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कैसे फोरेंसिक साइंस ने बदल दिए अपराधों की जांच के तरीके

फोरेंसिक साइंस, अपराधों की जांच और साक्ष्य के वैज्ञानिक विश्लेषण का अध्ययन है। इसका इतिहास सदियों पुराना है और यह समय के साथ विकसित होते हुए एक अत्यधिक परिष्कृत और बहुप्रभावी विज्ञान बन चुका है। आइए इसके विकास को विस्तार से समझें।

प्रारंभिक युग: प्रारंभिक जड़ें
प्राचीन काल (लगभग 700 ईसा पूर्व)
सबसे पुराने फोरेंसिक प्रयोगों में से एक चीन के “हिस्ट्री ऑफ सॉन्ग” (1248 ईस्वी) से मिलता है, जिसमें हत्या के मामलों की जांच का वर्णन किया गया है। चीन में पहली बार “फिंगरप्रिंट” के उपयोग का उल्लेख हुआ। यह पहचान के लिए प्रयोग में लाया गया, हालांकि इसका वैज्ञानिक आधार उस समय स्थापित नहीं था।

16वीं शताब्दी
यूरोप में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने शव परीक्षण और पोस्टमार्टम का उपयोग करना शुरू किया। इतालवी चिकित्सक फोर्टुनाटो फिडेलिस और पार्सिया ने शरीर की शारीरिक संरचना और मृत्यु के कारणों की जांच को संगठित रूप दिया।

17वीं और 18वीं शताब्दी: वैज्ञानिक प्रगति का आरंभ
1670: माइक्रोस्कोप का आविष्कार रॉबर्ट हुक और एंटनी वॉन ल्यूवेनहुक द्वारा किया गया, जिसने सूक्ष्म साक्ष्यों की पहचान में मदद की।
1784: इंग्लैंड में, गोलियों की जांच के माध्यम से पहली बार एक संदिग्ध को दोषी ठहराया गया।

19वीं शताब्दी: आधुनिक फोरेंसिक का आरंभ
फिंगरप्रिंट विश्लेषण
1892 में, फ्रांसिस गाल्टन ने पहली बार फिंगरप्रिंट की पहचान प्रणाली का वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किया। भारत में, सर विलियम हर्शल ने फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल अनुबंधों की प्रामाणिकता के लिए किया।

बैलिस्टिक और फोरेंसिक टोपी
गोलियों और हथियारों के विश्लेषण का आरंभ हुआ। क्रॉस-मैचिंग तकनीकें विकसित हुईं।

फॉरेंसिक टोमैटोलॉजी (दंत चिकित्सा)
19वीं शताब्दी में पहली बार दांतों की जांच का उपयोग पहचान के लिए किया गया।

20वीं शताब्दी: तकनीकी क्रांति और विकास
डीएनए फोरेंसिक का आरंभ
1984 में, सर एलेक जेफ्रीस ने डीएनए फिंगरप्रिंटिंग की खोज की। यह फोरेंसिक साइंस के इतिहास में क्रांतिकारी बदलाव था। 1987 में पहली बार डीएनए साक्ष्य का उपयोग एक अपराध मामले में किया गया।

अदालती विज्ञान का संस्थानीकरण
फॉरेंसिक लैब की स्थापना विभिन्न देशों में हुई। 20वीं शताब्दी में अपराध स्थलों से साक्ष्य इकट्ठा करने के मानक विकसित हुए।

डिजिटल फोरेंसिक
1980 और 1990 के दशक में, कंप्यूटर और इंटरनेट के प्रसार के साथ डिजिटल अपराध बढ़े। डिजिटल डेटा की जांच के लिए नई तकनीकें विकसित की गईं।

21वीं शताब्दी: आधुनिक फोरेंसिक साइंस
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग
AI और मशीन लर्निंग का उपयोग डेटा विश्लेषण, चेहरे की पहचान, और अपराध स्थल की पुनर्निर्मिति के लिए हो रहा है।

बायोमेट्रिक्स और फेशियल रिकग्निशन
आंखों, आवाज़, और चेहरे की विशेषताओं का विश्लेषण उन्नत हो गया है।

फॉरेंसिक साइबर सिक्योरिटी
साइबर अपराधों की जांच में नई विधियां विकसित हो रही हैं।

भारत में फोरेंसिक साइंस का विकास
शुरुआती दौर
भारत में फिंगरप्रिंट ब्यूरो की स्थापना 1897 में कोलकाता में हुई, जो दुनिया में अपनी तरह का पहला था।

सीबीआई और फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं
केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL) और राज्य स्तरीय प्रयोगशालाओं की स्थापना हुई। डीएनए और फिंगरप्रिंट विश्लेषण में भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की।

फोरेंसिक साइंस ने अपराधों की जांच के तरीके को बदल दिया है। यह विज्ञान की नई शाखाओं, तकनीकी प्रगति, और आपराधिक न्याय प्रणाली में एक अभिन्न अंग बन चुका है। इसके इतिहास और विकास को समझना न केवल इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित करता है, बल्कि यह दिखाता है कि विज्ञान किस तरह से समाज के लिए उपयोगी हो सकता है।  

Asmita Sarkar

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