
‘कोचिंग फैक्टरी’ कहे जानेवाले राजस्थान के शहर कोटा की तस्वीर बदल रही है। कभी यह शहर भरदम गुलजार हुआ करता था। यहां सपने परवाज भरते थे। डॉक्टर-इंजीनियरिंग का ख्वाब पाले यहां आने वाले छात्रों की बड़ी तादाद से यहां की आबोहवा ही बदल गई थी। लेकिन अब यहां एक वीरानी पसरी नजर आती है। कोटा इस साल मायूस और सहमा हुआ है। वीरान हॉस्टलों के कमरे अपने नए दोस्तों का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन उनका इंतजार लम्बा होता जा रहा है। आंकड़ों की मानें तो इस साल 35 से 40 फीसदी छात्र यहां कम आए हैं। आखिर ऐसा क्यों? ये शहर तो भरबांह छात्रों का स्वागत किया करता था और छात्र भी यहां बड़ी संख्या में आया करते थे। अपने ख्वाबों के साथ। डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना लिए। पूरे भारत से यहां बच्चे एडमीशन के लिए आते थे। लेकिन, इस साल कुछ अलग है। सड़कें शांत हैं, कोचिंग सेंटरों में बहुत कम स्टूडेंट्स हैं, कई हॉस्टल खाली हैं और मेस मालिक अपना गुजारा चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां तक कि रियल एस्टेट का बिजनेस जो कभी तेजी से बढ़ रहा था वो भी धीमा पड़ रहा है— कोटा अब पहले जैसा नहीं रहा। आखिर अब इस कोटा में वो रौनक क्यों नहीं?
कोटा तो ऐसा न था। इस शहर ने हजारों की संख्या में इंजीनियर और डॉक्टर दिए। यहां के कोचिंग संस्थानों से पढ़े बच्चे प्रवेश परीक्षाओं में कई बार टॉपर बने। लेकिन बदलते वक्त के साथ यहांं की कोचिंग धीरे-धीरे फैक्टरियों में बदलती गईं और छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं भी उसी हिसाब से बढ़ गईं। जैसे कोटा इन घटनाओं का गवाह बना तो कोचिंग फैक्टरियों ने भी दूसरे शहरों का रुख करना शुरू कर दिया। इसका असर यहां दिखाई देने लगा है। जब बच्चों को अपने ही शहर में पढ़ाई के अच्छे अवसर मिलेंगे तो कोई कोटा क्यों आएगा। बीते कई सालों में कोचिंग फैक्ट्री के नाम से मशहूर इस शहर में उम्मीदों की बोझ ने छात्रों के सपनों को कुचल दिया है। फांसी के फंदों ने बच्चों की सांसों की डोर तोड़ दी है। बंद अंधेरे कमरों में बचपन सिसकता रहा, जिंदगी थमती रही, कोचिंग फैक्टरियां कभी न रुकीं और न डॉक्टर-इंजीनियरिंग का ख्वाब पाले छात्रों और अभिभावकों के कदम। लेकिन अब नजारा बदल गया है। कोटा कोचिंग फैक्टरी से सुसाइड शहर बना तो तस्वीर ही बदल गई।
कोटा के कोचिंग केंद्र बनने से जो इकोनॉमी साल 2022 में 6500 करोड़ के आसपास पहुंच गई थी, इसमें इस साल गिरावट होकर यह आधी रह गई है। इसका असर कोटा के आम नागरिक से लेकर हर व्यक्ति पर पड़ा है। साल 2022 में 2.5 लाख विद्यार्थी कोचिंग के लिए यहां आए थे। इससे फीस के जरिए कोचिंग संस्थानों को 2000 से 2500 करोड़ रुपए मिले थे। 2800 से 2900 करोड़ रुपये पीजी और मेस के जरिए आए। साथ ही दैनिक आवश्यकताओं की चीजों पर खर्च भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाती हैं। सीधे तौर पर एक से डेढ़ लाख लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन रोजगार मिलने की बात तो दूरए अब यहां लोगों की नौकरी जा रही है।
कोटा में छोटे-बड़े कोचिंग मिलाकर इनकी संख्या 20 के करीब है, जिनमें अनुमानित तौर पर 10 हजार से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि कोटा के सबसे बड़े कोचिंग संस्थान ने ही कर्मचारियों को निकालना शुरू कर दिया है। वहीं 10 से लेकर 30 प्रतिशत सैलरी भी कम कर दी। ये ही नहीं संसाधनों को भी सीमित किया जा रहा है। 250 से अधिक कर्मचारियों को सीधे तौर पर निकाल दिया गया है जिसमें फैकल्टी से लेकर, आॅफिस स्टॉफ व अन्य कर्मचारी शामिल हैं।
दरअसल, हाल के वर्षों में छात्रों की आत्महत्याओं में वृद्धि के कारण कोटा की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है, जिसने सीकर के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया है। 2015 से पहले, सीकर में केवल छह से सात कोचिंग संस्थान थे। आज, दो मोहल्लों में 20 से अधिक कोचिंग संस्थान हैं: पिपराली रोड और नवलगढ़ रोड। डीएस इंस्टीट्यूट, आकाश, एलन, सीएलसी, मैट्रिक्स और अनएकेडमी जैसे बड़े नामों ने सीकर में केंद्र स्थापित किए हैं, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और यहां तक कि पूर्वोत्तर से छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं। अपनी हवेलियों, किलों और खाटू श्याम मंदिर के लिए मशहूर सीकर शहर अब अपने शांत और पर्यटन वाली छवि को बदल रहा है। हालांकि, सीकर के निवासी और कोचिंग सेंटर संचालक कोटा की लेबलिंग अपने ऊपर नहीं चाहते हैं। वे ‘मिनी कोटा’ कहे जाने का विरोध करते हैं। सीकर की किस्मत चमकने के पीछे इस साल नीट का रिजल्ट है। यहां के कोचिंग संस्थानों से 700 से ज्यादा नंबर हासिल करने वाले छात्रों की संख्या करीब डेढ़ सौ रही। इसने इसे अचानक देशभर की नजरों में ला दिया है। नीट की सफलता के बाद अब हर कोई सीकर की ओर भाग रहा है।
बहरहाल, कोटा के हॉस्टलों का हाल भी बेहाल है। छात्र आधे से भी कम रह गये। कोटा में एक हॉस्टल संचालक का कहना है, ‘हर बार तीन से चार हॉस्टल चलाया करते थे। इसके साथ ही कुछ लीज पर भी लिया करते थे, लेकिन इस बार लीज का काम नहीं लिया क्योंकि बच्चे कम हैं और हॉस्टल पूरा लेना पड़ता है। एक हॉस्टल में 50 से 60 प्रतिशत बच्चे हैं। किराया भी 15 से 17 हजार प्रतिमाह था, वह भी 9 से 10 हजार रह गया है।’ पीजी में भी यही हाल है। जितने बच्चे आते थे, इस बार 40 प्रतिशत बच्चे कम आए हैं। मेस संचालकों को खर्चा निकालना भी भारी पड़ रहा है। जहां पहले एक मेस पर 200 बच्चे आते थे, वहां 100 से 120 के करीब आ रहे हैं। स्टॉफ का वेतन निकालना भारी पड़ रहा है। इस समय जो भी बच्चे पढ़ रहे हैं उन्हें साल का करीब दो लाख का फायदा हो रहा है। जो खर्च चार लाख पर था वह दो लाख पर आ गया है। वहीं दूसरी और कोचिंग संस्थान ने भी अपनी फीस को कम कर दी है।
कोटा हॉस्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष विमल मित्तल ने बताया कि पिछले साल यहां करीब पौने दो लाख बच्चे थे, इस बार एक लाख से कुछ अधिक हैं। कोरल पार्क में 23 हजार बच्चों के रहने की क्षमता है और वहां करीब 350 हॉस्टल हैं, लेकिन इस बार वहां केवल 7500 से 8 हजार बच्चे हैं। कोटा में कुल 4500 हॉस्टल और पीजी हैं, लेकिन इस बार आधे ही भरे हैं। लैंडमार्क सिटी और अन्य कोचिंग एरिया में छात्रों के ज्यादा रहने की वजह से दुकानों का किराया भी काफी ज्यादा था। इस एरिया के दुकानदारों को अच्छा टर्नओवर भी मिल रहा था लेकिन इस बार यहां भी गिरावट देखने को मिल रही है।
कोटा में वैसे तो कोचिंग का असर हर वर्ग पर पड़ रहा है, लेकिन जो सीधे तौर से जुड़े हुए हैं वह काफी प्रभावित हो रहे हैं। इसमें मुख्य रूप से वाहन चालक, रेस्टोरेंट, फल विक्रेता, केमिस्ट, स्टेशनरी, साइकिल, टी-स्टॉल, कपड़ों की दुकानें, फास्ट फूड, जनरल स्टोर, जूस सेंटर, हेयर सैलून, मोची, लाइब्रेरियन, जेरोक्स, मोबाइल रिपेयर, इलेक्ट्रोनिक आइटम, आॅप्टिकल शॉप, डॉक्टर, सब्जी विक्रेता, सफाईकर्मी, गार्ड, कुक, हाउस कीपिंग, आॅटो, ई-रिक्शा, धोबी, ऐसी, कूलर मेकेनिक, हेल्पर, मैकेनिक, सहित अन्य व्यापार पर सीधा असर पड़ रहा है।




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