
उत्तराखंड के प्रतिष्ठित आईआईटी रुड़की में गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन का उद्देश्य आधुनिक शिक्षा के साथ रामायण के जीवन मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को समझाना है। सम्मेलन का आयोजन आईआईटी रुड़की और अमेरिका स्थित श्री रामचरित भवन के संयुक्त सहयोग से किया गया है।
इस सम्मेलन में भारत सहित कई देशों से आए विद्वान, संत, शिक्षाविद और शोधकर्ता भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और समाज निर्माण से जुड़े विषयों पर गहन चर्चा होगी। सम्मेलन में लगभग 150 शोध पत्र प्रस्तुत किए जाने हैं, जिनमें रामायण और उससे जुड़े आध्यात्मिक व सामाजिक पक्षों पर विचार रखा जाएगा।
शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, समाज सेवा भी
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ रोजगार पाना नहीं होना चाहिए, बल्कि मानवता की सेवा और समाज के कल्याण में योगदान देना भी उतना ही जरूरी है। रामायण के आदर्श आज के समय में भी प्रासंगिक हैं और युवाओं को जीवन में सही दिशा दिखा सकते हैं।
रामचरितमानस से प्रेरित है IIT रुड़की का राष्ट्रगान
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के.के. पंत ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए बताया कि संस्थान का राष्ट्रगान भी गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस की एक पंक्ति से प्रेरित है।
उन्होंने कहा, “रामचरितमानस की पंक्ति ‘परहित सरिस धर्म नहीं भाई’ और आईआईटी रुड़की के राष्ट्रगान की पंक्ति ‘सर्जन हित जीवन नित अर्पित’—दोनों ही समाज सेवा और जनकल्याण के विचार को सामने रखते हैं।”
प्रो. पंत ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के सिद्धांत आज भी उतने ही मूल्यवान हैं और इन्हें आधुनिक संदर्भों से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
रामायण के मूल्य और आज की चुनौतियां
उन्होंने रामायण में निहित मूल्यों—माता-पिता के प्रति कर्तव्य, सामाजिक जिम्मेदारी, सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और राम राज्य के आदर्श—को सतत विकास, स्वास्थ्य, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण जैसे समकालीन विषयों से जोड़ा।
निदेशक ने युवाओं से अपील की कि वे ज्ञान को केवल अधिक वेतन पाने का साधन न मानें, बल्कि इसे समाज सेवा और 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का माध्यम बनाएं।
चरित्र निर्माण के लिए धर्मग्रंथों की जरूरत
सम्मेलन में संत महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतानंद ने मोबाइल और भौतिक सुख-सुविधाओं के इस दौर में चरित्र निर्माण और आंतरिक शांति के लिए रामायण, महाभारत और अन्य धर्मग्रंथों की भूमिका पर प्रकाश डाला।
उन्होंने गंगा तट पर संतों और विद्वानों को एक मंच पर लाने के लिए आयोजकों की सराहना की और कहा कि रामायण जीवन का संपूर्ण मार्गदर्शक ग्रंथ है, जो त्याग, भक्ति, गुरु के प्रति श्रद्धा और सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है।
शोध पत्रों की प्रस्तुति और ‘रामायण रत्न’ सम्मान
उद्घाटन सत्र में “गीता शब्द अनुक्रमणिका” का विमोचन भी किया गया। श्री रामचरित भवन के संस्थापक और ह्यूस्टन-डाउनटाउन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ओम प्रकाश गुप्ता ने बताया कि सम्मेलन में रामायण और संबंधित आध्यात्मिक साहित्य पर आधारित करीब 150 शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे।
इस अवसर पर प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान प्रोफेसर महावीर अग्रवाल को संस्कृत साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में पांच दशकों के शिक्षण, शोध और सेवा के लिए मरणोपरांत “रामायण रत्न” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
यह सम्मेलन शिक्षा, संस्कृति और मूल्यों के संगम के रूप में उभरकर सामने आया है, जो युवाओं को भारतीय परंपरा से जोड़ने और जीवन में संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।




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