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फॉरेंसिक मनोविज्ञान में नशे में चश्मदीद गवाह की भूमिका

आपने कई फ़िल्में और वेब सीरीज़ देखी होंगी या किताबों में पढ़ा होगा कि मुख्य किरदार कभी-कभी नशे में होता है, लेकिन फिर भी अपराध होते हुए देख लेता है और आखिर में अपराधी को पकड़वा देता है। लेकिन क्या असल जिंदगी में भी ऐसा होता है? क्या नशे में धुत गवाह किसी अपराध को सुलझाने में मदद कर सकता है? क्या उसकी याददाश्त पर भरोसा किया जा सकता है?

शोध के अनुसार, याददाश्त की विश्वसनीयता एक स्पेक्ट्रम (विस्तार) है, न कि कोई निश्चित चीज़। इसका मतलब है कि किसी गवाह की याददाश्त बिल्कुल सही या बिल्कुल गलत नहीं होती — वह बीच में कहीं हो सकती है।

क्या शराब पीने से हमारी याददाश्त प्रभावित होती है?
University of Portsmouth के वैज्ञानिकों ने 2024 में एक रिसर्च की, जिसमें यह पता लगाया गया कि शराब पीने से चेहरों को पहचानने की क्षमता पर क्या असर पड़ता है। इस अध्ययन में कुछ लोगों को शराब दी गई, जबकि कुछ लोगों ने कुछ नहीं पिया। इसके बाद सभी को अजनबी लोगों के वीडियो दिखाए गए और अगले दिन उनसे पूछा गया कि वे चेहरे कैसे दिखते थे।

परिणामों में पता चला कि जिन लोगों ने शराब नहीं पी थी, वे चेहरे की प्रमुख विशेषताओं जैसे आँखें, नाक और मुँह को अधिक सटीकता से याद रख सके। वहीं जिन्होंने शराब पी रखी थी, उन्होंने अक्सर व्यक्ति के हेयरस्टाइल या सामान्य रूप-रंग को याद किया।

क्यों? क्योंकि शराब हमारी ध्यान देने की क्षमता को सीमित कर देती है। हम बारीकियों को नजरअंदाज कर देते हैं और केवल बड़े और स्पष्ट चीज़ों पर ध्यान देते हैं।

भारत में नशे में गवाहों से जुड़े अपराध
भारत में कई पुलिस रिपोर्टों से पता चला है कि बहुत सारे अपराध उन जगहों के पास होते हैं जहाँ शराब की बिक्री होती है। इसका मतलब है कि वहां मौजूद गवाह अक्सर नशे की हालत में हो सकते हैं।

ऐसे मामलों में, पुलिस और जांचकर्ता समझते हैं कि नशे में गवाह अक्सर व्यक्तियों का सामान्य विवरण देते हैं, जैसे “उसने लाल शर्ट पहनी थी”, बजाय बारीकी से वर्णन करने के।

भारत में कुछ मामलों में नशे में गवाह की बात के आधार पर गिरफ़्तारी भी हुई है। इसीलिए आज फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिकों की माँग बढ़ गई है, जो यह मूल्यांकन करते हैं कि किसी गवाह की बात कितनी विश्वसनीय है।

क्या नशे में गवाह अपराधी पकड़वाने में मदद कर सकता है?
हाँ, लेकिन शर्त यह है कि उसकी याददाश्त की सटीकता की वैज्ञानिक तरीके से जांच की जाए। गवाह ने कितनी मात्रा में शराब पी थी, उसका शरीर शराब को कितनी अच्छी तरह सह सकता है, और घटना के समय उसकी मानसिक स्थिति क्या थी — ये सभी बातें अहम होती हैं।

फॉरेंसिक मनोविज्ञान में चश्मदीद गवाह की भूमिका
भारत में फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स जानते हैं कि नशे में व्यक्ति से मिली जानकारी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हो सकती। इसलिए वे एक से ज़्यादा गवाहों की बातों को मिलाकर, CCTV फुटेज, फॉरेंसिक सबूत और अन्य स्रोतों से तुलना करके पूरे मामले की सही तस्वीर बनाते हैं।

साक्षात्कार (इंटरव्यू) कैसे लिया जाता है, यह भी बेहद महत्वपूर्ण है। प्रशिक्षित अधिकारी सवालों को इस तरह पूछते हैं कि गवाह भ्रमित न हो या किसी झूठी याददाश्त को न दोहराए।

फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिक गवाह के व्यवहार, शरीर की भाषा, भावनात्मक प्रतिक्रियाएं और भ्रम के स्तर का अध्ययन करते हैं। वे सरल टेस्ट लेकर यह पता लगाते हैं कि व्यक्ति कितना याद रख पा रहा है और क्या वह किसी के प्रभाव में है।

डिजिटल टूल्स से नशे में गवाह की जांच
भारत में अब कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ वॉयस एनालिसिस और टाइमलाइन मैपिंग जैसे आधुनिक डिजिटल टूल्स का उपयोग कर रही हैं। इसके ज़रिए यह समझने में मदद मिलती है कि गवाह की बात किसी अन्य सबूत से मेल खाती है या नहीं।

इस बहुस्तरीय प्रक्रिया से सच्चाई को छाँटने में मदद मिलती है, और यह सुनिश्चित किया जाता है कि नशे में भी किसी गवाह की बात पूरी तरह नज़रअंदाज़ न की जाए, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से उसका विश्लेषण किया जाए।

अगर आप खुद एक नशे में गवाह हों तो क्या करें?
यदि आप किसी अपराध या महत्वपूर्ण घटना के गवाह हैं, तो तुरंत पुलिस को सूचित करें। लेकिन यह स्पष्ट रूप से बताएं कि आपने शराब पी थी या नहीं। इससे जांचकर्ताओं को आपकी बात को सही संदर्भ में समझने में मदद मिलती है।

चाहे नशे में होने के कारण आप कुछ विवरण भूल जाएँ, फिर भी आपकी जानकारी जांच में उपयोगी हो सकती है। आज की फॉरेंसिक तकनीकें छोटी-छोटी बातों को भी पकड़ सकती हैं।

नशा याददाश्त को प्रभावित करता है, लेकिन पूरी तरह अयोग्य नहीं बनाता
इसलिए, जब न्याय की बात आती है, तो किसी नशे में गवाह के बयान को पूरी तरह स्वीकार करना या पूरी तरह नकार देना — दोनों ही गलत दृष्टिकोण हैं। फॉरेंसिक मनोविज्ञान, तकनीक और सही जांच प्रक्रिया के ज़रिए सच्चाई तक पहुँचना संभव है – चाहे गवाह ने शराब पी रखी हो या नहीं।

Asmita Sarkar

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