हें वास्तव में क्या राहत मिली है। इसका कारण आदेशों में इस्तेमाल की गई अत्यधिक तकनीकी, अस्पष्ट और घुमावदार भाषा रही, जो कानून की जानकारी न रखने वाले लोगों के लिए लगभग समझ से बाहर होती है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि यह स्थिति न्याय व्यवस्था के उद्देश्य के विपरीत है।

न्यायिक लेखन में एकरूपता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि फैसले संक्षिप्त, स्पष्ट और भरोसेमंद होने चाहिए। कम शब्दों में ठोस तर्क और आदेश से जुड़े जरूरी निर्देश साफ-साफ लिखे जाने चाहिए, ताकि किसी भी तरह का भ्रम न रहे। उनके अनुसार, स्पष्टता ही न्याय पर भरोसे की सबसे मजबूत नींव है।

“एकीकृत न्यायिक नीति” की बात करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीक का असली लाभ उसकी जटिलता में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह आम आदमी के लिए न्याय को कितना समझने योग्य बनाती है। आज ऐसे डिजिटल उपकरण उपलब्ध हैं, जो फैसलों को आसान भाषा में प्रस्तुत कर सकते हैं और उनका अलग-अलग भाषाओं में तुरंत अनुवाद संभव बना सकते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग न्यायिक निर्णयों को समझ सकें।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यह भी कहा कि केवल भाषा ही नहीं, बल्कि फैसलों में समानता और स्पष्टता भी जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि एक जैसे कानूनी सवालों वाले मामलों को एक साथ सुनकर निर्णय किए जाएं, ताकि अलग-अलग फैसलों से भ्रम की स्थिति न बने। उन्होंने एक पुराने उदाहरण का उल्लेख किया, जिसमें भूमि अधिग्रहण से जुड़ी समान अपीलों पर उच्च न्यायालय की अलग-अलग पीठों ने अलग फैसले दिए थे, जिससे याचिकाकर्ताओं को अपने अधिकारों को लेकर असमंजस में रहना पड़ा।

न्यायपालिका की जवाबदेही पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि हाल ही में निर्देश दिए गए हैं कि जमानत, बंदी प्रत्यक्षीकरण, बेदखली और विध्वंस जैसे तात्कालिक प्रकृति के मामलों को खामियां दूर होने के दो दिनों के भीतर सूचीबद्ध किया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे मामलों में फैसले जल्दबाजी में नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और जिम्मेदार प्रक्रिया के तहत हों।

अपने संबोधन के अंत में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि तकनीक केवल एक साधन है, लेकिन न्याय का तरीका हमेशा मानवीय होना चाहिए। लक्ष्य एक ऐसी न्याय प्रणाली बनाना है, जहां “कानून का शासन” केवल किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोगों के जीवन में सचमुच महसूस किया जा सके।

एडइनबॉक्स टीम

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