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सीबीएसई स्कूल परफॉर्मेंस रिपोर्ट: पारदर्शिता की दिशा में अधूरा कदम

सीबीएसई की स्कूल एकेडमिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट शिक्षा में पारदर्शिता लाने का बड़ा कदम है, लेकिन इसे सार्वजनिक न करना अभिभावकों के अधिकारों का हनन है।

 

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा स्कूलों की एकेडमिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट (School Academic Performance Report) तैयार किया जाना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक और सराहनीय पहल है। लेकिन इस रिपोर्ट को केवल संबंधित स्कूल प्रधान या संस्था प्रमुख तक सीमित रखना आमजन और अभिभावकों के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। यह न केवल पारदर्शिता के सिद्धांत के विपरीत है, बल्कि नागरिकों के सूचना के अधिकार (Right to Information) पर भी कुठाराघात करता है।

 

एक अभिभावक को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जिस स्कूल में उसका बच्चा पढ़ रहा है, वह राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर किस स्थान पर है। 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं में उस स्कूल के विद्यार्थियों का औसत प्रदर्शन राज्य और राष्ट्रीय औसत से बेहतर है या कमजोर — यह जानकारी अभिभावक का बुनियादी अधिकार है।

 

कई बार ऐसा भी होता है कि किसी स्कूल के छात्रों का प्रदर्शन औसत आंकड़ों की तुलना में कहीं बेहतर होता है, या कुछ मामलों में काफी कमजोर। इस स्थिति में यह जरूरी है कि स्कूल एकेडमिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि अभिभावक और आमजन स्कूल के वास्तविक शैक्षणिक स्तर का आकलन कर सकें।

 

परफॉर्मेंस रिपोर्ट की अहमियत

व्यवहारिक अनुभव बताता है कि कई स्कूलों में 10वीं कक्षा तक शिक्षा का स्तर तो उत्कृष्ट होता है, लेकिन सीनियर सेकेंडरी स्तर पर अच्छे शिक्षकों की कमी के कारण गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।

 

कुछ स्कूलों में वाणिज्य संकाय (Commerce Stream) मजबूत होता है, वहीं विज्ञान या कला संकाय की स्थिति कमजोर रहती है। अगर ये आंकड़े स्कूल एकेडमिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट के माध्यम से सार्वजनिक हों, तो अभिभावक तुलना कर सकेंगे कि किस संकाय में कौन-सा स्कूल बेहतर है और अपने बच्चों के लिए कौन-सा विकल्प चुनना उचित रहेगा।

 

फीस और पारदर्शिता पर असर

जब स्कूलों की शैक्षणिक उपलब्धियों और सुविधाओं का तुलनात्मक डेटा सार्वजनिक होगा, तो स्कूल प्रशासन मनमाने ढंग से फीस तय नहीं कर पाएंगे। फीस अब “परफॉर्मेंस आधारित” हो जाएगी — यानी अगर कोई स्कूल उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और सुविधाएँ प्रदान करता है, तभी वह अधिक फीस वसूलने का नैतिक अधिकार रखेगा। यह पारदर्शिता का तंत्र स्वतः फीस निर्धारण को तर्कसंगत बनाएगा — जो स्कूल बेहतर प्रदर्शन करेगा वही टिकेगा, और टिकना है तो बेहतर होना ही पड़ेगा।

 

बालिका शिक्षा और लैंगिक समानता पर दृष्टि

बालिका शिक्षा के प्रति अभिभावक स्वाभाविक रूप से अधिक सजग रहते हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि किसी स्कूल में बालिकाओं का नामांकन कितना है और उनकी शैक्षणिक प्रगति कैसी है। लेकिन अभी तक यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होती, जिससे बालिकाओं के प्रवेश से जुड़ा निर्णय कठिन हो जाता है।

 

स्कूल एकेडमिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट इस कमी को दूर करेगी। इसमें बालिकाओं के नामांकन और उनकी प्रदर्शन-संबंधी जानकारी उपलब्ध होगी, जिससे अभिभावक बालिकाओं की शिक्षा के लिए अधिक सूझबूझ भरे निर्णय ले सकेंगे।

साथ ही, यह स्कूल प्रशासन पर भी बालिका शिक्षा को गंभीरता से लेने का दबाव बनाएगी।

 

सिर्फ पढ़ाई नहीं, खेलों में भी प्रदर्शन का विश्लेषण

यह रिपोर्ट केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें खेलकूद प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों की भागीदारी और प्रदर्शन का भी राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तुलनात्मक विश्लेषण शामिल है।

 

इससे खेलों में रुचि रखने वाले छात्र और उनके अभिभावक यह जान सकेंगे कि कौन सा स्कूल खेलों में बेहतर प्रदर्शन करता है, जैसे — एथलेटिक्स, तैराकी, शूटिंग आदि में उसकी स्थिति कैसी है। यह पारदर्शिता न केवल छात्रों के लिए कैरियर दिशा तय करने में सहायक होगी, बल्कि स्कूलों को भी खेल प्रतिभाओं के विकास के लिए प्रेरित करेगी।

 

रिपोर्ट कार्ड में क्या खास है?

सीबीएसई द्वारा तैयार किए गए इस स्कूल एकेडमिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट कार्ड में 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण इन प्रमुख श्रेणियों में किया गया है:

राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर औसत अंकों की तुलना:

छात्रों द्वारा अर्जित अंकों की तुलना राज्य व राष्ट्रीय औसत से की गई है।

जेंडर-आधारित विश्लेषण:

नामांकित विद्यार्थियों का तुलनात्मक विश्लेषण लड़कियों और लड़कों के आधार पर किया गया है।

विषयवार औसत अंकों की तुलना:

छात्रों के विषयवार प्रदर्शन का राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तुलनात्मक विश्लेषण।

खेलों में भागीदारी और उपलब्धियों का विश्लेषण:

खेलों में छात्रों की भागीदारी और प्रदर्शन को राज्य और राष्ट्रीय मानकों से तुलना की गई है।

सीबीएसई की यह पहल निश्चित रूप से शैक्षणिक गुणवत्ता में पारदर्शिता लाने की दिशा में बड़ा कदम है। लेकिन अगर इस रिपोर्ट को केवल स्कूल प्रधान तक सीमित रखा गया, तो इसका वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। अभिभावकों, विद्यार्थियों और आमजन को इन आंकड़ों तक पहुँच देना अनिवार्य है, ताकि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बढ़े, और देश का हर स्कूल अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित हो।

 

पारदर्शिता तभी सार्थक है, जब जानकारी सभी के लिए सुलभ हो — क्योंकि शिक्षा में जवाबदेही ही असली सुधार की शुरुआत है।

 

रईस अहमद 'लाली'

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