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स्मार्ट क्लासेज के दौर में कैसे होगा देशी शिक्षा का कल्याण?

कहते हैं कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं। कक्षाएँ प्रशिक्षण केंद्र हैं जहाँ लोग इन हथियारों का उपयोग करना सीखते हैं। ज्ञान सफलता की कुंजी है, और इसे प्राप्त करने के लिए कक्षाएँ आवश्यक हैं। कक्षा एक ऐसा कमरा है जो अच्छे और सकारात्मक वाइब्स से भरा होता है, जो आपको वह सारी आवश्यक जानकारी प्राप्त करने में मदद करता है जिसकी आपको आवश्यकता होगी। सिर्फ़ तथ्य और डेटा ही नहीं, एक कक्षा वह जगह है जहाँ आप व्यक्तित्व विकास से गुजरते हैं और उत्पादक और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति बनते हैं।

भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में एक लंबा सफर तय किया है। प्राचीन काल के गुरुकुल से आज देश के ज्यादातर बड़े शहरों में स्मार्ट क्लासेज ऑनलाइन शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर भारतीय शिक्षा प्रणाली पिछड़ती ही नजर आ रही है। यह भी सच है कि हाल के दशकों में देश के आर्थिक, सामाजिक व अन्य क्षेत्रों में ढांचागत एवं नीतिगत स्तर पर काफी प्रगति हई है। इसके फलस्वरुप देश की विकास दर तेजी से बढ़ी है। इस बढ़ती विकास दर ने अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधारों को गति प्रदान की है, लेकिन इन परिवर्तनों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं को दूर नहीं किया है।

इनमें स्कूलों तक पहुंच, गुणवत्ता और समानता की समस्याएं शामिल हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्कूली अधोसंरचना, नवीनतम तकनीक, औसत शिक्षक, शिक्षक प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम विकास में सुधार की आवश्यकता 21वीं सदी के भारत के लिए आवश्यकता हो गई है।

भारत और अमेरिका में शिक्षा प्रणालियों को लेकर बहस दशकों से चल रही है। कई लोग तर्क देते हैं कि भारतीय शिक्षा प्रणाली पिछड़ रही है। इसकी अक्सर कठोर होने और रटने पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए आलोचना की जाती है। दूसरी तरफ, रचनात्मकता और व्यावहारिक शिक्षा पर जोर देने के कारण अमेरिकी शिक्षा प्रणाली को अक्सर श्रेष्ठ माना जाता है, हालांकि कोई भी प्रणाली अपनी खामियों के बगैर नहीं आती है। दोनों देशों को अद्वितीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उनकी प्रणालियां सांस्कृतिक संरचनात्मक मतभेद दर्शाती हैं, जिनका छात्रों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

भारत और अमेरिका में शिक्षा की मूलभूत संरचना में एक महत्वपूर्ण अंतर है। भारत ने हाल ही में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की शुरुआत के साथ अपनी स्कूल प्रणाली में बदलाव किया है। इस नए ढांचे ने पारंपरिक 10+2 प्रणाली को 5+3+3+4 मॉडल से बदल दिया है। फाउंडेशन चरण 3 से 8 वर्ष की आयु तक फैला है और इसमें प्रीस्कूल और प्रारंभिक प्राथमिक ग्रेड शामिल हैं, जो खेल- आधारित और गतिविधि-केंद्रित शिक्षा को बढ़ावा देते हैं।

इसके बाद प्रारंभिक चरण (आयु 8-11) है, जिसमें भाषा और बुनियादी कौशल पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। मध्य चरण (उम्र 11-14) छात्रों को अनुभवात्मक शिक्षा के माध्यम से अधिक विविध विषयों में स्थानांतरित करता है, जबकि माध्यमिक चरण (उम्र 14-18) विभिन्न विषयों में गहन अध्ययन प्रदान करता है। इसके विपरीत अमेरिका एक सरल त्रि-स्तरीय मॉडल को फॉलो करता है। प्राथमिक विद्यालय (उम्र 5-10), मध्य विद्यालय (उम्र 11-13) और हाई स्कूल (उम्र 14-18). अमेरिकी प्रणाली पूरे देश में अपेक्षाकृत सुसंगत है, जो विषयों में क्रमिक प्रगति तथा कौशल विकास पर जोर देती है। कुछ लोग इसे ही प्लस प्वाइंट मानते हैं।

शिक्षा और शोध को नई दिशा देने के लिए सरकार ने वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन यानी ‘एक राष्ट्र, एक सदस्यता’ योजना शुरू की, जो छात्रों और शोधकर्ताओं को राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षिक जर्नल्स, ई-बुक्स और शोध डेटाबेस तक पहुंच प्रदान करेगी। इस योजना के तहत 6,000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है, जो देशभर के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के लिए एक डिजिटल क्रांति साबित हो सकता है।

पीएम विद्या लक्ष्मी योजना का लक्ष्य मेधावी क्षात्रों के लिए वित्तीय बोझ को कम करना था। यह योजना विशेष रूप से उन छात्रों के लिए है, जो देश के 860 प्रमुख संस्थानों में दाखिला लेते हैं. इस योजना के तहत छात्रों को न्यूनतम ब्याज दरों पर शिक्षा ऋण मिलेंगे, सरकार ने इस योजना के लिए अगले सात सालों में 3,600 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, जिससे हर साल 22 लाख से अधिक छात्रों को लाभ होगा।

 

 

Asmita Sarkar

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