
भारत एक युवा देश है। इस मायने में कि 65 फीसदी से ज्यादा भारतीय 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। भारतीयों की औसत आयु तो मात्र 28 वर्ष की है। जाहिर है कि भारत की युवा आबादी में देश को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने की क्षमता है। और रोजगार योग्यता एक महत्वपूर्ण कारक है जो किसी भी देश के विकास को आगे बढ़ाता है। लेकिन यह भी किसी से छिपा नहीं है कि इस संभावित गतिशील, युवा कार्यबल को एक बड़ी बाधा का सामना करना पड़ता है- कौशल का अंतर, जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों से अपेक्षित कौशल और कर्मचारियों के पास वास्तव में मौजूद कौशल के बीच की असमानता को बताता है।
वास्तव में, कौशल विकास के लिए शिक्षा हमारी युवा पीढ़ियों को वैश्विक गांव के उत्पादक सदस्यों के रूप में योगदान करने में मदद करने के लिए एक अंतिम समाधान प्रदान करती है। लेकिन भारत के लाखों युवक-युवतियों के पास, जिनमें औपचारिक डिग्रीधारी भी शामिल हैं, देश में या उसके बाहर आज के गतिशील कार्यस्थल के लायक जरूरी कौशल का अभाव है, चाहे वह विनिर्माण का क्षेत्र हो या सेवा का। भारत की उन्नति तभी होगी, जब उसका कार्यबल तेजी से बदलते कामकाज की दुनिया में कार्य करने के लिए तैयार हो। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डाटा, डाटा एनालिटिक्स और साइबर सुरक्षा तेजी से भविष्य के मुख्य कौशल बनते जा रहे हैं। इसके अलावा, विश्लेषणात्मक सोच, नेतृत्व क्षमता, संकट प्रबंधन और टीम के साथ मिलकर काम करने का हुनर भी महत्वपूर्ण है।
स्वाभाविक है कि बदलाव की जरूरत है, और इसके लिए व्यापक तौर पर फिर से प्रतिभा को तराशने और पुनर्कौशल की जरूरत है। हाल में पेश वर्तमान वित्त वर्ष के बजट में रोजगार और कौशल विकास को प्रमुखता दी गयी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से कंपनियों को अनेक प्रकार की वित्तीय एवं अन्य राहतों की घोषणा की है। कौशल विकास और समुचित प्रशिक्षण के लिए देश की 500 बड़ी कंपनियों में हर साल 20 लाख युवाओं को इंटर्नशिप उपलब्ध कराने का प्रस्ताव बजट में है। ऐसे युवाओं को सरकार की ओर से वृत्ति दी जायेगी और प्रशिक्षण का खर्च कंपनियां उठायेंगी। हालांकि अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ-साथ रोजगार के मौके भी पैदा हो रहे हैं, पर कार्य बल में हर साल बड़ी संख्या में युवाओं के आने के कारण बेरोजगारी, विशेषकर शिक्षित बेरोजगारी, एक गंभीर समस्या बनी हुई है। इसकी एक वजह यह भी है कि कुशल कामगारों का बड़ा अभाव है।
वित्त सचिव टीवी सोमनाथन ने रेखांकित किया है कि उद्योग जगत को कौशलयुक्त लोगों की आवश्यकता है, पर समुचित संख्या में ऐसे लोग उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि कंपनियां आम तौर पर अनुभव रखने वाले लोगों को काम पर रखना चाहती हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आई है कि लगभग 51.25 फीसदी युवा ही रोजगार के योग्य माने जाते हैं। यानी कॉलेज से निकलने वाले लगभग दो में से एक युवा अभी रोजगार के लिए तैयार नहीं माने जाते हैं। ध्यान देने योग्य है कि पिछले दशक में यह आंकड़ा 34 फीसदी था, जो बढ़कर 51.3 फीसदी हो गया है। सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि 2030 तक सालाना औसतन लगभग 78.5 लाख नौकरियां पैदा करने की जरूरत है। शायद इन्हीं स्थितियों को ध्यान में रखते हुए रोजगार प्रोत्साहन और प्रशिक्षण का प्रावधान बजट में किया गया है। कौशल विकास को गति देने के उद्देश्य से जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महत्वाकांक्षी ‘स्किल इंडिया मिशन’ का प्रारंभ किया था। इस कार्यक्रम ने नौ वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियों को हासिल किया है। इस अवधि में देश में औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्रों (आइटीआइ) की संख्या में लगभग 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
साल 2014 में इन केंद्रों की संख्या 11,847 थी, जो 2022 में बढ़कर 14,747 हो गयी। इन केंद्रों में 2018 से चार लाख से अधिक सीटें भी बढ़ायी गयी हैं। पिछले साल विश्व बैंक ने स्किल इंडिया मिशन के लिए 250 मिलियन डॉलर के आवंटन को भी मंजूरी दी थी। वर्ष 2023-24 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस कार्यक्रम के चौथे चरण के प्रारंभ की घोषणा की थी। अब 2024-25 के बजट में रोजगार सृजन और कौशल विकास के प्रयासों को उद्योग जगत से जोड़ने का प्रावधान कर महत्वपूर्ण पहल की गयी है। जैसा कि वित्त सचिव ने कहा है, कौशल विकास और शिक्षा व्यवस्था में बेहतरी की जरूरत है। इन प्रयासों के निश्चित सकारात्मक परिणाम होंगे, लेकिन इसमें कुछ समय अवश्य लगेगा। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का आकलन है कि भारत को 2030 तक लगभग 2.90 करोड़ कुशल कामगारों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने के लिए हमें कौशल विकास पर लगातार ध्यान देना होगा। कौशल विकास और समुचित प्रशिक्षण के लिए देश की 500 बड़ी कंपनियों में हर साल 20 लाख युवाओं को इंटर्नशिप उपलब्ध कराने का प्रस्ताव बजट में है।
हालांकि सरकार का रोजगार सृजन का इरादा सही दिशा में है, लेकिन एक साल में संख्या को 500 से बढ़ाकर 4,000 तक पहुंचाना हमारे लिए मुश्किल होगा। एक और चिंता यह है कि यदि इंटर्न नौकरी छोड़ देता है या कंपनी उसे बीच में ही हटा देती है, तो फंड का क्या होगा? एक और जरूरी बात है कि प्रभावी कौशल विकास के लिए एक मजबूत आधार की जरूरत होती है। अगर गांवों में रहने वाले लोगों सहित औसत भारतीयों के लिए बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता खराब रहती है, तो आधार कमजोर रहेगा। इसलिए बुनियादी शिक्षा पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है। प्रस्तावित इंटर्नशिप योजना की मंशा अच्छी है, लेकिन इसे और अधिक विस्तार से समझने की आवश्यकता है।
– रिज़वाना रानी
(ये लेखक के अपने विचार हैं )




Add comment