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रिश्तों की गहराइयों को छूती बमन ईरानी की ‘द मेहता बॉयज’

कला, रचनात्मकता और सिनेमा की कोई उम्र नहीं होती, और 65 साल के बमन ईरानी ने इसे अपनी पहली निर्देशित फिल्म ‘द मेहता बॉयज’ के जरिए साबित कर दिया है। बमन ने इस फिल्म का निर्देशन किया है और उनके सह-लेखक हैं ऑस्कर विजेता एलेक्स डाइनलारिस, जिन्होंने ‘बर्डमैन’ के लिए अकादमी पुरस्कार जीता था। यह फिल्म बाप-बेटे के जटिल रिश्तों की कहानी को नए सिरे से बयां करती है, जिसमें भावनाओं की ठंडक, संवादहीनता और समय के साथ जुड़ने की कोशिशें दिखाई देती हैं।

फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाले एक नक्शानवीस के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने हुनर को लेकर संदेह में रहता है। उसकी दोस्त उसे समझाने की कोशिश करती है कि औसत लोगों की इस दुनिया में उसका टैलेंट फिर भी दूसरों से बेहतर है। लेकिन इसी बीच उसकी मां का निधन हो जाता है। बेटा अमेरिका से लौटता है, बहन पहले ही आ चुकी होती है। इस दुखद मौके पर घर में पिता और बेटे के बीच संवाद की कमी और दूरी साफ नजर आती है। दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन इसे व्यक्त नहीं कर पाते। जब बेटा घर छोड़कर वापस जाने लगता है, तो पिता उसके पास तक आता तो है, लेकिन गले लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। रिश्तों की यह जमी हुई बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है, जब बेटा अपने छोटे से कमरे में अपने पिता के हाथ की बनी गर्म नूडल्स खाता है और दोनों साथ में चार्ली चैपलिन की फिल्म देखकर हंसते हैं। यह पहली बार होता है जब बेटा अपने पिता के साथ खुलकर हंसता है, और यहीं से उनके रिश्ते की नई शुरुआत होती है।

फिल्म ‘द मेहता बॉयज’ एक ऐसी भावनात्मक यात्रा है, जो पिता-पुत्र के जटिल रिश्तों की उलझनों को सुलझाने की कोशिश करती है। अक्सर बाप-बेटे का रिश्ता दुनिया का सबसे कठिन रिश्ता होता है। पिता चाहता है कि बेटा उसकी सोच के अनुसार आगे बढ़े, लेकिन बेटा अपनी पहचान खुद बनाना चाहता है। इस संघर्ष में संवाद की कमी रिश्तों को और जटिल बना देती है। फिल्म इस रिश्ते के ठोस पहलुओं को बेहद सहजता से दिखाती है, जिससे यह आम बायोपिक या ठेठ कमर्शियल फिल्मों से अलग नजर आती है।

बमन ईरानी ने अपने पूरे करियर में बेहतरीन किरदार निभाए हैं, लेकिन निर्देशन में उनका पहला प्रयास भी उतना ही प्रभावी साबित हुआ है। पारसी परिवारों की उनकी गहरी समझ फिल्म में झलकती है, जिसमें रिश्तों की गहराइयों को बेहद स्वाभाविक तरीके से दिखाया गया है। यह देखना दिलचस्प है कि उन्होंने इतने वर्षों तक निर्देशन की ओर कदम क्यों नहीं बढ़ाया। ‘द मेहता बॉयज’ कोई टिपिकल मसाला फिल्म नहीं है, शायद यही वजह है कि यह सिनेमाघरों तक नहीं पहुंची और सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई। लेकिन इससे पहले गोवा फिल्म फेस्टिवल में इसे जबरदस्त सराहना मिली थी। अब जब इसे घर पर देखा जा सकता है, तो दर्शकों को भी यह फिल्म दिल को छू लेने वाली लगेगी।

फिल्म में बमन ईरानी न केवल निर्देशन और लेखन बल्कि अभिनय में भी शानदार रहे हैं। उनका अभिनय हमेशा से बिना किसी नाटकीयता के गहराई लिए होता है, जो उन्हें बेहतरीन अभिनेता बनाता है। उनके साथ बेटे के किरदार में अविनाश तिवारी नजर आते हैं, जो कई दृश्यों में मनोज बाजपेयी की झलक देते हैं। उनकी अभिनय क्षमता कमाल की है और अगर वह खुद को स्टार बनने की दौड़ से दूर रख पाए, तो लंबे समय तक बेहतरीन कलाकार बने रह सकते हैं। फिल्म का एक यादगार दृश्य तब आता है, जब बेटा अपने पिता को घर पर न पाकर उसकी तलाश में निकलता है और कमर तक भरे पानी में उसे सामान लाते देखता है। यह दृश्य रिश्तों की जटिलता और परस्पर प्रेम को खूबसूरती से उकेरता है।

फिल्म में श्रेया चौधरी ने शानदार परफॉर्मेंस दी है, जो न सिर्फ हीरो के आत्मविश्वास को बढ़ाने में मदद करती है, बल्कि पिता-पुत्र के बीच एक पुल भी बनने की कोशिश करती है। उनकी सहजता और अभिनय की ईमानदारी दर्शकों को प्रभावित करती है। वहीं, पूजा सरूप भी अपने अभिनय से फिल्म में गहराई जोड़ती हैं।

‘द मेहता बॉयज’ उन फिल्मों में से है, जो रिश्तों की उलझनों को बारीकी से टटोलती है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है। यह फिल्म किताब पढ़ने जैसा अनुभव देती है, जिसमें हर दृश्य रिश्तों की नई परत खोलता है। इसे देखने का असली आनंद तभी आता है, जब आप इसके भावनात्मक पहलुओं को समझने के लिए थोड़ा समय निकालें। अगर आप भी एक अच्छी कहानी, शानदार अभिनय और रिश्तों की जटिलताओं को पर्दे पर सजीव होते देखना चाहते हैं, तो ‘द मेहता बॉयज’ को जरूर देखें।

Asmita Sarkar

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