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इतिहास की नई भाषा: बच्चों को सोचने देना जरूरी है या बहसों में उलझाना?

एनसीईआरटी की कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की किताब को लेकर इन दिनों तीखी बहस चल रही है। एक ओर यह किताब इतिहास को नई भाषा में पेश करती है, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का मानना है कि इससे बच्चों की सोच एकतरफा हो सकती है। सवाल यह है कि क्या इतिहास को नए ढंग से पढ़ाना सही है, या यह भविष्य की पीढ़ी के लिए एक नया पूर्वाग्रह तैयार कर रहा है?

इतिहास का नया नजरिया या नई दिशा?
किताब में बाबर को “क्रूर विजेता”, अकबर को “सहिष्णुता और क्रूरता का मिश्रण” और औरंगजेब को “मंदिर और गुरुद्वारे तोड़ने वाला शासक” बताया गया है। यह शब्द पहले की पाठ्यपुस्तकों की अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्ट और आलोचनात्मक हैं। इससे जुड़ी चिंता यह है कि क्या इतने छोटे बच्चों के मन में इन शब्दों से एकतरफा या नकारात्मक सोच जन्म ले सकती है?

सवाल उठाना गलत नहीं, पर सिखाने का तरीका अहम है
एनसीईआरटी का कहना है कि यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 के अनुसार किया गया है, जिसमें बच्चों को केवल तथ्यों की रट लगवाने के बजाय सोचने, विश्लेषण करने और तर्क देने की दिशा में ले जाना उद्देश्य है।

बिलकुल, यह एक सराहनीय कदम है। 21वीं सदी के छात्रों को इतिहास को सिर्फ याद करने के बजाय उसकी जड़ों और प्रभावों को समझने की जरूरत है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि भाषा ऐसी हो जो बच्चों को सोचने पर मजबूर करे, न कि नफरत या भेदभाव की ओर धकेले।

“अंधकारमय दौर” की चेतावनी: सही सन्दर्भ, लेकिन क्या पर्याप्त?
किताब में एक विशेष टिप्पणी “A Note on History’s Darker Period” में लिखा गया है कि “बीते ज़माने की घटनाओं के लिए आज के किसी व्यक्ति या समुदाय को दोष नहीं दिया जाना चाहिए।” यह लाइन किताब की आलोचनात्मक भाषा को संतुलित करने की कोशिश लगती है, लेकिन क्या यह 13-14 साल के छात्र के लिए पर्याप्त स्पष्टीकरण है?

बच्चों की सोच पर असर डालने वाली भाषा को संतुलन में रखने के लिए केवल एक पैराग्राफ काफी नहीं। शिक्षक, पेरेंट्स और शिक्षा विशेषज्ञों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह के मजबूत शब्दों के साथ समझाने का वातावरण भी मजबूत हो।

बदलाव जरूरी हैं, लेकिन संतुलन से
किसी भी समाज में इतिहास की पुनर्रचना या पुनर्पाठ जरूरी होता है, खासकर तब जब पुरानी किताबें या तो पक्षपाती रही हों या अधूरी। लेकिन इन बदलावों का उद्देश्य होना चाहिए — बच्चों को संवेदनशील, निष्पक्ष और विवेकशील नागरिक बनाना। इतिहास को “काले” और “सफेद” में बांटने के बजाय, हमें बच्चों को ग्रे क्षेत्रों को देखने और समझने का हुनर सिखाना होगा।

एनसीईआरटी की यह नई किताब एक बहस की शुरुआत है, अंत नहीं। यह बहस सिर्फ शब्दों की नहीं है, बल्कि हम अपने बच्चों को किस तरह का नजरिया देना चाहते हैं, इसकी भी है। अगर हम चाहते हैं कि बच्चे सोचें, तो उन्हें सोचने का स्पेस, संतुलित भाषा और खुला वातावरण देना होगा। इतिहास को नया पढ़ाना गलत नहीं है, लेकिन यह जिम्मेदारी से और विवेक के साथ किया जाना चाहिए।

रईस अहमद 'लाली'

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