
केरल में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर जारी गतिरोध एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। इसी बीच राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर सार्वजनिक रूप से असहमति जताई है। यह टिप्पणी उन्होंने जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर पुरस्कार समारोह के दौरान की, जहां यह सम्मान देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और केरल के पूर्व राज्यपाल जस्टिस (सेवानिवृत्त) पी. सथाशिवम को प्रदान किया गया।
राज्यपाल अर्लेकर ने कहा कि लोकतंत्र में हर संस्था की एक स्पष्ट भूमिका और सीमा होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी सही तरीके से काम कर सकती है, जब सभी संस्थाएं अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाओं को समझें और उनका सम्मान करें। उन्होंने संकेत दिया कि संस्थागत संतुलन बिगड़ने से संवैधानिक मूल्यों को नुकसान पहुंच सकता है।
यह बयान सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के संदर्भ में आया है, जिसमें कोर्ट ने डिजिटल विज्ञान, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और एपीजे अब्दुल कलाम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपतियों की नियुक्ति के लिए जस्टिस (सेवानिवृत्त) सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने इस समिति से दोनों विश्वविद्यालयों के लिए एक-एक नाम की सिफारिश करने को कहा है।
दरअसल, इन नियुक्तियों को लेकर केरल के राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच लंबे समय से मतभेद चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर को अपने आदेश में कहा था कि अदालत के प्रयासों के बावजूद इस मुद्दे पर गतिरोध बना हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में कोर्ट ने समिति से कहा कि वह वरीयता क्रम में नामों को सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करे और मुख्यमंत्री के पत्र तथा कुलपति के जवाब पर एक विस्तृत रिपोर्ट भी दे।
राज्यपाल अर्लेकर ने आरोप लगाया कि कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पूर्व निर्धारित सिद्धांतों की अनदेखी की है। इससे पहले राज्यपाल ने केरल हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 27 नवंबर 2024 को कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के. शिवप्रसाद को एपीजे अब्दुल कलाम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त करने संबंधी अधिसूचना को रद्द कर दिया था।
लोक भवन की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि राज्यपाल ने लोकतंत्र में एक संस्था द्वारा दूसरी संस्था की भूमिका “हथियाने” की प्रवृत्ति की आलोचना की है। उनका कहना था कि संविधान में संशोधन करने का अधिकार संसद और निर्वाचित विधायिकाओं के पास है, जबकि अदालतों की भूमिका संविधान की व्याख्या तक सीमित है, न कि उसमें बदलाव करने की।
राज्यपाल ने यह भी चिंता जताई कि एक ही मुद्दे पर अलग-अलग और विरोधाभासी व्याख्याएं या फैसले संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह विवाद केवल कुलपति नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों के संतुलन, न्यायपालिका की भूमिका और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर एक व्यापक बहस की ओर इशारा करता है।




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