
संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी ने बिना परीक्षा पास किए विभिन्न मंत्रालयों में बतौर संयुक्त सचिव, निदेशक व उपसचिव नियुक्त करने का हाल ही में विज्ञापन निकाला है। इसका मतलब है कि अब बिना यूपीएससी की परीक्षा पास किये भी नौकरशाह यानी आईएएस बना जा सकेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो निजी क्षेत्र के कर्मचारियों और अंतरराष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वालों के लिए आईएएस बनने की राह खोल दी गई है। और वह भी बिना यूपीएससी की कोई तैयारी किए या यूपीएससी की परीक्षा दिए बगैर। फिलहाल, यूपीएससी ने ‘लैटरल एंट्री’ के जरिए 45 पदों की भर्ती का विज्ञापन निकाला है।
जी हां, लैटरल एंट्री। यही नाम दिया गया है ऐसी भर्ती को। भर्ती का यह अभियान एक ऐसे समय में शुरू किया गया है जब पिछले दिनों संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की कार्यप्रणाली को लेकर बड़ा विवाद छिड़ा था। कई भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए चुने गए अफसरों की योग्यता पर सवाल उठाए गए थे। फर्जी प्रमाण-पत्रों के जरिए आईएएस की नौकरी पाने जैसी खबरों का भी बोलबाला रहा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्री से स्पष्टीकरण की मांग की थी। खरगे ने कहा था कि उन्हें बताना होगा कि आयोग की फुलप्रूफ प्रणाली को कौन धोखा दे रहा है। अब उसी यूपीएससी ने बिना परीक्षा पास किए विभिन्न मंत्रालयों में बतौर संयुक्त सचिव, निदेशक व उपसचिव नियुक्त करने का विज्ञापन जारी कर दिया है।
यानी अब लैटरल एंट्री के जरिए केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में उच्च पदों पर सीधी भर्ती होगी। खास बात है कि लैटरल एंट्री के जरिए निजी क्षेत्र के कर्मचारियों और अंतरराष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वालों के लिए आईएएस बनने की राह खोल दी गई है। वे भी लैटरल एंट्री के जरिए फटाफट आईएएस बनकर किसी मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर काम कर सकेंगे। यूपीएससी के नोटिफिकेशन में कहा गया है कि संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव के 45 पदों पर लैटरल एंट्री मतलब सीधी भर्ती के जरिए नियुक्ति की जाएगी। आवेदकों को यूपीएससी की परीक्षा पास नहीं करनी पड़ेगी। यह नौकरी तीन वर्ष के अनुबंध पर रहेगी।
संयुक्त सचिव स्तर के पद के लिए 15 वर्ष का अनुभव होना चाहिए। निदेशक के पद के लिए 10 और उप सचिव के पदों के लिए सात साल की नौकरी का अनुभव होना अनिवार्य है। ख़ास बात यह भी है कि केंद्र सरकार में कार्यरत कर्मचारी इस भर्ती के लिए योग्य नहीं होंगे। यानी वे आवेदन नहीं कर सकेंगे। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, स्वायत्त निकाय, वैधानिक निकाय, यूनिवर्सिटी, मान्यता प्राप्त शोध संस्थान, निजी कंपनी, अंतरराष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत लोग लैटरल एंट्री वाले पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं।
आयु सीमा की बात करें तो संयुक्त सचिव पद के लिए आयु सीमा 40 वर्ष से 55 वर्ष के बीच होनी चाहिए। सातवें वेतन आयोग के अनुसार, इन्हें पे लेवल 14 में रखा जाएगा। यानी इन्हें डीए मिलाकर 2,70,000 रुपये का मासिक वेतन मिलेगा। नियमानुसार, यात्रा भत्ता और मकान का किराया भी दिया जाएगा। वहीं, निदेशक पद के लिए आयु सीमा 35 वर्ष से 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए। इन्हें पे लेवल 13 में शामिल किया जाएगा। यानी डीए को मिलाकर 2,32,000 रुपये वेतन मिलेगा। डिप्टी सेक्रेटरी के लिए आयु सीमा 32 से 40 वर्ष होनी चाहिए। ऐसे अधिकारी पे लेवल 12 में रहेंगे। इन्हें डीए मिलाकर 1,52,000 रुपये मासिक वेतन दिया जाएगा।
इस बीच ऐसी नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती कर खुलेआम एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग का आरक्षण छीना जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह सरकार बड़े पदों पर भर्ती संघ लोक सेवा आयोग की जगह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से कर रही है। नरेंद्र मोदी संघ लोक सेवा आयोग की जगह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जरिए लोकसेवकों की भर्ती कर संविधान पर हमला कर रहे हैं। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती कर खुलेआम एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग का आरक्षण छीना जा रहा है।
इसमें दो राय नहीं कि ‘लैटरल एंट्री’ के जरिए सीनियर ब्यूरोक्रेसी में ‘एक्सपर्ट्स’ की नियुक्ति वाली व्यवस्था को लेकर तमाम तरह की शंकाएं उत्पन्न होती है। अव्वल तो यही कि क्या इससे यूपीएससी की तैयारी कर रहे प्रतिभाशाली युवाओं के हक पर डाका नहीं पड़ेगा? क्या वंचितों के आरक्षण समेत सामाजिक न्याय की परिकल्पना पर इससे चोट नहीं पहुंचेगी ? गौरतलब है कि टॉप ब्यूरोक्रेसी समेत देश के सभी शीर्ष पदों पर वंचितों का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। ऐसे में उसे सुधारने के बजाय लैटरल एंट्री द्वारा उन्हें शीर्ष पदों से और दूर किया जा रहा है।
एक और बात कि क्या इन क़दमों से अपने पसंदीदा लोगों को केंद्र में वरिष्ठ नौकरशाह बनाकर सत्ताएं अपना उल्लू नहीं साधने की कोशिश करेंगी ? चंद कॉरपोरेट्स के प्रतिनिधि निर्णायक सरकारी पदों पर बैठ कर क्या कारनामे करेंगे, इसका ताज़ा उदाहरण सेबी है। इस संस्थान में निजी क्षेत्र से आने वाले को पहली बार चेयरपर्सन बनाया गया और हिंडनबर्ग रिपोर्ट से क्या खुलासा हुआ, सब हमारे सामने है। यही वजह है कि इसे प्रशासनिक ढांचे और सामाजिक न्याय दोनों को चोट पहुंचाने वाला कदम निरूपित करते हुए विपक्ष इसका मजबूती से विरोध कर रहा है।
निःसंदेह यह कदम आज के अधिकारियों के साथ युवाओं के लिए भी वर्तमान और भविष्य में उच्च पदों पर जाने का रास्ता बंद कर देगा। आम लोग बाबू व चपरासी तक ही सीमित हो जाएंगे। सीधी भर्ती के माध्यम से नीचे के पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को पदोन्नति के लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। साथ ही, इन सरकारी नियुक्तियों में एससी (अनुसूचित जाति), एसटी (अनुसूचित जनजाति) व ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) समुदायों के लोगों को उनके कोटे के अनुपात में अगर नियुक्ति नहीं दी जाती है तो यह संविधान का सीधा उल्लंघन होगा।




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