
दुनिया भर के देशों के लिए प्लास्टिक कचरा एक विशिष्ट चुनौती बना हुआ है, वहीं तमिलनाडु की एक कंपनी ने एकल यूज प्लास्टिक का प्रबंधन करके फैशन से लेकर अन्य उत्पाद बनाकर सभी को हैरान कर दिया है। बीते साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में एक नीली सदरी जैकेट पहनी थी। इसके बाद उन्होंने जापान के हिरोशिमा में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान भी ऐसी ही एक जैकेट पहनी थी। इस जैकेट की खासियत है कि ये कचरे में फेंकी गई पीईटी बोतलों से बनाई गई है। और इसे उसी कंपनी ने बनाया था, जिसके संस्थापक पिता-पुत्र की जोड़ी ऐसी जैकेटें और अन्य गार्मेंट्स बनाते हैं।
प्लास्टिक उत्पादों से बने मखमल की तरह मुलायम ये कपड़े फैशन को नया आयाम दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई नामचीन हस्तियां इन्हें धारण कर दुनिया को प्लास्टिक प्रबंधन के नए तौर-तरीकों का संदेश दे रही हैं। कंपनी देशभर में कूड़ा उठाने वाले हजारों लोगों से प्लास्टिक की खाली बोतलें जमा करके टी-शर्ट, पैंट और ब्लेजर समेत अन्य फैशन के उत्पाद बना रही है। यही नहीं, प्लास्टिक अपशिष्ट को रीसाइकिल कर कंबल, बेडशिट, तकिया के कवर, कारपेट जैसे आइटम भी तैयार किए जा रहे हैं। यह बहुत मुलायम है, जो छूने पर एकदम मखमल जैसी अनुभूति देता है। इससे हर साल 50 हजार मीट्रिक टन प्लास्टिक को लैंडफिल साइट पर जाने से रोका जा रहा है। पर्यावरण बचाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
प्लास्टिक से बने इन कपड़ों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई अन्य नामचीन हस्तियां धारण कर रही है। के शंकर और उनके बेटे सेंथिल शंकर ने तमिलनाडु में श्री रेंगा पॉलिमर और इकोलाइन नाम से कंपनी स्थापित की है जो लोगों से प्लास्टिक कचरा इकठ्ठा करती है। इस तरह से इस कंपनी ने अब तक प्लास्टिक की करीब 50 लाख बोतलों को लैंडफिल में जाने से बचाया है। वे प्लास्टिक की आठ बोतलों का इस्तेमाल करके एक शर्ट और करीबन 20 बोतलों से एक जैकेट बनाते हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने संसद में उनकी बनाई जैकेट पहनी थी। उस जैकेट को प्लास्टिक की 25 बोतलों को रीसाइकिल करके बनाया गया था। प्रधानमंत्री ने इसे संसद के साथ-साथ जापान और ऑस्ट्रेलिया में भी पहना था।
के शंकर बताते हैं कि टेक्सटाइल वैल्यू चेन बहुत जटिल होती है। उनके पास एक गंदी प्लास्टिक की बोतल को एक सुंदर परिधान में बदलने का सपना था और उन्होंने इसे पूरा किया। प्रधानमंत्री को भी ये पसंद आई। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पीएम मोदी इकोलाइन के कपड़ों के उत्पाद पहनेंगे। उन्हें इस बात पर अधिक गर्व महसूस होता है कि इस समर्थन के साथ, करूर एक जगह जिसे भारत में शायद ही कोई जानता हो स्पॉटलाइट बन गई।
विदेश में रोजी-रोटी कमाने वाले के शंकर तीन दशकों तक अपने घर और देश से दूर रहे। जब वह भारत लौटे तो उनके पास प्लास्टिक के खतरे से निपटने की एक मजबूत सोच थी। ये साल 2008 था जब के शंकर ने श्री रेंगा पॉलिमर की स्थापना की। सालाना 100 करोड़ का कारोबार करने वाली ये कंपनी आज भारत में पेट बोतल रीसाइक्लिंग और टिकाऊ वस्त्रों में आगे है। इस कंपनी का प्रोडक्शन हाउस करूर में है, जो अपने होम टेक्सटाइल उद्योगों के लिए जाना जाता है।
के शंकर के बेटे सेंथिल शंकर अगली पीढ़ी के इंटरप्रेन्योर हैं। वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद सेंथिल शंकर ने भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद में कार्यकारी शिक्षा कार्यक्रम किया। उन्होंने अपने पिता का बिजनेस ज्वाइन करने से पहले तीन साल तक टीसीएस के साथ काम किया। वह कई स्टार्टअप्स के एंजेल इन्वेस्टर भी हैं।
पिछले दिनों दिल्ली के प्रगति मैदान के आयोजित चार दिवसीय ग्लोबल कॉन्क्लेव ऑन प्लास्टिक रीसाइकिलिंग और सस्टेनेबिलिटी में विभिन्न प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के नवाचारों की प्रदर्शनी लगी थी। यहां प्लास्टिक से तैयार चश्मे, रसोई के सामान, फर्नीचर, खिलौने, और श्रृंगार के मोती प्रदर्शित किए गए। कंपनी के एक कर्मचारी ने बताया कि इस तकनीक के प्रयोग से प्लास्टिक को सबसे पहले अलग किया जाता है। उसके बाद उनके कण को पिघलाकर फाइबर तैयार होता है। उसी धागे से मुलायम कपड़े तैयार किए जाते है।
प्रदर्शनी में पांच हजार बॉटल के ढक्कन से बनी कुर्सी भी प्रदर्शित की गई थी तो बच्चों के खिलौने भी तैयार किए गए थे। ये खिलौने सुरक्षित, टिकाऊ और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए भी अच्छे होते हैं। साथ ही, ये खिलौने पर्यावरण में प्लास्टिक की मात्रा को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इतना ही नहीं, प्लास्टिक कचरे के बढ़ते पहाड़ों को कम करने और महिलाओं के सौंदर्य को निखारने के लिए प्लास्टिक का प्रबंधन कर महिलाओं के लिए श्रृंगार के सामान और मोती भी तैयार किए गए हैं। यह देखने में बेहद खूबसूरत है। रसोई के समान जिसमें बेलन और चकला तैयार किया गया है। कंपनी के कर्मचारी का कहना है कि इससे हजारों पेड़ों को काटने से बचाया जा सकेगा।




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