
फोरेंसिक साइकोलॉजी (Forensic Psychology) मनोविज्ञान की वह शाखा है जो कानून और न्याय प्रणाली के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती है। इसमें मानव व्यवहार को आपराधिक दृष्टिकोण से समझा जाता है और न्यायिक प्रक्रियाओं में मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है। फोरेंसिक मनोवैज्ञानिक अपराधियों के मानसिक स्वास्थ्य की जांच, गवाहों की साख का मूल्यांकन, बच्चों के बयानों की विश्वसनीयता, तथा अदालत में पेशी के लिए मानसिक रूप से सक्षम होने का परीक्षण जैसे कार्य करते हैं।
फोरेंसिक साइकोलॉजी की परिभाषा
फोरेंसिक साइकोलॉजी को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है:
“फोरेंसिक साइकोलॉजी वह अनुप्रयुक्त मनोवैज्ञानिक क्षेत्र है जिसमें न्याय प्रणाली की सहायता के लिए मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों, विधियों और शोध का उपयोग किया जाता है।”
इतिहास और विकास
फोरेंसिक साइकोलॉजी की शुरुआत 19वीं सदी के उत्तरार्ध में हुई, जब मनोविज्ञान और कानून के बीच सहयोग की जरूरत महसूस की गई। जर्मन मनोवैज्ञानिक ह्यूगो मुनस्टरबर्ग को इस क्षेत्र के अग्रणी माने जाते हैं। 20वीं सदी में कई देशों में कोर्ट केसों में मनोवैज्ञानिकों की भूमिका बढ़ने लगी और यह एक औपचारिक अनुशासन बन गया।
मुख्य कार्यक्षेत्र
1. आपराधिक प्रोफाइलिंग (Criminal Profiling):
मनोवैज्ञानिक अपराध स्थल और व्यवहारिक संकेतों के आधार पर अपराधी की संभावित मानसिक स्थिति, व्यक्तित्व और पृष्ठभूमि का अनुमान लगाते हैं।
2. मानसिक स्थिति का मूल्यांकन:
यह देखा जाता है कि आरोपी मानसिक रूप से मुकदमा लड़ने योग्य है या नहीं। इसमें स्किज़ोफ्रेनिया, साइकोसिस या अन्य मानसिक विकारों की पहचान की जाती है।
3. गवाहों की विश्वसनीयता:
गवाहों की याददाश्त, धारणा और बयान की सटीकता की जांच की जाती है। बच्चों या मानसिक रूप से अस्थिर गवाहों के मामलों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है।
4. पीड़ित सहायता और पुनर्वास:
पीड़ितों के मनोवैज्ञानिक आघात को समझकर उन्हें परामर्श देना और पुनर्वास की योजना बनाना भी फोरेंसिक मनोवैज्ञानिकों की भूमिका में आता है।
5. बाल अपराध (Juvenile Delinquency):
किशोर अपराधियों के व्यवहार, पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक कारकों का विश्लेषण कर अदालत को रिपोर्ट दी जाती है।
अदालत में फोरेंसिक मनोवैज्ञानिक की भूमिका
फोरेंसिक मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ गवाह (expert witness) के रूप में अदालत में पेश होते हैं और न्यायाधीश या जूरी को अपराधी की मानसिक स्थिति, अपराध की प्रकृति और पुनर्वास की संभावनाओं के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देते हैं। वे रिपोर्ट्स तैयार करते हैं जो सजा तय करने में मदद करती हैं।
उपयोग किए जाने वाले प्रमुख परीक्षण
– MMPI (Minnesota Multiphasic Personality Inventory)
– Rorschach Inkblot Test
– WAIS (Wechsler Adult Intelligence Scale)
– Risk Assessment Tools (जैसे HCR-20, PCL-R)
भारत में फोरेंसिक साइकोलॉजी
भारत में फोरेंसिक साइकोलॉजी का उपयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। NIMHANS (बेंगलुरु), CFSL (Central Forensic Science Laboratory) और Gujarat Forensic Sciences University जैसे संस्थान इस क्षेत्र में शिक्षा, अनुसंधान और सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर जैसी तकनीकों में भी फोरेंसिक साइकोलॉजिस्ट की भूमिका अहम है।
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
गोपनीयता और नैतिकता का सवाल:
मानसिक परीक्षण और रिपोर्ट का दुरुपयोग न हो, इसके लिए सख्त नैतिक दिशानिर्देशों की आवश्यकता होती है।
विश्वसनीयता पर सवाल:
अदालत में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की वैधता और वैज्ञानिक आधार को लेकर कई बार विवाद उठते हैं।
प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी:
भारत जैसे देशों में फोरेंसिक मनोवैज्ञानिकों की संख्या सीमित है, जिससे न्याय प्रक्रिया में देरी हो सकती है।
फोरेंसिक साइकोलॉजी अपराध न्याय प्रणाली में एक सेतु की भूमिका निभाती है जो अपराध, अपराधी और पीड़ित की मानसिक स्थिति को समझने में मदद करती है। यह क्षेत्र अपराधों के मूल कारणों की पड़ताल करने, न्याय को अधिक मानवीय बनाने और पुनर्वास के लिए प्रभावी रणनीति विकसित करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आने वाले वर्षों में, तकनीकी प्रगति और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के साथ, फोरेंसिक साइकोलॉजी की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती जाएगी।
अधिक जानकारी के लिए AIFSET की आधिकारिक वेबसाइट https://aifset.com/ पर जाएं या 08035018480 नंबर पर संपर्क करें।




Add comment