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AMU और नोबेल 2026: IceCube न्यूट्रिनो रिसर्च से जुड़े तीन शोधार्थी, फ्रांसिस हाल्जेन को भौतिकी का नोबेल

2026 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार ने न्यूट्रिनो भौतिकी पर भारत में हो रहे शोध को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) के नेतृत्व में विकसित IceCube Neutrino Observatory से जुड़े शोध में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के शोधकर्ताओं की भी भागीदारी रही है। AMU के भौतिकी विभाग से जुड़े अनुज कुमार उपाध्याय, गोपाल गर्ग और जे. कृष्णमूर्ति का नाम IceCube से जुड़े न्यूट्रिनो अनुसंधान में सामने आता है।

प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार IceCube Neutrino Observatory में उनके निर्णायक योगदान और खगोलीय स्रोतों से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है। इस सम्मान ने न्यूट्रिनो के जरिए ब्रह्मांड को समझने वाली इस शोध दिशा को एक बार फिर वैश्विक स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है।

क्या है IceCube Neutrino Observatory?

IceCube दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद विशाल बर्फ में बनाया गया दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण न्यूट्रिनो डिटेक्टरों में से एक है। इसका उद्देश्य बेहद कमजोर तरीके से पदार्थ के साथ प्रतिक्रिया करने वाले न्यूट्रिनो के संकेतों को दर्ज करना और उनके जरिए ब्रह्मांड में होने वाली अत्यधिक ऊर्जावान घटनाओं के बारे में जानकारी हासिल करना है।

प्रो. हाल्जेन ने अंटार्कटिका की बर्फ को एक विशाल न्यूट्रिनो डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल करने का विचार आगे बढ़ाया। इसी सोच से IceCube Neutrino Observatory का निर्माण हुआ। यहां बर्फ के भीतर लगाए गए सेंसर न्यूट्रिनो के पदार्थ से टकराने पर पैदा होने वाले प्रकाश के संकेतों को रिकॉर्ड करते हैं।

न्यूट्रिनो को अक्सर ‘घोस्ट पार्टिकल’ कहा जाता है, क्योंकि वे पदार्थ के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं और बड़ी मात्रा में पदार्थ को लगभग बिना रुके पार कर सकते हैं। यही विशेषता उन्हें ब्रह्मांड के बेहद दूरस्थ और शक्तिशाली स्रोतों का अध्ययन करने के लिए उपयोगी बनाती है।

फ्रांसिस हाल्जेन के काम की अहमियत क्या है?

नोबेल पुरस्कार के लिए प्रो. हाल्जेन के काम को इसलिए महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि IceCube ने वैज्ञानिकों को न्यूट्रिनो के जरिए ब्रह्मांड को देखने का एक नया तरीका दिया। प्रकाश आधारित खगोल विज्ञान के अलावा अब वैज्ञानिक ऐसे कणों का भी अध्ययन कर सकते हैं, जो बेहद ऊर्जावान खगोलीय घटनाओं से निकलकर पृथ्वी तक पहुंचते हैं।

IceCube के जरिए खगोलीय स्रोतों से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो का पता लगाया गया है। इन कणों के अध्ययन से वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ब्रह्मांड में सबसे ऊर्जावान कण कहां और किस तरह पैदा होते हैं।

इन शोधों में सक्रिय आकाशगंगाओं के केंद्रों में मौजूद विशाल ब्लैक होल के आसपास के क्षेत्र संभावित स्रोतों के रूप में सामने आए हैं। ऐसे क्षेत्रों में अत्यधिक ऊर्जा वाली प्रक्रियाएं होती हैं, जो उच्च-ऊर्जा कण पैदा कर सकती हैं।

AMU के शोधकर्ताओं का IceCube से क्या संबंध है?

AMU के भौतिकी विभाग और भारत के अन्य शोध संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिक लंबे समय से न्यूट्रिनो भौतिकी पर काम कर रहे हैं। अनुज कुमार उपाध्याय का नाम IceCube DeepCore से जुड़े शोध में दर्ज है। उन्होंने वायुमंडलीय न्यूट्रिनो के जरिए पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से और न्यूट्रिनो के पदार्थ के साथ होने वाले प्रभावों पर भी शोध किया है।

2025 में प्रकाशित एक शोध में जे. कृष्णमूर्ति और अनुज कुमार उपाध्याय समेत शोधकर्ताओं ने IceCube DeepCore की मदद से पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से का अध्ययन करने की संभावनाओं पर काम किया। इस शोध में न्यूट्रिनो के दोलन के जरिए पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों की इलेक्ट्रॉन घनत्व संबंधी जानकारी हासिल करने की क्षमता पर चर्चा की गई।

IceCube के एक अगस्त 2026 के शोध अपडेट में कृष्णमूर्ति जयकुमार, अनुज कुमार उपाध्याय और अन्य शोधकर्ताओं के काम का उल्लेख किया गया है। इसमें IceCube Upgrade की मदद से वायुमंडलीय न्यूट्रिनो के जरिए पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने की संभावनाओं पर अध्ययन किया गया।

न्यूट्रिनो से पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से का अध्ययन

IceCube का इस्तेमाल केवल अंतरिक्ष से आने वाले न्यूट्रिनो को पकड़ने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक वायुमंडलीय न्यूट्रिनो का इस्तेमाल पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से को समझने के लिए भी कर रहे हैं।

न्यूट्रिनो पृथ्वी से होकर लगभग बिना रुके गुजर सकते हैं। इस दौरान उनके व्यवहार में आने वाले बदलाव पृथ्वी के अंदर मौजूद पदार्थ और इलेक्ट्रॉन घनत्व के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इसी आधार पर वैज्ञानिक पृथ्वी की अलग-अलग परतों, कोर और उसके आसपास के क्षेत्र की संरचना का अध्ययन करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

यह शोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से को सीधे देखना संभव नहीं है। अब न्यूट्रिनो एक अलग तरह का वैज्ञानिक माध्यम उपलब्ध करा रहे हैं, जो पारंपरिक भूकंपीय और गुरुत्वीय अध्ययनों के साथ अतिरिक्त जानकारी दे सकता है।

AMU के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

AMU के भौतिकी विभाग की अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग में भागीदारी नई बात नहीं है। विभाग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, उसके शोधकर्ता CERN की ALICE Collaboration, DUNE, MINERνA और अन्य अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परियोजनाओं से भी जुड़े रहे हैं। विभाग के संयुक्त शोध कार्यक्रम में न्यूट्रिनो भौतिकी से संबंधित सहयोग भी शामिल हैं।

ऐसे समय में जब IceCube से जुड़े काम के लिए प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन को भौतिकी का नोबेल मिला है, इस सहयोग से जुड़े भारतीय शोधकर्ताओं का काम विशेष महत्व रखता है। यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत के शोधार्थी अंतरराष्ट्रीय स्तर की बड़ी वैज्ञानिक परियोजनाओं में शामिल होकर आधुनिक कण भौतिकी और न्यूट्रिनो विज्ञान के महत्वपूर्ण सवालों पर काम कर रहे हैं।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नोबेल पुरस्कार प्रो. फ्रांसिस हाल्जेन को दिया गया है, AMU या उसके शोधार्थियों को नहीं। AMU के शोधकर्ताओं का महत्व इस बात में है कि वे उस व्यापक वैज्ञानिक सहयोग और शोध प्रयास का हिस्सा रहे हैं, जिसके क्षेत्र को इस वर्ष के नोबेल सम्मान से वैश्विक पहचान मिली है।

न्यूट्रिनो रिसर्च का अगला चरण

IceCube में लगातार नए उपकरण और तकनीकी सुधार किए जा रहे हैं। IceCube Upgrade का उद्देश्य न्यूट्रिनो की ऊर्जा और दिशा को पहले से अधिक सटीक तरीके से मापना है। इससे वैज्ञानिकों को न केवल ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो के स्रोतों को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से और न्यूट्रिनो के मूलभूत गुणों के अध्ययन के लिए भी नए अवसर मिलेंगे।

AMU से जुड़े शोधकर्ताओं का काम इसी व्यापक वैज्ञानिक प्रयास का हिस्सा है। नोबेल पुरस्कार ने जिस शोध क्षेत्र को दुनिया का ध्यान दिलाया है, उसमें भारतीय शोध संस्थानों और युवा वैज्ञानिकों की भागीदारी देश में उच्चस्तरीय मूलभूत विज्ञान के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।

Raish Ahmed

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