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फोरेंसिक विज्ञान सत्य की खोज का आधार, पर झूठी गवाही न्याय की बाधा

अदालत में सत्य की खोज में फोरेंसिक विज्ञान और गवाहों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जहाँ वैज्ञानिक साक्ष्य तथ्यों पर आधारित होते हैं, वहीं मौखिक गवाही—विशेषकर चश्मदीद गवाहों की—मामले की दिशा बदल सकती है। लेकिन जब गवाही झूठी होती है, तो यह न्याय प्रक्रिया को गहराई से प्रभावित कर सकती है, चाहे वैज्ञानिक प्रमाण कितने ही मजबूत क्यों न हों।

झूठी गवाही के कारण (Reasons for False Testimony):

1. पुलिस या राजनैतिक दबाव
2. डर या धमकी
3. पैसे या व्यक्तिगत लाभ के लिए गवाही देना
4. पक्षपात या पूर्वाग्रह
5. स्मृति भ्रम या मानसिक भ्रम

 

फोरेंसिक विज्ञान पर प्रभाव (Impact on Forensic Science):

1. वैज्ञानिक साक्ष्यों की अनदेखी:
जब अदालत झूठी गवाही को अधिक महत्व देती है, तो डीएनए, फिंगरप्रिंट या अन्य वैज्ञानिक प्रमाण दरकिनार किए जा सकते हैं। इससे सच्चे अपराधी बच निकलते हैं।

2. मिसकैरेज ऑफ जस्टिस (न्याय में चूक):
झूठी गवाही के चलते निर्दोष लोगों को सजा हो सकती है, जबकि दोषी व्यक्ति छूट सकता है।

3. फोरेंसिक रिपोर्ट पर संदेह:
यदि झूठी गवाही के कारण किसी वैज्ञानिक रिपोर्ट को झूठा साबित करने की कोशिश की जाए, तो अदालतें फोरेंसिक विशेषज्ञों पर भी शक कर सकती हैं।

4. फोरेंसिक जांच पर दबाव:
झूठी गवाही के कारण जांच एजेंसियों को बार-बार वैज्ञानिक रिपोर्टें दोहरानी पड़ सकती हैं, जिससे समय और संसाधनों की बर्बादी होती है।

5. न्यायिक निर्णयों पर प्रभाव:
न्यायाधीशों का फैसला अक्सर गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्य दोनों पर आधारित होता है। यदि गवाही गलत है, तो गलत निष्कर्ष निकल सकता है।

 

भारत में कानूनी परिप्रेक्ष्य (Legal Perspective in India):
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 191-193 झूठी गवाही देने को दंडनीय अपराध मानती है। झूठी गवाही पर 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। फिर भी, व्यवहार में झूठी गवाही के मामलों में मुकदमे बहुत कम होते हैं, जिससे यह प्रवृत्ति बनी रहती है।

 

झूठी गवाही को रोकने में फोरेंसिक की भूमिका (Role of Forensics in Countering False Testimony):

1. क्रॉस-चेकिंग गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्य:
जैसे ब्लड स्प्लैटर, डीएनए, मोबाइल लोकेशन या डिजिटल फोरेंसिक झूठी बातों का पर्दाफाश कर सकते हैं।

2. फोरेंसिक साइकोलॉजी/न्यूरो साइंस:
झूठ बोलने के व्यवहार का विश्लेषण, जैसे पॉलीग्राफ टेस्ट, ब्रेन मैपिंग आदि।

3. सीसीटीवी, ऑडियो-वीडियो एनालिसिस:
घटनाओं की दृश्य या श्रव्य पुष्टि, जो झूठी गवाही को काट सकती है।

फोरेंसिक विज्ञान सत्य की खोज का एक सशक्त माध्यम है, लेकिन झूठी गवाही न्याय प्रणाली की नींव को कमजोर कर देती है। अगर वैज्ञानिक प्रमाणों को प्राथमिकता दी जाए और झूठी गवाही पर कड़ी कार्रवाई हो, तो न्यायिक प्रणाली अधिक पारदर्शी और प्रभावशाली बन सकती है।

 

Asmita Sarkar

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