
कोटा। राजस्थान का एक शहर। शिक्षा के मंदिर के रूप में इसकी एक पहचान रही है। यह पहचान यहाँ के कोचिंग संस्थानों की वजह से बनी जहाँ स्वप्न, संघर्ष और सफलता साथ-साथ परवान चढ़ते रहे। संघर्ष इस शहर के मिजाज़ में रहा है और तभी सफलता के स्वप्न लिए हज़ारों-लाखों छात्र यहां हर साल अपनी आमद दर्ज कराते रहे। इस शहर ने उन्हें निराश भी नहीं किया। उनके सपनों को हकीकत के धरातल पर उतरने में सहायक ही बनता रहा यह शहर। जाहिर है कि संघर्ष के मिजाज़ वाले इस शहर में शिक्षक भी संघर्षशील रहे और विद्या का अर्जन करने की सोच रखने वाले विद्यार्थी भी। न शिक्षक पढ़ाते हुए थके, न विद्यार्थी पढ़ते हुए। शिक्षा के प्रति दोनों पक्ष की सकारात्मक सोच यही रही कि जितना बड़ा संघर्ष होगा, उतनी बड़ी सफलता होगी। यही वजह है कि संघर्ष से सफलता अर्जित करना इस शहर की आबोहवा में एक सामान्य प्रक्रिया बन गयी।
वह 90 का दशक था। शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक सभी संघर्ष के इस सच को स्वीकार कर रहे थे। यह समझ रहे थे कि संघर्ष पीड़ा नहीं, सफलता की सोपान है। यही वजह है कि पढ़ाई के दौरान कड़ी मेहनत एक सामान्य प्रक्रिया बनी रही। क्लासरूम-स्टडी, सेल्फ-स्टडी, डाउट-रिमूवल, माइनर-मेजर टेस्ट, टेस्ट पेपर डिस्कशन और फिर बैच-रीशफलिंग, सब अनवरत चलते रहे। विषय-वस्तु पर खूब तार्किक-संवाद हुआ, हजारों-हजार प्रश्न हल किए गए, प्रश्नों को हल करने के एक से अधिक तरीकों पर चर्चा की गई, कम समय में प्रश्नों को कैसे हल किया जाए- इसके लिए शिक्षक अपने प्रयासों को विद्यार्थियों से निरंतर बांटते रहे। इस चर्चा के दौर में लेकिन सुविधाओं की चर्चा किसी ने नहीं की, न शिक्षकों ने और न ही विद्यार्थियों और अभिभावकों ने। कोई गिला नहीं, कोई शिकायत नहीं। सिर्फ संघर्ष और स्वप्न को सफलता में बदलने की सोच।
यह वह समय था जब कोटा के कोचिंग सिस्टम में दाखिल होना ही सौभाग्य था। जिस भी छात्र में संघर्ष का माद्दा होता, उसे इस शहर के कोचिंग सिस्टम में प्रवेश मिल जाता। जिनके लिए यहाँ आना मौज-मस्ती का या ‘अफोर्ड’ करने का पर्याय होता, उन्हें अक्सर निराशा हाथ लगती। कारण उनमें संघर्ष की भावना नहीं होती, सुविधाओं को खरीदने का हौसला ही होता। सभी को यह समझ थी कि कोटा की आबोहवा एक संघर्षशील शिक्षा-प्रणाली की है, यह स्वप्न, संघर्ष और सफलता का शहर है, मौज-मस्ती का नहीं! वर्षों तक ‘संघर्ष से सफलता’ का यह सफर अनवरत रहा, सतत रहा।
विशेष बात यह रही कि कोचिंग-संस्थानों के मालिक अधिकाँश स्वयं उच्च कोटि के अत्यंत ऊर्जावान एवं समर्पित शिक्षक थे। वे लगातार प्रतिदिन 4-5 बैच पढ़ाते थे, विद्यार्थियों से उनका सीधा संवाद था और संवाद में सिर्फ शिक्षा थी, और कुछ नहीं। तब कोटा का कोचिंग व्यवसाय नहीं था। एक साधना थी। लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आता गया। बदलाव का दायरा इतना बढ़ा कि सुविधा-भोगी मानसिकता ने संघर्ष-क्षमता को समाप्त कर दिया। सफलता ने किनारा कर लिया और फिर प्रारंभ हुआ खरीद फरोख्त का दौर!
इंजीनियरिंग तथा मेडिकल प्रवेश परीक्षा में क्लासरूम स्टूडेंट्स की सफलता ने कोटा को शिक्षा की काशी बना दिया। विद्यार्थियों की संख्या में अचानक से बेतहाशा बढ़ोतरी हुई और फिर शिक्षा में व्यावसायिकता प्रवेश कर गई! अधिक से अधिक विद्यार्थियों का प्रवेश ही एकमात्र उद्देश्य बनता गया। अब शिक्षा में गुणवत्ता गौण होती जा रही थी और एकमात्र उद्देश्य था, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों को येन-केन-प्रकारेण प्रभावित करना, अधिक सुविधाएं देकर आकर्षित करना।
आकर्षण के इस दौर में विद्यार्थी एवं अभिभावक शैक्षणिक-वास्तविकता से दूर होकर सुविधाओं एवं मनोरंजन की आभासी दुनिया की ओर बढ़ने लगे। इस आभासी दुनिया ने विद्यार्थी के स्टडी-रूम को होटल रूम में परिवर्तित कर दिया। अब चर्चाओं में शैक्षणिक-गुणवत्ता समाप्त हो चुकी थी और भौतिक-संसाधन अपनी कुंडली मारकर बैठ चुके थे। शैक्षणिक-संघर्ष रूपी अमृत, शैक्षणिक तनाव रूपी विष में परिवर्तित होना प्रारंभ हो गया।
विद्यार्थी भी अब शैक्षणिक-तनाव के नाम पर भांति-भांति के बहाने बनाने की कला में पारंगत हो चुके थे। कोचिंग कर्मियों, हॉस्टल कर्मियों एवं तथाकथित शिक्षकों में अब आभासी विद्यार्थी-हितैषी बनने की प्रवृत्ति जागने लगी। विद्यार्थी-हितैषी होने के इस आडंबर से विद्यार्थी में विद्यार्थियों के गुण ही समाप्त होने लगे। विद्यार्थी सिर्फ अब गृह-त्यागी थे और शैक्षणिक सफलता हेतु आवश्यक संघर्ष से कोसों दूर। कोटा के कोचिंग कल्चर में इस बदलाव ने ही शिक्षा के काशी की पहचान बदल दी।
आज कोटा में वह आबोहवा नहीं दिखती, जो कभी हर कोई महसूस करता था। संघर्ष इसकी शिराओं से गायब होता जा रहा है। उसकी धमनियों में रक्त तो बह रहा है मगर उसमें संघर्ष का पुट नहीं। बस सपने हैं, सफलता की चाह भी, मगर संघर्ष का माद्दा नहीं। तभी सफलता का आंकड़ा लड़खड़ा रहा है। और जब सफलता नहीं तो शिनाख्त पर संकट आना स्वाभाविक है। पहचान ख़त्म हो रही है कोटा की। उसकी जगह अब अन्य शहर इस दौड़ में शामिल हो चुके हैं। अपनी पहचान बना भी ली है। संघर्ष के बूते ही।
‘कोचिंग फैक्टरी’ कहे जानेवाले राजस्थान के शहर कोटा की तस्वीर बदल रही है। कभी यह शहर भरदम गुलजार हुआ करता था। यहां सपने परवाज भरते थे। डॉक्टर-इंजीनियरिंग का ख्वाब पाले यहां आने वाले छात्रों की बड़ी तादाद से यहां की आबोहवा ही बदल गई थी। लेकिन अब यहां एक वीरानी पसरी नजर आती है। कोटा इस साल मायूस और सहमा हुआ है। वीरान हॉस्टलों के कमरे अपने नए दोस्तों का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन उनका इंतजार लम्बा होता जा रहा है। आंकड़ों की मानें तो इस साल 35 से 40 फीसदी छात्र यहां कम आए हैं।
कोटा के कोचिंग केंद्र बनने से जो इकोनॉमी साल 2022 में 6500 करोड़ के आसपास पहुंच गई थी, इसमें इस साल गिरावट होकर यह आधी रह गई है। इसका असर कोटा के आम नागरिक से लेकर हर व्यक्ति पर पड़ा है। साल 2022 में 2.5 लाख विद्यार्थी कोचिंग के लिए यहां आए थे। इससे फीस के जरिए कोचिंग संस्थानों को 2000 से 2500 करोड़ रुपए मिले थे। 2800 से 2900 करोड़ रुपये पीजी और मेस के जरिए आए। साथ ही दैनिक आवश्यकताओं की चीजों पर खर्च भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाती हैं। सीधे तौर पर एक से डेढ़ लाख लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन रोजगार मिलने की बात तो दूर, अब यहां लोगों की नौकरी जा रही है। असर हर वर्ग पर पड़ रहा है, लेकिन जो सीधे तौर से जुड़े हुए हैं वह काफी प्रभावित हो रहे हैं।
ऐसे में फिर से आवश्यकता है कि विद्यार्थी शैक्षणिक संघर्ष की राह पकड़ें, संघर्ष को पीड़ा समझने की मानसिकता को त्यागें क्योंकि संघर्ष के बिना सफलता संभव नहीं और हां, संघर्ष जितना अधिक होगा सफलता उतनी बड़ी होगी ही।




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