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Reserved Category Students' Share in Higher Education Exceeds 60%, IIM Report Reveals

हरे-भरे यूनिवर्सिटी कैंपस क्यों बन रहे हैं छात्रों की पहली पसंद?

हरे-भरे यूनिवर्सिटी कैंपस क्यों बन रहे हैं छात्रों की पहली पसंद?

– कनिष्का 

जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिंग और पेड़ों को लेकर बढ़ती चिंता के दौर में आज के युवा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि सुकून और संतुलन भी चाहते हैं। देशभर में छात्र अब ऐसे कॉलेज और विश्वविद्यालय ढूंढ रहे हैं, जहां पढ़ाई के साथ हरियाली, साफ हवा और मानसिक शांति भी मिले। यही वजह है कि हरे-भरे (ग्रीन) यूनिवर्सिटी कैंपस आज एडमिशन बढ़ाने का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं।

कंक्रीट इमारतों और गिने-चुने पेड़ों वाले साधारण कैंपस भले ही लागत के लिहाज से सस्ते हों, लेकिन वे उन ग्रीन कैंपस का मुकाबला नहीं कर पा रहे, जहां ताजा हवा, खुली जगहें, आधुनिक सुविधाएं और बेहतर जीवनशैली उपलब्ध है। 21वीं सदी के भारतीय छात्रों के लिए ग्रीन कैंपस अब लग्ज़री नहीं, बल्कि एक ज़रूरत बन चुका है। यह लेख बताता है कि हरियाली वाले कैंपस क्यों ज्यादा छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं, खासकर पर्यावरण के प्रति जागरूक भारतीय युवाओं को।

भारतीय कैंपस में हरित बदलाव

भारत में तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण ने कॉलेज की तलाश को भी “सांस लेने की जगह” खोजने जैसा बना दिया है। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में AQI जब 300 के पार पहुंच जाता है, तो छात्र गूगल पर “भारत के सबसे ग्रीन कैंपस” या “प्रदूषण मुक्त कॉलेज” सर्च करने लगते हैं।

आईआईटी बॉम्बे, जहां 50 मेगावॉट सोलर पावर, ज़ीरो-वेस्ट हॉस्टल जैसी पहलें हैं, और दिल्ली की TERI यूनिवर्सिटी (LEED प्लेटिनम रेटिंग) में हर साल 20–30% तक आवेदन बढ़ रहे हैं। वहीं, सस्टेनेबिलिटी को NIRF रैंकिंग में शामिल किए जाने से आईआईटी मद्रास (2025 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य) को भी शीर्ष स्थान मिला है।

इसके उलट, साधारण कैंपस—जहां घुटन भरा माहौल, पानी की किल्लत और सूनी दीवारें होती हैं—छात्रों में थकान और बर्नआउट बढ़ाते हैं। ASSOCHAM की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, 68% भारतीय छात्र कॉलेज चुनते समय ग्रीन फीचर्स को प्राथमिकता देते हैं, जबकि 2018 में यह आंकड़ा 42% था।

सेहत और खुशी: एडमिशन का छुपा हुआ कारण

WHO समर्थित एक अध्ययन के अनुसार, हरे-भरे खुले स्थान तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) को 15–20% तक कम करते हैं, जिससे पढ़ाई पर ध्यान बढ़ता है। सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी का 1,000 एकड़ का कैंपस—जहां झीलें और ऑर्गेनिक फार्म हैं—25% तक बेहतर स्टूडेंट रिटेंशन दर्ज करता है। वहीं, भीड़भाड़ वाले कई सरकारी कॉलेजों में थकान के कारण 12% तक ड्रॉपआउट देखे गए हैं।

पोस्ट-कोविड दौर में योग डेक, हर्बल गार्डन और खुले स्पेस छात्रों और अभिभावकों के लिए अहम बन गए हैं। जब अभिभावक “भारत के सबसे टिकाऊ विश्वविद्यालय” या “पार्क वाले कॉलेज” सर्च करते हैं, तो वे जानते हैं कि प्रकृति मानसिक तनाव का सबसे बेहतर इलाज है।

भविष्य की नौकरियों के लिए ग्रीन स्किल्स

आने वाला जॉब मार्केट भी ग्रीन ओरिएंटेशन मांग रहा है। 2030 तक भारत को सोलर, इलेक्ट्रिक व्हीकल और वेस्ट मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में करीब 1 करोड़ ग्रीन जॉब्स की जरूरत होगी। बेंगलुरु की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान छात्रों को रूफटॉप गार्डन, बायोगैस प्लांट जैसे प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स से जोड़ते हैं, जिससे उन्हें टाटा पावर और रिलायंस ग्रीन जैसी कंपनियों में अवसर मिलते हैं।

FICCI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन कैंपस से पढ़े छात्रों को 15–20% बेहतर प्लेसमेंट मिलते हैं। यही वजह है कि “IIT ग्रीन कैंपस प्लेसमेंट” जैसे सर्च ट्रेंड्स तेजी से बढ़ रहे हैं।

छात्रों की ऑनलाइन खोज क्या कहती है?

Google Trends के अनुसार, “Green Campus University India” सर्च 2020 के बाद 150% बढ़ी है। “मुंबई के पास प्रदूषण मुक्त कॉलेज” जैसे कीवर्ड्स भी खूब सर्च किए जा रहे हैं। निजी विश्वविद्यालय जैसे ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और एलायंस यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु, अपनी हरियाली और सस्टेनेबल सुविधाओं के कारण छात्रों की पसंद बन रहे हैं। सोशल मीडिया पर #GreenCampusIndia जैसे ट्रेंड्स भी एडमिशन को बढ़ावा दे रहे हैं।

स्पष्ट है कि ग्रीन कैंपस ही आगे हैं, क्योंकि वे छात्रों का समग्र विकास करते हैं—शारीरिक, मानसिक और प्रोफेशनल। नीति-निर्माताओं को इसमें निवेश बढ़ाना चाहिए, विश्वविद्यालयों को अपने कैंपस को हरित बनाना चाहिए और छात्रों को एडमिशन लेते समय ग्रीन कैंपस की मांग करनी चाहिए।

भारत में शिक्षा का अगला बड़ा बदलाव हरियाली से शुरू होता है। 2026 के लिए शीर्ष ग्रीन विश्वविद्यालयों में दाखिला लेकर न सिर्फ बेहतर पढ़ाई, बल्कि बेहतर माहौल और सकारात्मक जीवनशैली भी पाई जा सकती है।

एडइनबॉक्स टीम

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