
हाल के समय में शिक्षा क्षेत्र में एक गंभीर प्रवृत्ति देखने को मिल रही है – छात्रों का प्राइवेट कोचिंग पर निर्भर होना। चाहे एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी हो या स्कूल स्तर की पढ़ाई, बच्चों को कोचिंग का सहारा लेने के लिए मजबूर होना अब आम बात हो गई है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर किए गए व्यापक मॉड्यूलर सर्वे (अप्रैल-जून 2025) में यह तथ्य सामने आया है कि मौजूदा सत्र में करीब 27 प्रतिशत छात्र प्राइवेट कोचिंग ले रहे हैं।
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 30.7 प्रतिशत छात्र और ग्रामीण क्षेत्रों में 25.5 प्रतिशत छात्र प्राइवेट कोचिंग ले रहे हैं। कुल 52,085 घरों में 57,742 छात्रों पर आधारित इस सर्वे से पता चलता है कि शिक्षा की तैयारी में कोचिंग का असर हर स्तर पर देखा जा सकता है।
विशेष रूप से हायर सेकेंडरी स्तर पर कोचिंग की मांग और भी बढ़ जाती है। सेकेंडरी लेवल पर शहरी क्षेत्रों में 40.2 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 36.7 प्रतिशत छात्र कोचिंग लेते हैं। हायर सेकेंडरी में यह संख्या शहरी क्षेत्रों में 44.6 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 33.1 प्रतिशत है। इसका मतलब साफ है – जैसे-जैसे पढ़ाई का स्तर बढ़ता है, छात्र और माता-पिता दोनों पर प्राइवेट कोचिंग का दबाव बढ़ता जा रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्री-प्राइमरी स्तर से ही बच्चों को कोचिंग के लिए भेजा जा रहा है। शहरों में 13.6 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 10.7 प्रतिशत छात्र पहले से ही कोचिंग का हिस्सा बन चुके हैं। प्राइमरी में यह संख्या 26.6 प्रतिशत और मिडिल क्लासेज में 31 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्पष्ट संकेत है कि स्कूल लेवल से ही कोचिंग पर निर्भरता बढ़ रही है, जो कि दीर्घकालिक रूप से बच्चों के स्वतंत्र सीखने की क्षमता पर असर डाल सकती है।
कोचिंग का उद्देश्य छात्रों की समझ और कौशल बढ़ाना होना चाहिए, न कि उनकी निर्भरता। यदि प्रारंभिक स्तर से ही बच्चे को कोचिंग के लिए भेजे जाएँ, तो यह उनकी स्वयं सीखने की क्षमता और रचनात्मक सोच को कम कर सकता है। साथ ही, यह शहरी और ग्रामीण असमानता को और बढ़ावा देता है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में कोचिंग की पहुंच ज्यादा है।
हमें यह समझने की आवश्यकता है कि शिक्षा केवल पढ़ाई और अंक हासिल करने तक सीमित नहीं है। बच्चों को खुद सीखने, सवाल करने और खोज करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। स्कूलों और शिक्षकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बुनियादी शिक्षा इतनी मजबूत हो कि छात्रों को हर चीज के लिए बाहरी कोचिंग की आवश्यकता न पड़े।
कोचिंग की बढ़ती संस्कृति सिर्फ छात्रों और माता-पिता पर दबाव नहीं डाल रही, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा कर रही है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे स्वतंत्र, रचनात्मक और सशक्त बनें, तो अब समय आ गया है कि स्कूल और घर दोनों स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता और सुदृढ़ता पर ध्यान दिया जाए, बजाय कि केवल कोचिंग पर निर्भर रहने के।




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