
हाल ही में बिहार के सुपौल जिले से आई एक खबर देशभर की मीडिया में सुर्ख़ियों में रही। खबर यह थी कि यहां के सेंट जॉन बोर्डिंग स्कूल के नर्सरी के एक छात्र ने अपने ही स्कूल में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले छात्र को गोली मार दी। गनीमत रही कि निशाना चूकने के कारण गोली दूसरे छात्र के हाथ में लगी। घायल छात्र का अस्पताल में इलाज चला और फिलहाल वह खतरे से बाहर है। बताया गया कि गोली चलाने वाला छात्र अपने स्कूल बैग में घर से ही हथियार लेकर आया था। वहीं पीड़ित छात्र का कहना है कि उसकी उससे कोई दुश्मनी नहीं थी।
यानी अचानक किसी बात को लेकर बच्चे की मानसिक स्थिति ऐसी बनी कि उसने दूसरे छात्र को गोली मारने का इरादा कर लिया। दरअसल, यह घटना भारत की सामाजिक व्यवस्था मे छोटे-छोटे बच्चों के हिंसक विचार और उनके मनोभाव को देखने की है। आखिर छोटे-छोटे बच्चे इतने हिंसक क्यों हो रहे हैं? इस तरह की घटनाएं अमेरिका जैसे देशों में तो देखने और सुनने में आती थीं। अब ऐसी घटनाएं भारत में भी होने लगी हैं। यह चिंता का सबसे बड़ा कारण है।
पिछले कुछ वर्षों से ऑनलाइन वीडियो गेम का प्रचलन बड़ी तेजी के साथ भारत में बढ़ा है। वीडियो में बच्चों को हथियार के साथ खेलते हुए और एक-दूसरे के साथ मारामारी करते हुए गेम बने हुए हैं। छोटे-छोटे बच्चे गेम देखते हुए दूध पीते हैं, नाश्ता करते हैं और खाते-पीते हैं। यदि इन्हें मोबाइल या टीवी पर वीडियो गेम नहीं दिखाया जाए, तो ये घर पर आक्रामक हो जाते हैं।
बच्चे अपनी नाराजी को माता-पिता और भाई बहनों के साथ तरह-तरह से प्रकट करते हैं। संयुक्त परिवार खत्म हो गए हैं। माता-पिता अपने बच्चों को अब किस्से कहानी नहीं सुनाते हैं, उनके पास इसके लिए समय ही नहीं है। ऐसी स्थिति में वे अपने बच्चों को टीवी और वीडियो गेम दिखाना शुरू कर देते हैं। बच्चे अकेले रहते हैं, इसलिए भी उनकी सोच और दुनिया बदलती जा रही है। भारत के टेलीविजन चैनल भी हिंसा को फैलाने में बड़ा योगदान दे रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम, धार्मिक एवं सामाजिक भेदभाव की हिंसक घटनाओं का जिस तरह से चित्रण नेशनल टेलीविजन चैनल कर रहे हैं, उससे बच्चों के दिमाग में हिंसा फैल रही है।
कहा जाता है कि छोटी उम्र के बच्चे बड़े संवेदनशील होते हैं। वे अपने आसपास जो देखते ओर सुनते हैं, उसका उनके ऊपर गहरा असर होता है। पहले बच्चों को दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता, बड़े भाई-बहन अच्छी-अच्छी साहसिक एवं ज्ञानवर्धक कहानियाँ सुनाते थे। सामाजिक सद्भाव के साथ रिश्तों से जुड़ने की सीख देते थे। इसका बड़ा असर बच्चों पर संस्कार के रूप में होता था। डिजिटल इंडिया के इस दौर में बच्चों के लिए जिस तरह से हिंसक वीडियो तैयार किये जा रहे हैं। खिलौने के रूप में मिले हथियार से बच्चे खेल रहे हैं। घर और बाहर नफरत का वातावरण और हर तरफ हिंसा ही हिंसा बच्चों को दिखती है। इस हिंसा का असर छोटे-छोटे बच्चों पर कई तरह से पड़ रहा है।
शायद यही वजह है कि आजकल बच्चों में आक्रामकता बढ़ती जा रही है। उनके हिंसक होने के कई मामले घर और स्कूलों में सामने आ रहे हैं। ऐसे बच्चे जो बात-बात पर हाथ उठाते हैं, दांत से काटते हैं या फिर खिलौने तोड़ने लगते हैं को देखकर अकसर माता-पिता काफी परेशान हो जाते हैं। ऐसे में आपको विशेष ध्यान देने की जरूरत है। अकसर बच्चों को गुस्सा तब आता है जब उनकी मांग पूरी नहीं की जाती है, ऐसे में बच्चों को शांत करने के लिए माता-पिता उनकी मांगों को पूरा करने लगते हैं, जिससे उनके बच्चे जिद्दी हो जाते हैं।
बच्चों के लिए उदाहरण तय करना बेहद महत्वपूर्ण होता है। माता-पिता को बच्चों के सामने अपने गुस्से को प्रदर्शित नहीं करना चाहिए। बच्चों के सामने ऐसे टीवी कार्यक्रम देखने से बचें, जिसमें हिंसा दिखाई जा रही हो। ये ध्यान रखें कि बच्चे बहुत जल्दी सीखते हैं। अपने बच्चों को ऐसे लोगों से दूर रखें, जो जरा-जरा सी बात पर गुस्सा हो जाते हैं या जिन्हें अपने गुस्से पर नियंत्रण करना नहीं आता। अपने गुस्सैल बच्चे को सबके सामने न डांटें। इससे आपके बच्चे के गुस्सैल व्यवहार को बढ़ावा मिल सकता है।
बच्चे से मारपीट भी न करें। यह बच्चे में उग्रता पैदा करते हैं। बच्चे के गुस्से को समझें। कई बार बच्चे ध्यान खींचने के लिए भी अपने व्यवहार को बदलते रहते हैं। अपने आक्रामक बच्चे को नियंत्रित करके रखें, हो सकता है कि वह अपने गुस्से में किसी अन्य व्यक्ति को हानि पहुंचा दे। बच्चों के प्रति अपने प्रेम को दर्शना बेहद अहम होता है। अपने बच्चों को ये जरूर बताएं कि आप उनसे बेहद प्यार करते हैं।
दरअसल, भारत की सामाजिक एवं पारिवारिक व्यवस्था बड़ी तेजी के साथ बदली है। हर मां-बाप और बच्चों के पास इन दिनों मोबाइल फोन देखने को मिलते हैं। वीडियो गेम से लेकर इंटरनेट पर पॉर्न वीडियो इत्यादि छोटे-छोटे बच्चे और कम उम्र के युवा देखने लगे हैं। इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। एक घटना हाल ही में सामने आई है, जब 13 साल के बड़े भाई ने अपनी 8 साल की छोटी बहन के साथ दुष्कर्म किया। जब उसने पापा से शिकायत करने की बात की तो उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। विकास और दिखावे की दौड़ और होड़ में हम किस तरह का समाज और परिवार बना रहे हैं, इसे आसानी से समझा जा सकता है। हमारे आने वाली पीढ़ी किस तरह से आगे बढ़ेगी, इस पर गंभीरता के साथ विचार करना जरूरी हो गया है।
यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि शिक्षा के नाम पर जिस तरह से बच्चों को मोबाइल और इंटरनेट से जोड़कर उन्हें वास्तविक ज्ञान की दुनिया से दूर किया जा रहा है और काल्पनिक ज्ञान की ओर ले जाने की जो प्रवृत्ति शिक्षण संस्थानों में बढ़ रही है, वह आने वाली पीढ़ी को पूरी तरह से बर्बाद करके रख देगी। यह घटना इस बात को दर्शाती है कि इस तरह की घटनाओं से सबक लेकर गंभीरता से विचार करना होगा। सरकार, समाज, परिवार एवं धर्मगुरुओं को भी इस दिशा में विशेष प्रयास करने होंगे। समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दिनों में सामाजिक एवं पारिवारिक रिश्तों में हिंसा बढ़ेगी।




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