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सड़क पर क्यों उतरे हुए हैं पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में छात्र ?

पड़ोसी देश बांग्लादेश में इन दिनों छात्र सड़कों पर उतरे हुए हैं। देश के लगभग हर प्रमुख शहर में विरोध-प्रदर्शन का परचम लहराया हुआ है उन्होंने। इन प्रदर्शनों के दौरान वे राजमार्ग और रेल मार्ग बाधित कर रहे हैं। जाहिर है जनजीवन भी इससे अस्त-व्यस्त हो रहा है और हिंसा भी हो रही है। पुलिस से लगातार उनकी झड़पें हो रही हैं। इनमें उनकी जान भी जा रही है। 

मंगलवार 16 जुलाई को भी ऐसे ही विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस से उनकी झड़प में तीन विद्यार्थियों सहित कम से कम चार लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक अन्य घायल हो गए। इनमें उत्तरपूर्वी रंगपुर स्थित विश्वविद्यालय का एक छात्र, राजधानी ढाका का एक छात्र और दक्षिणपूर्वी चटगांव का एक छात्र शामिल है। मृतकों में एक राहगीर भी है। हालात इतने बेकाबू हो गए कि चार प्रमुख शहरों में अर्धसैनिक बल बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) के जवानों को बुलाना पड़ा। सैकड़ों पुलिसकर्मी रात भर देश भर के सार्वजनिक विश्वविद्यालय परिसरों में तैनात रहे। 

बहरहाल, सवाल उठता है कि आखिर छात्र सड़क पर क्यों हैं ? तो जवाब है कि वे सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं। छात्रों की मांग है कि मौजूदा आरक्षण प्रणाली में सुधार करते हुए प्रतिभा के आधार पर सीटें भरी जाएं। और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के तहत बांग्लादेश में 30 फीसदी नौकरियां 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों के बच्चों और पौत्र-पौत्रियों के लिए, 10 प्रतिशत प्रशासनिक जिलों के लिए, 10 प्रतिशत महिलाओं के लिए, पांच प्रतिशत जातीय अल्पसंख्यक समूहों के लिए और एक प्रतिशत नौकरियां शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए आरक्षित हैं। 

आपके जेहन में सवाल कौंध सकता है कि जब यह मौजूदा आरक्षण प्रणाली पहले से अस्तित्व में है तो अचानक इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन क्यों होने लगे? तो इसका उत्तर पिछले महीने बांग्लादेश के हाईकोर्ट के एक फैसले में निहित है। इस फैसले में उसने 1971 के बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने वाले नायकों के परिवार के सदस्यों के लिए 30 प्रतिशत कोटा बहाल करने का आदेश दिया है। और तभी से सारा बवाल शुरू हो गया है। छात्रों के विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। 

दरअसल आरक्षण की जो मौजूदा प्रणाली है, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने वाले नायकों के परिवार के सदस्यों के लिए 30 प्रतिशत कोटा है, उसके खिलाफ पहले भी विरोध होते रहे हैं। तभी इस प्रणाली को 2018 में निलंबित कर दिया गया था, जिससे उस समय इसी तरह के विरोध-प्रदर्शन रुक गए थे। लेकिन, अब बांग्लादेश के हाईकोर्ट के ताज़ा फैसले के बाद नए सिरे से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। प्रदर्शनकारी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था सरकारी सेवाओं में मेधावी छात्रों के नामांकन को काफी हद तक रोक रही है।   

प्रदर्शनकारी दिव्यांग लोगों और जातीय समूहों के लिए छह प्रतिशत कोटे का तो समर्थन कर रहे हैं, लेकिन वे स्वतंत्रता संग्राम के नायकों के वंशजों को 30 प्रतिशत आरक्षण के खिलाफ हैं। हालांकि विरोध-प्रदर्शन के बीच पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर चार हफ्ते के लिए रोक लगा दी थी और प्रधान न्यायाधीश ने छात्र प्रदर्शनकारियों से कहा था कि वे विरोध-प्रदर्शन समाप्त कर अपनी कक्षाओं में वापस लौट जाएं। वह चार सप्ताह के बाद इस मुद्दे पर फैसला करेगा। इसके बावजूद, विरोध-प्रदर्शन का दौर जारी है।    

दिलचस्प है कि प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि उनका विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण है मगर सत्तारूढ़ पार्टी के छात्र कार्यकर्ता उनके इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हिंसक हमले कर रहे हैं। ताज़ा प्रदर्शन को लेकर भी उनका दावा है कि ढाका और उसके बाहरी इलाकों में दो सरकारी विश्वविद्यालयों में जब वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, तभी उन पर सत्तारूढ़ पार्टी के छात्र कार्यकर्ताओं ने लाठी, पत्थर व चाकू आदि से हमला कर दिया। यानी सत्तारूढ़ अवामी लीग के छात्र मोर्चे के कार्यकर्ता प्रदर्शनकारियों के सामने आ गए। 

यहां उल्लेखनीय है कि आलोचकों का कहना है कि आरक्षण की यह व्यवस्था, जिसमें सरकारी नौकरियों में एक तिहाई पद उन लोगों के बच्चों के लिए आरक्षित रखे गए हैं, जिन्होंने देश के मुक्ति संग्राम यानी साल 1971 के युद्ध में भाग लिया था, प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का समर्थन करने वाले सरकार समर्थक समूहों के बच्चों को अनुचित तौर पर लाभ पहुँचाने वाली है। यही वजह है कि सत्तारूढ़ अवामी लीग के छात्र मोर्चे के कार्यकर्ता प्रदर्शनकारी छात्रों का विरोध कर रहे हैं।  

बहरहाल प्रदर्शनकारियों ने चार महत्वपूर्ण शहरों मध्य ढाका, उत्तर पश्चिम राजशाही, दक्षिण पश्चिम खुलना और चट्टोग्राम में विरोध-प्रदर्शन कर राजमार्ग और रेल मार्ग बाधित कर दिए। प्रदर्शनकारियों ने अपने विरोध को ‘बांग्ला नाकाबंदी’ का नाम दिया है। ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने प्रथम और द्वितीय श्रेणी की सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए एक सप्ताह से चल रहे विरोध प्रदर्शन में अग्रणी भूमिका निभाई। आरक्षण को लेकर लगी यह आग पड़ोसी देश बांग्लादेश को बुरी तरह झुलसा रही है। शीर्ष अदालत ने नौकरी में आरक्षण की इस व्यवस्था को भले ही अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया है, लेकिन जब तक इसे स्थायी रूप से नहीं हटा दिया जाता, तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रहने की संभावना है। 

 

रईस अहमद 'लाली'

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