
इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी ने मुंबई में आयोजित FICCI Frames 2025 में मीडिया और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर गहरी बात रखी। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं रह गया, बल्कि विश्वास कायम रखना और नई तकनीकों के साथ कदम मिलाकर चलना भी उतना ही जरूरी है।
50 साल के अनुभव से निकली बात: “बदलाव ही स्थायी है”
पुरी ने कहा कि वे मीडिया में अपने 50 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं, और इन दशकों में उन्होंने यही सीखा है कि बदलाव कभी रुकता नहीं। उन्होंने याद किया कि कैसे उन्होंने एक प्रिंट मैगज़ीन इंडिया टुडे से शुरुआत की थी, जिसकी रीडरशिप अपने समय में 50 लाख थी, और आज ग्रुप के पास चार 24×7 न्यूज़ चैनल और 60 डिजिटल प्लेटफॉर्म्स हैं। उन्होंने बताया कि आज इंडिया टुडे ग्रुप की पहुंच 75 करोड़ व्यूअर्स, रीडर्स और फॉलोअर्स तक है, और भारत की पहली AI न्यूज़ एंकर “सना” इसी संस्थान की है।
“भारत में मीडिया की विविधता दुनिया में बेमिसाल”
पुरी ने कहा कि भारत में मीडिया जगत की विविधता और विस्तार दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। उन्होंने कहा, “देश में 1.40 लाख से ज्यादा पंजीकृत पब्लिकेशन्स हैं और दिल्ली जैसे एक शहर में दर्जनों अखबार रोज़ छपते हैं। TRAI के मुताबिक, भारत में 900 सैटेलाइट टीवी चैनलों की अनुमति है, जिनमें से 375 से ज्यादा न्यूज चैनल हैं। यह किसी और देश में नहीं होता।”
‘रद्दी इकॉनॉमिक्स’ और विज्ञापन मॉडल की चुनौतियां
पुरी ने मज़ाकिया लहजे में कहा कि भारत के अखबार “रद्दी इकॉनॉमिक्स” पर चलते हैं — यानी अखबार की कीमत इतनी कम होती है कि उसे बेचने पर उससे ज्यादा पैसा मिल जाता है। उन्होंने बताया कि टीवी चैनल्स को भी लंबे समय से कैरेज फीस और सरकारी नियंत्रण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता रहा है। पुरी ने कहा, “सरकार को टीवी चैनलों को नियंत्रित करने की बजाय उन्हें समान और न्यायपूर्ण माहौल देना चाहिए, ताकि यह उद्योग और तेजी से रोजगार पैदा कर सके।”
“विज्ञापन पर निर्भरता से खतरे में स्वतंत्रता”
उन्होंने कहा कि भारत की न्यूज इंडस्ट्री का अधिकांश खर्च विज्ञापनों से चलता है, जिससे पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमेशा खतरा बना रहता है। पुरी बोले, “जब कोई उद्योग विज्ञापनदाताओं या सरकारों पर निर्भर हो जाता है, तो उसका अस्तित्व भी उनके हाथों में आ जाता है। फिर भी, इसी सिस्टम में रहकर भारतीय पत्रकारों ने बोफोर्स घोटाला, 2जी स्कैम, कॉमनवेल्थ गेम्स और मणिपुर की घटनाओं जैसी बड़ी कहानियाँ उजागर की हैं।”
“अरबपति न्यूज़ चैनलों” का दौर
पुरी ने चेतावनी दी कि अब पत्रकारिता एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है — जिसे उन्होंने ‘अरबपति न्यूज़ चैनलों का युग’ कहा। उन्होंने कहा, “बड़े उद्योगपति अब न्यूज चैनल खरीद रहे हैं, जो इसे बिजनेस नहीं, बल्कि प्रभाव का साधन मानते हैं। इससे न केवल मुनाफे पर असर पड़ता है, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी खतरा मंडरा रहा है।”
“डिजिटल मीडिया ने वही गलती दोहराई”
पुरी ने कहा कि डिजिटल क्रांति मीडिया के लिए एक नया अवसर थी, लेकिन इंडस्ट्री ने वही गलती दोहराई — कंटेंट को मुफ्त देना। उन्होंने कहा, “गूगल, फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर आज दुनिया के नए एडिटर-इन-चीफ हैं। वे खुद पत्रकारिता नहीं करते, लेकिन कमाई और वितरण पर उनका पूरा नियंत्रण है।”
उन्होंने जोड़ा कि आज डिजिटल विज्ञापन मीडिया के कुल ऐड रेवेन्यू का 55% हिस्सा ले रहे हैं, जबकि पारंपरिक चैनल और प्रकाशक संघर्ष कर रहे हैं। “अब मालिक विज्ञापनदाता नहीं, बल्कि एल्गोरिदम है,” उन्होंने तीखे लहजे में कहा।
“AI से पत्रकारिता के अस्तित्व को खतरा”
पुरी ने कहा कि अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पत्रकारिता के लिए नई चुनौती बन गई है। उनका कहना था कि “AI लेखों को एक पैराग्राफ में बदल देता है, जिससे लोग असली रिपोर्ट तक पहुंचते ही नहीं। जब असली पत्रकारों का काम बिना क्रेडिट या मुआवजे के इस्तेमाल होता है, तो विश्वसनीय जानकारी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है।”
“सच्ची खबरें मुफ्त नहीं होनी चाहिए”
अपने भाषण के अंत में पुरी ने कहा कि पत्रकारों को अपने काम की वैल्यू समझनी होगी। उन्होंने कहा, “हमें अपने दर्शकों को बताना होगा कि सच्ची और भरोसेमंद खबरें भी एक सार्वजनिक जरूरत हैं — और हर जरूरत की तरह उनकी भी एक कीमत होती है।” उन्होंने कहा कि सब्सक्रिप्शन कोई खर्च नहीं, बल्कि यह एक वोट है कि पाठक किस तरह की मीडिया को जीवित रखना चाहता है।
“बदलाव से डरने की नहीं, अपनाने की जरूरत”
पुरी ने अपने भाषण का समापन इन शब्दों से किया— “बदलाव अब कोई दुश्मन नहीं, बल्कि जीवन का सामान्य हिस्सा है। असली सवाल यह है कि क्या हमारे पास इतना साहस, कल्पना और ईमानदारी है कि हम इस बदलाव को अपने पक्ष में बदल सकें?”
उन्होंने कहा, “हम कहानीकार हैं — और मानवता उन्हीं कहानियों से जिंदा रहती है जिन्हें हम एक-दूसरे को बताते हैं। इस झूठ के युग में सच बोलना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है, क्योंकि भारत में सच का भविष्य ही हमारे लोकतंत्र की सेहत तय करेगा।”




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