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विदेश में बसे भारतीय वैज्ञानिकों को देश में लाने की बड़ी सरकारी पहल, रिसर्च और शिक्षा क्षेत्र को मिलेगा नया बल

A major government initiative to bring back Indian scientists living abroad

भारतीय सरकार एक नई योजना पर काम कर रही है, जिसके तहत विदेशों में बसे भारतीय मूल के शीर्ष वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को भारत के संस्थानों में काम करने के लिए आकर्षित किया जाएगा।

यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब ट्रम्प प्रशासन के तहत अमेरिका में उच्च शिक्षा से जुड़े कड़े नियम लागू हो रहे हैं, जिन्हें कई विशेषज्ञ विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता के लिए खतरा मानते हैं।

वर्तमान में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय विज़िटिंग एडवांस्ड जॉइंट रिसर्च फैकल्टी स्कीम (VAJRA) चलाता है। इसका उद्देश्य विदेशों में रह रहे वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों, जिनमें एनआरआई और ओसीआई शामिल हैं, को एक निश्चित अवधि के लिए भारत के सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

अब, अमेरिका में हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए, शिक्षा मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ मिलकर एक नई योजना तैयार की जा रही है, ताकि ये शोधकर्ता भारत में शिक्षण या शोध कार्य में समय दे सकें।

ब्रेन सर्कुलेशन की ओर कदम

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में Centre for New Economic Diplomacy की सीनियर फैलो अर्पण तुलस्यान ने इसे जरूरी कदम बताया।

उन्होंने कहा, “कई वर्षों से हम देख रहे हैं कि बड़ी संख्या में भारतीय छात्र और पेशेवर विदेश जाकर बस रहे हैं और सफल करियर बना रहे हैं। दो दशक से ‘ब्रेन ड्रेन’ पर बात हो रही है। अब समय है इसे ‘ब्रेन सर्कुलेशन’ में बदलने का।”  

तुलस्यान का कहना है कि लक्ष्य ऐसे संरचित अवसर बनाना होना चाहिए, जिनसे ये पेशेवर सिर्फ धन भेजने तक सीमित न रहें, बल्कि ज्ञान, अनुभव और सहयोग से भी योगदान दें।

“जरूरी नहीं कि वे हमेशा के लिए लौटें, लेकिन भारत से उनका जुड़ाव बना रहना चाहिए ताकि हम उनके कौशल, नेटवर्क और विशेषज्ञता का लाभ उठा सकें,” उन्होंने कहा।

उन्होंने बताया कि मौजूदा समय भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ मजबूत जुड़ाव बढ़ाने के लिए सबसे उपयुक्त है — एक तरफ अमेरिका में H-1B वीज़ा को लेकर अनिश्चितता और कई देशों में एंटी-इमिग्रेशन माहौल है, दूसरी तरफ भारत नवाचार-आधारित विकास पर जोर दे रहा है।

सूत्रों के अनुसार, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय, शिक्षा मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के बीच इस नई योजना को डिजाइन करने को लेकर बैठकें हो चुकी हैं।

योजना का उद्देश्य भारतवंशी प्रतिष्ठित अकादमिक और शोधकर्ताओं को एक निश्चित अवधि के लिए भारत में पढ़ाने या शोध करने के लिए लाना है। उन्हें लैब और शोध टीम स्थापित करने के लिए बड़े सेट-अप ग्रांट दिए जाएंगे।

प्रतिस्पर्धी वेतन की दिशा में भारत

तुलस्यान के अनुसार, “भारत की शोध संरचना और संस्थागत संस्कृति में सुधार हुआ है। वेतन भी पहले की तुलना में प्रतिस्पर्धी हैं, भले ही अभी अमेरिका के बराबर नहीं, लेकिन हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। ऐसे माहौल में यह भारत के लिए अवसर है।”

 

विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक प्रोत्साहन के अलावा, एक स्वागतपूर्ण माहौल — जैसे आवास, आतिथ्य और प्रशासनिक सहयोग — सफलता की कुंजी होगा।

तुलस्यान ने स्वीकार किया कि लौटने वाले अकादमिक एक निश्चित जीवनस्तर की अपेक्षा करते हैं, लेकिन सिर्फ आर्थिक लाभ काफी नहीं है।

उन्होंने कहा, “समग्र सहयोग जरूरी है — जैसे जीवनसाथी के करियर में मदद, बच्चों की शिक्षा, दस्तावेज़ीकरण या पुनर्वास से जुड़े कामों में सहायता। लंबे समय बाद लौटने वालों के लिए सहज पुनर्संलग्नता महत्वपूर्ण है।

“सरकार कई देशों के साथ योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता पर काम कर रही है, जिससे लौटने वाले पेशेवरों का संक्रमण आसान होगा,” उन्होंने बताया।

भारत के शोध इकोसिस्टम को मजबूती

IITs भी इस पहल का समर्थन कर रहे हैं और कई निदेशक चर्चाओं में शामिल हैं। शुरुआत में 12–14 प्रमुख STEM क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी। सरकार को उम्मीद है कि यह पहल भारत की शोध क्षमता को मजबूत करेगी और प्रतिभा के विदेशी पलायन को कम करेगी।

तुलस्यान के अनुसार, यह पहल भारत की वैश्विक छवि को भी मजबूत करती है। भारतवंशी शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों की वापसी से भारत एक उभरते नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित होगा।

वे न सिर्फ विशेषज्ञता लाते हैं, बल्कि वैश्विक नेटवर्क और रिश्ते भी साथ लाते हैं, जो भारत के शोध और अकादमिक ढांचे को और सशक्त बनाते हैं — जैसे संयुक्त शोध, सह-निर्देशित पीएचडी, और एक्सचेंज प्रोग्राम।

उन्होंने कहा, “ऐसे विशेषज्ञ सांस्कृतिक और वैज्ञानिक एंबेसडर की भूमिका निभाते हैं। उनका वैश्विक अनुभव हरित तकनीक, AI, बायोटेक और क्लीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में ज्ञान अंतर को भरने में मदद करता है।”

प्रक्रियागत बाधाएं अभी भी चुनौती

VAJRA और रामानुजन फेलोशिप जैसे कार्यक्रम मौजूद होने के बावजूद, प्रक्रियागत जटिलताएं, सीमित फंडिंग और छोटी अवधि के कारण उनका असर सीमित रहा है। नई योजना इन खामियों को दूर करने पर केंद्रित होगी — लंबी अवधि, अधिक स्वायत्तता और अधिक लचीला फंडिंग ढांचा देकर।

हालांकि योजना को लागू करने में भारत को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है — जैसे शोध अवसंरचना, फंडिंग की निरंतरता और संस्थागत स्वायत्तता।

तुलस्यान के अनुसार, पारंपरिक चुनौतियों में सुधार हो रहा है। अनुसंधान संरचना मजबूत हुई है और अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (NRF) के गठन से फंडिंग और अवसर IITs–IIM तक सीमित न रहकर टियर-2 और टियर-3 संस्थानों तक पहुंच रहे हैं।

लेकिन असली चुनौती संस्थागत कठोरता और ब्यूरोक्रेसी है। अवसंरचना जल्दी बन सकती है, लेकिन मानसिकता और प्रशासनिक संस्कृति बदलने में समय लगता है।

उन्होंने कहा कि फंडिंग चिंता का विषय तो है, लेकिन पहले की तुलना में कम। GDP के मुकाबले फंडिंग स्थिर है, लेकिन कुल राशि बढ़ी है। “नई फंडिंग मॉडल — जैसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप — भी उभर रहे हैं। असली मुद्दा फंडिंग की उपलब्धता नहीं, बल्कि इसका समय पर वितरण है — मंजूरियों में देरी, कागज़ी कार्य और प्रक्रियागत बाधाएं।

“अगर प्राथमिकता तय करनी हो, तो प्रशासनिक देरी सबसे बड़ी चुनौती है, फिर प्रतिभा को बनाए रखना और संस्थागत लचीलेपन की कमी,” उन्होंने कहा।

अधिकारियों द्वारा बौद्धिक संपदा अधिकार, कार्यकाल संरचना और फंडिंग की लचीलापन जैसे बिंदुओं पर अंतिम रूप दिया जा रहा है। प्रस्ताव तैयार होने के बाद इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा।

यह कदम भारत के बड़े लक्ष्य — वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विश्वविद्यालय बनाना और देश में विश्वस्तरीय शोध क्षमता विकसित करना — से जुड़ा है।

भारत सरकार विदेशी भारतीय मूल के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को देश में पढ़ाने और शोध कार्य के लिए आकर्षित करने की नई योजना पर काम कर रही है। इस पहल का लक्ष्य भारत के शोध इकोसिस्टम को मजबूत करना, ब्रेन सर्कुलेशन बढ़ाना और वैश्विक स्तर पर भारत की अकादमिक क्षमता को ऊंचा उठाना है। 

एडइनबॉक्स टीम

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