भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में पिछले एक दशक के दौरान शिक्षकों की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में शिक्षकीय पद खाली हैं। SBI Research की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2013-14 से 2023-24 के बीच देश के उच्च शिक्षा क्षेत्र में शिक्षकों की संख्या करीब 27 प्रतिशत बढ़ी और 13.68 लाख से बढ़कर 17.32 लाख हो गई। इस दौरान करीब 3.65 लाख शिक्षक उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े।
हालांकि, शिक्षकों की संख्या बढ़ने के बावजूद केंद्रीय विश्वविद्यालयों और केंद्र से वित्त पोषित उच्च शिक्षा संस्थानों में स्वीकृत शिक्षकीय पदों का बड़ा हिस्सा अब भी खाली है। रिपोर्ट के अनुसार, इन संस्थानों में 34 प्रतिशत स्वीकृत शिक्षक पद खाली हैं। यानी शिक्षक संख्या में विस्तार के साथ-साथ भर्ती और उपलब्ध शिक्षकों के वितरण की चुनौती भी बनी हुई है।
10 साल में 27% बढ़ी शिक्षकों की संख्या
SBI Research ने अपनी रिपोर्ट में All India Survey on Higher Education (AISHE) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। इसके मुताबिक 2013-14 में देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में 13,67,535 शिक्षक थे। 2023-24 तक यह संख्या बढ़कर 17,32,294 हो गई।
इस तरह एक दशक में शिक्षकों की संख्या में लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी अवधि में महिला शिक्षकों की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। 2013-14 में उच्च शिक्षा के कुल शिक्षकों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 39 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में बढ़कर 45 प्रतिशत हो गई।
यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब देश में उच्च शिक्षा का विस्तार भी तेजी से हुआ है। 2023-24 में भारत में 1,289 विश्वविद्यालय, 48,246 कॉलेज और 15,221 स्टैंडअलोन संस्थान थे। कुल मिलाकर उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या 64,756 तक पहुंच गई थी।
34% स्वीकृत शिक्षक पद खाली, IIIT में सबसे ज्यादा कमी
रिपोर्ट का सबसे अहम हिस्सा शिक्षकों के खाली पदों से जुड़ा है। यह आंकड़ा देश के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में खाली पदों का नहीं, बल्कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और केंद्र से वित्त पोषित उच्च शिक्षा संस्थानों में स्वीकृत शिक्षकीय पदों का है।
संसदीय आंकड़ों के आधार पर SBI Research ने बताया कि कुल 41,351 स्वीकृत शिक्षकीय पदों में 27,133 पद भरे हुए थे, जबकि 14,042 पद खाली थे। यानी करीब 34 प्रतिशत पदों पर नियुक्ति नहीं हुई थी।
संस्थान के हिसाब से स्थिति और ज्यादा स्पष्ट होती है। IIIT में 54 प्रतिशत स्वीकृत शिक्षक पद खाली थे, जो इन प्रमुख केंद्रीय संस्थानों में सबसे अधिक है। IIT में यह हिस्सेदारी 39 प्रतिशत, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 33 प्रतिशत, IIM में 31 प्रतिशत और NIT में 29 प्रतिशत रही। IISER में रिक्त पदों की हिस्सेदारी 7 प्रतिशत थी।
रिपोर्ट में वरिष्ठ शिक्षकों के पदों को लेकर भी चिंता सामने आती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रोफेसर स्तर के 56.2 प्रतिशत पद खाली थे। इसका असर केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शोध, छात्रों के मार्गदर्शन और नए शैक्षणिक कार्यक्रमों के संचालन पर भी पड़ सकता है।
स्टूडेंट-टीचर रेश्यो 23, लेकिन राज्यों में बड़ा अंतर
SBI Research के अनुसार 2023-24 में नियमित उच्च शिक्षा में भारत का Pupil-Teacher Ratio (PTR) 23 था। यानी औसतन एक शिक्षक पर करीब 23 विद्यार्थी थे।
राष्ट्रीय औसत पहली नजर में बहुत खराब नहीं दिखता। रिपोर्ट ने इसकी तुलना अमेरिका और यूरोप के कई प्रमुख संस्थानों में देखे जाने वाले करीब 25 से 30 विद्यार्थियों प्रति शिक्षक के अनुपात से भी की है। लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों की स्थिति में काफी अंतर है।
बिहार में PTR 57, झारखंड में 48 और उत्तर प्रदेश में 33 दर्ज किया गया। इसके मुकाबले तमिलनाडु, केरल और गोवा में यह अनुपात 14 था। शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ने उच्च शिक्षा के लिए 15:1 को आदर्श PTR बताया है।
इसका मतलब है कि राष्ट्रीय औसत को देखकर पूरे देश में शिक्षकों की उपलब्धता की समान स्थिति मान लेना सही नहीं होगा। कुछ राज्यों में विद्यार्थियों की तुलना में शिक्षकों की उपलब्धता बेहतर है, जबकि कुछ राज्यों में एक शिक्षक पर विद्यार्थियों की संख्या काफी अधिक है।
उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन शिक्षक भर्ती बड़ी चुनौती
भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार पिछले एक दशक में तेजी से हुआ है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या बढ़ने के साथ विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ी है। 2023-24 में उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की कुल संख्या 4.5 करोड़ से अधिक थी।
ऐसे में केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उनके लिए पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षक, शोधकर्ता और वरिष्ठ संकाय उपलब्ध कराना भी जरूरी है। खासकर IIT, IIM, NIT, IIIT और केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में लंबे समय तक बड़ी संख्या में पद खाली रहने का असर पढ़ाई के साथ शोध गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि SBI Research ने उच्च शिक्षा में खाली शिक्षकीय पदों को भरने और निवेश बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक उच्च शिक्षा पर सरकारी खर्च का हिस्सा हाल के वर्षों में कुल सरकारी खर्च का करीब 1 प्रतिशत रहा है, जो 2017-18 में करीब 1.6 प्रतिशत था। रिपोर्ट ने इसे बढ़ाकर 1.5 प्रतिशत करने का सुझाव दिया है।
वैश्विक स्तर पर भी शिक्षक कमी बड़ी चिंता
शिक्षकों की कमी केवल भारत की समस्या नहीं है। UNESCO ने भी वैश्विक स्तर पर शिक्षकों की कमी को गंभीर चुनौती बताया है। संगठन के अनुसार 2030 तक दुनिया को प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए करीब 4.4 करोड़ अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत होगी।
भारत के आंकड़ों को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। देश में शिक्षकों की कुल संख्या बढ़ रही है, लेकिन संस्थानों और राज्यों के बीच शिक्षकों की उपलब्धता में अंतर, स्वीकृत पदों का खाली रहना और वरिष्ठ शिक्षकों की कमी अभी भी महत्वपूर्ण सवाल हैं।
क्या कहते हैं ये आंकड़े?
SBI Research की रिपोर्ट भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था की एक मिश्रित तस्वीर सामने रखती है। एक तरफ 10 साल में शिक्षकों की संख्या में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और महिला शिक्षकों की हिस्सेदारी भी 45 प्रतिशत तक पहुंची है। दूसरी तरफ केंद्रीय संस्थानों में हर तीन में करीब एक स्वीकृत शिक्षकीय पद खाली है।
इसलिए आने वाले वर्षों में चुनौती सिर्फ ‘कितने शिक्षक हैं’ यह नहीं होगी, बल्कि यह भी होगी कि ‘कहां कितने शिक्षक चाहिए, कितने पद स्वीकृत हैं और उनमें से कितने वास्तव में भरे गए हैं’। उच्च शिक्षा के विस्तार को गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए इन तीनों स्तरों पर संतुलन जरूरी होगा।




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