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एमपॉक्स यानी नया कोरोना ! 

बीते 15 अगस्त को विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ (WHO) ने जब एमपॉक्स यानी मंकी पॉक्स को लेकर ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी का एलान किया तो अचानक इस वायरस को लेकर दुनियाभर में लोगों की गंभीरता बढ़ गई। वे इसके सम्बन्ध में जानकारियां प्राप्त करने की कोशिश करने लगे, यह चर्चा होने लगी कि कहीं यह नया कोरोना तो नहीं !

जाहिर है यह सवाल गैरवाजिब भी नहीं। आखिर मसला गंभीर रहा होगा तभी तो डब्ल्यूएचओ ने इसे दुनियाभर के लिए स्वस्थ्य के मोर्चे पर आपातकाल सरीखा माना। कोरोना वायरस को भी उसने वैश्विक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया था। कोरोना के अगर दिसंबर 2019 से अगस्त 2023 तक 76 करोड़ से ज़्यादा केस दर्ज किए गए थे, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ मई 2022 से अब तक एमपॉक्स के भी दुनियाभर में एक लाख से ज़्यादा केस दर्ज किए जा चुके हैं। और, अब तो यह और भी तेजी से बढ़ रहा है। 

तेज गति से अपने पाँव पसारते हुए एमपॉक्स अब 116 देशों से ज़्यादा देशों में फैल चुका है। इसके जहां एक लाख से अधिक मामले आ चुके हैं, वहीं इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा भी डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 300 पार कर चुका है। वैसे अफ़्रीका सेंटर्स फोर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेनशन (सीडीसी) ने कहा है कि सिर्फ अफ्रीका में ही एमपॉक्स की वजह से 600 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है। बहरहाल, भारत में भी अब तक कुल 30 मामले पाए गए हैं। हालांकि यहां आखिरी मामला मार्च 2024 में सामने आया था। तब से नया मामला भले ही दर्ज न किया गया हो, मगर फिर भी इसकी गंभीरता को काम करके नहीं आँका जा सकता। 

बीते दो सालों में एमपॉक्स ने अफ़्रीका के देशों में ज़्यादा तांडव मचाया है। यह अलग बात कि कोरोना वायरस के फैलने पर जिस तरह सरहद को बंद करने या लॉकडाउन लगाने का फैसला करना पड़ा था, वैसा एमपॉक्स के मामले में अब तक ऐसा नहीं किया गया है। शायद इसके पीछे यह वजह रही है कि कोरोना के विपरीत एमपॉक्स की वैक्सीन पहले से ही उपलब्ध है। कोरोना के मामले में सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वैक्सीन बनानी होगी, फिर उसका ट्रायल होगा, फिर मंज़ूरी मिलेगी और तब जाकर कोरोना पर काबू पाया जा सकेगा। साथ ही एमपॉक्स कोरोना की तरह नया वायरस नहीं है। 

एमपॉक्स बीमारी साल 1958 से मौजूद है। पहले इसे मंकी पॉक्स के नाम से जाना जाता था। ये वायरस सबसे पहले डेनमार्क के बंदरों में मिला था। इंसान के इस वायरस की चपेट में आने का पहला मामला डीआर कॉन्गो में 1970 में देखने को मिला था। तब से पश्चिम और मध्य अफ़्रीका में ये वायरस कई बार फैला। एमपॉक्स को लेकर ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी का एलान भी इससे पहले 2022 में किया गया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि दोनों ही वायरसों- एमपॉक्स और कोरोना- को वैश्विक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया गया पर अब हम एमपॉक्स के बारे में कोरोना से ज़्यादा जानते हैं। 

तो क्या एमपॉक्स से हमें घबराने की ज़रूरत नहीं है? क्या आम आबादी के लिए इसके जोखिम कम हैं? और क्या एमपॉक्स कोरोना से अलग है? यह सही है कि हमें मालूम है कि एमपॉक्स को कैसे काबू करना है, लेकिन एमपॉक्स भी कोरोना की तरह एक संक्रामक बीमारी है। एमपॉक्स भी किसी संक्रमित व्यक्ति के क़रीब आने पर फैलता है, जैसे- आप संक्रमित मरीज़ की त्वचा को छू लें, शारीरिक संबंध बना लें, संक्रमित इंसान के बिस्तर पर लेट जाएं या उसके कपड़ों का इस्तेमाल कर लें। देर तक आमने-सामने बात करने से भी एमपॉक्स वायरस एक से दूसरे इंसान में जा सकता है। हालांकि ये एयरबोर्न नहीं है। 

जहाँ तक एमपॉक्स के लक्षण का सवाल है तो कमोबेश इसके लक्षण भी कोरोना की तरह ही हैं- बुखार, सिर दर्द, बदन दर्द, गले में सूजन, चकत्ते आदि। वैक्सीन के ज़रिए इससे निपटने का इंतज़ाम 1980 में हो गया था। जिन वैक्सीन से स्मॉलपॉक्स से निपटा जाता है, वही वैक्सीन एमपॉक्स से भी बचा रही हैं, ख़ासकर जब 2022 में ये बीमारी फैली थी। हालांकि यह 100 फ़ीसदी सरंक्षण मुहैया नहीं करवाती है। जाहिर है वक़्त के साथ वायरस बदलता है। कुछ वायरस बहुत तेज़ी से अपना रूप बदलते हैं।  

एक्सपर्ट्स का कहना है कि नया और घातक एमपॉक्स स्ट्रेन-क्लैड 1बी बच्चों के लिए एक बड़ा खतरा है। यह स्ट्रेन साल 2022 में दुनियाभर में किए गए अनुभव से बिल्कुल अलग है। 2022 का स्ट्रेन क्लैड II से संचालित था, जो कम खतरनाक होता है। यानी खतरा तो है, भले ही इसने अभी भयावह रूप नहीं दिखाया हो मगर भविष्य में कुछ भी हो सकता है। हो सकता है कि एक और कोरोना दोहरा दिया जाए। एमपॉक्स डीएनए वायरस से होता है जबकि कोरोना आरएनए वायरस से होता है। अभी जो एमपॉक्स संक्रमण फैल रहा है, वो क्लेड 1 वायरस से फैल रहा है, जिसे क्लेड 1बी भी कहते हैं। 

लेकिन एक डरने वाली बात यह है कि 2022 में क्लेड 1 वायरस से बड़ी उम्र के पुरुष ज़्यादा संक्रमित हुए थे, मगर इस बार बच्चे संक्रमित हो रहे हैं। साथ ही यह तेजी से भी फ़ैल रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि एमपॉक्स का यह स्ट्रेन क्लेड 1 से अलग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैज्ञानिकों का भी कहना है कि वो नहीं जानते कि 1बी स्ट्रेन क्या बाक़ी स्ट्रेन के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से फैल रहा है। और अगर ऐसा है तो यह घबराने वाली बात हो सकती है। कारण, इससे लड़ने का ज्ञान अभी हमें नहीं है और न ही पुरानी वैक्सीन से इसका मुकाबला किया जा सकता है। 

बहरहाल, यह अच्छी बात है कि भारत में एमपॉक्स पर नियंत्रण की तैयारी शुरू हो गयी है। तीन स्वदेशी टेस्टिंग किट के निर्माण को मंजूरी दी गयी है। इन टेस्टिंग किट्स को सीमेंस हेल्थकेयर, ट्रांसएशिया डायग्नोस्टिक्स और जेआईटीएम सी जीन द्वारा डेवलप किया जा रहा है। यह तीनों स्वीकृत टेस्टिंग किट्स उन छह किटों में हैं, जिन्हें आईसीएमआर द्वारा वायरल संक्रमण का पता लगाने के लिए मान्यता दी गई है। 2022 में भारत में पहली बार एमपॉक्स के मामले सामने आने के बाद आईसीएमआर ने कंपनियों से डायग्नोस्टिक्स और वैक्सीन डेवलप करने का आह्वान किया था। टेस्टिंग किट्स के अप्रूवल का यह प्रॉसेस डब्लूएचओ द्वारा एमपॉक्स को ग्लोबल इमरजेंसी घोषित करने के ऐलान के बाद शुरू हुआ है।

Asmita Sarkar

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