दिल्ली की तीन प्रमुख यूनिवर्सिटी—जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली (AUD)—में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन ने कैंपस में लोकतंत्र, शैक्षणिक स्वतंत्रता और विश्वविद्यालयों के कामकाज से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। JNU में छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं, जामिया के विद्यार्थी छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग कर रहे हैं, जबकि AUD में कैंपस में आने-जाने की व्यवस्था और संस्थान से जुड़ी अन्य समस्याओं को लेकर विरोध हो रहा है।
तीनों विश्वविद्यालयों में आंदोलन के कारण अलग-अलग हैं, लेकिन छात्रों की मुख्य मांग है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी समस्याओं को सुने और उन पर ठोस कदम उठाए। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन ने कैंपस में अनुशासन, सुरक्षा और विरोध-प्रदर्शन के तरीके को लेकर अपनी चिंताएं भी जताई हैं।
JNU में छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर क्यों हैं?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) ने 3 अक्टूबर 2026 को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 20 अक्टूबर तक यह आंदोलन 16वें दिन में पहुंच गया था।
छात्रों ने कुल 13 मांगें रखी हैं। इनमें मुख्य मांग विश्वविद्यालय के मुख्य प्रॉक्टर कार्यालय (CPO) के उस मैनुअल को वापस लेने की है, जिसके नियमों को छात्र कैंपस में विरोध-प्रदर्शन पर जरूरत से ज्यादा पाबंदियां लगाने वाला बता रहे हैं। इसके अलावा, छात्र संघ पदाधिकारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द करने और विश्वविद्यालय की सुविधाओं में सुधार की मांग भी की जा रही है।
छात्रों की अन्य प्रमुख मांगों में यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्सुअल हैरेसमेंट (GSCASH) को फिर से बहाल करना, प्रस्तावित रोहित वेमुला कानून के तहत समान अवसर प्रकोष्ठ बनाना और भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच कराना शामिल है।
छात्र हॉस्टल, लाइब्रेरी, सड़कों और कैंपस की दूसरी सुविधाओं में सुधार के साथ हॉस्टल में आरक्षण से जुड़ी चिंताओं की समीक्षा तथा विश्वविद्यालय की अपनी प्रवेश परीक्षा फिर शुरू करने की मांग भी कर रहे हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि उसने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से बातचीत की है और भूख हड़ताल पर बैठे विद्यार्थियों की दिन में दो बार स्वास्थ्य जांच कराई जा रही है। प्रशासन ने सार्वजनिक संपत्ति को कथित नुकसान पहुंचाए जाने का मुद्दा भी उठाया है और अपनी अनुशासनात्मक कार्रवाई का बचाव किया है।
इस विवाद का मुख्य सवाल यह है कि क्या प्रशासन छात्रों की मांगों का पर्याप्त समाधान कर रहा है और क्या अनुशासन संबंधी नियम शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए पर्याप्त जगह देते हैं। लंबे समय से चल रही भूख हड़ताल ने प्रदर्शनकारी छात्रों की सेहत को लेकर भी चिंता बढ़ाई है।
JNU के छात्र CUET हटाकर अपनी प्रवेश परीक्षा क्यों चाहते हैं?
JNU में छात्रों की एक प्रमुख मांग विश्वविद्यालय की अपनी प्रवेश परीक्षा, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्जामिनेशन (JNUEE), को दोबारा शुरू करना है। पहले विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए इसी परीक्षा का इस्तेमाल होता था, लेकिन बाद में प्रवेश प्रक्रिया में कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) अपनाया गया।
CUET एक साझा प्रवेश परीक्षा है, जिसका इस्तेमाल इसमें भाग लेने वाले विश्वविद्यालय निर्धारित नियमों के तहत विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए करते हैं।
JNUEE को बहाल करने की मांग करने वाले छात्र चाहते हैं कि JNU अपनी जरूरतों के अनुसार विद्यार्थियों की शैक्षणिक क्षमता का आकलन कर सके। इस बहस का एक अहम पहलू यह है कि क्या एक ही प्रवेश परीक्षा अलग-अलग विश्वविद्यालयों और पाठ्यक्रमों की जरूरतों को समान रूप से पूरा कर सकती है।
साझा प्रवेश परीक्षा से विद्यार्थियों के लिए कई विश्वविद्यालयों में आवेदन की प्रक्रिया आसान हो सकती है। दूसरी ओर, किसी विश्वविद्यालय की अपनी परीक्षा उसे अपने पाठ्यक्रमों और शैक्षणिक जरूरतों के अनुरूप प्रश्न तैयार करने की सुविधा देती है।
इसलिए, CUET की उपयुक्तता पर सवाल उठाने वाली छात्रों की मांग को इस बात का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए कि साझा प्रवेश परीक्षा सभी विश्वविद्यालयों के लिए अनुपयुक्त है। किसी भी बदलाव पर विचार करते समय परीक्षा की गुणवत्ता, निष्पक्षता, आयोजन की लागत और सभी उम्मीदवारों को समान अवसर देने जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।
फिलहाल, छात्रों के विरोध का अर्थ यह नहीं है कि CUET रद्द कर दिया गया है या इसमें शामिल सभी विश्वविद्यालय इसे हटाने की मांग कर रहे हैं।
जामिया में छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग क्यों?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र विश्वविद्यालय के छात्र संघ को फिर से सक्रिय करने और चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। वर्ष 2006 में चुनाव बंद होने के बाद से विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव बहाल नहीं हुए हैं।
विद्यार्थियों का कहना है कि विश्वविद्यालय स्तर पर चुना गया छात्र संघ उनकी समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने और छात्र हितों का प्रतिनिधित्व करने में मदद कर सकता है। प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ की गई कार्रवाई वापस लेने की मांग भी उठाई गई है।
दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि कैंपस में हिंसा और कामकाज बाधित होने की घटनाओं के बाद छात्र संघ चुनाव बंद किए गए थे। प्रशासन के मुताबिक, विभागों में होने वाले विषय-आधारित छात्र संगठनों के चुनाव विद्यार्थियों को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं।
19 अक्टूबर 2026 को जामिया प्रशासन ने प्रदर्शनकारी छात्रों से बातचीत करने और उनकी मांगों की समीक्षा के लिए सात सदस्यीय समिति गठित की। विश्वविद्यालय ने कहा कि वह बातचीत के जरिए विवाद का समाधान चाहता है। हालांकि, समिति के गठन के समय छात्र संघ चुनाव बहाल करने का कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया था।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि समिति और छात्रों के बीच बातचीत से छात्र प्रतिनिधित्व तथा अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े मुद्दों पर कोई सहमति बन पाती है या नहीं।
अंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली में छात्र क्यों कर रहे हैं प्रदर्शन?
अंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली (AUD) में छात्रों ने 28 सितंबर 2026 को अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया था। उनकी प्रमुख मांगों में कैंपस का मुख्य गेट दोबारा खोलना, आने-जाने में बाधा डालने वाले अवरोध हटाना, शिक्षकों की नियुक्तियां बढ़ाना और बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना शामिल है।
छात्र पीएचडी की फीस में छूट बहाल करने और विश्वविद्यालय के निर्णय लेने वाली समितियों में विद्यार्थियों को प्रतिनिधित्व देने की मांग भी कर रहे हैं।
13 अक्टूबर को डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग के दौरान सुरक्षा कर्मचारियों के साथ हुए विवाद के बाद आंदोलन और तेज हो गया। इसके अगले दिन, 14 अक्टूबर को विश्वविद्यालय ने 11 छात्रों को निलंबित कर दिया, छात्रों के कैंपस में प्रवेश पर रोक लगाई और मामले को जांच के लिए भेज दिया।
विश्वविद्यालय प्रशासन का आरोप है कि छात्रों ने दुर्व्यवहार किया, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और कर्मचारियों के साथ झगड़ा किया। वहीं, छात्र प्रतिनिधियों ने निलंबन पर सवाल उठाते हुए आदेश वापस लेने की मांग की है।
इस विवाद में दो प्रमुख मुद्दे सामने आए हैं। पहला, कैंपस तक पहुंच, सुविधाओं और विश्वविद्यालय के फैसलों में छात्रों की भागीदारी को लेकर उनकी चिंताएं। दूसरा, अनुशासनहीनता के आरोपों की निष्पक्ष जांच करने की प्रशासन की जिम्मेदारी।
दोनों पक्षों के आरोपों की सच्चाई तय करने के लिए जांच प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों को देखना जरूरी है। जांच पूरी होने से पहले किसी भी आरोप को साबित हुआ तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
तीनों विश्वविद्यालयों के आंदोलनों में क्या समानता है?
JNU, जामिया और AUD में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों की वजह एक जैसी नहीं है। फिर भी, इनसे उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की भूमिका और विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही से जुड़े कुछ साझा मुद्दे सामने आते हैं।
छात्र प्रतिनिधित्व: विद्यार्थी चाहते हैं कि उनके पास निर्वाचित छात्र संघ या ऐसे औपचारिक मंच हों, जिनके जरिए वे विश्वविद्यालय के फैसलों पर अपनी राय रख सकें।
अनुशासनात्मक कार्रवाई: निलंबन, निष्कासन और कैंपस में प्रवेश पर रोक जैसे कदम छात्रों और प्रशासन के बीच विवाद का बड़ा कारण बने हैं। ऐसे मामलों में नियमों का स्पष्ट होना और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाना जरूरी है।
शैक्षणिक सुविधाएं: हॉस्टल, लाइब्रेरी, कैंपस का बुनियादी ढांचा और शिक्षकों की नियुक्ति जैसे मुद्दे विद्यार्थियों की पढ़ाई और विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल को सीधे प्रभावित करते हैं।
पारदर्शिता और बातचीत: छात्र चाहते हैं कि उनकी मांगों पर स्पष्ट जवाब दिया जाए। वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ कैंपस की सुरक्षा और पढ़ाई का सामान्य संचालन भी बनाए रखना होता है।
विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई करने की जगह नहीं हैं। वे विद्यार्थियों को सार्वजनिक जीवन में भाग लेने, अपनी असहमति व्यक्त करने और अलग-अलग विचारों के बीच संवाद के जरिए समाधान खोजने का अवसर भी देते हैं।
इसलिए, छात्र आंदोलनों से जुड़े मुद्दों का समाधान निकालते समय शैक्षणिक स्वतंत्रता, छात्रों के अधिकारों, सुरक्षा और संस्थागत नियमों के बीच संतुलन जरूरी है।




Add comment