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क्या चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम वास्तव में एक वरदान है?

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली पिछले कुछ वर्षों से बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत शुरू किया गया चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (Four-Year Undergraduate Programme – FYUP) इन बदलावों का एक बड़ा हिस्सा है। पारंपरिक तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम की जगह अब छात्रों को चार वर्षीय, बहुविषयी (multi-disciplinary), कौशल-आधारित और अनुसंधान केंद्रित शिक्षा देने की दिशा में कदम उठाया जा रहा है। लेकिन यह बदलाव सबके लिए समान रूप से उपयोगी नहीं दिखाई देता। सवाल उठता है – क्या यह चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम वास्तव में एक वरदान है, या फिर यह भारतीय युवाओं के लिए एक नई चुनौती बनकर आया है?

क्या है चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम?
चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम छात्रों को अधिक व्यापक, लचीली और बहु-विषयक शिक्षा देने की सोच के साथ लाया गया है। इसमें छात्र अपने पसंद के मुख्य विषय (major) के साथ सहायक विषय (minor), कौशल आधारित पाठ्यक्रम, और अंतिम वर्ष में शोध परियोजना (research project) या इंटर्नशिप कर सकते हैं। साथ ही यह कार्यक्रम छात्रों को विभिन्न चरणों पर बाहर निकलने (multiple exit options) का विकल्प भी देता है – एक वर्ष बाद सर्टिफिकेट, दो वर्ष बाद डिप्लोमा, तीन वर्ष बाद स्नातक डिग्री, और चार वर्ष बाद ‘ऑनर्स विद रिसर्च’ डिग्री।

वरदान क्यों है?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनीयता: चार वर्षीय स्नातक डिग्री अमेरिका, कनाडा, यूरोप आदि देशों की शिक्षा प्रणाली के अनुरूप है। इससे भारतीय छात्रों के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ते हैं।

शोध व नवाचार को बढ़ावा: अंतिम वर्ष में शोध परियोजना शामिल होने से छात्रों को रिसर्च और इनोवेशन की समझ विकसित होती है, जो भारत में लंबे समय से शिक्षा प्रणाली की कमी रही है।

व्यावसायिक कौशल का विकास: लचीलापन और कौशल आधारित पाठ्यक्रम छात्रों को रोज़गार की बेहतर तैयारी देते हैं। इससे रोजगार क्षमता (employability) में सुधार संभव है।

पठन का लचीलापन: छात्र अपनी रुचि और करियर के अनुसार विषय चुन सकते हैं। एक कला का छात्र कंप्यूटर विज्ञान या डेटा एनालिटिक्स जैसी व्यावहारिक स्किल्स भी सीख सकता है।

लेकिन अभिशाप क्यों कहा जा रहा है?
वित्तीय बोझ: एक अतिरिक्त वर्ष का मतलब है अधिक ट्यूशन फीस, हॉस्टल, रहने और पढ़ाई का खर्च। यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

समय की कीमत: जो छात्र जल्दी नौकरी या करियर में प्रवेश करना चाहते हैं, उनके लिए चार वर्ष एक अतिरिक्त साल की देरी और अवसर की लागत (opportunity cost) है।

संरचना और संसाधनों की कमी: भारत के कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों, लैब्स और आधारभूत ढांचे की कमी पहले से ही है। ऐसे में इस विस्तारित प्रोग्राम को प्रभावी रूप से लागू करना कठिन हो सकता है।

कई छात्रों की अनिच्छा: छात्रों में यह भ्रम भी है कि तीन साल में ही उन्हें डिग्री मिल सकती है, तो चौथे साल में क्यों पढ़ें? ऐसे में शोध और इंटर्नशिप के लिए छात्रों का झुकाव कमजोर हो सकता है।

संतुलन की जरूरत
चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम दृष्टि से उत्कृष्ट और वैश्विक स्तर का विचार है, लेकिन इसे ज़मीन पर उतारने के लिए संरचनात्मक सुधार, शिक्षक प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और छात्रों के लिए मार्गदर्शन जरूरी है। बिना इन कदमों के यह बदलाव केवल शहरी, सक्षम वर्ग के छात्रों के लिए वरदान और बाकी के लिए अभिशाप बन सकता है।

चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को न तो पूरी तरह वरदान कहा जा सकता है, और न ही पूर्णतः अभिशाप। यह भारत की उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों तक पहुँचाने की दिशा में एक साहसिक पहल है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे कितनी कुशलता और समानता के साथ लागू किया जाता है। यदि नीति निर्माता, शिक्षण संस्थान और समाज मिलकर इसे समावेशी और व्यावहारिक रूप में ढालें, तो यह भारतीय युवाओं के लिए अवसरों का नया द्वार बन सकता है।

 

Asmita Sarkar

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