
हाल ही में राजस्थान में एक अजीब वाक़या सामने आया। राजस्थान के करौली में स्थित क्यारदा खुर्द गांव के महात्मा गांधी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के गेट पर स्कूली बच्चों और अभिभावकों ने सुबह-सुबह ताला जड़ दिया। जब प्रधानाचार्य सहित अन्य शिक्षक स्कूल पहुंचे तो उन्हें करीब 1 घंटे तक स्कूल के बाहर ही खड़े रहना पड़ा।
दरअसल, स्कूली बच्चे विद्यालय को अंग्रेजी माध्यम से पुनः हिंदी माध्यम में परिवर्तित किए जाने की मांग कर रहे थे। आक्रोश में उन्होंने राज्य की भजनलाल सरकार और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के खिलाफ नारेबाजी भी की। इन बच्चों के अभिभावकों ने शिक्षा विभाग के जिला और ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों को निशाने पर लेते हुए बताया कि कई बार अवगत कराने के बावजूद अधिकारी उनके बच्चों के भविष्य को लेकर उचित निर्णय नहीं कर पा रहे हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि बच्चे और अभिभावक कैसे निर्णय की बात कर रहे थे। तो ग्रामीणों का कहना था कि प्रथम कक्षा से ही उनके बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ रहे हैं, लेकिन अब विद्यालय को अंग्रेजी माध्यम कर दिया गया है। इससे इस बार दसवीं कक्षा के छात्र-छात्राओं को बोर्ड परीक्षा में फेल होने की आशंका सता रही है। उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर विद्यालय को अंग्रेजी से हिंदी माध्यम में परिवर्तित नहीं किया गया तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। चूँकि यह मांग वे काफी समय से कर रहे थे और इस पर कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। इसी से तंग आकर उन्होंने स्कूल पर ताला लगाने का फैसला किया था। करीब 1 घंटे तक प्रदर्शन करने के बाद अभिभावक और स्कूली बच्चे स्कूल के गेट के बाहर ही बैठ गए थे। प्रधानाचार्य ने अभिभावकों से समझाने की तमाम कोशिशें कीं, लेकिन ग्रामीण विभागीय अधिकारियों को बुलाने की बात पर अड़े रहे।
अंततः, प्रधानाचार्य की सूचना पर मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी मौके पर पहुंचे तथा ग्रामीण और बच्चों को समझा कर विद्यालय के गेट पर लगा ताला खुलवाया। बाद में सीबीइओ और प्रधानाचार्य ने बंद कमरे में ग्रामीणों से बातचीत की। प्रधानाचार्य ने बताया कि दो सत्र पूर्व क्यारदा खुर्द गांव के हिंदी मीडियम विद्यालय को राज्य सरकार ने अंग्रेजी माध्यम महात्मा गांधी सीनियर सेकेंडरी स्कूल के रूप में परिवर्तित कर दिया था, लेकिन अब दसवीं कक्षा में आए छात्र-छात्रा अंग्रेजी माध्यम के तहत होने वाली बोर्ड परीक्षा में फेल होने को लेकर आशंकित हैं। परेशान चल रहे दसवीं कक्षा के करीब दो दर्जन से अधिक बच्चे अपनी टीसी लेकर अन्यत्र स्कूलों में जाने की बात कह रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो विद्यालय पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में हम तो अपनी तरफ से राज्य सरकार को प्रस्ताव भेज देंगे, लेकिन अंतिम निर्णय सरकार का ही होगा।
निःसंदेह ऐसे फैसले सरकार को ही लेने होते हैं, लेकिन दुर्भाग्य कि बिना सोचे-समझे ऐसे अव्यवहारिक फैसले लेने की आदि हो चुकी सरकारें इससे कोई सबक लेना नहीं चाहती। दरअसल, अपनी छवि चमकाने के लिए अक्सर सरकार ऐसे फैसले ले लेती है जिससे उसे लगता है कि वह इसे अपनी उपलब्धि बतौर प्रचारित कर पाएगी। लेकिन ऐसे फैसलों को लागू करने से पहले धरातल पर वे इसकी व्यवहारिकता की पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाती। राजस्थान के इस स्कूल की घटना यही इशारा करती है कि फैसलों को लागू करने से पहले व्यवहारिकता की कसौटी पर उसे जांचना भी ज़रूरी है।




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