Edinbox Hindi

एडटेक उद्योग को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की ज़रूरत

हाल ही में एक लिंक्डइन पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुई। इसमें एक दिल्ली यूनिवर्सिटी के टॉपर ने अपनी परेशानी साझा की—उत्कृष्ट अकादमिक रिकॉर्ड और दमदार रिज़्यूमे होने के बावजूद, उसे किसी भी कंपनी से इंटर्नशिप तक का ऑफर नहीं मिला। न कॉल आया, न इंटरव्यू। केवल खामोशी।

यह सिर्फ एक छात्र की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय शिक्षा प्रणाली की एक गहरी समस्या का संकेत है—जहां अच्छे नंबरों को ही करियर की गारंटी मान लिया जाता है। लेकिन 2025 की सच्चाई यह है कि अकेले अंक अब करियर नहीं बनाते।

₹8 लाख करोड़ की इंडस्ट्री, पर भरोसे की कमी
भारत का एजुकेशन सेक्टर आज करीब ₹8 लाख करोड़ (लगभग $100 अरब) का है। लेकिन इस विशाल उद्योग का एक कड़वा सच भी है—भ्रामक दावों और झूठे वादों की भरमार।

एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) के मुताबिक, शिक्षा क्षेत्र से सबसे ज़्यादा भ्रामक विज्ञापन की शिकायतें आती हैं—और इनमें से बड़ी संख्या एडटेक कंपनियों की होती है।

कोई दो हफ्तों में ₹20 लाख सालाना की नौकरी का वादा करता है, तो कोई “100% प्लेसमेंट गारंटी” देकर छात्रों को भ्रमित करता है—जबकि हकीकत में ये जॉब्स या तो अनपेड इंटर्नशिप होती हैं या कोर्स से बिलकुल असंबंधित।

शिक्षा: सिर्फ निवेश नहीं, भरोसे की बात
छात्र केवल फीस नहीं चुकाते—वे सालों की मेहनत, उम्मीदें और अपने भविष्य का सपना एक कोर्स में लगाते हैं। जब संस्थान या प्लेटफॉर्म यह साबित नहीं कर पाते कि उनका कोर्स किसी नौकरी या करियर का रास्ता बनाता है, तो यह शिक्षा का नहीं, भरोसे का नुकसान है।

सोचिए, हम खाने की चीज़ों में सामग्री तक जांचते हैं—प्रोटीन कितना है, फैट कितना है। लेकिन जब लाखों रुपए देकर कोर्स करते हैं, तो हमें न प्लेसमेंट डेटा मिलता है, न एलुमनी की जानकारी। यह एक नैतिक चूक नहीं, बल्कि एक संस्थागत विफलता है।

एडटेक: अवसर या भ्रम?
एडटेक कंपनियों का वादा था—”हर फोन तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।” और कुछ हद तक, यह पूरा भी हुआ। लेकिन जैसे-जैसे कंपनियों का फोकस गुणवत्ता से हटकर ग्रोथ पर गया, वैसे-वैसे भरोसा टूटता गया।

आज कुछ प्लेटफॉर्म “सप्ताहांत में डिजिटल मार्केटिंग सिखाने” का दावा करते हैं, तो कुछ “विदेशी यूनिवर्सिटी की डिग्री” के नाम पर एक काग़ज़ थमा देते हैं—जिसकी वैल्यू न नौकरी दिलाती है, न सम्मान।

छात्र, जो एक बेहतर भविष्य की तलाश में इन प्लेटफॉर्म्स पर भरोसा करते हैं, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

क्या पारदर्शिता ही समाधान है?
ASCI ने एजुकेशन विज्ञापनों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी करने शुरू कर दिए हैं, जो एक सकारात्मक कदम है। लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब संस्थान अपने एलुमनी डेटा और प्लेसमेंट रिकॉर्ड्स सार्वजनिक करें, छात्र को कोर्स का करिकुलम और प्रोजेक्ट्स पहले देखने को मिलें और हर दावा साक्ष्य के साथ प्रस्तुत किया जाए, न कि फाइन प्रिंट में छुपाया जाए

कुछ संस्थानों को डर है कि इससे उनका व्यापार प्रभावित होगा। लेकिन जिनका कंटेंट और नतीजे मजबूत हैं, उनके लिए यह एक अवसर है—भरोसा जीतने का।

अब सवाल पूछना सबकी ज़िम्मेदारी है। छात्र, माता-पिता और निवेशकों को अब खुलकर सवाल पूछने चाहिए:

– आप क्या पढ़ा रहे हैं?
– परिणाम कैसे माप रहे हैं?
– आपके पुराने छात्र आज क्या कर रहे हैं?

और जो संस्थान या प्लेटफॉर्म इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, उनके लिए यह समय आत्ममंथन का है। हर कोर्स, हर विज्ञापन और हर वादा एक ही कसौटी पर खरा उतरना चाहिए—क्या यह छात्र की मदद करेगा?

शिक्षा का मतलब परिणाम है, प्रचार नहीं
2025 में, एडटेक और शिक्षा उद्योग को एक नई परिभाषा की ज़रूरत है—परिणाम आधारित, पारदर्शी और जवाबदेह। अगर हम यह नहीं कर पाए, तो चाहे हमारे पास कितने भी AI ट्यूटर हों या ग्लोबल सर्टिफिकेट्स—छात्रों का भरोसा हम खो देंगे। अब समय आ गया है कि शिक्षा को भी उसी स्टैंडर्ड पर परखा जाए, जैसे हम किसी प्रोडक्ट या सेवा को परखते हैं। क्योंकि अंत में, शिक्षा वही है, जो जीवन बदल दे—ना कि केवल स्कोरकार्ड।

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed