
– रईस अहमद ‘लाली’
देश में उच्च शिक्षा को लेकर सरकार और शिक्षा मंत्रालय की मंशा पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। उच्च शिक्षण संस्थानों को प्रतिस्पर्धी बनाने, वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने और युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं। नई शिक्षा नीति 2020 इसी सोच का परिणाम है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि केवल प्रतिस्पर्धा बढ़ा देने या पाठ्यक्रम बदल देने से उच्च शिक्षा की मूल समस्याएं हल नहीं होंगी। असली चुनौती गुणवत्ता, रोजगारपरकता और सांस्कृतिक चेतना—तीनों के बीच संतुलन बनाने की है।
आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे उच्च शिक्षा संस्थान ऐसे युवा तैयार कर पा रहे हैं, जो उद्योग, व्यापार और समाज की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सकें। हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में छात्र डिग्रियां लेकर निकल तो रहे हैं, लेकिन रोजगार के योग्य नहीं बन पा रहे। इससे शिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है। यह स्थिति तब है, जब देश में सरकारी और निजी—दोनों स्तरों पर उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। संस्थान खुलना अपने आप में उपलब्धि नहीं है, सवाल यह है कि वहां पढ़ाया क्या जा रहा है और कैसे पढ़ाया जा रहा है।
नई शिक्षा नीति ने पाठ्यक्रम में लचीलापन, कौशल आधारित शिक्षा और बहु-विषयक अध्ययन की बात कही है, लेकिन इसका क्रियान्वयन धीमा और असमान रहा है। कुछ गिने-चुने केंद्रीय और प्रतिष्ठित संस्थानों में सुधार दिखता है, जबकि राज्य विश्वविद्यालयों और सामान्य कॉलेजों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कई विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के सैकड़ों पद खाली हैं। योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों के बिना शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी, यह एक बुनियादी सवाल है। दुर्भाग्य से यह समस्या केवल छोटे संस्थानों तक सीमित नहीं, बल्कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक में दिखाई दे रही है।
इसी कमजोर व्यवस्था का नतीजा है कि बड़ी संख्या में भारतीय छात्र बेहतर शिक्षा की तलाश में विदेशों का रुख कर रहे हैं। उनमें से बहुत कम वापस लौटते हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में कैंपस खुलने से यह पलायन कुछ हद तक रुक सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। असली जरूरत अपने संस्थानों को मजबूत करने की है। यह भी सोचना होगा कि देश के शीर्ष संस्थान बाकी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अकादमिक सहयोग क्यों नहीं दे सकते, ताकि हर राज्य में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा उपलब्ध हो सके।
दूसरी ओर, नई शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को केवल रोजगार से जोड़ने के बजाय सांस्कृतिक और मूल्य आधारित बनाने की बात भी कही है। भारतीय भाषाओं, कला, लोक परंपराओं और मातृभाषा में शिक्षा पर जोर नीति का अहम हिस्सा है। लेकिन पांच साल बाद भी यह पहल ज्यादातर कागजों और पाठ्यक्रम संशोधन तक सिमट कर रह गई है। संस्कृति को अक्सर नृत्य, संगीत या कला तक सीमित समझ लिया जाता है, जबकि वह जीवन दृष्टि, भाषा, व्यवहार और सामाजिक मूल्यों में झलकती है।
अगर शिक्षा केवल नौकरी दिलाने की मशीन बन जाए, तो वह अधूरी रह जाती है। भारतीय दर्शन हमेशा से ‘सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्’ के जरिए समग्र विकास पर जोर देता रहा है। नई शिक्षा नीति के पास यह अवसर था कि वह आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जोड़कर एक संतुलित शिक्षा व्यवस्था खड़ी करे। लेकिन इसके लिए संस्थागत ढांचे, प्रशिक्षित शिक्षकों और स्थानीय स्तर पर ठोस पहल की जरूरत है, जो अब तक कमजोर दिखाई देती है।
भारत की विविधता ही उसकी ताकत है। हर राज्य की अपनी भाषा, कला, लोकगीत और परंपराएं हैं। अगर शिक्षा के जरिए बच्चों और युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ा जाए, तो वे न केवल बेहतर पेशेवर बनेंगे, बल्कि जिम्मेदार और आत्मविश्वासी नागरिक भी बनेंगे। मातृभाषा में शिक्षा की सिफारिश इसी दिशा में एक सही कदम है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के बिना यह लक्ष्य अधूरा रहेगा।
आज जब वैश्वीकरण और पश्चिमी मॉडल का दबाव लगातार बढ़ रहा है, तब भारतीय शिक्षा व्यवस्था को केवल रैंकिंग और प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उच्च शिक्षा को गुणवत्ता, रोजगार, और सांस्कृतिक स्वाभिमान—तीनों को साथ लेकर चलना होगा। इसके लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और समाज को मिलकर गंभीर और त्वरित कदम उठाने होंगे। शिक्षा तभी सार्थक होगी, जब वह युवा को सिर्फ डिग्रीधारी नहीं, बल्कि सक्षम, संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से जागरूक नागरिक बनाए।




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