
पिछले कुछ दिनों से जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट चर्चा में है। इसने मलयालम फिल्म उद्योग में महिलाओं की स्थिति का खौफनाक सच सामने लाकर रख दिया है। जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं का यौन शोषण होता है, उनके साथ लिंग आधारित भेदभाव होता है और साथ ही उनके साथ कई तरह के अमानवीय व्यवहार भी किए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में एक ट्रेनी महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या के मामले को लेकर देश भर में आक्रोश का प्रदर्शन किया जा रहा है, धरना-प्रदर्शन और कैंडल मार्च निकाले जा रहे हैं। यानी पूरब से लेकर पश्चिम, उत्तर से लेकर दक्षिण तक हर जगह महिलाओं के साथ भेदभाव, उनके उत्पीड़न के चर्चे हैं। महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार को रोकने को लेकर कई कदम उठाने की घोषणाएं हो रही हैं, कई जांच और समीक्षा कमेटियां गठित की जा रही हैं।
बहरहाल, बात पहले मलयालम फिल्म उद्योग में महिलाओं की स्थिति की पड़ताल के लिए बनाई गई जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट की। वर्ष 2017 में एक मशहूर अभिनेत्री ने अभिनेता और फिल्मकार दिलीप पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। तब इस पर केरल में काफी हो-हल्ला हुआ था, तो सरकार ने यह कमेटी बनाई थी। लेकिन 2019 में कमेटी द्वारा रिपोर्ट सौंपने के बाद भी सरकार ने उसे जारी नहीं किया था। सरकार ने इसका कारण बताया कि इससे उन महिलाओं की निजता का हनन होगा, जिन्होंने इस कमेटी के सामने आकर अपनी बातें कहीं। केरल उच्च न्यायालय के आदेश के बाद जब अंततः बीते 19 अगस्त को रिपोर्ट जारी की गई, तो रिपोर्ट के सामने आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया।
उल्लेखनीय है कि जस्टिस हेमा कमेटी का गठन 2017 में हुआ था, उस वक्त एक मलयालम फिल्म एक्ट्रेस के साथ उसकी कार में ही रेप हुआ था। वह किसी काम से कोच्चि जा रही थी उसी दौरान उसको किडनैप कर लिया गया था और उसके साथ रेप हुआ था। इस घटना के बाद काफी हंगामा हुआ था और काफी दबाव में सरकार ने केरल हाई कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस हेमा के नेतृत्व में कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी में जस्टिस हेमा के अतिरिक्त दो और सदस्य थीं, जिनमें से एक वेटरन एक्ट्रेस टी शारदा थीं और दूसरी रिटायर्ड आईएएस केबी वलसाला कुमारी थीं।
जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट का वुमेन ऐंड सिनेमा कलेक्टिव ने स्वागत किया है। इस संगठन ने कहा है कि इतिहास में यह पहली बार है, जब हमारे पास एक ऐसी रिपोर्ट है, जो बताती है कि फिल्मी दुनिया में लैंगिक असमानता कितनी ज्यादा है। मलयाली फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्रियां किस तरह शोषण का शिकार होती हैं, इसकी कहानी जैसे रिपोर्ट का हर पृष्ठ कहता है। इसमें बताया गया है कि जैसे ही कोई स्त्री मलयालम फिल्मों की दुनिया में प्रवेश करती है, सबसे पहले काम देने के बदले उससे सेक्सुअल फेवर की मांग की जाती है। यदि वह ऐसा करने से मना करती हैं, तो उसे कहीं काम नहीं मिलता। इसके अलावा, ठहरने के लिए अलग से कमरा, शौचालय की सुविधा, आने-जाने की व्यवस्था और सुरक्षित वातावरण जैसी मामूली सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। कार्यस्थल पर स्त्रियों से अश्लील बातें करना, समय पर पैसे न देना, दिए भी तो आधे-अधूरे पैसे देना, शिकायतों के लिए किसी संस्था का न होना आदि ऐसी बातें हैं, जो स्त्रियों ने हेमा कमेटी के सामने बताई थीं। जिन अभिनेत्रियों ने जस्टिस हेमा कमेटी के सामने बयान दिए, उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया।
बत्तीस साल की एक अभिनेत्री ने बताया कि जब वह जस्टिस हेमा कमेटी के सामने बयान देने गई, और खुलकर अपनी बातें रखीं, तो उसे काम मिलना बंद हो गया और उसे फिल्मी दुनिया को छोड़ना पड़ा। आज वह एक मामूली-सी नौकरी करती है। ऐसे ही अनुभव वुमेन सिनेमा कलेक्टिव से जुड़ी बहुत-सी अभिनेत्रियों और तकनीकी क्षेत्र की विशेषज्ञ महिलाओं के हैं। इनमें से अधिकांश का कहना है कि चूंकि उन्होंने काम की खराब परिस्थितियों के बारे में बोला है, इसलिए उन्हें परेशानी पैदा करने वाली महिला बताया जाता है। कहा जाता है कि वे उन समस्याओं के बारे में बता रही हैं, जो मलयालम फिल्मोद्योग में हैं ही नहीं। जबकि तमाम भुक्त-भोगियों का कहना है कि यह उद्योग लैंगिक भेदभाव के मामले में बहुत निचले पायदान पर है।
हिंदी फिल्म उद्योग में भी कास्टिंग काउच की शिकायतें अधिकांश अभिनेत्रियां करती रही हैं। ‘मी टू’ के बाद बड़ी संख्या में अभिनेत्रियों ने इस बारे में बातें की थीं। पर अफसोस की बात है कि जब भी वे बातें करती हैं, तो अक्सर कहती हैं कि फलां ने मुझे इस बारे में बताया था। अपने बारे में कभी नहीं कहतीं कि उन्हें भी इस तरह की मुसीबतों को झेलना पड़ा था। फिल्मी दुनिया में स्त्रियों के शोषण का मामला कोई नया नहीं है। दुनिया भर में फिल्मों में काम करने वाली स्त्रियों को शारीरिक व मानसिक शोषण से गुजरना पड़ता है। एक बार अनुपम खेर ने एक विदेशी अभिनेत्री के बारे में कहा था कि काम पाने के लिए उन्हें फिल्म जगत से जुड़े तीन सौ पुरुषों को खुश करना पड़ा था। असल में अभिनेत्रियों को यही डर सताता है कि यदि वे अपने शोषण के बारे में बोलेंगी, तो उन्हें फिल्मोद्योग में काम नहीं मिलेगा।
गुजरे जमाने की मशहूर मराठी अभिनेत्री हंसा वाडेकर ने अपनी जीवनी में ऐसी ही बातों का उल्लेख किया था। यह जीवनी एक मशहूर हिंदी पत्रिका में धारावाहिक छपी थी। इसी जीवनी पर मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल ने भूमिका नाम से फिल्म बनाई थी। आशा की जानी चाहिए कि जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट के बाद मलयाली फिल्मोद्योग में अभिनेत्रियों के कामकाज की स्थितियों में सुधार होगा। वैसे रिपोर्ट की रस्मअदायगी हमेशा से होती रही है, लेकिन इससे कुछ ख़ास असर आज तक नहीं हुआ। महिलाएं भेदभाव और हैवानिअत का शिकार आज भी हो रही हैं।




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