
मेघालय के सघन जंगलों में पाया जाने वाला दुर्लभ औषधीय पौधा गोनियोथालामस सिमॉन्सी (Goniothalamus simonsii) अब अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित कर रहा है। नागालैंड यूनिवर्सिटी और असम डाउन टाउन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस पौधे पर पहला व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन किया है, जिसके निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Chemistry and Biodiversity में प्रकाशित हुए हैं।
प्राकृतिक औषधियों के दौर में महत्वपूर्ण खोज
नागालैंड यूनिवर्सिटी के वन्य विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. मयूर मसूम फुकन के अनुसार, यह अध्ययन पारंपरिक औषधीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु का कार्य करता है। उन्होंने कहा कि, “आज जब एंटीबायोटिक प्रतिरोध, पुरानी बीमारियां और सिंथेटिक दवाओं के दुष्प्रभाव स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी पड़ रहे हैं, ऐसे समय में प्राकृतिक औषधियों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।”
डॉ. फुकन ने बताया कि भारत की समृद्ध जैव विविधता में नई दवाओं की खोज के लिए असीम संभावनाएं हैं। गोनियोथालामस सिमॉन्सी ऐसा ही एक पौधा है, जिसे स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से पेट दर्द, गले की जलन, टाइफाइड और मलेरिया जैसी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन वैज्ञानिक स्तर पर इसका अध्ययन अब तक नहीं हुआ था।
पौधे में पाए गए शक्तिशाली जैव-सक्रिय यौगिक
अध्ययन में यह खुलासा हुआ कि गोनियोथालामस सिमॉन्सी में कई महत्वपूर्ण जैव-सक्रिय यौगिक मौजूद हैं, जो एंटीऑक्सीडेंट, एंटीमाइक्रोबियल और एंटी-कैंसर गुणों से भरपूर हैं। शोधकर्ताओं ने आधुनिक विश्लेषणात्मक तकनीकों और कंप्यूटेशनल मॉडलिंग का उपयोग करते हुए यह दर्शाया कि इस पौधे के प्राकृतिक यौगिक कैंसर से जुड़े प्रोटीन के साथ किस प्रकार इंटरैक्ट करते हैं।
नागालैंड यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर जगदीश के. पटनाइक ने कहा, “यह शोध न केवल इस दुर्लभ पौधे की वैज्ञानिक समझ को बढ़ाता है, बल्कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक अनुसंधान से जोड़ने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।”
कैंसर से लड़ाई में मददगार साबित हो सकता है यह पौधा
अध्ययन में पाया गया कि गोनियोथालामस सिमॉन्सी के विभिन्न हिस्सों से निकाले गए अर्क में एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-डायबिटिक और एंटी-कैंसर जैसी कई जैविक गतिविधियां पाई गईं। खास बात यह रही कि इसके अर्क ने कोलन कैंसर कोशिकाओं पर विशेष रूप से प्रभावशाली असर दिखाया, जिससे यह पौधा भविष्य में प्राकृतिक कैंसर उपचार के लिए एक संभावित स्रोत बन सकता है।
संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण की जरूरत
इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता सैमसन रोज़ली सांगा ने बताया कि गोनियोथालामस सिमॉन्सी अब अत्यंत दुर्लभ हो चुका है और इसकी उपस्थिति केवल कुछ ही प्राकृतिक आवासों तक सीमित रह गई है। अंतरराष्ट्रीय संगठन IUCN ने इसे ‘संकटग्रस्त प्रजाति’ (Endangered Species) के रूप में सूचीबद्ध किया है। उन्होंने कहा, “हमारा शोध इस पौधे के संरक्षण, सतत उपयोग और इसके औषधीय महत्व को समझने में नई दिशा प्रदान करेगा।”
यह अध्ययन न केवल पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता की समृद्धि को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि स्थानीय पारंपरिक ज्ञान वैज्ञानिक दृष्टि से कितना मूल्यवान है। गोनियोथालामस सिमॉन्सी पर हुआ यह शोध प्राकृतिक औषधियों के क्षेत्र में भारत की नई संभावनाओं को उजागर करता है — जो न सिर्फ बीमारियों से लड़ने में मददगार हो सकता है, बल्कि पारिस्थितिकी संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।




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