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देश में क्यों बेहद ज़रूरी है ‘सेक्स एजुकेशन’

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चाइल्ट पोर्नोग्राफी पर फैसला सुनाते हुए सेक्स एजुकेशन के बारे में भी बात की। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के अश्लील वीडियो के अपराध पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार को समग्र रूप से यौन शिक्षा कार्यक्रम लागू करने का सुझाव दिया। कोर्ट ने कहा, ‘सेक्स एजुकेशन को वेस्टर्न कॉन्सेप्ट मानना गलत है। इससे युवाओं में अनैतिकता नहीं बढ़ती। इसलिए भारत में इसकी शिक्षा बेहद जरूरी है।’ 

कोर्ट ने कहा कि लोगों का मानना है कि सेक्स एजुकेशन भारतीय मूल्यों के खिलाफ है। इसी वजह से कई राज्यों में यौन शिक्षा को बैन कर दिया गया है। इसी विरोध की वजह से युवाओं को सटीक जानकारी नहीं मिलती। फिर वे इंटरनेट का सहारा लेते हैं, जहां अक्सर भ्रामक जानकारी मिलती है। सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें अश्लील वीडियो देखने और उसकी सामग्री रखने को पोक्सो और आइटी कानून में अपराध बताने वाले फैसले में कही।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने ये जरूर कहा है कि भारत में सेक्स एजुकेशन जरूरी है। लेकिन इससे पहले कई नेता इसका विरोध कर चुके हैं। डॉ हर्षवर्धन जो 2014 से 2019 के बीच भारत सरकार के हेल्थ मिनिस्टर रहे, उन्होंने कहा था कि भारत के स्कूलों में सेक्स एजुकेशन की जगह योग कराया जाना चाहिए। उन्होंने सेक्स एजुकेशन को बैन तक करने की मांग की थी। 2007 में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ये कहते हुए सेक्स एजुकेशन को प्रदेश में बैन कर दिया था कि इसका इंस्ट्रक्शन मैन्युअल टीचर्स के लिए अश्लील है। इसके अलावा BJP नेता प्रकाश जावडेकर और मुरली मनोहर जोशी भी सेक्स एजुकेशन का विरोध कर चुके हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई यौन शिक्षा देश में अस्वीकार्य अवधारणा है या फिर सेक्स एजुकेशन को देश में लागू करना बेहद ज़रूरी है जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है? इससे कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत में यौन शिक्षा को लेकर व्यापक भ्रम है। यहां तक कि बहुत से माता-पिता और शिक्षक भी इसे लेकर संकीर्ण नजरिया रखते हैं और सेक्स के बारे में बात करना अनुचित व अनैतिक समझते हैं।  एक भ्रम यह भी है कि सेक्स एजुकेशन से युवाओं का व्यवहार गैरजिम्मेदाराना और स्वेच्छाचारी हो जाएगा। आलोचना करने वाले अक्सर कहते हैं कि यौन स्वास्थ्य और कंट्रासेप्टिव के बारे में जानकारी देने से किशोरों में यौन गतिविधियां बढ़ जाएंगी। जबकि रिसर्च बताती है कि समग्र सेक्स एजुकेशन वास्तव में सेक्सुअल एक्टीविटी में देरी लाती है और जो लोग सेक्सुअली एक्टिव हैं, उन्हें सुरक्षित बनाती है। 

यह सोच कि सेक्स एजुकेशन पश्चिम की धारणा है और यह भारतीय पारंपारिक मूल्यों से मेल नहीं खाती, जिसकी ओर सुप्रीम कोर्ट ने भी इशारा किया है, बिलकुल समझ से परे है। इस सोच से कई राज्यों में स्कूलों में सेक्स एजुकेशन प्रतिबंधित हो गई। इस तरह का विरोध समग्र यौन स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू करने में बाधा है और इसके कारण बहुत से किशोर-किशोरियों को सही जानकारी नहीं मिल पाती। इसके चलते किशोर और युवा इंटरनेट की ओर मुखातिब होते हैं जहां उन्हें बिना निगरानी और बिना किसी फिल्टर के सूचना मिलती है, जो कई बार गलत होती है एवं अस्वास्थ्यकर व्यवहार का बीज बो सकती है।

यह भी एक गलत धारणा है कि सेक्स एजुकेशन सिर्फ संतानोत्पत्ति के बायोलाजिकल पहलू तक ही सीमित है। प्रभावी सेक्स एजुकेशन में व्यापक विषय शामिल होते हैं जिसमें स्वास्थ्य, रिलेशनशिप, सहमति, लिंग आधारित समानता और विविधिता का सम्मान शामिल होता है। लिंग आधारित समानता को बढ़ावा देने और यौन हिंसा को कम करने के लिए इन विषयों पर ध्यान देना जरूरी है। यानी बच्चों को स्कूल में सेक्स एजुकेशन बिल्कुल देनी चाहिए। हां, इस मामले में सुझाव-सलाह की हमेशा दरकार हो सकती है। 

मसलन, दिल्ली टीचर्स एसोसिएशन के चेयरमैन हंसराज सुमन का कहना है कि बच्चों को छोटी उम्र से सेक्स एजुकेशन देने से पहले उनके पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। हमारे पास कई ऐसे मामले आते हैं कि टीचर्स छोटे बच्चों को सेक्स एजुकेशन के बारे में बता रहे हैं। कई बार जब टीचर्स ने जब छोटे बच्चों को सेक्स एजुकेशन के बारे में बताया तो पेरेंट्स ने नाराज होकर स्कूल में खूब हंगामा किया जो बिल्कुल ठीक नहीं है। इसलिए पेरेंट्स को भी अवेयर करना जरूरी है।

साथ ही वह कहते हैं कि सेक्स एजुकेशन को लेकर पहले टीचर्स की ट्रेनिंग जरूरी है। स्कूलों में 9वीं-10वीं में बायोलॉजी की किताबों में रिप्रोडक्शन चैप्टर के जरिए बच्चों को पढ़ाया तो जाता है मगर ये सिर्फ एक सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ाया जाता है। सेक्स एजुकेशन 6वीं क्लास से बच्चों के लिए कंपलसरी होना चाहिए। क्योंकि ये वो उम्र होती है जब बच्चे नासमझ होते हैं लेकिन बड़े भी हो रहे होते हैं। ऐसे में उनके मन में कई तरह के सवाल भी होते हैं। अगर सेक्स को लेकर हम उनके सवालों का जवाब नहीं देंगे तो वो इंटरनेट या दूसरे माध्यमों के जरिए जवाब ढूंढने लगेंगे जो बिल्कुल ठीक नहीं है। बच्चों को अगर कंसेंट, गुड टच- बैड टच के बारे में पता होगा तो वो अपने साथ होने वाली गलत घटनाओं के बारे में जागरूक हो सकेंगे। साथ ही पेरेंट्स को भी इस बारे में बता पाएंगे।

गुड टच और बैड टच के बारे में बताया जाना भी एक तरह का सेक्स एजुकेशन ही है, जिसकी शुरुआत बचपन में ही सहजता के साथ अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाए कि बच्चों, किशोरों और नौजवानों के लिए सेक्स एजुकेशन की प्रक्रिया अलग-अलग होनी चाहिए। इसके कई लाभ उभर कर सामने आ सकते है जैसे कि छोटे बच्चों के साथ कोई यौन शोषण करने का प्रयास करेगा तो बच्चे बिना घबराएं इस संदर्भ में अपने अभिभावक, शिक्षक या अन्य को जानकारी देने में सक्षम हो जाएंगे।

एक फायदा यह भी हो सकता है कि बच्चों का गलत दिशा में भटकाव पर अंकुश लगेगा। कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आ रही है कि बच्चे मोबाइल और इंटरनेट का गलत इस्तेमाल कर पोर्न वीडियो देखते हैं। बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन बहुत जरूरी है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना जरूरी है कि हमारे देश की एक बड़ी आबादी गांव में बस्ती है। साथ ही देश की एक बड़ी आबादी अभी भी अशिक्षित है इसलिए सेक्स एजुकेशन से संबंधित जो भी सिलेबस तैयार किया जाए उसे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और अशिक्षित लोगों को भी ध्यान में रख कर किया जाए।

 

 

Asmita Sarkar

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