
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रामक चिकित्सा विज्ञापनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह ऐसे विज्ञापनों पर शिकायत दर्ज करने के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करे। अदालत ने यह भी कहा कि एक ऐसा तंत्र विकसित किया जाए, जिससे आम नागरिक भ्रामक चिकित्सा विज्ञापनों के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज कर सकें। शीर्ष अदालत ने औषधि और जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम के कार्यान्वयन की आवश्यकता को भी रेखांकित किया और कहा कि इसका सही तरीके से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत (न्याय मित्र) से कहा कि वे अधिनियम के कार्यान्वयन पर एक रिपोर्ट अगले सुनवाई तक प्रस्तुत करें। यह अधिनियम भारत में दवाओं और उपचारों के विज्ञापनों पर नियंत्रण रखता है और उन विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाता है, जो जादुई गुणों का दावा करते हैं, जिसे एक संज्ञेय अपराध माना जाता है।
जस्टिस ओका ने फरासत से कहा, “इस अधिनियम के तहत सबसे पहले शिकायत तंत्र स्थापित करना होगा, जो कि बेहद महत्वपूर्ण है। इस पर एक रिपोर्ट तैयार करें और हम व्यापक निर्देश देंगे। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नागरिक आसानी से शिकायत दर्ज कर सकें, और इसके लिए समर्पित फोन लाइन या अन्य तंत्र बनाया जा सकता है। यह काम पहले ही हो जाना चाहिए था।”
इसके अलावा, जस्टिस ओका ने फरासत से यह भी पूछा कि क्या अधिनियम के सभी प्रावधानों का पालन हो रहा है और क्या राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में इसे लागू करने के लिए उपयुक्त तंत्र मौजूद है। पिछले साल 7 मई को, अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया था कि वे अपने लाइसेंसिंग प्राधिकरणों से भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में हलफनामा दाखिल करें। साथ ही, उन्हें यह भी बताने के लिए कहा था कि वे इन कानूनों का पालन करने में कितनी सक्रियता दिखा रहे हैं और दंड तथा निवारक उपायों के बारे में भी जानकारी प्रदान करें।




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