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रैगिंग को रोकने के लिए क्या सख्त कानून ही काफी है?

अभी हाल ही में गुजरात से एक ह्रदय विदारक घटना सामने आयी है। यहां के पाटन ज़िले में एक मेडिकल कॉलेज में सीनियर छात्रों की रैगिंग के कारण 18 साल के एक एमबीबीएस छात्र की मौत हो गई। दरअसल, एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र अनिल मेठानिया को उसके सीनियरों ने रैगिंग के दौरान तीन घंटे तक खड़ा रखा। फिर उसे नचाया गया। इस निर्मम यातना से पीड़ित छात्र बेहोश होकर गिर पड़ा। उसे अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

रैगिंग के नाम पर यह हैवानियत देश के लिए एक गंभीर घटना है। यह व्यवहार उन लोगों ने किया, जिनके ऊपर दूसरों की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी आने वाली थी। दुखद है, कानूनी प्रतिबंध के बावजूद नए छात्रों के साथ रैगिंग का यह वीभत्स खेल चलता चला जा रहा है। ज्यादातर मेडिकल कॉलेज अमानवीय व्यवहार व मानसिक उत्पीड़न के संस्थान बन गए है। इन कॉलेजों में रैगिंग, उत्पीड़न, मानसिक असंतुलन, सनकीपन और असंतुलित व्यवहार के कारण शिक्षण और कौशल अर्जित करना केवल एक सब्जबाग है।

जाहिर है कि इस घटना के बाद रैगिंग को रोकने के लिए सख्त कानून की वकालत हो रही है और यह कोई नई बात नहीं है। जब भी ऐसी कोई घटना सामने आती है, लोग रैगिंग के खिलाफ बने कानून को सख्त करने की मांग करने लगते हैं, दोषियों को कठोरतम सजा देने की आवाज बुलंद की जाने लगती है। मगर क्या वाकई सख्त कानून से अपराध में कमी आती है? शायद नहीं। कारण, अगर ऐसा होता तो आज दहेज जैसी कुरीति इतिहास बन चुकी होती। देश में बलात्कार की घटनाओं में कमी आ गई होती। जाहिर है, जब दहेज हत्या और बलात्कार जैसा घिनौना अपराध हम कानूनी प्रावधानों से नहीं रोक सके, तो क्या रैगिंग रोकी जा सकती है?

रैगिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाने और कॉलेजों की लगातार निगरानी करने की आवश्यकता जरूर है, लेकिन साथ ही जन-जागरूकता भी जरुरी है। ऐसी घटनाओं को रोकना हर हाल में अब अनिवार्य है, अन्यथा, हम अनिल जैसी कई प्रतिभाओं को यूं ही खोते जाएंगे। रैगिंग की घटनाएं आये दिन यह काम कर रही हैं, लगातार। आमतौर पर रैगिंग सीनियर छात्रों के अहं की तुष्टि का उपक्रम होता है। वह एक तो अपनी हेकड़ी जमाना चाहता है और फिर अपने अहंकार को तुष्ट करना चाहता है। जाहिर है, जागरूकता से रैगिंग करने वाली मानसिकता हतोत्साहित होगी। ऐसे छात्रों पर कॉलेज के साथ-साथ समाज का भी दबाव पड़ेगा और वे किसी की रैगिंग करने से पहले सौ बार सोचेंगे। अगर उसे यह ख्याल आ जाए कि हेकड़ी जमाना या अहंकार जैसी भावनाओं का कॉलेज में कोई महत्व नहीं, तो फिर वह रैगिंग क्यों करेगा? 

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सख्त कानून की जरुरत नहीं है। केंद्र व राज्य सरकारों को इस मामले में कठोरतम कानून बनाना चाहिए। रैगिंग करने वाले छात्रों को सश्रम कारावास की लंबी और कठिनतम सजा सुनाई जानी चाहिए। साथ ही, संबंधित कॉलेज, वहां के प्रशासन को भी बराबर का जिम्मेदार मानकर कार्रवाई की जानी चाहिए। कॉलेज के सिस्टम पर नियंत्रण नहीं होने और अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा के चलते कानून का डंडा बेअसर साबित हो रहा है। रैगिंग करने वाले छात्रों को सख्त सजा मिलनी ही चाहिए। सख्ती इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश के कई राज्यों में रैगिंग के नाम पर हैवानियत की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। इसके कारण कई छात्र आज भी मानसिक रूप से पीड़ित दिख जाएंगे। इसलिए, रैगिंग के खिलाफ अब सख्त रुख अपनाना भी आवश्यक हो गया है। साथ ही जागरूकता भी ज़रूरी है। केवल कानूनी डंडे के ऐसी घटनाओं को रोकना संभव नहीं है। 

माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने रैगिंग पर पूर्ण प्रतिबंध का कानून लागू किया है, मगर देश में रैगिंग के बढ़ते मामलों से यह कानून मजाक बनता जा रहा हैै। शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग ने होने पाए, इसके लिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की तरफ से कई कदम उठाए गए हैं। वहीं, शैक्षिणिक संस्थानों में रैगिंग ने होने पाए इसको लेकर यूजीसी भी सख्त है। समय-समय पर यूजीसी की तरफ से रैगिंग रोकने के लिए गाइडलाइंस भी जारी की जाती रहती है। बावजूद इसके शैक्षणिक संस्थानों से आए दिन रैगिंग की खबरें आती रहती हैं। 

पिछले दिनों यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के अध्यक्ष प्रो. एम. जगदीश कुमार ने ही बताया था कि एक जनवरी 2023 से 28 अप्रैल 2024 तक अलग-अलग यूनिवर्सिटी और उच्च शिक्षा संस्थानों से छात्रों की रैगिंग को लेकर 1240 शिकायतें मिली हैं, जिनमें से 1113 (89.76%) का निपटारा किया गया है। प्रो. जगदीश का कहना है कि जैसे ही UGC की एंटी रैगिंग हेल्पलाइन पर कोई छात्र मदद मांगता है, केस को तुरंत संबंधित यूनिवर्सिटी और कॉलेज के साथ-साथ पुलिस को भी फॉरवर्ड किया जाता है। इसके बावजूद क्यों नहीं थम पा रही हैं ये घटनाएं ?
   
जब तक जागरूकता नहीं फैलेगी, रैगिंग जैसे किसी अपराध को रोक पाना मुश्किल है।जन-जागरूकता से किसी समस्या का किस तरह समाधान हो सकता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज अगर हम पोलियो या चेचक जैसी बीमारियों का उन्मूलन कर चुके हैं, तो इसकी बड़ी वजह जागरूकता अभियान है। जनसंख्या वृद्धि दर भी अब यदि बांध ली गई है, तो इसकी वजह कोई सख्त कानून नहीं, बल्कि जागरूकता ही है। समाज जितना जागरूक होगा, उतना ही वह अपराध या विकृत मानसिकता से दूर होता जाएगा। हमें इसी सोच को आगे बढ़ाना होगा और छात्रों के बीच जागरूकता अभियान चलाकर उनको सचेत करना होगा। ऐसा करने से ही रैगिंग की घटनाएं रुक सकेंगी, वरना कानून हम चाहे जितना भी सख्त बना लें, देश में यह अपराध होता ही रहेगा।

 

Asmita Sarkar

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