
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार, 23 जुलाई को वित्त वर्ष 2024-25 के लिए जो बजट प्रस्ताव पेश किया, उसमें सरकार द्वारा घरेलू संस्थानों में उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को 10 लाख रुपये तक के ऋण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने की बात को काफी प्रचारित किया जा रहा है। वित्त मंत्री की उस बात को बड़े ही सकारात्मक परिप्रेक्ष्य में पेश किया जा रहा है कि इस उद्देश्य के लिए हर साल एक लाख छात्रों को सीधे ई-वाउचर दिए जाएंगे, जिसमें ऋण राशि का तीन प्रतिशत ब्याज अनुदान भी दिया जाएगा। ज्ञात है कि केंद्रीय बजट 2024-25 में शिक्षा, रोजगार और कौशल के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
लेकिन सवाल उठता है कि क्या उच्च शिक्षा के लिए 10 लाख रुपये तक के ऋण प्राप्त करने में छात्रों को वित्तीय सहायता की घोषणा वाकई शिक्षा जगत के लिए एक युगांतकारी कदम है ? अगर ऐसा ही है तो क्यों बजट घोषणा के तुरंत बाद कई विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों ने ही इस पर सार्वजनिक चिंता जता दी ? उन्होंने इस कदम को “सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण” के तौर पर देखा। उन शिक्षकों का स्पष्ट कहना था कि केंद्र को छात्रों को ऋण लेने के लिए मजबूर करने के बजाय अनुदान प्रदान करने और फीस कम करने की दिशा में काम करना चाहिए था।
तो क्या वाकई उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को 10 लाख रुपये तक के ऋण की घोषणा का कदम “सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण” की और बढ़ा कदम है? इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वित्त पोषण में कमी के कारण, विश्वविद्यालय अपनी फीस में भारी वृद्धि कर रहे हैं। नतीजतन, छात्रों को ऋण लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। ऋण सुविधा प्रदान करने के बजाय, केंद्र को शैक्षणिक संस्थानों की फीस कम करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अफ़सोस कि इस कदम से और अधिक छात्र ऋण लेने के लिए प्रेरित होंगे।
केंद्रीय बजट ने “वित्त की कमी से जूझ रहे उच्च शिक्षा संस्थानों की उम्मीदों” को विफल कर दिया है। वे बाट जोह रहे थे कि उन्हें वित्तीय सहायता में वृद्धि होगी, जबकि हुआ इसके उलट। छात्रों को वित्तीय सहायता के नाम पर लोन का खिलौना थमाने का एलान कर दिया गया। जाहिर है इससे देश में ही उच्च शिक्षा के लिए उन्हें रोकने में कुछ हद तक सफलता तो मिलेगी लेकिन इससे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कौन सी क्रांति आ जाएगी? छात्र लोन लेंगे और फीस बढ़ा कर धंधा करने वाले शिक्षण संस्थानों और वित्तीय संस्थाओं को इससे लाभ होगा।
गौरतलब है कि यूजीसी का बजट पिछले वित्तीय वर्ष के 17,473 करोड़ रुपये की तुलना में बढ़कर इस बार 19,024 करोड़ रुपये हो गया है। उच्च शिक्षा के कुल बजट में करीब आठ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इस वृद्धि की तह में झांकेंगे तो यह कसरत कमोबेश शैक्षणिक संस्थानों के निजीकरण को बढ़ावा देने वाला ही प्रतीत होगा। रकम ज़रूर बढ़ी नज़र आएगी लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी के संदर्भ में शिक्षा पर व्यय में लगातार गिरावट आती जा रही है।
2010-20 में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा पर किया गया व्यय सकल घरेलू उत्पाद का 2.9 प्रतिशत था। 2023-24 में यह घटकर 2.7 प्रतिशत रह गया है। सामाजिक सेवाओं पर कुल व्यय के सापेक्ष शिक्षा पर व्यय भी इस अवधि में 10.7 प्रतिशत से घटकर 9.2 प्रतिशत रह गया। ऐसे में डर है कि आने वाले वर्षों में शिक्षा क्षेत्र में निजी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) जैसे गरीब और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के लिए शिक्षा तक पहुंच में कमी आएगी। शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय में गिरावट से वंचित वर्गों के छात्रों को नुकसान होगा।
शिक्षा के लिए सकल बजटीय सहायता जीडीपी के 3 प्रतिशत से भी कम रही है। सरकार शिक्षा पर खर्च नहीं कर रही है। शिक्षा का निजीकरण पहले ही बढ़ चुका है। इस तरह निजीकरण और बढ़ेगा। जिनके पास पैसा है वे पढ़ाई कर सकेंगे और जिनके पास नहीं है वे शिक्षा से बाहर हो जाएंगे।




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