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छोटे शहरों से क्यों अब बड़ी संख्या में पढ़ाई के लिए विदेश जा रहे भारतीय छात्र?

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भारत के छोटे शहरों और कस्बों से अब बड़ी संख्या में छात्र विदेशों में पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। यह बदलाव भारत के पारंपरिक “मेट्रो शहर” केंद्रित विदेशी शिक्षा प्रोफ़ाइल को बदल रहा है, जो पहले दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों के छात्रों तक सीमित थी।

 

शिक्षा ऋण पर बढ़ती निर्भरता

अपग्रैड स्टडी अब्रॉड की ट्रांसनेशनल एजुकेशन (TNE) रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, अब भारत के 57% विदेशी छात्र टियर-2 और टियर-3 शहरों से आते हैं। इनमें से अधिकतर छात्र सीमित आर्थिक साधनों वाले परिवारों से हैं, जिसके कारण शिक्षा ऋण पर निर्भरता तेज़ी से बढ़ी है। अब लगभग एक-तिहाई भारतीय छात्र विदेश में पढ़ाई के लिए बैंक से लोन ले रहे हैं।

 

रिपोर्ट बताती है कि पहले छात्र अपनी पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप या पारिवारिक बचत पर निर्भर रहते थे, लेकिन अब शिक्षा ऋण प्रमुख स्रोत बन चुका है। केवल 28% छात्र ही अब स्कॉलरशिप पर पढ़ाई कर पा रहे हैं।

 

लॉयला ग्लोबल करियर्स लिमिटेड की मैनेजर जैसी जोसेफ के अनुसार, “लोन पर आधारित विदेशी शिक्षा भारतीय परिवारों के लिए अवसर भी है और जोखिम भी। छात्रों को यह समझना होगा कि क्या उनके चुने हुए कोर्स से मिलने वाली आय भविष्य में लोन चुकाने के लिए पर्याप्त होगी या नहीं।”

 

उन्होंने चेताया कि “कई परिवार अपने वित्तीय भविष्य को ऐसे शिक्षा निवेश पर लगा रहे हैं जिसके परिणाम की कोई गारंटी नहीं है। इसलिए छात्रों को यथार्थवादी करियर प्रोजेक्शन और बैकअप प्लान तैयार करना चाहिए।”

 

बजट और निवेश की सोच में बदलाव

करीब 75% छात्र 30 लाख रुपये तक के बजट में अपनी पढ़ाई पूरी करने की योजना बना रहे हैं, जिनमें से 40% का बजट 10–20 लाख रुपये और 34% का बजट 20–30 लाख रुपये के बीच है।

 

एमएम एडवाइजरी सर्विसेज की डायरेक्टर मारिया मैथाई कहती हैं, “आज शिक्षा ऋण लेने वाले छात्र भारी दबाव में हैं। हर सेमेस्टर उनके लिए निवेश पर वापसी (ROI) साबित करने जैसा हो गया है। अब प्रयोग करने की गुंजाइश कम है, उन्हें सुनिश्चित परिणाम चाहिए।”

 

कम खर्च वाले देशों की बढ़ती लोकप्रियता

खर्च के प्रति संवेदनशीलता ने अब छात्रों की पसंद भी बदल दी है। जर्मनी, जहां सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में ट्यूशन फीस नहीं ली जाती, भारतीय छात्रों के लिए नया आकर्षण बन गया है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में जहां 13% भारतीय छात्र जर्मनी में पढ़ते थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 32.6% हो गया है, जो कनाडा और अमेरिका दोनों से आगे निकल चुका है।

 

कम या शून्य फीस, अनुकूल वीज़ा नीतियां, और उच्च गुणवत्ता वाले STEM और मैनेजमेंट प्रोग्राम इसकी प्रमुख वजहें हैं। जर्मनी के संघीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, वहां भारतीय छात्रों की संख्या 2023 के 49,500 से बढ़कर 2025 में लगभग 60,000 तक पहुंचने की संभावना है।

 

भाषा की बाधाएं भी कम हो रही हैं, क्योंकि अब फ्रांस, फिनलैंड और जर्मनी जैसे देशों में अंग्रेज़ी माध्यम में कोर्स बढ़ रहे हैं।

 

विदेश में पढ़ाई के बदलते मकसद

अब केवल 16.6% छात्र स्थायी निवास (PR) के लिए विदेश जाना चाहते हैं, जबकि लगभग 48.2% छात्र बेहतर नौकरी अवसरों की तलाश में हैं — खासकर STEM और मैनेजमेंट क्षेत्रों में।

 

मास्टर्स प्रोग्राम छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं, जिनमें 86.5% छात्र पोस्टग्रेजुएट कोर्स चुन रहे हैं। वहीं, मैनेजमेंट कोर्स की मांग तीन साल में 30% से बढ़कर 56% हो गई है।

 

मारिया मैथाई कहती हैं, “विदेशी शिक्षा अब लोकतांत्रिक हो चुकी है। डिजिटल पहुंच ने छोटे शहरों के छात्रों को भी वैश्विक शिक्षा से जोड़ा है। आज के पहले पीढ़ी के विद्यार्थी करियर-केंद्रित हैं और विश्वविद्यालयों को उन्हें व्यक्तिगत समर्थन देने की ज़रूरत है।”

 

पारंपरिक गंतव्यों की लोकप्रियता में गिरावट

अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे पारंपरिक शिक्षा केंद्र अब आकर्षण खो रहे हैं, विशेष रूप से छोटे शहरों के छात्रों के बीच जो कम लागत और करियर-उन्मुख कोर्स चाहते हैं।

 

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में आवेदन 13% घटे हैं, कनाडा की हिस्सेदारी 17.85% से घटकर 9.3% रह गई है, और ब्रिटेन में भारतीय छात्रों के वीज़ा अप्रूवल में 11% की कमी आई है। इसके विपरीत, यूएई, कतर और यूरोप जैसे क्षेत्र नए विकल्प बन रहे हैं। इन देशों में Georgetown, Carnegie Mellon, Heriot-Watt जैसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के अंतरराष्ट्रीय कैंपस हैं, जो कम खर्च में वैश्विक मान्यता वाले डिग्री प्रदान करते हैं। आज यूएई में कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों में 42% भारतीय छात्र हैं — यह इस बदलाव की स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।

 

कहने का तात्पर्य कि भारतीय छात्रों की विदेश में पढ़ाई की कहानी अब मेट्रो शहरों से निकलकर छोटे शहरों की सड़कों तक पहुंच गई है। परंतु इस नई लहर के साथ शिक्षा ऋण, लागत, और अनिश्चित करियर जैसे जोखिम भी बढ़ गए हैं। छात्रों के लिए यह ज़रूरी है कि वे भावनाओं से नहीं, बल्कि रणनीति से अपने विदेशी शिक्षा के सपनों की योजना बनाएं।

 

एडइनबॉक्स टीम

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