
भारत में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में तेज़ी से हो रही वृद्धि अब एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। इन बीमारियों की बढ़ती संख्या देश की स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी बोझ डाल रही है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा गैर-संचारी रोगों (NCDs) का है, जैसे डायबिटीज़, हृदय संबंधी रोग (CVDs), मोटापा, उच्च रक्तचाप और फैटी लीवर। इन बीमारियों की रोकथाम और प्रबंधन के लिए सहयोगी स्वास्थ्य पेशेवरों, स्वास्थ्य क्षेत्र में आने वाले युवाओं और आम जनता का इन रोगों को समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
जीवनशैली जनित रोगों की ‘साइलेंट महामारी’
Health of the Nation 2025 रिपोर्ट से सामने आया है कि भारत एक “साइलेंट एपिडेमिक” की चपेट में है, जिसमें जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ व्यापक स्तर पर फैल रही हैं। जांच किए गए लोगों में से 65% में फैटी लीवर पाया गया, जिनमें से 85% मामलों में यह अल्कोहल की बजाय जीवनशैली से जुड़ा कारण रहा। बिना किसी लक्षण वाले लोगों में 46% में ‘साइलेंट हार्ट रिस्क’ देखा गया। वहीं, पोस्ट-मेनेपॉज़ल महिलाओं में डायबिटीज़ की दर 14% से बढ़कर 40% और मोटापे की दर 76% से 86% तक पहुँच गई है। बच्चों में मोटापा और कॉलेज छात्रों में विटामिन D की भारी कमी, और वयस्कों में 75% से अधिक की दर से यह समस्या बनी हुई है।
डायबिटीज़: भारत पर बढ़ता भार
भारत को दुनिया की ‘डायबिटीज़ राजधानी’ कहा जाता है, जहाँ वर्तमान में 7.7 करोड़ से अधिक लोग इस रोग से ग्रस्त हैं। यह संख्या 2045 तक 13.4 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। वर्ष 2009 में डायबिटीज़ की दर 7.1% थी, जो 2019 में बढ़कर 8.9% हो गई। शहरी क्षेत्रों में इसकी दर 11.2% है, जबकि ग्रामीण इलाकों में 5.2%। चिंताजनक रूप से, 57% वयस्क मरीज ऐसे हैं जिन्हें अभी तक डायबिटीज़ का पता ही नहीं चला है, जिससे उनके लिए समय पर इलाज और प्रबंधन मुश्किल हो जाता है।
हृदय रोग: मृत्यु का प्रमुख कारण
भारत में हृदय रोगों के कारण मृत्यु दर सबसे अधिक है, जो कुल मौतों का लगभग 28% है। भारत में CVD मृत्यु दर वैश्विक औसत से भी अधिक है, जिसमें इस्केमिक हार्ट डिज़ीज़ और स्ट्रोक 80% से अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। यह रोग अपेक्षाकृत कम उम्र में और अधिक गंभीरता के साथ सामने आता है, विशेष रूप से उन लोगों में जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं और जिन्हें समुचित इलाज नहीं मिल पाता। 1990 से 2010 के बीच CVD के कारण जीवन के खोए वर्षों में 59% की वृद्धि हुई, जो इसके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
वृद्धि के कारण
इस संकट का सीधा संबंध तेज़ शहरीकरण, गतिहीन जीवनशैली, अस्वास्थ्यकर खानपान और बढ़ते तनाव से है। अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड, चीनी, और असंतुलित वसा का सेवन, धूम्रपान, फल-सब्जियों का कम उपयोग और विटामिन की कमी जैसी आदतें इसके मूल कारण हैं। निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों में यह स्थिति और गंभीर है, जहाँ पोषण की कमी के साथ मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ, जैसे डिप्रेशन, भी जुड़ी हुई हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रभाव
जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ देश की पहले से ही संघर्ष कर रही स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त भार डाल रही हैं। इन बीमारियों का प्रबंधन दीर्घकालिक और महंगा होता है, जिसमें लगातार निगरानी और इलाज की आवश्यकता होती है। इस स्थिति से निपटने के लिए समय पर जांच और इलाज जरूरी है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा चलाया जा रहा NPCDCS (National Programme for Prevention and Control of Cancer, Diabetes, Cardiovascular Diseases, and Stroke) इस संकट से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है।
सहयोगी स्वास्थ्य पेशेवरों की भूमिका
सहयोगी स्वास्थ्य पेशेवर (Allied healthcare professionals) इन बीमारियों से लड़ाई में अहम भूमिका निभाते हैं। ये न केवल मरीज़ों को शिक्षा, जीवनशैली परामर्श और स्क्रीनिंग प्रदान करते हैं, बल्कि डॉक्टर और मरीज़ के बीच एक सेतु के रूप में काम करते हुए इलाज की योजना को लागू कराने में भी सहायक होते हैं। इन क्षेत्रों में करियर बनाने के इच्छुक लोगों के लिए यह जानना जरूरी है कि इन बीमारियों का एपिडेमियोलॉजी और प्रबंधन क्या है, जिससे वे राष्ट्र की स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूती देने में योगदान कर सकें।
भारत में जीवनशैली जनित बीमारियाँ एक गंभीर चुनौती बन चुकी हैं, जिसका सीधा संबंध बदलती जीवनशैली और शहरीकरण से है। डायबिटीज़, हृदय रोग और मोटापा जैसे रोगों से करोड़ों लोग प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में जन-जागरूकता, समय पर जांच और एकीकृत स्वास्थ्य सेवाएँ अत्यंत आवश्यक हो गई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाना और सहयोगी स्वास्थ्य पेशेवरों को सक्रिय करना इस महामारी से निपटने और देश की सेहत को सुधारने की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा।




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