
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा देश की सबसे बड़ी भर्ती परीक्षा है, जिसके जरिए 21 सेवाओं में नियुक्तियां होती हैं। इनमें अखिल भारतीय सेवाएं (IAS, IPS, IFoS), सिविल सर्विसेज ग्रुप ‘A’ (IFS, IRS, आदि) और ग्रुप ‘B’ (DANICS, DANIPS, पुडुचेरी सेवाएं) शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका
तीन अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल रिट याचिका में यूपीएससी द्वारा प्रारंभिक परीक्षा की उत्तर-कुंजी देर से जारी करने की प्रथा को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि आयोग हर साल प्रारंभिक परीक्षा (जैसे इस बार 25 मई को हुई परीक्षा) के तुरंत बाद अस्थायी उत्तर-कुंजी जारी कर आपत्तियां आमंत्रित करे और अंतिम उत्तर-कुंजी प्रकाशित करे। अदालत ने मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए इसे एक अन्य लंबित याचिका के साथ क्लब कर दिया है।
यूपीएससी का तर्क
आयोग का कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया पूरी होने से पहले उत्तर-कुंजी जारी करने से असफल उम्मीदवार अनावश्यक आपत्तियां कर सकते हैं, जिससे प्रक्रिया प्रभावित होगी। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि जब एनटीए जैसी एजेंसियां मेडिकल और इंजीनियरिंग परीक्षाओं में 25 लाख उम्मीदवारों के बावजूद कुछ ही दिनों में उत्तर-कुंजी जारी कर सकती हैं, तो यूपीएससी क्यों नहीं।
विवाद और आलोचना
पूजा खेडकर प्रकरण (2024): फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर चयनित होने का मामला सामने आने पर यूपीएससी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। आयोग ने स्पष्ट किया कि वह हर प्रमाणपत्र की जांच करने में सक्षम नहीं है, जिससे संस्थान की साख को धक्का लगा।
स्कोर कार्ड की कमी: प्रारंभिक परीक्षा में उम्मीदवारों को केवल रोल नंबर आधारित परिणाम मिलता है। उन्हें कितने अंक मिले, यह जानकारी अंतिम नतीजे तक नहीं मिलती। इससे तैयारी और आत्ममूल्यांकन प्रभावित होता है।
उत्तर पुस्तिकाएं न मिलना: कई राज्य आयोग अभ्यर्थियों को जांची गई कॉपियां उपलब्ध कराते हैं, लेकिन यूपीएससी नहीं।
स्केलिंग पर सवाल: वैकल्पिक विषयों में स्केलिंग की जटिल और अपारदर्शी प्रक्रिया भी विवादों में है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे खत्म कर सामान्य पाठ्यक्रम अपनाना चाहिए।
पारदर्शिता की मांग
परीक्षार्थियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा के तुरंत बाद उत्तर-कुंजी और व्यक्तिगत स्कोर कार्ड जारी करे, तो उम्मीदवार अपनी गलतियों से सीखकर अगली बार बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे। संसदीय समिति भी इसी की अनुशंसा कर चुकी है।
लोक सेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से पारदर्शिता और भरोसे की अपेक्षा की जाती है। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और सरकार की सिफारिशों के बाद यूपीएससी अपनी प्रणाली में कितना सुधार करता है।




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