
कभी भारतीय सिविल सेवा में इतिहास, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र पढ़े हुए युवाओं का गहरा प्रभाव देखा जाता था। वे अपने मानवीय दृष्टिकोण और सामाजिक समझ के लिए जाने जाते थे। लेकिन पिछले एक-दो दशकों में परिदृश्य तेजी से बदला है। आज स्थिति यह है कि चयनित उम्मीदवारों में से दो-तिहाई से अधिक इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आते हैं।
संसद की एक स्थायी समिति ने हाल ही में इस प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। समिति का मानना है कि यदि नौकरशाही में एक ही तरह की सोच हावी हो जाएगी, तो नीतियों में आवश्यक विविधता और संवेदनशीलता कम होती जाएगी।
आंकड़े बोलते हैं
– 2011 में सफल अभ्यर्थियों में 46% इंजीनियर थे, जो 2020 तक बढ़कर 65% हो गए।
– डॉक्टरों का अनुपात 2011 में 14% था, जो 2020 में घटकर मात्र 4% रह गया।
– ह्यूमैनिटीज पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार 2011 में 27% थे, जो 2020 में गिरकर 23% हो गए।
– 2017 से 2021 के बीच चयनित उम्मीदवारों में 76% साइंस/इंजीनियरिंग/मेडिकल पृष्ठभूमि से थे, जबकि ह्यूमैनिटीज का हिस्सा 23.6% ही रहा।
CSAT का प्रभाव
इस बदलाव की बड़ी वजह 2011 में लागू हुआ सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट (CSAT) माना जा रहा है। इस परीक्षा का पैटर्न तार्किक और गणनात्मक कौशल पर अधिक आधारित था, जिसमें इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को स्वाभाविक बढ़त मिली।
2009 में जहां ह्यूमैनिटीज छात्रों की सफलता दर 30% थी, वहीं 2012 तक यह घटकर 15% रह गई। इसके विपरीत इंजीनियरों की हिस्सेदारी लगभग 50% तक पहुँच गई।
क्यों चिंता की बात है?
– भारतीय नौकरशाही केवल प्रशासनिक मशीनरी नहीं है; यह समाज और संस्कृति की धड़कनों को भी प्रतिबिंबित करती है।
– ह्यूमैनिटीज पृष्ठभूमि वाले अफसर समाज की जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं को समझने में बेहतर होते हैं।
– डॉक्टरों और इंजीनियरों का बड़ी संख्या में नौकरशाही में जाना, हेल्थकेयर और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए टैलेंट की कमी भी पैदा करता है।
– नीतियों में यदि एक ही तरह की तकनीकी सोच हावी हो गई, तो वे समाज की विविध आवश्यकताओं को नज़रअंदाज़ कर सकती हैं।
समाधान की दिशा
विशेषज्ञ मानते हैं कि CSAT के ढांचे की पुनर्समीक्षा ज़रूरी है ताकि यह किसी एक शैक्षिक पृष्ठभूमि को अनुचित लाभ न दे। इसके साथ ही:
– अलग-अलग डोमेन एक्सपर्ट्स के लिए अलग कैडर या सर्विस ट्रैक बनाए जा सकते हैं।
– हर स्ट्रीम से संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर नौकरशाही की विचारधारा में विविधता लानी होगी।
दुनिया के कई देशों में लिबरल आर्ट्स और सोशल साइंस पृष्ठभूमि वाले युवाओं को नौकरशाही में महत्व दिया जाता है, क्योंकि वे नीतियों को केवल लागू ही नहीं करते, बल्कि उन्हें समाज से जोड़कर देखने की क्षमता रखते हैं।
भारत के लिए भी यही ज़रूरी है। आखिरकार, गवर्नेंस केवल एफिशियंसी (कार्यक्षमता) का मामला नहीं है, बल्कि इसमें इक्विटी (न्याय), कॉन्टेक्स्ट (परिस्थिति) और विजन (दृष्टि) का संतुलित मेल होना चाहिए।




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