नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर सवाल उठे हैं। शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 382वीं रिपोर्ट में परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की सिफारिश की है। समिति चाहती है कि एनटीए की जवाबदेही संसद के प्रति सुनिश्चित करने के लिए उचित संसदीय ढांचा तैयार किया जाए। इसके साथ ही नीट को कंप्यूटर आधारित परीक्षा में बदलने, सरकारी परीक्षा केंद्रों की संख्या बढ़ाने और पेपर लीक रोकने के लिए बड़ा प्रश्न बैंक बनाने जैसे सुझाव भी दिए गए हैं।
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, देश की प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं की निष्पक्षता बनाए रखना केवल परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी की जिम्मेदारी नहीं है। यह शिक्षा में समान अवसर, सामाजिक न्याय और सार्वजनिक संस्थानों पर लोगों के भरोसे से भी जुड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एनटीए ने परीक्षा सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन नीट यूजी 2026 रद्द होने से स्पष्ट है कि मौजूदा व्यवस्था में प्रक्रियागत और संस्थागत सुधारों की जरूरत बनी हुई है।
NEET UG 2026 परीक्षा क्यों रद्द हुई?
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने 3 मई 2026 को नीट यूजी की परीक्षा आयोजित की थी। परीक्षा से जुड़े दस्तावेजों के कथित अनधिकृत प्रसार और पेपर लीक की आशंका सामने आने के बाद 12 मई को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने मामला दर्ज किया। शिक्षा मंत्रालय की शिकायत के आधार पर दर्ज मामले में कथित अनियमितताओं, आपराधिक साजिश और अन्य संबंधित अपराधों की जांच शुरू की गई।
सरकार ने परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर संभावित असर को देखते हुए नीट यूजी 2026 की परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा कराने का फैसला किया। एनटीए के आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार, दोबारा परीक्षा 21 जून 2026 को आयोजित की गई।
इस घटनाक्रम ने परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और परीक्षा संचालन में शामिल एजेंसियों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। संसदीय समिति ने इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए एनटीए की व्यवस्था में बदलाव की जरूरत बताई है।
NTA में कितने पद खाली हैं? समिति ने क्या कहा?
संसदीय समिति ने एनटीए में कर्मचारियों की कमी को भी एक बड़ी समस्या बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, एजेंसी में स्वीकृत 39 पदों में से केवल 23 पर अधिकारी तैनात थे। यानी करीब 41 प्रतिशत पद खाली थे।
समिति ने इन पदों को जल्द भरने और केवल दूसरे विभागों से प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों पर निर्भर रहने के बजाय एनटीए में स्थायी विशेषज्ञों की नियुक्ति करने की सिफारिश की है। इसके लिए परीक्षा सुरक्षा, डिजिटल व्यवस्था, आंकड़ों के विश्लेषण, परीक्षा संचालन और मनोमिति जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की जरूरत बताई गई है। मनोमिति के तहत परीक्षाओं और मूल्यांकन की विश्वसनीयता तथा प्रश्नों की गुणवत्ता का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।
समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करने के लिए लंबे अनुभव और विशेष कौशल की जरूरत होती है। इसलिए एनटीए को ऐसी पेशेवर टीम तैयार करनी चाहिए जो परीक्षा की योजना बनाने से लेकर उसके सुरक्षित संचालन तक की जिम्मेदारी प्रभावी ढंग से निभा सके।
NEET को कंप्यूटर आधारित परीक्षा बनाने की सिफारिश
समिति ने नीट यूजी को पेन-पेपर आधारित परीक्षा से कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT) में बदलने की सिफारिश की है। एनटीए पहले से जेईई मेन, यूजीसी नेट और सीयूईटी जैसी कई प्रमुख परीक्षाएं कंप्यूटर के माध्यम से आयोजित करता है। समिति के अनुसार, नीट का पेन-पेपर प्रारूप में बने रहना एक अलग स्थिति है, जिस पर बदलाव के लिए विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, कंप्यूटर आधारित परीक्षा लागू करने से पहले पर्याप्त सरकारी बुनियादी ढांचा तैयार करना जरूरी होगा। समिति ने देशभर में चरणबद्ध तरीके से 1,000 सुरक्षित सरकारी कंप्यूटर आधारित परीक्षा केंद्र बनाने के सुझाव का समर्थन किया है। खास तौर पर छोटे शहरों, ग्रामीण इलाकों और दूरदराज के क्षेत्रों में केंद्रों की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
समिति चाहती है कि प्रत्येक जिले में कम से कम एक परीक्षा केंद्र हो, ताकि विद्यार्थियों को परीक्षा देने के लिए दूसरे शहरों में जाने और रहने पर अतिरिक्त पैसा खर्च न करना पड़े। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में कंप्यूटर लैब विकसित करने तथा विद्यार्थियों को परीक्षा से पहले मॉक टेस्ट देने का अवसर उपलब्ध कराने का सुझाव भी दिया गया है।
जहां कंप्यूटर या इंटरनेट की सुविधा पर्याप्त नहीं है, वहां पूरी तरह कंप्यूटर आधारित परीक्षा लागू होने तक एक वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है। इसके तहत एन्क्रिप्टेड यानी सुरक्षित डिजिटल प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र पर भेजकर वहीं प्रिंट किए जा सकते हैं।
समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि कंप्यूटर आधारित परीक्षा में अलग-अलग पालियों में प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर के अंतर को देखते हुए अंक सामान्यीकरण की पारदर्शी और स्वतंत्र रूप से जांची गई व्यवस्था जरूरी होगी। इस बदलाव से पहले विद्यार्थियों, उनके परिवारों, स्वास्थ्य मंत्रालय और चिकित्सा शिक्षा से जुड़े नियामकों से परामर्श करने की सिफारिश भी की गई है।
पेपर लीक रोकने के लिए बड़ा प्रश्न बैंक बनाने का सुझाव
संसदीय समिति ने पेपर लीक रोकने के लिए प्रश्न बैंक में निवेश को लंबे समय का महत्वपूर्ण उपाय बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, बार-बार एक ही तरह के प्रश्नों का इस्तेमाल करना या हर साल सीमित परीक्षकों से नए प्रश्नपत्र तैयार करवाना परीक्षा की गोपनीयता और निष्पक्षता के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
समिति ने एनटीए को बड़ा, विविध और लगातार अपडेट होने वाला प्रश्न बैंक तैयार करने की सिफारिश की है। इसमें से डिजिटल माध्यमों की मदद से परीक्षा के काफी करीब प्रश्नपत्र तैयार किए जा सकेंगे। इससे प्रश्नपत्र बनाने वाले विशेषज्ञों को भी पहले से यह पता नहीं होगा कि अंतिम प्रश्नपत्र में कौन-से सवाल शामिल किए जाएंगे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रश्न बैंक तैयार करने और प्रश्नों का अनुवाद करने के लिए आईआईटी, एम्स और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के योग्य विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए। विशेषज्ञों की नियुक्ति से पहले उनके पिछले काम, विश्वसनीयता और हितों के टकराव की भी जांच होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, निजी कोचिंग संस्थानों के मालिकों या शिक्षकों तथा परीक्षा में शामिल होने वाले उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े संभावित हितों पर ध्यान देना जरूरी है।
समिति ने कंप्यूटर आधारित परीक्षा की व्यवस्था विकसित होने के बाद कंप्यूटर अनुकूली परीक्षा (Computer Adaptive Testing) की दिशा में भी आगे बढ़ने का सुझाव दिया है। इस प्रणाली में प्रश्नों का चयन विद्यार्थी की क्षमता के अनुसार किया जा सकता है। इससे सभी अभ्यर्थियों को एक जैसा प्रश्नपत्र देने की जरूरत कम हो सकती है और नकल की संभावनाओं पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके लिए सुरक्षित तकनीकी व्यवस्था और अंकों के सामान्यीकरण की भरोसेमंद प्रक्रिया जरूरी होगी।
परीक्षा केंद्र पर देर से पहुंचने वाले छात्रों को भी मिल सकता है मौका
समिति ने परीक्षा केंद्र पर कुछ मिनट देर से पहुंचने वाले अभ्यर्थियों की समस्या पर भी ध्यान दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, कई बार मामूली देरी के कारण विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं मिलती, जिससे उनकी सालभर की मेहनत प्रभावित हो सकती है।
समिति ने सुझाव दिया है कि ऐसे अभ्यर्थियों के लिए एक व्यवस्था बनाई जाए, जिसके तहत वे देरी का कारण बताते हुए लिखित अंडरटेकिंग दें और शेष समय में परीक्षा दे सकें। हालांकि, उन्हें अतिरिक्त समय नहीं दिया जाना चाहिए।
इसके अलावा, परीक्षा के दौरान निरीक्षकों द्वारा हस्ताक्षर और जांच संबंधी औपचारिकताएं पूरी करने से विद्यार्थियों का ध्यान भटक सकता है। समिति ने सुझाव दिया है कि इन औपचारिकताओं के लिए परीक्षा शुरू होने से पहले या समाप्त होने के बाद 15 मिनट का अलग समय रखा जाए।
समिति ने परीक्षा के दिन बड़ी रैलियों और जुलूसों के कारण विद्यार्थियों को होने वाली परेशानी पर भी चिंता जताई है। उसने संबंधित कानून में संशोधन कर जिला प्रशासन को परीक्षा के दिनों में ऐसे आयोजनों की अनुमति रोकने तथा यातायात की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित करने का सुझाव दिया है।
निजी परीक्षा केंद्रों पर निर्भरता घटाने की सिफारिश
परीक्षा सुरक्षा मजबूत करने के लिए समिति ने निजी संस्थानों द्वारा संचालित परीक्षा केंद्रों पर निर्भरता कम करने की जरूरत बताई है। रिपोर्ट के अनुसार, उप-ठेके पर परीक्षा केंद्र चलाने वाली कुछ निजी संस्थाएं सुरक्षा व्यवस्था की कमजोर कड़ी साबित हुई हैं।
समिति चाहती है कि परीक्षा केंद्रों का स्वामित्व और संचालन केंद्र या राज्य सरकारों के पास हो। इसके लिए सरकारी केंद्रों की उपलब्धता, बजट और मौजूदा सुविधाओं का आकलन करके स्पष्ट कार्ययोजना तैयार करने की सिफारिश की गई है।
इसके साथ ही एनटीए को परीक्षा से जुड़ी सेवाएं देने वाली उन कंपनियों और एजेंसियों का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाने का सुझाव दिया गया है, जिन्हें किसी राज्य सरकार या सरकारी संगठन ने प्रतिबंधित किया है। इस रजिस्टर में संबंधित कंपनियों, उनसे जुड़े व्यक्तियों और प्रतिबंध के कारणों की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।
संसद के प्रति जवाबदेही और छात्रों की शिकायतों पर भी जोर
समिति की सिफारिशें केवल परीक्षा के तकनीकी प्रारूप तक सीमित नहीं हैं। उसने एनटीए में ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया है, जिससे एजेंसी की जवाबदेही संसद के प्रति सुनिश्चित हो सके।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एनटीए को विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों के साथ संवाद बेहतर करना चाहिए। फिलहाल एजेंसी की ओर से मिलने वाली जानकारी काफी हद तक पोर्टल और सूचनाओं तक सीमित है। समिति ने शिकायतों और सुझावों के लिए ऐसे माध्यम विकसित करने की सिफारिश की है, जिनका इस्तेमाल विद्यार्थी आसानी से कर सकें।
समिति ने परीक्षा सुरक्षा की जांच करने, अभ्यर्थियों की शिकायतों की समीक्षा करने और अपनी रिपोर्ट सीधे शिक्षा मंत्रालय को देने वाली एक स्वतंत्र व्यवस्था बनाने का सुझाव भी दिया है। इसके अलावा, परीक्षा रद्द होने जैसी प्रशासनिक घटनाओं से प्रभावित विद्यार्थियों को मुआवजा देने और शिकायतों के निपटारे की समयसीमा तय करने पर विचार करने को कहा गया है।
रिपोर्ट में नीट की कटऑफ और पात्रता प्रतिशत की सालाना समीक्षा, परीक्षा में सफल होने वाले विद्यार्थियों के आंकड़ों का सामाजिक और क्षेत्रीय आधार पर विश्लेषण तथा तनाव से जूझ रहे अभ्यर्थियों के लिए मुफ्त परामर्श सेवाएं उपलब्ध कराने जैसे सुझाव भी शामिल हैं।
क्या इन सिफारिशों से NEET की परीक्षा व्यवस्था बदलेगी?
संसदीय समिति की रिपोर्ट में परीक्षा सुरक्षा, कर्मचारियों की नियुक्ति, तकनीकी सुविधाओं, प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया और जवाबदेही से जुड़े कई सुधार सुझाए गए हैं। लेकिन इन सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकार और संबंधित एजेंसियों को आगे कदम उठाने होंगे। रिपोर्ट में दिए गए सुझावों को अपने आप लागू हो चुके फैसले नहीं माना जा सकता।
नीट यूजी जैसी राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा में लाखों विद्यार्थी शामिल होते हैं। ऐसे में परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य और शिक्षा में समान अवसर से जुड़ा सवाल है।
अब महत्वपूर्ण यह होगा कि सरकार इन सिफारिशों पर क्या कार्रवाई करती है, सरकारी परीक्षा केंद्रों का विस्तार कितनी तेजी से होता है और एनटीए की जवाबदेही तथा सुरक्षा व्यवस्था में कितना ठोस बदलाव दिखाई देता है।




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