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रोजगार वृद्धि के बिना बेमानी है आर्थिक विकास

इन दिनों भारत अपनी जीडीपी दर के हिसाब से आर्थिक तरक्की के बेहतरीन सोपान पर है। भारत विश्व में सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था है। पर, यह भी सच है कि लगातार अच्छी विकास दर रहने के बावजूद भारत में रोजगार सृजन बहुत कम है।आर्थिक विश्लेषण में जब भारतीय अर्थव्यवस्था पर रोजगार विहीन विकास का सेहरा बांधा जाता है, तो यह आम आदमी को बहुत अचंभित करता है।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आइएलओ की पिछले दिनों भारत में रोजगार संबंधी रपट में बताया गया है कि वर्ष 2000 से लेकर अब तक भारत में कुल श्रम संख्या 17 करोड़ बढ़ी है, तो वहीं बेरोजगारों की संख्या 92 लाख से बढ़कर  ढाई करोड़ से भी अधिक हो गई है। यानी पिछले तेईस-चौबीस वर्षों में भारत में बेरोजगारी की दर दोगुनी से अधिक हो गई है। भारत के एक तिहाई युवा न तो पढ़ाई कर रहे हैं और न ही काम कर रहे हैं। 40 प्रतिशत कामकाजी उम्र के व्यक्ति श्रम बाजार से विमुख हैं। यह रोजगार की चुनौती के लगातार गंभीर होने का प्रमाण है। 

इतना ही नहीं, भारत में इस समय अल्प-बेरोजगारी की दर बेरोजगारी की दर से भी  अधिक है। भारत में प्रतिदिन का कार्य औसतन आठ घंटे के हिसाब से निश्चित है। पर वर्तमान समय में भारत की आबादी के एक बड़े तबके को प्रतिदिन के हिसाब से अत्यंत कम समय के लिए रोजगार उपलब्ध हो रहा है। कोई व्यक्ति पांच घंटे के लिए रोजगार कर रहा है, तो कोई तीन घंटे के लिए या कोई उससे भी कम समय के लिए।इसके चलते ऐसे व्यक्तियों की प्रतिदिन की आय बहुत कम है, पर उन्हें रोजगार उपलब्ध है। भारत में कुल श्रम संख्या का पचास से पचपन फीसद तक हिस्सा रोजगार के लिए खुद के प्रयासों पर निर्भर है, जिन्हें स्वरोजगार की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे में देश में रोज़गार की स्थिति क्या है, आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रपट के अनुसार भारत में नियमित रोजगारों के अंतर्गत व्यक्तियों का फीसद वर्ष 2019 तक लगातार बढ़ा है, पर उसके बाद इसमें गिरावट देखी गई है। आइएलओ का यह विश्लेषण भारत में बेरोजगारी की विकट स्थितियों को स्पष्ट करता है, क्योंकि पचास फीसद से अधिक तबका असंगठित क्षेत्र में स्वरोजगार की श्रेणी में है और तकरीबन 25 फीसद लोग अपना जीवन यापन नियमित रोजगार के माध्यम से कर रहे हैं। यानी देश के 75 फीसद लोगों के जीवन में रोजगार तो है, लेकिन रोजगार में स्थायित्व की कमी है।

वैश्विक अनुभव बताते हैं कि रोजगार वृद्धि के बिना आर्थिक विकास सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का कारण बन सकता है। यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सुलझाया न जा सके और समस्या का ईमानदारी से वर्णन करना शमन उपायों के लिए एक अच्छी शुरुआत होगी। शिक्षा और आय से आंकी जाने वाली श्रम की गुणवत्ता दिखाती है कि तमाम श्रम गहन उद्योगों में बहुत मामूली सुधार हुआ है। ऐसे में चिंता केवल रोजगार के अवसर तैयार करने की नहीं बल्कि यह भी है कि रोजगार के अवसर कहां पैदा किए जा रहे हैं और कुल उत्पादन में श्रमिकों को कितना हिस्सा मिल रहा है।

श्रम ब्यूरो के सर्वेक्षण में पाया गया कि आठ सबसे बड़े रोजगार सृजन क्षेत्रों-कपड़ा, चमड़ा, धातु, ऑटोमोबाइल, रत्न एवं आभूषण, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी और हथकरघा क्षेत्र में नौकरियां घट रही हैं। हालांकि सरकार जादुई तरीके से स्थिति को बदल नहीं सकती, लेकिन वह समाधान के बारे में विचार कर सकती है। रोजगार सृजन के लिए सरकार को और ज्यादा प्रयास करने चाहिए। नीति आयोग ने  निर्यात बढ़ाकर रोजगार सृजन पर जोर देने के लिए एक विशेषज्ञ कार्यबल का गठन किया है। 

भारत की अर्थव्यवस्था को नब्बे के दशक के बाद से सेवा क्षेत्र द्वारा संचालित किया जा रहा है। आज सेवा क्षेत्र भारत में तकरीबन 55 फीसद के आसपास जीडीपी में अंशदान देता है, लेकिन रोजगार में इसका अंशदान तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। आज भी भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा रोजगार के लिए कृषि पर ही निर्भर है। चर्चा है कि अगर भारत की अर्थव्यवस्था पांच लाख करोड़ डालर की हो जाएगी तो बेरोजगारी आधी रह जाएगी। यह जमीनी हकीकत से बहुत दूर दिखता है। अब आर्थिक नीतियों में कृषि, विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र में रोजगार के मद्देनजर नए सुधारों की जरूरत है। 

गौरतलब है कि रोजगार से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। कृषि उत्पादन का औद्योगीकरण करने के लिए, सरकार को अधिक रोजगार पैदा करने और किसानों पर बोझ कम करने के लिए अधिक सार्वजनिक और सहकारी निवेश पर विचार करना चाहिए। भारत की रोजगार चुनौती के लिए एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। संरचनात्मक मुद्दों को हल करके, कौशल विकास को बढ़ावा देकर, समावेशी विकास को बढ़ावा देकर और सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ करके भारत आर्थिक विकास एवं गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन के बीच के अंतर को कम कर सकता है। इससे न केवल समान विकास सुनिश्चित होगा बल्कि भारत मानव पूंजी विकास में वैश्विक नेतृत्वकर्त्ता के रूप में भी स्थापित होगा। देश में सामाजिक और आर्थिक नीति निर्माण के लिए रोजगार सृजन को धुरी बनाया जाना चाहिए।

 

Asmita Sarkar

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