
ब्रिटेन लंबे समय से भारतीय छात्रों और वर्कर्स की पसंदीदा मंज़िल रहा है। विश्व स्तर की यूनिवर्सिटीज़, बड़े कॉर्पोरेट हब और बेहतर करियर संभावनाएं भारतीय युवाओं को यहां खींचती रही हैं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। ब्रिटेन में इमिग्रेशन नियमों में लगातार हो रहे बदलावों ने भारतीयों की राह मुश्किल कर दी है, जिसका असर आधिकारिक आंकड़ों में साफ दिख रहा है।
2 लाख से ज्यादा लोगों ने छोड़ा ब्रिटेन
ब्रिटिश ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स (ONS) द्वारा जारी ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, जून 2025 में समाप्त हुए साल में 2 लाख से ज्यादा लोग ब्रिटेन छोड़कर गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 80% अधिक है। कोविड-19 महामारी के बाद यह किसी भी साल में देश छोड़ने वालों की सबसे बड़ी संख्या है।
रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि अब न केवल भारतीय, बल्कि कई अन्य देशों के लोग भी ब्रिटेन में रहना पहले जैसा आकर्षक विकल्प नहीं मान रहे हैं।
कितने भारतीय लौटे?
ONS डेटा के मुताबिक, पिछले एक वर्ष में कुल 74,000 भारतीयों ने ब्रिटेन छोड़ा, जिसमें 45,000 भारतीय छात्र, 22,000 भारतीय वर्कर्स, 7,000 लोग जो अन्य वीज़ा कैटेगरी (फैमिली, स्पाउज़ आदि) से जुड़े, शामिल हैं। गैर-यूरोपीय देशों में यह संख्या सबसे अधिक है। तुलना करें तो चीन के करीब 42,000 नागरिक इसी अवधि में ब्रिटेन से लौटे हैं।
क्यों टूट रहा है ब्रिटेन से भारतीयों का भरोसा?
भारतीयों के लौटने की सबसे बड़ी वजह ब्रिटेन में लागू या प्रस्तावित इमिग्रेशन पॉलिसी में बड़े बदलाव हैं। इनमें प्रमुख हैं:
1. पोस्ट-स्टडी वर्क वीज़ा में कटौती
पहले ग्रेजुएशन के बाद छात्रों को 2 साल तक काम करने की अनुमति मिलती थी। नए नियम के बाद यह अवधि घटाकर 18 महीने कर दी जाएगी। इससे भारत सहित कई देशों के छात्रों की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।
2. परमानेंट रेज़िडेंसी (ILR) की समय सीमा दोगुनी
ब्रिटेन में पहले 5 साल रहकर लोग इंडेफिनिट लीव टू रिमेन (स्थायी निवास) के लिए आवेदन कर सकते थे। अब यह अवधि 5 साल से बढ़ाकर 10 साल कर दी गई है।
इस बदलाव से लंबे समय की योजनाएं बनाने वाले भारतीय वर्कर्स और प्रोफेशनल्स के लिए ब्रिटेन कम आकर्षक हो गया है।
3. पढ़ाई पूरी होते ही देश छोड़ने की मजबूरी
रिपोर्ट बताती है कि बड़ी संख्या में छात्र केवल पढ़ाई पूरी होने के बाद नियमों के कारण देश छोड़ने को मजबूर हुए। कई लोग नौकरी ढूंढ़ने या वहां बसने की उम्मीद लेकर गए थे, लेकिन सख्त नियमों ने विकल्प सीमित कर दिए।
ब्रिटेन की बदलती इकोनॉमी और सख्त नीतियां
ब्रिटेन में बढ़ती महंगाई, नौकरी के मुकाबले बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सख्त इमिग्रेशन रुख ने वहां रहना पहले जैसा आसान नहीं छोड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बदलावों का असर ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज और कंपनियों पर भी पड़ेगा, क्योंकि भारतीय छात्र वहां की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं।




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