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फिंगरप्रिंट से अपराध का नया खुलासा: DESI-MS तकनीक से अपराधियों की पहचान अब और सटीक

हाल ही में एक वैज्ञानिक खोज ने फिंगरप्रिंट की फोरेंसिक जांच की दिशा ही बदल दी है। Desorption Electrospray Ionization Mass Spectrometry यानी DESI-MS नाम की एक उन्नत तकनीक ने यह संभव बना दिया है कि अब सिर्फ फिंगरप्रिंट से व्यक्ति की पहचान ही नहीं, बल्कि यह भी पता लगाया जा सकता है कि उसने हाल ही में क्या किया, कौन-सी दवाएं लीं, कौन-से रसायनों को छुआ, उसकी उम्र, लिंग और यहां तक कि उसकी जातीय पृष्ठभूमि क्या है।

DESI-MS क्या है?
DESI-MS एक अत्याधुनिक उपकरण है जो पारंपरिक फिंगरप्रिंट पैटर्न के साथ-साथ उसकी रासायनिक संरचना की भी जानकारी देता है। इसकी प्रक्रिया कुछ इस प्रकार है:

– व्यक्ति अपनी उंगली किसी सतह पर दबाता है, और फिर जेलैटिन लिफ्टर (जो भारतीय फोरेंसिक लैब्स में पहले से इस्तेमाल हो रहा है) से फिंगरप्रिंट उठाया जाता है।

– इस लिफ्टर पर हल्की तीव्रता वाला विद्युत आवेशित सॉल्वेंट (जैसे मेथेनॉल) स्प्रे किया जाता है।

– इस स्प्रे से फिंगरप्रिंट की रेखाओं में मौजूद रसायन निकल आते हैं।

– ये रसायन DESI-MS में जाकर विश्लेषित होते हैं, जिससे न सिर्फ फिंगरप्रिंट की छवि मिलती है, बल्कि उसके अंदर मौजूद रासायनिक संरचना की पूरी जानकारी भी सामने आती है।

यह तकनीक नॉन-डिस्ट्रक्टिव (यानी नमूने को खराब नहीं करती), तेज़ और उन फिंगरप्रिंट्स को भी पढ़ सकती है जो एक-दूसरे से ओवरलैप हो रहे हों या बहुत कमजोर/धुंधले हों।

हालिया शोध से जुड़े प्रमुख तथ्य:
DESI-MS की मदद से आरहस यूनिवर्सिटी और अन्य शोधकर्ताओं ने एक ही जगह मौजूद ओवरलैपिंग, धुंधले और कमजोर फिंगरप्रिंट्स को भी सफलतापूर्वक पहचाना और विश्लेषित किया — जो कि पहले संभव नहीं था।

यह तकनीक यह पता लगा सकती है कि व्यक्ति ने कौन-सी दवाएं, विस्फोटक, रसायन या पर्यावरणीय तत्वों को छुआ था — जो अपराध से जुड़ी कड़ियों को जोड़ने में बेहद सहायक हो सकता है।

मशीन लर्निंग की सहायता से यह तकनीक फिंगरप्रिंट के रासायनिक प्रोफाइल के आधार पर लिंग (96%), उम्र (84%) और जातीय पहचान (82%) तक की सटीक पहचान कर पाने में सक्षम है।

यह प्रक्रिया तेज़ है और in-situ यानी मौके पर ही विश्लेषण कर सकती है। अधिकतर मामलों में दो घंटे के भीतर उपयोगी परिणाम मिल सकते हैं।

अब फिंगरप्रिंट से क्या-क्या पता चल सकता है?
– व्यक्ति की पारंपरिक रेखाओं के आधार पर पहचान।

– यदि उसने हाल ही में ड्रग्स, विस्फोटक, भोजन, स्नेहक या सफाई एजेंट जैसे किसी भी बाहरी पदार्थ को छुआ हो तो उसका पता लगाना।

– लिंग, आयु वर्ग, जातीयता और यहां तक कि स्वास्थ्य संबंधी जानकारी — जैसे कि कुछ बीमारियों के बायोमार्कर।

– यहां तक कि अब यह अनुमान लगाना भी संभव है कि फिंगरप्रिंट कितने समय पहले छोड़ा गया था।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसका महत्व:
भारत में अक्सर क्राइम सीन पर ओवरलैपिंग और धुंधले फिंगरप्रिंट मिलते हैं, जिन्हें पहले इस्तेमाल लायक नहीं माना जाता था। लेकिन DESI-MS की मदद से अब ऐसे प्रिंट्स से भी जानकारी निकाली जा सकती है। इससे:

– कोल्ड केस यानी पुराने, अनसुलझे मामलों को सुलझाने में मदद मिलेगी।

– नई रासायनिक जानकारी के आधार पर दोषमुक्त लोगों को राहत मिल सकती है या अपराधियों की पहचान हो सकती है।

– ड्रग्स, आतंकवाद और पर्यावरणीय अपराधों से जुड़े मामलों में नए सुराग मिल सकते हैं।

जेलैटिन लिफ्टर पहले से फोरेंसिक लैब्स में उपयोग में हैं, इसलिए DESI-MS तकनीक को मौजूदा सिस्टम में जोड़ना सुलभ और किफायती हो सकता है।

भविष्य की चुनौतियां और आगे का रास्ता:
हालांकि DESI-MS की संभावनाएं बहुत आशाजनक हैं, लेकिन इसके व्यापक उपयोग के लिए भारत को इस तकनीक में निवेश करना होगा। फोरेंसिक टीमों को प्रशिक्षण देना, न्यायाधीशों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को इसके वैज्ञानिक पहलुओं के प्रति संवेदनशील बनाना जरूरी है। शोधकर्ता लगातार यह भी प्रयास कर रहे हैं कि और अधिक रसायनों की पहचान की जा सके, जिससे व्यक्तिगत, स्वास्थ्य और व्यवहार संबंधी प्रोफाइलिंग और भी सटीक हो।

DESI-MS जैसी तकनीक ने फिंगरप्रिंट की परिभाषा को ही बदल दिया है। अब हर फिंगरप्रिंट सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि एक पूरी कहानी कहता है — उस व्यक्ति की, उसकी आदतों की और उसकी गतिविधियों की। यह भारत जैसे संसाधन सीमित देश के लिए एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है — जिससे मामलों को तेज़ी से सुलझाया जा सकेगा, गलत सज़ाओं में कमी आएगी और न्याय व्यवस्था में समय व धन की बचत होगी।

टिप: मूल अध्ययन पढ़ने या इस तकनीक से संबंधित रिसर्च देखने के लिए ScienceDaily पर DESI-MS सर्च करें।

Asmita Sarkar

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