
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए लिखा था कि “भारत के विश्वविद्यालयों को वैश्विक मंच पर प्रगति करते हुए देखकर बहुत अच्छा लगा! गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के उत्साहजनक परिणाम सामने आ रहे हैं। हम अपने शैक्षणिक संस्थानों की सहायता करना और विकास तथा नवान्मेषण के अवसर प्रदान करना जारी रखेंगे। इससे हमारे युवाओं को अत्यधिक सहायता मिलेगी।” प्रधानमंत्री ने यह बात टाइम्स हायर एजुकेशन में चीफ ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर फिल बैटी की उस प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में कही थी जिसमें उन्होंने वैश्विक मंच पर भारतीय विश्वविद्यालयों की बढ़ती पहचान की सराहना की थी।
निःसंदेह, वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालय वैश्विक मंच पर उभर रहे हैं, वे स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं और प्रतिस्पर्धी हैं। भारत ने शिक्षा के वैश्विक केंद्रों में से एक बनने की अपनी क्षमता को पहचानना शुरू कर दिया है। हम अधिक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव देने वाले और भारत की आर्थिक जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करने वाले विश्वविद्यालयों की ओर एक वास्तविक बदलाव देख रहे हैं। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुधार कार्यक्रमों की सराहना करनी होगी।
पीएम मोदी जिस सबसे असाधारण चीज को आगे बढ़ाने में कामयाब रहे हैं वह है संतुलन बनाना। गुणवत्ता को बनाए रखते हुए शिक्षा का शानदार विस्तार करना, अधिक से अधिक लोगों को शिक्षित करना लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं करना। पीएम मोदी के सुधार अपने पैमाने और स्पष्टता में निश्चित रूप से प्रेरणादायक हैं। वैसे भी भारत में शिक्षा प्रणाली के विकास की ज़रूरत है। यानी भारत एक ऐसा देश है जिसे शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है। एक बड़ी युवा आबादी को शिक्षा तक पहुंच की आवश्यकता है। मोदी सरकार के शिक्षा तक पहुंच में सुधार, उच्च शिक्षा में समावेशन बढ़ाने और साथ ही गुणवत्ता बढ़ाने के प्रयास सराहनीय हैं।
पिछले दशक में हम जो रैंकिंग में सुधार देख रहे हैं, उसे वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ना कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। हम पर अमेरिकी और ब्रिटिश विश्वविद्यालयों तथा कुछ पश्चिमी यूरोपीय विश्वविद्यालयों का पूर्ण प्रभुत्व था। पिछले दशक में, हमने पश्चिम से पूर्व की ओर पुनर्संतुलन देखा है। हमने देखा है कि भारत ने अधिक प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। शक्ति संतुलन अब पूरी तरह से पश्चिम के पक्ष में नहीं है। इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि 2025 की विश्व रैंकिंग के लिए रिकॉर्ड 133 भारतीय विश्वविद्यालयों ने आवेदन किया है। इसी के साथ भारत दुनिया में चौथा सबसे अच्छा विश्वविद्यालयों का प्रतिनिधित्व करने वाला देश बन गया है।
शिक्षा की भविष्योन्मुखी नीतियों और निर्णयों का परिणाम है कि आज भारतीय विश्वविद्यालयों की वैश्विक पहचान बढ़ रही है। साल 2014 में क्यूएस वर्ल्ड रैंकिंग में केवल 12 भारतीय विश्वविद्यालय होते थे लेकिन आज यह संख्या सैकड़ों के आसपास है। हाल के वर्षों में आईआईटी, आईआईएम, एम्स की संख्या में हुई वृद्धि नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। दरअसल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिए इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया कि छात्र सीखना क्या चाहते हैं जबकि पहले ध्यान इस बात पर दिया जाता था कि छात्रों को पढ़ाया क्या जाए।
प्रधानमंत्री की पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर पहल (आईसीईटी) को लेकर हुए एक समझौते मात्र से देश के युवाओं के लिए जमीन से लेकर अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर से लेकर कृत्रिम मेधा (एआई) तक नए अवसर पैदा होने की स्थिति बनी। ऐसे अवसर अब लगातार बन रहे हैं, बढ़ रहे हैं। जाहिर है कि यह वैश्विक मंच पर उभर रहे भारतीय विश्वविद्यालय से जुड़ा है।
भारत को वैश्विक महाशक्ति बनना है तो देश के शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन मूल्यों की चिंता करनी ही होगी। और उच्च शिक्षा इसका सबसे प्रमुख जरिया है। इसके मद्देनजर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में उच्चतर शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को वर्तमान 27.3 फीसद से बढ़ा कर 2035 तक 50 फीसद करने का लक्ष्य है। एनईपी उच्च शिक्षा में बुनियादी बदलाव के जरिए पाठ्यक्रम, अध्ययन-अध्यापन और मूल्यांकन पद्धति में सुधार पर जोर देती है। नए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे द्वारा पाठ्यक्रम परिवर्तन, जो शिक्षण के वैकल्पिक रूपों की स्थापना करते हुए विद्यार्थियों के बीच रचनात्मकता और जिज्ञासा के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान तथा तकनीकी विषयों को बढ़ावा देंगे। नवीन व गतिशील शिक्षण पद्धति के साथ-साथ सीखने की गुणवत्ता में सुधार पर अधिक ध्यान देते हुए शैक्षणिक संस्थानों में पाठ्यक्रम पढ़ाने में सक्षम बनाने के लिए ढांचागत विकास करना होगा। इससे विद्यार्थियों का समग्र व्यक्तित्व विकास और वर्तमान जरूरतों के मुताबिक कौशल निर्माण होगा।
शिक्षा में गुणवत्ता तथा जीईआर में वृद्धि द्वारा भारत के वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरने में, राज्यों के शिक्षा संस्थानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। पर राज्यों के उच्च शिक्षा संस्थान, विशेषकर विश्वविद्यालय गुणवत्ता, शिक्षकों की अपर्याप्तता और तदर्थ व्यवस्था, घटिया शोध, वित्तीय संकट, प्रत्यायन, आधारभूत ढांचे में कमी, कुप्रबंधन के साथ-साथ स्वायत्तता की कमी जैसी गंभीर समस्याओं के भंवरजाल में हैं। इस ओर ध्यान देने की भी आवश्यकता है। हालांकि वर्ष 2013 से राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) राज्य विश्वविद्यालयों के उन्नयन के लिए केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम की शुरुआत हुई। रूसा का उद्देश्य उच्च शिक्षा में गुणवत्ता के लिए राज्य के उच्च शिक्षा संस्थानों की बेहतर गुणवत्ता के लिए पात्र संस्थानों की ‘रणनीतिक फंडिंग’ करना है।
बहरहाल, तमाम चुनौतियों के बावजूद वैश्विक स्तर पर भारतीय विश्वविद्यालय अपनी पहचान बनाने में सफल हो रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सफर जारी रहेगा।




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