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डिज़ाइन शिक्षा में स्थिरता: पर्यावरण-अनुकूल नवाचार की ओर एक कदम

वर्तमान समय में जब जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की कमी और प्रदूषण जैसी समस्याएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं, तब डिज़ाइन शिक्षा में स्थिरता (Sustainability) का समावेश अत्यंत आवश्यक हो गया है। डिज़ाइनर न केवल उत्पाद के स्वरूप को तय करते हैं, बल्कि उनके निर्माण, उपयोग और निष्पादन तक के पूरे जीवन चक्र को भी प्रभावित करते हैं। ऐसे में डिज़ाइन शिक्षा में पर्यावरण-संवेदनशीलता को जोड़ना एक सकारात्मक और दूरदर्शी पहल है।

आधुनिक डिज़ाइन पाठ्यक्रम में स्थिरता का समावेश
आज के डिज़ाइन पाठ्यक्रमों में पारंपरिक ज्ञान के साथ-साथ स्थिरता से जुड़े पहलुओं को भी जोड़ा जा रहा है। छात्रों को सिखाया जा रहा है कि वे कैसे बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक, पुनर्नवीनीकृत धातु, और जैविक वस्त्रों जैसी पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों का चयन करें।

इसके साथ ही, डिज़ाइन प्रक्रिया में ऊर्जा-कुशल तकनीकों और क्लाउड-आधारित टूल्स का भी समावेश हो रहा है, जिससे संसाधनों की बचत होती है और डिज़ाइन प्रक्रिया अधिक हरित बनती है।

सर्कुलर डिज़ाइन सोच: उपयोग, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण
Circular Design Thinking यानी परिपत्र डिज़ाइन सोच छात्रों को यह सिखाता है कि उत्पाद केवल देखने में सुंदर और कार्यक्षम ही न हों, बल्कि पुनः प्रयोग योग्य, मरम्मत योग्य, और पुनर्चक्रण योग्य भी हों।

छात्रों को वास्तविक जीवन की परियोजनाओं में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जैसे: ज़ीरो वेस्ट कार्यक्रमों के लिए प्रचार सामग्री डिज़ाइन करना, शहरी कृषि (Urban Farming) अभियानों में भाग लेना।

डिज़ाइन और निर्माण प्रक्रिया में स्थिरता का प्रभाव
डिज़ाइन शिक्षा का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक असर उत्पाद निर्माण की प्रक्रिया पर भी पड़ रहा है। Dematerialization यानी न्यूनतम सामग्री का उपयोग कर अधिक कार्य करना आज की जरूरत बन गई है।

इसके अतिरिक्त, 3D प्रिंटिंग, सिंथेटिक बायोलॉजी जैसी तकनीकें डिज़ाइनरों को कम अपशिष्ट और अधिक कुशल डिज़ाइन की शक्ति देती हैं—विशेषकर एयरोस्पेस और ऑटोमोबाइल उद्योगों में।

व्यावसायिकता बनाम स्थिरता: संतुलन की चुनौती
सबसे बड़ी चुनौती है—पर्यावरण संरक्षण और लागत प्रभावशीलता के बीच संतुलन बनाना। डिज़ाइन शिक्षा छात्रों को इस दिशा में तैयार करती है कि वे हरित डिज़ाइन को अपनाते हुए भी बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखें।

आज कई उद्योग भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिससे स्थिरता में प्रशिक्षित डिज़ाइनरों की माँग तेजी से बढ़ रही है।

वैश्विक रुझान और भारत की भूमिका
दुनियाभर के डिज़ाइन संस्थान अब अंतरविषयक शिक्षा (Interdisciplinary Learning) पर जोर दे रहे हैं, जहाँ इंजीनियरिंग, पर्यावरण विज्ञान और प्रबंधन को एकीकृत किया जा रहा है।

Life Cycle Assessment (LCA) जैसे टूल्स का उपयोग उत्पादों के संपूर्ण पर्यावरणीय प्रभाव को मापने में हो रहा है।

Eternal Design जैसी अवधारणाएँ—जो दीर्घकालिक उपयोग और सादगी को प्राथमिकता देती हैं—सामग्री की बर्बादी को कम करती हैं और टिकाऊपन को बढ़ावा देती हैं।

संसाधन-संबंधी बाधाएँ और संभावनाएँ
हालांकि, कई शैक्षणिक संस्थानों में उन्नत तकनीकी संसाधनों की कमी, जैसे 3D प्रिंटर, अभी भी एक चुनौती है।
छात्रों को प्रारंभिक स्तर पर स्थिरता की जानकारी न होने के कारण इस अवधारणा को समझने में कठिनाई होती है।
इसके अतिरिक्त, शिक्षकों के लिए सैद्धांतिक ज्ञान और व्यवहारिक अनुभव के बीच संतुलन बनाना भी चुनौतीपूर्ण कार्य है।

एक हरित भविष्य की ओर
डिज़ाइन शिक्षा में स्थिरता केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि यह एक नवाचार की संस्कृति है। यह छात्रों को न केवल पर्यावरण के अनुकूल डिज़ाइन के लिए तैयार करता है, बल्कि उन्हें ऐसे समाधान गढ़ने की दिशा में भी प्रेरित करता है जो वैश्विक पर्यावरणीय संकटों से निपटने में सहायक हों।

भारतीय शिक्षण संस्थानों के पास अवसर है कि वे ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करें जो हरित नवाचार को बढ़ावा दे और समाज को दीर्घकालिक मूल्य प्रदान करे।

स्थिरता को अपनाना ही डिज़ाइन का भविष्य है — एक ऐसा भविष्य जो पर्यावरण, समाज और उद्योग सभी के लिए लाभकारी हो।

Asmita Sarkar

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